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एकादश स्कन्ध · अध्याय 26

ऐल-गीता

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (bhagavata.11.26.1)

श्रीभगवानुवाच मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थितः । आनन्दं परमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम् ॥ १ ॥

śrī-bhagavān uvāca mal-lakṣaṇam imaṁ kāyaṁ labdhvā mad-dharma āsthitaḥ ānandaṁ paramātmānam ātma-sthaṁ samupaiti mām

श्रीभगवान ने कहा — मुझसे युक्त इस शरीर को पाकर तथा मेरे धर्म (भक्ति) में स्थित होकर, मनुष्य आनन्दस्वरूप, आत्मा में ही स्थित परमात्मा — अर्थात् मुझे — प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (bhagavata.11.26.2)

गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया । गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः । वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥

guṇa-mayyā jīva-yonyā vimukto jñāna-niṣṭhayā guṇeṣu māyā-mātreṣu dṛśyamāneṣv avastutaḥ vartamāno 'pi na pumān yujyate 'vastubhir guṇaiḥ

ज्ञान में स्थिर रहने के कारण जो पुरुष गुणमयी जीव-योनि से मुक्त हो गया है, वह गुणों के बीच रहते हुए भी उनसे बद्ध नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि दिखने वाले ये गुण केवल माया हैं, वास्तविक वस्तु नहीं।

श्लोक 3 (bhagavata.11.26.3)

सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित् । तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत् ॥ ३ ॥

saṅgaṁ na kuryād asatāṁ śiśnodara-tṛpāṁ kvacit tasyānugas tamasy andhe pataty andhānugāndha-vat

जो केवल जननेन्द्रिय और उदर की तृप्ति में लगे रहते हैं, ऐसे असज्जनों की संगति कभी नहीं करनी चाहिए। उनका अनुसरण करने वाला व्यक्ति घोर अन्धकार में गिरता है, जैसे एक अन्धा दूसरे अन्धे के पीछे चलकर गिर जाता है।

श्लोक 4 (bhagavata.11.26.4)

ऐलः सम्राडिमां गाथामगायत बृहच्छ्रवाः । उर्वशीविरहान् मुह्यन् निर्विण्णः शोकसंयमे ॥ ४ ॥

ailaḥ samrāḍ imāṁ gāthām agāyata bṛhac-chravāḥ urvaśī-virahān muhyan nirviṇṇaḥ śoka-saṁyame

महाकीर्तिमान सम्राट ऐल ने, उर्वशी के वियोग से मोहित होकर तथा फिर अपने शोक को संयत करते हुए वैराग्य को प्राप्त होकर, यह गीत गाया।

श्लोक 5 (bhagavata.11.26.5)

त्यक्त्वात्मानं व्रजन्तीं तां नग्न उन्मत्तवन्नृपः । विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विक्लवः ॥ ५ ॥

tyaktvātmānaṁ vrayantīṁ tāṁ nagna unmatta-van nṛpaḥ vilapann anvagāj jāye ghore tiṣṭheti viklavaḥ

जब वह उसे त्यागकर जा रही थी, तब राजा नग्न अवस्था में उन्मत्त की भाँति विलाप करते हुए उसके पीछे दौड़ा और व्याकुल होकर कहने लगा — "हे प्रिये, हे कठोर हृदय वाली, ठहरो!"

श्लोक 6 (bhagavata.11.26.6)

कामानतृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः । न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः ॥ ६ ॥

kāmān atṛpto 'nujuṣan kṣullakān varṣa-yāminīḥ na veda yāntīr nāyāntīr urvaśy-ākṛṣṭa-cetanaḥ

उर्वशी के प्रति आकृष्ट-चित्त होने के कारण, वर्षों तक तुच्छ कामनाओं को भोगते हुए भी अतृप्त रहकर, वह यह भी नहीं जान पाता था कि रात्रियाँ कब आती और कब चली जाती हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.11.26.7)

ऐल उवाच अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः । देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डा इमे स्मृताः ॥ ७ ॥

aila uvāca aho me moha-vistāraḥ kāma-kaśmala-cetasaḥ devyā gṛhīta-kaṇṭhasya nāyuḥ-khaṇḍā ime smṛtāḥ

ऐल ने कहा — हाय, देखो मेरे मोह का यह विस्तार! काम से कलुषित मेरे चित्त की यह दशा थी कि जब वह देवी मेरा गला पकड़े रहती थी, तब मुझे यह भी स्मरण नहीं रहता था कि मेरी आयु के ये खण्ड बीत रहे हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.11.26.8)

नाहं वेदाभिनिर्मुक्तः सूर्यो वाभ्युदितोऽमुया । मूषितो वर्षपूगानां बताहानि गतान्युत ॥ ८ ॥

nāhaṁ vedābhinirmuktaḥ sūryo vābhyudito 'muyā mūṣito varṣa-pūgānāṁ batāhāni gatāny uta

उसने मुझे इस प्रकार ठगा कि मुझे सूर्य के उदय अथवा अस्त होने का भी बोध नहीं रहता था। हाय, इस प्रकार मैंने वर्षों के वर्ष व्यर्थ में बिता दिए!

श्लोक 9 (bhagavata.11.26.9)

अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृतः । क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः ॥ ९ ॥

aho me ātma-sammoho yenātmā yoṣitāṁ kṛtaḥ krīḍā-mṛgaś cakravartī naradeva-śikhāmaṇiḥ

हाय, यह मेरा कैसा आत्ममोह था कि मैं, चक्रवर्ती सम्राट, राजाओं का शिरोमणि होते हुए भी, स्त्रियों के हाथ की क्रीड़ा-पशु बन गया!

श्लोक 10 (bhagavata.11.26.10)

सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम् । यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद् रुदन् ॥ १० ॥

sa-paricchadam ātmānaṁ hitvā tṛṇam iveśvaram yāntīṁ striyaṁ cānvagamaṁ nagna unmatta-vad rudan

जिसने मुझ ऐश्वर्यसम्पन्न स्वामी को तिनके के समान त्यागकर जाने दिया, उस जाती हुई स्त्री के पीछे मैं, नग्न, उन्मत्त की भाँति रोता हुआ चला।

श्लोक 11 (bhagavata.11.26.11)

कुतस्तस्यानुभावः स्यात् तेज ईशत्वमेव वा । योऽन्वगच्छंस्त्रियं यान्तीं खरवत् पादताडितः ॥ ११ ॥

kutas tasyānubhāvaḥ syāt teja īśatvam eva vā yo 'nvagacchaṁ striyaṁ yāntīṁ khara-vat pāda-tāḍitaḥ

मेरा वह प्रभाव, तेज तथा स्वामित्व अब कहाँ रहा, जो मैं, गधे की भाँति गधी की लात से पीड़ित होकर भी, जाती हुई उस स्त्री के पीछे-पीछे दौड़ता रहा?

श्लोक 12 (bhagavata.11.26.12)

किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा । किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम् ॥ १२ ॥

kiṁ vidyayā kiṁ tapasā kiṁ tyāgena śrutena vā kiṁ viviktena maunena strībhir yasya mano hṛtam

विद्या से क्या लाभ, तप से क्या, त्याग और शास्त्र-श्रवण से क्या, तथा एकान्तवास और मौन से भी क्या, यदि किसी का मन स्त्रियों द्वारा हर लिया जाए?

श्लोक 13 (bhagavata.11.26.13)

स्वार्थस्याकोविदं धिङ् मां मूर्खं पण्डितमानिनम् । योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः ॥ १३ ॥

svārthasyākovidaṁ dhiṅ māṁ mūrkhaṁ paṇḍita-māninam yo 'ham īśvaratāṁ prāpya strībhir go-khara-vaj jitaḥ

धिक्कार है मुझ जैसे मूर्ख को, जो अपने ही हित को न समझते हुए स्वयं को पण्डित मानता रहा — जो, ईश्वरत्व प्राप्त करके भी, बैल और गधे के समान स्त्रियों द्वारा जीत लिया गया।

श्लोक 14 (bhagavata.11.26.14)

सेवतो वर्षपूगान् मे उर्वश्या अधरासवम् । न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निराहुतिभिर्यथा ॥ १४ ॥

sevato varṣa-pūgān me urvaśyā adharāsavam na tṛpyaty ātma-bhūḥ kāmo vahnir āhutibhir yathā

वर्षों तक उर्वशी के अधरामृत का सेवन करते रहने पर भी मेरी स्वयं-उत्पन्न काम-वासना कभी तृप्त न हुई, जैसे अग्नि आहुतियों से कभी तृप्त नहीं होती।

श्लोक 15 (bhagavata.11.26.15)

पुंश्चल्यापहृतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः । आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम् ॥ १५ ॥

puṁścalyāpahṛtaṁ cittaṁ ko nv anyo mocituṁ prabhuḥ ātmārāmeśvaram ṛte bhagavantam adhokṣajam

एक वेश्या के द्वारा हर लिये गये मेरे इस चित्त को, आत्माराम सन्तों के स्वामी, इन्द्रियातीत भगवान के अतिरिक्त और कौन मुक्त कर सकता है?

श्लोक 16 (bhagavata.11.26.16)

बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मतेः । मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मनः ॥ १६ ॥

bodhitasyāpi devyā me sūkta-vākyena durmateḥ mano-gato mahā-moho nāpayāty ajitātmanaḥ

उस देवी ने स्वयं मुझे सुभाषित वचनों से समझाया, फिर भी दुर्बुद्धि तथा अजितेन्द्रिय मुझ जैसे मूर्ख के मन में बसा वह महामोह दूर नहीं हुआ।

श्लोक 17 (bhagavata.11.26.17)

किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतसः । द्रष्टुः स्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रियः ॥ १७ ॥

kim etayā no 'pakṛtaṁ rajjvā vā sarpa-cetasaḥ draṣṭuḥ svarūpāviduṣo yo 'haṁ yad ajitendriyaḥ

इसमें उसका क्या अपराध, जैसे रस्सी का सर्प समझने में सर्प का कोई दोष नहीं होता? दोष तो मेरा ही है, जो अपने स्वरूप को नहीं जानता और जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.26.18)

क्वायं मलीमसः कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोऽशुचिः । क्व गुणाः सौमनस्याद्या ह्यध्यासोऽविद्यया कृतः ॥ १८ ॥

kvāyaṁ malīmasaḥ kāyo daurgandhyādy-ātmako 'śuciḥ kva guṇāḥ saumanasyādyā hy adhyāso 'vidyayā kṛtaḥ

यह मलिन, दुर्गन्धयुक्त, अपवित्र शरीर कहाँ, और सुन्दरता आदि वे गुण कहाँ, जो केवल अविद्या द्वारा रचा गया एक भ्रम मात्र हैं?

श्लोक 19 (bhagavata.11.26.19)

पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः श्वगृध्रयोः । किमात्मनः किं सुहृदामिति यो नावसीयते ॥ १९ ॥

pitroḥ kiṁ svaṁ nu bhāryāyāḥ svāmino 'gneḥ śva-gṛdhrayoḥ kim ātmanaḥ kiṁ suhṛdām iti yo nāvasīyate

यह शरीर वास्तव में किसका है — माता-पिता का, पत्नी का, स्वामी का, अग्नि का, अथवा कुत्तों और गिद्धों का? क्या यह आत्मा का है या मित्रों का — यह कोई निश्चित नहीं कर पाता।

श्लोक 20 (bhagavata.11.26.20)

तस्मिन् कलेवरेऽमेध्ये तुच्छनिष्ठे विषज्जते । अहो सुभद्रं सुनसं सुस्मितं च मुखं स्त्रियः ॥ २० ॥

tasmin kalevare 'medhye tuccha-niṣṭhe viṣajjate aho su-bhadraṁ su-nasaṁ su-smitaṁ ca mukhaṁ striyaḥ

फिर भी मनुष्य उसी अपवित्र, तुच्छ परिणाम वाले शरीर में आसक्त होकर कहता है — "अहा, कैसा सुन्दर, कैसा सुडौल नाक वाला, कैसी मधुर मुस्कान वाला है इस स्त्री का मुख!"

श्लोक 21 (bhagavata.11.26.21)

त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ । विण्मूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम् ॥ २१ ॥

tvaṅ-māṁsa-rudhira-snāyu- medo-majjāsthi-saṁhatau viṇ-mūtra-pūye ramatāṁ kṛmīṇāṁ kiyad antaram

त्वचा, मांस, रुधिर, स्नायु, मेद, मज्जा और हड्डी के इस पिण्ड में, तथा मल, मूत्र और पीब में रमण करने वाले कीड़ों में — कितना अन्तर है?

श्लोक 22 (bhagavata.11.26.22)

अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित् । विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा ॥ २२ ॥

athāpi nopasajjeta strīṣu straiṇeṣu cārtha-vit viṣayendriya-saṁyogān manaḥ kṣubhyati nānyathā

फिर भी अर्थ को जानने वाले को स्त्रियों से अथवा स्त्री-आसक्त पुरुषों से संग नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषयों के साथ इन्द्रियों के संयोग से ही मन विचलित होता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 23 (bhagavata.11.26.23)

अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते । असम्प्रयुञ्जतः प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मनः ॥ २३ ॥

adṛṣṭād aśrutād bhāvān na bhāva upajāyate asamprayuñjataḥ prāṇān śāmyati stimitaṁ manaḥ

जो देखा या सुना ही नहीं गया, उससे कोई भाव (आकर्षण) उत्पन्न नहीं होता। इसलिए जो इन्द्रियों को विषयों में नहीं लगाता, उसका मन शान्त होकर स्थिर हो जाता है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.26.24)

तस्मात् सङ्गो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः । विदुषां चाप्यविस्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम् ॥ २४ ॥

tasmāt saṅgo na kartavyaḥ strīṣu straiṇeṣu cendriyaiḥ viduṣāṁ cāpy avisrabdhaḥ ṣaḍ-vargaḥ kim u mādṛśām

इसलिए इन्द्रियों के द्वारा स्त्रियों से अथवा स्त्री-आसक्त पुरुषों से संग नहीं करना चाहिए। विद्वान भी छह आन्तरिक शत्रुओं पर विश्वास नहीं कर सकते, तो मुझ जैसों की तो बात ही क्या।

श्लोक 25 (bhagavata.11.26.25)

श्रीभगवानुवाच एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः स उर्वशीलोकमथो विहाय । आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै उपारमज्ज्ञानविधूतमोहः ॥ २५ ॥

śrī-bhagavān uvāca evaṁ pragāyan nṛpa-deva-devaḥ sa urvaśī-lokam atho vihāya ātmānam ātmany avagamya māṁ vai upāramaj jñāna-vidhūta-mohaḥ

श्रीभगवान ने कहा — इस प्रकार गाते हुए, देवताओं में भी पूजनीय उस राजाधिराज ने उर्वशी के उस लोक को त्याग दिया। आत्मा में ही आत्मा का साक्षात्कार कर, ज्ञान से मोह को दूर कर, वह मुझमें ही उपरत (शान्त) हो गया।

श्लोक 26 (bhagavata.11.26.26)

ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान् । सन्त एवास्य छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ २६ ॥

tato duḥsaṅgam utsṛjya satsu sajjeta buddhimān santa evāsya chindanti mano-vyāsaṅgam uktibhiḥ

इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह कुसंग को त्यागकर सत्पुरुषों की संगति करे, क्योंकि सन्त ही अपने वचनों से मन के अत्यधिक आसक्ति-बन्धन को काट देते हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.11.26.27)

सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः । निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ॥ २७ ॥

santo 'napekṣā mac-cittāḥ praśāntāḥ sama-darśinaḥ nirmamā nirahaṅkārā nirdvandvā niṣparigrahāḥ

मेरे सन्त भक्त निरपेक्ष, मुझमें ही चित्त लगाये हुए, परम शान्त तथा समदर्शी होते हैं; वे ममता, अहंकार, द्वन्द्व तथा संग्रह-वृत्ति से रहित होते हैं।

श्लोक 28 (bhagavata.11.26.28)

तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः । सम्भवन्ति हि ता नृणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम् ॥ २८ ॥

teṣu nityaṁ mahā-bhāga mahā-bhāgeṣu mat-kathāḥ sambhavanti hi tā nṝṇāṁ juṣatāṁ prapunanty agham

हे परम भाग्यशाली उद्धव, उन महाभाग सन्तों के मध्य सदैव मेरी ही कथा होती है, और उसका आदरपूर्वक सेवन करने वाले मनुष्यों के समस्त पाप निश्चय ही धुल जाते हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.11.26.29)

ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः । मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि ॥ २९ ॥

tā ye śṛṇvanti gāyanti hy anumodanti cādṛtāḥ mat-parāḥ śraddadhānāś ca bhaktiṁ vindanti te mayi

जो लोग आदरपूर्वक इन कथाओं को सुनते हैं, गाते हैं और अनुमोदन करते हैं, वे मुझमें ही श्रद्धावान तथा तत्पर होकर मेरी भक्ति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.11.26.30)

भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते । मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ॥ ३० ॥

bhaktiṁ labdhavataḥ sādhoḥ kim anyad avaśiṣyate mayy ananta-guṇe brahmaṇy ānandānubhavātmani

अनन्त गुणों वाले, आनन्दानुभवस्वरूप ब्रह्म मुझमें भक्ति प्राप्त कर लेने वाले साधु के लिए और क्या शेष रह जाता है?

श्लोक 31 (bhagavata.11.26.31)

यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम् । शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा ॥ ३१ ॥

yathopaśrayamāṇasya bhagavantaṁ vibhāvasum śītaṁ bhayaṁ tamo 'pyeti sādhūn saṁsevatas tathā

जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि की शरण लेने वाले की शीत, भय तथा अन्धकार दूर हो जाते हैं, उसी प्रकार सन्तों की सेवा करने वाले के भी दूर हो जाते हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.11.26.32)

निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायणम् । सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम् ॥ ३२ ॥

nimajjyonmajjatāṁ ghore bhavābdhau paramāyaṇam santo brahma-vidaḥ śāntā naur dṛḍhevāpsu majjatām

इस भयंकर भवसागर में डूबते-उतराते जीवों के लिए ब्रह्मज्ञानी, शान्त सन्त ही परम आश्रय हैं, जैसे डूबते हुए के लिए जल में एक दृढ़ नौका।

श्लोक 33 (bhagavata.11.26.33)

अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम् । धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम् ॥ ३३ ॥

annaṁ hi prāṇināṁ prāṇa ārtānāṁ śaraṇaṁ tv aham dharmo vittaṁ nṛṇāṁ pretya santo 'rvāg bibhyato 'raṇam

जैसे अन्न प्राणियों का प्राण है, जैसे मैं दुःखियों का शरण हूँ, तथा जैसे धर्म मरणोपरान्त मनुष्यों का धन है, वैसे ही सन्त इस लोक में भयभीत जनों के आश्रय हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.11.26.34)

सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः । देवता बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माहमेव च ॥ ३४ ॥

santo diśanti cakṣūṁṣi bahir arkaḥ samutthitaḥ devatā bāndhavāḥ santaḥ santa ātmāham eva ca

सन्त सच्ची दृष्टि प्रदान करते हैं, जबकि बाहरी सूर्य केवल उदय होने पर ही दिखा पाता है। सन्त ही सच्चे देवता हैं, सच्चे बान्धव हैं, सन्त ही आत्मा हैं, और अन्ततः वे मुझसे अभिन्न हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.11.26.35)

वैतसेनस्ततोऽप्येवमुर्वश्या लोकनिष्पृहः । मुक्तसङ्गो महीमेतामात्मारामश्चचार ह ॥ ३५ ॥

vaitasenas tato 'py evam urvaśyā loka-niṣpṛhaḥ mukta-saṅgo mahīm etām ātmārāmaś cacāra ha

इस प्रकार वैतसेन (ऐल) उर्वशी के लोक की समस्त कामना से रहित होकर, आसक्ति से मुक्त तथा आत्मा में ही रमण करते हुए इस पृथ्वी पर विचरण करने लगा।

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