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एकादश स्कन्ध · अध्याय 27

अर्चा-विधि पर श्रीकृष्ण का उपदेश

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (bhagavata.11.27.1)

श्रीउद्धव उवाच क्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधनं प्रभो । यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वताः सात्वतर्षभ ॥ १ ॥

śrī-uddhava uvāca kriyā-yogaṁ samācakṣva bhavad-ārādhanaṁ prabho yasmāt tvāṁ ye yathārcanti sātvatāḥ sātvatarṣabha

श्री उद्धव ने कहा — हे प्रभो, आप अपनी आराधना की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए, जिससे हे सात्वतश्रेष्ठ, आपके सात्वत भक्त जिस आधार पर और जिस विधि से आपकी अर्चना करते हैं, वह मुझे ज्ञात हो।

श्लोक 2 (bhagavata.11.27.2)

एतद् वदन्ति मुनयो मुहुर्निःश्रेयसं नृणाम् । नारदो भगवान् व्यास आचार्योऽङ्गिरसः सुतः ॥ २ ॥

etad vadanti munayo muhur niḥśreyasaṁ nṛṇām nārado bhagavān vyāsa ācāryo 'ṅgirasaḥ sutaḥ

मुनिजन बार-बार यही कहते हैं कि यह मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी है — यह भगवान नारद, वेदव्यास तथा मेरे गुरु अंगिरा-पुत्र [बृहस्पति] का भी मत है।

श्लोक 3 (bhagavata.11.27.3)

निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः । पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः ॥ ३ ॥

niḥsṛtaṁ te mukhāmbhojād yad āha bhagavān ajaḥ putrebhyo bhṛgu-mukhyebhyo devyai ca bhagavān bhavaḥ

यह उपदेश पहले आपके ही कमल-मुख से निकला था, फिर भगवान अज (ब्रह्मा) ने भृगु आदि अपने पुत्रों को, तथा भगवान भव (शिव) ने देवी [पार्वती] को इसे सुनाया।

श्लोक 4 (bhagavata.11.27.4)

एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम् । श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद ॥ ४ ॥

etad vai sarva-varṇānām āśramāṇāṁ ca sammatam śreyasām uttamaṁ manye strī-śūdrāṇāṁ ca māna-da

हे मानद, मैं मानता हूँ कि यह विधि सभी वर्णों तथा आश्रमों को मान्य है, तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी कल्याण का सर्वोत्तम साधन है।

श्लोक 5 (bhagavata.11.27.5)

एतत् कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम् । भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर ॥ ५ ॥

etat kamala-patrākṣa karma-bandha-vimocanam bhaktāya cānuraktāya brūhi viśveśvareśvara

हे कमलनयन, हे विश्वेश्वरों के भी ईश्वर, कर्म के बन्धन से मुक्ति देने वाली इस विधि को अपने अनुरक्त भक्त को समझाइए।

श्लोक 6 (bhagavata.11.27.6)

श्रीभगवानुवाच न ह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव । सङ्क्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ६ ॥

śrī-bhagavān uvāca na hy anto 'nanta-pārasya karma-kāṇḍasya coddhava saṅkṣiptaṁ varṇayiṣyāmi yathāvad anupūrvaśaḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे उद्धव, कर्मकाण्ड का कोई अन्त नहीं है, वह अनन्त है; अतः मैं उसे संक्षेप में, यथाक्रम, ठीक-ठीक वर्णन करूँगा।

श्लोक 7 (bhagavata.11.27.7)

वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः । त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चरेत् ॥ ७ ॥

vaidikas tāntriko miśra iti me tri-vidho makhaḥ trayāṇām īpsitenaiva vidhinā māṁ samarcaret

मेरा यज्ञ (आराधना) वैदिक, तान्त्रिक तथा मिश्र — इस प्रकार तीन प्रकार का है। मनुष्य को इन तीनों में से जो विधि उसे अभीष्ट हो, उसी से मेरी सम्यक् आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 8 (bhagavata.11.27.8)

यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः । यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥ ८ ॥

yadā sva-nigamenoktaṁ dvijatvaṁ prāpya pūruṣaḥ yathā yajeta māṁ bhaktyā śraddhayā tan nibodha me

जब पुरुष अपनी शाखा के वेद में कहे अनुसार द्विजत्व को प्राप्त कर लेता है, तब वह किस प्रकार श्रद्धा तथा भक्ति से मेरा यजन करे, यह मुझसे सुनो।

श्लोक 9 (bhagavata.11.27.9)

अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजः । द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया ॥ ९ ॥

arcāyāṁ sthaṇḍile 'gnau vā sūrye vāpsu hṛdi dvijaḥ dravyeṇa bhakti-yukto 'rcet sva-guruṁ mām amāyayā

द्विज को चाहिए कि वह अर्चा-विग्रह में, स्थण्डिल (भूमि) पर, अग्नि में, सूर्य में, जल में अथवा हृदय में, निष्कपट भाव से, उपयुक्त सामग्री सहित भक्तिपूर्वक मुझ अपने आराध्य गुरु की अर्चना करे।

श्लोक 10 (bhagavata.11.27.10)

पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये । उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैर्मृद्ग्रहणादिना ॥ १० ॥

pūrvaṁ snānaṁ prakurvīta dhauta-danto 'ṅga-śuddhaye ubhayair api ca snānaṁ mantrair mṛd-grahaṇādinā

पहले दाँत साफ कर शरीर की शुद्धि के लिए स्नान करना चाहिए, फिर मिट्टी आदि से तथा वैदिक व तान्त्रिक — दोनों प्रकार के मन्त्रों से दुबारा स्नान करना चाहिए।

श्लोक 11 (bhagavata.11.27.11)

सन्ध्योपास्त्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानि मे । पूजां तैः कल्पयेत् सम्यक् सङ्कल्पः कर्मपावनीम् ॥ ११ ॥

sandhyopāstyādi-karmāṇi vedenācoditāni me pūjāṁ taiḥ kalpayet samyak- saṅkalpaḥ karma-pāvanīm

वेद द्वारा विहित संध्योपासना आदि कर्मों को सम्यक् संकल्प के साथ मेरी पूजा के रूप में सम्पन्न करना चाहिए, क्योंकि वे कर्मों को पवित्र करने वाले हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.11.27.12)

शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती । मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ॥ १२ ॥

śailī dāru-mayī lauhī lepyā lekhyā ca saikatī mano-mayī maṇi-mayī pratimāṣṭa-vidhā smṛtā

प्रतिमा आठ प्रकार की मानी गई है — पाषाण की, काष्ठ की, धातु की, मिट्टी की, चित्रित, रेखांकित, बालू की, तथा मानसिक और रत्ननिर्मित।

श्लोक 13 (bhagavata.11.27.13)

चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम् । उद्वासावाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥ १३ ॥

calācaleti dvi-vidhā pratiṣṭhā jīva-mandiram udvāsāvāhane na staḥ sthirāyām uddhavārcane

सर्वजीवों के आश्रयस्वरूप भगवान की प्रतिष्ठा दो प्रकार की होती है — चल तथा अचल। हे उद्धव, स्थिर अर्चा में आवाहन और विसर्जन नहीं होता।

श्लोक 14 (bhagavata.11.27.14)

अस्थिरायां विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम् । स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम् ॥ १४ ॥

asthirāyāṁ vikalpaḥ syāt sthaṇḍile tu bhaved dvayam snapanaṁ tv avilepyāyām anyatra parimārjanam

अस्थिर प्रतिमा में आवाहन-विसर्जन वैकल्पिक है, परन्तु भूमि पर स्थापित प्रतिमा में दोनों अनिवार्य हैं। स्नान जल से किया जाता है, सिवाय लेप से बनी प्रतिमा के, जिसमें मात्र परिमार्जन ही पर्याप्त है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.27.15)

द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वमायिनः । भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चैव हि ॥ १५ ॥

dravyaiḥ prasiddhair mad-yāgaḥ pratimādiṣv amāyinaḥ bhaktasya ca yathā-labdhair hṛdi bhāvena caiva hi

मेरी अर्चा आदि की पूजा प्रायः उत्तम सामग्री से करनी चाहिए, परन्तु निष्कपट भक्त जो कुछ भी उसे सहज ही प्राप्त हो, उसी से — यहाँ तक कि केवल हृदय के भाव से भी — मेरी पूजा कर सकता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.27.16)

स्नानालङ्करणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव । स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः ॥ १६ ॥

snānālaṅkaraṇaṁ preṣṭham arcāyām eva tūddhava sthaṇḍile tattva-vinyāso vahnāv ājya-plutaṁ haviḥ

हे उद्धव, अर्चाविग्रह में स्नान और शृंगार मुझे सबसे प्रिय हैं; भूमि पर की गई प्रतिमा में तत्त्व-न्यास प्रिय है; तथा अग्नि में घृत से सिंचित हवि प्रिय है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.27.17)

सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः । श्रद्धयोपाहृतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि ॥ १७ ॥

sūrye cābhyarhaṇaṁ preṣṭhaṁ salile salilādibhiḥ śraddhayopāhṛtaṁ preṣṭhaṁ bhaktena mama vāry api

सूर्य में अभ्यर्हण (अर्घ्य आदि से पूजा) प्रिय है, जल में जलादि से पूजा प्रिय है; परन्तु मेरे भक्त द्वारा श्रद्धा से अर्पित वस्तु — चाहे वह केवल जल ही क्यों न हो — मुझे सर्वाधिक प्रिय है।

श्लोक 18 (bhagavata.11.27.18)

भूर्यप्यभक्तोपाहृतं न मे तोषाय कल्पते । गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः ॥ १८ ॥

bhūry apy abhaktopāhṛtaṁ na me toṣāya kalpate gandho dhūpaḥ sumanaso dīpo 'nnādyaṁ ca kiṁ punaḥ

अभक्त द्वारा लाई गई अत्यन्त प्रचुर सामग्री भी मुझे संतुष्ट नहीं करती — फिर सुगन्ध, धूप, पुष्प, दीप तथा अन्न-भोग की तो बात ही क्या!

श्लोक 19 (bhagavata.11.27.19)

शुचिः सम्भृतसम्भारः प्राग्दर्भैः कल्पितासनः । आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायां त्वथ सम्मुखः ॥ १९ ॥

śuciḥ sambhṛta-sambhāraḥ prāg-darbhaiḥ kalpitāsanaḥ āsīnaḥ prāg udag vārced arcāyāṁ tv atha sammukhaḥ

पवित्र होकर तथा सामग्री एकत्रित कर, पूर्वाभिमुख कुशाओं से आसन बनाकर, पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख कर बैठे — अथवा यदि स्थिर अर्चा हो, तो उसके सम्मुख बैठकर पूजा करे।

श्लोक 20 (bhagavata.11.27.20)

कृतन्यासः कृतन्यासां मदर्चां पाणिना मृजेत् । कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत् ॥ २० ॥

kṛta-nyāsaḥ kṛta-nyāsāṁ mad-arcāṁ pāṇināmṛjet kalaśaṁ prokṣaṇīyaṁ ca yathāvad upasādhayet

न्यास किए हुए पुरुष को चाहिए कि वह अपने हाथ से न्यासयुक्त मेरी अर्चा का प्रमार्जन करे, तथा कलश और प्रोक्षणी-पात्र को विधिपूर्वक तैयार करे।

श्लोक 21 (bhagavata.11.27.21)

तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च । प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत् ॥ २१ ॥

tad-adbhir deva-yajanaṁ dravyāṇy ātmānam eva ca prokṣya pātrāṇi trīṇy adbhis tais tair dravyaiś ca sādhayet

उस जल से पूजा-स्थान, सामग्री तथा स्वयं को सींचकर, उन्हीं सामग्रियों और उसी जल से तीन पात्रों को तैयार करे।

श्लोक 22 (bhagavata.11.27.22)

पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि देशिकः । हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥ २२ ॥

pādyārghyācamanīyārthaṁ trīṇi pātrāṇi deśikaḥ hṛdā śīrṣṇātha śikhayā gāyatryā cābhimantrayet

आचार्य को पाद्य, अर्घ्य तथा आचमनीय के लिए बनाए तीन पात्रों को हृदय, शिर, शिखा तथा गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित करना चाहिए।

श्लोक 23 (bhagavata.11.27.23)

पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम । अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥ २३ ॥

piṇḍe vāyv-agni-saṁśuddhe hṛt-padma-sthāṁ parāṁ mama aṇvīṁ jīva-kalāṁ dhyāyen nādānte siddha-bhāvitām

वायु और अग्नि [प्राणायाम] से शुद्ध हुए शरीर में हृदय-कमल में स्थित मेरी परम, सूक्ष्म जीव-कला का ध्यान करे, जिसे सिद्धजन ॐकार की ध्वनि के अन्त में अनुभव करते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.11.27.24)

तयात्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः । आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २४ ॥

tayātma-bhūtayā piṇḍe vyāpte sampūjya tan-mayaḥ āvāhyārcādiṣu sthāpya nyastāṅgaṁ māṁ prapūjayet

आत्मस्वरूप हुई उस [कला] से व्याप्त शरीर में तन्मय होकर पूजा करते हुए, अंग-न्यास करके, अर्चा आदि में उसका आवाहन और स्थापन करके, वह मेरी पूर्ण पूजा करे।

श्लोक 25 (bhagavata.11.27.25)

पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत् । धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वासनं मम ॥ २५ ॥

pādyopasparśārhaṇādīn upacārān prakalpayet dharmādibhiś ca navabhiḥ kalpayitvāsanaṁ mama

धर्म आदि नौ [देवताओं] सहित मेरे आसन की कल्पना करके, पाद्य, उपस्पर्श तथा अर्घ्य आदि उपचारों की व्यवस्था करे।

श्लोक 26 (bhagavata.11.27.26)

पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम् । उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये ॥ २६ ॥

padmam aṣṭa-dalaṁ tatra karṇikā-kesarojjvalam ubhābhyāṁ veda-tantrābhyāṁ mahyaṁ tūbhaya-siddhaye

वहाँ कर्णिका और केसर से उज्ज्वल अष्टदल कमल की कल्पना करे, और वैदिक तथा तान्त्रिक — दोनों विधियों से मेरी पूजा करे, जिससे दोनों [इहलोक और परलोक] की सिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 27 (bhagavata.11.27.27)

सुदर्शनं पाञ्चजन्यं गदासीषुधनुर्हलान् । मुषलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥ २७ ॥

sudarśanaṁ pāñcajanyaṁ gadāsīṣu-dhanur-halān muṣalaṁ kaustubhaṁ mālāṁ śrīvatsaṁ cānupūjayet

फिर क्रमशः सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, गदा, खड्ग, बाण, धनुष तथा हल, मुसल, कौस्तुभमणि, वनमाला तथा श्रीवत्स-चिह्न की पूजा करे।

श्लोक 28 (bhagavata.11.27.28)

नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च । महाबलं बलं चैव कुमुदं कमुदेक्षणम् ॥ २८ ॥

nandaṁ sunandaṁ garuḍaṁ pracaṇḍaṁ caṇḍam eva ca mahābalaṁ balaṁ caiva kumudaṁ kumudekṣaṇam

नन्द, सुनन्द, गरुड़, प्रचण्ड और चण्ड, महाबल और बल, तथा कुमुद और कुमुदेक्षण की भी पूजा करे।

श्लोक 29 (bhagavata.11.27.29)

दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून्सुरान् । स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः ॥ २९ ॥

durgāṁ vināyakaṁ vyāsaṁ viṣvaksenaṁ gurūn surān sve sve sthāne tv abhimukhān pūjayet prokṣaṇādibhiḥ

दुर्गा, विनायक, व्यास, विष्वक्सेन, गुरुजनों तथा देवताओं की भी, अपने-अपने उचित स्थान पर सम्मुख रखकर, प्रोक्षण आदि विधियों से पूजा करे।

श्लोक 30 (bhagavata.11.27.30)

चन्दनोशीरकर्पूरकुङ्कुमागुरुवासितैः । सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥

candanośīra-karpūra- kuṅkumāguru-vāsitaiḥ salilaiḥ snāpayen mantrair nityadā vibhave sati

यथाशक्ति नित्य ही चन्दन, उशीर, कर्पूर, कुंकुम तथा अगरु से सुवासित जल द्वारा मन्त्रों सहित अर्चाविग्रह को स्नान कराए।

श्लोक 31 (bhagavata.11.27.31)

स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया । पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ ३१ ॥

svarṇa-gharmānuvākena mahāpuruṣa-vidyayā pauruṣeṇāpi sūktena sāmabhī rājanādibhiḥ

स्वर्णघर्म अनुवाक, महापुरुष-विद्या, पुरुष-सूक्त, तथा राजन आदि साम-गानों से भी स्नान कराए।

श्लोक 32 (bhagavata.11.27.32)

वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनैः । अलङ्कुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम् ॥ ३२ ॥

vastropavītābharaṇa- patra-srag-gandha-lepanaiḥ alaṅkurvīta sa-prema mad-bhakto māṁ yathocitam

मेरा भक्त प्रेमपूर्वक तथा यथोचित रीति से मुझे वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, तिलक-पत्र, माला तथा सुगन्धित लेप से अलंकृत करे।

श्लोक 33 (bhagavata.11.27.33)

पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान् । धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चकः ॥ ३३ ॥

pādyam ācamanīyaṁ ca gandhaṁ sumanaso 'kṣatān dhūpa-dīpopahāryāṇi dadyān me śraddhayārcakaḥ

पूजक श्रद्धापूर्वक मुझे पाद्य, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप तथा अन्य उपहार अर्पित करे।

श्लोक 34 (bhagavata.11.27.34)

गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान् । संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥ ३४ ॥

guḍa-pāyasa-sarpīṁṣi śaṣkuly-āpūpa-modakān saṁyāva-dadhi-sūpāṁś ca naivedyaṁ sati kalpayet

अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुड़, खीर, घृत, शष्कुली, अपूप, मोदक, संयाव, दधि तथा सूप (शाक-रस) आदि का नैवेद्य अर्पित करे।

श्लोक 35 (bhagavata.11.27.35)

अभ्यङ्गोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम् । अन्नाद्यगीतनृत्यानि पर्वणि स्युरुतान्वहम् ॥ ३५ ॥

abhyaṅgonmardanādarśa- danta-dhāvābhiṣecanam annādya-gīta-nṛtyāni parvaṇi syur utānv-aham

उबटन, मालिश, दर्पण-दर्शन, दन्तधावन तथा अभिषेक, साथ ही अन्न-भोग, गीत और नृत्य — ये सब पर्वों पर, और यदि संभव हो तो प्रतिदिन, करने चाहिए।

श्लोक 36 (bhagavata.11.27.36)

विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभिः । अग्निमाधाय परितः समूहेत् पाणिनोदितम् ॥ ३६ ॥

vidhinā vihite kuṇḍe mekhalā-garta-vedibhiḥ agnim ādhāya paritaḥ samūhet pāṇinoditam

विधिपूर्वक बनाए गए कुण्ड में, मेखला, गर्त तथा वेदी सहित अग्नि स्थापित कर, अपने ही हाथों से एकत्रित की गई समिधा को चारों ओर व्यवस्थित करे।

श्लोक 37 (bhagavata.11.27.37)

परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि । प्रोक्षण्यासाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम् ॥ ३७ ॥

paristīryātha paryukṣed anvādhāya yathā-vidhi prokṣaṇyāsādya dravyāṇi prokṣyāgnau bhāvayeta mām

कुशा बिछाकर, विधिपूर्वक अभिषिंचन और अन्वाधान कर, प्रोक्षणी से सामग्री का प्रोक्षण करे, और फिर अग्नि में मेरा ध्यान करे।

श्लोक 38 (bhagavata.11.27.38)

तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः । लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिञ्जल्कवाससम् ॥ ३८ ॥

tapta-jāmbūnada-prakhyaṁ śaṅkha-cakra-gadāmbujaiḥ lasac-catur-bhujaṁ śāntaṁ padma-kiñjalka-vāsasam

तप्त सुवर्ण के समान वर्ण वाले, शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुशोभित चार भुजाओं वाले, शान्त, कमल-केसर के रंग का वस्त्र धारण किए हुए उस रूप का ध्यान करे —

श्लोक 39 (bhagavata.11.27.39)

स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवराङ्गदम् । श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥ ३९ ॥

sphurat-kirīṭa-kaṭaka kaṭi-sūtra-varāṅgadam śrīvatsa-vakṣasaṁ bhrājat- kaustubhaṁ vana-mālinam

— जिसका मुकुट, कंकण, करधनी तथा भुजबन्ध चमक रहे हों, जिसके वक्षस्थल पर श्रीवत्स-चिह्न तथा देदीप्यमान कौस्तुभमणि हो, और जो वनमाला धारण किए हो।

श्लोक 40 (bhagavata.11.27.40)

ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणि हविषाभिघृतानि च । प्रास्याज्यभागावाघारौ दत्त्वा चाज्यप्लुतं हविः ॥ ४० ॥

dhyāyann abhyarcya dārūṇi haviṣābhighṛtāni ca prāsyājya-bhāgāv āghārau dattvā cājya-plutaṁ haviḥ

इस प्रकार ध्यान कर तथा पूजा कर, वह घृत में डुबोई हुई समिधाओं को अर्पित करे; आज्यभाग तथा आघार की दोनों आहुतियाँ देकर, घृतसिक्त हवि अर्पित करे —

श्लोक 41 (bhagavata.11.27.41)

जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशर्चावदानतः । धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रैः स्विष्टिकृतं बुधः ॥ ४१ ॥

juhuyān mūla-mantreṇa ṣoḍaśarcāvadānataḥ dharmādibhyo yathā-nyāyaṁ mantraiḥ sviṣṭi-kṛtaṁ budhaḥ

— विद्वान पूजक मूल-मन्त्र से षोडश-ऋचाओं (पुरुष-सूक्त) की आहुतियाँ अर्पित करे, तथा विधिपूर्वक धर्म आदि देवताओं के मन्त्रों से स्विष्टिकृत-होम भी करे।

श्लोक 42 (bhagavata.11.27.42)

अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत् । मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन्नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥

abhyarcyātha namaskṛtya pārṣadebhyo baliṁ haret mūla-mantraṁ japed brahma smaran nārāyaṇātmakam

इस प्रकार पूजा और नमस्कार कर, भगवान के पार्षदों को बलि अर्पित करे, तथा भगवान नारायण का स्मरण करते हुए मूल-मन्त्र का मौन जप करे।

श्लोक 43 (bhagavata.11.27.43)

दत्त्वाचमनमुच्छेषं विष्वक्सेनाय कल्पयेत् । मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत् ॥ ४३ ॥

dattvācamanam uccheṣaṁ viṣvaksenāya kalpayet mukha-vāsaṁ surabhimat tāmbūlādyam athārhayet

पुनः आचमन जल अर्पित कर, शेष प्रसाद विष्वक्सेन के लिए रख दे, तत्पश्चात् सुगन्धित मुखवास तथा ताम्बूल आदि अर्पित करे।

श्लोक 44 (bhagavata.11.27.44)

उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम । मत्कथाः श्रावयन् शृण्वन् मुहूर्तं क्षणिको भवेत् ॥ ४४ ॥

upagāyan gṛṇan nṛtyan karmāṇy abhinayan mama mat-kathāḥ śrāvayan śṛṇvan muhūrtaṁ kṣaṇiko bhavet

साथ में गाते, स्तुति करते, नाचते, मेरी लीलाओं का अभिनय करते तथा मेरी कथाएँ सुनते-सुनाते हुए, वह कुछ समय के लिए इसी उत्सव में तल्लीन हो जाए।

श्लोक 45 (bhagavata.11.27.45)

स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि । स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत् ॥ ४५ ॥

stavair uccāvacaiḥ stotraiḥ paurāṇaiḥ prākṛtair api stutvā prasīda bhagavann iti vandeta daṇḍa-vat

पुराणों तथा लोकप्रचलित नाना स्तवों और स्तोत्रों से भगवान की स्तुति कर, "हे भगवन्, प्रसन्न होइए" कहते हुए दण्डवत् प्रणाम करे।

श्लोक 46 (bhagavata.11.27.46)

शिरो मत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम् । प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात् ॥ ४६ ॥

śiro mat-pādayoḥ kṛtvā bāhubhyāṁ ca parasparam prapannaṁ pāhi mām īśa bhītaṁ mṛtyu-grahārṇavāt

अपना शिर मेरे चरणों में रखकर तथा दोनों भुजाओं को जोड़कर [प्रार्थना करे] — "हे ईश, मृत्यु के ग्रास-रूपी इस सागर से भयभीत, शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।"

श्लोक 47 (bhagavata.11.27.47)

इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम् । उद्वासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः ॥ ४७ ॥

iti śeṣāṁ mayā dattāṁ śirasy ādhāya sādaram udvāsayec ced udvāsyaṁ jyotir jyotiṣi tat punaḥ

इस प्रकार [प्रार्थना कर], मेरे द्वारा दिए गए शेष प्रसाद को आदरपूर्वक शिर पर धारण करे; और यदि वह विसर्जनीय अर्चा हो, तो उस ज्योति को पुनः [हृदय की] ज्योति में विलीन कर विसर्जित करे।

श्लोक 48 (bhagavata.11.27.48)

अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत् । सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः ॥ ४८ ॥

arcādiṣu yadā yatra śraddhā māṁ tatra cārcayet sarva-bhūteṣv ātmani ca sarvātmāham avasthitaḥ

अर्चा आदि जिस भी रूप में और जहाँ भी श्रद्धा हो, वहीं मेरी पूजा करनी चाहिए, क्योंकि सर्वात्मा मैं ही समस्त प्राणियों में तथा आत्मा में भी स्थित हूँ।

श्लोक 49 (bhagavata.11.27.49)

एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः । अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम् ॥ ४९ ॥

evaṁ kriyā-yoga-pathaiḥ pumān vaidika-tāntrikaiḥ arcann ubhayataḥ siddhiṁ matto vindaty abhīpsitām

इस प्रकार वैदिक और तान्त्रिक क्रियायोग की विधियों से मेरी पूजा करने वाला पुरुष मुझसे इहलोक और परलोक, दोनों की अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 50 (bhagavata.11.27.50)

मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम् । पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान् ॥ ५० ॥

mad-arcāṁ sampratiṣṭhāpya mandiraṁ kārayed dṛḍham puṣpodyānāni ramyāṇi pūjā-yātrotsavāśritān

मेरी अर्चा को सुदृढ़ रूप से प्रतिष्ठित कर मन्दिर का निर्माण कराना चाहिए, तथा नित्य पूजा, यात्रा और उत्सव के लिए सुन्दर पुष्प-उद्यान भी लगाने चाहिए।

श्लोक 51 (bhagavata.11.27.51)

पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम् । क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्त्वा मत्सार्ष्टितामियात् ॥ ५१ ॥

pūjādīnāṁ pravāhārthaṁ mahā-parvasv athānv-aham kṣetrāpaṇa-pura-grāmān dattvā mat-sārṣṭitām iyāt

जो पूजा आदि की नित्य तथा महापर्वों की व्यवस्था अबाध चलती रहे, इसके लिए क्षेत्र, बाजार, नगर तथा ग्राम दान करता है, वह मेरे समान ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

श्लोक 52 (bhagavata.11.27.52)

प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् । पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५२ ॥

pratiṣṭhayā sārvabhaumaṁ sadmanā bhuvana-trayam pūjādinā brahma-lokaṁ tribhir mat-sāmyatām iyāt

प्रतिष्ठा से सम्पूर्ण पृथ्वी का, मन्दिर-निर्माण से तीनों लोकों का, तथा पूजा आदि से ब्रह्मलोक का [स्वामित्व] प्राप्त होता है; और इन तीनों को साथ करने से मेरे समान स्वरूप की प्राप्ति होती है।

श्लोक 53 (bhagavata.11.27.53)

मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति । भक्तियोगं स लभत एवं यः पूजयेत माम् ॥ ५३ ॥

mām eva nairapekṣyeṇa bhakti-yogena vindati bhakti-yogaṁ sa labhata evaṁ yaḥ pūjayeta mām

परन्तु जो निरपेक्ष भाव से भक्तियोग द्वारा [पूजा करता है], वह मुझे ही प्राप्त होता है। इस प्रकार जो कोई मेरी पूजा करता है, वह भक्तियोग को प्राप्त करता है।

श्लोक 54 (bhagavata.11.27.54)

यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः । वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम् ॥ ५४ ॥

yaḥ sva-dattāṁ parair dattāṁ hareta sura-viprayoḥ vṛttiṁ sa jāyate viḍ-bhug varṣāṇām ayutāyutam

जो देवता या ब्राह्मण को दी गई वृत्ति को — चाहे स्वयं दी हो या किसी अन्य ने — छीन लेता है, वह करोड़ों वर्षों तक विष्ठा भक्षण करने वाला कीड़ा बनता है।

श्लोक 55 (bhagavata.11.27.55)

कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च । कर्मणां भागिनः प्रेत्य भूयो भूयसि तत् फलम् ॥ ५५ ॥

kartuś ca sārather hetor anumoditur eva ca karmaṇāṁ bhāginaḥ pretya bhūyo bhūyasi tat-phalam

कर्ता, प्रेरक, सहायक तथा अनुमोदन करने वाला — ये सभी उस कर्म के फल के भागी बनते हैं, और परलोक में यह फल उत्तरोत्तर अधिक बढ़ता जाता है।

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