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एकादश स्कन्ध · अध्याय 28

ज्ञानयोग

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (bhagavata.11.28.1)

श्रीभगवानुवाच परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥

śrī-bhagavān uvāca para-svabhāva-karmāṇi na praśaṁsen na garhayet viśvam ekātmakaṁ paśyan prakṛtyā puruṣeṇa ca

श्रीभगवान ने कहा — प्रकृति और पुरुष से बने इस विश्व को एक ही आत्मा पर आधारित देखते हुए, मनुष्य को दूसरों के स्वभाव और कर्मों की न तो प्रशंसा करनी चाहिए और न निन्दा।

श्लोक 2 (bhagavata.11.28.2)

परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः ॥ २ ॥

para-svabhāva-karmāṇi yaḥ praśaṁsati nindati sa āśu bhraśyate svārthād asaty abhiniveśataḥ

जो पुरुष दूसरों के स्वभाव और कर्मों की प्रशंसा या निन्दा करता है, वह असत् में आसक्ति के कारण शीघ्र ही अपने वास्तविक हित से विचलित हो जाता है।

श्लोक 3 (bhagavata.11.28.3)

तैजसे निद्रयापन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः । मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्वन्नानार्थदृक् पुमान् ॥ ३ ॥

taijase nidrayāpanne piṇḍa-stho naṣṭa-cetanaḥ māyāṁ prāpnoti mṛtyuṁ vā tadvan nānārtha-dṛk pumān

जैसे तैजस (स्वप्न) अथवा गहरी निद्रा में पड़ा हुआ देहधारी चेतनाशून्य होकर भ्रम अथवा मृत्युतुल्य अवस्था को प्राप्त होता है, वैसे ही अनेकत्व-दर्शी पुरुष [संसार-भ्रम] को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (bhagavata.11.28.4)

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् । वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥

kiṁ bhadraṁ kim abhadraṁ vā dvaitasyāvastunaḥ kiyat vācoditaṁ tad anṛtaṁ manasā dhyātam eva ca

इस असत् द्वैत में शुभ ही क्या है और अशुभ ही क्या है, और यह कितना है? जो कुछ वाणी से कहा जाए अथवा मन से चिन्तन किया जाए, वह सब असत्य ही है।

श्लोक 5 (bhagavata.11.28.5)

छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः । एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥

chāyā-pratyāhvayābhāsā hy asanto 'py artha-kāriṇaḥ evaṁ dehādayo bhāvā yacchanty ā-mṛtyuto bhayam

जैसे छाया, प्रतिध्वनि तथा मृगतृष्णा असत् होते हुए भी कुछ प्रयोजन सिद्ध करते प्रतीत होते हैं, वैसे ही देह आदि से तादात्म्य की यह भावना असत् होते हुए भी मृत्युपर्यन्त भय उत्पन्न करती रहती है।

श्लोक 6 (bhagavata.11.28.6)

आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः । त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥

ātmaiva tad idaṁ viśvaṁ sṛjyate sṛjati prabhuḥ trāyate trāti viśvātmā hriyate haratīśvaraḥ

यह सम्पूर्ण विश्व आत्मा ही है — वही प्रभु सृष्टि करता है और वही सृजित होता है; वही विश्वात्मा रक्षा करता है और रक्षित होता है; वही ईश्वर संहार करता है और संहृत होता है।

श्लोक 7 (bhagavata.11.28.7)

तस्मान्न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः । निरूपितेऽयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि । इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ७ ॥

tasmān na hy ātmano 'nyasmād anyo bhāvo nirūpitaḥ nirūpite 'yaṁ tri-vidhā nirmūlā bhātir ātmani idaṁ guṇa-mayaṁ viddhi tri-vidhaṁ māyayā kṛtam

इसलिए आत्मा से भिन्न कोई अन्य वस्तु कभी सिद्ध नहीं होती। सिद्ध होने पर भी यह त्रिविध जगत् आत्मा में निर्मूल भास मात्र है — इसे माया द्वारा रचित त्रिगुणमय जानो।

श्लोक 8 (bhagavata.11.28.8)

एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ८ ॥

etad vidvān mad-uditaṁ jñāna-vijñāna-naipuṇam na nindati na ca stauti loke carati sūrya-vat

मेरे द्वारा कहे गए इस ज्ञान-विज्ञान-कौशल को जानने वाला विद्वान न किसी की निन्दा करता है और न स्तुति; वह सूर्य के समान इस लोक में विचरण करता है।

श्लोक 9 (bhagavata.11.28.9)

प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ ९ ॥

pratyakṣeṇānumānena nigamenātma-saṁvidā ādy-antavad asaj jñātvā niḥsaṅgo vicared iha

प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र तथा आत्म-साक्षात्कार के द्वारा यह जानकर कि जो आदि-अन्त वाला है वह असत् है, मनुष्य को इस संसार में निःसंग होकर विचरण करना चाहिए।

श्लोक 10 (bhagavata.11.28.10)

श्रीउद्धव उवाच नैवात्मनो न देहस्य संसृतिर्द्रष्टृदृश्ययोः । अनात्मस्वदृशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते ॥ १० ॥

śrī-uddhava uvāca naivātmano na dehasya saṁsṛtir draṣṭṛ-dṛśyayoḥ anātma-sva-dṛśor īśa kasya syād upalabhyate

श्री उद्धव ने कहा — हे ईश, यह संसृति न तो द्रष्टा आत्मा की अनुभूति हो सकती है, न दृश्य देह की, क्योंकि एक स्वतःसिद्ध ज्ञानवान् है और दूसरा जड़ है। तब यह किसकी अनुभूति मानी जाए?

श्लोक 11 (bhagavata.11.28.11)

आत्माव्ययोऽगुणः शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः । अग्निवद्दारुवदचिद्देहः कस्येह संसृतिः ॥ ११ ॥

ātmāvyayo 'guṇaḥ śuddhaḥ svayaṁ-jyotir anāvṛtaḥ agni-vad dāru-vad acid dehaḥ kasyeha saṁsṛtiḥ

आत्मा अविनाशी, निर्गुण, शुद्ध, स्वयंप्रकाश तथा अनावृत है — अग्नि के समान; और देह काष्ठ के समान अचेतन है। तो फिर इस संसार का अनुभव किसे होता है?

श्लोक 12 (bhagavata.11.28.12)

श्रीभगवानुवाच यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १२ ॥

śrī-bhagavān uvāca yāvad dehendriya-prāṇair ātmanaḥ sannikarṣaṇam saṁsāraḥ phalavāṁs tāvad apārtho 'py avivekinaḥ

श्रीभगवान ने कहा — जब तक आत्मा का देह, इन्द्रियों तथा प्राणों से घनिष्ठ सम्बन्ध बना रहता है, तब तक अविवेकी पुरुष के लिए यह संसार, वास्तव में निरर्थक होते हुए भी, फलवान प्रतीत होता है।

श्लोक 13 (bhagavata.11.28.13)

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १३ ॥

arthe hy avidyamāne 'pi saṁsṛtir na nivartate dhyāyato viṣayān asya svapne 'narthāgamo yathā

वस्तु के वास्तव में न होने पर भी, विषयों का चिन्तन करने वाले के लिए यह संसार-भ्रम समाप्त नहीं होता, जैसे स्वप्न में अनिष्ट की प्राप्ति होती है।

श्लोक 14 (bhagavata.11.28.14)

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् । स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १४ ॥

yathā hy apratibuddhasya prasvāpo bahv-anartha-bhṛt sa eva pratibuddhasya na vai mohāya kalpate

जैसे अजागृत मनुष्य को स्वप्न बहुत अनिष्ट पहुँचाता है, परन्तु जाग जाने पर वही स्वप्न उसे मोहित नहीं कर पाता।

श्लोक 15 (bhagavata.11.28.15)

शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः । अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मनः ॥ १५ ॥

śoka-harṣa-bhaya-krodha- lobha-moha-spṛhādayaḥ ahaṅkārasya dṛśyante janma-mṛtyuś ca nātmanaḥ

शोक, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह तथा कामना आदि, और साथ ही जन्म और मृत्यु भी, अहंकार के ही धर्म हैं, आत्मा के नहीं।

श्लोक 16 (bhagavata.11.28.16)

देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेव गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १६ ॥

dehendriya-prāṇa-mano-'bhimāno jīvo 'ntar-ātmā guṇa-karma-mūrtiḥ sūtraṁ mahān ity urudheva gītaḥ saṁsāra ādhāvati kāla-tantraḥ

देह, इन्द्रिय, प्राण तथा मन के साथ अभिमान करने वाला जीव, अन्तरात्मा होते हुए भी गुण-कर्म का ही रूप धारण कर लेता है, तथा 'सूत्र', 'महत्' आदि अनेक नामों से पुकारा जाता हुआ, काल के अधीन होकर संसार में इधर-उधर दौड़ता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.28.17)

अमूलमेतद् बहुरूपरूपितं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन- च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १७ ॥

amūlam etad bahu-rūpa-rūpitaṁ mano-vacaḥ-prāṇa-śarīra-karma jñānāsinopāsanayā śitena cchittvā munir gāṁ vicaraty atṛṣṇaḥ

मूलरहित होते हुए भी यह मन, वाणी, प्राण और शरीर की क्रियाओं के रूप में अनेक रूपों में प्रकट होता है। परन्तु मुनि, गुरु की उपासना से तेज हुई ज्ञान-असि से इसे काटकर, निःस्पृह होकर इस पृथ्वी पर विचरण करता है।

श्लोक 18 (bhagavata.11.28.18)

ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् । आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥ १८ ॥

jñānaṁ viveko nigamas tapaś ca pratyakṣam aitihyam athānumānam ādy-antayor asya yad eva kevalaṁ kālaś ca hetuś ca tad eva madhye

ज्ञान वास्तव में विवेक है, जो शास्त्र, तप, प्रत्यक्ष, इतिहास तथा अनुमान से प्राप्त होता है। इस जगत् के आदि और अन्त में जो अकेला विद्यमान है, वही काल भी है, वही कारण भी, और वही मध्य में भी है।

श्लोक 19 (bhagavata.11.28.19)

यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ १९ ॥

yathā hiraṇyaṁ sv-akṛtaṁ purastāt paścāc ca sarvasya hiraṇ-mayasya tad eva madhye vyavahāryamāṇaṁ nānāpadeśair aham asya tadvat

जैसे सोना, गहना बनने से पूर्व भी विद्यमान रहता है, गहना गलने के बाद भी वही रहता है, और बीच में व्यवहार में लाए जाते समय भी वही होता है, अनेक नामों से पुकारे जाने पर भी — वैसे ही मैं ही इस जगत् का [आदि, अन्त तथा मध्य] हूँ।

श्लोक 20 (bhagavata.11.28.20)

विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ । समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २० ॥

vijñānam etat triy-avastham aṅga guṇa-trayaṁ kāraṇa-kārya-kartṛ samanvayena vyatirekataś ca yenaiva turyeṇa tad eva satyam

हे अंग, यह चित्त-वृत्ति त्रिगुणमय होने से तीन अवस्थाओं में रहती है, तथा कारण, कार्य और कर्ता के रूप में भी — इनके अन्वय और व्यतिरेक द्वारा। किन्तु इन तीनों से पृथक् जो चौथा तत्त्व है, वही सत्य है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.28.21)

न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद् यत् तदेव तत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २१ ॥

na yat purastād uta yan na paścān madhye ca tan na vyapadeśa-mātram bhūtaṁ prasiddhaṁ ca pareṇa yad yat tad eva tat syād iti me manīṣā

जो न पहले था और न बाद में रहेगा, वह बीच में भी वास्तव में नहीं है — वह केवल एक नाममात्र है। जो कुछ भी किसी अन्य [वस्तु] के आधार पर उत्पन्न और प्रसिद्ध होता है, वह वस्तुतः वही अन्य वस्तु है — यही मेरा मत है।

श्लोक 22 (bhagavata.11.28.22)

अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयंज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २२ ॥

avidyamāno 'py avabhāsate yo vaikāriko rājasa-sarga eṣaḥ brahma svayaṁ jyotir ato vibhāti brahmendriyārthātma-vikāra-citram

यह रजोगुण से उत्पन्न विकाररूप सृष्टि, वास्तव में असत् होते हुए भी, इसलिए प्रकट प्रतीत होती है क्योंकि स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही इन्द्रिय, विषय, मन तथा भूतों के विकाररूप चित्र में प्रकाशित होता है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.28.23)

एवं स्फुटं ब्रह्मविवेकहेतुभिः परापवादेन विशारदेन । छित्त्वात्मसन्देहमुपारमेत स्वानन्दतुष्टोऽखिलकामुकेभ्यः ॥ २३ ॥

evaṁ sphuṭaṁ brahma-viveka-hetubhiḥ parāpavādena viśāradena chittvātma-sandeham upārameta svānanda-tuṣṭo 'khila-kāmukebhyaḥ

इस प्रकार ब्रह्म के विवेक के कुशल हेतुओं द्वारा तथा अन्य [असत्] के खण्डन द्वारा स्पष्ट रूप से आत्मा के सम्बन्ध में संशय को छिन्न-भिन्न कर, अपनी ही आत्मानन्द से तृप्त होकर, सभी कामनाओं से उपरत हो जाना चाहिए।

श्लोक 24 (bhagavata.11.28.24)

नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुर्जलम् हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः खं क्षितिरर्थसाम्यम् ॥ २४ ॥

nātmā vapuḥ pārthivam indriyāṇi devā hy asur vāyur jalam hutāśaḥ mano 'nna-mātraṁ dhiṣaṇā ca sattvam ahaṅkṛtiḥ khaṁ kṣitir artha-sāmyam

आत्मा न तो पार्थिव शरीर है, न इन्द्रियाँ, न देवता, न प्राण, न वायु, जल अथवा अग्नि; न मन, न अन्नमय कोश, न बुद्धि, न सत्त्व (अन्तःकरण), न अहंकार, न आकाश, न पृथ्वी, और न ही वह मूल साम्यावस्था।

श्लोक 25 (bhagavata.11.28.25)

समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि-र्गुणो भवेन्मत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणंघनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २५ ॥

samāhitaiḥ kaḥ karaṇair guṇātmabhir guṇo bhaven mat-suvivikta-dhāmnaḥ vikṣipyamāṇair uta kiṁ nu dūṣaṇaṁ ghanair upetair vigatai raveḥ kim

मुझमें भलीभाँति पृथक् स्थित पुरुष के लिए गुणमय इन्द्रियों के एकाग्र होने से क्या गुण प्राप्त होता है, अथवा उनके विक्षिप्त होने से क्या दोष? मेघों के आने अथवा जाने से सूर्य को क्या लाभ या हानि होती है?

श्लोक 26 (bhagavata.11.28.26)

यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते । तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलै- रहंमतेः संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २६ ॥

yathā nabho vāyv-analāmbu-bhū-guṇair gatāgatair vartu-guṇair na sajjate tathākṣaraṁ sattva-rajas-tamo-malair ahaṁ-mateḥ saṁsṛti-hetubhiḥ param

जैसे आकाश आने-जाने वाले वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के गुणों और ऋतु-परिवर्तन से कभी लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह अविनाशी परम तत्त्व अहंकार से उत्पन्न, संसार-बन्धन के कारणस्वरूप सत्त्व, रज तथा तम के मलों से कभी लिप्त नहीं होता।

श्लोक 27 (bhagavata.11.28.27)

तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत मनःकषायः ॥ २७ ॥

tathāpi saṅgaḥ parivarjanīyo guṇeṣu māyā-raciteṣu tāvat mad-bhakti-yogena dṛḍhena yāvad rajo nirasyeta manaḥ-kaṣāyaḥ

फिर भी, जब तक मेरी दृढ़ भक्ति द्वारा मन का रजोमय कल्मष दूर न हो जाए, तब तक माया द्वारा रचित गुणों की संगति से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए।

श्लोक 28 (bhagavata.11.28.28)

यथामयोऽसाधुचिकित्सितो नृणां पुनः पुनः सन्तुदति प्ररोहन् । एवं मनोऽपक्वकषायकर्म कुयोगिनं विध्यति सर्वसङ्गम् ॥ २८ ॥

yathāmayo 'sādhu cikitsito nṛṇāṁ punaḥ punaḥ santudati prarohan evaṁ mano 'pakva-kaṣāya-karma kuyoginaṁ vidhyati sarva-saṅgam

जैसे अनुचित उपचार किया गया रोग बार-बार उभरकर मनुष्य को पीड़ा देता है, वैसे ही अपरिपक्व मन का कल्मष-कर्म अपूर्ण योगी को बार-बार सभी प्रकार की आसक्ति से बींध देता है।

श्लोक 29 (bhagavata.11.28.29)

कुयोगिनो ये विहितान्तरायै- र्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टैः । ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो युञ्जन्ति योगं न तु कर्मतन्त्रम् ॥ २९ ॥

kuyogino ye vihitāntarāyair manuṣya-bhūtais tridaśopasṛṣṭaiḥ te prāktanābhyāsa-balena bhūyo yuñjanti yogaṁ na tu karma-tantram

जिन अपूर्ण योगियों की साधना देवताओं द्वारा भेजे गए मनुष्यरूपी विघ्नों से बाधित होती है, वे अपनी पूर्व-साधना के बल पर पुनः योग का ही अभ्यास करते हैं, न कि कर्मबन्धन का।

श्लोक 30 (bhagavata.11.28.30)

करोति कर्म क्रियते च जन्तुः केनाप्यसौ चोदित आनिपातात् । न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि निवृत्ततृष्णः स्वसुखानुभूत्या ॥ ३० ॥

karoti karma kriyate ca jantuḥ kenāpy asau codita ā-nipātāt na tatra vidvān prakṛtau sthito 'pi nivṛtta-tṛṣṇaḥ sva-sukhānubhūtyā

साधारण प्राणी कर्म करता है और स्वयं भी किसी न किसी प्रेरणा से मृत्युपर्यन्त कर्म द्वारा परिणत होता रहता है। परन्तु विद्वान, प्रकृति में स्थित रहते हुए भी, अपने आत्मसुख के अनुभव से समस्त तृष्णा से मुक्त रहता है।

श्लोक 31 (bhagavata.11.28.31)

तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३१ ॥

tiṣṭhantam āsīnam uta vrajantaṁ śayānam ukṣantam adantam annam svabhāvam anyat kim apīhamānam ātmānam ātma-stha-matir na veda

जिसकी बुद्धि आत्मा में स्थित है, वह खड़े होने, बैठने, चलने, लेटने, मल-मूत्र त्यागने, भोजन करने अथवा अन्य किसी भी स्वाभाविक क्रिया में लगे हुए शरीर को अपना नहीं मानता।

श्लोक 32 (bhagavata.11.28.32)

यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वाप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३२ ॥

yadi sma paśyaty asad-indriyārthaṁ nānānumānena viruddham anyat na manyate vastutayā manīṣī svāpnaṁ yathotthāya tirodadhānam

यदि उसे कहीं कोई असत् इन्द्रियविषय दिखाई भी दे, जो विविध अनुमानों से विरुद्ध प्रतीत हो, तो भी बुद्धिमान पुरुष उसे सत्य नहीं मानता, जैसे जागने के बाद स्वप्न लुप्त हो जाने पर उसे कोई सत्य नहीं मानता।

श्लोक 33 (bhagavata.11.28.33)

पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३३ ॥

pūrvaṁ gṛhītaṁ guṇa-karma-citram ajñānam ātmany aviviktam aṅga nivartate tat punar īkṣayaiva na gṛhyate nāpi visṛjya ātmā

हे अंग, पहले गुण-कर्म से चित्रित तथा आत्मा से अभिन्न मान लिया गया अज्ञान, सम्यक् दृष्टि से ही पुनः दूर हो जाता है। आत्मा वास्तव में न कभी ग्रहण किया जाता है और न कभी त्यागा जाता है।

श्लोक 34 (bhagavata.11.28.34)

यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां तमो निहन्यान्न तु सद् विधत्ते । एवं समीक्षा निपुणा सती मे हन्यात्तमिस्रं पुरुषस्य बुद्धेः ॥ ३४ ॥

yathā hi bhānor udayo nṛ-cakṣuṣāṁ tamo nihanyān na tu sad vidhatte evaṁ samīkṣā nipuṇā satī me hanyāt tamisraṁ puruṣasya buddheḥ

जैसे सूर्योदय मनुष्यों की आँखों के अन्धकार को नष्ट करता है, किन्तु वस्तुओं को नया उत्पन्न नहीं करता, वैसे ही मेरा कुशल तथा सत्य साक्षात्कार पुरुष की बुद्धि के अन्धकार को नष्ट कर देता है।

श्लोक 35 (bhagavata.11.28.35)

एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ ३५ ॥

eṣa svayaṁ-jyotir ajo 'prameyo mahānubhūtiḥ sakalānubhūtiḥ eko 'dvitīyo vacasāṁ virāme yeneṣitā vāg-asavaś caranti

यह स्वयंप्रकाश, अजन्मा, अप्रमेय तत्त्व महान अनुभूतिस्वरूप है, सबकुछ का अनुभव करने वाला है, एक और अद्वितीय है, तथा वाणी के मौन हो जाने पर ही प्राप्त होता है — उसी से प्रेरित होकर वाणी और प्राण सक्रिय होते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.11.28.36)

एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले । आत्मनृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि ॥ ३६ ॥

etāvān ātma-sammoho yad vikalpas tu kevale ātman ṛte svam ātmānam avalambo na yasya hi

आत्मा में जो द्वैत की कल्पना होती है, वही समस्त आत्ममोह है, क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त उस [द्वैत] को कोई आधार ही प्राप्त नहीं है।

श्लोक 37 (bhagavata.11.28.37)

यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् । व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डितमानिनाम् ॥ ३७ ॥

yan nāmākṛtibhir grāhyaṁ pañca-varṇam abādhitam vyarthenāpy artha-vādo 'yaṁ dvayaṁ paṇḍita-māninām

जो केवल नाम और रूप से ग्रहण किया जाता है, वह पञ्च-भौतिक जगत् अबाधित प्रतीत होता है; परन्तु इसे यथार्थ मानना उन लोगों का व्यर्थ वाग्विलास है, जो स्वयं को पण्डित मानते हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.11.28.38)

योगिनोऽपक्वयोगस्य युञ्जतः काय उत्थितैः । उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधिः ॥ ३८ ॥

yogino 'pakva-yogasya yuñjataḥ kāya utthitaiḥ upasargair vihanyeta tatrāyaṁ vihito vidhiḥ

जिस योगी का योग अभी अपरिपक्व है, उसका शरीर साधना करते समय उत्पन्न होने वाले उपसर्गों (विघ्नों) से पीड़ित हो सकता है। उसके लिए यह विधि बताई गई है।

श्लोक 39 (bhagavata.11.28.39)

योगधारणया कांश्चिदासनैर्धारणान्वितैः । तपोमन्त्रौषधैः कांश्चिदुपसर्गान् विनिर्दहेत् ॥ ३९ ॥

yoga-dhāraṇayā kāṁścid āsanair dhāraṇānvitaiḥ tapo-mantrauṣadhaiḥ kāṁścid upasargān vinirdahet

कुछ उपसर्गों को योग-धारणा से, कुछ को धारणा-सहित आसनों से, तथा कुछ को तप, मन्त्र अथवा औषधियों से पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए।

श्लोक 40 (bhagavata.11.28.40)

कांश्चिन्ममानुध्यानेन नामसङ्कीर्तनादिभिः । योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदान् शनैः ॥ ४० ॥

kāṁścin mamānudhyānena nāma-saṅkīrtanādibhiḥ yogeśvarānuvṛttyā vā hanyād aśubha-dān śanaiḥ

कुछ अशुभकारी विघ्नों को मेरे निरन्तर ध्यान से, नाम-संकीर्तन आदि से, अथवा महान योगेश्वरों के अनुसरण से धीरे-धीरे दूर करना चाहिए।

श्लोक 41 (bhagavata.11.28.41)

केचिद् देहमिमं धीराः सुकल्पं वयसि स्थिरम् । विधाय विविधोपायैरथ युञ्जन्ति सिद्धये ॥ ४१ ॥

kecid deham imaṁ dhīrāḥ su-kalpaṁ vayasi sthiram vidhāya vividhopāyair atha yuñjanti siddhaye

कुछ धीर योगी विविध उपायों से इस शरीर को दीर्घकाल तक सुदृढ़ और स्थिर बनाकर, तत्पश्चात् सिद्धियों की प्राप्ति के लिए योग में प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.11.28.42)

न हि तत् कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थकः । अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पतेः ॥ ४२ ॥

na hi tat kuśalādṛtyaṁ tad-āyāso hy apārthakaḥ antavattvāc charīrasya phalasyeva vanaspateḥ

परन्तु कुशल पुरुष इसे अधिक महत्त्व नहीं देते, क्योंकि इसके लिए किया गया परिश्रम व्यर्थ है — शरीर का अन्त निश्चित है, जैसे वृक्ष के फल का।

श्लोक 43 (bhagavata.11.28.43)

योगं निषेवतो नित्यं कायश्चेत् कल्पतामियात् । तच्छ्रद्दध्यान्न मतिमान्योगमुत्सृज्य मत्परः ॥ ४३ ॥

yogaṁ niṣevato nityaṁ kāyaś cet kalpatām iyāt tac chraddadhyān na matimān yogam utsṛjya mat-paraḥ

यदि नित्य योगाभ्यास से शरीर सिद्ध भी हो जाए, तो भी बुद्धिमान तथा मुझमें ही परायण पुरुष उस पर विश्वास नहीं करता, बल्कि ऐसे योग को त्याग देता है।

श्लोक 44 (bhagavata.11.28.44)

योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रयः । नान्तरायैर्विहन्येत निःस्पृहः स्वसुखानुभूः ॥ ४४ ॥

yoga-caryām imāṁ yogī vicaran mad-apāśrayaḥ nāntarāyair vihanyeta niḥspṛhaḥ sva-sukhānubhūḥ

मेरी शरण में रहकर इस योगचर्या का आचरण करने वाला योगी, निःस्पृह होकर अपने आत्मसुख का अनुभव करता हुआ, कभी विघ्नों से पराजित नहीं होता।

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