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एकादश स्कन्ध · अध्याय 29

भक्तियोग

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (bhagavata.11.29.1)

श्रीउद्धव उवाच सुदुस्तरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मनः । यथाञ्जसा पुमान् सिद्ध्येत् तन्मे ब्रूह्यञ्जसाच्युत ॥ १ ॥

śrī-uddhava uvāca su-dustarām imāṁ manye yoga-caryām anātmanaḥ yathāñjasā pumān siddhyet tan me brūhy añjasācyuta

श्री उद्धव ने कहा — हे अच्युत, मैं समझता हूँ कि जिसने अपने मन को वश में नहीं किया, उसके लिए यह योगचर्या अत्यन्त दुस्तर है। इसलिए मुझे सरल रीति से बताइए कि मनुष्य सहज ही इसमें कैसे सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 2 (bhagavata.11.29.2)

प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युञ्जन्ते योगिनो मनः । विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहकर्शिताः ॥ २ ॥

prāyaśaḥ puṇḍarīkākṣa yuñjanto yogino manaḥ viṣīdanty asamādhānān mano-nigraha-karśitāḥ

हे पुण्डरीकाक्ष, प्रायः मन को वश में करने का प्रयत्न करने वाले योगी, समाधि सिद्ध न होने के कारण खिन्न हो जाते हैं और मन-निग्रह के परिश्रम से थक जाते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.11.29.3)

अथात आनन्ददुघं पदाम्बुजं हंसाः श्रयेरन्नरविन्दलोचन । सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभि- स्त्वन्माययामी विहता न मानिनः ॥ ३ ॥

athāta ānanda-dughaṁ padāmbujaṁ haṁsāḥ śrayerann aravinda-locana sukhaṁ nu viśveśvara yoga-karmabhis tvan-māyayāmī vihatā na māninaḥ

इसलिए, हे कमलनयन विश्वेश्वर, हंस-तुल्य [परमहंस] जन आनन्द के स्रोत आपके चरण-कमलों की सुखपूर्वक शरण लेते हैं; परन्तु योग और कर्म के अभिमानी लोग आपकी माया से पराजित होकर वैसा नहीं कर पाते।

श्लोक 4 (bhagavata.11.29.4)

किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धोदासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम् । योऽरोचयत् सह मृगैः स्वयमीश्वराणांश्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठः ॥ ४ ॥

kiṁ citram acyuta tavaitad aśeṣa-bandho dāseṣv ananya-śaraṇesu yad ātma-sāttvam yo 'rocayat saha mṛgaiḥ svayam īśvarāṇāṁ śrīmat-kirīṭa-taṭa-pīḍita-pāda-pīṭhaḥ

हे अच्युत, हे अशेष बन्धु, यह क्या आश्चर्य है कि आप अनन्यशरण दासों के प्रति ऐसी आत्मीयता दिखाते हैं — आप, जिनकी पादपीठिका महान ईश्वरों के मुकुटों से रगड़ी जाती है, फिर भी आपने स्वयं वानरों के साथ रहना पसन्द किया!

श्लोक 5 (bhagavata.11.29.5)

तं त्वाखिलात्मदयितेश्वरमाश्रितानां सर्वार्थदं स्वकृतविद् विसृजेत को नु । को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै किं वा भवेन्न तव पादरजोजुषां नः ॥ ५ ॥

taṁ tvākhilātma-dayiteśvaram āśritānāṁ sarvārtha-daṁ sva-kṛta-vid visṛjeta ko nu ko vā bhajet kim api vismṛtaye 'nu bhūtyai kiṁ vā bhaven na tava pāda-rajo-juṣāṁ naḥ

आपके किए हुए कर्मों को जानने वाला कौन ऐसा है जो सर्वात्मा, प्रिय, ईश्वर तथा शरणागतों को सर्वस्व देने वाले आपको त्याग सके? भूलकर भी कोई किसी और की उपासना क्यों करेगा जो अन्ततः विस्मृति में ही ले जाए? आपके चरण-रज का सेवन करने वाले हमें भला और किस बात की कमी है?

श्लोक 6 (bhagavata.11.29.6)

नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः । योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन्न आचार्यचैत्त्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥ ६ ॥

naivopayanty apacitiṁ kavayas taveśa brahmāyuṣāpi kṛtam ṛddha-mudaḥ smarantaḥ yo 'ntar bahis tanu-bhṛtām aśubhaṁ vidhunvann ācārya-caittya-vapuṣā sva-gatiṁ vyanakti

हे ईश, विद्वान लोग, ब्रह्मा के समान आयु पाकर भी, आपके किए हुए उपकारों को स्मरण कर आनन्दित होते हुए भी, आपका ऋण नहीं चुका पाते — आप जो आचार्य और अन्तर्यामी, दोनों रूपों में देहधारियों की भीतरी-बाहरी अशुभता को दूर करते हुए उन्हें अपना मार्ग दिखाते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.11.29.7)

श्रीशुक उवाच इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेममनोहरस्मितः ॥ ७ ॥

śrī-śuka uvāca ity uddhavenāty-anurakta-cetasā pṛṣṭo jagat-krīḍanakaḥ sva-śaktibhiḥ gṛhīta-mūrti-traya īśvareśvaro jagāda sa-prema-manohara-smitaḥ

श्री शुकदेव ने कहा — इस प्रकार अत्यन्त अनुरक्त-चित्त उद्धव द्वारा पूछे जाने पर, अपनी शक्तियों से जगत् के साथ क्रीड़ा करने वाले, तीनों मूर्तियों को धारण करने वाले उन ईश्वरेश्वर ने प्रेमपूर्ण, मनोहर मुस्कान के साथ कहा।

श्लोक 8 (bhagavata.11.29.8)

श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमङ्गलान् । यान् श्रद्धयाचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम् ॥ ८ ॥

śrī-bhagavān uvāca hanta te kathayiṣyāmi mama dharmān su-maṅgalān yān śraddhayācaran martyo mṛtyuṁ jayati durjayam

श्रीभगवान ने कहा — अच्छा, मैं तुम्हें अपने अत्यन्त मंगलकारी धर्म बताता हूँ, जिनका श्रद्धापूर्वक आचरण कर मरणधर्मा मनुष्य भी दुर्जय मृत्यु को जीत लेता है।

श्लोक 9 (bhagavata.11.29.9)

कुर्यात् सर्वाणि कर्माणि मदर्थं शनकैः स्मरन् । मय्यर्पितमनश्चित्तो मद्धर्मात्ममनोरतिः ॥ ९ ॥

kuryāt sarvāṇi karmāṇi mad-arthaṁ śanakaiḥ smaran mayy arpita-manaś-citto mad-dharmātma-mano-ratiḥ

मनुष्य को चाहिए कि वह धीरे-धीरे मेरा स्मरण करते हुए सभी कर्म मेरे ही लिए करे, अपना मन और चित्त मुझे अर्पित करे, तथा मेरे धर्म में ही अपने मन की रति रखे।

श्लोक 10 (bhagavata.11.29.10)

देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तैः साधुभिः श्रितान् । देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च ॥ १० ॥

deśān puṇyān āśrayeta mad-bhaktaiḥ sādhubhiḥ śritān devāsura-manuṣyeṣu mad-bhaktācaritāni ca

मेरे साधु भक्तों द्वारा बसाए गए पुण्य स्थानों का आश्रय ले, तथा देवताओं, असुरों और मनुष्यों में जन्मे मेरे भक्तों के चरित्र का अनुसरण करे।

श्लोक 11 (bhagavata.11.29.11)

पृथक् सत्रेण वा मह्यं पर्वयात्रामहोत्सवान् । कारयेद् गीतनृत्याद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥

pṛthak satreṇa vā mahyaṁ parva-yātrā-mahotsavān kārayed gīta-nṛtyādyair mahārāja-vibhūtibhiḥ

अकेले अथवा सामूहिक यज्ञ द्वारा, गीत-नृत्य आदि तथा महाराजोचित वैभव के साथ, मेरे लिए पर्व, यात्रा तथा महोत्सव आयोजित करे।

श्लोक 12 (bhagavata.11.29.12)

मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम् । ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥

mām eva sarva-bhūteṣu bahir antar apāvṛtam īkṣetātmani cātmānaṁ yathā kham amalāśayaḥ

पवित्र अन्तःकरण से यह देखे कि मैं ही समस्त प्राणियों में बाहर और भीतर व्याप्त हूँ, अनावृत हूँ, तथा आत्मा में भी आत्मस्वरूप स्थित हूँ — जैसे आकाश [सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी निर्लिप्त रहता है]।

श्लोक 13 (bhagavata.11.29.13)

इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयन् मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रितः ॥ १३ ॥

iti sarvāṇi bhūtāni mad-bhāvena mahā-dyute sabhājayan manyamāno jñānaṁ kevalam āśritaḥ

हे महातेजस्वी उद्धव, इस प्रकार मुझे सब भूतों में व्याप्त मानते हुए जो सबका सम्मान करता है, वह केवल ज्ञान का ही आश्रय लेने वाला माना जाता है।

श्लोक 14 (bhagavata.11.29.14)

ब्राह्मणे पुक्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥

brāhmaṇe pukkase stene brahmaṇye 'rke sphuliṅgake akrūre krūrake caiva sama-dṛk paṇḍito mataḥ

ब्राह्मण में, चाण्डाल में, चोर में, ब्राह्मणहितैषी में, सूर्य में तथा चिनगारी में, कोमल में और क्रूर में — समान दृष्टि रखने वाला ही पण्डित माना गया है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.29.15)

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात् । स्पर्धासूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥ १५ ॥

nareṣv abhīkṣṇaṁ mad-bhāvaṁ puṁso bhāvayato 'cirāt spardhāsūyā-tiraskārāḥ sāhaṅkārā viyanti hi

जो पुरुष निरन्तर सब मनुष्यों में मेरी भावना का चिन्तन करता है, उसकी स्पर्धा, ईर्ष्या, तिरस्कार तथा अहंकारवश उत्पन्न सभी दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.11.29.16)

विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम् । प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥ १६ ॥

visṛjya smayamānān svān dṛśaṁ vrīḍāṁ ca daihikīm praṇamed daṇḍa-vad bhūmāv ā-śva-cāṇḍāla-go-kharam

अपने साथियों की हँसी की परवाह न करते हुए तथा देहाभिमान और उससे उत्पन्न लज्जा को त्यागकर, कुत्ते, चाण्डाल, गाय अथवा गधे को भी दण्ड की भाँति भूमि पर लेटकर प्रणाम करे।

श्लोक 17 (bhagavata.11.29.17)

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते । तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः ॥ १७ ॥

yāvat sarveṣu bhūteṣu mad-bhāvo nopajāyate tāvad evam upāsīta vāṅ-manaḥ-kāya-vṛttibhiḥ

जब तक सभी प्राणियों में मेरी भावना पूर्ण रूप से जाग्रत न हो जाए, तब तक वाणी, मन तथा शरीर की क्रियाओं द्वारा इसी प्रकार उपासना करते रहना चाहिए।

श्लोक 18 (bhagavata.11.29.18)

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययात्ममनीषया । परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः ॥ १८ ॥

sarvaṁ brahmātmakaṁ tasya vidyayātma-manīṣayā paripaśyann uparamet sarvato mukta-saṁśayaḥ

इस विद्या तथा आत्म-विवेक से सब कुछ को ब्रह्मस्वरूप देखता हुआ मनुष्य सर्वत्र संशयरहित होकर विराम पा लेता है।

श्लोक 19 (bhagavata.11.29.19)

अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम । मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभिः ॥ १९ ॥

ayaṁ hi sarva-kalpānāṁ sadhrīcīno mato mama mad-bhāvaḥ sarva-bhūteṣu mano-vāk-kāya-vṛttibhiḥ

मेरा यही मत है कि सभी साधनों में मन, वाणी तथा शरीर की क्रियाओं द्वारा सब भूतों में मेरी उपस्थिति का यह भाव ही सबसे सीधा और सरल मार्ग है।

श्लोक 20 (bhagavata.11.29.20)

न ह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि । मया व्यवसितः सम्यङ्निर्गुणत्वादनाशिषः ॥ २० ॥

na hy aṅgopakrame dhvaṁso mad-dharmasyoddhavāṇv api mayā vyavasitaḥ samyaṅ nirguṇatvād anāśiṣaḥ

हे उद्धव, मेरे इस धर्म का, स्वयं मेरे द्वारा भलीभाँति स्थापित होने के कारण, आरम्भ में भी लेशमात्र नाश नहीं होता, क्योंकि यह गुणातीत और निष्काम है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.29.21)

यो यो मयि परे धर्मः कल्प्यते निष्फलाय चेत् । तदायासो निरर्थः स्याद् भयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥

yo yo mayi pare dharmaḥ kalpyate niṣphalāya cet tad-āyāso nirarthaḥ syād bhayāder iva sattama

हे सत्तम, मुझ परमेश्वर के प्रति जो भी कर्म फल की आकांक्षा के बिना किया जाए, वह परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता — भय आदि से प्रेरित [साधारण मानवीय उद्वेगों] के विपरीत।

श्लोक 22 (bhagavata.11.29.22)

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् । यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ २२ ॥

eṣā buddhimatāṁ buddhir manīṣā ca manīṣiṇām yat satyam anṛteneha martyenāpnoti māmṛtam

यही बुद्धिमानों की सच्ची बुद्धि है और विद्वानों की सच्ची विद्वत्ता है — कि इस मरणधर्मा तथा असत् जीवन के द्वारा ही मनुष्य मुझ सत्य और अमृतस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.29.23)

एष तेऽभिहितः कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य सङ्ग्रहः । समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गमः ॥ २३ ॥

eṣa te 'bhihitaḥ kṛtsno brahma-vādasya saṅgrahaḥ samāsa-vyāsa-vidhinā devānām api durgamaḥ

इस प्रकार मैंने संक्षेप और विस्तार, दोनों विधियों से ब्रह्मविद्या का यह सम्पूर्ण संग्रह तुम्हें बताया, जो देवताओं के लिए भी दुर्गम है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.29.24)

अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत् । एतद् विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥ २४ ॥

abhīkṣṇaśas te gaditaṁ jñānaṁ vispaṣṭa-yuktimat etad vijñāya mucyeta puruṣo naṣṭa-saṁśayaḥ

यह स्पष्ट युक्तियुक्त ज्ञान तुम्हें बार-बार बताया गया है। इसे भलीभाँति जानकर पुरुष संशयरहित होकर मुक्त हो जाता है।

श्लोक 25 (bhagavata.11.29.25)

सुविविक्तं तव प्रश्नं मयैतदपि धारयेत् । सनातनं ब्रह्मगुह्यं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २५ ॥

su-viviktaṁ tava praśnaṁ mayaitad api dhārayet sanātanaṁ brahma-guhyaṁ paraṁ brahmādhigacchati

जो तुम्हारे प्रश्न का यह मेरा भलीभाँति विवेचित उत्तर हृदय में धारण करे, वह सनातन तथा गुह्य परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 26 (bhagavata.11.29.26)

य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रदद्यात् सुपुष्कलम् । तस्याहं ब्रह्मदायस्य ददाम्यात्मानमात्मना ॥ २६ ॥

ya etan mama bhakteṣu sampradadyāt su-puṣkalam tasyāhaṁ brahma-dāyasya dadāmy ātmānam ātmanā

जो इसे मेरे भक्तों को पूर्णरूप से प्रदान करता है, उसे मैं ब्रह्मदाता समझकर स्वयं अपना ही आत्मा प्रदान करता हूँ।

श्लोक 27 (bhagavata.11.29.27)

य एतत् समधीयीत पवित्रं परमं शुचि । स पूयेताहरहर्मां ज्ञानदीपेन दर्शयन् ॥ २७ ॥

ya etat samadhīyīta pavitraṁ paramaṁ śuci sa pūyetāhar ahar māṁ jñāna-dīpena darśayan

जो इस परम पवित्र तथा शुचि ज्ञान का अध्ययन करता है, वह ज्ञान के दीपक से मुझे [दूसरों को] दिखाते हुए प्रतिदिन शुद्ध होता जाता है।

श्लोक 28 (bhagavata.11.29.28)

य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्रः शृणुयान्नरः । मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते ॥ २८ ॥

ya etac chraddhayā nityam avyagraḥ śṛṇuyān naraḥ mayi bhaktiṁ parāṁ kurvan karmabhir na sa badhyate

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक तथा एकाग्रचित्त होकर नित्य इसे सुनता है, और मुझमें परा भक्ति करता रहता है, वह कर्मों से कभी नहीं बँधता।

श्लोक 29 (bhagavata.11.29.29)

अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम् । अपि ते विगतो मोहः शोकश्चासौ मनोभवः ॥ २९ ॥

apy uddhava tvayā brahma sakhe samavadhāritam api te vigato mohaḥ śokaś cāsau mano-bhavaḥ

हे मित्र उद्धव, क्या अब तुमने इस ब्रह्मविद्या को भलीभाँति जान लिया है? क्या तुम्हारे मन में उत्पन्न हुआ वह मोह और शोक अब दूर हो गया है?

श्लोक 30 (bhagavata.11.29.30)

नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च । अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम् ॥ ३० ॥

naitat tvayā dāmbhikāya nāstikāya śaṭhāya ca aśuśrūṣor abhaktāya durvinītāya dīyatām

यह उपदेश तुम्हें कभी पाखण्डी, नास्तिक, धूर्त, अश्रद्धालु, अभक्त अथवा अविनीत को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 31 (bhagavata.11.29.31)

एतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च । साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम् ॥ ३१ ॥

etair doṣair vihīnāya brahmaṇyāya priyāya ca sādhave śucaye brūyād bhaktiḥ syāc chūdra-yoṣitām

इन दोषों से रहित, ब्राह्मण-हितैषी, प्रिय, साधु तथा शुचि व्यक्ति को यह देना चाहिए; और यदि शूद्र अथवा स्त्रियों में भी भक्ति दिखे, तो उन्हें भी देना चाहिए।

श्लोक 32 (bhagavata.11.29.32)

नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते । पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥ ३२ ॥

naitad vijñāya jijñāsor jñātavyam avaśiṣyate pītvā pīyūṣam amṛtaṁ pātavyaṁ nāvaśiṣyate

इसे जान लेने पर जिज्ञासु के लिए जानने योग्य और कुछ शेष नहीं रह जाता — जैसे अमृतरूप पीयूष पीकर पीने योग्य और कुछ शेष नहीं रहता।

श्लोक 33 (bhagavata.11.29.33)

ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे । यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेऽहं चतुर्विधः ॥ ३३ ॥

jñāne karmaṇi yoge ca vārtāyāṁ daṇḍa-dhāraṇe yāvān artho nṛṇāṁ tāta tāvāṁs te 'haṁ catur-vidhaḥ

हे तात, ज्ञान, कर्म, योग, आजीविका तथा दण्ड-धारण (राजशासन) से मनुष्यों को जो भी प्रयोजन सिद्ध होता है, वह सब मैं ही चतुर्विध रूप में तुम्हारे लिए [सुलभ] हूँ।

श्लोक 34 (bhagavata.11.29.34)

मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे । तदामृतत्त्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै ॥ ३४ ॥

martyo yadā tyakta-samasta-karmā niveditātmā vicikīrṣito me tadāmṛtatvaṁ pratipadyamāno mayātma-bhūyāya ca kalpate vai

जब मरणधर्मा मनुष्य सभी कर्मों को त्यागकर, अपने को मुझे अर्पित कर, केवल मेरी सेवा की इच्छा रखता है, तब वह अमृतत्व को प्राप्त होकर मेरी ही आत्मीयता (सामीप्य) को प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (bhagavata.11.29.35)

श्रीशुक उवाच स एवमादर्शितयोगमार्ग- स्तदोत्तमःश्लोकवचो निशम्य । बद्धाञ्जलिः प्रीत्युपरुद्धकण्ठो न किञ्चिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः ॥ ३५ ॥

śrī-śuka uvāca sa evam ādarśita-yoga-mārgas tadottamaḥśloka-vaco niśamya baddhāñjaliḥ prīty-uparuddha-kaṇṭho na kiñcid ūce 'śru-pariplutākṣaḥ

श्री शुकदेव ने कहा — इस प्रकार योगमार्ग का उपदेश पाकर तथा उत्तमःश्लोक भगवान के वचन सुनकर, उद्धव हाथ जोड़े, प्रेम से गला रुँधे, नेत्रों से अश्रु बहाते हुए कुछ भी न बोल सके।

श्लोक 36 (bhagavata.11.29.36)

विष्टभ्य चित्तं प्रणयावघूर्णं धैर्येण राजन् बहु मन्यमानः । कृताञ्जलिः प्राह यदुप्रवीरं शीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम् ॥ ३६ ॥

viṣṭabhya cittaṁ praṇayāvaghūrṇaṁ dhairyeṇa rājan bahu-manyamānaḥ kṛtāñjaliḥ prāha yadu-pravīraṁ śīrṣṇā spṛśaṁs tac-caraṇāravindam

हे राजन्, प्रेम से विह्वल अपने चित्त को धैर्यपूर्वक सम्भालकर तथा उन्हें अत्यन्त आदर देते हुए, उद्धव ने उन यदुश्रेष्ठ के चरण-कमलों में अपना शिर स्पर्श करते हुए, हाथ जोड़कर कहा।

श्लोक 37 (bhagavata.11.29.37)

श्रीउद्धव उवाच विद्रावितो मोहमहान्धकारो य आश्रितो मे तव सन्निधानात् । विभावसोः किं नु समीपगस्य शीतं तमो भीः प्रभवन्त्यजाद्य ॥ ३७ ॥

śrī-uddhava uvāca vidrāvito moha-mahāndhakāro ya āśrito me tava sannidhānāt vibhāvasoḥ kiṁ nu samīpa-gasya śītaṁ tamo bhīḥ prabhavanty ajādya

श्री उद्धव ने कहा — हे अजन्मा, हे आद्य, मुझमें व्याप्त मोह का वह महान अन्धकार आपकी समीपता से नष्ट हो गया। भला प्रज्वलित अग्नि के निकट पहुँचे हुए को शीत, अन्धकार अथवा भय कहाँ प्रभावित कर सकते हैं?

श्लोक 38 (bhagavata.11.29.38)

प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना भृत्याय विज्ञानमयः प्रदीपः । हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं कोऽन्यं समीयाच्छरणं त्वदीयम् ॥ ३८ ॥

pratyarpito me bhavatānukampinā bhṛtyāya vijñāna-mayaḥ pradīpaḥ hitvā kṛta-jñas tava pāda-mūlaṁ ko 'nyaṁ samīyāc charaṇaṁ tvadīyam

आपने अपनी कृपा से मुझ दास को विज्ञानमय दीपक पुनः लौटा दिया है। ऐसे में आपका कृतज्ञ भक्त आपके चरण-कमलों को छोड़कर और किस शरण को प्राप्त होगा?

श्लोक 39 (bhagavata.11.29.39)

वृक्णश्च मे सुदृढः स्नेहपाशो दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु । प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना ॥ ३९ ॥

vṛkṇaś ca me su-dṛḍhaḥ sneha-pāśo dāśārha-vṛṣṇy-andhaka-sātvateṣu prasāritaḥ sṛṣṭi-vivṛddhaye tvayā sva-māyayā hy ātma-subodha-hetinā

दाशार्ह, वृष्णि, अन्धक तथा सात्वत कुलों के प्रति मेरा जो अत्यन्त दृढ़ स्नेह-पाश था — जिसे आपने ही, सृष्टि की वृद्धि के लिए, अपनी माया से मुझ पर फैलाया था — वह अब आत्म-ज्ञान के अस्त्र से कट गया।

श्लोक 40 (bhagavata.11.29.40)

नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम् । यथा त्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी ॥ ४० ॥

namo 'stu te mahā-yogin prapannam anuśādhi mām yathā tvac-caraṇāmbhoje ratiḥ syād anapāyinī

हे महायोगिन्, आपको नमस्कार है। शरणागत मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे आपके चरण-कमलों में मेरी अनपायिनी (कभी न छूटने वाली) रति बनी रहे।

श्लोक 41 (bhagavata.11.29.41)

श्रीभगवानुवाच गच्छोद्धव मयादिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम् । तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः ॥ ४१ ॥

śrī-bhagavān uvāca gacchoddhava mayādiṣṭo badary-ākhyaṁ mamāśramam tatra mat-pāda-tīrthode snānopasparśanaiḥ śuciḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे उद्धव, मेरी आज्ञा से बदरिकाश्रम नामक मेरे आश्रम को जाओ। वहाँ मेरे चरणों से प्रकट हुए तीर्थ-जल में स्नान तथा स्पर्श से पवित्र होकर —

श्लोक 42 (bhagavata.11.29.42)

ईक्षयालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः । वसानो वल्कलान्यङ्ग वन्यभुक् सुखनिःस्पृहः ॥ ४२ ॥

īkṣayālakanandāyā vidhūtāśeṣa-kalmaṣaḥ vasāno valkalāny aṅga vanya-bhuk sukha-niḥspṛhaḥ

— अलकनन्दा के दर्शन मात्र से समस्त पाप धुल जाने पर, हे अंग, वल्कल वस्त्र धारण कर, वन में जो सहज ही उपलब्ध हो उसी से निर्वाह करते हुए, सुखी तथा निःस्पृह रहो;

श्लोक 43 (bhagavata.11.29.43)

तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः । शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ४३ ॥

titikṣur dvandva-mātrāṇāṁ suśīlaḥ saṁyatendriyaḥ śāntaḥ samāhita-dhiyā jñāna-vijñāna-saṁyutaḥ

— सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करने वाले, सुशील, जितेन्द्रिय, शान्त, स्थिरबुद्धि तथा ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न बनकर —

श्लोक 44 (bhagavata.11.29.44)

मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन् । मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव । अतिव्रज्य गतीस्तिस्रो मामेष्यसि ततः परम् ॥ ४४ ॥

matto 'nuśikṣitaṁ yat te viviktam anubhāvayan mayy āveśita-vāk-citto mad-dharma-nirato bhava ativrajya gatīs tisro mām eṣyasi tataḥ param

— मुझसे सीखी हुई इस विवेक-दृष्टि का निरन्तर अनुभव करते हुए, वाणी और चित्त को मुझमें लगाकर, मेरे धर्म में निरत रहो। इस प्रकार तीनों गुणों की गतियों को लाँघकर तुम अन्ततः मुझे ही प्राप्त होओगे।

श्लोक 45 (bhagavata.11.29.45)

श्रीशुक उवाच स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः । शिरो निधायाश्रुकलाभिरार्द्रधी- र्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५ ॥

śrī-śuka uvāca sa evam ukto hari-medhasoddhavaḥ pradakṣiṇaṁ taṁ parisṛtya pādayoḥ śiro nidhāyāśru-kalābhir ārdra-dhīr nyaṣiñcad advandva-paro 'py apakrame

श्री शुकदेव ने कहा — भगवान हरि के इन वचनों को सुनकर उद्धव ने उनकी परिक्रमा की और उनके चरणों में अपना शिर रखा। समस्त द्वन्द्वों से परे होते हुए भी, उनका हृदय द्रवित हो गया, और इस विदाई के क्षण उन्होंने अपने आँसुओं से भगवान के चरणों को सिंचित कर दिया।

श्लोक 46 (bhagavata.11.29.46)

सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुरः । कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके बिभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥ ४६ ॥

su-dustyaja-sneha-viyoga-kātaro na śaknuvaṁs taṁ parihātum āturaḥ kṛcchraṁ yayau mūrdhani bhartṛ-pāduke bibhran namaskṛtya yayau punaḥ punaḥ

उस अत्यन्त दुस्त्यज स्नेह के वियोग से व्याकुल तथा पीड़ित होकर वे उन्हें छोड़ नहीं पा रहे थे। बड़ी कठिनाई से, अपने स्वामी की पादुकाओं को शिर पर धारण कर, बार-बार प्रणाम करते हुए वे वहाँ से चल पड़े।

श्लोक 47 (bhagavata.11.29.47)

ततस्तमन्तर्हृदि सन्निवेश्य गतो महाभागवतो विशालाम् । यथोपदिष्टां जगदेकबन्धुना तपः समास्थाय हरेरगाद् गतिम् ॥ ४७ ॥

tatas tam antar hṛdi sanniveśya gato mahā-bhāgavato viśālām yathopadiṣṭāṁ jagad-eka-bandhunā tapaḥ samāsthāya harer agād gatim

तत्पश्चात्, भगवान को अपने हृदय में गहराई से स्थापित कर, वे महाभागवत उद्धव विशाला (बदरिकाश्रम) की ओर गए, तथा जगत् के एकमात्र बन्धु हरि द्वारा बताए गए तप में स्थित होकर उन्हीं के परम धाम को प्राप्त हुए।

श्लोक 48 (bhagavata.11.29.48)

य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम् । कृष्णेन योगेश्वरसेविताङ्घ्रिणा सच्छ्रद्धयासेव्य जगद् विमुच्यते ॥ ४८ ॥

ya etad ānanda-samudra-sambhṛtaṁ jñānāmṛtaṁ bhāgavatāya bhāṣitam kṛṣṇena yogeśvara-sevitāṅghriṇā sac-chraddhayāsevya jagad vimucyate

आनन्द के सागर से भरा हुआ यह ज्ञानामृत, योगेश्वरों द्वारा सेवित चरणों वाले श्रीकृष्ण द्वारा अपने भक्त को कहा गया। इस जगत् में जो कोई भी सच्ची श्रद्धा से इसका सेवन करता है, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 49 (bhagavata.11.29.49)

भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं निगमकृदुपजह्रे भृङ्गवद् वेदसारम् । अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान् पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि ॥ ४९ ॥

bhava-bhayam apahantuṁ jñāna-vijñāna-sāraṁ nigama-kṛd upajahre bhṛṅga-vad veda-sāram amṛtam udadhitaś cāpāyayad bhṛtya-vargān puruṣam ṛṣabham ādyaṁ kṛṣṇa-saṁjñaṁ nato 'smi

संसार के भय को दूर करने के लिए, वेद के रचयिता उन्होंने, भ्रमर की भाँति, वेद के इस ज्ञान-विज्ञानमय सार को एकत्र किया, तथा अपने सेवकों को उस सागर से निकाला हुआ अमृत पिलाया — उन आदिपुरुष, श्रीकृष्ण नामधारी को मैं नमन करता हूँ।

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