एकादश स्कन्ध · अध्याय 30
यदुवंश का तिरोभाव
श्लोक 1 (bhagavata.11.30.1)
श्रीराजोवाच ततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम् । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥
śrī-rājovāca tato mahā-bhāgavata uddhave nirgate vanam dvāravatyāṁ kim akarod bhagavān bhūta-bhāvanaḥ
श्री राजा ने कहा — महाभागवत उद्धव के वन को चले जाने के बाद, समस्त प्राणियों के पालनकर्ता भगवान ने द्वारका में क्या किया?
श्लोक 2 (bhagavata.11.30.2)
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः । प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥
brahma-śāpopasaṁsṛṣṭe sva-kule yādavarṣabhaḥ preyasīṁ sarva-netrāṇāṁ tanuṁ sa katham atyajat
जब ब्राह्मणों के शाप से उनका अपना कुल नष्ट हो गया, तब उन यदुश्रेष्ठ ने सबकी आँखों के प्रियतम अपने उस शरीर को किस प्रकार त्यागा?
श्लोक 3 (bhagavata.11.30.3)
प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति ततो यत् सतामात्मलग्नम् । यच्छ्रीर्वाचां जनयति रतिं किं नु मानं कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥
pratyākraṣṭuṁ nayanam abalā yatra lagnaṁ na śekuḥ karṇāviṣṭaṁ na sarati tato yat satām ātma-lagnam yac-chrīr vācāṁ janayati ratiṁ kiṁ nu mānaṁ kavīnāṁ dṛṣṭvā jiṣṇor yudhi ratha-gataṁ yac ca tat-sāmyam īyuḥ
जिस रूप पर टिकी आँखों को स्त्रियाँ हटा ही नहीं पाती थीं, जो कानों में एक बार प्रवेश कर संतों के हृदय में स्थिर हो जाने पर कभी नहीं निकलता था, जिसकी शोभा कवियों की वाणी में प्रीति उत्पन्न करती है — कीर्ति की तो बात ही क्या — तथा जिसे युद्ध में अर्जुन के रथ पर देखकर योद्धागण उसी के समान पद को प्राप्त हो गए —
श्लोक 4 (bhagavata.11.30.4)
श्री ऋषिरुवाच दिवि भुव्यन्तरिक्षे च महोत्पातान् समुत्थितान् । दृष्ट्वासीनान् सुधर्मायां कृष्णः प्राह यदूनिदम् ॥ ४ ॥
śrī ṛṣir uvāca divi bhuvy antarikṣe ca mahotpātān samutthitān dṛṣṭvāsīnān su-dharmāyāṁ kṛṣṇaḥ prāha yadūn idam
श्री ऋषि (शुकदेव) ने कहा — आकाश में, पृथ्वी पर तथा अन्तरिक्ष में उठे हुए महान उत्पातों को देखकर, सुधर्मा सभा में बैठे यदुवंशियों से श्रीकृष्ण ने यह कहा।
श्लोक 5 (bhagavata.11.30.5)
श्रीभगवानुवाच एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतवः । मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवाः ॥ ५ ॥
śrī-bhagavān uvāca ete ghorā mahotpātā dvārvatyāṁ yama-ketavaḥ muhūrtam api na stheyam atra no yadu-puṅgavāḥ
श्रीभगवान ने कहा — हे यदुश्रेष्ठो, द्वारका में उठे ये भयंकर महान उत्पात यमराज की ध्वजाओं के समान हैं। यहाँ अब एक क्षण भी नहीं रुकना चाहिए।
श्लोक 6 (bhagavata.11.30.6)
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च शङ्खोद्धारं व्रजन्त्वितः । वयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक् सरस्वती ॥ ६ ॥
striyo bālāś ca vṛddhāś ca śaṅkhoddhāraṁ vrajantv itaḥ vayaṁ prabhāsaṁ yāsyāmo yatra pratyak sarasvatī
स्त्रियाँ, बालक तथा वृद्धजन यहाँ से शंखोद्धार को जाएँ, और हम प्रभास क्षेत्र में जाएँगे, जहाँ सरस्वती पश्चिम की ओर बहती है।
श्लोक 7 (bhagavata.11.30.7)
तत्राभिषिच्य शुचय उपोष्य सुसमाहिताः । देवताः पूजयिष्यामः स्नपनालेपनार्हणैः ॥ ७ ॥
tatrābhiṣicya śucaya upoṣya su-samāhitāḥ devatāḥ pūjayiṣyāmaḥ snapanālepanārhaṇaiḥ
वहाँ स्नान कर, पवित्र होकर, उपवास कर, एकाग्रचित्त होकर हम स्नपन, अंगराग तथा अर्हण द्वारा देवताओं की पूजा करेंगे।
श्लोक 8 (bhagavata.11.30.8)
ब्राह्मणांस्तु महाभागान् कृतस्वस्त्ययना वयम् । गोभूहिरण्यवासोभिर्गजाश्वरथवेश्मभिः ॥ ८ ॥
brāhmaṇāṁs tu mahā-bhāgān kṛta-svastyayanā vayam go-bhū-hiraṇya-vāsobhir gajāśva-ratha-veśmabhiḥ
तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन कराकर, हम महाभाग ब्राह्मणों को गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ तथा आवास प्रदान करेंगे।
श्लोक 9 (bhagavata.11.30.9)
विधिरेष ह्यरिष्टघ्नो मङ्गलायनमुत्तमम् । देवद्विजगवां पूजा भूतेषु परमो भवः ॥ ९ ॥
vidhir eṣa hy ariṣṭa-ghno maṅgalāyanam uttamam deva-dvija-gavāṁ pūjā bhūteṣu paramo bhavaḥ
यह विधि अनिष्ट का नाश करने वाली तथा परम मंगलकारी है, क्योंकि देवता, ब्राह्मण तथा गौओं की पूजा प्राणियों के लिए सबसे बड़ा कल्याण है।
श्लोक 10 (bhagavata.11.30.10)
इति सर्वे समाकर्ण्य यदुवृद्धा मधुद्विषः । तथेति नौभिरुत्तीर्य प्रभासं प्रययू रथैः ॥ १० ॥
iti sarve samākarṇya yadu-vṛddhā madhu-dviṣaḥ tatheti naubhir uttīrya prabhāsaṁ prayayū rathaiḥ
मधुसूदन के ये वचन सुनकर सभी यदुवंश के वृद्धजनों ने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकृति दी, और नौकाओं से पार होकर रथों द्वारा प्रभास की ओर चल पड़े।
श्लोक 11 (bhagavata.11.30.11)
तस्मिन् भगवतादिष्टं यदुदेवेन यादवाः । चक्रुः परमया भक्त्या सर्वश्रेयोपबृंहितम् ॥ ११ ॥
tasmin bhagavatādiṣṭaṁ yadu-devena yādavāḥ cakruḥ paramayā bhaktyā sarva-śreyopabṛṁhitam
वहाँ यादवों ने अपने स्वामी भगवान के आदेश के अनुसार परम भक्तिपूर्वक वे सब कार्य किए, जो सम्पूर्ण कल्याण देने वाले थे।
श्लोक 12 (bhagavata.11.30.12)
ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु । दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मतिः ॥ १२ ॥
tatas tasmin mahā-pānaṁ papur maireyakaṁ madhu diṣṭa-vibhraṁśita-dhiyo yad-dravair bhraśyate matiḥ
फिर वहाँ, भाग्य द्वारा बुद्धि भ्रष्ट हो जाने से, वे मैरेयक मधु नामक मादक पेय का अत्यधिक पान करने लगे, जिसके प्रभाव से मति भ्रष्ट हो जाती है।
श्लोक 13 (bhagavata.11.30.13)
महापानाभिमत्तानां वीराणां दृप्तचेतसाम् । कृष्णमायाविमूढानां सङ्घर्षः सुमहानभूत् ॥ १३ ॥
mahā-pānābhimattānāṁ vīrāṇāṁ dṛpta-cetasām kṛṣṇa-māyā-vimūḍhānāṁ saṅgharṣaḥ su-mahān abhūt
अत्यधिक पान से मत्त, अहंकार से भरे तथा श्रीकृष्ण की माया से मोहित उन वीरों में एक बहुत बड़ा संघर्ष उत्पन्न हो गया।
श्लोक 14 (bhagavata.11.30.14)
युयुधुः क्रोधसंरब्धा वेलायामाततायिनः । धनुर्भिरसिभिर्भल्लैर्गदाभिस्तोमरर्ष्टिभिः ॥ १४ ॥
yuyudhuḥ krodha-saṁrabdhā velāyām ātatāyinaḥ dhanurbhir asibhir bhallair gadābhis tomararṣṭibhiḥ
क्रोध से उद्वेलित होकर वे तट पर ही धनुष, खड्ग, भल्ल, गदा, तोमर तथा ऋष्टि लेकर आपस में युद्ध करने लगे।
श्लोक 15 (bhagavata.11.30.15)
पतत्पताकै रथकुञ्जरादिभिः खरोष्ट्रगोभिर्महिषैर्नरैरपि । मिथः समेत्याश्वतरैः सुदुर्मदा न्यहन्शरैर्दद्भिरिव द्विपा वने ॥ १५ ॥
patat-patākai ratha-kuñjarādibhiḥ kharoṣṭra-gobhir mahiṣair narair api mithaḥ sametyāśvataraiḥ su-durmadā nyahan śarair dadbhir iva dvipā vane
रथों, हाथियों, गधों, ऊँटों, बैलों, भैंसों, मनुष्यों तथा खच्चरों पर सवार, फहराती पताकाओं वाले, अत्यन्त उन्मत्त हुए योद्धागण एक-दूसरे से भिड़कर बाणों से एक-दूसरे को उसी तरह मारने लगे, जैसे वन में हाथी अपने दाँतों से लड़ते हैं।
श्लोक 16 (bhagavata.11.30.16)
प्रद्युम्नसाम्बौ युधि रूढमत्सराव्- अक्रूरभोजावनिरुद्धसात्यकी । सुभद्रसङ्ग्रामजितौ सुदारुणौ गदौ सुमित्रासुरथौ समीयतुः ॥ १६ ॥
pradyumna-sāmbau yudhi rūḍha-matsarāv akrūra-bhojāv aniruddha-sātyakī subhadra-saṅgrāmajitau su-dāruṇau gadau sumitrā-surathau samīyatuḥ
युद्ध में प्रगाढ़ ईर्ष्या से भरकर प्रद्युम्न और साम्ब, अक्रूर और भोज, अनिरुद्ध और सात्यकि, सुभद्र और संग्रामजित्, तथा भयंकर सुमित्र और सुरथ तथा दोनों गद परस्पर भिड़ गए।
श्लोक 17 (bhagavata.11.30.17)
अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादयः सहस्रजिच्छतजिद्भानुमुख्याः । अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिता जघ्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भृशम् ॥ १७ ॥
anye ca ye vai niśaṭholmukādayaḥ sahasrajic-chatajid-bhānu-mukhyāḥ anyonyam āsādya madāndha-kāritā jaghnur mukundena vimohitā bhṛśam
निशठ, उल्मुक आदि तथा सहस्रजित्, शतजित् और भानु प्रमुख अन्य लोग भी, मद से अन्धे तथा मुकुन्द द्वारा अत्यन्त मोहित होकर, एक-दूसरे से भिड़कर एक-दूसरे को मार डालने लगे।
श्लोक 18 (bhagavata.11.30.18)
दाशार्हवृष्ण्यन्धकभोजसात्वता मध्वर्बुदा माथुरशूरसेनाः । विसर्जनाः कुकुराः कुन्तयश्च मिथस्तु जघ्नुः सुविसृज्य सौहृदम् ॥ १८ ॥
dāśārha-vṛṣṇy-andhaka-bhoja-sātvatā madhv-arbudā māthura-śūrasenāḥ visarjanāḥ kukurāḥ kuntayaś ca mithas tu jaghnuḥ su-visṛjya sauhṛdam
दाशार्ह, वृष्णि, अन्धक, भोज, सात्वत, मधु, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, विसर्जन, कुकुर तथा कुन्ति — सभी अपनी परस्पर मित्रता को पूर्णतः त्यागकर एक-दूसरे का संहार करने लगे।
श्लोक 19 (bhagavata.11.30.19)
पुत्रा अयुध्यन् पितृभिर्भ्रातृभिश्च स्वस्रीयदौहित्रपितृव्यमातुलैः । मित्राणि मित्रैः सुहृदः सुहृद्भि- र्ज्ञातींस्त्वहन् ज्ञातय एव मूढाः ॥ १९ ॥
putrā ayudhyan pitṛbhir bhrātṛbhiś ca svasrīya-dauhitra-pitṛvya-mātulaiḥ mitrāṇi mitraiḥ suhṛdaḥ suhṛdbhir jñātīṁs tv ahan jñātaya eva mūḍhāḥ
पुत्र पिताओं से, भाई भाइयों से, भांजे-नाती चाचा-मामाओं से युद्ध करने लगे; मित्र मित्रों से, सुहृद सुहृदों से लड़ने लगे — इस प्रकार मोहग्रस्त होकर स्वजन ही स्वजनों को मारने लगे।
श्लोक 20 (bhagavata.11.30.20)
शरेषु हीयमानेषु भज्यमानेसु धन्वसु । शस्त्रेषु क्षीयमानेषु मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः ॥ २० ॥
śareṣu hīyamāneṣu bhajyamāneṣu dhanvasu śastreṣu kṣīyamāneṣu muṣṭibhir jahrur erakāḥ
जब बाण समाप्त हो गए, धनुष टूट गए तथा शस्त्र भी क्षीण हो गए, तब उन्होंने मुट्ठियों में नरकुल की सींकें उठा लीं।
श्लोक 21 (bhagavata.11.30.21)
ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृताः । जघ्नुर्द्विषस्तैः कृष्णेन वार्यमाणास्तु तं च ते ॥ २१ ॥
tā vajra-kalpā hy abhavan parighā muṣṭinā bhṛtāḥ jaghnur dviṣas taiḥ kṛṣṇena vāryamāṇās tu taṁ ca te
मुट्ठी में पकड़ते ही वे सींकें वज्र के समान कठोर लौह-दण्ड बन गईं। उनसे उन्होंने अपने शत्रुओं पर प्रहार किया, और जब श्रीकृष्ण ने उन्हें रोकना चाहा तो उन पर भी प्रहार करने लगे।
श्लोक 22 (bhagavata.11.30.22)
प्रत्यनीकं मन्यमाना बलभद्रं च मोहिताः । हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिनः ॥ २२ ॥
pratyanīkaṁ manyamānā balabhadraṁ ca mohitāḥ hantuṁ kṛta-dhiyo rājann āpannā ātatāyinaḥ
हे राजन्, मोहग्रस्त होकर उन्होंने बलभद्र को भी शत्रु समझ लिया, और शस्त्र उठाकर उन्हें मार डालने के इरादे से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 23 (bhagavata.11.30.23)
अथ तावपि सङ्क्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन । एरकामुष्टिपरिघौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि ॥ २३ ॥
atha tāv api saṅkruddhāv udyamya kuru-nandana erakā-muṣṭi-parighau carantau jaghnatur yudhi
हे कुरुनन्दन, तब वे दोनों [कृष्ण और बलराम] भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर नरकुल के डण्डे उठाकर, युद्ध-भूमि में विचरते हुए प्रहार करने लगे।
श्लोक 24 (bhagavata.11.30.24)
ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम् । स्पर्धाक्रोधः क्षयं निन्ये वैणवोऽग्निर्यथा वनम् ॥ २४ ॥
brahma-śāpopasṛṣṭānāṁ kṛṣṇa-māyāvṛtātmanām spardhā-krodhaḥ kṣayaṁ ninye vaiṇavo 'gnir yathā vanam
ब्राह्मणों के शाप से आक्रान्त तथा श्रीकृष्ण की माया से आवृत-चित्त उन योद्धाओं की परस्पर स्पर्धा और क्रोध ने उन सबका विनाश कर दिया, जैसे बाँस के वन में लगी आग सारे वन को भस्म कर देती है।
श्लोक 25 (bhagavata.11.30.25)
एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः । अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषितः ॥ २५ ॥
evaṁ naṣṭeṣu sarveṣu kuleṣu sveṣu keśavaḥ avatārito bhuvo bhāra iti mene 'vaśeṣitaḥ
इस प्रकार अपने सम्पूर्ण कुल का नाश हो जाने पर, केशव ने, अकेले शेष रह जाकर, यह विचार किया कि अब पृथ्वी का भार उतर गया है।
श्लोक 26 (bhagavata.11.30.26)
रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम् । तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥
rāmaḥ samudra-velāyāṁ yogam āsthāya pauruṣam tatyāja lokaṁ mānuṣyaṁ saṁyojyātmānam ātmani
बलराम समुद्र-तट पर जाकर परम पुरुष के योग में स्थित हो गए, और अपने आत्मा को आत्मा में लीन कर इस मनुष्य-लोक को त्याग दिया।
श्लोक 27 (bhagavata.11.30.27)
रामनिर्याणमालोक्य भगवान् देवकीसुतः । निषसाद धरोपस्थे तुष्णीमासाद्य पिप्पलम् ॥ २७ ॥
rāma-niryāṇam ālokya bhagavān devakī-sutaḥ niṣasāda dharopasthe tuṣṇīm āsādya pippalam
बलराम के इस प्रस्थान को देखकर देवकीनन्दन भगवान चुपचाप वहीं पास के एक पीपल वृक्ष के नीचे भूमि पर जा बैठे।
श्लोक 28 (bhagavata.11.30.28)
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया । दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः ॥ २८ ॥
bibhrac catur-bhujaṁ rūpaṁ bhrājiṣṇu prabhayā svayā diśo vitimirāḥ kurvan vidhūma iva pāvakaḥ
अपनी ही प्रभा से देदीप्यमान, धूमरहित अग्नि के समान दिशाओं के अन्धकार को दूर करते हुए अपने चतुर्भुज रूप को धारण किए —
श्लोक 29 (bhagavata.11.30.29)
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम् । कौशेयाम्बरयुग्मेन परिवीतं सुमङ्गलम् ॥ २९ ॥
śrīvatsāṅkaṁ ghana-śyāmaṁ tapta-hāṭaka-varcasam kauśeyāmbara-yugmena parivītaṁ su-maṅgalam
— श्रीवत्स-चिह्न से युक्त, सघन मेघ के समान श्याम वर्ण, तपाए हुए सुवर्ण के समान कान्तिमान, एक जोड़ी रेशमी वस्त्रों से सुशोभित, अत्यन्त मंगलमय —
श्लोक 30 (bhagavata.11.30.30)
सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम् । पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ ३० ॥
sundara-smita-vaktrābjaṁ nīla-kuntala-maṇḍitam puṇḍarīkābhirāmākṣaṁ sphuran makara-kuṇḍalam
— सुन्दर मुस्कान से युक्त कमल-मुख वाले, श्याम घुँघराले केशों से सुशोभित, कमलदल के समान मनोहर नेत्रों वाले, चमकते हुए मकराकार कुण्डलों वाले —
श्लोक 31 (bhagavata.11.30.31)
कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकिरीटकटकाङ्गदैः । हारनूपुरमुद्राभिः कौस्तुभेन विराजितम् ॥ ३१ ॥
kaṭi-sūtra-brahma-sūtra- kirīṭa-kaṭakāṅgadaiḥ hāra-nūpura-mudrābhiḥ kaustubhena virājitam
— करधनी, यज्ञोपवीत, मुकुट, कंकण तथा भुजबन्ध से, तथा हार, नूपुर, मुद्रिकाओं और कौस्तुभमणि से सुशोभित —
श्लोक 32 (bhagavata.11.30.32)
वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधैः । कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम् ॥ ३२ ॥
vana-mālā-parītāṅgaṁ mūrtimadbhir nijāyudhaiḥ kṛtvorau dakṣiṇe pādam āsīnaṁ paṅkajāruṇam
— वनमाला से घिरे हुए अंगों वाले, अपने साक्षात् आयुधों से घिरे, दाहिनी जाँघ पर अपना कमल-सा अरुण चरण रखे हुए बैठे थे।
श्लोक 33 (bhagavata.11.30.33)
मुषलावशेषायःखण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा । मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया ॥ ३३ ॥
muṣalāvaśeṣāyaḥ-khaṇḍa- kṛteṣur lubdhako jarā mṛgāsyākāraṁ tac-caraṇaṁ vivyādha mṛga-śaṅkayā
साम्ब की गदा के अवशिष्ट लौह-खण्ड से बनाए बाण वाले जरा नामक बहेलिए ने, उस अरुण चरण को मृग-मुख समझकर, मृगशंका से बींध दिया।
श्लोक 34 (bhagavata.11.30.34)
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्बिषः । भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विषः ॥ ३४ ॥
catur-bhujaṁ taṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā sa kṛta-kilbiṣaḥ bhītaḥ papāta śirasā pādayor asura-dviṣaḥ
उस चतुर्भुज पुरुष को देखकर, अपराध किए हुए वह भयभीत होकर, असुरों के शत्रु के चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा।
श्लोक 35 (bhagavata.11.30.35)
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन । क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमःश्लोक मेऽनघ ॥ ३५ ॥
ajānatā kṛtam idaṁ pāpena madhusūdana kṣantum arhasi pāpasya uttamaḥśloka me 'nagha
"हे मधुसूदन, यह पापी कर्म मुझ अज्ञानी से हो गया। हे निष्पाप, हे उत्तमःश्लोक, मुझ पापी को क्षमा कीजिए।"
श्लोक 36 (bhagavata.11.30.36)
यस्यानुस्मरणं नृणामज्ञानध्वान्तनाशनम् । वदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृतं प्रभो ॥ ३६ ॥
yasyānusmaraṇaṁ nṛṇām ajñāna-dhvānta-nāśanam vadanti tasya te viṣṇo mayāsādhu kṛtaṁ prabho
"हे विष्णु, विद्वान कहते हैं कि जिनका स्मरण मात्र मनुष्यों के अज्ञान-अन्धकार को नष्ट कर देता है, हे प्रभु, उन्हीं आपके साथ मैंने यह अशुभ कर्म किया है।"
श्लोक 37 (bhagavata.11.30.37)
तन्माशु जहि वैकुण्ठ पाप्मानं मृगलुब्धकम् । यथा पुनरहं त्वेवं न कुर्यां सदतिक्रमम् ॥ ३७ ॥
tan māśu jahi vaikuṇṭha pāpmānaṁ mṛga-lubdhakam yathā punar ahaṁ tv evaṁ na kuryāṁ sad-atikramam
"अतः हे वैकुण्ठनाथ, इस पापी मृगया-बहेलिए को तत्काल मार डालिए, जिससे मैं पुनः कभी सन्तों के प्रति ऐसा अपराध न करूँ।"
श्लोक 38 (bhagavata.11.30.38)
यस्यात्मयोगरचितं न विदुर्विरिञ्चो रुद्रादयोऽस्य तनयाः पतयो गिरां ये । त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदञ्जः किं तस्य ते वयमसद्गतयो गृणीमः ॥ ३८ ॥
yasyātma-yoga-racitaṁ na vidur viriñco rudrādayo 'sya tanayāḥ patayo girāṁ ye tvan-māyayā pihita-dṛṣṭaya etad añjaḥ kiṁ tasya te vayam asad-gatayo gṛṇīmaḥ
"जिनकी आत्म-योगमयी लीला को न ब्रह्मा जानते हैं, न उनके पुत्र रुद्र आदि, न वाणी के स्वामी महान ऋषिगण — क्योंकि आपकी माया से उनकी दृष्टि भी आच्छादित है — उसके विषय में हम जैसे अधम पुरुष भला क्या कह सकते हैं?"
श्लोक 39 (bhagavata.11.30.39)
श्रीभगवानुवाच मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे । याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम् ॥ ३९ ॥
śrī-bhagavān uvāca mā bhair jare tvam uttiṣṭha kāma eṣa kṛto hi me yāhi tvaṁ mad-anujñātaḥ svargaṁ su-kṛtināṁ padam
श्रीभगवान ने कहा — हे जरा, भयभीत मत हो, उठो। यह तो मेरी ही इच्छा से हुआ है। मेरी अनुमति से तुम पुण्यात्माओं के धाम स्वर्ग को जाओ।
श्लोक 40 (bhagavata.11.30.40)
इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा । त्रिः परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवं ययौ ॥ ४० ॥
ity ādiṣṭo bhagavatā kṛṣṇenecchā-śarīriṇā triḥ parikramya taṁ natvā vimānena divaṁ yayau
इच्छानुसार शरीर धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रकार आदेश देने पर, उसने तीन बार उनकी परिक्रमा कर, प्रणाम कर, विमान से स्वर्गलोक की यात्रा की।
श्लोक 41 (bhagavata.11.30.41)
दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्य ताम् । वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ ॥ ४१ ॥
dārukaḥ kṛṣṇa-padavīm anvicchann adhigamya tām vāyuṁ tulasikāmodam āghrāyābhimukhaṁ yayau
इधर सारथि दारुक श्रीकृष्ण के मार्ग को ढूँढते हुए वहाँ पहुँचा, तथा वायु में तुलसी की सुगन्ध पाकर उसी दिशा की ओर चल पड़ा।
श्लोक 42 (bhagavata.11.30.42)
तं तत्र तिग्मद्युभिरायुधैर्वृतं ह्यश्वत्थमूले कृतकेतनं पतिम् । स्नेहप्लुतात्मा निपपात पादयो रथादवप्लुत्य सबाष्पलोचनः ॥ ४२ ॥
taṁ tatra tigma-dyubhir āyudhair vṛtaṁ hy aśvattha-mūle kṛta-ketanaṁ patim sneha-plutātmā nipapāta pādayo rathād avaplutya sa-bāṣpa-locanaḥ
अपने स्वामी को वहाँ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे, चमकते हुए आयुधों से घिरे बैठे देखकर, स्नेह से आर्द्र-हृदय होकर वह रथ से कूद पड़ा और अश्रुपूरित नेत्रों से उनके चरणों में गिर पड़ा।
श्लोक 43 (bhagavata.11.30.43)
अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो दृष्टिः प्रणष्टा तमसि प्रविष्टा । दिशो न जाने न लभे च शान्तिं यथा निशायामुडुपे प्रणष्टे ॥ ४३ ॥
apaśyatas tvac-caraṇāmbujaṁ prabho dṛṣṭiḥ praṇaṣṭā tamasi praviṣṭā diśo na jāne na labhe ca śāntiṁ yathā niśāyām uḍupe praṇaṣṭe
"हे प्रभु, आपके चरण-कमलों को न देख पाने से मेरी दृष्टि नष्ट होकर अन्धकार में डूब गई है। मुझे कोई दिशा नहीं सूझती और न कहीं शान्ति मिलती है — जैसे रात्रि में चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर होता है।"
श्लोक 44 (bhagavata.11.30.44)
इति ब्रुवति सूते वै रथो गरुडलाञ्छनः । खमुत्पपात राजेन्द्र साश्वध्वज उदीक्षतः ॥ ४४ ॥
iti bruvati sūte vai ratho garuḍa-lāñchanaḥ kham utpapāta rājendra sāśva-dhvaja udīkṣataḥ
[शुकदेव ने आगे कहा —] हे राजेन्द्र, सारथि के ऐसा कहते ही, उसकी आँखों के सामने गरुड़-चिह्नित वह रथ अपने घोड़ों और ध्वजा सहित आकाश में उड़ गया।
श्लोक 45 (bhagavata.11.30.45)
तमन्वगच्छन् दिव्यानि विष्णुप्रहरणानि च । तेनातिविस्मितात्मानं सूतमाह जनार्दनः ॥ ४५ ॥
tam anvagacchan divyāni viṣṇu-praharaṇāni ca tenāti-vismitātmānaṁ sūtam āha janārdanaḥ
विष्णु के दिव्य आयुध भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े। तब यह देखकर अत्यन्त विस्मित हुए उस सारथि से भगवान जनार्दन ने कहा।
श्लोक 46 (bhagavata.11.30.46)
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः । सङ्कर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम् ॥ ४६ ॥
gaccha dvāravatīṁ sūta jñātīnāṁ nidhanaṁ mithaḥ saṅkarṣaṇasya niryāṇaṁ bandhubhyo brūhi mad-daśām
"हे सूत, द्वारका जाओ और स्वजनों से हमारे कुटुम्बियों के परस्पर संहार का, संकर्षण के प्रस्थान का, तथा मेरी वर्तमान दशा का समाचार कहो।"
श्लोक 47 (bhagavata.11.30.47)
द्वारकायां च न स्थेयं भवद्भिश्च स्वबन्धुभिः । मया त्यक्तां यदुपुरीं समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ ४७ ॥
dvārakāyāṁ ca na stheyaṁ bhavadbhiś ca sva-bandhubhiḥ mayā tyaktāṁ yadu-purīṁ samudraḥ plāvayiṣyati
"तथा तुम्हें और तुम्हारे स्वजनों को द्वारका में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि मेरे द्वारा त्याग दी गई यह यदुपुरी समुद्र द्वारा जलमग्न कर दी जाएगी।"
श्लोक 48 (bhagavata.11.30.48)
स्वं स्वं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः । अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ ॥ ४८ ॥
svaṁ svaṁ parigrahaṁ sarve ādāya pitarau ca naḥ arjunenāvitāḥ sarva indraprasthaṁ gamiṣyatha
"आप सभी अपने-अपने परिवार तथा हमारे माता-पिता को साथ लेकर, अर्जुन की सुरक्षा में इन्द्रप्रस्थ चले जाना।"
श्लोक 49 (bhagavata.11.30.49)
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः । मन्मायारचितामेतां विज्ञायोपशमं व्रज ॥ ४९ ॥
tvaṁ tu mad-dharmam āsthāya jñāna-niṣṭha upekṣakaḥ man-māyā-racitām etāṁ vijñayopaśamaṁ vraja
"परन्तु तुम मेरे धर्म में स्थित रहकर, ज्ञान में निष्ठा रखते हुए, उदासीन रहना; और इस समस्त लीला को मेरी ही माया की रचना जानकर शान्त रहना।"
श्लोक 50 (bhagavata.11.30.50)
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य पुनः पुनः । तत्पादौ शीर्ष्ण्युपाधाय दुर्मनाः प्रययौ पुरीम् ॥ ५० ॥
ity uktas taṁ parikramya namaskṛtya punaḥ punaḥ tat-pādau śīrṣṇy upādhāya durmanāḥ prayayau purīm
इस प्रकार आदेश पाकर, दारुक ने उनकी परिक्रमा की, बार-बार प्रणाम किया, उनके चरणों को अपने शिर पर धारण किया, और भारी मन से नगर की ओर चल पड़ा।