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एकादश स्कन्ध · अध्याय 3

निमि के प्रश्न: माया और कर्मयोग का मार्ग

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (bhagavata.11.3.1)

श्रीराजोवाच परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम् । मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः ॥ 3.1 ॥

śrī-rājovāca parasya viṣṇor īśasya māyinām api mohinīm māyāṁ veditum icchāmo bhagavanto bruvantu naḥ

राजा ने कहा — अब हम परम भगवान विष्णु की उस मायाशक्ति को समझना चाहते हैं, जो बड़े-बड़े योगियों को भी मोहित कर देती है। हे भगवन्तो! कृपया हमें यह बताइए।

श्लोक 2 (bhagavata.11.3.2)

नानुतृप्ये जुषन्युष्मद्वचोहरिकथामृतम् । संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम् ॥ 3.2 ॥

nānutṛpye juṣan yuṣmad- vaco hari-kathāmṛtam saṁsāra-tāpa-nistapto martyas tat-tāpa-bheṣajam

आपके वचनों में निहित हरि-कथा के अमृत का बार-बार पान करने पर भी मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ; क्योंकि संसार-ताप से संतप्त मरणधर्मा मनुष्य के लिए वही उस ताप की वास्तविक औषधि है।

श्लोक 3 (bhagavata.11.3.3)

श्रीअन्तरीक्ष उवाच एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये ॥ 3.3 ॥

śrī-antarīkṣa uvāca ebhir bhūtāni bhūtātmā mahā-bhūtair mahā-bhuja sasarjoccāvacāny ādyaḥ sva-mātrātma-prasiddhaye

श्री अन्तरीक्ष ने कहा — हे महाबाहु राजन्! इन महाभूतों के द्वारा समस्त प्राणियों की आत्मा, वे आदिपुरुष, उच्च और निम्न प्राणियों की सृष्टि करते हैं, जिससे उनके अपने अंश भोग अथवा आत्म-सिद्धि — दोनों में से किसी को प्राप्त कर सकें।

श्लोक 4 (bhagavata.11.3.4)

एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पञ्चधातुभिः । एकधा दशधात्मानं विभजन्जुषते गुणान् ॥ 3.4 ॥

evaṁ sṛṣṭāni bhūtāni praviṣṭaḥ pañca-dhātubhiḥ ekadhā daśadhātmānaṁ vibhajan juṣate guṇān

इस प्रकार पाँच स्थूल तत्वों से रचे गए प्राणियों में वे प्रविष्ट होते हैं, और स्वयं को एक मन तथा दस इन्द्रियों के रूप में विभाजित करके उन्हें प्रकृति के गुणों में संलग्न कराते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.11.3.5)

गुणैर्गुणान्स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः । मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ 3.5 ॥

guṇair guṇān sa bhuñjāna ātma-pradyotitaiḥ prabhuḥ manyamāna idaṁ sṛṣṭam ātmānam iha sajjate

आत्मा द्वारा प्रकाशित इन्द्रियों से इन्द्रिय-विषयों को भोगता हुआ जीव, इस रचित शरीर को ही अपना स्वरूप मानकर, इस संसार में उलझ जाता है।

श्लोक 6 (bhagavata.11.3.6)

कर्माणि कर्मभिः कुर्वन्सनिमित्तानि देहभृत् । तत्तत्कर्मफलं गृह्णन्भ्रमतीह सुखेतरम् ॥ 3.6 ॥

karmāṇi karmabhiḥ kurvan sa-nimittāni deha-bhṛt tat tat karma-phalaṁ gṛhṇan bhramatīha sukhetaram

कर्मेन्द्रियों के द्वारा उनके निमित्तभूत विविध कर्मों को करते हुए, देहधारी उन-उन कर्मों के फल को ग्रहण करते हुए, इस संसार में सुख और दुःख के मध्य भटकता रहता है।

श्लोक 7 (bhagavata.11.3.7)

इत्थं कर्मगतीर्गच्छन्बह्वभद्रवहाः पुमान् । आभूतसम्प्लवात्सर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ 3.7 ॥

itthaṁ karma-gatīr gacchan bahv-abhadra-vahāḥ pumān ābhūta-samplavāt sarga- pralayāv aśnute ’vaśaḥ

इस प्रकार अपने ही कर्मों से निर्मित गतियों को प्राप्त करता हुआ, अनेक अमंगलों को साथ लिए हुए, प्राणी महाप्रलय तक विवश होकर बार-बार सृष्टि और प्रलय को भोगता रहता है।

श्लोक 8 (bhagavata.11.3.8)

धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति ॥ 3.8 ॥

dhātūpaplava āsanne vyaktaṁ dravya-guṇātmakam anādi-nidhanaḥ kālo hy avyaktāyāpakarṣati

तत्वों के प्रलय के निकट आने पर, अनादि-अनन्त काल, स्थूल द्रव्य और सूक्ष्म गुणों से बने इस प्रकट जगत् को अव्यक्त में समेट लेता है।

श्लोक 9 (bhagavata.11.3.9)

शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि । तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन्प्रतपिष्यति ॥ 3.9 ॥

śata-varṣā hy anāvṛṣṭir bhaviṣyaty ulbaṇā bhuvi tat-kālopacitoṣṇārko lokāṁs trīn pratapiṣyati

पृथ्वी पर सौ वर्षों तक चलने वाला भीषण अनावृष्टि होगा; उस काल में सूर्य की बढ़ती हुई उष्णता तीनों लोकों को झुलसा देगी।

श्लोक 10 (bhagavata.11.3.10)

पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानलः । दहन्नूर्ध्वशिखो विष्वग्वर्धते वायुनेरितः ॥ 3.10 ॥

pātāla-talam ārabhya saṅkarṣaṇa-mukhānalaḥ dahann ūrdhva-śikho viṣvag vardhate vāyuneritaḥ

पाताल-लोक से आरंभ होकर संकर्षण के मुख से निकली अग्नि, अपनी ऊपर उठती हुई ज्वाला के साथ, वायु द्वारा प्रेरित होकर सभी दिशाओं में फैलती हुई सबको जला डालती है।

श्लोक 11 (bhagavata.11.3.11)

संवर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समाः । धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट् ॥ 3.11 ॥

saṁvartako megha-gaṇo varṣati sma śataṁ samāḥ dhārābhir hasti-hastābhir līyate salile virāṭ

संवर्तक नामक मेघों के समूह सौ वर्षों तक बरसते हैं, और हाथी की सूंड जैसी मोटी धाराओं से समस्त ब्रह्माण्ड जल में विलीन हो जाता है।

श्लोक 12 (bhagavata.11.3.12)

ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप । अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ 3.12 ॥

tato virājam utsṛjya vairājaḥ puruṣo nṛpa avyaktaṁ viśate sūkṣmaṁ nirindhana ivānalaḥ

हे राजन्! तब वैराज पुरुष उस विराट स्वरूप को त्यागकर, ईंधन-रहित अग्नि के समान, सूक्ष्म अव्यक्त में प्रविष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.11.3.13)

वायुना हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते । सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ 3.13 ॥

vāyunā hṛta-gandhā bhūḥ salilatvāya kalpate salilaṁ tad-dhṛta-rasaṁ jyotiṣṭvāyopakalpate

वायु द्वारा गन्ध-गुण से वंचित पृथ्वी जल में परिणत हो जाती है; और उसी वायु द्वारा रस-गुण से वंचित जल अग्नि में परिणत हो जाता है।

श्लोक 14 (bhagavata.11.3.14)

हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते । कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ॥ 3.14 ॥

hṛta-rūpaṁ tu tamasā vāyau jyotiḥ pralīyate hṛta-sparśo ’vakāśena vāyur nabhasi līyate kālātmanā hṛta-guṇaṁ nabha ātmani līyate

अंधकार द्वारा रूप-गुण से वंचित अग्नि वायु में विलीन हो जाती है; आकाश द्वारा स्पर्श-गुण से वंचित वायु आकाश में विलीन हो जाती है; और काल-स्वरूप भगवान द्वारा गुण से वंचित आकाश तामसिक अहंकार में विलीन हो जाता है।

श्लोक 15 (bhagavata.11.3.15)

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप । प्रविशन्ति ह्यहङ्कारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ 3.15 ॥

indriyāṇi mano buddhiḥ saha vaikārikair nṛpa praviśanti hy ahaṅkāraṁ sva-guṇair aham ātmani

हे राजन्! इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि, सात्विक अहंकार से उत्पन्न देवताओं सहित, अपने-अपने गुणों के साथ अहंकार में प्रविष्ट हो जाते हैं, और अहंकार महत्तत्व में विलीन हो जाता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.3.16)

एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी । त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ 3.16 ॥

eṣā māyā bhagavataḥ sarga-sthity-anta-kāriṇī tri-varṇā varṇitāsmābhiḥ kiṁ bhūyaḥ śrotum icchasi

यह भगवान की माया है, जो त्रिगुणात्मक होकर सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कर्ता है — इस प्रकार हमने इसका वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?

श्लोक 17 (bhagavata.11.3.17)

श्रीराजोवाच यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ 3.17 ॥

śrī-rājovāca yathaitām aiśvarīṁ māyāṁ dustarām akṛtātmabhiḥ taranty añjaḥ sthūla-dhiyo maharṣa idam ucyatām

राजा ने कहा — हे महर्षे! यह बताइए कि असंयमी और स्थूलबुद्धि पुरुष भी भगवान की इस दुस्तर माया को कैसे सुगमता से पार कर सकते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.3.18)

श्रीप्रबुद्ध उवाच कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ 3.18 ॥

śrī-prabuddha uvāca karmāṇy ārabhamāṇānāṁ duḥkha-hatyai sukhāya ca paśyet pāka-viparyāsaṁ mithunī-cāriṇāṁ nṛṇām

श्री प्रबुद्ध ने कहा — दुःख-निवृत्ति और सुख-प्राप्ति के लिए कर्मों में प्रवृत्त होने वाले, स्त्री-पुरुष के जोड़े रूप में विचरने वाले मनुष्यों के परिणाम को देखना चाहिए, जो सर्वथा विपरीत निकलता है।

श्लोक 19 (bhagavata.11.3.19)

नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना । गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ 3.19 ॥

nityārtidena vittena durlabhenātma-mṛtyunā gṛhāpatyāpta-paśubhiḥ kā prītiḥ sādhitaiś calaiḥ

जो धन सदैव पीड़ादायी है, दुर्लभ है, और वस्तुतः आत्मा की मृत्यु के समान है, उससे अर्जित घर, संतान, बंधु-बांधव और पशुओं में — जो सब क्षणभंगुर हैं — क्या सुख हो सकता है?

श्लोक 20 (bhagavata.11.3.20)

एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् । सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ 3.20 ॥

evaṁ lokaṁ paraṁ vidyān naśvaraṁ karma-nirmitam sa-tulyātiśaya-dhvaṁsaṁ yathā maṇḍala-vartinām

इस प्रकार जानना चाहिए कि कर्मों से निर्मित परलोक भी नाशवान है, और समान तथा श्रेष्ठ जनों की स्पर्धा से उसका विनाश होता है, जैसे इस पृथ्वी के छोटे-छोटे राजाओं में होता है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.3.21)

तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ 3.21 ॥

tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam śābde pare ca niṣṇātaṁ brahmaṇy upaśamāśrayam

अतः परम कल्याण का जिज्ञासु पुरुष उस गुरु की शरण ले, जो शास्त्रों में और उनके परे स्थित परब्रह्म में — दोनों में निष्णात हो, तथा जो शांति में प्रतिष्ठित हो।

श्लोक 22 (bhagavata.11.3.22)

तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्मात्मदोहरिः ॥ 3.22 ॥

tatra bhāgavatān dharmān śikṣed gurv-ātma-daivataḥ amāyayānuvṛttyā yais tuṣyed ātmātma-do hariḥ

वहाँ गुरु को अपनी आत्मा और देवता मानकर भागवत-धर्मों को सीखना चाहिए — जिनका निष्कपट और श्रद्धापूर्ण पालन करने से आत्मदाता हरि प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.11.3.23)

सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ 3.23 ॥

sarvato manaso ’saṅgam ādau saṅgaṁ ca sādhuṣu dayāṁ maitrīṁ praśrayaṁ ca bhūteṣv addhā yathocitam

मन का सर्वत्र से वैराग्य; और आरम्भ में साधु-पुरुषों का संग; तथा प्राणियों के प्रति यथोचित दया, मैत्री और आदर —

श्लोक 24 (bhagavata.11.3.24)

शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः ॥ 3.24 ॥

śaucaṁ tapas titikṣāṁ ca maunaṁ svādhyāyam ārjavam brahmacaryam ahiṁsāṁ ca samatvaṁ dvandva-saṁjñayoḥ

पवित्रता, तप, सहनशीलता, मौन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, और द्वन्द्वों के प्रति समभाव —

श्लोक 25 (bhagavata.11.3.25)

सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम् । विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित् ॥ 3.25 ॥

sarvatrātmeśvarānvīkṣāṁ kaivalyam aniketatām vivikta-cīra-vasanaṁ santoṣaṁ yena kenacit

सर्वत्र आत्मा और ईश्वर का सतत अनुसंधान; एकांतवास; निश्चित निवास का अभाव; जहाँ-तहाँ पड़े वस्त्र-खण्ड धारण करना; और जो कुछ भी मिले उसमें संतोष —

श्लोक 26 (bhagavata.11.3.26)

श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ 3.26 ॥

śraddhāṁ bhāgavate śāstre ’nindām anyatra cāpi hi mano-vāk-karma-daṇḍaṁ ca satyaṁ śama-damāv api

भागवत-शास्त्र में श्रद्धा और अन्य शास्त्रों की निन्दा न करना; मन, वाणी और कर्म का कठोर संयम; सत्य; तथा मन और बाह्य इन्द्रियों का दमन —

श्लोक 27 (bhagavata.11.3.27)

श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः । जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥ 3.27 ॥

śravaṇaṁ kīrtanaṁ dhyānaṁ harer adbhuta-karmaṇaḥ janma-karma-guṇānāṁ ca tad-arthe ’khila-ceṣṭitam

अद्भुत कर्म करने वाले हरि का श्रवण, कीर्तन और ध्यान — उनके जन्मों, कर्मों और गुणों का — तथा समस्त प्रयासों को केवल उन्हीं के लिए समर्पित करना;

श्लोक 28 (bhagavata.11.3.28)

इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम् । दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत्परस्मै निवेदनम् ॥ 3.28 ॥

iṣṭaṁ dattaṁ tapo japtaṁ vṛttaṁ yac cātmanaḥ priyam dārān sutān gṛhān prāṇān yat parasmai nivedanam

जो भी पूजा, दान, तप अथवा जप किया जाए, और जो भी कर्म स्वयं को प्रिय हो — पत्नी, पुत्र, घर, अपने प्राण तक — यह सब परमेश्वर को अर्पित कर देना।

श्लोक 29 (bhagavata.11.3.29)

एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ 3.29 ॥

evaṁ kṛṣṇātma-nātheṣu manuṣyeṣu ca sauhṛdam paricaryāṁ cobhayatra mahatsu nṛṣu sādhuṣu

इस प्रकार, कृष्ण को अपनी आत्मा का स्वामी मानने वाले मनुष्यों के प्रति मैत्री, और दोनों ओर — महापुरुषों तथा साधु मनुष्यों की सेवा।

श्लोक 30 (bhagavata.11.3.30)

परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः । मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः ॥ 3.30 ॥

parasparānukathanaṁ pāvanaṁ bhagavad-yaśaḥ mitho ratir mithas tuṣṭir nivṛttir mitha ātmanaḥ

परस्पर भगवान की पावन कीर्ति का कथन; परस्पर स्नेह; परस्पर संतोष; और इसी से आत्मा के दुःखों की निवृत्ति —

श्लोक 31 (bhagavata.11.3.31)

स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम् । भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम् ॥ 3.31 ॥

smarantaḥ smārayantaś ca mitho ’ghaugha-haraṁ harim bhaktyā sañjātayā bhaktyā bibhraty utpulakāṁ tanum

परस्पर पापों के समूह को हरने वाले हरि का स्मरण और स्मरण कराना — इस प्रकार उत्पन्न भक्ति से भक्ति द्वारा वे रोमांचित शरीर धारण करते हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.11.3.32)

क्वचिद् रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि- द्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः । नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निवृताः ॥ 3.32 ॥

kvacid rudanty acyuta-cintayā kvacid dhasanti nandanti vadanty alaukikāḥ nṛtyanti gāyanty anuśīlayanty ajaṁ bhavanti tūṣṇīṁ param etya nirvṛtāḥ

वे कभी अच्युत के चिन्तन में रोते हैं, कभी हँसते हैं, आनन्दित होते हैं, अलौकिक ढंग से बोलते हैं; वे नाचते हैं, गाते हैं, अजन्मा भगवान का अनुकरण करते हैं; और कभी परमतत्व को प्राप्त कर मौन और शांत हो जाते हैं।

श्लोक 33 (bhagavata.11.3.33)

इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया । नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुस्तराम् ॥ 3.33 ॥

iti bhāgavatān dharmān śikṣan bhaktyā tad-utthayā nārāyaṇa-paro māyām añjas tarati dustarām

इस प्रकार भागवत-धर्मों को उनसे उत्पन्न भक्ति द्वारा सीखते हुए, नारायण-परायण पुरुष उस माया को सुगमता से पार कर जाता है, जो अन्यथा दुस्तर है।

श्लोक 34 (bhagavata.11.3.34)

श्रीराजोवाच नारायणाभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः । निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः ॥ 3.34 ॥

śrī-rājovāca nārāyaṇābhidhānasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ niṣṭhām arhatha no vaktuṁ yūyaṁ hi brahma-vittamāḥ

राजा ने कहा — कृपया हमें उस ब्रह्म, नारायण नाम से प्रसिद्ध परमात्मा की सच्ची स्थिति बताइए; क्योंकि आप सब ब्रह्म के सबसे बड़े ज्ञाता हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.11.3.35)

श्रीपिप्पलायन उवाच स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यत् स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र ॥ 3.35 ॥

śrī-pippalāyana uvāca sthity-udbhava-pralaya-hetur ahetur asya yat svapna-jāgara-suṣuptiṣu sad bahiś ca dehendriyāsu-hṛdayāni caranti yena sañjīvitāni tad avehi paraṁ narendra

श्री पिप्पलायन ने कहा — वे इस जगत् की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय के कारण हैं, फिर भी स्वयं अकारण हैं; स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति में विद्यमान तथा उनसे परे भी, वे ही समस्त प्राणियों के शरीर, इन्द्रियों, प्राण और हृदय को सजीव कर उन्हें गतिशील बनाते हैं। हे राजन्! उन्हें ही परमतत्व जानिए।

श्लोक 36 (bhagavata.11.3.36)

नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथानलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयात्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेधसिद्धिः ॥ 3.36 ॥

naitan mano viśati vāg uta cakṣur ātmā prāṇendriyāṇi ca yathānalam arciṣaḥ svāḥ śabdo ’pi bodhaka-niṣedhatayātma-mūlam arthoktam āha yad-ṛte na niṣedha-siddhiḥ

इसमें न मन प्रवेश कर सकता है, न वाणी, न दृष्टि, न बुद्धि, न प्राण और इन्द्रियाँ — जैसे चिंगारियाँ उस अग्नि में प्रवेश नहीं कर सकतीं जिससे वे उत्पन्न होती हैं। वेद का शब्द भी, यद्यपि निषेध के द्वारा संकेत करने में समर्थ है, उसी आत्मा को अपना मूल मानकर बोलता है; क्योंकि उस परमतत्व के बिना शास्त्र के निषेधों की कोई सिद्धि नहीं हो सकती।

श्लोक 37 (bhagavata.11.3.37)

सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ 3.37 ॥

sattvaṁ rajas tama iti tri-vṛd ekam ādau sūtraṁ mahān aham iti pravadanti jīvam jñāna-kriyārtha-phala-rūpatayoru-śakti brahmaiva bhāti sad asac ca tayoḥ paraṁ yat

सत्त्व, रजस् और तमस् — इस प्रकार आदि में एक से त्रिविध; फिर क्रियाशक्ति, महत्तत्व और अहंकार नामक तत्व, जिसमें जीव आवृत होता है। ज्ञान, क्रिया, उनके विषय और फल के रूपों को धारण करते हुए, अपार शक्तिसम्पन्न ब्रह्म ही स्थूल और सूक्ष्म कारण दोनों रूपों में प्रकट होता है, जबकि स्वयं दोनों से परे रहता है।

श्लोक 38 (bhagavata.11.3.38)

नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ 3.38 ॥

nātmā jajāna na mariṣyati naidhate ’sau na kṣīyate savana-vid vyabhicāriṇāṁ hi sarvatra śaśvad anapāyy upalabdhi-mātraṁ prāṇo yathendriya-balena vikalpitaṁ sat

आत्मा न कभी जन्मी, न कभी मरेगी; न वह बढ़ती है, न घटती है; वह तो अन्य परिवर्तनशील प्राणियों में होने वाली इन अवस्थाओं की साक्षी मात्र है। सर्वत्र, नित्य, अविनाशी, शुद्ध चैतन्य — जैसे शरीर के भीतर का प्राण, जो इन्द्रियों के प्रभाव से विभक्त-सा प्रतीत होता है, यद्यपि वह एक ही है।

श्लोक 39 (bhagavata.11.3.39)

अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषु प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र । सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ 3.39 ॥

aṇḍeṣu peśiṣu taruṣv aviniściteṣu prāṇo hi jīvam upadhāvati tatra tatra sanne yad indriya-gaṇe ’hami ca prasupte kūṭa-stha āśayam ṛte tad-anusmṛtir naḥ

अण्डज, पिण्डज, वृक्ष-योनि और अनिश्चित उत्पत्ति वाले प्राणियों में प्राण ही आत्मा का एक योनि से दूसरी में अनुसरण करता है। जब गाढ़ निद्रा में इन्द्रियाँ और अहंकार लीन हो जाते हैं, तब उस अपरिवर्तनशील साक्षी, उस सूक्ष्म आवरण के कारण ही हमें बाद में सोने का स्मरण होता है।

श्लोक 40 (bhagavata.11.3.40)

यर्ह्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या चेतोमलानि विधमेद् गुणकर्मजानि । तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं साक्षाद् यथामलदृशोः सवितृप्रकाशः ॥ 3.40 ॥

yarhy abja-nābha-caraṇaiṣaṇayoru-bhaktyā ceto-malāni vidhamed guṇa-karma-jāni tasmin viśuddha upalabhyata ātma-tattvaṁ śākṣād yathāmala-dṛśoḥ savitṛ-prakāśaḥ

जब कमलनाभ भगवान के चरणों की ही कामना रखने वाला पुरुष उत्कट भक्ति द्वारा गुण और कर्म से उत्पन्न चित्त की मलिनताओं को धो डालता है, तब उस शुद्ध चित्त में आत्म-तत्व का साक्षात् बोध होता है — जैसे निर्मल नेत्रों से सूर्य का प्रकाश साक्षात् दिखाई देता है।

श्लोक 41 (bhagavata.11.3.41)

श्रीराजोवाच कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः । विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम् ॥ 3.41 ॥

śrī-rājovāca karma-yogaṁ vadata naḥ puruṣo yena saṁskṛtaḥ vidhūyehāśu karmāṇi naiṣkarmyaṁ vindate param

राजा ने कहा — हमें कर्मयोग के विषय में बताइए, जिससे संस्कारित होकर मनुष्य इसी जीवन में शीघ्र ही कर्मों को त्यागकर परम नैष्कर्म्य को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 42 (bhagavata.11.3.42)

एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ 3.42 ॥

evaṁ praśnam ṛṣīn pūrvam apṛcchaṁ pitur antike nābruvan brahmaṇaḥ putrās tatra kāraṇam ucyatām

मैंने पहले भी अपने पिता के समक्ष ऋषियों से यही प्रश्न पूछा था; किन्तु उन ब्रह्मा-पुत्रों ने कोई उत्तर नहीं दिया। कृपया इसका कारण बताइए।

श्लोक 43 (bhagavata.11.3.43)

श्रीआविर्होत्र उवाच कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ 3.43 ॥

śrī-āvirhotra uvāca karmākarma vikarmeti veda-vādo na laukikaḥ vedasya ceśvarātmatvāt tatra muhyanti sūrayaḥ

श्री आविर्होत्र ने कहा — विहित कर्म, अकर्म और निषिद्ध कर्म — ये विषय वेद द्वारा ही जाने जाते हैं, लौकिक तर्क से नहीं; और चूँकि वेद स्वयं ईश्वर का ही स्वरूप है, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान भी इसमें मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.11.3.44)

परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम् । कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा ॥ 3.44 ॥

parokṣa-vādo vedo ’yaṁ bālānām anuśāsanam karma-mokṣāya karmāṇi vidhatte hy agadaṁ yathā

यह वेद अप्रत्यक्ष भाषा में बोलता है, बालकों के लिए उपयुक्त शिक्षा के समान; यह कर्मों से मुक्ति के लिए ही कर्मों का विधान करता है, जैसे औषधि को किसी मीठी वस्तु के बहाने दिया जाता है।

श्लोक 45 (bhagavata.11.3.45)

नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ 3.45 ॥

nācared yas tu vedoktaṁ svayam ajño ’jitendriyaḥ vikarmaṇā hy adharmeṇa mṛtyor mṛtyum upaiti saḥ

जो स्वयं अज्ञानी और अजितेन्द्रिय होकर वेदोक्त कर्म का आचरण नहीं करता, वह उस अधर्मरूप विकर्म के कारण मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता रहता है।

श्लोक 46 (bhagavata.11.3.46)

वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ 3.46 ॥

vedoktam eva kurvāṇo niḥsaṅgo ’rpitam īśvare naiṣkarmyaṁ labhate siddhiṁ rocanārthā phala-śrutiḥ

जो केवल वेदोक्त कर्म को निरासक्त होकर, ईश्वर को अर्पित करके करता है, वह नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त करता है; शास्त्र में फल की जो श्रुति है, वह तो केवल रुचि उत्पन्न कराने के लिए है।

श्लोक 47 (bhagavata.11.3.47)

य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः । विधिनोपचरेद् देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम् ॥ 3.47 ॥

ya āśu hṛdaya-granthiṁ nirjihīrṣuḥ parātmanaḥ vidhinopacared devaṁ tantroktena ca keśavam

जो पुरुष शीघ्र ही परमात्मा से जुड़ी हृदय-ग्रन्थि को काटना चाहता है, उसे वेद तथा तंत्रों में कहे गए विधि-विधान से भगवान केशव की उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 48 (bhagavata.11.3.48)

लब्ध्वानुग्रह आचार्यात् तेन सन्दर्शितागमः । महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याभिमतयात्मनः ॥ 3.48 ॥

labdhvānugraha ācāryāt tena sandarśitāgamaḥ mahā-puruṣam abhyarcen mūrtyābhimatayātmanaḥ

आचार्य की कृपा प्राप्त कर और उनके द्वारा दिखाए गए शास्त्रीय मार्ग को जानकर, शिष्य को अपने हृदय को प्रिय उस विशेष स्वरूप में महापुरुष की उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 49 (bhagavata.11.3.49)

शुचिः सम्मुखमासीनः प्राणसंयमनादिभिः । पिण्डं विशोध्य सन्न्यासकृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम् ॥ 3.49 ॥

śuciḥ sammukham āsīnaḥ prāṇa-saṁyamanādibhiḥ piṇḍaṁ viśodhya sannyāsa- kṛta-rakṣo ’rcayed dharim

पवित्र होकर, प्रतिमा के सम्मुख आसीन होकर, प्राणायाम आदि द्वारा शरीर को शुद्ध करके, तथा अंगों पर तिलक-चिह्न द्वारा रक्षा-कवच धारण कर, हरि की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 50 (bhagavata.11.3.50)

अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः । द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ 3.50 ॥

arcādau hṛdaye cāpi yathā-labdhopacārakaiḥ dravya-kṣity-ātma-liṅgāni niṣpādya prokṣya cāsanam

जो भी पूजा-सामग्री उपलब्ध हो, उससे प्रतिमा में और अपने हृदय में भी, द्रव्य, भूमि, अपने मन और चिह्नों को तैयार करके, तथा अपने आसन को जल से प्रोक्षित करके —

श्लोक 51 (bhagavata.11.3.51)

पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्निधाप्य समाहितः । हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत् ॥ 3.51 ॥

pādyādīn upakalpyātha sannidhāpya samāhitaḥ hṛd-ādibhiḥ kṛta-nyāso mūla-mantreṇa cārcayet

पाद्य आदि तैयार करके तथा एकाग्रचित्त होकर प्रतिमा को प्रतिष्ठित करके, अपने हृदय आदि पर पवित्र अक्षरों का न्यास करके मूल मंत्र से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 52 (bhagavata.11.3.52)

साङ्गोपाङ्गां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः । पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः ॥ 3.52 ॥

sāṅgopāṅgāṁ sa-pārṣadāṁ tāṁ tāṁ mūrtiṁ sva-mantrataḥ pādyārghyācamanīyādyaiḥ snāna-vāso-vibhūṣaṇaiḥ

अपने-अपने मंत्रों से उस विशेष स्वरूप को उसके अंगों, आयुधों और पार्षदों सहित पूजना चाहिए, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि तथा स्नान, वस्त्र और आभूषण अर्पित करते हुए।

श्लोक 53 (bhagavata.11.3.53)

गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः । साङ्गंसम्पूज्य विधिवत् स्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम् ॥ 3.53 ॥

gandha-mālyākṣata-sragbhir dhūpa-dīpopahārakaiḥ sāṅgam sampūjya vidhivat stavaiḥ stutvā named dharim

इस प्रकार गन्ध, माला, अक्षत, पुष्पहार, धूप और दीप से विधिपूर्वक उनके समस्त अंगों सहित पूजा करके, स्तुतियों से हरि की स्तवना करते हुए प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 54 (bhagavata.11.3.54)

आत्मानम् तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः । शेषामाधाय शिरसा स्वधाम्न्युद्वास्य सत्कृतम् ॥ 3.54 ॥

ātmānam tan-mayam dhyāyan mūrtiṁ sampūjayed dhareḥ śeṣām ādhāya śirasā sva-dhāmny udvāsya sat-kṛtam

स्वयं को उन्हीं में तन्मय मानकर ध्यान करते हुए हरि की प्रतिमा की सम्यक् पूजा करनी चाहिए; फिर पूजा के शेष को अपने सिर पर धारण कर, आदरपूर्वक प्रतिमा को उनके स्थान पर पुनः स्थापित कर देना चाहिए।

श्लोक 55 (bhagavata.11.3.55)

एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः । यजतीश्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ 3.55 ॥

evam agny-arka-toyādāv atithau hṛdaye ca yaḥ yajatīśvaram ātmānam acirān mucyate hi saḥ

इस प्रकार जो अग्नि, सूर्य, जल आदि में, घर आए अतिथि में तथा अपने हृदय में परमेश्वर, परमात्मा की उपासना करता है, वह निश्चय ही शीघ्र मुक्त हो जाता है।

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