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एकादश स्कन्ध · अध्याय 6

ब्रह्मा और देवताओं की स्तुति; उद्धव की प्रार्थना

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (bhagavata.11.6.1)

श्रीशुक उवाच अथ ब्रह्मात्मजैः देवैः प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात् । भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृतः ॥ 6.1 ॥

śrī-śuka uvāca atha brahmātma-jaiḥ devaiḥ prajeśair āvṛto ’bhyagāt bhavaś ca bhūta-bhavyeśo yayau bhūta-gaṇair vṛtaḥ

श्री शुक ने कहा — तदनन्तर ब्रह्मा अपने पुत्रों, देवताओं और प्रजापतियों से घिरे हुए द्वारका को चले; और भूत-भव्य के स्वामी शिव भी भूत-गणों से घिरे हुए वहाँ गए।

श्लोक 2 (bhagavata.11.6.2)

इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ । ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवताः ॥ 6.2 ॥

indro marudbhir bhagavān ādityā vasavo ’śvinau ṛbhavo ’ṅgiraso rudrā viśve sādhyāś ca devatāḥ

इन्द्र मरुतों सहित, आदित्यगण, वसुगण, अश्विनीकुमार, ऋभुगण, अंगिरागण, रुद्रगण, तथा विश्वेदेव और साध्य देवता —

श्लोक 3 (bhagavata.11.6.3)

गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धचारणगुह्यकाः । ऋषयः पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नराः ॥ 6.3 ॥

gandharvāpsaraso nāgāḥ siddha-cāraṇa-guhyakāḥ ṛṣayaḥ pitaraś caiva sa-vidyādhara-kinnarāḥ

गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक, ऋषिगण, पितरगण, तथा विद्याधर और किन्नर —

श्लोक 4 (bhagavata.11.6.4)

द्वारकामुपसञ्जग्मुः सर्वे कृष्णदिदृक्षवः । वपुषा येन भगवान् नरलोकमनोरमः । यशो वितेने लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ॥ 6.4 ॥

dvārakām upasañjagmuḥ sarve kṛṣṇa-didṛkṣavaḥ vapuṣā yena bhagavān nara-loka-manoramaḥ yaśo vitene lokeṣu sarva-loka-malāpaham

— ये सब, कृष्ण के दर्शन की कामना से द्वारका में एकत्र हुए, जिनका स्वरूप मनुष्य-लोक को मोहित करने वाला था, और जिन्होंने अपनी कीर्ति, जो सब लोकों के मल को हरने वाली है, सर्वत्र फैला दी थी।

श्लोक 5 (bhagavata.11.6.5)

तस्यां विभ्राजमानायां समृद्धायां महर्द्धिभिः । व्यचक्षतावितृप्ताक्षाः कृष्णमद्भुतदर्शनम् ॥ 6.5 ॥

tasyāṁ vibhrājamānāyāṁ samṛddhāyāṁ maharddhibhiḥ vyacakṣatāvitṛptākṣāḥ kṛṣṇam adbhuta-darśanam

उस दैदीप्यमान, महान ऐश्वर्य से समृद्ध नगरी में, वे अतृप्त नेत्रों से अद्भुत-दर्शन कृष्ण को देखते रहे।

श्लोक 6 (bhagavata.11.6.6)

स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम् । गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम् ॥ 6.6 ॥

svargodyānopagair mālyaiś chādayanto yudūttamam gīrbhiś citra-padārthābhis tuṣṭuvur jagad-īśvaram

स्वर्ग के उद्यानों से लाई गई मालाओं से यदुश्रेष्ठ को ढँकते हुए, उन्होंने अद्भुत अर्थयुक्त वचनों से जगदीश्वर की स्तुति की।

श्लोक 7 (bhagavata.11.6.7)

श्रीदेवा ऊचुः नताः स्म ते नाथ पदारविन्दं बुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभिः । यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तै- र्मुमुक्षुभिः कर्ममयोरुपाशात् ॥ 6.7 ॥

śrī-devā ūcuḥ natāḥ sma te nātha padāravindaṁ buddhīndriya-prāṇa-mano-vacobhiḥ yac cintyate ’ntar hṛdi bhāva-yuktair mumukṣubhiḥ karma-mayoru-pāśāt

देवताओं ने कहा — हे नाथ! हम बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणी से आपके चरण-कमलों को नमन करते हैं — जिन चरणों का, कर्म के महान बंधन से मुक्ति चाहने वाले भावयुक्त साधक हृदय में ध्यान करते हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.11.6.8)

त्वं मायया त्रिगुणयात्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः । नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यत् स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ 6.8 ॥

tvaṁ māyayā tri-guṇayātmani durvibhāvyaṁ vyaktaṁ sṛjasy avasi lumpasi tad-guṇa-sthaḥ naitair bhavān ajita karmabhir ajyate vai yat sve sukhe ’vyavahite ’bhirato ’navadyaḥ

अपनी त्रिगुणमयी माया से आप अपने ही भीतर इस दुर्विभाव्य प्रकट जगत् की रचना, पालन और संहार करते हैं, गुणों में स्थित प्रतीत होते हुए भी; किन्तु हे अजित! आप इन कर्मों से कभी बद्ध नहीं होते, क्योंकि आप, निर्दोष, सदा अपने ही अखंड सुख में लीन रहते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.11.6.9)

शुद्धिर्नृणां न तु तथेड्य दुराशयानां विद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभिः । सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध- सच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात् ॥ 6.9 ॥

śuddhir nṛṇāṁ na tu tatheḍya durāśayānāṁ vidyā-śrutādhyayana-dāna-tapaḥ-kriyābhiḥ sattvātmanām ṛṣabha te yaśasi pravṛddha- sac-chraddhayā śravaṇa-sambhṛtayā yathā syāt

हे पूज्य! दूषित मन वालों की शुद्धि विद्या, वेदाध्ययन, दान, तप अथवा क्रियाओं से उतनी नहीं होती, जितनी हे श्रेष्ठ! शुद्ध-हृदय जनों की आपकी कीर्ति के श्रवण से परिपक्व हुई श्रद्धा द्वारा होती है।

श्लोक 10 (bhagavata.11.6.10)

स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्भि- र्व्यूहेऽर्चितः सवनशः स्वरतिक्रमाय ॥ 6.10 ॥

syān nas tavāṅghrir aśubhāśaya-dhūmaketuḥ kṣemāya yo munibhir ārdra-hṛdohyamānaḥ yaḥ sātvataiḥ sama-vibhūtaya ātmavadbhir vyūhe ’rcitaḥ savanaśaḥ svar-atikramāya

जिन चरणों को द्रवित-हृदय मुनि अपने कल्याण हेतु धारण करते हैं, तथा जिन्हें आत्मसंयमी सात्वत भक्त स्वर्ग से परे आपके तुल्य ऐश्वर्य पाने हेतु दिन के तीनों संध्याकालों में आपके चतुर्व्यूह-रूप में पूजते हैं — वे आपके चरण हमारे लिए भी अशुभ वासनाओं को भस्म करने वाली अग्नि बनें।

श्लोक 11 (bhagavata.11.6.11)

यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा । अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां जिज्ञासुभिः परमभागवतैः परीष्टः ॥ 6.11 ॥

yaś cintyate prayata-pāṇibhir adhvarāgnau trayyā nirukta-vidhineśa havir gṛhītvā adhyātma-yoga uta yogibhir ātma-māyāṁ jijñāsubhiḥ parama-bhāgavataiḥ parīṣṭaḥ

हे ईश! जो लोग यज्ञाग्नि में त्रयी और निरुक्त की विधि से हवि लेकर जोड़े हाथों से ध्यान करते हैं, तथा जो योगीजन अध्यात्म-योग में आपकी माया को जानने की इच्छा से आपका अन्वेषण करते हैं, और जो परम भागवत भक्त आपकी सम्यक् उपासना करते हैं — वे सब आपको ही ध्याते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.11.6.12)

पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पार्धिनी भगवती प्रतिपत्नीवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ 6.12 ॥

paryuṣṭayā tava vibho vana-mālayeyaṁ saṁspārdhinī bhagavatī pratipatnī-vac chrīḥ yaḥ su-praṇītam amuyārhaṇam ādadan no bhūyāt sadāṅghrir aśubhāśaya-dhūmaketuḥ

हे विभो! आपकी इस मुरझाई हुई वनमाला पर स्वयं भगवती श्री एक सौत के समान ईर्ष्या करती हैं; फिर भी आप हमारी इस भलीभाँति की गई भेंट को स्वीकार करते हैं — आपके चरण सदैव हमारी अशुभ वासनाओं को भस्म करने वाली अग्नि बनें रहें।

श्लोक 13 (bhagavata.11.6.13)

केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचम्वोः । स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन् पादः पुनातु भगवन् भजतामघं नः ॥ 6.13 ॥

ketus tri-vikrama-yutas tri-patat-patāko yas te bhayābhaya-karo ’sura-deva-camvoḥ svargāya sādhuṣu khaleṣv itarāya bhūman padaḥ punātu bhagavan bhajatām aghaṁ naḥ

हे भूमन्! जो चरण त्रिविक्रम के रूप में तीनों पगों की ध्वजा बनकर तीनों लोकों में गिरा, जो असुर और देव-सेनाओं के लिए क्रमशः भय और अभय उत्पन्न करने वाला है, तथा सज्जनों को स्वर्ग और दुष्टों को उसके विपरीत देने वाला है — हे भगवन्! वह चरण आपकी उपासना करने वाले हम लोगों के पाप को पवित्र करे।

श्लोक 14 (bhagavata.11.6.14)

नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरर्द्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ 6.14 ॥

nasy ota-gāva iva yasya vaśe bhavanti brahmādayas tanu-bhṛto mithur ardyamānāḥ kālasya te prakṛti-pūruṣayoḥ parasya śaṁ nas tanotu caraṇaḥ puruṣottamasya

जिनके वश में ब्रह्मा आदि देहधारी भी, नथी हुई नाक से बँधे बैलों के समान, परस्पर पीड़ित होते हुए रहते हैं — प्रकृति और पुरुष दोनों से परे उन काल-स्वरूप पुरुषोत्तम का चरण हमारे लिए कल्याण फैलाए।

श्लोक 15 (bhagavata.11.6.15)

अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमाना- मव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ 6.15 ॥

asyāsi hetur udaya-sthiti-saṁyamānām avyakta-jīva-mahatām api kālam āhuḥ so ’yaṁ tri-ṇābhir akhilāpacaye pravṛttaḥ kālo gabhīra-raya uttama-pūruṣas tvam

आप ही अव्यक्त, जीव और महत्तत्व — इन सबकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं; आप ही काल कहलाते हैं — वही काल, जिसका त्रिनाभि चक्र समस्त वस्तुओं के क्षय में प्रवृत्त है, जिसकी गति अगम्य है, वही आप परम पुरुष हैं।

श्लोक 16 (bhagavata.11.6.16)

त्वत्तः पुमान् समधिगम्य ययास्य वीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ 6.16 ॥

tvattaḥ pumān samadhigamya yayāsya vīryaṁ dhatte mahāntam iva garbham amogha-vīryaḥ so ’yaṁ tayānugata ātmana āṇḍa-kośaṁ haimaṁ sasarja bahir āvaraṇair upetam

आपसे ही पुरुष उस शक्ति को प्राप्त कर, जिससे अपनी माया में मानो महत्तत्व रूपी गर्भ को धारण करते हैं, अमोघ-वीर्य होकर; और वह महत्तत्व, प्रकृति के साथ मिलकर, अपने से बाहरी आवरणों से युक्त स्वर्णिम ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करता है।

श्लोक 17 (bhagavata.11.6.17)

तत्तस्थूषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म ॥ 6.17 ॥

tat tasthūṣaś ca jagataś ca bhavān adhīśo yan māyayottha-guṇa-vikriyayopanītān arthāñ juṣann api hṛṣīka-pate na lipto ye ’nye svataḥ parihṛtād api bibhyati sma

इस प्रकार आप स्थावर और जंगम — दोनों के परम अधीश्वर हैं; हे हृषीकेश! प्रकृति के गुणों के विकार से उत्पन्न विषयों का सेवन करते हुए भी आप कभी लिप्त नहीं होते — जबकि अन्य लोग स्वयं त्यागी हुई वस्तु से भी भयभीत रहते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.6.18)

स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि- भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः । पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणै- र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्यः ॥ 6.18 ॥

smāyāvaloka-lava-darśita-bhāva-hāri- bhrū-maṇḍala-prahita-saurata-mantra-śauṇḍaiḥ patnyas tu ṣoḍaśa-sahasram anaṅga-bāṇair yasyendriyaṁ vimathituṁ karaṇair na vibhvyaḥ

यहाँ तक कि आपकी सोलह सहस्र पत्नियाँ भी, मुस्कान भरी चितवन से मनोहर भाव प्रकट करते हुए, भौंहों के इशारे से साहसिक प्रणय-संदेश भेजते हुए, कामदेव के बाणों और समस्त उपायों के होते हुए भी, आपकी इन्द्रियों को विचलित करने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.11.6.19)

विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति ॥ 6.19 ॥

vibhvyas tavāmṛta-kathoda-vahās tri-lokyāḥ pādāvane-ja-saritaḥ śamalāni hantum ānuśravaṁ śrutibhir aṅghri-jam aṅga-saṅgais tīrtha-dvayaṁ śuci-ṣadas ta upaspṛśanti

आपकी अमृतमयी कथाओं की नदियाँ तथा आपके चरण-प्रक्षालन से उत्पन्न नदियाँ — दोनों त्रिलोकी के मल को नष्ट करने में समर्थ हैं; पवित्रता चाहने वाले जन एक को कानों से श्रवण द्वारा, दूसरे को शरीर के स्पर्श द्वारा — इन दोनों तीर्थों का सेवन करते हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.11.6.20)

श्रीबादरायणिरुवाच इत्यभिष्टूय विबुधैः सेशः शतधृतिर्हरिम् । अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रितः ॥ 6.20 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca ity abhiṣṭūya vibudhaiḥ seśaḥ śata-dhṛtir harim abhyabhāṣata govindaṁ praṇamyāmbaram āśritaḥ

श्री शुक ने कहा — इस प्रकार देवताओं सहित हरि की स्तुति करके, शिव सहित ब्रह्मा ने आकाश में स्थित होकर गोविन्द को प्रणाम करते हुए उनसे कहा।

श्लोक 21 (bhagavata.11.6.21)

श्रीब्रह्मोवाच भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो । त्वमस्माभिरशेषात्मन्तत्तथैवोपपादितम् ॥ 6.21 ॥

śrī-brahmovāca bhūmer bhārāvatārāya purā vijñāpitaḥ prabho tvam asmābhir aśeṣātman tat tathaivopapāditam

श्री ब्रह्मा ने कहा — हे प्रभो! पहले हमने आपसे पृथ्वी का भार उतारने की प्रार्थना की थी; हे अशेषात्मा! वह हमारी प्रार्थना ठीक वैसे ही पूर्ण हुई है।

श्लोक 22 (bhagavata.11.6.22)

धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसन्धेषु वै त्वया । कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा ॥ 6.22 ॥

dharmaś ca sthāpitaḥ satsu satya-sandheṣu vai tvayā kīrtiś ca dikṣu vikṣiptā sarva-loka-malāpahā

आपने सत्यनिष्ठ सज्जनों में धर्म की स्थापना की है; और अपनी उस कीर्ति को समस्त दिशाओं में फैलाया है, जो सब लोकों के मल को हरने वाली है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.6.23)

अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रूपमनुत्तमम् । कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः ॥ 6.23 ॥

avatīrya yador vaṁśe bibhrad rūpam anuttamam karmāṇy uddāma-vṛttāni hitāya jagato ’kṛthāḥ

यदुवंश में अवतरित होकर, अनुपम स्वरूप धारण करते हुए, आपने संसार के हित के लिए उदार और विशाल कर्म किए हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.11.6.24)

यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ । शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः ॥ 6.24 ॥

yāni te caritānīśa manuṣyāḥ sādhavaḥ kalau śṛṇvantaḥ kīrtayantaś ca tariṣyanty añjasā tamaḥ

हे ईश! कलियुग में जो साधुजन आपके इन चरितों को सुनेंगे और गाएंगे, वे सुगमता से इस युग के अंधकार को पार कर जाएंगे।

श्लोक 25 (bhagavata.11.6.25)

यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम । शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ 6.25 ॥

yadu-vaṁśe ’vatīrṇasya bhavataḥ puruṣottama śarac-chataṁ vyatīyāya pañca-viṁśādhikaṁ prabho

हे पुरुषोत्तम! हे प्रभो! यदुवंश में आपके अवतरण के पश्चात् एक सौ पच्चीस शरद ऋतुएँ बीत चुकी हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.11.6.26)

नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम् । कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम् ॥ 6.26 ॥

nādhunā te ’khilādhāra deva-kāryāvaśeṣitam kulaṁ ca vipra-śāpena naṣṭa-prāyam abhūd idam

हे अखिलाधार! अब देवताओं के हित में आपके लिए कोई कार्य शेष नहीं है; और यह आपका कुल ब्राह्मणों के शाप से लगभग नष्ट हो चुका है।

श्लोक 27 (bhagavata.11.6.27)

ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे । सलोकाँल्लोकपालान् नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् ॥ 6.27 ॥

tataḥ sva-dhāma paramaṁ viśasva yadi manyase sa-lokāl loka-pālān naḥ pāhi vaikuṇṭha-kiṅkarān

यदि आपकी ऐसी इच्छा हो, तो अब अपने परमधाम में प्रवेश कीजिए; और हे वैकुण्ठ! अपने सेवकों — हम लोकपालों को उनके लोकों सहित — रक्षा करते रहिए।

श्लोक 28 (bhagavata.11.6.28)

श्रीभगवानुवाच अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर । कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ 6.28 ॥

śrī-bhagavān uvāca avadhāritam etan me yad āttha vibudheśvara kṛtaṁ vaḥ kāryam akhilaṁ bhūmer bhāro ’vatāritaḥ

भगवान ने कहा — हे देवेश्वर! आपने जो कहा, मैंने उसे समझ लिया है। तुम्हारा समस्त कार्य पूर्ण हो गया है; पृथ्वी का भार उतर चुका है।

श्लोक 29 (bhagavata.11.6.29)

तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् । लोकं जिघृक्षद् रुद्धं मे वेलयेव महार्णवः ॥ 6.29 ॥

tad idaṁ yādava-kulaṁ vīrya-śaurya-śriyoddhatam lokaṁ jighṛkṣad ruddhaṁ me velayeva mahārṇavaḥ

यह यादव-कुल, बल, पराक्रम और वैभव से उन्मत्त होकर संसार को निगलने पर उतारू था, इसे मैंने वैसे ही रोक रखा है, जैसे तट महासागर को रोकता है।

श्लोक 30 (bhagavata.11.6.30)

यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् । गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ॥ 6.30 ॥

yady asaṁhṛtya dṛptānāṁ yadūnāṁ vipulaṁ kulam gantāsmy anena loko ’yam udvelena vinaṅkṣyati

यदि मैं इस विशाल, उन्मत्त यदुकुल को समेटे बिना ही चला जाऊँ, तो यह संसार इसके उमड़ने से वैसे ही नष्ट हो जाएगा, जैसे तटबंध टूटने पर बाढ़ से होता है।

श्लोक 31 (bhagavata.11.6.31)

इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः । यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ॥ 6.31 ॥

idānīṁ nāśa ārabdhaḥ kulasya dvija-śāpa-jaḥ yāsyāmi bhavanaṁ brahmann etad-ante tavānagha

हे अनघ ब्रह्मन्! अभी इस कुल का, ब्राह्मणों के शाप से उत्पन्न विनाश आरंभ हो चुका है; इसके पूर्ण होने पर मैं आपके धाम को जाऊँगा।

श्लोक 32 (bhagavata.11.6.32)

श्रीशुक उवाच इत्युक्तो लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम् । सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत ॥ 6.32 ॥

śrī-śuka uvāca ity ukto loka-nāthena svayam-bhūḥ praṇipatya tam saha deva-gaṇair devaḥ sva-dhāma samapadyata

श्री शुक ने कहा — लोकनाथ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, स्वयंभू ब्रह्मा ने उन्हें प्रणाम किया, और देवगणों सहित वे अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 33 (bhagavata.11.6.33)

अथ तस्यां महोत्पातान् द्वारवत्यां समुत्थितान् । विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान् समागतान् ॥ 6.33 ॥

atha tasyāṁ mahotpātān dvāravatyāṁ samutthitān vilokya bhagavān āha yadu-vṛddhān samāgatān

तत्पश्चात् उस द्वारका नगरी में उत्पन्न हुए महान उत्पातों को देखकर भगवान ने एकत्रित यादव-वृद्धों से कहा।

श्लोक 34 (bhagavata.11.6.34)

श्रीभगवानुवाच एते वै सुमहोत्पाता व्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः । शापश्च नः कुलस्यासीद् ब्राह्मणेभ्यो दुरत्ययः ॥ 6.34 ॥

śrī-bhagavān uvāca ete vai su-mahotpātā vyuttiṣṭhantīha sarvataḥ śāpaś ca naḥ kulasyāsīd brāhmaṇebhyo duratyayaḥ

भगवान ने कहा — ये अत्यंत भीषण उत्पात चारों ओर से उठ रहे हैं; और हमारे कुल पर ब्राह्मणों का वह शाप है, जिसे टाला नहीं जा सकता।

श्लोक 35 (bhagavata.11.6.35)

न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः । प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव मा चिरम् ॥ 6.35 ॥

na vastavyam ihāsmābhir jijīviṣubhir āryakāḥ prabhāsaṁ su-mahat-puṇyaṁ yāsyāmo ’dyaiva mā ciram

हे आर्यजनो! यदि हम जीवित रहना चाहते हैं, तो हमें यहाँ नहीं रहना चाहिए; आज ही, बिना विलंब किए, परम पवित्र प्रभास चलें।

श्लोक 36 (bhagavata.11.6.36)

यत्र स्नात्वा दक्षशापाद् गृहीतो यक्ष्मणोडुराट् । विमुक्तः किल्बिषात् सद्यो भेजे भूयः कलोदयम् ॥ 6.36 ॥

yatra snātvā dakṣa-śāpād gṛhīto yakṣmaṇodu-rāṭ vimuktaḥ kilbiṣāt sadyo bheje bhūyaḥ kalodayam

वहाँ स्नान करके, दक्ष के शाप से क्षय रोग से ग्रस्त हुए नक्षत्रराज (चन्द्रमा) तत्काल ही पाप से मुक्त होकर पुनः अपनी कलाओं की वृद्धि को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 37 (bhagavata.11.6.37)

वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितृन् सुरान् । भोजयित्वोषिजो विप्रान् नानागुणवतान्धसा ॥ 6.37 ॥

vayaṁ ca tasminn āplutya tarpayitvā pitṝn surān bhojayitvoṣijo viprān nānā-guṇavatāndhasā

हम भी वहाँ स्नान करके, पितरों और देवताओं को तर्पण द्वारा तृप्त करके, पूज्य ब्राह्मणों को विविध स्वादिष्ट अन्न से भोजन कराकर —

श्लोक 38 (bhagavata.11.6.38)

तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै । वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ॥ 6.38 ॥

teṣu dānāni pātreṣu śraddhayoptvā mahānti vai vṛjināni tariṣyāmo dānair naubhir ivārṇavam

और श्रद्धापूर्वक उन योग्य पात्रों में दान बोकर, हम इन महान संकटों को दान रूपी नौकाओं से, समुद्र के समान, पार कर लेंगे।

श्लोक 39 (bhagavata.11.6.39)

श्रीशुक उवाच एवं भगवतादिष्टा यादवाः कुरुनन्दन । गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान् समयूयुजन् ॥ 6.39 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ bhagavatādiṣṭā yādavāḥ kuru-nandana gantuṁ kṛta-dhiyas tīrthaṁ syandanān samayūyujan

श्री शुक ने कहा — हे कुरुनन्दन! इस प्रकार भगवान द्वारा आदेशित यादवगण उस तीर्थ को जाने का निश्चय करके अपने रथों में घोड़े जोतने लगे।

श्लोक 40 (bhagavata.11.6.40)

तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम् । दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ॥ 6.40 ॥

tan nirīkṣyoddhavo rājan śrutvā bhagavatoditam dṛṣṭvāriṣṭāni ghorāṇi nityaṁ kṛṣṇam anuvrataḥ

हे राजन्! यह देखकर, भगवान के कहे हुए वचन को सुनकर, और उन भीषण अपशकुनों को देखकर, कृष्ण के नित्य अनुयायी उद्धव ने —

श्लोक 41 (bhagavata.11.6.41)

विविक्त उपसङ्गम्य जगतामीश्वरेश्वरम् । प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत ॥ 6.41 ॥

vivikta upasaṅgamya jagatām īśvareśvaram praṇamya śirasā pādau prāñjalis tam abhāṣata

एकांत में उन जगत्-ईश्वरों के ईश्वर के समीप जाकर, सिर से उनके चरणों में प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उनसे कहा।

श्लोक 42 (bhagavata.11.6.42)

श्रीउद्धव उवाच देवदेवेश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन । संहृत्यैतत् कुलं नूनं लोकं सन्त्यक्ष्यते भवान् । विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वरः ॥ 6.42 ॥

śrī-uddhava uvāca deva-deveśa yogeśa puṇya-śravaṇa-kīrtana saṁhṛtyaitat kulaṁ nūnaṁ lokaṁ santyakṣyate bhavān vipra-śāpaṁ samartho ’pi pratyahan na yad īśvaraḥ

श्री उद्धव ने कहा — हे देवदेवेश! हे योगेश्वर! हे पुण्य-श्रवण-कीर्तन! क्या यह सत्य नहीं कि इस कुल को समेटकर आप अब इस लोक को सर्वथा त्यागने वाले हैं? क्योंकि आप सर्वसमर्थ ईश्वर होते हुए भी ब्राह्मणों के शाप को नहीं टाला।

श्लोक 43 (bhagavata.11.6.43)

नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव । त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि ॥ 6.43 ॥

nāhaṁ tavāṅghri-kamalaṁ kṣaṇārdham api keśava tyaktuṁ samutsahe nātha sva-dhāma naya mām api

हे केशव! मैं आपके चरण-कमलों को आधे क्षण के लिए भी त्यागने का साहस नहीं कर सकता; हे नाथ! मुझे भी अपने धाम को ले चलिए।

श्लोक 44 (bhagavata.11.6.44)

तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममङ्गलम् । कर्णपीयूषमासाद्य त्यजन्त्यन्यस्पृहां जनाः ॥ 6.44 ॥

tava vikrīḍitaṁ kṛṣṇa nṛṇāṁ parama-maṅgalam karṇa-pīyūṣam āsādya tyajanty anya-spṛhāṁ janāḥ

हे कृष्ण! आपकी लीलाएँ मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी हैं; उन्हें कानों के लिए अमृत के समान पाकर लोग अन्य समस्त कामनाओं को त्याग देते हैं।

श्लोक 45 (bhagavata.11.6.45)

शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु । कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि ॥ 6.45 ॥

śayyāsanāṭana-sthāna- snāna-krīḍāśanādiṣu kathaṁ tvāṁ priyam ātmānaṁ vayaṁ bhaktās tyajema hi

शयन, आसन, भ्रमण, स्थान, स्नान, क्रीड़ा, भोजन आदि में हम भक्तजन अपने ही आत्मा के समान प्रिय आपको भला कैसे त्याग सकते हैं?

श्लोक 46 (bhagavata.11.6.46)

त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः । उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि ॥ 6.46 ॥

tvayopabhukta-srag-gandha- vāso-’laṅkāra-carcitāḥ ucchiṣṭa-bhojino dāsās tava māyāṁ jayema hi

आपके द्वारा पहले भोगी गई माला, गन्ध, वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित होकर, आपके उच्छिष्ट का भोजन करने वाले हम सेवक निश्चय ही आपकी माया को जीत लेंगे।

श्लोक 47 (bhagavata.11.6.47)

वातवसना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः । ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः सन्न्यासीनोऽमलाः ॥ 6.47 ॥

vāta-vasanā ya ṛṣayaḥ śramaṇā ūrdhra-manthinaḥ brahmākhyaṁ dhāma te yānti śāntāḥ sannyāsino ’malāḥ

वे दिगम्बर ऋषि, तपस्वी, ऊर्ध्वरेता, शांत, संन्यासी और निर्मल — वे ही ब्रह्म नामक धाम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 48 (bhagavata.11.6.48)

वयं त्विह महायोगिन् भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु । त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ 6.48 ॥

vayaṁ tv iha mahā-yogin bhramantaḥ karma-vartmasu tvad-vārtayā tariṣyāmas tāvakair dustaraṁ tamaḥ

किन्तु हे महायोगिन्! हम इस संसार में कर्म-मार्गों पर भटकते हुए, आपके भक्तों के मध्य आपकी कथा द्वारा, अन्यथा दुस्तर उस अंधकार को पार कर लेंगे।

श्लोक 49 (bhagavata.11.6.49)

स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च । गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ 6.49 ॥

smarantaḥ kīrtayantas te kṛtāni gaditāni ca gaty-utsmitekṣaṇa-kṣveli yan nṛ-loka-viḍambanam

आपके कर्मों और वचनों का, आपकी गति, मुस्कान-भरी चितवन और क्रीड़ाओं का — जो मनुष्य-लोक का अनुकरण-सा प्रतीत होती हैं — स्मरण और कीर्तन करते हुए।

श्लोक 50 (bhagavata.11.6.50)

श्रीशुक उवाच एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः । एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ॥ 6.50 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ vijñāpito rājan bhagavān devakī-sutaḥ ekāntinaṁ priyaṁ bhṛtyam uddhavaṁ samabhāṣata

श्री शुक ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, देवकी-पुत्र भगवान ने अपने अनन्य प्रिय सेवक उद्धव से विस्तारपूर्वक कहा।

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