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एकादश स्कन्ध · अध्याय 9

अवधूत ब्राह्मण के शेष गुरु

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.11.9.1)

श्रीब्राह्मण उवाच परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत्प्रियतमं नृणाम् । अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिञ्चनः ॥ 9.1 ॥

śrī-brāhmaṇa uvāca parigraho hi duḥkhāya yad yat priyatamaṁ nṛṇām anantaṁ sukham āpnoti tad vidvān yas tv akiñcanaḥ

उस साधु ब्राह्मण ने कहा — मनुष्यों को जो वस्तु सबसे अधिक प्रिय होती है, उसी में आसक्ति के कारण अंततः दुःख उत्पन्न होता है। जो यह जानकर पदार्थों के प्रति ममत्व और आसक्ति त्याग देता है, वह असीम सुख को प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (bhagavata.11.9.2)

सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनोऽन्ये निरामिषाः । तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥ 9.2 ॥

sāmiṣaṁ kuraraṁ jaghnur balino ’nye nirāmiṣāḥ tadāmiṣaṁ parityajya sa sukhaṁ samavindata

मांस का एक टुकड़ा लिए हुए कुरर पक्षी पर अन्य बलवान किन्तु निराहार बाजों ने आक्रमण किया। जैसे ही उसने वह मांस त्याग दिया, उसे वास्तविक सुख की प्राप्ति हुई।

श्लोक 3 (bhagavata.11.9.3)

न मे मानापमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम् । आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥ 9.3 ॥

na me mānāpamānau sto na cintā geha-putriṇām ātma-krīḍa ātma-ratir vicarāmīha bāla-vat

मुझे न मान की चिंता है, न अपमान की, न ही घर और संतान से जुड़ी वे चिंताएँ जो गृहस्थों को घेरे रहती हैं। आत्मा में ही क्रीड़ा करता और आत्मा में ही रमण करता हुआ, मैं इस संसार में एक निश्छल बालक के समान विचरण करता हूँ।

श्लोक 4 (bhagavata.11.9.4)

द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ । यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥ 9.4 ॥

dvāv eva cintayā muktau paramānanda āplutau yo vimugdho jaḍo bālo yo guṇebhyaḥ paraṁ gataḥ

केवल दो प्रकार के मनुष्य ही चिंता से मुक्त होकर परम आनंद में निमग्न रहते हैं — एक तो निर्दोष और भोला-भाला बालक, और दूसरा वह जो प्रकृति के गुणों से परे जा चुका है।

श्लोक 5 (bhagavata.11.9.5)

क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान् । स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ 9.5 ॥

kvacit kumārī tv ātmānaṁ vṛṇānān gṛham āgatān svayaṁ tān arhayām āsa kvāpi yāteṣu bandhuṣu

एक बार, जब उसके परिजन कहीं बाहर गए हुए थे, कुछ लोग एक कुँवारी कन्या के घर उसे वरण करने की इच्छा से आए। अकेली होने के कारण उसने स्वयं ही उनका यथोचित सत्कार किया।

श्लोक 6 (bhagavata.11.9.6)

तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव । अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शङ्खाः स्वनं महत् ॥ 9.6 ॥

teṣām abhyavahārārthaṁ śālīn rahasi pārthiva avaghnantyāḥ prakoṣṭha-sthāś cakruḥ śaṅkhāḥ svanaṁ mahat

हे राजन्! उन अतिथियों के भोजन हेतु वह एकांत स्थान में जाकर धान कूटने लगी। जैसे ही उसने धान कूटा, उसकी कलाइयों में पहनी शंख की चूड़ियाँ आपस में टकराकर तेज़ ध्वनि करने लगीं।

श्लोक 7 (bhagavata.11.9.7)

सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता ततः । बभञ्जैकैकशः शङ्खान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत् ॥ 9.7 ॥

sā taj jugupsitaṁ matvā mahatī vrīḍitā tataḥ babhañjaikaikaśaḥ śaṅkhān dvau dvau pāṇyor aśeṣayat

उस ध्वनि को अशोभनीय मानकर वह अत्यंत लज्जित हुई। अतः उसने एक-एक कर चूड़ियाँ तोड़ डालीं, यहाँ तक कि प्रत्येक कलाई पर केवल दो-दो ही शेष रह गईं।

श्लोक 8 (bhagavata.11.9.8)

उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्वशङ्खयोः । तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्नाभवद् ध्वनिः ॥ 9.8 ॥

ubhayor apy abhūd ghoṣo hy avaghnantyāḥ sva-śaṅkhayoḥ tatrāpy ekaṁ nirabhidad ekasmān nābhavad dhvaniḥ

दो-दो चूड़ियाँ रहने पर भी धान कूटते समय वे आपस में टकराकर ध्वनि करती रहीं। अतः उसने प्रत्येक कलाई से एक और चूड़ी तोड़ दी, और जब प्रत्येक कलाई पर केवल एक ही चूड़ी शेष रही, तब कोई ध्वनि नहीं हुई।

श्लोक 9 (bhagavata.11.9.9)

अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम । लोकाननुचरन्नेतान् लोकतत्त्वविवित्सया ॥ 9.9 ॥

anvaśikṣam imaṁ tasyā upadeśam arindama lokān anucarann etān loka-tattva-vivitsayā

हे शत्रुदमन! इन लोकों में विचरण करते हुए, संसार के यथार्थ स्वरूप को जानने की इच्छा से, मैंने स्वयं यह देखा और उस कन्या से यह शिक्षा ग्रहण की।

श्लोक 10 (bhagavata.11.9.10)

वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । एक एव वसेत्तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ 9.10 ॥

vāse bahūnāṁ kalaho bhaved vārtā dvayor api eka eva vaset tasmāt kumāryā iva kaṅkaṇaḥ

जहाँ बहुत से लोग साथ रहते हैं, वहाँ कलह उत्पन्न होता है; और दो के रहने पर भी व्यर्थ की बातचीत और तनाव बना रहता है। अतः उस कन्या की चूड़ी के दृष्टान्त के अनुसार मनुष्य को अकेला ही रहना चाहिए।

श्लोक 11 (bhagavata.11.9.11)

मन एकत्र संयुञ्ज्याज्जितश्वासो जितासनः । वैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥ 9.11 ॥

mana ekatra saṁyuñjyāj jita-śvāso jitāsanaḥ vairāgyābhyāsa-yogena dhriyamāṇam atandritaḥ

श्वास और आसन पर विजय प्राप्त कर, मनुष्य को अनथक भाव से मन को एक ही लक्ष्य पर एकाग्र करना चाहिए, तथा वैराग्य एवं योगाभ्यास द्वारा उसे स्थिर रखना चाहिए।

श्लोक 12 (bhagavata.11.9.12)

यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ 9.12 ॥

yasmin mano labdha-padaṁ yad etac chanaiḥ śanair muñcati karma-reṇūn sattvena vṛddhena rajas tamaś ca vidhūya nirvāṇam upaity anindhanam

जब मन उस परम तत्व में स्थिर पद प्राप्त कर लेता है, तब वह धीरे-धीरे कर्म की धूल को त्यागने लगता है। सत्व गुण के बढ़ने से रज और तम को दूर करके, वह बिना ईंधन की अग्नि के समान शांत हो जाता है।

श्लोक 13 (bhagavata.11.9.13)

तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ 9.13 ॥

tadaivam ātmany avaruddha-citto na veda kiñcid bahir antaraṁ vā yatheṣu-kāro nṛpatiṁ vrajantam iṣau gatātmā na dadarśa pārśve

इस प्रकार मन के आत्मा में पूर्णतः लीन हो जाने पर मनुष्य को न बाहर की और न भीतर की किसी वस्तु का बोध रहता है — जैसे बाणकार अपने मन को बाण में पूर्णतः लगाकर पास से गुजरते राजा को भी नहीं देख पाया।

श्लोक 14 (bhagavata.11.9.14)

एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः । अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽल्पभाषणः ॥ 9.14 ॥

eka-cāry aniketaḥ syād apramatto guhāśayaḥ alakṣyamāṇa ācārair munir eko ’lpa-bhāṣaṇaḥ

मुनि को अकेला विचरण करना चाहिए, किसी स्थायी निवास से रहित होकर, सदा सजग और अंतर्मुखी रहते हुए, अपने आचरण को दूसरों की दृष्टि से छिपाकर, एकाकी रहकर और अल्प वचन बोलना चाहिए।

श्लोक 15 (bhagavata.11.9.15)

गृहारम्भो हि दुःखाय विफलश्चाध्रुवात्मनः । सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ 9.15 ॥

gṛhārambho hi duḥkhāya viphalaś cādhruvātmanaḥ sarpaḥ para-kṛtaṁ veśma praviśya sukham edhate

जिसका अस्तित्व ही अनित्य है, उसके लिए घर बनाना दुःख का कारण बनता है और निष्फल सिद्ध होता है। सर्प इसके विपरीत, दूसरे के बनाए हुए बिल में प्रवेश कर सुखपूर्वक रहता है।

श्लोक 16 (bhagavata.11.9.16)

एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया । संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः । एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ॥ 9.16 ॥

eko nārāyaṇo devaḥ pūrva-sṛṣṭaṁ sva-māyayā saṁhṛtya kāla-kalayā kalpānta idam īśvaraḥ eka evādvitīyo ’bhūd ātmādhāro ’khilāśrayaḥ

भगवान नारायण, जिन्होंने अपनी माया से पूर्व में इस सृष्टि की रचना की थी, कल्प के अंत में काल की कला द्वारा इसका संहार कर देते हैं। तब वे एक और अद्वितीय रूप में विद्यमान रहते हैं, स्वयं ही अपने आधार और समस्त सृष्टि के आश्रय।

श्लोक 17 (bhagavata.11.9.17)

कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु । सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ॥ 9.17 ॥

kālenātmānubhāvena sāmyaṁ nītāsu śaktiṣu sattvādiṣv ādi-puruṣaḥ pradhāna-puruṣeśvaraḥ

जब भगवान अपनी काल-रूपी शक्ति द्वारा सत्व आदि प्रकृति की शक्तियों को साम्यावस्था में ले आते हैं, तब वे आदि पुरुष प्रधान और जीवात्माओं के परम ईश्वर के रूप में विद्यमान रहते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.11.9.18)

परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः । केवलानुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिकः ॥ 9.18 ॥

parāvarāṇāṁ parama āste kaivalya-saṁjñitaḥ kevalānubhavānanda- sandoho nirupādhikaḥ

वे परम और अपर दोनों के परे स्थित परम तत्व हैं, जिन्हें 'कैवल्य' के नाम से जाना जाता है। समस्त उपाधियों से रहित, वे केवल आत्मानुभव के आनंद की समग्रता स्वरूप हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.11.9.19)

केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम् । सङ्क्षोभयन् सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम ॥ 9.19 ॥

kevalātmānubhāvena sva-māyāṁ tri-guṇātmikām saṅkṣobhayan sṛjaty ādau tayā sūtram arindama

हे शत्रुदमन! सृष्टि के आरंभ में भगवान अपनी ही शक्ति से त्रिगुणात्मिका माया को क्षुब्ध करते हैं, और उसके द्वारा सूत्र नामक सूक्ष्म तत्व की रचना करते हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.11.9.20)

तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम् । यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान् ॥ 9.20 ॥

tām āhus tri-guṇa-vyaktiṁ sṛjantīṁ viśvato-mukham yasmin protam idaṁ viśvaṁ yena saṁsarate pumān

विद्वज्जन उसे त्रिगुणों की अभिव्यक्ति कहते हैं, जो चारों ओर से इस विश्व की रचना करती है; उसी में यह सम्पूर्ण जगत बुना हुआ है, और उसी के द्वारा जीव संसार-चक्र में भ्रमण करता है।

श्लोक 21 (bhagavata.11.9.21)

यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रतः । तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥ 9.21 ॥

yathorṇanābhir hṛdayād ūrṇāṁ santatya vaktrataḥ tayā vihṛtya bhūyas tāṁ grasaty evaṁ maheśvaraḥ

जिस प्रकार मकड़ी अपने ही भीतर से मुख द्वारा तंतु निकालकर उससे क्रीड़ा करती है और फिर उसे स्वयं में समेट लेती है, उसी प्रकार महेश्वर इस सृष्टि को अपने से प्रकट करते हैं और अंततः पुनः अपने में समेट लेते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.11.9.22)

यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया । स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्स्वरूपताम् ॥ 9.22 ॥

yatra yatra mano dehī dhārayet sakalaṁ dhiyā snehād dveṣād bhayād vāpi yāti tat-tat-svarūpatām

देहधारी जीव जिस-जिस वस्तु पर स्नेह, द्वेष अथवा भय से अपना मन एकाग्रचित्त होकर लगाता है, वह उसी-उसी के स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 23 (bhagavata.11.9.23)

कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः । याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसन्त्यजन् ॥ 9.23 ॥

kīṭaḥ peśaskṛtaṁ dhyāyan kuḍyāṁ tena praveśitaḥ yāti tat-sātmatāṁ rājan pūrva-rūpam asantyajan

हे राजन्! भ्रमरकीट द्वारा अपने बिल में बंद कर दिया गया कीड़ा भय के कारण निरंतर उसी का ध्यान करता रहता है, और अपने पूर्व शरीर को त्यागे बिना ही उसी के स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 24 (bhagavata.11.9.24)

एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः । स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो ॥ 9.24 ॥

evaṁ gurubhya etebhya eṣā me śikṣitā matiḥ svātmopaśikṣitāṁ buddhiṁ śṛṇu me vadataḥ prabho

हे प्रभो! इस प्रकार इन गुरुओं से मैंने यह बुद्धि प्राप्त की है। अब मुझसे वह ज्ञान भी सुनिए जो मैंने स्वयं अपने ही शरीर से सीखा है।

श्लोक 25 (bhagavata.11.9.25)

देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम् । तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ 9.25 ॥

deho gurur mama virakti-viveka-hetur bibhrat sma sattva-nidhanaṁ satatārty-udarkam tattvāny anena vimṛśāmi yathā tathāpi pārakyam ity avasito vicarāmy asaṅgaḥ

यह शरीर भी मेरा गुरु है, क्योंकि यह मुझे वैराग्य और विवेक सिखाता है — अपने भीतर विनाश का बीज लिए हुए, यह अंततः सदैव दुःख में परिणत होता है। यद्यपि मैं इसी के द्वारा तत्वों का चिंतन करता हूँ, तथापि यह जानते हुए कि यह अंततः पराया हो जाएगा, मैं निस्संग होकर विचरण करता हूँ।

श्लोक 26 (bhagavata.11.9.26)

जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मः ॥ 9.26 ॥

jāyātmajārtha-paśu-bhṛtya-gṛhāpta-vargān puṣṇāti yat-priya-cikīrṣayā vitanvan svānte sa-kṛcchram avaruddha-dhanaḥ sa dehaḥ sṛṣṭvāsya bījam avasīdati vṛkṣa-dharmaḥ

शरीर को प्रसन्न करने की इच्छा से मनुष्य पत्नी, संतान, धन, पशु, सेवक, घर और स्वजनों का पालन-पोषण करता है। अत्यंत परिश्रम से धन संचित करने के बाद, यह शरीर — मरने से पूर्व बीज उत्पन्न करने वाले वृक्ष के समान — भावी शरीर का बीज (कर्म) छोड़कर स्वयं नष्ट हो जाता है।

श्लोक 27 (bhagavata.11.9.27)

जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति- र्बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ 9.27 ॥

jihvaikato ’mum apakarṣati karhi tarṣā śiśno ’nyatas tvag udaraṁ śravaṇaṁ kutaścit ghrāṇo ’nyataś capala-dṛk kva ca karma-śaktir bahvyaḥ sapatnya iva geha-patiṁ lunanti

जिह्वा उसे एक ओर खींचती है, तो कभी तृष्णा दूसरी ओर; जननेन्द्रिय कहीं और खींचती है, तो त्वचा, उदर और कान अपनी-अपनी दिशा में; घ्राण कहीं और, चंचल नेत्र कहीं और, तथा कर्मेन्द्रियाँ कहीं और — मानो अनेक सौतें एक ही गृहपति को नोच-नोच कर बाँट रही हों।

श्लोक 28 (bhagavata.11.9.28)

सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदन्दशूकान् । तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ॥ 9.28 ॥

sṛṣṭvā purāṇi vividhāny ajayātma-śaktyā vṛkṣān sarīsṛpa-paśūn khaga-dandaśūkān tais tair atuṣṭa-hṛdayaḥ puruṣaṁ vidhāya brahmāvaloka-dhiṣaṇaṁ mudam āpa devaḥ

अपनी अजन्मा शक्ति से वृक्ष, सरीसृप, पशु, पक्षी और सर्प आदि अनेक प्रकार के शरीरों की रचना करने पर भी भगवान का हृदय संतुष्ट नहीं हुआ। तत्पश्चात् मनुष्य शरीर की रचना करके, जो ब्रह्म-दर्शन में समर्थ बुद्धि से युक्त है, वे प्रसन्न हुए।

श्लोक 29 (bhagavata.11.9.29)

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव- न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ 9.29 ॥

labdhvā su-durlabham idaṁ bahu-sambhavānte mānuṣyam artha-dam anityam apīha dhīraḥ tūrṇaṁ yateta na pated anu-mṛtyu yāvan niḥśreyasāya viṣayaḥ khalu sarvataḥ syāt

अनेक जन्मों के पश्चात् प्राप्त होने वाले इस अत्यंत दुर्लभ मनुष्य-जन्म को पाकर, जो नश्वर होते हुए भी परम अर्थ को प्रदान करने वाला है, बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि मृत्यु के आने से पूर्व ही शीघ्रतापूर्वक परम कल्याण के लिए प्रयत्न करे, क्योंकि विषय-भोग तो सर्वत्र सुलभ है, किन्तु यह परम कल्याण नहीं।

श्लोक 30 (bhagavata.11.9.30)

एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि । विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहङ्कृतः ॥ 9.30 ॥

evaṁ sañjāta-vairāgyo vijñānāloka ātmani vicarāmi mahīm etāṁ mukta-saṅgo ’nahaṅkṛtaḥ

इस प्रकार वैराग्य और आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश से युक्त होकर, मैं आसक्ति और अहंकार से रहित होकर इस पृथ्वी पर विचरण करता हूँ।

श्लोक 31 (bhagavata.11.9.31)

न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् । ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ 9.31 ॥

na hy ekasmād guror jñānaṁ su-sthiraṁ syāt su-puṣkalam brahmaitad advitīyaṁ vai gīyate bahudharṣibhiḥ

केवल एक ही गुरु से प्राप्त ज्ञान न तो सुदृढ़ होता है और न ही सम्पूर्ण, क्योंकि यह एक अद्वितीय ब्रह्म अनेक ऋषियों द्वारा विभिन्न रूपों में गाया गया है।

श्लोक 32 (bhagavata.11.9.32)

श्रीभगवानुवाच इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः । वन्दितः स्वर्चितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥ 9.32 ॥

śrī-bhagavān uvāca ity uktvā sa yaduṁ vipras tam āmantrya gabhīra-dhīḥ vanditaḥ sv-arcito rājñā yayau prīto yathāgatam

भगवान ने कहा — राजा यदु से इस प्रकार कहकर, गंभीर बुद्धि वाले उस ब्राह्मण ने उनसे विदा ली। राजा द्वारा वंदित और सम्यक् पूजित होकर, वे प्रसन्न मन से उसी प्रकार चले गए जैसे आए थे।

श्लोक 33 (bhagavata.11.9.33)

अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः । सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह ॥ 9.33 ॥

avadhūta-vacaḥ śrutvā pūrveṣāṁ naḥ sa pūrva-jaḥ sarva-saṅga-vinirmuktaḥ sama-citto babhūva ha

उस अवधूत के वचन सुनकर, हमारे पूर्वजों के भी पूर्वज राजा यदु समस्त आसक्तियों से मुक्त हो गए, और उनका चित्त पूर्णतः सम रह गया।

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