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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10

भगवान शिव और उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि की महिमा

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (bhagavata.12.10.1)

सूत उवाच स एवमनुभूयेदं नारायणविनिर्मितम् । वैभवं योगमायायास्तमेव शरणं ययौ ॥ १ ॥

sūta uvāca sa evam anubhūyedaṁ nārāyaṇa-vinirmitam vaibhavaṁ yoga-māyāyās tam eva śaraṇaṁ yayau

सूत जी ने कहा — भगवान नारायण द्वारा रचित योगमाया के इस ऐश्वर्य का अनुभव कर, मार्कण्डेय उन्हीं की शरण में चले गए।

श्लोक 2 (bhagavata.12.10.2)

श्रीमार्कण्डेय उवाच प्रपन्नोऽस्म्यङ्घ्रिमूलं ते प्रपन्नाभयदं हरे । यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया ॥ २ ॥

śrī-mārkaṇḍeya uvāca prapanno ’smy aṅghri-mūlaṁ te prapannābhaya-daṁ hare yan-māyayāpi vibudhā muhyanti jñāna-kāśayā

श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे हरे! मैं आपके उन चरणों की शरण लेता हूँ, जो शरणागत को अभय प्रदान करते हैं — जिनकी माया से विद्वान देवता भी ज्ञान के आभास में मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.12.10.3)

सूत उवाच तमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन् । रुद्राण्या भगवान् रुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः ॥ ३ ॥

sūta uvāca tam evaṁ nibhṛtātmānaṁ vṛṣeṇa divi paryaṭan rudrāṇyā bhagavān rudro dadarśa sva-gaṇair vṛtaḥ

सूत जी ने कहा — अपने वृषभ पर आकाश में विचरण करते हुए, रुद्राणी सहित तथा अपने गणों से घिरे भगवान रुद्र ने उस निश्चल-चित्त मार्कण्डेय को देखा।

श्लोक 4 (bhagavata.12.10.4)

अथोमा तमृषिं वीक्ष्य गिरिशं समभाषत । पश्येमं भगवन् विप्रं निभृतात्मेन्द्रियाशयम् ॥ ४ ॥

athomā tam ṛṣiṁ vīkṣya giriśaṁ samabhāṣata paśyemaṁ bhagavan vipraṁ nibhṛtātmendriyāśayam

तब उमा ने उस ऋषि को देखकर गिरीश से कहा — हे भगवन्! इस विप्र को देखिए, जिसकी आत्मा, इन्द्रियाँ तथा मन पूर्णतः निश्चल हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.12.10.5)

निभृतोदझषव्रातो वातापाये यथार्णवः । कुर्वस्य तपसः साक्षात् संसिद्धिं सिद्धिदो भवान् ॥ ५ ॥

nibhṛtoda-jhaṣa-vrāto vātāpāye yathārṇavaḥ kurv asya tapasaḥ sākṣāt saṁsiddhiṁ siddhi-do bhavān

वह उस समुद्र के समान शान्त है जिसका जल और मत्स्य वायु के थम जाने पर निश्चल हो जाते हैं। हे सिद्धिदाता! आप इसकी तपस्या का साक्षात् फल प्रदान करें।

श्लोक 6 (bhagavata.12.10.6)

श्रीभगवानुवाच नैवेच्छत्याशिषः क्वापि ब्रह्मर्षिर्मोक्षमप्युत । भक्तिं परां भगवति लब्धवान् पुरुषेऽव्यये ॥ ६ ॥

śrī-bhagavān uvāca naivecchaty āśiṣaḥ kvāpi brahmarṣir mokṣam apy uta bhaktiṁ parāṁ bhagavati labdhavān puruṣe ’vyaye

भगवान ने कहा — यह ब्रह्मर्षि किसी भी प्रकार का वर नहीं चाहता, यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं, क्योंकि इसने अव्यय पुरुष भगवान के प्रति परम भक्ति प्राप्त कर ली है।

श्लोक 7 (bhagavata.12.10.7)

अथापि संवदिष्यामो भवान्येतेन साधुना । अयं हि परमो लाभो नृणां साधुसमागमः ॥ ७ ॥

athāpi saṁvadiṣyāmo bhavāny etena sādhunā ayaṁ hi paramo lābho nṛṇāṁ sādhu-samāgamaḥ

फिर भी, हे भवानी! इस साधु से हम बातचीत करें — क्योंकि मनुष्यों के लिए साधु-संगति ही परम लाभ है।

श्लोक 8 (bhagavata.12.10.8)

सूत उवाच इत्युक्त्वा तमुपेयाय भगवान् स सतां गतिः । ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वदेहिनाम् ॥ ८ ॥

sūta uvāca ity uktvā tam upeyāya bhagavān sa satāṁ gatiḥ īśānaḥ sarva-vidyānām īśvaraḥ sarva-dehinām

सूत जी ने कहा — यह कहकर, साधुओं के आश्रय, समस्त विद्याओं के स्वामी, सब देहधारियों के ईश्वर वे भगवान उसके पास पहुँचे।

श्लोक 9 (bhagavata.12.10.9)

तयोरागमनं साक्षादीशयोर्जगदात्मनोः । न वेद रुद्धधीवृत्तिरात्मानं विश्वमेव च ॥ ९ ॥

tayor āgamanaṁ sākṣād īśayor jagad-ātmanoḥ na veda ruddha-dhī-vṛttir ātmānaṁ viśvam eva ca

किन्तु उसकी बुद्धि-वृत्ति इतनी स्तब्ध थी कि जगत के उन दोनों साक्षात् ईश्वरों के आगमन को जानते हुए भी वह न तो स्वयं को जान सका, न ही जगत को।

श्लोक 10 (bhagavata.12.10.10)

भगवांस्तदभिज्ञाय गिरिशो योगमायया । आविशत्तद्गुहाकाशं वायुश्छिद्रमिवेश्वरः ॥ १० ॥

bhagavāṁs tad abhijñāya giriśo yoga-māyayā āviśat tad-guhākāśaṁ vāyuś chidram iveśvaraḥ

यह जानकर भगवान गिरीश अपनी योगमाया से उसके हृदय-गुहा में प्रविष्ट हो गए, जैसे वायु सहज ही किसी छिद्र में प्रवेश कर जाती है।

श्लोक 11 (bhagavata.12.10.11)

आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिङ्गजटाधरम् । त्र्यक्षं दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम् ॥ ११ ॥

ātmany api śivaṁ prāptaṁ taḍit-piṅga-jaṭā-dharam try-akṣaṁ daśa-bhujaṁ prāṁśum udyantam iva bhāskaram

अपने ही भीतर मार्कण्डेय ने अब शिव को देखा — बिजली-सी पीली जटाओं वाले, त्रिनेत्र, दशभुज, ऊँचे कद वाले, उदित सूर्य के समान तेजस्वी।

श्लोक 12 (bhagavata.12.10.12)

व्याघ्रचर्माम्बरं शूलधनुरिष्वसिचर्मभिः । अक्षमालाडमरुककपालं परशुं सह ॥ १२ ॥

vyāghra-carmāmbaraṁ śūla- dhanur-iṣv-asi-carmabhiḥ akṣa-mālā-ḍamaruka- kapālaṁ paraśuṁ saha

व्याघ्रचर्म धारण किए, त्रिशूल, धनुष, बाण, तलवार तथा ढाल के साथ रुद्राक्ष माला, डमरू, कपाल तथा परशु धारण किए हुए —

श्लोक 13 (bhagavata.12.10.13)

बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः । किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः ॥ १३ ॥

bibhrāṇaṁ sahasā bhātaṁ vicakṣya hṛdi vismitaḥ kim idaṁ kuta eveti samādher virato muniḥ

— इस प्रकार हृदय में अचानक प्रकट हुई इस दीप्ति को देखकर, विस्मित होकर वह मुनि समाधि से बाहर आया, यह सोचते हुए कि 'यह क्या है, और यह कहाँ से आया?'

श्लोक 14 (bhagavata.12.10.14)

नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयागतम् । रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं ननाम शिरसा मुनिः ॥ १४ ॥

netre unmīlya dadṛśe sa-gaṇaṁ somayāgatam rudraṁ tri-lokaika-guruṁ nanāma śirasā muniḥ

नेत्र खोलकर उसने उमा तथा अपने गणों सहित आए हुए, त्रिलोक के एकमात्र गुरु रुद्र को देखा; और उस मुनि ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 15 (bhagavata.12.10.15)

तस्मै सपर्यां व्यदधात् सगणाय सहोमया । स्वागतासनपाद्यार्घ्यगन्धस्रग्धूपदीपकैः ॥ १५ ॥

tasmai saparyāṁ vyadadhāt sa-gaṇāya sahomayā svāgatāsana-pādyārghya- gandha-srag-dhūpa-dīpakaiḥ

उसने उन्हें, उमा को तथा उनके गणों को स्वागत-वचन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, चन्दन, माला, धूप तथा दीप से पूजा।

श्लोक 16 (bhagavata.12.10.16)

आह त्वात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो । करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत् ॥ १६ ॥

āha tv ātmānubhāvena pūrṇa-kāmasya te vibho karavāma kim īśāna yenedaṁ nirvṛtaṁ jagat

उसने कहा — हे विभो! आपके लिए मैं क्या कर सकता हूँ, जो अपने ही अनुभव से पूर्णकाम हैं, हे ईशान! जिनकी कृपा से यह सम्पूर्ण जगत निर्वृत रहता है?

श्लोक 17 (bhagavata.12.10.17)

नमः शिवाय शान्ताय सत्त्वाय प्रमृडाय च । रजोजुषेऽथ घोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे ॥ १७ ॥

namaḥ śivāya śāntāya sattvāya pramṛḍāya ca rajo-juṣe ’tha ghorāya namas tubhyaṁ tamo-juṣe

शान्त, सत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी शिव को नमस्कार; रजोगुण-युक्त घोर रूप को भी नमस्कार, और तमोगुण-युक्त रूप को भी आपको नमस्कार है।

श्लोक 18 (bhagavata.12.10.18)

सूत उवाच एवं स्तुतः स भगवानादिदेवः सतां गतिः । परितुष्टः प्रसन्नात्मा प्रहसंस्तमभाषत ॥ १८ ॥

sūta uvāca evaṁ stutaḥ sa bhagavān ādi-devaḥ satāṁ gatiḥ parituṣṭaḥ prasannātmā prahasaṁs tam abhāṣata

सूत जी ने कहा — इस प्रकार स्तुति किए जाने पर वे आदिदेव, साधुओं के आश्रय भगवान, अत्यन्त सन्तुष्ट और प्रसन्नचित्त होकर मुस्कुराते हुए उससे बोले।

श्लोक 19 (bhagavata.12.10.19)

श्रीभगवानुवाच वरं वृणीष्व नः कामं वरदेशा वयं त्रयः । अमोघं दर्शनं येषां मर्त्यो यद् विन्दतेऽमृतम् ॥ १९ ॥

śrī-bhagavān uvāca varaṁ vṛṇīṣva naḥ kāmaṁ vara-deśā vayaṁ trayaḥ amoghaṁ darśanaṁ yeṣāṁ martyo yad vindate ’mṛtam

भगवान ने कहा — हमसे इच्छानुसार वर माँगो, क्योंकि हम तीनों वरदाता हैं, जिनका दर्शन कभी निष्फल नहीं जाता — जिन्हें देखकर मरणधर्मा मनुष्य भी अमृत को प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (bhagavata.12.10.20)

ब्राह्मणाः साधवः शान्ता निःसङ्गा भूतवत्सलाः । एकान्तभक्ता अस्मासु निर्वैराः समदर्शिनः ॥ २० ॥

brāhmaṇāḥ sādhavaḥ śāntā niḥsaṅgā bhūta-vatsalāḥ ekānta-bhaktā asmāsu nirvairāḥ sama-darśinaḥ

जो ब्राह्मण साधु, शान्त, निःसंग, समस्त प्राणियों के प्रति वत्सल, हम में एकान्त-भक्ति रखने वाले, वैररहित तथा समदर्शी होते हैं —

श्लोक 21 (bhagavata.12.10.21)

सलोका लोकपालास्तान् वन्दन्त्यर्चन्त्युपासते । अहं च भगवान् ब्रह्मा स्वयं च हरिरीश्वरः ॥ २१ ॥

sa-lokā loka-pālās tān vandanty arcanty upāsate ahaṁ ca bhagavān brahmā svayaṁ ca harir īśvaraḥ

— उनकी वन्दना, पूजा तथा सेवा समस्त लोकों के निवासी तथा लोकपाल करते हैं, और स्वयं मैं, भगवान ब्रह्मा, तथा साक्षात् भगवान हरि भी करते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.12.10.22)

न ते मय्यच्युतेऽजे च भिदामण्वपि चक्षते । नात्मनश्च जनस्यापि तद् युष्मान् वयमीमहि ॥ २२ ॥

na te mayy acyute ’je ca bhidām aṇv api cakṣate nātmanaś ca janasyāpi tad yuṣmān vayam īmahi

ऐसे भक्त मुझमें, अच्युत विष्णु में तथा अज ब्रह्मा में तनिक भी भेद नहीं देखते; और न ही अपनी आत्मा तथा अन्य जनों में भेद देखते हैं। इसीलिए हम आपका सम्मान करते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.12.10.23)

न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्चेतनोज्झिताः । ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रतः ॥ २३ ॥

na hy am-mayāni tīrthāni na devāś cetanojjhitāḥ te punanty uru-kālena yūyaṁ darśana-mātrataḥ

जलमय तीर्थ वस्तुतः तीर्थ नहीं हैं, न ही चेतनाहीन प्रतिमाएँ देवता हैं; वे दीर्घकाल में पवित्र करती हैं, जबकि आप जैसे साधु मात्र दर्शन से ही पवित्र कर देते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.12.10.24)

ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामो येऽस्मद्रूपं त्रयीमयम् । बिभ्रत्यात्मसमाधानतपःस्वाध्यायसंयमैः ॥ २४ ॥

brāhmaṇebhyo namasyāmo ye ’smad-rūpaṁ trayī-mayam bibhraty ātma-samādhāna- tapaḥ-svādhyāya-saṁyamaiḥ

हम उन ब्राह्मणों को नमस्कार करते हैं, जो आत्म-समाधान, तप, स्वाध्याय तथा संयम द्वारा त्रयीमय हमारे ही स्वरूप को धारण करते हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.12.10.25)

श्रवणाद् दर्शनाद् वापि महापातकिनोऽपि वः । शुध्येरन्नन्त्यजाश्चापि किमु सम्भाषणादिभिः ॥ २५ ॥

śravaṇād darśanād vāpi mahā-pātakino ’pi vaḥ śudhyerann antya-jāś cāpi kim u sambhāṣaṇādibhiḥ

आप जैसे साधुओं के केवल श्रवण अथवा दर्शन मात्र से महापातकी तथा अन्त्यज भी पवित्र हो जाते हैं — फिर आपसे सम्भाषण करने से तो कहना ही क्या!

श्लोक 26 (bhagavata.12.10.26)

सूत उवाच इति चन्द्रललामस्य धर्मगुह्योपबृंहितम् । वचोऽमृतायनमृषिर्नातृप्यत् कर्णयोः पिबन् ॥ २६ ॥

sūta uvāca iti candra-lalāmasya dharma-gahyopabṛṁhitam vaco ’mṛtāyanam ṛṣir nātṛpyat karṇayoḥ piban

सूत जी ने कहा — इस प्रकार चन्द्रशेखर भगवान के धर्म-रहस्य से परिपूर्ण अमृतमय वचनों को कानों से पीते हुए भी वह ऋषि तृप्त न हुआ।

श्लोक 27 (bhagavata.12.10.27)

स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामितः कर्शितो भृशम् । शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुञ्जस्तमब्रवीत् ॥ २७ ॥

sa ciraṁ māyayā viṣṇor bhrāmitaḥ karśito bhṛśam śiva-vāg-amṛta-dhvasta- kleśa-puñjas tam abravīt

विष्णु की माया से दीर्घकाल तक भ्रमित और अत्यन्त क्षीण हुआ वह, शिव के अमृत-वचनों से समस्त संचित क्लेश नष्ट होने पर, उनसे यह बोला।

श्लोक 28 (bhagavata.12.10.28)

श्रीमार्कण्डेय उवाच अहो ईश्वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम् । यन्नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्वराः ॥ २८ ॥

śrī-mārkaṇḍeya uvāca aho īśvara-līleyaṁ durvibhāvyā śarīriṇām yan namantīśitavyāni stuvanti jagad-īśvarāḥ

श्री मार्कण्डेय ने कहा — अहो! ईश्वर की यह लीला देहधारियों के लिए कितनी अगम्य है, कि जगत के ईश्वर स्वयं अपने शासितों के आगे नतमस्तक होकर उनकी स्तुति करते हैं!

श्लोक 29 (bhagavata.12.10.29)

धर्मं ग्राहयितुं प्रायः प्रवक्तारश्च देहिनाम् । आचरन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च ॥ २९ ॥

dharmaṁ grāhayituṁ prāyaḥ pravaktāraś ca dehinām ācaranty anumodante kriyamāṇaṁ stuvanti ca

प्रायः देहधारियों को धर्म ग्रहण कराने के लिए ही धर्मोपदेशक स्वयं उसका आचरण करते हैं, आचरण किए जाने पर उसका अनुमोदन करते हैं, तथा उसकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.12.10.30)

नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभिः । न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिनः कुहकं यथा ॥ ३० ॥

naitāvatā bhagavataḥ sva-māyā-maya-vṛttibhiḥ na duṣyetānubhāvas tair māyinaḥ kuhakaṁ yathā

इस प्रकार अपनी मायामयी वृत्तियों से भगवान का प्रभाव तनिक भी दूषित नहीं होता — जैसे किसी जादूगर की शक्ति उसके किए गए इन्द्रजाल से क्षीण नहीं होती।

श्लोक 31 (bhagavata.12.10.31)

सृष्ट्वेदं मनसा विश्वमात्मनानुप्रविश्य यः । गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा ॥ ३१ ॥

sṛṣṭvedaṁ manasā viśvam ātmanānupraviśya yaḥ guṇaiḥ kurvadbhir ābhāti karteva svapna-dṛg yathā

जिन्होंने मन-मात्र से इस विश्व की सृष्टि कर, स्वयं आत्मारूप में उसमें प्रवेश किया, और गुणों के कार्य द्वारा मानो कर्ता प्रतीत होते हैं, जैसे स्वप्नद्रष्टा अपने स्वप्न में —

श्लोक 32 (bhagavata.12.10.32)

तस्मै नमो भगवते त्रिगुणाय गुणात्मने । केवलायाद्वितीयाय गुरवे ब्रह्ममूर्तये ॥ ३२ ॥

tasmai namo bhagavate tri-guṇāya guṇātmane kevalāyādvitīyāya gurave brahma-mūrtaye

— उन भगवान को, जो त्रिगुणों को धारण करते हुए भी गुणों के आत्मा हैं, जो केवल और अद्वितीय हैं, जो गुरु हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं — उन्हें मेरा नमस्कार है।

श्लोक 33 (bhagavata.12.10.33)

कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात् । यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत् ॥ ३३ ॥

kaṁ vṛṇe nu paraṁ bhūman varaṁ tvad vara-darśanāt yad-darśanāt pūrṇa-kāmaḥ satya-kāmaḥ pumān bhavet

हे भूमन्! आपके इस वरदान-स्वरूप दर्शन से बढ़कर मैं और कौन-सा वर माँगूँ, जिस दर्शन से मनुष्य पूर्णकाम तथा सत्यकाम हो जाता है?

श्लोक 34 (bhagavata.12.10.34)

वरमेकं वृणेऽथापि पूर्णात् कामाभिवर्षणात् । भगवत्यच्युतां भक्तिं तत्परेषु तथा त्वयि ॥ ३४ ॥

varam ekaṁ vṛṇe ’thāpi pūrṇāt kāmābhivarṣaṇāt bhagavaty acyutāṁ bhaktiṁ tat-pareṣu tathā tvayi

फिर भी, समस्त कामनाओं को पूर्णतः वर्षा देने वाले आपसे मैं एक ही वर माँगता हूँ — भगवान में, उनके परायण भक्तों में, तथा आप में अच्युत भक्ति।

श्लोक 35 (bhagavata.12.10.35)

सूत उवाच इत्यर्चितोऽभिष्टुतश्च मुनिना सूक्तया गिरा । तमाह भगवाञ्छर्वः शर्वया चाभिनन्दितः ॥ ३५ ॥

sūta uvāca ity arcito ’bhiṣṭutaś ca muninā sūktayā girā tam āha bhagavāñ charvaḥ śarvayā cābhinanditaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस मुनि द्वारा सुभाषित वाणी से पूजित और स्तुत होकर, तथा शर्वाणी से भी अभिनन्दित होकर, भगवान शर्व उससे बोले।

श्लोक 36 (bhagavata.12.10.36)

कामो महर्षे सर्वोऽयं भक्तिमांस्त्वमधोक्षजे । आकल्पान्ताद् यशः पुण्यमजरामरता तथा ॥ ३६ ॥

kāmo maharṣe sarvo ’yaṁ bhaktimāṁs tvam adhokṣaje ā-kalpāntād yaśaḥ puṇyam ajarāmaratā tathā

हे महर्षे! आप इन्द्रियातीत भगवान के भक्त हैं, अतः आपकी ये सब कामनाएँ पूर्ण होंगी — कल्पान्त तक यश, पुण्य, तथा अजरा-अमरता।

श्लोक 37 (bhagavata.12.10.37)

ज्ञानं त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत् । ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु ते ॥ ३७ ॥

jñānaṁ trai-kālikaṁ brahman vijñānaṁ ca viraktimat brahma-varcasvino bhūyāt purāṇācāryatāstu te

हे ब्रह्मन्! आपको त्रैकालिक ज्ञान, तथा वैराग्ययुक्त विज्ञान प्राप्त हो; आप ब्रह्मतेज से दीप्तिमान हों, और पुराणों के आचार्यत्व को प्राप्त करें।

श्लोक 38 (bhagavata.12.10.38)

सूत उवाच एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात् त्र्यक्ष ईश्वरः । देव्यै तत्कर्म कथयन्ननुभूतं पुरामुना ॥ ३८ ॥

sūta uvāca evaṁ varān sa munaye dattvāgāt try-akṣa īśvaraḥ devyai tat-karma kathayann anubhūtaṁ purāmunā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस मुनि को वर देकर त्रिनेत्र भगवान चल दिए, और देवी को उस मुनि के पूर्वानुभूत कर्मों की कथा सुनाते रहे।

श्लोक 39 (bhagavata.12.10.39)

सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तमः । विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गतः ॥ ३९ ॥

so ’py avāpta-mahā-yoga- mahimā bhārgavottamaḥ vicaraty adhunāpy addhā harāv ekāntatāṁ gataḥ

वह भार्गवश्रेष्ठ, महायोग की महिमा को प्राप्त कर, आज भी इस संसार में विचरण करता है, पूर्णतः भगवान हरि की एकान्त भक्ति में लीन।

श्लोक 40 (bhagavata.12.10.40)

अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्य धीमतः । अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम् ॥ ४० ॥

anuvarṇitam etat te mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ anubhūtaṁ bhagavato māyā-vaibhavam adbhutam

इस प्रकार मैंने आपको बुद्धिमान मार्कण्डेय के इस अद्भुत अनुभव का वर्णन किया, जो भगवान की माया के आश्चर्यजनक ऐश्वर्य से सम्बन्धित था।

श्लोक 41 (bhagavata.12.10.41)

एतत् केचिदविद्वांसो मायासंसृतिरात्मनः । अनाद्यावर्तितं नृणां कादाचित्कं प्रचक्षते ॥ ४१ ॥

etat kecid avidvāṁso māyā-saṁsṛtir ātmanaḥ anādy-āvartitaṁ nṝṇāṁ kādācitkaṁ pracakṣate

कुछ अज्ञानी जन इसे मात्र आत्मा की उस अनादि, बार-बार आवर्तित होने वाली मायाजनित संसृति कहते हैं, जिसे वे मनुष्यों के लिए एक साधारण, कदाचित् घटित होने वाली घटना मानते हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.12.10.42)

य एवमेतद् भृगुवर्य वर्णितं रथाङ्गपाणेरनुभावभावितम् । संश्रावयेत् संशृणुयादु तावुभौ तयोर्न कर्माशयसंसृतिर्भवेत् ॥ ४२ ॥

ya evam etad bhṛgu-varya varṇitaṁ rathāṅga-pāṇer anubhāva-bhāvitam saṁśrāvayet saṁśṛṇuyād u tāv ubhau tayor na karmāśaya-saṁsṛtir bhavet

हे भृगुश्रेष्ठ! जो कोई इस चक्रधारी भगवान की महिमा से युक्त इस वर्णन को दूसरों को सुनाता है, अथवा स्वयं सुनता है, उन दोनों को ही कर्माशय-जनित संसार-बन्धन कभी प्राप्त नहीं होता।

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