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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9

मार्कण्डेय ऋषि द्वारा भगवान की मायाशक्ति का दर्शन

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.12.9.1)

सूत उवाच संस्तुतो भगवानित्थं मार्कण्डेयेन धीमता । नारायणो नरसखः प्रीत आह भृगूद्वहम् ॥ १ ॥

sūta uvāca saṁstuto bhagavān itthaṁ mārkaṇḍeyena dhīmatā nārāyaṇo nara-sakhaḥ prīta āha bhṛgūdvaham

सूत जी ने कहा — इस प्रकार बुद्धिमान मार्कण्डेय द्वारा स्तुति किए जाने पर, नर के सखा भगवान नारायण प्रसन्न होकर उस भृगुवंशी श्रेष्ठ से बोले।

श्लोक 2 (bhagavata.12.9.2)

श्रीभगवानुवाच भो भो ब्रह्मर्षिवर्योऽसि सिद्ध आत्मसमाधिना । मयि भक्त्यानपायिन्या तपःस्वाध्यायसंयमैः ॥ २ ॥

śrī-bhagavān uvāca bho bho brahmarṣi-varyo ’si siddha ātma-samādhinā mayi bhaktyānapāyinyā tapaḥ-svādhyāya-saṁyamaiḥ

भगवान ने कहा — हे ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ! तुमने आत्मसमाधि से, मुझमें अविचल भक्ति से, तथा तप, स्वाध्याय एवं संयम से सिद्धि प्राप्त कर ली है।

श्लोक 3 (bhagavata.12.9.3)

वयं ते परितुष्टाः स्म त्वद् बृहद्व्रतचर्यया । वरं प्रतीच्छ भद्रं ते वरदोऽस्मि त्वदीप्सितम् ॥ ३ ॥

vayaṁ te parituṣṭāḥ sma tvad-bṛhad-vrata-caryayā varaṁ pratīccha bhadraṁ te vara-do ’smi tvad-īpsitam

तुम्हारे बृहद्व्रत के पालन से हम अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो — मैं तुम्हारी इच्छित वस्तु प्रदान करने को तत्पर हूँ।

श्लोक 4 (bhagavata.12.9.4)

श्रीऋषिरुवाच जितं ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराच्युत । वरेणैतावतालं नो यद् भवान् समदृश्यत ॥ ४ ॥

śrī-ṛṣir uvāca jitaṁ te deva-deveśa prapannārti-harācyuta vareṇaitāvatālaṁ no yad bhavān samadṛśyata

ऋषि ने कहा — हे देवदेवेश! हे शरणागत के दुःख हरने वाले अच्युत! आपकी जय हो। इतना ही वर हमारे लिए पर्याप्त है कि आपने हमें दर्शन दिया।

श्लोक 5 (bhagavata.12.9.5)

गृहीत्वाजादयो यस्य श्रीमत्पादाब्जदर्शनम् । मनसा योगपक्वेन स भवान् मेऽक्षिगोचरः ॥ ५ ॥

gṛhītvājādayo yasya śrīmat-pādābja-darśanam manasā yoga-pakvena sa bhavān me ’kṣi-gocaraḥ

जिनके श्रीचरण-कमलों का दर्शन ब्रह्मा आदि भी योग-परिपक्व मन से ही प्राप्त करते हैं, वही आप मेरे नेत्रों के समक्ष प्रत्यक्ष हो गए हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.12.9.6)

अथाप्यम्बुजपत्राक्ष पुण्यश्लोकशिखामणे । द्रक्ष्ये मायां यया लोकः सपालो वेद सद्भिदाम् ॥ ६ ॥

athāpy ambuja-patrākṣa puṇya-śloka-śikhāmaṇe drakṣye māyāṁ yayā lokaḥ sa-pālo veda sad-bhidām

फिर भी, हे कमलनयन! हे पुण्यश्लोकों में शिरोमणि! मैं आपकी उस माया को देखना चाहता हूँ, जिसके प्रभाव से लोकपालों सहित सम्पूर्ण जगत सत्य को भेद-रूप में जानता है।

श्लोक 7 (bhagavata.12.9.7)

सूत उवाच इतीडितोऽर्चितः काममृषिणा भगवान् मुने । तथेति स स्मयन् प्रागाद् बदर्याश्रममीश्वरः ॥ ७ ॥

sūta uvāca itīḍito ’rcitaḥ kāmam ṛṣiṇā bhagavān mune tatheti sa smayan prāgād badary-āśramam īśvaraḥ

सूत जी ने कहा — हे मुने! इस प्रकार ऋषि द्वारा भलीभाँति स्तुति और पूजा किए जाने पर भगवान मुस्कुराते हुए 'तथास्तु' कहकर बदरिकाश्रम की ओर चले गए।

श्लोक 8 (bhagavata.12.9.8)

तमेव चिन्तयन्नर्थमृषिः स्वाश्रम एव सः । वसन्नग्न्यर्कसोमाम्बुभूवायुवियदात्मसु ॥ ८ ॥

tam eva cintayann artham ṛṣiḥ svāśrama eva saḥ vasann agny-arka-somāmbu- bhū-vāyu-viyad-ātmasu

वह ऋषि अपने ही आश्रम में रहते हुए उसी इच्छा का चिन्तन करता रहा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश तथा अपनी आत्मा में भगवान का ध्यान करते हुए।

श्लोक 9 (bhagavata.12.9.9)

ध्यायन् सर्वत्र च हरिं भावद्रव्यैरपूजयत् । क्वचित् पूजां विसस्मार प्रेमप्रसरसम्प्लुतः ॥ ९ ॥

dhyāyan sarvatra ca hariṁ bhāva-dravyair apūjayat kvacit pūjāṁ visasmāra prema-prasara-samplutaḥ

सर्वत्र हरि का ध्यान करते हुए वह भाव-निर्मित सामग्री से उनकी पूजा करता था; कभी-कभी प्रेम की बाढ़ में डूबकर वह पूजा को ही भूल जाता था।

श्लोक 10 (bhagavata.12.9.10)

तस्यैकदा भृगुश्रेष्ठ पुष्पभद्रातटे मुनेः । उपासीनस्य सन्ध्यायां ब्रह्मन् वायुरभून्महान् ॥ १० ॥

tasyaikadā bhṛgu-śreṣṭha puṣpabhadrā-taṭe muneḥ upāsīnasya sandhyāyāṁ brahman vāyur abhūn mahān

हे भृगुश्रेष्ठ! एक दिन जब वह मुनि पुष्पभद्रा नदी के तट पर संध्या-उपासना में बैठा था, हे ब्रह्मन्! तभी एक प्रचण्ड वायु उठी।

श्लोक 11 (bhagavata.12.9.11)

तं चण्डशब्दं समुदीरयन्तं बलाहका अन्वभवन् करालाः । अक्षस्थविष्ठा मुमुचुस्तडिद्भिः स्वनन्त उच्चैरभिवर्षधाराः ॥ ११ ॥

taṁ caṇḍa-śabdaṁ samudīrayantaṁ balāhakā anv abhavan karālāḥ akṣa-sthaviṣṭhā mumucus taḍidbhiḥ svananta uccair abhi varṣa-dhārāḥ

उस प्रचण्ड शब्द करती वायु के पीछे भयंकर मेघ उमड़ आए, जो पहिये के समान स्थूल थे, और गरजते हुए बिजली सहित मूसलाधार वर्षा बरसाने लगे।

श्लोक 12 (bhagavata.12.9.12)

ततो व्यदृश्यन्त चतुःसमुद्राः समन्ततः क्ष्मातलमाग्रसन्तः । समीरवेगोर्मिभिरुग्रनक्र- महाभयावर्तगभीरघोषाः ॥ १२ ॥

tato vyadṛśyanta catuḥ samudrāḥ samantataḥ kṣmā-talam āgrasantaḥ samīra-vegormibhir ugra-nakra- mahā-bhayāvarta-gabhīra-ghoṣāḥ

तब चारों ओर चार समुद्र दिखाई देने लगे, जो पृथ्वी-तल को निगलते हुए बढ़ रहे थे, वायु-वेग की लहरों से युक्त, भयंकर मगरों से भरे, तथा गहरे भँवरों की गम्भीर गर्जना से गूँजते थे।

श्लोक 13 (bhagavata.12.9.13)

अन्तर्बहिश्चाद्भिरतिद्युभिः खरैः शतह्रदाभिरुपतापितं जगत् । चतुर्विधं वीक्ष्य सहात्मना मुनि- र्जलाप्लुतां क्ष्मां विमनाः समत्रसत् ॥ १३ ॥

antar bahiś cādbhir ati-dyubhiḥ kharaiḥ śatahradābhir upatāpitaṁ jagat catur-vidhaṁ vīkṣya sahātmanā munir jalāplutāṁ kṣmāṁ vimanāḥ samatrasat

आकाश तक उठे हुए उन प्रचण्ड जलों से, तथा बार-बार गिरती बिजलियों से भीतर-बाहर संतप्त सम्पूर्ण जगत को, इन चारों को अपने सहित जलमग्न पृथ्वी पर देखकर, वह मुनि व्याकुल तथा भयभीत हो उठा।

श्लोक 14 (bhagavata.12.9.14)

तस्यैवमुद्वीक्षत ऊर्मिभीषणः प्रभञ्जनाघूर्णितवार्महार्णवः । आपूर्यमाणो वरषद्भिरम्बुदैः क्ष्मामप्यधाद् द्वीपवर्षाद्रिभिः समम् ॥ १४ ॥

tasyaivam udvīkṣata ūrmi-bhīṣaṇaḥ prabhañjanāghūrṇita-vār mahārṇavaḥ āpūryamāṇo varaṣadbhir ambudaiḥ kṣmām apyadhād dvīpa-varṣādribhiḥ samam

उसके देखते-देखते वह लहरों से भयंकर, तूफान से मन्थित जलवाला महासागर, बरसते मेघों से भरता ही गया, यहाँ तक कि उसने द्वीप, वर्ष और पर्वतों सहित पृथ्वी को भी डुबो दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.12.9.15)

सक्ष्मान्तरिक्षं सदिवं सभागणं त्रैलोक्यमासीत् सह दिग्भिराप्लुतम् । स एक एवोर्वरितो महामुनि- र्बभ्राम विक्षिप्य जटा जडान्धवत् ॥ १५ ॥

sa-kṣmāntarikṣaṁ sa-divaṁ sa-bhā-gaṇaṁ trai-lokyam āsīt saha digbhir āplutam sa eka evorvarito mahā-munir babhrāma vikṣipya jaṭā jaḍāndha-vat

पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग — नक्षत्रगणों तथा दिशाओं सहित त्रिलोकी जलमग्न हो गई। केवल वह महामुनि अकेला शेष रह गया, और अपनी बिखरी जटाओं के साथ मूक-अन्धे के समान भटकने लगा।

श्लोक 16 (bhagavata.12.9.16)

क्षुत्तृट्परीतो मकरैस्तिमिङ्गिलै- रुपद्रुतो वीचिनभस्वता हतः । तमस्यपारे पतितो भ्रमन् दिशो न वेद खं गां च परिश्रमेषितः ॥ १६ ॥

kṣut-tṛṭ-parīto makarais timiṅgilair upadruto vīci-nabhasvatāhataḥ tamasy apāre patito bhraman diśo na veda khaṁ gāṁ ca pariśrameṣitaḥ

भूख-प्यास से व्याकुल, मगरमच्छों और तिमिंगिल मछलियों से पीड़ित, लहरों तथा वायु से आहत, उस अपार अंधकार में गिरा हुआ वह दिशाहीन भटकता रहा, थकान से इतना अभिभूत कि आकाश और पृथ्वी का भेद भी न जान सका।

श्लोक 17 (bhagavata.12.9.17)

क्वचिन्मग्नो महावर्ते तरलैस्ताडितः क्वचित् । यादोभिर्भक्ष्यते क्वापि स्वयमन्योन्यघातिभिः ॥ १७ ॥

kracin magno mahāvarte taralais tāḍitaḥ kvacit yādobhir bhakṣyate kvāpi svayam anyonya-ghātibhiḥ

कभी वह किसी बड़े भँवर में डूब जाता, कभी उठती लहरों से आहत होता, तो कभी परस्पर एक-दूसरे पर आक्रमण करते जल-जन्तुओं द्वारा निगले जाने के निकट पहुँच जाता।

श्लोक 18 (bhagavata.12.9.18)

क्वचिच्छोकं क्वचिन्मोहं क्वचिद्दुःखं सुखं भयम् । क्वचिन्मृत्युमवाप्नोति व्याध्यादिभिरुतार्दितः ॥ १८ ॥

kvacic chokaṁ kvacin mohaṁ kvacid duḥkhaṁ sukhaṁ bhayam kvacin mṛtyum avāpnoti vyādhy-ādibhir utārditaḥ

कभी उसे शोक होता, कभी मोह, कभी दुःख, सुख अथवा भय; और कभी रोग आदि से पीड़ित होकर वह मानो मृत्यु के निकट पहुँच जाता।

श्लोक 19 (bhagavata.12.9.19)

अयुतायुतवर्षाणां सहस्राणि शतानि च । व्यतीयुर्भ्रमतस्तस्मिन् विष्णुमायावृतात्मनः ॥ १९ ॥

ayutāyuta-varṣāṇāṁ sahasrāṇi śatāni ca vyatīyur bhramatas tasmin viṣṇu-māyāvṛtātmanaḥ

इस प्रकार दस-दस हजार वर्षों की सैकड़ों-हजारों अवधियाँ बीत गईं, जबकि वह उस प्रलय-जल में भगवान विष्णु की माया से आवृत होकर भटकता रहा।

श्लोक 20 (bhagavata.12.9.20)

स कदाचिद् भ्रमंस्तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि द्विजः । न्याग्रोधपोतं ददृशे फलपल्लवशोभितम् ॥ २० ॥

sa kadācid bhramaṁs tasmin pṛthivyāḥ kakudi dvijaḥ nyāgrodha-potaṁ dadṛśe phala-pallava-śobhitam

एक बार उस जल में भटकते हुए उस द्विज ने पृथ्वी के एक शिखर पर फलों और पल्लवों से सुशोभित एक बरगद के छोटे वृक्ष को देखा।

श्लोक 21 (bhagavata.12.9.21)

प्रागुत्तरस्यां शाखायां तस्यापि ददृशे शिशुम् । शयानं पर्णपुटके ग्रसन्तं प्रभया तमः ॥ २१ ॥

prāg-uttarasyāṁ śākhāyāṁ tasyāpi dadṛśe śiśum śayānaṁ parṇa-puṭake grasantaṁ prabhayā tamaḥ

उसकी उत्तर-पूर्व दिशा की शाखा पर उसे एक शिशु दिखाई दिया, जो पत्ते की दोने में लेटा हुआ था, और जिसकी आभा अंधकार को निगल रही थी।

श्लोक 22 (bhagavata.12.9.22)

महामरकतश्यामं श्रीमद्वदनपङ्कजम् । कम्बुग्रीवं महोरस्कं सुनसं सुन्दरभ्रुवम् ॥ २२ ॥

mahā-marakata-śyāmaṁ śrīmad-vadana-paṅkajam kambu-grīvaṁ mahoraskaṁ su-nasaṁ sundara-bhruvam

वह शिशु महामरकत-मणि के समान श्याम था, उसका मुख कमल-सम शोभा-सम्पन्न था, कण्ठ शंख-सदृश, वक्षस्थल विशाल, नासिका सुन्दर, तथा भौंहें मनोहर थीं —

श्लोक 23 (bhagavata.12.9.23)

श्वासैजदलकाभातं कम्बुश्रीकर्णदाडिमम् । विद्रुमाधरभासेषच्छोणायितसुधास्मितम् ॥ २३ ॥

śvāsaijad-alakābhātaṁ kambu-śrī-karṇa-dāḍimam vidrumādhara-bhāseṣac- choṇāyita-sudhā-smitam

— उसके श्वास से चंचल केश दीप्तिमान थे, कर्ण शंख-सदृश शोभा तथा अनार के फूल से युक्त थे, और मूँगे-सी अरुण आभा से उसकी अमृतमयी मुस्कान हल्की लालिमा लिए थी —

श्लोक 24 (bhagavata.12.9.24)

पद्मगर्भारुणापाङ्गं हृद्यहासावलोकनम् । श्वासैजद्वलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम् ॥ २४ ॥

padma-garbhāruṇāpāṅgaṁ hṛdya-hāsāvalokanam śvāsaijad-vali-saṁvigna- nimna-nābhi-dalodaram

— उसके नेत्रों के कोने कमल-गर्भ के समान अरुण थे, उसकी हास्ययुक्त दृष्टि हृदयहारी थी, और श्वास लेने पर उसके गहरी नाभिवाले उदर की सलवटें पत्ते के समान हिलती थीं।

श्लोक 25 (bhagavata.12.9.25)

चार्वङ्गुलिभ्यां पाणिभ्यामुन्नीय चरणाम्बुजम् । मुखे निधाय विप्रेन्द्रो धयन्तं वीक्ष्य विस्मितः ॥ २५ ॥

cārv-aṅgulibhyāṁ pāṇibhyām unnīya caraṇāmbujam mukhe nidhāya viprendro dhayantaṁ vīkṣya vismitaḥ

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने विस्मित होकर देखा कि वह शिशु अपने सुन्दर हाथों की अंगुलियों से अपने चरण-कमल को उठाकर मुख में रखकर चूस रहा था।

श्लोक 26 (bhagavata.12.9.26)

तद्दर्शनाद् वीतपरिश्रमो मुदा प्रोत्फुल्लहृत्पद्मविलोचनाम्बुजः । प्रहृष्टरोमाद्भुतभावशङ्कितः प्रष्टुं पुरस्तं प्रससार बालकम् ॥ २६ ॥

tad-darśanād vīta-pariśramo mudā protphulla-hṛt-padma-vilocanāmbujaḥ prahṛṣṭa-romādbhuta-bhāva-śaṅkitaḥ praṣṭuṁ puras taṁ prasasāra bālakam

उस दर्शन से उसकी थकान दूर हो गई; आनन्द से उसके हृदय-कमल तथा नेत्र-कमल दोनों खिल उठे, रोमांच हो आया, और आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा से भरकर वह उस बालक से प्रश्न पूछने के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 27 (bhagavata.12.9.27)

तावच्छिशोर्वै श्वसितेन भार्गवः सोऽन्तः शरीरं मशको यथाविशत् । तत्राप्यदो न्यस्तमचष्ट कृत्स्नशो यथा पुरामुह्यदतीव विस्मितः ॥ २७ ॥

tāvac chiśor vai śvasitena bhārgavaḥ so ’ntaḥ śarīraṁ maśako yathāviśat tatrāpy ado nyastam acaṣṭa kṛtsnaśo yathā purāmuhyad atīva vismitaḥ

किन्तु उतने में ही उस शिशु के श्वास लेने पर वह भार्गव मच्छर की भाँति उसके शरीर के भीतर प्रविष्ट हो गया; और वहाँ उसने सब कुछ पूर्ववत् यथावत् देखा — अत्यन्त विस्मित होकर वह पूर्णतः मोहित हो गया।

श्लोक 28 (bhagavata.12.9.28)

खं रोदसी भागणानद्रिसागरान् द्वीपान् सवर्षान् ककुभः सुरासुरान् । वनानि देशान् सरितः पुराकरान् खेटान् व्रजानाश्रमवर्णवृत्तयः ॥ २८ ॥

khaṁ rodasī bhā-gaṇān adri-sāgarān dvīpān sa-varṣān kakubhaḥ surāsurān vanāni deśān saritaḥ purākarān kheṭān vrajān āśrama-varṇa-vṛttayaḥ

उसने आकाश, स्वर्ग-पृथ्वी, नक्षत्रगण, पर्वत-समुद्र, वर्षों सहित द्वीप, दिशाएँ, सुर-असुर, वन, देश, नदियाँ, नगर, खानें, ग्राम, गोचर-भूमियाँ, आश्रम तथा वर्णों के कर्तव्यों को देखा —

श्लोक 29 (bhagavata.12.9.29)

महान्ति भूतान्यथ भौतिकान्यसौ कालं च नानायुगकल्पकल्पनम् । यत् किञ्चिदन्यद् व्यवहारकारणं ददर्श विश्वं सदिवावभासितम् ॥ २९ ॥

mahānti bhūtāny atha bhautikāny asau kālaṁ ca nānā-yuga-kalpa-kalpanam yat kiñcid anyad vyavahāra-kāraṇaṁ dadarśa viśvaṁ sad ivāvabhāsitam

— उसने महाभूतों तथा उनके कार्यों को, तथा नाना युग-कल्पों की रचना करने वाले काल को देखा; और जो भी अन्य व्यावहारिक कारण था, उसने सम्पूर्ण विश्व को यथार्थवत् प्रकाशित होते देखा।

श्लोक 30 (bhagavata.12.9.30)

हिमालयं पुष्पवहां च तां नदीं निजाश्रमं यत्र ऋषी अपश्यत । विश्वं विपश्यञ्छ्वसिताच्छिशोर्वै बहिर्निरस्तो न्यपतल्लयाब्धौ ॥ ३० ॥

himālayaṁ puṣpavahāṁ ca tāṁ nadīṁ nijāśramaṁ yatra ṛṣī apaśyata viśvaṁ vipaśyañ chvasitāc chiśor vai bahir nirasto nyapatal layābdhau

उसने हिमालय, पुष्पवाहा नदी, तथा अपने उस आश्रम को देखा जहाँ उसने उन दोनों ऋषियों के दर्शन किए थे; किन्तु इस सम्पूर्ण विश्व को देखते-देखते ही उस शिशु के श्वास छोड़ने पर वह बाहर निकाल दिया गया, और पुनः प्रलय-सागर में जा गिरा।

श्लोक 31 (bhagavata.12.9.31)

तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि प्ररूढं वटं च तत्पर्णपुटे शयानम् । तोकं च तत्प्रेमसुधास्मितेन निरीक्षितोऽपाङ्गनिरीक्षणेन ॥ ३१ ॥

tasmin pṛthivyāḥ kakudi prarūḍhaṁ vaṭaṁ ca tat-parṇa-puṭe śayānam tokaṁ ca tat-prema-sudhā-smitena nirīkṣito ’pāṅga-nirīkṣaṇena

वहाँ पुनः उसी पृथ्वी-शिखर पर उगे हुए उस बरगद वृक्ष को, तथा उसके पत्ते की दोने में लेटे उस शिशु को उसने देखा, जो अब उसकी ओर तिरछी दृष्टि से प्रेम-सुधामय मुस्कान के साथ देख रहा था।

श्लोक 32 (bhagavata.12.9.32)

अथ तं बालकं वीक्ष्य नेत्राभ्यां धिष्ठितं हृदि । अभ्ययादतिसङ्क्लिष्टः परिष्वक्तुमधोक्षजम् ॥ ३२ ॥

atha taṁ bālakaṁ vīkṣya netrābhyāṁ dhiṣṭhitaṁ hṛdi abhyayād ati-saṅkliṣṭaḥ pariṣvaktum adhokṣajam

फिर उस बालक को देखकर, नेत्रों के द्वारा उसे हृदय में धारण कर, अत्यन्त व्याकुल हुआ वह ऋषि उस इन्द्रियातीत भगवान को आलिंगन करने के लिए दौड़ पड़ा।

श्लोक 33 (bhagavata.12.9.33)

तावत् स भगवान् साक्षाद् योगाधीशो गुहाशयः । अन्तर्दध ऋषेः सद्यो यथेहानीशनिर्मिता ॥ ३३ ॥

tāvat sa bhagavān sākṣād yogādhīśo guhā-śayaḥ antardadha ṛṣeḥ sadyo yathehānīśa-nirmitā

किन्तु उसी क्षण साक्षात् योगेश्वर, गुहाशायी भगवान, उस ऋषि की दृष्टि से अन्तर्धान हो गए — जैसे किसी असमर्थ की रचनाएँ पल भर में लुप्त हो जाती हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.12.9.34)

तमन्वथ वटो ब्रह्मन् सलिलं लोकसम्प्लवः । तिरोधायि क्षणादस्य स्वाश्रमे पूर्ववत्स्थितः ॥ ३४ ॥

tam anv atha vaṭo brahman salilaṁ loka-samplavaḥ tirodhāyi kṣaṇād asya svāśrame pūrva-vat sthitaḥ

हे ब्रह्मन्! फिर भगवान के साथ ही वह बरगद वृक्ष, वह जल, तथा वह सम्पूर्ण लोक-प्रलय भी तिरोहित हो गए, और वह ऋषि उसी क्षण अपने आश्रम में पूर्ववत् स्थित पाया गया।

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