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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6

राजा परीक्षित का निर्वाण

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (bhagavata.12.6.1)

सूत उवाच एतन्निशम्य मुनिनाभिहितं परीक्षिद् व्यासात्मजेन निखिलात्मदृशा समेन । तत्पादमूलमुपसृत्य नतेन मूर्ध्ना बद्धाञ्जलिस्तमिदमाह स विष्णुरातः ॥ १ ॥

sūta uvāca etan niśamya muninābhihitaṁ parīkṣid vyāsātmajena nikhilātma-dṛśā samena tat-pāda-mūlam upasṛtya natena mūrdhnā baddhāñjalis tam idam āha sa viṣṇurātaḥ

सूत ने कहा — व्यासपुत्र, सर्वत्र समदर्शी उस मुनि द्वारा कहे गए इस वृत्तांत को सुनकर, जन्म से ही भगवान विष्णु द्वारा रक्षित परीक्षित उनके चरणों के समीप गए; और सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर उनसे यह कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.12.6.2)

राजोवाच सिद्धोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भवता करुणात्मना । श्रावितो यच्च मे साक्षादनादिनिधनो हरिः ॥ २ ॥

rājovāca siddho ’smy anugṛhīto ’smi bhavatā karuṇātmanā śrāvito yac ca me sākṣād anādi-nidhano hariḥ

राजा ने कहा — मैं सिद्ध हो गया, मैं कृतार्थ हो गया, क्योंकि करुणामय स्वभाव वाले आपने मुझे साक्षात् उन अनादि-अनन्त हरि की यह कथा सुनाई।

श्लोक 3 (bhagavata.12.6.3)

नात्यद्भुतमहं मन्ये महतामच्युतात्मनाम् । अज्ञेषु तापतप्तेषु भूतेषु यदनुग्रहः ॥ ३ ॥

nāty-adbhutam ahaṁ manye mahatām acyutātmanām ajñeṣu tāpa-tapteṣu bhūteṣu yad anugrahaḥ

मैं इसे कोई विशेष आश्चर्य नहीं मानता कि अच्युत में लीन आपके-जैसे महापुरुष, संसार-ताप से संतप्त अज्ञानी प्राणियों पर भी ऐसी कृपा करते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.12.6.4)

पुराणसंहितामेतामश्रौष्म भवतो वयम् । यस्यां खलूत्तमःश्लोको भगवाननुवर्ण्यते ॥ ४ ॥

purāṇa-saṁhitām etām aśrauṣma bhavato vayam yasyāṁ khalūttamaḥ-śloko bhagavān anuvarṇyate

हमने आपसे यह पुराण-संहिता सुनी, जिसमें उत्तमःश्लोक भगवान का सम्यक् वर्णन किया गया है।

श्लोक 5 (bhagavata.12.6.5)

भगवंस्तक्षकादिभ्यो मृत्युभ्यो न बिभेम्यहम् । प्रविष्टो ब्रह्म निर्वाणमभयं दर्शितं त्वया ॥ ५ ॥

bhagavaṁs takṣakādibhyo mṛtyubhyo na bibhemy aham praviṣṭo brahma nirvāṇam abhayaṁ darśitaṁ tvayā

हे भगवन्, अब मुझे तक्षक अथवा किसी अन्य मृत्यु का भय नहीं है, क्योंकि आपने मुझे जिस अभयमय ब्रह्म-निर्वाण का दर्शन कराया, उसमें मैं प्रविष्ट हो चुका हूँ।

श्लोक 6 (bhagavata.12.6.6)

अनुजानीहि मां ब्रह्मन् वाचं यच्छाम्यधोक्षजे । मुक्तकामाशयं चेतः प्रवेश्य विसृजाम्यसून् ॥ ६ ॥

anujānīhi māṁ brahman vācaṁ yacchāmy adhokṣaje mukta-kāmāśayaṁ cetaḥ praveśya visṛjāmy asūn

हे ब्राह्मण, मुझे अनुमति दीजिए कि मैं अपनी वाणी को अधोक्षज भगवान में समर्पित कर दूँ; कामनाओं से मुक्त चित्त को उन्हीं में लीन करके मैं अपने प्राणों का त्याग करूँ।

श्लोक 7 (bhagavata.12.6.7)

अज्ञानं च निरस्तं मे ज्ञानविज्ञाननिष्ठया । भवता दर्शितं क्षेमं परं भगवतः पदम् ॥ ७ ॥

ajñānaṁ ca nirastaṁ me jñāna-vijñāna-niṣṭhayā bhavatā darśitaṁ kṣemaṁ paraṁ bhagavataḥ padam

ज्ञान और विज्ञान की इस निष्ठा से आपने मेरा अज्ञान दूर कर दिया है, और मुझे भगवान का वह परम कल्याणकारी पद दिखा दिया है।

श्लोक 8 (bhagavata.12.6.8)

सूत उवाच इत्युक्तस्तमनुज्ञाप्य भगवान् बादरायणिः । जगाम भिक्षुभिः साकं नरदेवेन पूजितः ॥ ८ ॥

sūta uvāca ity uktas tam anujñāpya bhagavān bādarāyaṇiḥ jagāma bhikṣubhiḥ sākaṁ nara-devena pūjitaḥ

सूत ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर, भगवान बादरायणि (शुकदेव) राजा को अनुमति देकर, राजा द्वारा पूजित होकर, अन्य भिक्षुओं (मुनियों) के साथ वहाँ से चले गए।

श्लोक 9 (bhagavata.12.6.9)

परीक्षिदपि राजर्षिरात्मन्यात्मानमात्मना । समाधाय परं दध्यावस्पन्दासुर्यथा तरुः ॥ ९ ॥

parīkṣid api rājarṣir ātmany ātmānam ātmanā samādhāya paraṁ dadhyāv aspandāsur yathā taruḥ

तत्पश्चात् राजर्षि परीक्षित ने अपनी आत्मा को आत्मा के द्वारा ही परमात्मा में स्थिर करके गहन ध्यान में प्रवेश किया, वृक्ष के समान निश्चल और स्पंदनरहित होकर।

श्लोक 10 (bhagavata.12.6.10)

प्राक्कूले बर्हिष्यासीनो गङ्गाकूल उदङ्मुखः । ब्रह्मभूतो महायोगी निःसङ्गश्छिन्नसंशयः ॥ १० ॥

prāk-kūle barhiṣy āsīno gaṅgā-kūla udaṅ-mukhaḥ brahma-bhūto mahā-yogī niḥsaṅgaś chinna-saṁśayaḥ

पूर्वाग्र कुशासन पर बैठे हुए, गंगातट पर, उत्तराभिमुख होकर, वह महायोगी ब्रह्मस्वरूप हो गया, आसक्ति-रहित और संशय-रहित।

श्लोक 11 (bhagavata.12.6.11)

तक्षकः प्रहितो विप्राः क्रुद्धेन द्विजसूनुना । हन्तुकामो नृपं गच्छन् ददर्श पथि कश्यपम् ॥ ११ ॥

takṣakaḥ prahito viprāḥ kruddhena dvija-sūnunā hantu-kāmo nṛpaṁ gacchan dadarśa pathi kaśyapam

हे विद्वान ब्राह्मणो, क्रुद्ध ब्राह्मण-पुत्र द्वारा भेजा गया तक्षक राजा को मारने के लिए जाते समय मार्ग में मुनि कश्यप से मिला।

श्लोक 12 (bhagavata.12.6.12)

तं तर्पयित्वा द्रविणैर्निवर्त्य विषहारिणम् । द्विजरूपप्रतिच्छन्नः कामरूपोऽदशन्नृपम् ॥ १२ ॥

taṁ tarpayitvā draviṇair nivartya viṣa-hāriṇam dvija-rūpa-praticchannaḥ kāma-rūpo ’daśan nṛpam

धन देकर उसे संतुष्ट करके और विषनाशक उस मुनि को लौटाकर, कामरूपी तक्षक ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा को डस लिया।

श्लोक 13 (bhagavata.12.6.13)

ब्रह्मभूतस्य राजर्षेर्देहोऽहिगरलाग्निना । बभूव भस्मसात् सद्यः पश्यतां सर्वदेहिनाम् ॥ १३ ॥

brahma-bhūtasya rājarṣer deho ’hi-garalāgninā babhūva bhasmasāt sadyaḥ paśyatāṁ sarva-dehinām

सभी प्राणियों के देखते-देखते, ब्रह्मस्वरूप हो चुके उस राजर्षि का शरीर सर्प के विष की अग्नि से तत्काल भस्म हो गया।

श्लोक 14 (bhagavata.12.6.14)

हाहाकारो महानासीद् भुवि खे दिक्षु सर्वतः । विस्मिता ह्यभवन् सर्वे देवासुरनरादयः ॥ १४ ॥

hāhā-kāro mahān āsīd bhuvi khe dikṣu sarvataḥ vismitā hy abhavan sarve devāsura-narādayaḥ

पृथ्वी पर, आकाश में और सभी दिशाओं में महान हाहाकार मच गया, और देवता, असुर, मनुष्य आदि सभी विस्मित हो उठे।

श्लोक 15 (bhagavata.12.6.15)

देवदुन्दुभयो नेदुर्गन्धर्वाप्सरसो जगुः । ववृषुः पुष्पवर्षाणि विबुधाः साधुवादिनः ॥ १५ ॥

deva-dundubhayo nedur gandharvāpsaraso jaguḥ vavṛṣuḥ puṣpa-varṣāṇi vibudhāḥ sādhu-vādinaḥ

देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं, गन्धर्व और अप्सराएँ गाने लगे, और देवगण साधुवाद करते हुए पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 16 (bhagavata.12.6.16)

जन्मेजयः स्वपितरं श्रुत्वा तक्षकभक्षितम् । यथा जुहाव सङ्क्रुद्धो नागान् सत्रे सह द्विजैः ॥ १६ ॥

janmejayaḥ sva-pitaraṁ śrutvā takṣaka-bhakṣitam yathājuhāva saṅkruddho nāgān satre saha dvijaiḥ

अपने पिता को तक्षक द्वारा डसा जाना सुनकर जन्मेजय अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और विधिपूर्वक ब्राह्मणों सहित यज्ञ में सर्पों की आहुति देने लगे।

श्लोक 17 (bhagavata.12.6.17)

सर्पसत्रे समिद्धाग्नौ दह्यमानान् महोरगान् । दृष्ट्वेन्द्रं भयसंविग्नस्तक्षकः शरणं ययौ ॥ १७ ॥

sarpa-satre samiddhāgnau dahyamānān mahoragān dṛṣṭvendraṁ bhaya-saṁvignas takṣakaḥ śaraṇaṁ yayau

सर्पयज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में बड़े-बड़े नागों को जलते देखकर, भयभीत तक्षक इन्द्र की शरण में गया।

श्लोक 18 (bhagavata.12.6.18)

अपश्यंस्तक्षकं तत्र राजा पारीक्षितो द्विजान् । उवाच तक्षकः कस्मान्न दह्येतोरगाधमः ॥ १८ ॥

apaśyaṁs takṣakaṁ tatra rājā pārīkṣito dvijān uvāca takṣakaḥ kasmān na dahyetoragādhamaḥ

वहाँ तक्षक को न देखकर राजा जन्मेजय ने ब्राह्मणों से पूछा — "उस अधम सर्प तक्षक की आहुति क्यों नहीं जल रही है?"

श्लोक 19 (bhagavata.12.6.19)

तं गोपायति राजेन्द्र शक्रः शरणमागतम् । तेन संस्तम्भितः सर्पस्तस्मान्नाग्नौ पतत्यसौ ॥ १९ ॥

taṁ gopāyati rājendra śakraḥ śaraṇam āgatam tena saṁstambhitaḥ sarpas tasmān nāgnau pataty asau

(ब्राह्मणों ने कहा) — हे राजेन्द्र, इन्द्र उस शरणागत तक्षक की रक्षा कर रहे हैं; उन्हीं के द्वारा रोके जाने से वह सर्प अग्नि में नहीं गिर रहा है।

श्लोक 20 (bhagavata.12.6.20)

पारीक्षित इति श्रुत्वा प्राहर्त्विज उदारधीः । सहेन्द्रस्तक्षको विप्रा नाग्नौ किमिति पात्यते ॥ २० ॥

pārīkṣita iti śrutvā prāhartvija udāra-dhīḥ sahendras takṣako viprā nāgnau kim iti pātyate

यह सुनकर उदार बुद्धि वाले परीक्षित-पुत्र ने पुरोहितों से कहा — हे विप्रगण, तो फिर इन्द्र सहित तक्षक को ही अग्नि में क्यों न गिराया जाए?

श्लोक 21 (bhagavata.12.6.21)

तच्छ्रुत्वाजुहुवुर्विप्राः सहेन्द्रं तक्षकं मखे । तक्षकाशु पतस्वेह सहेन्द्रेण मरुत्वता ॥ २१ ॥

tac chrutvājuhuvur viprāḥ sahendraṁ takṣakaṁ makhe takṣakāśu patasveha sahendreṇa marutvatā

यह सुनकर ब्राह्मणों ने यज्ञ में इन्द्र सहित तक्षक की आहुति देने के लिए मंत्र पढ़ा — "हे तक्षक, तुम इन्द्र और मरुद्गणों सहित शीघ्र ही इस अग्नि में गिरो!"

श्लोक 22 (bhagavata.12.6.22)

इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः । बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥

iti brahmoditākṣepaiḥ sthānād indraḥ pracālitaḥ babhūva sambhrānta-matiḥ sa-vimānaḥ sa-takṣakaḥ

इन ब्राह्मणों के उच्चारित इन आक्षेपमय मंत्रों से इन्द्र अपने स्थान से विचलित हो उठे, और अपने विमान तथा तक्षक सहित अत्यंत भ्रमित हो गए।

श्लोक 23 (bhagavata.12.6.23)

तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् । विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥

taṁ patantaṁ vimānena saha-takṣakam ambarāt vilokyāṅgirasaḥ prāha rājānaṁ taṁ bṛhaspatiḥ

विमान सहित तक्षक को आकाश से गिरते देखकर, अंगिरा के पुत्र बृहस्पति ने राजा जन्मेजय से यह कहा।

श्लोक 24 (bhagavata.12.6.24)

नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमर्हति सर्पराट् । अनेन पीतममृतमथ वा अजरामरः ॥ २४ ॥

naiṣa tvayā manuṣyendra vadham arhati sarpa-rāṭ anena pītam amṛtam atha vā ajarāmaraḥ

हे मनुष्येन्द्र, यह सर्पराज तुम्हारे द्वारा वध किए जाने योग्य नहीं है, क्योंकि इसने अमृत का पान किया है और इसलिए यह जरा-मृत्यु से रहित है।

श्लोक 25 (bhagavata.12.6.25)

जीवितं मरणं जन्तोर्गतिः स्वेनैव कर्मणा । राजंस्ततोऽन्यो नास्त्यस्य प्रदाता सुखदुःखयोः ॥ २५ ॥

jīvitaṁ maraṇaṁ jantor gatiḥ svenaiva karmaṇā rājaṁs tato ’nyo nāsty asya pradātā sukha-duḥkhayoḥ

किसी भी प्राणी का जीवन, मृत्यु और उसकी आगे की गति उसके अपने ही कर्मों के अनुसार होती है। हे राजन्, इसके सुख-दुःख का कोई अन्य दाता नहीं है।

श्लोक 26 (bhagavata.12.6.26)

सर्पचौराग्निविद्युद्भ्यः क्षुत्तृड्व्याध्यादिभिर्नृप । पञ्चत्वमृच्छते जन्तुर्भुङ्क्त आरब्धकर्म तत् ॥ २६ ॥

sarpa-caurāgni-vidyudbhyaḥ kṣut-tṛd-vyādhy-ādibhir nṛpa pañcatvam ṛcchate jantur bhuṅkta ārabdha-karma tat

हे राजन्, चाहे सर्प, चोर, अग्नि, बिजली से, अथवा भूख-प्यास और रोग आदि से प्राणी की मृत्यु हो — वह अपने ही पूर्वकृत कर्म का ही फल भोगता है।

श्लोक 27 (bhagavata.12.6.27)

तस्मात् सत्रमिदं राजन् संस्थीयेताभिचारिकम् । सर्पा अनागसो दग्धा जनैर्दिष्टं हि भुज्यते ॥ २७ ॥

tasmāt satram idaṁ rājan saṁsthīyetābhicārikam sarpā anāgaso dagdhā janair diṣṭaṁ hi bhujyate

इसलिए, हे राजन्, हिंसा के उद्देश्य से आरम्भ किया गया यह यज्ञ अब समाप्त कर दो। अनेक निर्दोष सर्प पहले ही जल चुके हैं। वस्तुतः प्रत्येक प्राणी को अपने विधाता का ही फल भोगना पड़ता है।

श्लोक 28 (bhagavata.12.6.28)

सूत उवाच इत्युक्तः स तथेत्याह महर्षेर्मानयन् वचः । सर्पसत्रादुपरतः पूजयामास वाक्पतिम् ॥ २८ ॥

sūta uvāca ity uktaḥ sa tathety āha maharṣer mānayan vacaḥ sarpa-satrād uparataḥ pūjayām āsa vāk-patim

सूत ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर, महर्षि के वचनों का सम्मान करते हुए राजा ने "ऐसा ही हो" कहकर सर्पयज्ञ को समाप्त कर दिया, और वाणी के स्वामी बृहस्पति की पूजा की।

श्लोक 29 (bhagavata.12.6.29)

सैषा विष्णोर्महामायाबाध्ययालक्षणा यया । मुह्यन्त्यस्यैवात्मभूता भूतेषु गुणवृत्तिभिः ॥ २९ ॥

saiṣā viṣṇor mahā-māyā- bādhyayālakṣaṇā yayā muhyanty asyaivātma-bhūtā bhūteṣu guṇa-vṛttibhiḥ

यह विष्णु की महामाया ही है, जो दुर्निवार और दुर्बोध्य है, जिसके कारण उन्हीं के अंशस्वरूप जीव, गुणों की क्रियाओं द्वारा प्राणियों में मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.12.6.30)

न यत्र दम्भीत्यभया विराजिता मायात्मवादेऽसकृदात्मवादिभिः । न यद्विवादो विविधस्तदाश्रयो मनश्च सङ्कल्पविकल्पवृत्ति यत् ॥ ३० ॥

na yatra dambhīty abhayā virājitā māyātma-vāde ’sakṛd ātma-vādibhiḥ na yad vivādo vividhas tad-āśrayo manaś ca saṅkalpa-vikalpa-vṛtti yat

किन्तु उस परम पद में यह माया 'मैं इसे छल लूँगी' — ऐसा सोचकर निर्भय होकर प्रभुत्व नहीं जमा सकती, क्योंकि वहाँ सच्चे आत्म-ज्ञानी बारंबार उस सत्य का साक्षात्कार करते हैं; वहाँ मायामय आत्मवाद पर आधारित कोई विवाद नहीं है, और न ही संकल्प-विकल्प में लगा हुआ मन ही है।

श्लोक 31 (bhagavata.12.6.31)

न यत्र सृज्यं सृजतोभयोः परं श्रेयश्च जीवस्त्रिभिरन्वितस्त्वहम् । तदेतदुत्सादितबाध्यबाधकं निषिध्य चोर्मीन् विरमेत तन्मुनिः ॥ ३१ ॥

na yatra sṛjyaṁ sṛjatobhayoḥ paraṁ śreyaś ca jīvas tribhir anvitas tv aham tad etad utsādita-bādhya-bādhakaṁ niṣidhya cormīn virameta tan muniḥ

वहाँ न सृष्टि है, न सृष्टिकर्ता, न तीनों गुणों में उलझा जीव और 'मैं' का भाव, न इनसे भिन्न कोई श्रेय है। इस प्रकार बाध्य और बाधक दोनों को हटाकर तथा तरंगों को रोककर मुनि वहीं शांत हो जाता है।

श्लोक 32 (bhagavata.12.6.32)

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः । विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यावसितं समाहितैः ॥ ३२ ॥

paraṁ padaṁ vaiṣṇavam āmananti tad yan neti netīty atad-utsisṛkṣavaḥ visṛjya daurātmyam ananya-sauhṛdā hṛdopaguhyāvasitaṁ samāhitaiḥ

ज्ञानीजन 'नेति नेति' कहकर, आत्मा से भिन्न सब कुछ त्यागने की इच्छा से, दुष्टता का परित्याग करके और अनन्य प्रेमपूर्वक हृदय में उस अन्तिम सत्य का आलिंगन करते हुए, समाहित चित्त से जिस परम पद को प्राप्त करते हैं, उसी को विष्णु का परमपद कहा जाता है।

श्लोक 33 (bhagavata.12.6.33)

त एतदधिगच्छन्ति विष्णोर्यत् परमं पदम् । अहं ममेति दौर्जन्यं न येषां देहगेहजम् ॥ ३३ ॥

ta etad adhigacchanti viṣṇor yat paramaṁ padam ahaṁ mameti daurjanyaṁ na yeṣāṁ deha-geha-jam

वे ही विष्णु के उस परम पद को प्राप्त करते हैं, जिनमें शरीर और घर से उत्पन्न 'मैं' और 'मेरा' की दुष्ट भावना नहीं रहती।

श्लोक 34 (bhagavata.12.6.34)

अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन । न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ३४ ॥

ativādāṁs titikṣeta nāvamanyeta kañcana na cemaṁ deham āśritya vairaṁ kurvīta kenacit

मनुष्य को कठोर वचनों को सहन करना चाहिए, किसी का अनादर नहीं करना चाहिए, और इस शरीर को आश्रय मानकर किसी से भी वैर नहीं करना चाहिए।

श्लोक 35 (bhagavata.12.6.35)

नमो भगवते तस्मै कृष्णायाकुण्ठमेधसे । यत्पादाम्बुरुहध्यानात् संहितामध्यगामिमाम् ॥ ३५ ॥

namo bhagavate tasmai kṛṣṇāyākuṇṭha-medhase yat-pādāmburuha-dhyānāt saṁhitām adhyagām imām

उन अच्युत-बुद्धि भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार है, जिनके चरण-कमलों के ध्यान से मैंने इस संहिता का अध्ययन किया।

श्लोक 36 (bhagavata.12.6.36)

श्रीशौनक उवाच पैलादिभिर्व्यासशिष्यैर्वेदाचार्यैर्महात्मभिः । वेदाश्च कथिता व्यस्ता एतत् सौम्याभिधेहि नः ॥ ३६ ॥

śrī-śaunaka uvāca pailādibhir vyāsa-śiṣyair vedācāryair mahātmabhiḥ vedāś ca kathitā vyastā etat saumyābhidhehi naḥ

श्री शौनक ने कहा — हे सौम्य, पैल आदि व्यास के महात्मा शिष्यों, वेदाचार्यों द्वारा वेदों का कथन और विभाजन किस प्रकार हुआ, यह हमें बताइए।

श्लोक 37 (bhagavata.12.6.37)

सूत उवाच समाहितात्मनो ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । हृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद् विभाव्यते ॥ ३७ ॥

sūta uvāca samāhitātmano brahman brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ hṛdy ākāśād abhūn nādo vṛtti-rodhād vibhāvyate

सूत ने कहा — हे ब्राह्मण, गहन समाधि में स्थित परमेष्ठी ब्रह्मा के हृदयाकाश से एक नाद प्रकट हुआ, जो बाह्य वृत्तियों के रुक जाने पर ही अनुभव होता है।

श्लोक 38 (bhagavata.12.6.38)

यदुपासनया ब्रह्मन् योगिनो मलमात्मनः । द्रव्यक्रियाकारकाख्यं धूत्वा यान्त्यपुनर्भवम् ॥ ३८ ॥

yad-upāsanayā brahman yogino malam ātmanaḥ dravya-kriyā-kārakākhyaṁ dhūtvā yānty apunar-bhavam

हे ब्राह्मण, उसी की उपासना से योगीजन द्रव्य, क्रिया और कारक नामक अपनी मलिनता को धोकर पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 39 (bhagavata.12.6.39)

ततोऽभूत्त्रिवृदोंकारो योऽव्यक्तप्रभवः स्वराट् । यत्तल्लिङ्गं भगवतो ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ३९ ॥

tato ’bhūt tri-vṛd oṁkāro yo ’vyakta-prabhavaḥ sva-rāṭ yat tal liṅgaṁ bhagavato brahmaṇaḥ paramātmanaḥ

उससे अव्यक्त से उत्पन्न, स्वयं-प्रकाशित त्रिवृत् ओंकार प्रकट हुआ, जो भगवान ब्रह्म तथा परमात्मा का साक्षात् प्रतीक-चिह्न है।

श्लोक 40 (bhagavata.12.6.40)

शृणोति य इमं स्फोटं सुप्तश्रोत्रे च शून्यदृक् । येन वाग् व्यज्यते यस्य व्यक्तिराकाश आत्मनः ॥ ४० ॥

śṛṇoti ya imaṁ sphoṭaṁ supta-śrotre ca śūnya-dṛk yena vāg vyajyate yasya vyaktir ākāśa ātmanaḥ

यही स्फोट (मूल शब्द-तत्व) है, जिसे बाह्य श्रवणेन्द्रिय के शांत होने पर भी शून्यदर्शी आन्तरिक साक्षी सुनता है; इसी से वाणी प्रकट होती है, और इसी की अभिव्यक्ति आत्मा के हृदयाकाश में होती है।

श्लोक 41 (bhagavata.12.6.41)

स्वधाम्नो ब्राह्मणः साक्षाद् वाचकः परमात्मनः । स सर्वमन्त्रोपनिषद्वेदबीजं सनातनम् ॥ ४१ ॥

sva-dhāmno brāhmaṇaḥ sākṣād vācakaḥ paramātmanaḥ sa sarva-mantropaniṣad veda-bījaṁ sanātanam

वह ओंकार अपने ही धाम में स्थित ब्रह्म का, परमात्मा का साक्षात् वाचक है; वही समस्त मंत्रों, उपनिषदों और वेद का सनातन बीज है।

श्लोक 42 (bhagavata.12.6.42)

तस्य ह्यासंस्त्रयो वर्णा अकाराद्या भृगूद्वह । धार्यन्ते यैस्त्रयो भावा गुणनामार्थवृत्तयः ॥ ४२ ॥

tasya hy āsaṁs trayo varṇā a-kārādyā bhṛgūdvaha dhāryante yais trayo bhāvā guṇa-nāmārtha-vṛttayaḥ

हे भृगुवंशी, उसमें अ आदि तीन वर्ण हैं, जिनके द्वारा तीन भाव — गुण, नाम और अर्थ की वृत्तियाँ धारण की जाती हैं।

श्लोक 43 (bhagavata.12.6.43)

ततोऽक्षरसमाम्नायमसृजद् भगवानजः । अन्तस्थोष्मस्वरस्पर्शह्रस्वदीर्घादिलक्षणम् ॥ ४३ ॥

tato ’kṣara-samāmnāyam asṛjad bhagavān ajaḥ antasthoṣma-svara-sparśa- hrasva-dīrghādi-lakṣaṇam

तत्पश्चात् अजन्मा भगवान ब्रह्मा ने अन्तःस्थ, ऊष्म, स्वर और स्पर्श वर्णों तथा ह्रस्व-दीर्घ आदि लक्षणों वाली सम्पूर्ण वर्णमाला की रचना की।

श्लोक 44 (bhagavata.12.6.44)

तेनासौ चतुरो वेदांश्चतुर्भिर्वदनैर्विभुः । सव्याहृतिकान् सोंकारांश्चातुर्होत्रविवक्षया ॥ ४४ ॥

tenāsau caturo vedāṁś caturbhir vadanair vibhuḥ sa-vyāhṛtikān soṁkārāṁś cātur-hotra-vivakṣayā

सर्वशक्तिमान ब्रह्मा ने उसी वर्णमाला से अपने चार मुखों से चातुर्होत्र (चार प्रकार के ऋत्विजों) की स्थापना के अभिप्राय से, व्याहृतियों और ओंकार सहित चारों वेदों को उत्पन्न किया।

श्लोक 45 (bhagavata.12.6.45)

पुत्रानध्यापयत्तांस्तु ब्रह्मर्षीन् ब्रह्मकोविदान् । ते तु धर्मोपदेष्टारः स्वपुत्रेभ्यः समादिशन् ॥ ४५ ॥

putrān adhyāpayat tāṁs tu brahmarṣīn brahma-kovidān te tu dharmopadeṣṭāraḥ sva-putrebhyaḥ samādiśan

उन्होंने ये वेद अपने पुत्रों — वेद-विद्या में निपुण ब्रह्मर्षियों — को पढ़ाए, और वे धर्मोपदेशक होकर अपने-अपने पुत्रों को यही उपदेश देते गए।

श्लोक 46 (bhagavata.12.6.46)

ते परम्परया प्राप्तास्तत्तच्छिष्यैर्धृतव्रतैः । चतुर्युगेष्वथ व्यस्ता द्वापरादौ महर्षिभिः ॥ ४६ ॥

te paramparayā prāptās tat-tac-chiṣyair dhṛta-vrataiḥ catur-yugeṣv atha vyastā dvāparādau maharṣibhiḥ

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुए वे वेद प्रत्येक चतुर्युग में दृढ़-व्रती शिष्यों द्वारा धारण किए जाते रहे, और द्वापर के आरम्भ में महर्षियों द्वारा विभाजित किए जाते रहे।

श्लोक 47 (bhagavata.12.6.47)

क्षीणायुषः क्षीणसत्त्वान् दुर्मेधान् वीक्ष्य कालतः । वेदान्ब्रह्मर्षयो व्यस्यन् हृदिस्थाच्युतचोदिताः ॥ ४७ ॥

kṣīṇāyuṣaḥ kṣīṇa-sattvān durmedhān vīkṣya kālataḥ vedān brahmarṣayo vyasyan hṛdi-sthācyuta-coditāḥ

काल के प्रभाव से मनुष्यों की घटती आयु, बल और बुद्धि को देखकर, ब्रह्मर्षिगण, हृदयस्थ अच्युत भगवान से प्रेरित होकर, वेदों का विभाजन करते गए।

श्लोक 48 (bhagavata.12.6.48)

अस्मिन्नप्यन्तरे ब्रह्मन् भगवान्लोकभावनः । ब्रह्मेशाद्यैर्लोकपालैर्याचितो धर्मगुप्तये ॥ ४८ ॥

asminn apy antare brahman bhagavān loka-bhāvanaḥ brahmeśādyair loka-pālair yācito dharma-guptaye

हे ब्राह्मण, इसी युग में भी, विश्व के पालनकर्ता भगवान से, ब्रह्मा और शिव आदि लोकपालों ने धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना की।

श्लोक 49 (bhagavata.12.6.49)

पराशरात् सत्यवत्यामंशांशकलया विभुः । अवतीर्णो महाभाग वेदं चक्रे चतुर्विधम् ॥ ४९ ॥

parāśarāt satyavatyām aṁśāṁśa-kalayā vibhuḥ avatīrṇo mahā-bhāga vedaṁ cakre catur-vidham

हे महाभाग, सर्वशक्तिमान भगवान ने पराशर से सत्यवती के गर्भ में अपने अंश के अंश-रूप में अवतार लेकर वेद को चार भागों में विभाजित किया।

श्लोक 50 (bhagavata.12.6.50)

ऋगथर्वयजुःसाम्नां राशीरुद्धृत्य वर्गशः । चतस्रः संहिताश्चक्रे मन्त्रैर्मणिगणा इव ॥ ५० ॥

ṛg-atharva-yajuḥ-sāmnāṁ rāśīr uddhṛtya vargaśaḥ catasraḥ saṁhitāś cakre mantrair maṇi-gaṇā iva

उन्होंने ऋक्, अथर्व, यजुः और साम — इन चारों वेदों की राशियों को अलग-अलग करके, मंत्रों को मणियों के समूह के समान चार संहिताओं में गूँथ दिया।

श्लोक 51 (bhagavata.12.6.51)

तासां स चतुरः शिष्यानुपाहूय महामतिः । एकैकां संहितां ब्रह्मन्नेकैकस्मै ददौ विभुः ॥ ५१ ॥

tāsāṁ sa caturaḥ śiṣyān upāhūya mahā-matiḥ ekaikāṁ saṁhitāṁ brahmann ekaikasmai dadau vibhuḥ

हे ब्राह्मण, उस महामति सर्वशक्तिमान ऋषि ने चार शिष्यों को बुलाकर प्रत्येक को एक-एक संहिता प्रदान की।

श्लोक 52 (bhagavata.12.6.52)

पैलाय संहितामाद्यां बह्वृचाख्यां उवाच ह । वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्यं यजुर्गणम् ॥ ५२ ॥

pailāya saṁhitām ādyāṁ bahvṛcākhyāṁ uvāca ha vaiśampāyana-saṁjñāya nigadākhyaṁ yajur-gaṇam

उन्होंने पैल को पहली संहिता, बह्वृच (ऋग्वेद) नामक, सुनाई; वैशम्पायन नामक शिष्य को निगद नामक यजुर्मंत्रों का समूह सुनाया।

श्लोक 53 (bhagavata.12.6.53)

साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम् । अथर्वाङ्गिरसीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे ॥ ५३ ॥

sāmnāṁ jaiminaye prāha tathā chandoga-saṁhitām atharvāṅgirasīṁ nāma sva-śiṣyāya sumantave

उन्होंने जैमिनि को छन्दोग-संहिता नामक साम-मंत्र सुनाए, और अपने शिष्य सुमन्तु को अथर्वांगिरसी नामक अथर्ववेद सुनाया।

श्लोक 54 (bhagavata.12.6.54)

पैलः स्वसंहितामूचे इन्द्रप्रमितये मुनिः । बाष्कलाय च सोऽप्याह शिष्येभ्यः संहितां स्वकाम् ॥ ५४ ॥

pailaḥ sva-saṁhitām ūce indrapramitaye muniḥ bāṣkalāya ca so ’py āha śiṣyebhyaḥ saṁhitāṁ svakām

मुनि पैल ने अपनी संहिता इन्द्रप्रमिति और बाष्कल को सुनाई; बाष्कल ने भी अपनी संहिता अपने शिष्यों को सुनाई।

श्लोक 55 (bhagavata.12.6.55)

चतुर्धा व्यस्य बोध्याय याज्ञवल्क्याय भार्गव । पराशरायाग्निमित्र इन्द्रप्रमितिरात्मवान् ॥ ५५ ॥

caturdhā vyasya bodhyāya yājñavalkyāya bhārgava parāśarāyāgnimitra indrapramitir ātmavān

हे भार्गव, उसे चार भागों में विभाजित करके बाष्कल ने बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को दिया, तथा आत्मसंयमी इन्द्रप्रमिति ने भी अपना अंश आगे सिखाया।

श्लोक 56 (bhagavata.12.6.56)

अध्यापयत् संहितां स्वां माण्डूकेयमृषिं कविम् । तस्य शिष्यो देवमित्रः सौभर्यादिभ्य ऊचिवान् ॥ ५६ ॥

adhyāpayat saṁhitāṁ svāṁ māṇḍūkeyam ṛṣiṁ kavim tasya śiṣyo devamitraḥ saubhary-ādibhya ūcivān

उन्होंने अपनी संहिता विद्वान ऋषि माण्डूकेय को पढ़ाई; उनके शिष्य देवमित्र ने इसे सौभरि आदि को सुनाया।

श्लोक 57 (bhagavata.12.6.57)

शाकल्यस्तत्सुतः स्वां तु पञ्चधा व्यस्य संहिताम् । वात्स्यमुद्गलशालीयगोखल्यशिशिरेष्वधात् ॥ ५७ ॥

śākalyas tat-sutaḥ svāṁ tu pañcadhā vyasya saṁhitām vātsya-mudgala-śālīya- gokhalya-śiśireṣv adhāt

माण्डूकेय के पुत्र शाकल्य ने अपनी संहिता को पाँच भागों में विभाजित करके वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य और शिशिर को दी।

श्लोक 58 (bhagavata.12.6.58)

जातूकर्ण्यश्च तच्छिष्यः सनिरुक्तां स्वसंहिताम् । बलाकपैलजाबालविरजेभ्यो ददौ मुनिः ॥ ५८ ॥

jātūkarṇyaś ca tac-chiṣyaḥ sa-niruktāṁ sva-saṁhitām balāka-paila-jābāla- virajebhyo dadau muniḥ

शाकल्य के शिष्य जातूकर्ण्य ने निरुक्त सहित अपनी संहिता बलाक, दूसरे पैल, जाबाल और विरज को दी।

श्लोक 59 (bhagavata.12.6.59)

बाष्कलिः प्रतिशाखाभ्यो वालखिल्याख्यसंहिताम् । चक्रे वालायनिर्भज्यः काशारश्चैव तां दधुः ॥ ५९ ॥

bāṣkaliḥ prati-śākhābhyo vālakhilyākhya-saṁhitām cakre vālāyanir bhajyaḥ kāśāraś caiva tāṁ dadhuḥ

बाष्कलि ने विभिन्न शाखाओं से वालखिल्य नामक संहिता बनाई, जिसे वालायनि, भज्य और काशार ने धारण किया।

श्लोक 60 (bhagavata.12.6.60)

बह्वृचाः संहिता ह्येता एभिर्ब्रह्मर्षिभिर्धृताः । श्रुत्वैतच्छन्दसां व्यासं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥

bahvṛcāḥ saṁhitā hy etā ebhir brahmarṣibhir dhṛtāḥ śrutvaitac-chandasāṁ vyāsaṁ sarva-pāpaiḥ pramucyate

इस प्रकार इन ब्रह्मर्षियों द्वारा धारण की गई ये बह्वृच (ऋग्वेद) की संहिताएँ हैं। इस वेद-वितरण को सुनने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 61 (bhagavata.12.6.61)

वैशम्पायनशिष्या वै चरकाध्वर्यवोऽभवन् । यच्चेरुर्ब्रह्महत्यांहः क्षपणं स्वगुरोर्व्रतम् ॥ ६१ ॥

vaiśampāyana-śiṣyā vai carakādhvaryavo ’bhavan yac cerur brahma-hatyāṁhaḥ kṣapaṇaṁ sva-guror vratam

वैशम्पायन के शिष्य 'चरक' अध्वर्यु कहलाए, क्योंकि उन्होंने अपने गुरु के ब्रह्महत्या-पाप के प्रायश्चित हेतु कठोर व्रत का पालन किया था।

श्लोक 62 (bhagavata.12.6.62)

याज्ञवल्क्यश्च तच्छिष्य आहाहो भगवन् कियत् । चरितेनाल्पसाराणां चरिष्येऽहं सुदुश्चरम् ॥ ६२ ॥

yājñavalkyaś ca tac-chiṣya āhāho bhagavan kiyat caritenālpa-sārāṇāṁ cariṣye ’haṁ su-duścaram

उनके ही शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा — हे भगवन्, आपके इन अल्पसार शिष्यों के आचरण से क्या ही लाभ होगा? मैं स्वयं अत्यंत कठिन तपस्या करूँगा।

श्लोक 63 (bhagavata.12.6.63)

इत्युक्तो गुरुरप्याह कुपितो याह्यलं त्वया । विप्रावमन्त्रा शिष्येण मदधीतं त्यजाश्विति ॥ ६३ ॥

ity ukto gurur apy āha kupito yāhy alaṁ tvayā viprāvamantrā śiṣyeṇa mad-adhītaṁ tyajāśv iti

यह सुनकर क्रुद्ध गुरु ने कहा — जाओ, तुम्हारी अब आवश्यकता नहीं! हे ब्राह्मणों का अनादर करने वाले शिष्य, तुरन्त मेरे द्वारा पढ़ाया हुआ सब कुछ लौटा दो।

श्लोक 64 (bhagavata.12.6.64)

देवरातसुतः सोऽपि छर्दित्वा यजुषां गणम् । ततो गतोऽथ मुनयो ददृशुस्तान् यजुर्गणान् ॥ ६४ ॥

devarāta-sutaḥ so ’pi charditvā yajuṣāṁ gaṇam tato gato ’tha munayo dadṛśus tān yajur-gaṇān

देवरात के पुत्र याज्ञवल्क्य ने यजुर्मंत्रों के समूह को वमन करके त्याग दिया और वहाँ से चले गए। तब वहाँ उपस्थित मुनियों ने उन यजुर्मंत्रों को देखा।

श्लोक 65 (bhagavata.12.6.65)

यजूंषि तित्तिरा भूत्वा तल्लोलुपतयाददुः । तैत्तिरीया इति यजुःशाखा आसन् सुपेशलाः ॥ ६५ ॥

yajūṁṣi tittirā bhūtvā tal-lolupatayādaduḥ taittirīyā iti yajuḥ- śākhā āsan su-peśalāḥ

लोभवश तित्तिर (तीतर) पक्षी का रूप धारण करके उन मुनियों ने उन यजुर्मंत्रों को ग्रहण किया; इसीलिए यजुर्वेद की वे अत्यंत सुन्दर शाखाएँ 'तैत्तिरीय' कहलाईं।

श्लोक 66 (bhagavata.12.6.66)

याज्ञवल्क्यस्ततो ब्रह्मंश्छन्दांस्यधिगवेषयन् । गुरोरविद्यमानानि सूपतस्थेऽर्कमीश्वरम् ॥ ६६ ॥

yājñavalkyas tato brahmaṁś chandāṁsy adhi gaveṣayan guror avidyamānāni sūpatasthe ’rkam īśvaram

हे ब्राह्मण, तब याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु के पास भी न रहे ऐसे मंत्रों की खोज करते हुए, ईश्वर-स्वरूप सूर्य की भलीभाँति उपासना की।

श्लोक 67 (bhagavata.12.6.67)

श्रीयाज्ञवल्क्य उवाच ॐ नमो भगवते आदित्यायाखिलजगतामात्मस्वरूपेण कालस्वरूपेण चतुर्विधभूतनिकायानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामन्तर्हृदयेषु बहिरपि चाकाश इवोपाधिनाव्यवधीयमानो भवानेक एव क्षणलवनिमेषावयवोपचितसंवत्सरगणेनापामादान विसर्गाभ्यामिमां लोकयात्रामनुवहति ॥ ६७ ॥

śrī-yājñavalkya uvāca oṁ namo bhagavate ādityāyākhila-jagatām ātma-svarūpeṇa kāla-svarūpeṇa catur-vidha-bhūta-nikāyānāṁ brahmādi-stamba-paryantānām antar-hṛdayeṣu bahir api cākāśa ivopādhināvyavadhīyamāno bhavān eka eva kṣaṇa-lava-nimeṣāvayavopacita-saṁvatsara-gaṇenāpām ādāna- visargābhyām imāṁ loka-yātrām anuvahati.

श्री याज्ञवल्क्य ने कहा — ॐ, भगवान आदित्य को नमस्कार है, जो समस्त जगत के आत्मस्वरूप और काल-स्वरूप होकर, ब्रह्मा से लेकर तिनके तक चार प्रकार के प्राणी-समूहों के हृदयों में तथा बाहर भी, आकाश के समान उपाधियों से अनावृत होकर, क्षण, लव और निमेष के अंशों से बने संवत्सरों की गणना द्वारा, जल के ग्रहण और विसर्जन द्वारा, इस संसार-यात्रा का संचालन करते हैं।

श्लोक 68 (bhagavata.12.6.68)

यदु ह वाव विबुधर्षभ सवितरदस्तपत्यनुसवनमहर अहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिन बीजावभर्जन भगवतः समभिधीमहि तपन मण्डलम् ॥ ६८ ॥

yad u ha vāva vibudharṣabha savitar adas tapaty anusavanam ahar ahar āmnāya-vidhinopatiṣṭhamānānām akhila-durita-vṛjina- bījāvabharjana bhagavataḥ samabhidhīmahi tapana maṇḍalam.

हे देवश्रेष्ठ सवितः, जो आप प्रतिदिन प्रत्येक संध्या में उदित होकर तपते हैं, तथा जो वैदिक विधि से आपकी उपासना करने वालों के समस्त पाप-रूपी बीजों को भस्म कर देते हैं — हम आपके उस तपोमय मण्डल का ध्यान करते हैं।

श्लोक 69 (bhagavata.12.6.69)

य इह वाव स्थिरचरनिकराणां निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासु गणाननात्मनः स्वयमात्मान्तर्यामी प्रचोदयति ॥ ६९ ॥

ya iha vāva sthira-cara-nikarāṇāṁ nija-niketanānāṁ mana-indriyāsu-gaṇān anātmanaḥ svayam ātmāntar-yāmī pracodayati.

जो आप ही इस संसार में स्थावर और जंगम, अपने-अपने निवास स्थानों में स्थित प्राणियों के मन, इन्द्रियों और प्राणों को, स्वयं अन्तर्यामी आत्मा होकर, प्रेरित करते हैं,

श्लोक 70 (bhagavata.12.6.70)

य एवेमं लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रह गिलितं मृतकमिव विचेतनमवलोक्यानुकम्पया परमकारुणिक ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं श्रेयसि स्वधर्माख्यात्मावस्थाने प्रवर्तयति ॥ ७० ॥

ya evemaṁ lokam ati-karāla-vadanāndhakāra-saṁjñājagara-graha-gilitaṁ mṛtakam iva vicetanam avalokyānukampayā parama-kāruṇika īkṣayaivotthāpyāhar ahar anusavanaṁ śreyasi sva-dharmākhyātmāva-sthane pravartayati.

तथा जो आप, अत्यंत भयंकर मुख वाले अन्धकार-नामक अजगर द्वारा निगले गए, मृतक के समान अचेत इस लोक को दयापूर्वक देखकर, हे परम करुणामय, अपनी दृष्टि से ही उठाकर, प्रतिदिन प्रत्येक संध्या में उसे कल्याण की ओर, स्वधर्म नामक आत्म-स्थिति की ओर प्रवृत्त करते हैं,

श्लोक 71 (bhagavata.12.6.71)

अवनिपतिरिवासाधूनां भयमुदीरयन्नटति परित आशापालैस्तत्र तत्र कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः ॥ ७१ ॥

avani-patir ivāsādhūnāṁ bhayam udīrayann aṭati parita āśā-pālais tatra tatra kamala-kośāñjalibhir upahṛtārhaṇaḥ.

तथा जो आप, पृथ्वीपति राजा के समान, दुष्टों में भय उत्पन्न करते हुए सर्वत्र विचरण करते हैं, और जहाँ-तहाँ दिशाओं के पालक देवता आपको कमल-कोश के अंजलियों से अर्घ्य अर्पित करते हैं —

श्लोक 72 (bhagavata.12.6.72)

अथ ह भगवंस्तव चरणनलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिरभिवन्दितमहमयातयामयजुष्काम उपसरामीति ॥ ७२ ॥

atha ha bhagavaṁs tava caraṇa-nalina-yugalaṁ tri-bhuvana-gurubhir abhivanditam aham ayāta-yāma-yajuṣ-kāma upasarāmīti.

हे भगवन्, अब मैं आपके उन चरण-कमलों की शरण में आता हूँ, जो त्रिभुवन के गुरुजनों द्वारा भी वन्दित हैं, इस इच्छा से कि आप मुझे अब तक अनुच्चरित यजुर्मंत्र प्रदान करें।

श्लोक 73 (bhagavata.12.6.73)

सूत उवाच एवं स्तुतः स भगवान् वाजिरूपधरो रविः । यजूंष्ययातयामानि मुनयेऽदात् प्रसादितः ॥ ७३ ॥

sūta uvāca evaṁ stutaḥ sa bhagavān vāji-rūpa-dharo raviḥ yajūṁṣy ayāta-yāmāni munaye ’dāt prasāditaḥ

सूत ने कहा — इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, वे भगवान सूर्य, अश्व का रूप धारण करके, प्रसन्न होकर उन मुनि को अब तक अनुच्चरित यजुर्मंत्र प्रदान किए।

श्लोक 74 (bhagavata.12.6.74)

यजुर्भिरकरोच्छाखा दशपञ्च शतैर्विभुः । जगृहुर्वाजसन्यस्ताः काण्वमाध्यन्दिनादयः ॥ ७४ ॥

yajurbhir akaroc chākhā daśa pañca śatair vibhuḥ jagṛhur vājasanyas tāḥ kāṇva-mādhyandinādayaḥ

उन शक्तिशाली मुनि ने उन यजुर्मंत्रों से पन्द्रह शाखाओं की रचना की; अश्व की अयाल से उत्पन्न होने के कारण 'वाजसनेयी' कहलाई ये शाखाएँ काण्व, माध्यन्दिन आदि द्वारा ग्रहण की गईं।

श्लोक 75 (bhagavata.12.6.75)

जैमिनेः सामगस्यासीत् सुमन्तुस्तनयो मुनिः । सुत्वांस्तु तत्सुतस्ताभ्यामेकैकां प्राह संहिताम् ॥ ७५ ॥

jaimineḥ sama-gasyāsīt sumantus tanayo muniḥ sutvāṁs tu tat-sutas tābhyām ekaikāṁ prāha saṁhitām

सामवेद के ज्ञाता जैमिनि के सुमन्तु नामक मुनि पुत्र थे, और सुमन्तु के पुत्र सुत्वान थे। जैमिनि ने इन दोनों को अलग-अलग एक-एक संहिता सुनाई।

श्लोक 76 (bhagavata.12.6.76)

सुकर्मा चापि तच्छिष्यः सामवेदतरोर्महान् । सहस्रसंहिताभेदं चक्रे साम्नां ततो द्विज ॥ ७६ ॥

sukarmā cāpi tac-chiṣyaḥ sāma-veda-taror mahān sahasra-saṁhitā-bhedaṁ cakre sāmnāṁ tato dvija

हे द्विज, उनके ही एक अन्य शिष्य, महान विद्वान सुकर्मा ने सामवेद रूपी विशाल वृक्ष को एक हज़ार संहिताओं में विभाजित किया।

श्लोक 77 (bhagavata.12.6.77)

हिरण्यनाभः कौशल्यः पौष्यञ्जिश्च सुकर्मणः । शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तमः ॥ ७७ ॥

hiraṇyanābhaḥ kauśalyaḥ pauṣyañjiś ca sukarmaṇaḥ śiṣyau jagṛhatuś cānya āvantyo brahma-vittamaḥ

सुकर्मा के शिष्य कुशल-पुत्र हिरण्यनाभ और पौष्यंजि ने, तथा ब्रह्मज्ञान में श्रेष्ठ एक अन्य शिष्य आवन्त्य ने भी उन संहिताओं को ग्रहण किया।

श्लोक 78 (bhagavata.12.6.78)

उदीच्याः सामगाः शिष्या आसन् पञ्चशतानि वै । पौष्यञ्ज्यावन्त्ययोश्चापि तांश्च प्राच्यान् प्रचक्षते ॥ ७८ ॥

udīcyāḥ sāma-gāḥ śiṣyā āsan pañca-śatāni vai pauṣyañjy-āvantyayoś cāpi tāṁś ca prācyān pracakṣate

पौष्यंजि और आवन्त्य के पाँच सौ शिष्य 'उदीच्य' (उत्तरी) सामगायक कहलाए, और उन्हीं में से कुछ बाद में 'प्राच्य' (पूर्वी) भी कहलाए।

श्लोक 79 (bhagavata.12.6.79)

लौगाक्षिर्माङ्गलिः कुल्यः कुशीदः कुक्षिरेव च । पौष्यञ्जिशिष्या जगृहुः संहितास्ते शतं शतम् ॥ ७९ ॥

laugākṣir māṅgaliḥ kulyaḥ kuśīdaḥ kukṣir eva ca pauṣyañji-śiṣyā jagṛhuḥ saṁhitās te śataṁ śatam

पौष्यंजि के शिष्य लौगाक्षि, माङ्गलि, कुल्य, कुशीद और कुक्षि — इन सबने सौ-सौ संहिताएँ ग्रहण कीं।

श्लोक 80 (bhagavata.12.6.80)

कृतो हिरण्यनाभस्य चतुर्विंशतिसंहिताः । शिष्य ऊचे स्वशिष्येभ्यः शेषा आवन्त्य आत्मवान् ॥ ८० ॥

kṛto hiraṇyanābhasya catur-viṁśati saṁhitāḥ śiṣya ūce sva-śiṣyebhyaḥ śeṣā āvantya ātmavān

हिरण्यनाभ के शिष्य कृत ने अपने शिष्यों को चौबीस संहिताएँ सुनाईं, और शेष संहिताएँ आत्मसंयमी आवन्त्य ने अपने शिष्यों को सुनाईं।

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