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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7

पौराणिक साहित्य

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (bhagavata.12.7.1)

सूत उवाच अथर्ववित्सुमन्तुश्च शिष्यमध्यापयत् स्वकाम् । संहितां सोऽपि पथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान् ॥ १ ॥

sūta uvāca atharva-vit sumantuś ca śiṣyam adhyāpayat svakām saṁhitāṁ so ’pi pathyāya vedadarśāya coktavān

सूत जी ने कहा — अथर्ववेद के ज्ञाता सुमन्तु ऋषि ने अपनी संहिता अपने शिष्य को पढ़ाई, और उस शिष्य ने आगे पथ्य तथा वेददर्श को वह संहिता सुनाई।

श्लोक 2 (bhagavata.12.7.2)

शौक्लायनिर्ब्रह्मबलिर्मोदोषः पिप्पलायनिः । वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो शृणु । कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्चाप्यथर्ववित् ॥ २ ॥

śauklāyanir brahmabalir modoṣaḥ pippalāyaniḥ vedadarśasya śiṣyās te pathya-śiṣyān atho śṛṇu kumudaḥ śunako brahman jājaliś cāpy atharva-vit

शौक्लायनि, ब्रह्मबलि, मोदोष तथा पिप्पलायनि — ये वेददर्श के शिष्य थे। अब हे ब्राह्मण! पथ्य के शिष्यों को सुनो — कुमुद, शुनक तथा जाजलि, जो स्वयं भी अथर्ववेद के ज्ञाता थे।

श्लोक 3 (bhagavata.12.7.3)

बभ्रुः शिष्योऽथाङ्गिरसः सैन्धवायन एव च । अधीयेतां संहिते द्वे सावर्णाद्यास्तथापरे ॥ ३ ॥

babhruḥ śiṣyo ’thāṅgirasaḥ saindhavāyana eva ca adhīyetāṁ saṁhite dve sāvarṇādyās tathāpare

बभ्रु तथा सैन्धवायन ने आगे चलकर आङ्गिरस की दो संहिताओं का अध्ययन किया; और सावर्ण आदि अन्य शिष्यों ने भी उन्हीं संहिताओं का अध्ययन किया।

श्लोक 4 (bhagavata.12.7.4)

नक्षत्रकल्पः शान्तिश्च कश्यपाङ्गिरसादयः । एते आथर्वणाचार्याः शृणु पौराणिकान् मुने ॥ ४ ॥

nakṣatrakalpaḥ śāntiś ca kaśyapāṅgirasādayaḥ ete ātharvaṇācāryāḥ śṛṇu paurāṇikān mune

नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आङ्गिरस आदि — ये सब अथर्ववेद-परम्परा के आचार्य थे। अब हे मुने! पौराणिक आचार्यों को सुनो।

श्लोक 5 (bhagavata.12.7.5)

त्रय्यारुणिः कश्यपश्च सावर्णिरकृतव्रणः । वैशम्पायनहारीतौ षड् वै पौराणिका इमे ॥ ५ ॥

trayyāruṇiḥ kaśyapaś ca sāvarṇir akṛtavraṇaḥ vaiśampāyana-hārītau ṣaḍ vai paurāṇikā ime

त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, वैशम्पायन तथा हारीत — ये छह पौराणिक आचार्य हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.12.7.6)

अधीयन्त व्यासशिष्यात् संहितां मत्पितुर्मुखात् । एकैकामहमेतेषां शिष्यः सर्वाः समध्यगाम् ॥ ६ ॥

adhīyanta vyāsa-śiṣyāt saṁhitāṁ mat-pitur mukhāt ekaikām aham eteṣāṁ śiṣyaḥ sarvāḥ samadhyagām

इन छहों में से प्रत्येक ने व्यास जी के शिष्य, मेरे पिता के मुख से, एक-एक संहिता का अध्ययन किया। मैं इन सबका शिष्य बनकर उन सभी संहिताओं में पारंगत हो गया।

श्लोक 7 (bhagavata.12.7.7)

कश्यपोऽहं च सावर्णी रामशिष्योऽकृतव्रणः । अधीमहि व्यासशिष्याच्चत्वारो मूलसंहिताः ॥ ७ ॥

kaśyapo ’haṁ ca sāvarṇī rāma-śiṣyo ’kṛtavraṇaḥ adhīmahi vyāsa-śiṣyāc catvāro mūla-saṁhitāḥ

कश्यप, मैं स्वयं, सावर्णि, तथा राम के शिष्य अकृतव्रण — हम चारों ने व्यास जी के शिष्य से चार मूल संहिताओं का अध्ययन किया।

श्लोक 8 (bhagavata.12.7.8)

पुराणलक्षणं ब्रह्मन् ब्रह्मर्षिभिर्निरूपितम् । शृणुष्व बुद्धिमाश्रित्य वेदशास्त्रानुसारतः ॥ ८ ॥

purāṇa-lakṣaṇaṁ brahman brahmarṣibhir nirūpitam śṛṇuṣva buddhim āśritya veda-śāstrānusārataḥ

हे ब्रह्मन्! अब बुद्धिपूर्वक, वेदशास्त्र के अनुसार, ब्रह्मर्षियों द्वारा निरूपित पुराण के लक्षणों को सुनो।

श्लोक 9 (bhagavata.12.7.9)

सर्गोऽस्याथ विसर्गश्च वृत्तिरक्षान्तराणि च । वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ ९ ॥

sargo ’syātha visargaś ca vṛtti-rakṣāntarāṇi ca vaṁśo vaṁśānucaritaṁ saṁsthā hetur apāśrayaḥ

सर्ग (प्राथमिक सृष्टि), विसर्ग (गौण सृष्टि), वृत्ति (जीवन-निर्वाह), रक्षा, अन्तर (मन्वन्तर), वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु, तथा अपाश्रय (परम आश्रय) —

श्लोक 10 (bhagavata.12.7.10)

दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः । केचित् पञ्चविधं ब्रह्मन् महदल्पव्यवस्थया ॥ १० ॥

daśabhir lakṣaṇair yuktaṁ purāṇaṁ tad-vido viduḥ kecit pañca-vidhaṁ brahman mahad-alpa-vyavasthayā

— इन दस लक्षणों से युक्त ग्रन्थ को जानकार लोग पुराण कहते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, हे ब्रह्मन्! बड़े और छोटे पुराणों के भेद से यह लक्षण पाँच प्रकार का भी हो सकता है।

श्लोक 11 (bhagavata.12.7.11)

अव्याकृतगुणक्षोभान्महतत्रिस्त्रवृतोऽहमः । भूतसूक्ष्मेन्द्रियार्थानां सम्भवः सर्ग उच्यते ॥ ११ ॥

avyākṛta-guṇa-kṣobhān mahatas tri-vṛto ’hamaḥ bhūta-sūkṣmendriyārthānāṁ sambhavaḥ sarga ucyate

अव्यक्त प्रकृति में गुणों के क्षोभ से महत्तत्त्व उत्पन्न होता है, और उससे त्रिविध अहंकार। इससे सूक्ष्म भूत, इन्द्रियाँ तथा उनके विषय उत्पन्न होते हैं — इस उत्पत्ति-क्रम को सर्ग कहा जाता है।

श्लोक 12 (bhagavata.12.7.12)

पुरुषानुगृहीतानामेतेषां वासनामयः । विसर्गोऽयं समाहारो बीजाद् बीजं चराचरम् ॥ १२ ॥

puruṣānugṛhītānām eteṣāṁ vāsanā-mayaḥ visargo ’yaṁ samāhāro bījād bījaṁ carācaram

पुरुष की कृपा से अनुगृहीत इन तत्त्वों का समुदाय, जो वासनाओं से बना है, विसर्ग कहलाता है, जिसमें बीज से बीज के क्रम में चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.12.7.13)

वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च । कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्चोदनयापि वा ॥ १३ ॥

vṛttir bhūtāni bhūtānāṁ carāṇām acarāṇi ca kṛtā svena nṛṇāṁ tatra kāmāc codanayāpi vā

वृत्ति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा चर प्राणी अचर प्राणियों पर आश्रित होकर जीवन-यापन करते हैं; मनुष्यों के लिए यह विशेष रूप से अपनी प्रकृति के अनुरूप जीविका है, जो इच्छा से अथवा शास्त्र-आज्ञा से की जाती है।

श्लोक 14 (bhagavata.12.7.14)

रक्षाच्युतावतारेहा विश्वस्यानु युगे युगे । तिर्यङ्मर्त्यर्षिदेवेषु हन्यन्ते यैस्त्रयीद्विषः ॥ १४ ॥

rakṣācyutāvatārehā viśvasyānu yuge yuge tiryaṅ-martyarṣi-deveṣu hanyante yais trayī-dviṣaḥ

रक्षा का अर्थ है भगवान अच्युत के अवतारों की लीलाएँ, जो युग-युग में पशु, मनुष्य, ऋषि तथा देवताओं में प्रकट होकर वेद-धर्म के शत्रुओं का संहार करते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.12.7.15)

मन्वन्तरं मनुर्देवा मनुपुत्राः सुरेश्वराः । ऋषयोऽशांवताराश्च हरेः षड्विधमुच्यते ॥ १५ ॥

manvantaraṁ manur devā manu-putrāḥ sureśvarāḥ ṛṣayo ’ṁśāvatārāś ca hareḥ ṣaḍ-vidham ucyate

मन्वन्तर को छह अंगों वाला कहा गया है — मनु, देवगण, मनु के पुत्र, देवताओं के स्वामी इन्द्र, ऋषिगण, तथा भगवान हरि के अंशावतार।

श्लोक 16 (bhagavata.12.7.16)

राज्ञां ब्रह्मप्रसूतानां वंश त्रैकालिकोऽन्वयः । वंशानुचरितं तेषां वृत्तं वंशधराश्च ये ॥ १६ ॥

rājñāṁ brahma-prasūtānāṁ vaṁśas trai-kāliko ’nvayaḥ vaṁśānucaritaṁ teṣāṁ vṛttaṁ vaṁśa-dharās ca ye

वंश का अर्थ है ब्रह्मा से उत्पन्न राजाओं की त्रैकालिक निरन्तर परम्परा; और वंशानुचरित उन राजाओं तथा वंश को धारण करने वालों के आचरण का वर्णन है।

श्लोक 17 (bhagavata.12.7.17)

नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लयः । संस्थेति कविभिः प्रोक्तश्चतुर्धास्य स्वभावतः ॥ १७ ॥

naimittikaḥ prākṛtiko nitya ātyantiko layaḥ saṁstheti kavibhiḥ proktaś caturdhāsya svabhāvataḥ

प्रलय को विद्वानों ने अपने स्वभाव के अनुसार चार प्रकार का बताया है — नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य, तथा आत्यन्तिक।

श्लोक 18 (bhagavata.12.7.18)

हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः । यं चानुशायिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे ॥ १८ ॥

hetur jīvo ’sya sargāder avidyā-karma-kārakaḥ yaṁ cānuśāyinaṁ prāhur avyākṛtam utāpare

इस सृष्टि आदि का कारण जीव है, जो अविद्यावश कर्म करता है; कुछ इसे 'अनुशायी' कहते हैं, तो कुछ इसे अव्यक्त कहते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.12.7.19)

व्यतिरेकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । मायामयेषु तद् ब्रह्म जीववृत्तिष्वपाश्रयः ॥ १९ ॥

vyatirekānvayo yasya jāgrat-svapna-suṣuptiṣu māyā-mayeṣu tad brahma jīva-vṛttiṣv apāśrayaḥ

जो ब्रह्म जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति की मायामय अवस्थाओं में व्याप्त रहते हुए भी उनसे पृथक् है, वही जीव की वृत्तियों का परम आश्रय है।

श्लोक 20 (bhagavata.12.7.20)

पदार्थेषु यथा द्रव्यं सन्मात्रं रूपनामसु । बीजादिपञ्चतान्तासु ह्यवस्थासु युतायुतम् ॥ २० ॥

padārtheṣu yathā dravyaṁ san-mātraṁ rūpa-nāmasu bījādi-pañcatāntāsu hy avasthāsu yutāyutam

जैसे किसी वस्तु के बदलते नाम-रूप के भीतर द्रव्य केवल सत्तामात्र रूप में स्थित रहता है, वैसे ही वह परम तत्त्व बीज से लेकर पञ्चतत्त्व में विलय तक की समस्त अवस्थाओं में युक्त और पृथक् दोनों रूपों में विद्यमान रहता है।

श्लोक 21 (bhagavata.12.7.21)

विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम् । योगेन वा तदात्मानं वेदेहाया निवर्तते ॥ २१ ॥

virameta yadā cittaṁ hitvā vṛtti-trayaṁ svayam yogena vā tadātmānaṁ vedehāyā nivartate

जब चित्त स्वयं अथवा योग के अभ्यास से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीनों वृत्तियों से निवृत्त हो जाता है, तब मनुष्य आत्मा को जानकर सांसारिक चेष्टा से उपरत हो जाता है।

श्लोक 22 (bhagavata.12.7.22)

एवंलक्षणलक्ष्याणि पुराणानि पुराविदः । मुनयोऽष्टादश प्राहुः क्षुल्लकानि महान्ति च ॥ २२ ॥

evaṁ lakṣaṇa-lakṣyāṇi purāṇāni purā-vidaḥ munayo ’ṣṭādaśa prāhuḥ kṣullakāni mahānti ca

प्राचीन इतिहास के ज्ञाता मुनियों ने कहा है कि इन लक्षणों से युक्त पुराण अठारह महापुराण तथा अठारह उपपुराण के रूप में हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.12.7.23)

ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं लैङ्गं सगारुडं । नारदीयं भागवतमाग्नेयं स्कान्दसंज्ञितम् ॥ २३ ॥

brāhmaṁ pādmaṁ vaiṣṇavaṁ ca śaivaṁ laiṅgaṁ sa-gāruḍaṁ nāradīyaṁ bhāgavatam āgneyaṁ skānda-saṁjñitam

ब्रह्म, पद्म, वैष्णव, शैव, लैंग तथा गारुड पुराण; नारदीय, भागवत, आग्नेय, तथा स्कन्द नामक पुराण —

श्लोक 24 (bhagavata.12.7.24)

भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं सवामनम् । वाराहं मात्स्यं कौर्मं च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट् ॥ २४ ॥

bhaviṣyaṁ brahma-vaivartaṁ mārkaṇḍeyaṁ sa-vāmanam vārāhaṁ mātsyaṁ kaurmaṁ ca brahmāṇḍākhyam iti tri-ṣaṭ

— भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय तथा वामन; वाराह, मात्स्य, कौर्म, तथा ब्रह्माण्ड नामक पुराण के साथ — इस प्रकार ये अठारह पुराण हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.12.7.25)

ब्रह्मन्निदं समाख्यातं शाखाप्रणयनं मुनेः । शिष्यशिष्यप्रशिष्याणां ब्रह्मतेजोविवर्धनम् ॥ २५ ॥

brahmann idaṁ samākhyātaṁ śākhā-praṇayanaṁ muneḥ śiṣya-śiṣya-praśiṣyāṇāṁ brahma-tejo-vivardhanam

हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने मुनि व्यास की शाखाओं के शिष्य, प्रशिष्य आदि में हुए विस्तार का वर्णन किया है, जो सुनने वालों के ब्रह्मतेज को बढ़ाने वाला है।

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