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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9

भगवद्वाणी के आधार पर दिया गया उत्तर

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.2.9.1)

श्रीशुक उवाच आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्नद्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ 9.1 ॥

śrī-śuka uvāca ātma-māyām ṛte rājan parasyānubhavātmanaḥ na ghaṭetārtha-sambandhaḥ svapna-draṣṭur ivāñjasā

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! अपनी माया के बिना, जिनका स्वरूप शुद्ध अनुभव-मात्र है उस परमात्मा का किसी वस्तु से वास्तविक सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता — जैसे स्वप्न देखने वाले का स्वप्न की वस्तुओं से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता।

श्लोक 2 (bhagavata.2.9.2)

बहुरूप इवाभाति मायया बहुरूपया । रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ 9.2 ॥

bahu-rūpa ivābhāti māyayā bahu-rūpayā ramamāṇo guṇeṣv asyā mamāham iti manyate

बहुरूपिणी माया के द्वारा जीव मानो अनेक रूपों में प्रतीत होता है; उसके गुणों में रमण करते हुए वह 'मैं' और 'मेरा' — ऐसा मानने लगता है।

श्लोक 3 (bhagavata.2.9.3)

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः । रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ 9.3 ॥

yarhi vāva mahimni sve parasmin kāla-māyayoḥ rameta gata-sammohas tyaktvodāste tadobhayam

किन्तु जब वह काल तथा माया से परे, अपनी ही महिमा में स्थित हो जाता है — मोह से रहित होकर — तब दोनों भ्रान्तियों को त्यागकर वह उदासीन रहता है।

श्लोक 4 (bhagavata.2.9.4)

आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम् । ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ 9.4 ॥

ātma-tattva-viśuddhy-arthaṁ yad āha bhagavān ṛtam brahmaṇe darśayan rūpam avyalīka-vratādṛtaḥ

आत्म-तत्त्व की शुद्धि के लिए, ब्रह्मा के निष्कपट व्रत का सम्मान करते हुए, भगवान ने अपना रूप दिखाते हुए सत्य वचन कहे।

श्लोक 5 (bhagavata.2.9.5)

स आदिदेवो जगतां परो गुरुः स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत । तां नाध्यगच्छद् दृशमत्र सम्मतां प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् ॥ 9.5 ॥

sa ādi-devo jagatāṁ paro guruḥ svadhiṣṇyam āsthāya sisṛkṣayaikṣata tāṁ nādhyagacchad dṛśam atra sammatāṁ prapañca-nirmāṇa-vidhir yayā bhavet

वह आदिदेव, जगत के परम गुरु, अपने कमलासन पर बैठे हुए सृष्टि की इच्छा से चारों ओर देखने लगे; किन्तु उन्हें वह उचित दृष्टि नहीं मिली जिससे विश्व-रचना की विधि प्राप्त हो सके।

श्लोक 6 (bhagavata.2.9.6)

स चिन्तयन् द्वयक्षरमेकदाम्भ- स्युपाशृणोद् द्विर्गदितं वचो विभुः । स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं निष्किञ्चनानां नृप यद् धनं विदुः ॥ 9.6 ॥

sa cintayan dvy-akṣaram ekadāmbhasy upāśṛṇod dvir-gaditaṁ vaco vibhuḥ sparśeṣu yat ṣoḍaśam ekaviṁśaṁ niṣkiñcanānāṁ nṛpa yad dhanaṁ viduḥ

इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन प्रभावशाली ब्रह्मा ने एक बार जल में से दो अक्षरों वाला एक शब्द दो बार उच्चारित होते सुना — स्पर्श-वर्णों में सोलहवाँ तथा इक्कीसवाँ अक्षर मिलकर बना वह शब्द, जो हे राजन्, अकिंचनों के धन के रूप में जाना जाता है।

श्लोक 7 (bhagavata.2.9.7)

निशम्य तद्वक्तृदिदृक्षया दिशो विलोक्य तत्रान्यदपश्यमानः । स्वधिष्ण्यमास्थाय विमृश्य तद्धितं तपस्युपादिष्ट इवादधे मनः ॥ 9.7 ॥

niśamya tad-vaktṛ-didṛkṣayā diśo vilokya tatrānyad apaśyamānaḥ svadhiṣṇyam āsthāya vimṛśya tad-dhitaṁ tapasy upādiṣṭa ivādadhe manaḥ

इसे सुनकर, वक्ता को देखने की इच्छा से उन्होंने चारों दिशाओं में देखा; वहाँ अन्य किसी को न पाकर, वे अपने आसन पर पुनः स्थिर हो गए, और अपने हित का विचार करते हुए, मानो आदेश पाकर ही, तपस्या में अपना मन लगा दिया।

श्लोक 8 (bhagavata.2.9.8)

दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ 9.8 ॥

divyaṁ sahasrābdam amogha-darśano jitānilātmā vijitobhayendriyaḥ atapyata smākhila-loka-tāpanaṁ tapas tapīyāṁs tapatāṁ samāhitaḥ

एक हजार दिव्य वर्षों तक, अचूक दृष्टि वाले, प्राण तथा मन को वश में किए हुए, बाह्य एवं आन्तरिक दोनों इन्द्रियों को जीते हुए, गहन एकाग्रता से युक्त उन तपस्वियों में सर्वश्रेष्ठ ने ऐसी तपस्या की जो समस्त लोकों को तपा देने वाली थी।

श्लोक 9 (bhagavata.2.9.9)

तस्मै स्वलोकं भगवान् सभाजितः सन्दर्शयामास परं न यत्परम् । व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं स्वदृष्टवद्भिर्पुरुषैरभिष्टुतम् ॥ 9.9 ॥

tasmai sva-lokaṁ bhagavān sabhājitaḥ sandarśayām āsa paraṁ na yat-param vyapeta-saṅkleśa-vimoha-sādhvasaṁ sva-dṛṣṭavadbhir puruṣair abhiṣṭutam

इस प्रकार सम्मानित हुए उन्हें भगवान ने अपना परम धाम दिखाया, जिससे बढ़कर कुछ भी नहीं है — जो समस्त क्लेश, मोह तथा भय से रहित है, और जिसकी स्तुति उन्हीं पुरुषों द्वारा की जाती है जिन्होंने स्वयं उस दर्शन को प्राप्त किया है।

श्लोक 10 (bhagavata.2.9.10)

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ 9.10 ॥

pravartate yatra rajas tamas tayoḥ sattvaṁ ca miśraṁ na ca kāla-vikramaḥ na yatra māyā kim utāpare harer anuvratā yatra surāsurārcitāḥ

जहाँ न रजस् और न तमस् का प्रभाव है, न ही उनसे मिश्रित सत्त्व; जहाँ काल का पराक्रम भी नहीं चलता — जहाँ स्वयं माया का प्रवेश नहीं, तो अन्य किसी की क्या बिसात! — जहाँ उनके अनुयायी देव तथा असुर, दोनों द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.2.9.11)

श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः । सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि- प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥ 9.11 ॥

śyāmāvadātāḥ śata-patra-locanāḥ piśaṅga-vastrāḥ surucaḥ supeśasaḥ sarve catur-bāhava unmiṣan-maṇi- praveka-niṣkābharaṇāḥ suvarcasaḥ

श्याम वर्ण होते हुए भी उज्ज्वल, कमल-नेत्र, पीताम्बरधारी, मनोहर कान्ति तथा सुन्दर रूप वाले — वे सभी चतुर्भुज, चमकते हुए उत्तम रत्नों से जड़े आभूषणों से सुशोभित तथा तेजोमय थे।

श्लोक 12 (bhagavata.2.9.12)

प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसः । परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनः ॥ 9.12 ॥

pravāla-vaidūrya-mṛṇāla-varcasaḥ parisphurat-kuṇḍala-mauli-mālinaḥ

कोई मूँगे के समान, कोई वैदूर्य-मणि के समान, कोई कमल-नाल के समान वर्ण वाले थे; सभी चमकते कुण्डल, मुकुट तथा मालाओं से सुशोभित थे।

श्लोक 13 (bhagavata.2.9.13)

भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् । विद्योतमानः प्रमदोत्तमाद्युभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः ॥ 9.13 ॥

bhrājiṣṇubhir yaḥ parito virājate lasad-vimānāvalibhir mahātmanām vidyotamānaḥ pramadottamādyubhiḥ savidyud-abhrāvalibhir yathā nabhaḥ

वह धाम चारों ओर महात्माओं के देदीप्यमान विमान-समूहों से सुशोभित है, तथा श्रेष्ठ रमणियों आदि से देदीप्यमान है — ठीक जैसे मेघों की पंक्तियाँ बिजली के साथ मिलकर आकाश को सुशोभित करती हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.2.9.14)

श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः । प्रेङ्खं श्रिता या कुसुमाकरानुगै- र्विगीयमाना प्रियकर्म गायती ॥ 9.14 ॥

śrīr yatra rūpiṇy urugāya-pādayoḥ karoti mānaṁ bahudhā vibhūtibhiḥ preṅkhaṁ śritā yā kusumākarānugair vigīyamānā priya-karma-gāyatī

जहाँ साक्षात् श्री देवी, सर्वत्र कीर्तिमान भगवान के चरणों में अपनी विभूतियों से नाना प्रकार से सम्मान अर्पित करती हैं; झूले पर विराजमान, बसंत के अनुचर भ्रमरों से घिरी हुई, वे उनके द्वारा स्तुति की जाती हुई स्वयं भी उनके प्रिय कर्मों का गान करती हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.2.9.15)

ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं श्रियः पतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः स्वपार्षदाग्रैः परिसेवितं विभुम् ॥ 9.15 ॥

dadarśa tatrākhila-sātvatāṁ patiṁ śriyaḥ patiṁ yajña-patiṁ jagat-patim sunanda-nanda-prabalārhaṇādibhiḥ sva-pārṣadāgraiḥ parisevitaṁ vibhum

वहाँ उन्होंने समस्त सात्वतों के स्वामी, श्री के स्वामी, यज्ञ के स्वामी, जगत के स्वामी उन सर्वव्यापी प्रभु का दर्शन किया, जो अपने प्रमुख पार्षदों — सुनन्द, नन्द, प्रबल, अर्हण आदि — द्वारा सेवित थे।

श्लोक 16 (bhagavata.2.9.16)

भृत्यप्रसादाभिमुखं दृगासवं प्रसन्नहासारुणलोचनाननम् । किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं पीतांशुकं वक्षसि लक्षितं श्रिया ॥ 9.16 ॥

bhṛtya-prasādābhimukhaṁ dṛg-āsavaṁ prasanna-hāsāruṇa-locanānanam kirīṭinaṁ kuṇḍalinaṁ catur-bhujaṁ pītāṁśukaṁ vakṣasi lakṣitaṁ śriyā

अपने सेवकों के प्रति सदैव अनुग्रहशील, जिनकी दृष्टि मादक-सी है, प्रसन्न मुस्कान से उज्ज्वल मुख तथा अरुण नेत्रों वाले; मुकुट, कुण्डल धारण किए, चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, वक्षस्थल पर श्री-चिह्न से युक्त।

श्लोक 17 (bhagavata.2.9.17)

अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं वृतं चतुःषोडशपञ्चशक्तिभिः । युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः स्व एव धामन् रममाणमीश्वरम् ॥ 9.17 ॥

adhyarhaṇīyāsanam āsthitaṁ paraṁ vṛtaṁ catuḥ-ṣoḍaśa-pañca-śaktibhiḥ yuktaṁ bhagaiḥ svair itaratra cādhruvaiḥ sva eva dhāman ramamāṇam īśvaram

एक परम पूज्य सिंहासन पर विराजमान, अपनी चार, सोलह तथा पाँच शक्तियों से घिरे हुए, अपनी नित्य विभूतियों से युक्त — तथा अन्यत्र उनके क्षणभंगुर सांसारिक प्रतिरूपों से भी — वे भगवान स्वयं अपने ही धाम में विहार कर रहे थे।

श्लोक 18 (bhagavata.2.9.18)

तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुतान्तरो हृष्यत्तनुः प्रेमभराश्रुलोचनः । ननाम पादाम्बुजमस्य विश्वसृग् यत् पारमहंस्येन पथाधिगम्यते ॥ 9.18 ॥

tad-darśanāhlāda-pariplutāntaro hṛṣyat-tanuḥ prema-bharāśru-locanaḥ nanāma pādāmbujam asya viśva-sṛg yat pāramahaṁsyena pathādhigamyate

उस दर्शन के आनन्द से आप्लावित अन्तःकरण, रोमांचित शरीर, प्रेमातिरेक से अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले उन विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा ने उनके उन चरण-कमलों को प्रणाम किया, जो केवल परमहंसों के मार्ग से ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.2.9.19)

तं प्रीयमाणं समुपस्थितं कविं प्रजाविसर्गे निजशासनार्हणम् । बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा प्रियः प्रियं प्रीतमनाः करे स्पृशन् ॥ 9.19 ॥

taṁ prīyamāṇaṁ samupasthitaṁ kaviṁ prajā-visarge nija-śāsanārhaṇam babhāṣa īṣat-smita-śociṣā girā priyaḥ priyaṁ prīta-manāḥ kare spṛśan

अपने समक्ष उपस्थित, प्रसन्नचित्त, प्रजा-सृष्टि हेतु अपनी आज्ञा पाने के योग्य उन विद्वान ब्रह्मा को देखकर, स्नेहसिक्त-हृदय प्रिय भगवान ने उनका हाथ स्पर्श करते हुए, मन्द मुस्कान से युक्त वाणी में उनसे कहा।

श्लोक 20 (bhagavata.2.9.20)

श्रीभगवानुवाच त्वयाहं तोषितः सम्यग् वेदगर्भ सिसृक्षया । चिरं भृतेन तपसा दुस्तोषः कूटयोगिनाम् ॥ 9.20 ॥

śrī-bhagavān uvāca tvayāhaṁ toṣitaḥ samyag veda-garbha sisṛkṣayā ciraṁ bhṛtena tapasā dustoṣaḥ kūṭa-yoginām

भगवान ने कहा — हे वेदगर्भ! सृष्टि की इच्छा से तुमने जो दीर्घकालीन तपस्या की, उससे मैं तुमसे पूर्णतः संतुष्ट हूँ — मैं, जो पाखण्डी योगियों के लिए दुर्लभतः संतुष्ट होता हूँ।

श्लोक 21 (bhagavata.2.9.21)

वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम् । ब्रह्मञ्छ्रेयःपरिश्रामः पुंसां मद्दर्शनावधिः ॥ 9.21 ॥

varaṁ varaya bhadraṁ te vareśaṁ mābhivāñchitam brahmañ chreyaḥ-pariśrāmaḥ puṁsāṁ mad-darśanāvadhiḥ

वर माँगो; तुम्हारा कल्याण हो — मुझसे, समस्त वरों के स्वामी से, जो चाहो माँगो। हे ब्रह्मन्! मनुष्यों के समस्त कल्याणकारी प्रयासों की चरम सीमा मेरा दर्शन ही है।

श्लोक 22 (bhagavata.2.9.22)

मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् । यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ 9.22 ॥

manīṣitānubhāvo ’yaṁ mama lokāvalokanam yad upaśrutya rahasi cakartha paramaṁ tapaḥ

मेरे धाम का यह दर्शन तुम्हारी उसी अभिलाषा का फल है — क्योंकि एकान्त में उस शब्द को सुनकर तुमने सर्वोच्च तपस्या की।

श्लोक 23 (bhagavata.2.9.23)

प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते । तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ ॥ 9.23 ॥

pratyādiṣṭaṁ mayā tatra tvayi karma-vimohite tapo me hṛdayaṁ sākṣād ātmāhaṁ tapaso ’nagha

हे निष्पाप! जब तुम अपने कार्य के विषय में मोहित थे, तब वहाँ वह आदेश मैंने ही दिया था; तपस्या साक्षात् मेरा हृदय है — मैं स्वयं तपस्या की आत्मा हूँ।

श्लोक 24 (bhagavata.2.9.24)

सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तपः ॥ 9.24 ॥

sṛjāmi tapasaivedaṁ grasāmi tapasā punaḥ bibharmi tapasā viśvaṁ vīryaṁ me duścaraṁ tapaḥ

तपस्या से ही मैं इसकी सृष्टि करता हूँ, तपस्या से ही पुनः इसे लीन कर लेता हूँ, तपस्या से ही विश्व को धारण करता हूँ — मेरी शक्ति ही यह दुष्कर तप है।

श्लोक 25 (bhagavata.2.9.25)

ब्रह्मोवाच भगवन् सर्वभूतानामध्यक्षोऽवस्थितो गुहाम् । वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम् ॥ 9.25 ॥

brahmovāca bhagavan sarva-bhūtānām adhyakṣo ’vasthito guhām veda hy apratiruddhena prajñānena cikīrṣitam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे भगवन्! समस्त प्राणियों के हृदय में साक्षी-रूप में स्थित होकर, आप अपने अबाधित ज्ञान से यह जानते हैं कि प्रत्येक क्या करना चाहता है।

श्लोक 26 (bhagavata.2.9.26)

तथापि नाथमानस्य नाथ नाथय नाथितम् । परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः ॥ 9.26 ॥

tathāpi nāthamānasya nātha nāthaya nāthitam parāvare yathā rūpe jānīyāṁ te tv arūpiṇaḥ

फिर भी, हे नाथ! प्रार्थना करने वाले की प्रार्थना पूर्ण कीजिए — अर्थात् मुझे यह ज्ञात हो सके कि आप, रूपरहित होते हुए भी, उच्च और निम्न, दोनों प्रकार के रूपों में किस प्रकार प्रकट होते हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.2.9.27)

यथात्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम् । विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना ॥ 9.27 ॥

yathātma-māyā-yogena nānā-śakty-upabṛṁhitam vilumpan visṛjan gṛhṇan bibhrad ātmānam ātmanā

यह भी बताइए कि आप अपनी ही माया के प्रयोग से, अनेक शक्तियों से सम्पन्न होकर, किस प्रकार स्वयं को स्वयं ही द्वारा नष्ट करते हैं, उत्पन्न करते हैं, ग्रहण करते हैं तथा धारण करते हैं।

श्लोक 28 (bhagavata.2.9.28)

क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते । तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥ 9.28 ॥

krīḍasy amogha-saṅkalpa ūrṇanābhir yathorṇute tathā tad-viṣayāṁ dhehi manīṣāṁ mayi mādhava

हे माधव! आपका संकल्प कभी विफल नहीं होता — आप उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं जैसे मकड़ी अपने ही तार से जाल बुनती है; इस विषय में मुझे यह ज्ञान प्रदान कीजिए।

श्लोक 29 (bhagavata.2.9.29)

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः । नेहमानः प्रजासर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् ॥ 9.29 ॥

bhagavac-chikṣitam ahaṁ karavāṇi hy atandritaḥ nehamānaḥ prajā-sargaṁ badhyeyaṁ yad-anugrahāt

हे भगवन्! आपके द्वारा शिक्षित होकर मैं अथक भाव से कार्य करूँ, जिससे उस कृपा के प्रभाव से, प्रजा-सृष्टि में प्रवृत्त होते हुए भी, मैं बन्धन में न पड़ूँ।

श्लोक 30 (bhagavata.2.9.30)

यावत् सखा सख्युरिवेश ते कृतः प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् । अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिनः ॥ 9.30 ॥

yāvat sakhā sakhyur iveśa te kṛtaḥ prajā-visarge vibhajāmi bho janam aviklavas te parikarmaṇi sthito mā me samunnaddha-mado ’ja māninaḥ

हे ईश! आपने मुझे मित्र के समान मित्र बना लिया है — प्रजा की सृष्टि तथा विभाजन करते हुए मैं आपकी सेवा में स्थिर, अविचलित रहूँ; और मुझमें कभी यह अहंकार न उपजे कि मैं स्वयं अजन्मा परमेश्वर हूँ।

श्लोक 31 (bhagavata.2.9.31)

श्रीभगवानुवाच ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ 9.31 ॥

śrī-bhagavān uvāca jñānaṁ parama-guhyaṁ me yad vijñāna-samanvitam sarahasyaṁ tad-aṅgaṁ ca gṛhāṇa gaditaṁ mayā

भगवान ने कहा — मेरा वह ज्ञान, जो अत्यन्त गोपनीय है, विज्ञान (अनुभूति) से युक्त है, अपने रहस्य तथा अंगों सहित — मेरे द्वारा कहा जाता है, उसे ग्रहण करो।

श्लोक 32 (bhagavata.2.9.32)

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः । तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ 9.32 ॥

yāvān ahaṁ yathā-bhāvo yad-rūpa-guṇa-karmakaḥ tathaiva tattva-vijñānam astu te mad-anugrahāt

मैं जितना और जैसा हूँ, जिस रूप, गुण तथा कर्म से युक्त हूँ — उसी का यथार्थ तत्त्व-ज्ञान मेरी कृपा से तुम्हें प्राप्त हो।

श्लोक 33 (bhagavata.2.9.33)

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ 9.33 ॥

aham evāsam evāgre nānyad yat sad-asat param paścād ahaṁ yad etac ca yo ’vaśiṣyeta so ’smy aham

सृष्टि से पूर्व मैं ही अकेला था; उसके अतिरिक्त कारण या कार्य कुछ भी न था; उसके पश्चात् जो यह जगत है, वह भी मैं ही हूँ; और अन्त में जो शेष रह जाएगा, वह भी मैं ही हूँ।

श्लोक 34 (bhagavata.2.9.34)

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥ 9.34 ॥

ṛte ’rthaṁ yat pratīyeta na pratīyeta cātmani tad vidyād ātmano māyāṁ yathābhāso yathā tamaḥ

जो कुछ आत्मा से भिन्न सार्थक प्रतीत होता है, परन्तु आत्मा में जिसकी वास्तविक स्थिति नहीं पाई जाती — उसे आत्मा की ही माया समझो, जैसे कोई आभास, जैसे अन्धकार।

श्लोक 35 (bhagavata.2.9.35)

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ 9.35 ॥

yathā mahānti bhūtāni bhūteṣūccāvaceṣv anu praviṣṭāny apraviṣṭāni tathā teṣu na teṣv aham

जिस प्रकार महाभूत उच्च-नीच प्राणियों में प्रविष्ट होते हुए भी अप्रविष्ट रहते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनमें रहते हुए भी उनमें सीमित नहीं हूँ।

श्लोक 36 (bhagavata.2.9.36)

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ 9.36 ॥

etāvad eva jijñāsyaṁ tattva-jijñāsunātmanaḥ anvaya-vyatirekābhyāṁ yat syāt sarvatra sarvadā

आत्म-तत्त्व के जिज्ञासु को केवल इतना ही जानना है — वह, जो अन्वय तथा व्यतिरेक दोनों के द्वारा, सर्वत्र तथा सदैव विद्यमान रहता है।

श्लोक 37 (bhagavata.2.9.37)

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना । भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ॥ 9.37 ॥

etan mataṁ samātiṣṭha parameṇa samādhinā bhavān kalpa-vikalpeṣu na vimuhyati karhicit

इस सिद्धान्त में परम समाधि के द्वारा स्वयं को दृढ़तापूर्वक स्थापित करो; तब सृष्टि तथा प्रलय के बारम्बार चक्रों में भी तुम कभी मोहित नहीं होगे।

श्लोक 38 (bhagavata.2.9.38)

श्रीशुक उवाच सम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम् । पश्यतस्तस्य तद् रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः ॥ 9.38 ॥

śrī-śuka uvāca sampradiśyaivam ajano janānāṁ parameṣṭhinam paśyatas tasya tad rūpam ātmano nyaruṇad dhariḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — प्रजापति ब्रह्मा को इस प्रकार उपदेश देकर, अजन्मा हरि ने, उन्हीं के देखते-देखते, अपने उस रूप को समेट लिया।

श्लोक 39 (bhagavata.2.9.39)

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताञ्जलिः । सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ 9.39 ॥

antarhitendriyārthāya haraye vihitāñjaliḥ sarva-bhūtamayo viśvaṁ sasarjedaṁ sa pūrvavat

इस प्रकार इन्द्रियों की पहुँच से ओझल हो गए हरि को हाथ जोड़कर प्रणाम कर, समस्त प्राणियों में व्याप्त वे ब्रह्मा पूर्ववत् इस विश्व की पुनः सृष्टि करने लगे।

श्लोक 40 (bhagavata.2.9.40)

प्रजापतिर्धर्मपतिरेकदा नियमान् यमान् । भद्रं प्रजानामन्विच्छन्नातिष्ठत् स्वार्थकाम्यया ॥ 9.40 ॥

prajāpatir dharma-patir ekadā niyamān yamān bhadraṁ prajānām anvicchann ātiṣṭhat svārtha-kāmyayā

एक बार प्रजापति ब्रह्मा, धर्म के स्वामी, प्रजा के कल्याण की कामना से, उसी को अपना स्वार्थ मानकर, यम-नियमों का पालन करने लगे।

श्लोक 41 (bhagavata.2.9.41)

तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः । शुश्रूषमाणः शीलेन प्रश्रयेण दमेन च ॥ 9.41 ॥

taṁ nāradaḥ priyatamo rikthādānām anuvrataḥ śuśrūṣamāṇaḥ śīlena praśrayeṇa damena ca

उन्हीं ब्रह्मा के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक प्रिय, अनुगत पुत्र नारद ने सुशीलता, विनम्रता तथा इन्द्रिय-संयम के साथ उनकी सेवा की।

श्लोक 42 (bhagavata.2.9.42)

मायां विविदिषन् विष्णोर्मायेशस्य महामुनिः । महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ 9.42 ॥

māyāṁ vividiṣan viṣṇor māyeśasya mahā-muniḥ mahā-bhāgavato rājan pitaraṁ paryatoṣayat

मायापति विष्णु की माया को जानने की इच्छा से, हे राजन्, महामुनि तथा महान भागवत नारद ने अपने पिता को पूर्णतः संतुष्ट कर दिया।

श्लोक 43 (bhagavata.2.9.43)

तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम् । देवर्षिः परिपप्रच्छ भवान् यन्मानुपृच्छति ॥ 9.43 ॥

tuṣṭaṁ niśāmya pitaraṁ lokānāṁ prapitāmaham devarṣiḥ paripapraccha bhavān yan mānupṛcchati

अपने पिता, समस्त लोकों के प्रपितामह, को इस प्रकार संतुष्ट देखकर, देवर्षि नारद ने उन्हीं से वही प्रश्न पूछा, जो आप, हे राजन्, मुझसे पूछ रहे हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.2.9.44)

तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम् । प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत् ॥ 9.44 ॥

tasmā idaṁ bhāgavataṁ purāṇaṁ daśa-lakṣaṇam proktaṁ bhagavatā prāha prītaḥ putrāya bhūta-kṛt

उन्हीं को, दस लक्षणों से युक्त वह भागवत पुराण, जो स्वयं भगवान द्वारा कहा गया था — प्रजापति ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र से कहा।

श्लोक 45 (bhagavata.2.9.45)

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप । ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ 9.45 ॥

nāradaḥ prāha munaye sarasvatyās taṭe nṛpa dhyāyate brahma paramaṁ vyāsāyāmita-tejase

हे राजन्! नारद ने फिर वही ज्ञान सरस्वती नदी के तट पर परब्रह्म का ध्यान करते हुए अमित तेजस्वी मुनि व्यास से कहा।

श्लोक 46 (bhagavata.2.9.46)

यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात् पुरुषादिदम् । यथासीत्तदुपाख्यास्ते प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ 9.46 ॥

yad utāhaṁ tvayā pṛṣṭo vairājāt puruṣād idam yathāsīt tad upākhyāste praśnān anyāṁś ca kṛtsnaśaḥ

अब जो तुमने मुझसे पूछा था — कि यह विश्व विराट पुरुष से किस प्रकार उत्पन्न हुआ — वह सब, तुम्हारे अन्य प्रश्नों सहित, मैंने तुम्हें पूर्णतः बता दिया है।

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