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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12

ध्रुव महाराज की परमधाम-प्राप्ति

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (bhagavata.4.12.1)

मैत्रेय उवाच ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसा- दपेतमन्युं भगवान्धनेश्वरः । तत्रागतश्चारणयक्षकिन्नरैः संस्तूयमानो न्यवदत्कृताञ्जलिम् ॥ 12.1 ॥

maitreya uvāca dhruvaṁ nivṛttaṁ pratibuddhya vaiśasād apeta-manyuṁ bhagavān dhaneśvaraḥ tatrāgataś cāraṇa-yakṣa-kinnaraiḥ saṁstūyamāno nyavadat kṛtāñjalim

मैत्रेय ने कहा — जब भगवान धनेश्वर कुबेर को यह ज्ञात हुआ कि ध्रुव का क्रोध शान्त हो गया है और उसने संहार त्याग दिया है, तब वे चारण, यक्ष और किन्नरों द्वारा स्तुति किए जाते हुए वहाँ आए और हाथ जोड़े खड़े ध्रुव से बोले।

श्लोक 2 (bhagavata.4.12.2)

धनद उवाच भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ । यत्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः ॥ 12.2 ॥

dhanada uvāca bhoḥ bhoḥ kṣatriya-dāyāda parituṣṭo ’smi te ’nagha yat tvaṁ pitāmahādeśād vairaṁ dustyajam atyajaḥ

धनेश्वर ने कहा — हे निष्पाप क्षत्रिय-कुमार, मैं इससे प्रसन्न हूँ कि तुमने अपने पितामह के आदेश पर उस वैर को त्याग दिया जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 3 (bhagavata.4.12.3)

न भवानवधीद्यक्षान्न यक्षा भ्रातरं तव । काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः ॥ 12.3 ॥

na bhavān avadhīd yakṣān na yakṣā bhrātaraṁ tava kāla eva hi bhūtānāṁ prabhur apyaya-bhāvayoḥ

न तुमने यक्षों को मारा, न यक्षों ने तुम्हारे भाई को मारा — क्योंकि प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का वास्तविक स्वामी तो काल ही है।

श्लोक 4 (bhagavata.4.12.4)

अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात्पुरुषस्य हि । स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद्यया बन्धविपर्ययौ ॥ 12.4 ॥

ahaṁ tvam ity apārthā dhīr ajñānāt puruṣasya hi svāpnīvābhāty atad-dhyānād yayā bandha-viparyayau

"मैं" और "तू" की यह मिथ्या धारणा, जो देहाध्यास से उत्पन्न होती है, स्वप्न के समान असत् होते हुए भी सत्य प्रतीत होती है, और इसी के ध्यान से बन्धन तथा उससे विपरीत भाव उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.4.12.5)

तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥ 12.5 ॥

tad gaccha dhruva bhadraṁ te bhagavantam adhokṣajam sarva-bhūtātma-bhāvena sarva-bhūtātma-vigraham

अब जाओ ध्रुव, तुम्हारा कल्याण हो; उन इन्द्रियातीत भगवान के पास जाओ, जो सर्वभूतात्मरूप से प्रत्येक प्राणी में देहधारी होकर निवास करते हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.4.12.6)

भजस्व भजनीयाङ्घ्रि मभवाय भवच्छिदम् । युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्यात्ममायया ॥ 12.6 ॥

bhajasva bhajanīyāṅghrim abhavāya bhava-cchidam yuktaṁ virahitaṁ śaktyā guṇa-mayyātma-māyayā

उन पूजनीय चरणों की आराधना करो जो पुनर्जन्म से मुक्ति देते हैं और उसे सर्वथा काट देते हैं — वे भगवान अपनी त्रिगुणमयी माया से युक्त होकर भी सदा उससे रहित हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.4.12.7)

वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः । वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयो- रनन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम ॥ 12.7 ॥

vṛṇīhi kāmaṁ nṛpa yan mano-gataṁ mattas tvam auttānapade ’viśaṅkitaḥ varaṁ varārho ’mbuja-nābha-pādayor anantaraṁ tvāṁ vayam aṅga śuśruma

हे राजन्, उत्तानपाद-पुत्र, अपने हृदय की जो भी इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच माँगो; हमने सुना है कि तुम, वर पाने के योग्य होकर, कमलनाभ भगवान के चरणों में सदा तत्पर रहते हो।

श्लोक 8 (bhagavata.4.12.8)

मैत्रेय उवाच स राजराजेन वराय चोदितो ध्रुवो महाभागवतो महामतिः । हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया तरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः ॥ 12.8 ॥

maitreya uvāca sa rāja-rājena varāya codito dhruvo mahā-bhāgavato mahā-matiḥ harau sa vavre ’calitāṁ smṛtiṁ yayā taraty ayatnena duratyayaṁ tamaḥ

मैत्रेय ने आगे कहा — इस प्रकार राजराज द्वारा वर माँगने को कहे जाने पर, महान भागवत तथा प्रगाढ़ बुद्धि वाले ध्रुव ने हरि की अचल स्मृति ही माँगी, जिससे मनुष्य उस दुस्तर अन्धकार को बिना प्रयास ही पार कर जाता है।

श्लोक 9 (bhagavata.4.12.9)

तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः । पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥ 12.9 ॥

tasya prītena manasā tāṁ dattvaiḍaviḍas tataḥ paśyato ’ntardadhe so ’pi sva-puraṁ pratyapadyata

इडविडा के पुत्र कुबेर ने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें वह वर प्रदान किया और ध्रुव के देखते-देखते ही अन्तर्धान हो गए; ध्रुव भी अपने नगर को लौट गए।

श्लोक 10 (bhagavata.4.12.10)

अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम् ॥ 12.10 ॥

athāyajata yajñeśaṁ kratubhir bhūri-dakṣiṇaiḥ dravya-kriyā-devatānāṁ karma karma-phala-pradam

तत्पश्चात् उन्होंने द्रव्य, क्रिया और देवता से सम्पन्न, कर्मफल प्रदान करने वाले यज्ञों द्वारा यज्ञपति भगवान की आराधना की।

श्लोक 11 (bhagavata.4.12.11)

सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् । ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥ 12.11 ॥

sarvātmany acyute ’sarve tīvraughāṁ bhaktim udvahan dadarśātmani bhūteṣu tam evāvasthitaṁ vibhum

सर्वात्मा अच्युत भगवान के प्रति सघन एवं अनवरत भक्ति धारण करते हुए, उन्होंने उन्हीं सर्वव्यापी प्रभु को अपनी आत्मा में तथा समस्त प्राणियों में स्थित देखा।

श्लोक 12 (bhagavata.4.12.12)

तमेवं शीलसम्पन्नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम् । गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः ॥ 12.12 ॥

tam evaṁ śīla-sampannaṁ brahmaṇyaṁ dīna-vatsalam goptāraṁ dharma-setūnāṁ menire pitaraṁ prajāḥ

सद्गुणों से सम्पन्न, ब्राह्मणभक्त, दीनों पर करुणा करने वाले तथा धर्म की मर्यादा के रक्षक ध्रुव को प्रजा अपने पिता के समान मानती थी।

श्लोक 13 (bhagavata.4.12.13)

षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम् । भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन्नभोगैरशुभक्षयम् ॥ 12.13 ॥

ṣaṭ-triṁśad-varṣa-sāhasraṁ śaśāsa kṣiti-maṇḍalam bhogaiḥ puṇya-kṣayaṁ kurvann abhogair aśubha-kṣayam

उन्होंने छत्तीस हजार वर्षों तक पृथ्वी-मण्डल पर शासन किया, भोगों द्वारा अपने पुण्य के भण्डार को तथा तप द्वारा अशुभ के भण्डार को क्षीण करते हुए।

श्लोक 14 (bhagavata.4.12.14)

एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः । त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्नृपासनम् ॥ 12.14 ॥

evaṁ bahu-savaṁ kālaṁ mahātmāvicalendriyaḥ tri-vargaupayikaṁ nītvā putrāyādān nṛpāsanam

इस प्रकार वह महात्मा, इन्द्रिय-संयमी, बहुत वर्षों तक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का समुचित पालन कर, अन्ततः राजसिंहासन अपने पुत्र को सौंप दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.4.12.15)

मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि । अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ 12.15 ॥

manyamāna idaṁ viśvaṁ māyā-racitam ātmani avidyā-racita-svapna- gandharva-nagaropamam

और इस विश्व को माया द्वारा अपने भीतर रचित, अविद्या से निर्मित स्वप्न अथवा गन्धर्वनगर के समान मानते हुए,

श्लोक 16 (bhagavata.4.12.16)

आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश- मन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्याः । भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम् ॥ 12.16 ॥

ātma-stry-apatya-suhṛdo balam ṛddha-kośam antaḥ-puraṁ parivihāra-bhuvaś ca ramyāḥ bhū-maṇḍalaṁ jaladhi-mekhalam ākalayya kālopasṛṣṭam iti sa prayayau viśālām

इस प्रकार अपनी देह, पत्नी, संतान, मित्रों, सेना, समृद्ध कोश, अन्तःपुर, रमणीय विहार-स्थलों तथा सागर-वलयित सम्पूर्ण भूमण्डल को काल-रचित मानकर वे विशाला (बदरिकाश्रम) की ओर चल पड़े।

श्लोक 17 (bhagavata.4.12.17)

तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य बद्ध्वासनं जितमरुन्मनसाहृताक्षः । स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद् ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ ॥ 12.17 ॥

tasyāṁ viśuddha-karaṇaḥ śiva-vār vigāhya baddhvāsanaṁ jita-marun manasāhṛtākṣaḥ sthūle dadhāra bhagavat-pratirūpa etad dhyāyaṁs tad avyavahito vyasṛjat samādhau

वहाँ पवित्र जल में स्नान कर, इन्द्रियों को पूर्णतः शुद्ध कर, स्थिर आसन में बैठकर, प्राणवायु को जीतकर, नेत्र आदि इन्द्रियों से मन को समेटकर, तथा भगवान की स्थूल प्रतिरूप मूर्ति को हृदय में धारण कर, निरन्तर उसी का ध्यान करते हुए वे समाधि में लीन हो गए।

श्लोक 18 (bhagavata.4.12.18)

भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र- मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः । विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्गः ॥ 12.18 ॥

bhaktiṁ harau bhagavati pravahann ajasram ānanda-bāṣpa-kalayā muhur ardyamānaḥ viklidyamāna-hṛdayaḥ pulakācitāṅgo nātmānam asmarad asāv iti mukta-liṅgaḥ

भगवान हरि के प्रति अविरल भक्ति प्रवाहित करते हुए, आनन्दाश्रुओं से बारंबार अभिभूत, द्रवित हृदय तथा पुलकित शरीर वाले वे इस प्रकार परिवर्तित होकर अपने देहभाव को भूल गए, और इस प्रकार उनके भौतिक बन्धन कट गए।

श्लोक 19 (bhagavata.4.12.19)

स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुवः । विभ्राजयद्दश दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥ 12.19 ॥

sa dadarśa vimānāgryaṁ nabhaso ’vatarad dhruvaḥ vibhrājayad daśa diśo rākāpatim ivoditam

तब ध्रुव ने आकाश से उतरता हुआ एक अत्यन्त भव्य विमान देखा, जो दसों दिशाओं को उसी प्रकार आलोकित कर रहा था मानो साक्षात् पूर्णिमा का चन्द्रमा उदित हुआ हो।

श्लोक 20 (bhagavata.4.12.20)

तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ । स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ किरीटहाराङ्गदचारुकुण्डलौ ॥ 12.20 ॥

tatrānu deva-pravarau catur-bhujau śyāmau kiśorāv aruṇāmbujekṣaṇau sthitāv avaṣṭabhya gadāṁ suvāsasau kirīṭa-hārāṅgada-cāru-kuṇḍalau

उसमें भगवान के दो श्रेष्ठ पार्षद खड़े थे — चतुर्भुज, श्याम वर्ण, किशोरवय, अरुण कमल के समान नेत्रों वाले, गदा धारण किए, सुन्दर वस्त्रों तथा मुकुट, हार, अंगद और मनोहर कुण्डलों से सुशोभित।

श्लोक 21 (bhagavata.4.12.21)

विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्करा- वभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः । ननाम नामानि गृणन्मधुद्विषः पार्षत्प्रधानाविति संहताञ्जलिः ॥ 12.21 ॥

vijñāya tāv uttamagāya-kiṅkarāv abhyutthitaḥ sādhvasa-vismṛta-kramaḥ nanāma nāmāni gṛṇan madhudviṣaḥ pārṣat-pradhānāv iti saṁhatāñjaliḥ

उन्हें उत्तमश्लोक भगवान के सेवक जानकर वे तुरन्त उठ खड़े हुए, किन्तु विस्मयवश स्वागत की विधि भूल गए; अतः उन्होंने केवल हाथ जोड़कर प्रणाम किया और मधुसूदन के नामों का उच्चारण करने लगे।

श्लोक 22 (bhagavata.4.12.22)

तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम् । सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ ॥ 12.22 ॥

taṁ kṛṣṇa-pādābhiniviṣṭa-cetasaṁ baddhāñjaliṁ praśraya-namra-kandharam sunanda-nandāv upasṛtya sasmitaṁ pratyūcatuḥ puṣkaranābha-sammatau

कृष्ण के चरणों में मन लगाए, हाथ जोड़े, विनम्रता से झुकी हुई ग्रीवा वाले उन ध्रुव के पास, कमलनाभ भगवान के प्रिय पार्षद नन्द और सुनन्द मुस्कराते हुए आए और बोले।

श्लोक 23 (bhagavata.4.12.23)

सुनन्दनन्दावूचतुः भो भो राजन्सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः शृणु । यः पञ्चवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत् ॥ 12.23 ॥

sunanda-nandāv ūcatuḥ bho bho rājan subhadraṁ te vācaṁ no ’vahitaḥ śṛṇu yaḥ pañca-varṣas tapasā bhavān devam atītṛpat

नन्द और सुनन्द ने कहा — हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो; हमारे वचन ध्यानपूर्वक सुनो। पाँच वर्ष की अवस्था में ही तुमने तपस्या द्वारा देवताओं से भी परे उन भगवान को संतुष्ट किया।

श्लोक 24 (bhagavata.4.12.24)

तस्याखिलजगद्धातुरावां देवस्य शार्ङ्गिणः । पार्षदाविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥ 12.24 ॥

tasyākhila-jagad-dhātur āvāṁ devasya śārṅgiṇaḥ pārṣadāv iha samprāptau netuṁ tvāṁ bhagavat-padam

हम दोनों उन्हीं शार्ङ्गधारी, समस्त जगत के स्रष्टा भगवान के पार्षद हैं; हम तुम्हें भगवद्धाम ले जाने के लिए यहाँ आए हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.4.12.25)

सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् । आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ 12.25 ॥

sudurjayaṁ viṣṇu-padaṁ jitaṁ tvayā yat sūrayo ’prāpya vicakṣate param ātiṣṭha tac candra-divākarādayo graharkṣa-tārāḥ pariyanti dakṣiṇam

विष्णु का वह अत्यन्त दुर्जय पद तुमने जीत लिया है, वह परम पद जिसे प्राप्त किए बिना ज्ञानीजन भी केवल दूर से वर्णन करते हैं। अब आरोहण करो उस धाम पर, जिसकी सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और तारे सब दक्षिणावर्त परिक्रमा करते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.4.12.26)

अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् । आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ 12.26 ॥

anāsthitaṁ te pitṛbhir anyair apy aṅga karhicit ātiṣṭha jagatāṁ vandyaṁ tad viṣṇoḥ paramaṁ padam

हे राजन्, तुम्हारे पूर्वजों में से किसी ने भी और न ही किसी अन्य ने इसे कभी प्राप्त किया; अब उस विष्णु के परम पद पर आरोहण करो, जो समस्त लोकों द्वारा वन्दित है।

श्लोक 27 (bhagavata.4.12.27)

एतद्विमानप्रवरमुत्तमश्लोकमौलिना । उपस्थापितमायुष्मन्नधिरोढुं त्वमर्हसि ॥ 12.27 ॥

etad vimāna-pravaram uttamaśloka-maulinā upasthāpitam āyuṣmann adhiroḍhuṁ tvam arhasi

हे आयुष्मान्, यह श्रेष्ठ विमान स्वयं उत्तमश्लोक भगवान द्वारा भेजा गया है; तुम निश्चय ही इस पर आरोहण करने योग्य हो।

श्लोक 28 (bhagavata.4.12.28)

मैत्रेय उवाच निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो- र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः । कृताभिषेकः कृतनित्यमङ्गलो मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥ 12.28 ॥

maitreya uvāca niśamya vaikuṇṭha-niyojya-mukhyayor madhu-cyutaṁ vācam urukrama-priyaḥ kṛtābhiṣekaḥ kṛta-nitya-maṅgalo munīn praṇamyāśiṣam abhyavādayat

मैत्रेय ने आगे कहा — वैकुण्ठ के उन दोनों श्रेष्ठ सेवकों की मधुर वाणी सुनकर, उरुक्रम भगवान के प्रिय ध्रुव ने स्नान कर, नित्य मंगल-कृत्य सम्पन्न किए, और वहाँ उपस्थित मुनियों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद ग्रहण किया।

श्लोक 29 (bhagavata.4.12.29)

परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च । इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम् ॥ 12.29 ॥

parītyābhyarcya dhiṣṇyāgryaṁ pārṣadāv abhivandya ca iyeṣa tad adhiṣṭhātuṁ bibhrad rūpaṁ hiraṇmayam

उस श्रेष्ठ विमान की परिक्रमा एवं पूजा कर तथा दोनों पार्षदों को प्रणाम कर, वे उस पर आरूढ़ होने को उद्यत हुए, और उनका अपना स्वरूप स्वर्ण के समान देदीप्यमान हो उठा।

श्लोक 30 (bhagavata.4.12.30)

तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम् । मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्भुतं गृहम् ॥ 12.30 ॥

tadottānapadaḥ putro dadarśāntakam āgatam mṛtyor mūrdhni padaṁ dattvā ārurohādbhutaṁ gṛham

तभी उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव ने साक्षात् मृत्यु को अपने समीप आते देखा; उन्होंने मृत्यु के ही मस्तक पर अपना पैर रखकर उस भवन-सदृश अद्भुत विमान पर आरोहण किया।

श्लोक 31 (bhagavata.4.12.31)

तदा दुन्दुभयो नेदुर्मृदङ्गपणवादयः । गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः ॥ 12.31 ॥

tadā dundubhayo nedur mṛdaṅga-paṇavādayaḥ gandharva-mukhyāḥ prajaguḥ petuḥ kusuma-vṛṣṭayaḥ

तब दुन्दुभि, मृदंग और पणव बज उठे, प्रमुख गन्धर्व गाने लगे, और पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 32 (bhagavata.4.12.32)

स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः । अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥ 12.32 ॥

sa ca svarlokam ārokṣyan sunītiṁ jananīṁ dhruvaḥ anvasmarad agaṁ hitvā dīnāṁ yāsye tri-viṣṭapam

स्वर्गलोक को आरोहण करते समय ध्रुव को अपनी दीन माता सुनीति का स्मरण हो आया — "क्या मैं इस दुःखी माता को छोड़कर त्रिविष्टप को चला जाऊँ?"

श्लोक 33 (bhagavata.4.12.33)

इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ । दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम् ॥ 12.33 ॥

iti vyavasitaṁ tasya vyavasāya surottamau darśayām āsatur devīṁ puro yānena gacchatīm

उनके इस मनोभाव को जानकर उन दोनों श्रेष्ठ देवों ने उन्हें दिखाया कि उनकी माता एक अन्य विमान में आगे-आगे जा रही हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.4.12.34)

तत्र तत्र प्रशंसद्भिः पथि वैमानिकैः सुरैः । अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान् ॥ 12.34 ॥

tatra tatra praśaṁsadbhiḥ pathi vaimānikaiḥ suraiḥ avakīryamāṇo dadṛśe kusumaiḥ kramaśo grahān

मार्ग में यात्रा करते हुए विमानस्थ देवगण चारों ओर से उनकी प्रशंसा करते हुए उन पर पुष्प बरसाते रहे, और वे क्रमशः ग्रहों को देखते गए।

श्लोक 35 (bhagavata.4.12.35)

त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि । परस्ताद्यद् ध्रुवगतिर्विष्णोः पदमथाभ्यगात् ॥ 12.35 ॥

tri-lokīṁ deva-yānena so ’tivrajya munīn api parastād yad dhruva-gatir viṣṇoḥ padam athābhyagāt

उस देवयान मार्ग से त्रिलोकी को तथा महर्षियों के लोक को भी लांघकर, अचल गति वाले ध्रुव अन्ततः विष्णु के परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 36 (bhagavata.4.12.36)

यद्भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो लोकास्त्रयो ह्यनु विभ्राजन्त एते । यन्नाव्रजञ्जन्तुषु येऽननुग्रहा व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम् ॥ 12.36 ॥

yad bhrājamānaṁ sva-rucaiva sarvato lokās trayo hy anu vibhrājanta ete yan nāvrajañ jantuṣu ye ’nanugrahā vrajanti bhadrāṇi caranti ye ’niśam

जिस धाम की अपनी ही आभा से ये तीनों लोक प्रकाशित होते हैं, उस धाम को निर्दय, अन्य प्राणियों के प्रति करुणाहीन जन नहीं पा सकते; केवल वे ही उसे प्राप्त करते हैं जो निरन्तर परहित में रत रहते हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.4.12.37)

शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरञ्जनाः । यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः ॥ 12.37 ॥

śāntāḥ sama-dṛśaḥ śuddhāḥ sarva-bhūtānurañjanāḥ yānty añjasācyuta-padam acyuta-priya-bāndhavāḥ

शान्त, समदर्शी, शुद्ध, समस्त प्राणियों को आनन्दित करने वाले तथा अच्युत के प्रियजनों को ही अपना बन्धु मानने वाले जन ही सुगमता से अच्युत के धाम को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.4.12.38)

इत्युत्तानपदः पुत्रो ध्रुवः कृष्णपरायणः । अभूत्त्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः ॥ 12.38 ॥

ity uttānapadaḥ putro dhruvaḥ kṛṣṇa-parāyaṇaḥ abhūt trayāṇāṁ lokānāṁ cūḍā-maṇir ivāmalaḥ

इस प्रकार कृष्णपरायण उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव निर्मल होकर त्रिलोकी के चूड़ामणि के समान हो गए।

श्लोक 39 (bhagavata.4.12.39)

गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम् । यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः ॥ 12.39 ॥

gambhīra-vego ’nimiṣaṁ jyotiṣāṁ cakram āhitam yasmin bhramati kauravya meḍhyām iva gavāṁ gaṇaḥ

हे कुरुनन्दन, ज्योतिश्चक्र अपनी अखण्ड गति से उनके धाम की उसी प्रकार परिक्रमा करता है जैसे गौओं का समूह अपने केन्द्रीय स्तम्भ की परिक्रमा करता है।

श्लोक 40 (bhagavata.4.12.40)

महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवानृषिः । आतोद्यं वितुदञ्श्लोकान् सत्रेऽगायत्प्रचेतसाम् ॥ 12.40 ॥

mahimānaṁ vilokyāsya nārado bhagavān ṛṣiḥ ātodyaṁ vitudañ ślokān satre ’gāyat pracetasām

उनकी इस महिमा को देखकर देवर्षि नारद वीणा बजाते हुए प्रचेताओं के यज्ञ-सत्र में जाकर ये श्लोक गाने लगे।

श्लोक 41 (bhagavata.4.12.41)

नारद उवाच नूनं सुनीतेः पतिदेवताया- स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् । दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः ॥ 12.41 ॥

nārada uvāca nūnaṁ sunīteḥ pati-devatāyās tapaḥ-prabhāvasya sutasya tāṁ gatim dṛṣṭvābhyupāyān api veda-vādino naivādhigantuṁ prabhavanti kiṁ nṛpāḥ

नारद ने कहा — पतिव्रता सुनीति के उस पुत्र की, जो तप के प्रभाव से यह गति प्राप्त कर सका, उसे देखकर वेदवादी विद्वान भी उसके उपाय को जानने में समर्थ नहीं — फिर राजाओं की तो बात ही क्या!

श्लोक 42 (bhagavata.4.12.42)

यः पञ्चवर्षो गुरुदारवाक्शरै- र्भिन्नेन यातो हृदयेन दूयता । वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं जिगाय तद्भक्तगुणैः पराजितम् ॥ 12.42 ॥

yaḥ pañca-varṣo guru-dāra-vāk-śarair bhinnena yāto hṛdayena dūyatā vanaṁ mad-ādeśa-karo ’jitaṁ prabhuṁ jigāya tad-bhakta-guṇaiḥ parājitam

जो पाँच वर्ष की अवस्था में सौतेली माता के कटु वचनों से आहत हृदय लेकर मेरे ही निर्देश पर वन गया, उसने भक्तों में निहित गुणों के बल पर उन अजेय भगवान को भी जीत लिया।

श्लोक 43 (bhagavata.4.12.43)

यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ- मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः । षट्पञ्चवर्षो यदहोभिरल्पैः प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम् ॥ 12.43 ॥

yaḥ kṣatra-bandhur bhuvi tasyādhirūḍham anv ārurukṣed api varṣa-pūgaiḥ ṣaṭ-pañca-varṣo yad ahobhir alpaiḥ prasādya vaikuṇṭham avāpa tat-padam

जिस पद तक पहुँचने की आकांक्षा अनेक वर्षों के प्रयास के बाद भी दुर्लभ है, उसी पद को उस क्षत्रिय-पुत्र ने मात्र पाँच-छह वर्षों में वैकुण्ठ को प्रसन्न कर प्राप्त कर लिया।

श्लोक 44 (bhagavata.4.12.44)

मैत्रेय उवाच एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । ध्रुवस्योद्दामयशसश्चरितं सम्मतं सताम् ॥ 12.44 ॥

maitreya uvāca etat te ’bhihitaṁ sarvaṁ yat pṛṣṭo ’ham iha tvayā dhruvasyoddāma-yaśasaś caritaṁ sammataṁ satām

मैत्रेय ने आगे कहा — हे विदुर, तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — ध्रुव के इस अपार कीर्तिमय चरित्र को, जो सज्जनों द्वारा सम्मानित है।

श्लोक 45 (bhagavata.4.12.45)

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् । स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम् ॥ 12.45 ॥

dhanyaṁ yaśasyam āyuṣyaṁ puṇyaṁ svasty-ayanaṁ mahat svargyaṁ dhrauvyaṁ saumanasyaṁ praśasyam agha-marṣaṇam

यह चरित्र धन, यश और आयु प्रदान करने वाला है; यह पवित्र, परम मंगलकारी, स्वर्गदायक, ध्रुवत्व प्रदान करने वाला, मनोहर, प्रशंसनीय तथा पापनाशक है।

श्लोक 46 (bhagavata.4.12.46)

श्रुत्वैतच्छ्रद्धयाभीक्ष्णमच्युतप्रियचेष्टितम् । भवेद्भक्तिर्भगवति यया स्यात्क्लेशसङ्क्षयः ॥ 12.46 ॥

śrutvaitac chraddhayābhīkṣṇam acyuta-priya-ceṣṭitam bhaved bhaktir bhagavati yayā syāt kleśa-saṅkṣayaḥ

श्रद्धापूर्वक बार-बार अच्युत को प्रिय इस कथा को सुनने वाले को भगवान के प्रति भक्ति प्राप्त होती है, जिससे समस्त क्लेश नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 47 (bhagavata.4.12.47)

महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः । यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम् ॥ 12.47 ॥

mahattvam icchatāṁ tīrthaṁ śrotuḥ śīlādayo guṇāḥ yatra tejas tad icchūnāṁ māno yatra manasvinām

महत्ता चाहने वालों के लिए यह कथा स्वयं एक तीर्थ है; श्रोता को शीलादि गुण प्राप्त होते हैं; तेज चाहने वालों के लिए यहाँ तेज है और विचारशील पुरुषों के लिए यहाँ सम्मान है।

श्लोक 48 (bhagavata.4.12.48)

प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः समवाये द्विजन्मनाम् । सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत् ॥ 12.48 ॥

prayataḥ kīrtayet prātaḥ samavāye dvi-janmanām sāyaṁ ca puṇya-ślokasya dhruvasya caritaṁ mahat

संयमपूर्वक प्रातःकाल तथा सायंकाल द्विजों की सभा में पुण्यश्लोक ध्रुव के इस महान चरित्र का कीर्तन करना चाहिए।

श्लोक 49 (bhagavata.4.12.49)

पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा । दिनक्षये व्यतीपाते सङ्क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा ॥ 12.49 ॥

paurṇamāsyāṁ sinīvālyāṁ dvādaśyāṁ śravaṇe ’thavā dina-kṣaye vyatīpāte saṅkrame ’rkadine ’pi vā

पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवार के दिन भी —

श्लोक 50 (bhagavata.4.12.50)

श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः । नेच्छंस्तत्रात्मनात्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति ॥ 12.50 ॥

śrāvayec chraddadhānānāṁ tīrtha-pāda-padāśrayaḥ necchaṁs tatrātmanātmānaṁ santuṣṭa iti sidhyati

भगवान के चरणों की शरण लिए हुए व्यक्ति को चाहिए कि वह श्रद्धावान जनों को यह कथा निःस्वार्थ भाव से सुनाए; स्वयं में ही संतुष्ट रहकर वह इस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (bhagavata.4.12.51)

ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् । कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥ 12.51 ॥

jñānam ajñāta-tattvāya yo dadyāt sat-pathe ’mṛtam kṛpālor dīna-nāthasya devās tasyānugṛhṇate

जो करुणावश सत्य के अज्ञानी को सन्मार्ग पर यह अमृत-ज्ञान प्रदान करता है और दीन-दुखियों का आश्रयदाता बनता है, उस पर देवता भी अनुगृहीत होते हैं।

श्लोक 52 (bhagavata.4.12.52)

इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वहध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः । हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातु-र्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम ॥ 12.52 ॥

idaṁ mayā te ’bhihitaṁ kurūdvaha dhruvasya vikhyāta-viśuddha-karmaṇaḥ hitvārbhakaḥ krīḍanakāni mātur gṛhaṁ ca viṣṇuṁ śaraṇaṁ yo jagāma

हे कुरुश्रेष्ठ, यह मैंने तुम्हें ध्रुव का वह चरित्र सुनाया, जिसके पवित्र और विख्यात कर्म समस्त जगत में प्रसिद्ध हैं — जिसने बालपन में ही खिलौने त्यागकर, माता का घर छोड़कर, एकमात्र विष्णु की शरण ली थी।

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