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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14

राजा वेन की कथा

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (bhagavata.4.14.1)

मैत्रेय उवाच भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः । गोप्तर्यसति वै नृणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम् ॥ 14.1 ॥

maitreya uvāca bhṛgv-ādayas te munayo lokānāṁ kṣema-darśinaḥ goptary asati vai nṝṇāṁ paśyantaḥ paśu-sāmyatām

मैत्रेय ने आगे कहा — लोककल्याणदर्शी भृगु आदि ऋषिगण, यह देखकर कि रक्षक के अभाव में मनुष्य पशुतुल्य हो गए हैं,

श्लोक 2 (bhagavata.4.14.2)

वीरमातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः । प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः ॥ 14.2 ॥

vīra-mātaram āhūya sunīthāṁ brahma-vādinaḥ prakṛty-asammataṁ venam abhyaṣiñcan patiṁ bhuvaḥ

उन्होंने वीर की माता सुनीथा को बुलाया और उनकी सम्मति से, यद्यपि मन्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध था, वेन का पृथ्वी के स्वामी के रूप में अभिषेक कर दिया।

श्लोक 3 (bhagavata.4.14.3)

श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम् । निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः ॥ 14.3 ॥

śrutvā nṛpāsana-gataṁ venam atyugra-śāsanam nililyur dasyavaḥ sadyaḥ sarpa-trastā ivākhavaḥ

वेन के अत्यन्त कठोर शासन के साथ राजसिंहासन पर बैठने की बात सुनकर डाकुगण उसी क्षण उसी प्रकार छिप गए जैसे सर्प से भयभीत चूहे बिलों में जा छिपते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.4.14.4)

स आरूढनृपस्थान उन्नद्धोऽष्टविभूतिभिः । अवमेने महाभागान् स्तब्धः सम्भावितः स्वतः ॥ 14.4 ॥

sa ārūḍha-nṛpa-sthāna unnaddho ’ṣṭa-vibhūtibhiḥ avamene mahā-bhāgān stabdhaḥ sambhāvitaḥ svataḥ

राजसिंहासन पर बैठते ही आठ प्रकार की विभूतियों से उन्मत्त होकर वह गर्वित हो उठा, और अपने ही मिथ्या अभिमान से स्तब्ध होकर वह महापुरुषों तक का अनादर करने लगा।

श्लोक 5 (bhagavata.4.14.5)

एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः । पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्निव रोदसी ॥ 14.5 ॥

evaṁ madāndha utsikto niraṅkuśa iva dvipaḥ paryaṭan ratham āsthāya kampayann iva rodasī

इस प्रकार मद से अन्धा तथा निरंकुश गजराज के समान बना हुआ वह अपने रथ पर सवार होकर विचरण करता, मानो उसकी गति से आकाश और पृथ्वी दोनों काँप उठते हों।

श्लोक 6 (bhagavata.4.14.6)

न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित् । इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः ॥ 14.6 ॥

na yaṣṭavyaṁ na dātavyaṁ na hotavyaṁ dvijāḥ kvacit iti nyavārayad dharmaṁ bherī-ghoṣeṇa sarvaśaḥ

"कोई भी ब्राह्मण अब कभी यज्ञ न करे, न दान दे, न हवन करे" — इस उद्घोषणा को उसने भेरी बजवाकर सर्वत्र प्रसारित करते हुए समस्त धर्म-कार्यों को रोक दिया।

श्लोक 7 (bhagavata.4.14.7)

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम् । विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः ॥ 14.7 ॥

venasyāvekṣya munayo durvṛttasya viceṣṭitam vimṛśya loka-vyasanaṁ kṛpayocuḥ sma satriṇaḥ

उस दुराचारी वेन के आचरण को देखकर तथा जगत पर आने वाली विपत्ति का विचार कर, यज्ञ में संलग्न उन्हीं ऋषियों ने करुणावश आपस में विचार-विमर्श किया।

श्लोक 8 (bhagavata.4.14.8)

अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत् । दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः ॥ 14.8 ॥

aho ubhayataḥ prāptaṁ lokasya vyasanaṁ mahat dāruṇy ubhayato dīpte iva taskara-pālayoḥ

"हाय, प्रजा एक साथ दोनों ओर से महान संकट में पड़ गई है — जैसे दोनों सिरों से जलती लकड़ी पर चींटियाँ चोर और रक्षक दोनों के मध्य फँस जाती हैं।"

श्लोक 9 (bhagavata.4.14.9)

अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः । ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम् ॥ 14.9 ॥

arājaka-bhayād eṣa kṛto rājātad-arhaṇaḥ tato ’py āsīd bhayaṁ tv adya kathaṁ syāt svasti dehinām

"अराजकता के भय से ही हमने एक अयोग्य पुरुष को राजा बनाया; और अब उसी से यह नया भय उत्पन्न हो गया है — तो फिर प्रजा को शान्ति कैसे मिलेगी?"

श्लोक 10 (bhagavata.4.14.10)

अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत् । वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः ॥ 14.10 ॥

aher iva payaḥ-poṣaḥ poṣakasyāpy anartha-bhṛt venaḥ prakṛtyaiva khalaḥ sunīthā-garbha-sambhavaḥ

"सुनीथा के गर्भ से उत्पन्न वेन स्वभाव से ही दुष्ट है; उसका पोषण करना सर्प को दूध पिलाने के समान है — जो अपने पालनकर्ता को भी हानि ही पहुँचाता है।"

श्लोक 11 (bhagavata.4.14.11)

निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः । तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत् ॥ 14.11 ॥

nirūpitaḥ prajā-pālaḥ sa jighāṁsati vai prajāḥ tathāpi sāntvayemāmuṁ nāsmāṁs tat-pātakaṁ spṛśet

"हमने उसे प्रजा का रक्षक नियुक्त किया था, और अब वह उन्हीं का विनाश चाहता है; फिर भी हमें उसे समझाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे उसका पाप हमें स्पर्श न करे।"

श्लोक 12 (bhagavata.4.14.12)

तद्विद्वद्भिरसद्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः । सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत् । लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा ॥ 14.12 ॥

tad-vidvadbhir asad-vṛtto veno ’smābhiḥ kṛto nṛpaḥ sāntvito yadi no vācaṁ na grahīṣyaty adharma-kṛt loka-dhikkāra-sandagdhaṁ dahiṣyāmaḥ sva-tejasā

"उसके दुराचरण को भली-भाँति जानते हुए भी हमने ही वेन को राजा बनाया था; यदि समझाने पर भी वह अधर्मी हमारा वचन नहीं मानेगा, तो लोकनिन्दा से पहले ही दग्ध उसे हम अपने तेज से भस्म कर देंगे।"

श्लोक 13 (bhagavata.4.14.13)

एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः । उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः ॥ 14.13 ॥

evam adhyavasāyainaṁ munayo gūḍha-manyavaḥ upavrajyābruvan venaṁ sāntvayitvā ca sāmabhiḥ

यह निश्चय कर ऋषिगण अपने वास्तविक क्रोध को छिपाकर वेन के पास गए और पहले सामवचनों से उसे शान्त कर बोले।

श्लोक 14 (bhagavata.4.14.14)

मुनय ऊचुः नृपवर्य निबोधैतद्यत्ते विज्ञापयाम भोः । आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम् ॥ 14.14 ॥

munaya ūcuḥ nṛpa-varya nibodhaitad yat te vijñāpayāma bhoḥ āyuḥ-śrī-bala-kīrtīnāṁ tava tāta vivardhanam

ऋषियों ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ, अब हम जो कहें, उसे सुनिए — क्योंकि हे तात, इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्ति की वृद्धि होगी।

श्लोक 15 (bhagavata.4.14.15)

धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः । लोकान् विशोकान् वतरत्यथानन्त्यमसङ्गिनाम् ॥ 14.15 ॥

dharma ācaritaḥ puṁsāṁ vāṅ-manaḥ-kāya-buddhibhiḥ lokān viśokān vitaraty athānantyam asaṅginām

वाणी, मन, शरीर और बुद्धि द्वारा आचरित धर्म मनुष्यों को शोकरहित लोकों में तथा अनासक्तजनों को अनन्त पद तक ले जाता है।

श्लोक 16 (bhagavata.4.14.16)

स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः । यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्वर्यादवरोहति ॥ 14.16 ॥

sa te mā vinaśed vīra prajānāṁ kṣema-lakṣaṇaḥ yasmin vinaṣṭe nṛpatir aiśvaryād avarohati

हे वीर, प्रजा के कल्याण का यह लक्षणस्वरूप धर्म आपके द्वारा नष्ट न हो — क्योंकि इसके नष्ट होने पर राजा स्वयं अपने ऐश्वर्य से च्युत हो जाता है।

श्लोक 17 (bhagavata.4.14.17)

राजन्नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः । रक्षन्यथा बलिं गृह्णन्निह प्रेत्य च मोदते ॥ 14.17 ॥

rājann asādhv-amātyebhyaś corādibhyaḥ prajā nṛpaḥ rakṣan yathā baliṁ gṛhṇann iha pretya ca modate

हे राजन्, जो दुष्ट मन्त्रियों और चोरों से प्रजा की रक्षा कर उचित रूप से कर ग्रहण करता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सुखी होता है।

श्लोक 18 (bhagavata.4.14.18)

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः । इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ 14.18 ॥

yasya rāṣṭre pure caiva bhagavān yajña-pūruṣaḥ ijyate svena dharmeṇa janair varṇāśramānvitaiḥ

वह राजा धन्य है जिसके राज्य और नगरों में प्रजा वर्णाश्रम-धर्मानुसार यज्ञपुरुष भगवान की आराधना करती है।

श्लोक 19 (bhagavata.4.14.19)

तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः । परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ 14.19 ॥

tasya rājño mahā-bhāga bhagavān bhūta-bhāvanaḥ parituṣyati viśvātmā tiṣṭhato nija-śāsane

हे महाभाग, उस राजा से भूतभावन, विश्वात्मा भगवान तभी तक प्रसन्न रहते हैं जब तक वह अपने ही शासन-धर्म में स्थित रहता है।

श्लोक 20 (bhagavata.4.14.20)

तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे । लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ॥ 14.20 ॥

tasmiṁs tuṣṭe kim aprāpyaṁ jagatām īśvareśvare lokāḥ sapālā hy etasmai haranti balim ādṛtāḥ

जब वे जगदीश्वरेश्वर भगवान इस प्रकार प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर क्या अप्राप्य रह जाता है? लोकपालगण अपने-अपने लोकों सहित आदरपूर्वक उन्हें बलि अर्पित करते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.4.14.21)

तं सर्वलोकामरयज्ञसङ्ग्रहं त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि ॥ 14.21 ॥

taṁ sarva-lokāmara-yajña-saṅgrahaṁ trayīmayaṁ dravyamayaṁ tapomayam yajñair vicitrair yajato bhavāya te rājan sva-deśān anuroddhum arhasi

हे राजन्, अपने ही कल्याण के लिए आप अपने देशवासियों को उन भगवान की, जो समस्त लोकों और देवताओं के यज्ञ-संग्रहस्वरूप, त्रयीमय, द्रव्यमय और तपोमय हैं, विविध यज्ञों द्वारा आराधना करने की अनुमति दें।

श्लोक 22 (bhagavata.4.14.22)

यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि- र्वितायमानेन सुराः कला हरेः । स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥ 14.22 ॥

yajñena yuṣmad-viṣaye dvijātibhir vitāyamānena surāḥ kalā hareḥ sviṣṭāḥ sutuṣṭāḥ pradiśanti vāñchitaṁ tad-dhelanaṁ nārhasi vīra ceṣṭitum

हे वीर, आपके राज्य में जब द्विजगण यज्ञ का विस्तार करेंगे, तब हरि के अंशस्वरूप देवगण सुपूजित और सुप्रसन्न होकर अभीष्ट फल प्रदान करेंगे — इसका तिरस्कार करने योग्य आचरण न करें।

श्लोक 23 (bhagavata.4.14.23)

वेन उवाच बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः । ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते ॥ 14.23 ॥

vena uvāca bāliśā bata yūyaṁ vā adharme dharma-māninaḥ ye vṛttidaṁ patiṁ hitvā jāraṁ patim upāsate

वेन ने उत्तर दिया — तुम कितने मूर्ख हो, जो अधर्म को ही धर्म मान बैठे हो — अपने पालक पति को छोड़कर मानो किसी उपपति की उपासना कर रहे हो!

श्लोक 24 (bhagavata.4.14.24)

अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् । नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च ॥ 14.24 ॥

avajānanty amī mūḍhā nṛpa-rūpiṇam īśvaram nānuvindanti te bhadram iha loke paratra ca

ये मूर्खजन राजा के रूप में साक्षात् उपस्थित भगवान का अनादर करते हैं, इसीलिए उन्हें न इस लोक में और न परलोक में कोई कल्याण प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (bhagavata.4.14.25)

को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी । भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम् ॥ 14.25 ॥

ko yajña-puruṣo nāma yatra vo bhaktir īdṛśī bhartṛ-sneha-vidūrāṇāṁ yathā jāre kuyoṣitām

वह "यज्ञपुरुष" आखिर कौन है, जिसके प्रति तुम्हारी ऐसी भक्ति है — मानो किसी कुलटा स्त्री की अपने पति के प्रेम से विमुख होकर उपपति के प्रति भक्ति हो?

श्लोक 26 (bhagavata.4.14.26)

विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः । पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्निरपाम्पतिः ॥ 14.26 ॥

viṣṇur viriñco giriśa indro vāyur yamo raviḥ parjanyo dhanadaḥ somaḥ kṣitir agnir apāmpatiḥ

विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, पर्जन्य, कुबेर, सोम, पृथ्वी, अग्नि, वरुण —

श्लोक 27 (bhagavata.4.14.27)

एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः । देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः ॥ 14.27 ॥

ete cānye ca vibudhāḥ prabhavo vara-śāpayoḥ dehe bhavanti nṛpateḥ sarva-devamayo nṛpaḥ

तथा वर या शाप देने में समर्थ अन्य समस्त देवगण राजा के शरीर में ही निवास करते हैं — इस प्रकार राजा स्वयं सर्वदेवमय है।

श्लोक 28 (bhagavata.4.14.28)

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः । बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक्पुमान् ॥ 14.28 ॥

tasmān māṁ karmabhir viprā yajadhvaṁ gata-matsarāḥ baliṁ ca mahyaṁ harata matto ’nyaḥ ko ’gra-bhuk pumān

अतः हे ब्राह्मणो, मेरे प्रति अपनी ईर्ष्या त्याग दो और अपने कर्मों से मेरी ही आराधना करो; अपना बलि मुझे ही अर्पित करो — मुझसे बढ़कर अग्रभोग का अधिकारी और कौन है?

श्लोक 29 (bhagavata.4.14.29)

मैत्रेय उवाच इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः । अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमङ्गलः ॥ 14.29 ॥

maitreya uvāca itthaṁ viparyaya-matiḥ pāpīyān utpathaṁ gataḥ anunīyamānas tad-yācñāṁ na cakre bhraṣṭa-maṅgalaḥ

मैत्रेय ने आगे कहा — इस प्रकार विपरीत बुद्धि तथा कुमार्गगामी वह अत्यन्त पापी राजा, आदरपूर्वक अनुनय किए जाने पर भी ऋषियों की प्रार्थना नहीं माना — क्योंकि उसका सौभाग्य पहले ही समाप्त हो चुका था।

श्लोक 30 (bhagavata.4.14.30)

इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना । भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः ॥ 14.30 ॥

iti te ’sat-kṛtās tena dvijāḥ paṇḍita-māninā bhagnāyāṁ bhavya-yācñāyāṁ tasmai vidura cukrudhuḥ

हे विदुर, स्वयं को विद्वान मानने वाले उस राजा द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर तथा अपनी सम्मानजनक प्रार्थना के विफल हो जाने पर ब्राह्मणगण उस पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 31 (bhagavata.4.14.31)

हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः । जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम् ॥ 14.31 ॥

hanyatāṁ hanyatām eṣa pāpaḥ prakṛti-dāruṇaḥ jīvañ jagad asāv āśu kurute bhasmasād dhruvam

"इसे मार डालो, मार डालो, इस स्वभाव से क्रूर पापी को — क्योंकि जीवित रहकर यह शीघ्र ही सम्पूर्ण जगत को भस्म कर देगा!"

श्लोक 32 (bhagavata.4.14.32)

नायमर्हत्यसद्वृत्तो नरदेववरासनम् । योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः ॥ 14.32 ॥

nāyam arhaty asad-vṛtto naradeva-varāsanam yo ’dhiyajña-patiṁ viṣṇuṁ vinindaty anapatrapaḥ

"यह दुराचारी, जो निर्लज्ज होकर स्वयं यज्ञपति विष्णु की निन्दा करता है, राजसिंहासन के योग्य कदापि नहीं है।"

श्लोक 33 (bhagavata.4.14.33)

को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम् । प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः ॥ 14.33 ॥

ko vainaṁ paricakṣīta venam ekam ṛte ’śubham prāpta īdṛśam aiśvaryaṁ yad-anugraha-bhājanaḥ

"इस एक वेन को छोड़कर, जो सर्वथा अमंगल है, और भला कौन उन्हीं की निन्दा करेगा, जिनकी कृपा से ऐसा ऐश्वर्य ही प्राप्त होता है?"

श्लोक 34 (bhagavata.4.14.34)

इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः । निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया ॥ 14.34 ॥

itthaṁ vyavasitā hantum ṛṣayo rūḍha-manyavaḥ nijaghnur huṅkṛtair venaṁ hatam acyuta-nindayā

इस प्रकार उसे मार डालने का निश्चय कर, अपने चिरसंचित क्रोध को प्रकट करते हुए ऋषियों ने अपने हुंकार मात्र से वेन का वध कर दिया — अच्युत की निन्दा करने के कारण वह पहले ही मृततुल्य हो चुका था।

श्लोक 35 (bhagavata.4.14.35)

ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम् । सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥ 14.35 ॥

ṛṣibhiḥ svāśrama-padaṁ gate putra-kalevaram sunīthā pālayām āsa vidyā-yogena śocatī

ऋषियों के अपने-अपने आश्रम को लौट जाने पर शोकाकुल सुनीथा ने अपने पुत्र के शव को विद्या-योग द्वारा सुरक्षित रखा।

श्लोक 36 (bhagavata.4.14.36)

एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुताः । हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे ॥ 14.36 ॥

ekadā munayas te tu sarasvat-salilāplutāḥ hutvāgnīn sat-kathāś cakrur upaviṣṭāḥ sarit-taṭe

एक दिन वे ही ऋषिगण सरस्वती नदी में स्नान कर तथा अग्नि में आहुति देकर उसके तट पर बैठे सत्संग-कथा में लीन थे।

श्लोक 37 (bhagavata.4.14.37)

वीक्ष्योत्थितांस्तदोत्पातानाहुर्लोकभयङ्करान् । अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः ॥ 14.37 ॥

vīkṣyotthitāṁs tadotpātān āhur loka-bhayaṅkarān apy abhadram anāthāyā dasyubhyo na bhaved bhuvaḥ

उसी समय जगत को भयभीत करने वाले भीषण उत्पातों को उठते देख उन्होंने कहा — "इस अनाथ हुई पृथ्वी पर डाकुओं से कोई अनिष्ट न हो।"

श्लोक 38 (bhagavata.4.14.38)

एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम् । पांसुः समुत्थितो भूरिश्चोराणामभिलुम्पताम् ॥ 14.38 ॥

evaṁ mṛśanta ṛṣayo dhāvatāṁ sarvato-diśam pāṁsuḥ samutthito bhūriś corāṇām abhilumpatām

ऋषिगण इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि चारों दिशाओं से लूटपाट करते हुए दौड़ते चोरों द्वारा उठाई गई धूल का महान बादल दिखाई देने लगा।

श्लोक 39 (bhagavata.4.14.39)

तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम् । भर्तर्युपरते तस्मिन्नन्योन्यं च जिघांसताम् ॥ 14.39 ॥

tad upadravam ājñāya lokasya vasu lumpatām bhartary uparate tasminn anyonyaṁ ca jighāṁ-satām

यह समझकर कि यह उपद्रव उन्हीं लोगों का कार्य है जो प्रजा के धन को लूट रहे हैं और अपने स्वामी की मृत्यु के बाद परस्पर एक-दूसरे का विनाश करने पर तुले हैं,

श्लोक 40 (bhagavata.4.14.40)

चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम् । लोकान्नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः ॥ 14.40 ॥

cora-prāyaṁ jana-padaṁ hīna-sattvam arājakam lokān nāvārayañ chaktā api tad-doṣa-darśinaḥ

यह दोष देखते हुए भी ऋषिगण, समर्थ होते हुए भी, अब लगभग निर्बल तथा राजाविहीन हो चुकी उस प्रजा को रोकने में प्रवृत्त नहीं हुए।

श्लोक 41 (bhagavata.4.14.41)

ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः । स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥ 14.41 ॥

brāhmaṇaḥ sama-dṛk śānto dīnānāṁ samupekṣakaḥ sravate brahma tasyāpi bhinna-bhāṇḍāt payo yathā

समदर्शी और शान्त ब्राह्मण भी यदि दीनों के दुःख की उपेक्षा करे, तो उसका ब्रह्मतेज भी उसी प्रकार क्षीण हो जाता है जैसे टूटे हुए पात्र से जल बह जाता है।

श्लोक 42 (bhagavata.4.14.42)

नाङ्गस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमर्हति । अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः ॥ 14.42 ॥

nāṅgasya vaṁśo rājarṣer eṣa saṁsthātum arhati amogha-vīryā hi nṛpā vaṁśe ’smin keśavāśrayāḥ

"राजर्षि अंग के इस वंश का अन्त नहीं होना चाहिए," उन्होंने कहा, "क्योंकि इस वंश में केशव के आश्रित राजाओं का वीर्य कभी निष्फल नहीं होता।"

श्लोक 43 (bhagavata.4.14.43)

विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः । ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः ॥ 14.43 ॥

viniścityaivam ṛṣayo vipannasya mahīpateḥ mamanthur ūruṁ tarasā tatrāsīd bāhuko naraḥ

यह निश्चय कर ऋषियों ने उस मृत राजा की जंघा का प्रबलता से मन्थन किया; उससे एक बौने आकार का पुरुष प्रकट हुआ।

श्लोक 44 (bhagavata.4.14.44)

काककृष्णोऽतिह्रस्वाङ्गो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः । ह्रस्वपान्निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः ॥ 14.44 ॥

kāka-kṛṣṇo ’tihrasvāṅgo hrasva-bāhur mahā-hanuḥ hrasva-pān nimna-nāsāgro raktākṣas tāmra-mūrdhajaḥ

वह कौए के समान काला था, उसके अंग अत्यन्त छोटे, भुजाएँ छोटी, हनु विशाल, पैर छोटे, नासाग्र चपटा, नेत्र रक्तवर्ण तथा केश ताम्रवर्ण के थे।

श्लोक 45 (bhagavata.4.14.45)

तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम् । निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ 14.45 ॥

taṁ tu te ’vanataṁ dīnaṁ kiṁ karomīti vādinam niṣīdety abruvaṁs tāta sa niṣādas tato ’bhavat

उस झुके हुए, दीन तथा "मैं क्या करूँ?" ऐसा पूछते हुए पुरुष से उन्होंने कहा — "बैठ जाओ (निषीद)" — और इस प्रकार वह निषाद कहलाया।

श्लोक 46 (bhagavata.4.14.46)

तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः । येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ 14.46 ॥

tasya vaṁśyās tu naiṣādā giri-kānana-gocarāḥ yenāharaj jāyamāno vena-kalmaṣam ulbaṇam

उसके वंशज नैषाद पर्वतों और वनों में निवास करते हैं, क्योंकि उसके जन्म के साथ ही उसने वेन के भीषण पाप का समस्त कल्मष अपने साथ ले लिया था।

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