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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17

महाराज पृथु का पृथ्वी पर क्रोध

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.4.17.1)

मैत्रेय उवाच एवं स भगवान् वैन्यः ख्यापितो गुणकर्मभिः । छन्दयामास तान् कामैः प्रतिपूज्याभिनन्द्य च ॥ १ ॥

maitreya uvāca evaṁ sa bhagavān vainyaḥ khyāpito guṇa-karmabhiḥ chandayām āsa tān kāmaiḥ pratipūjyābhinandya ca

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार अपने गुणों और कर्मों के लिए स्तुति किए जाने पर, भगवान वेन-पुत्र पृथु ने उन (स्तुतिकर्ताओं) का सम्मान और अभिनंदन करते हुए उन्हें उनकी इच्छानुसार वस्तुएँ प्रदान कर संतुष्ट किया।

श्लोक 2 (bhagavata.4.17.2)

ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः । पौराञ्जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २ ॥

brāhmaṇa-pramukhān varṇān bhṛtyāmātya-purodhasaḥ paurāñ jāna-padān śreṇīḥ prakṛtīḥ samapūjayat

उसने ब्राह्मणों के नेतृत्व वाले वर्णों, अपने सेवकों, मंत्रियों तथा पुरोहितों, नगरवासियों और ग्रामवासियों, श्रेणियों (व्यापारिक संघों) तथा समस्त प्रजा का यथोचित सम्मान किया।

श्लोक 3 (bhagavata.4.17.3)

विदुर उवाच कस्माद्दधार गोरूपं धरित्री बहुरूपिणी । यां दुदोह पृथुस्तत्र को वत्सो दोहनं च किम् ॥ ३ ॥

vidura uvāca kasmād dadhāra go-rūpaṁ dharitrī bahu-rūpiṇī yāṁ dudoha pṛthus tatra ko vatso dohanaṁ ca kim

विदुर ने कहा — अनेक रूप धारण करने वाली पृथ्वी ने गाय का रूप ही क्यों धारण किया? और जब पृथु ने उसे दुहा, तब वहाँ बछड़ा कौन था और दोहन-पात्र क्या था?

श्लोक 4 (bhagavata.4.17.4)

प्रकृत्या विषमा देवी कृता तेन समा कथम् । तस्य मेध्यं हयं देवः कस्य हेतोरपाहरत् ॥ ४ ॥

prakṛtyā viṣamā devī kṛtā tena samā katham tasya medhyaṁ hayaṁ devaḥ kasya hetor apāharat

स्वभाव से ऊँची-नीची (असमतल) पृथ्वी-देवी को उसने किस प्रकार समतल बनाया? और देवराज (इन्द्र) ने किस कारण से उसके यज्ञ के पवित्र अश्व का अपहरण किया?

श्लोक 5 (bhagavata.4.17.5)

सनत्कुमाराद्भगवतो ब्रह्मन् ब्रह्मविदुत्तमात् । लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं राजर्षिः कां गतिं गतः ॥ ५ ॥

sanat-kumārād bhagavato brahman brahma-vid-uttamāt labdhvā jñānaṁ sa-vijñānaṁ rājarṣiḥ kāṁ gatiṁ gataḥ

हे ब्राह्मण! ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान सनत्कुमार से साक्षात्कार सहित ज्ञान प्राप्त करके वह राजर्षि किस गति को प्राप्त हुआ?

श्लोक 6 (bhagavata.4.17.6)

यच्चान्यदपि कृष्णस्य भवान् भगवतः प्रभोः । श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६ ॥

yac cānyad api kṛṣṇasya bhavān bhagavataḥ prabhoḥ śravaḥ suśravasaḥ puṇyaṁ pūrva-deha-kathāśrayam

तथा भगवान कृष्ण के उस पूर्व शरीर (अवतार) की कथा से संबंधित जो कुछ अन्य पुण्य और सुनने योग्य वृत्तांत हो, वह भी आप कहें।

श्लोक 7 (bhagavata.4.17.7)

भक्ताय मेऽनुरक्ताय तव चाधोक्षजस्य च । वक्तुमर्हसि योऽदुह्यद्वैन्यरूपेण गामिमाम् ॥ ७ ॥

bhaktāya me ’nuraktāya tava cādhokṣajasya ca vaktum arhasi yo ’duhyad vainya-rūpeṇa gām imām

आप मुझसे — जो आपका और अधोक्षज (भगवान) दोनों का भक्त तथा अनुरक्त हूँ — उसका वर्णन करें, जिसने वेन-पुत्र के रूप में इस गौ-रूपिणी पृथ्वी को दुहा था।

श्लोक 8 (bhagavata.4.17.8)

सूत उवाच चोदितो विदुरेणैवं वासुदेवकथां प्रति । प्रशस्य तं प्रीतमना मैत्रेयः प्रत्यभाषत ॥ ८ ॥

sūta uvāca codito vidureṇaivaṁ vāsudeva-kathāṁ prati praśasya taṁ prīta-manā maitreyaḥ pratyabhāṣata

सूत जी ने कहा — इस प्रकार वासुदेव-कथा हेतु विदुर द्वारा प्रेरित किए जाने पर, प्रसन्नचित्त मैत्रेय ने उनकी प्रशंसा करते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 9 (bhagavata.4.17.9)

मैत्रेय उवाच यदाभिषिक्तः पृथुरङ्ग विप्रै-रामन्त्रितो जनतायाश्च पालः । प्रजा निरन्ने क्षितिपृष्ठ एत्यक्षुत्क्षामदेहाः पतिमभ्यवोचन् ॥ ९ ॥

maitreya uvāca yadābhiṣiktaḥ pṛthur aṅga viprair āmantrito janatāyāś ca pālaḥ prajā niranne kṣiti-pṛṣṭha etya kṣut-kṣāma-dehāḥ patim abhyavocan

मैत्रेय ने कहा — हे प्रिय! जब ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त तथा प्रजा के पालक के रूप में आमंत्रित पृथु (राजा बने), तब पृथ्वी की सतह अन्नरहित हो जाने से भूख से क्षीण शरीर वाली प्रजा अपने स्वामी के पास आकर इस प्रकार बोली।

श्लोक 10 (bhagavata.4.17.10)

वयं राजञ्जाठरेणाभितप्तायथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षाः । त्वामद्य याताः शरणं शरण्यंयः साधितो वृत्तिकरः पतिर्नः ॥ १० ॥

vayaṁ rājañ jāṭhareṇābhitaptā yathāgninā koṭara-sthena vṛkṣāḥ tvām adya yātāḥ śaraṇaṁ śaraṇyaṁ yaḥ sādhito vṛtti-karaḥ patir naḥ

हे राजन्! जिस प्रकार खोखले तने में लगी अग्नि से वृक्ष जल उठते हैं, उसी प्रकार हम अपने उदर की अग्नि से संतप्त हैं। आज हम आपकी, जो सच्चे शरण्य हैं, शरण में आए हैं — आप ही हमारी वृत्ति (जीविका) प्रदान करने हेतु स्वामी रूप में स्थापित किए गए हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.4.17.11)

तन्नो भवानीहतु रातवेऽन्नंक्षुधार्दितानां नरदेवदेव । यावन्न नङ्क्ष्यामह उज्झितोर्जावार्तापतिस्त्वं किल लोकपालः ॥ ११ ॥

tan no bhavān īhatu rātave ’nnaṁ kṣudhārditānāṁ naradeva-deva yāvan na naṅkṣyāmaha ujjhitorjā vārtā-patis tvaṁ kila loka-pālaḥ

अतः हे नरदेवों में देव! भूख से पीड़ित हम लोगों को अन्न देने का प्रयत्न कीजिए, इससे पहले कि हम अपना बल खोकर नष्ट हो जाएँ — क्योंकि आप ही वृत्ति (जीविका) के स्वामी और लोकपाल हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.4.17.12)

मैत्रेय उवाच पृथुः प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम् । दीर्घं दध्यौ कुरुश्रेष्ठ निमित्तं सोऽन्वपद्यत ॥ १२ ॥

maitreya uvāca pṛthuḥ prajānāṁ karuṇaṁ niśamya paridevitam dīrghaṁ dadhyau kuruśreṣṭha nimittaṁ so ’nvapadyata

मैत्रेय ने कहा — हे कुरुश्रेष्ठ! प्रजा का करुण विलाप सुनकर पृथु ने देर तक गहन चिंतन किया और तत्पश्चात् (उसके दुःख के) कारण को समझ लिया।

श्लोक 13 (bhagavata.4.17.13)

इति व्यवसितो बुद्ध्या प्रगृहीतशरासनः । सन्दधे विशिखं भूमेः क्रुद्धस्त्रिपुरहा यथा ॥ १३ ॥

iti vyavasito buddhyā pragṛhīta-śarāsanaḥ sandadhe viśikhaṁ bhūmeḥ kruddhas tripura-hā yathā

इस प्रकार बुद्धि से निश्चय करके उसने धनुष उठाया और त्रिपुरासुर के क्रुद्ध संहारक (शिव) के समान पृथ्वी की ओर बाण का संधान किया।

श्लोक 14 (bhagavata.4.17.14)

प्रवेपमाना धरणी निशाम्योदायुधं च तम् । गौः सत्यपाद्रवद्भीता मृगीव मृगयुद्रुता ॥ १४ ॥

pravepamānā dharaṇī niśāmyodāyudhaṁ ca tam gauḥ saty apādravad bhītā mṛgīva mṛgayu-drutā

उठे हुए अस्त्र सहित उसे देखकर पृथ्वी काँपने लगी और भयभीत होकर गौ का रूप धारण किए हुए वैसे ही भाग चली, जैसे शिकारी के पीछा करने पर हिरणी भागती है।

श्लोक 15 (bhagavata.4.17.15)

तामन्वधावत्तद्वैन्यः कुपितोऽत्यरुणेक्षणः । शरं धनुषि सन्धाय यत्र यत्र पलायते ॥ १५ ॥

tām anvadhāvat tad vainyaḥ kupito ’tyaruṇekṣaṇaḥ śaraṁ dhanuṣi sandhāya yatra yatra palāyate

क्रुद्ध वेन-पुत्र, जिनकी आँखें अत्यंत लाल हो गई थीं, धनुष पर बाण चढ़ाए हुए, वह जहाँ-जहाँ भागती, वहाँ-वहाँ उसका पीछा करते गए।

श्लोक 16 (bhagavata.4.17.16)

सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चान्तरं तयोः । धावन्ती तत्र तत्रैनं ददर्शानूद्यतायुधम् ॥ १६ ॥

sā diśo vidiśo devī rodasī cāntaraṁ tayoḥ dhāvantī tatra tatrainaṁ dadarśānūdyatāyudham

वह देवी दिशाओं, विदिशाओं तथा आकाश और पृथ्वी के मध्य के अंतरिक्ष में भागती रही, और जहाँ-जहाँ वह भागी, वहाँ-वहाँ उसने उसे अस्त्र उठाए हुए अपने पीछे आते देखा।

श्लोक 17 (bhagavata.4.17.17)

लोके नाविन्दत त्राणं वैन्यान्मृत्योरिव प्रजाः । त्रस्ता तदा निववृते हृदयेन विदूयता ॥ १७ ॥

loke nāvindata trāṇaṁ vainyān mṛtyor iva prajāḥ trastā tadā nivavṛte hṛdayena vidūyatā

जैसे प्राणी मृत्यु से कहीं भी शरण नहीं पाते, वैसे ही उसने वेन-पुत्र से कहीं भी शरण न पाई। तब भयभीत होकर, व्यथित हृदय से, वह वापस लौट आई।

श्लोक 18 (bhagavata.4.17.18)

उवाच च महाभागं धर्मज्ञापन्नवत्सल । त्राहि मामपि भूतानां पालनेऽवस्थितो भवान् ॥ १८ ॥

uvāca ca mahā-bhāgaṁ dharma-jñāpanna-vatsala trāhi mām api bhūtānāṁ pālane ’vasthito bhavān

और उसने उस परम भाग्यशाली से कहा — हे धर्मज्ञ! शरणागतवत्सल! मेरी रक्षा कीजिए, आप तो समस्त प्राणियों के पालन में स्थित हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.4.17.19)

स त्वं जिघांससे कस्माद्दीनामकृतकिल्बिषाम् । अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः ॥ १९ ॥

sa tvaṁ jighāṁsase kasmād dīnām akṛta-kilbiṣām ahaniṣyat kathaṁ yoṣāṁ dharma-jña iti yo mataḥ

फिर आप मुझ दीन और निरपराध को क्यों मारना चाहते हैं? जो धर्मज्ञ माना जाता है, वह भला किसी स्त्री का वध कैसे करेगा?

श्लोक 20 (bhagavata.4.17.20)

प्रहरन्ति न वै स्त्रीषु कृतागःस्वपि जन्तवः । किमुत त्वद्विधा राजन् करुणा दीनवत्सलाः ॥ २० ॥

praharanti na vai strīṣu kṛtāgaḥsv api jantavaḥ kim uta tvad-vidhā rājan karuṇā dīna-vatsalāḥ

यहाँ तक कि पशु भी अपराध करने वाली स्त्रियों पर प्रहार नहीं करते, फिर आप जैसे, हे राजन्, जो करुणामय और दीनवत्सल हैं, ऐसा कैसे करेंगे?

श्लोक 21 (bhagavata.4.17.21)

मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्वं प्रतिष्ठितम् । आत्मानं च प्रजाश्चेमाः कथमम्भसि धास्यसि ॥ २१ ॥

māṁ vipāṭyājarāṁ nāvaṁ yatra viśvaṁ pratiṣṭhitam ātmānaṁ ca prajāś cemāḥ katham ambhasi dhāsyasi

मुझे — इस अजर नौका को, जिस पर सम्पूर्ण विश्व टिका है — विदीर्ण करके, आप स्वयं को और इन अपनी प्रजाओं को जल में कैसे थामेंगे?

श्लोक 22 (bhagavata.4.17.22)

पृथुरुवाच वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्मुखीम् । भागं बर्हिषि या वृङ्क्ते न तनोति च नो वसु ॥ २२ ॥

pṛthur uvāca vasudhe tvāṁ vadhiṣyāmi mac-chāsana-parāṅ-mukhīm bhāgaṁ barhiṣi yā vṛṅkte na tanoti ca no vasu

पृथु ने कहा — हे वसुधे! मेरी आज्ञा से मुख मोड़ने वाली तुझे मैं मार डालूँगा — तू यज्ञ में अपना भाग तो ग्रहण करती है, किंतु हमारे लिए धन (अन्न) नहीं उपजाती।

श्लोक 23 (bhagavata.4.17.23)

यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पयः । तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ॥ २३ ॥

yavasaṁ jagdhy anudinaṁ naiva dogdhy audhasaṁ payaḥ tasyām evaṁ hi duṣṭāyāṁ daṇḍo nātra na śasyate

तू प्रतिदिन घास तो चरती है, किंतु अपने ऊधस् से दूध कभी नहीं देती। इस प्रकार दोषी के लिए यहाँ दंड निषिद्ध नहीं कहा जाता।

श्लोक 24 (bhagavata.4.17.24)

त्वं खल्वोषधिबीजानि प्राक् सृष्टानि स्वयम्भुवा । न मुञ्चस्यात्मरुद्धानि मामवज्ञाय मन्दधीः ॥ २४ ॥

tvaṁ khalv oṣadhi-bījāni prāk sṛṣṭāni svayambhuvā na muñcasy ātma-ruddhāni mām avajñāya manda-dhīḥ

हे मंदबुद्धि! मेरी अवज्ञा करके तू औषधि-बीजों को, जो पहले स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा सृजित हुए थे और अब तेरे भीतर रुके पड़े हैं, नहीं छोड़ती।

श्लोक 25 (bhagavata.4.17.25)

अमूषां क्षुत्परीतानामार्तानां परिदेवितम् । शमयिष्यामि मद्बाणैर्भिन्नायास्तव मेदसा ॥ २५ ॥

amūṣāṁ kṣut-parītānām ārtānāṁ paridevitam śamayiṣyāmi mad-bāṇair bhinnāyās tava medasā

मैं अपने बाणों से विदीर्ण की गई तेरी चर्बी (मांस) से, भूख से पीड़ित तथा व्याकुल इन प्रजाओं के विलाप को शांत करूँगा।

श्लोक 26 (bhagavata.4.17.26)

पुमान् योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः । भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः ॥ २६ ॥

pumān yoṣid uta klība ātma-sambhāvano ’dhamaḥ bhūteṣu niranukrośo nṛpāṇāṁ tad-vadho ’vadhaḥ

पुरुष हो, स्त्री हो या नपुंसक — जो केवल अपनी ही प्रशंसा चाहने वाला अधम है और प्राणियों के प्रति निर्दय है, राजाओं के लिए ऐसे का वध, वध नहीं कहलाता।

श्लोक 27 (bhagavata.4.17.27)

त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः । आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ २७ ॥

tvāṁ stabdhāṁ durmadāṁ nītvā māyā-gāṁ tilaśaḥ śaraiḥ ātma-yoga-balenemā dhārayiṣyāmy ahaṁ prajāḥ

हे उद्दंड और मदोन्मत्त मायामयी गौ! तुझे बाणों से तिल-तिल खंडित करके, मैं अपने योगबल से ही इन प्रजाओं का भरण-पोषण करूँगा।

श्लोक 28 (bhagavata.4.17.28)

एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम् । प्रणता प्राञ्जलिः प्राह मही सञ्जातवेपथुः ॥ २८ ॥

evaṁ manyumayīṁ mūrtiṁ kṛtāntam iva bibhratam praṇatā prāñjaliḥ prāha mahī sañjāta-vepathuḥ

इस प्रकार क्रोधमय मूर्ति धारण किए, मानो साक्षात् कृतांत (यमराज) हों, ऐसे उस राजा से, कंपित शरीर वाली पृथ्वी ने झुककर हाथ जोड़कर कहा।

श्लोक 29 (bhagavata.4.17.29)

धरोवाच नमः परस्मै पुरुषाय मायया विन्यस्तनानातनवे गुणात्मने । नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ २९ ॥

dharovāca namaḥ parasmai puruṣāya māyayā vinyasta-nānā-tanave guṇātmane namaḥ svarūpānubhavena nirdhuta- dravya-kriyā-kāraka-vibhramormaye

पृथ्वी ने कहा — उस परम पुरुष को नमस्कार, जिन्होंने माया द्वारा नाना शरीर धारण किए हैं, जो गुणों के स्वरूप हैं। उन्हें नमस्कार, जिनके लिए स्वरूप के साक्षात् अनुभव से द्रव्य, क्रिया और कारक संबंधी भ्रम की तरंगें विलुप्त हो चुकी हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.4.17.30)

येनाहमात्मायतनं विनिर्मिता धात्रा यतोऽयं गुणसर्गसङ्ग्रहः । स एव मां हन्तुमुदायुधः स्वरा- डुपस्थितोऽन्यं शरणं कमाश्रये ॥ ३० ॥

yenāham ātmāyatanaṁ vinirmitā dhātrā yato ’yaṁ guṇa-sarga-saṅgrahaḥ sa eva māṁ hantum udāyudhaḥ svarāḍ upasthito ’nyaṁ śaraṇaṁ kam āśraye

जिस विधाता ने मुझे प्राणियों के आवास-स्थान के रूप में रचा, जिनसे यह गुणों से उत्पन्न समस्त सृष्टि-समूह उपजा है — वही स्वराट् भगवान् अब अस्त्र उठाए मुझे मारने को उपस्थित हैं। तब मैं और किसकी शरण लूँ?

श्लोक 31 (bhagavata.4.17.31)

य एतदादावसृजच्चराचरं स्वमाययात्माश्रययावितर्क्यया । तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥ ३१ ॥

ya etad ādāv asṛjac carācaraṁ sva-māyayātmāśrayayāvitarkyayā tayaiva so ’yaṁ kila goptum udyataḥ kathaṁ nu māṁ dharma-paro jighāṁsati

जिसने आदि में अपनी उस अचिन्त्य, आत्माश्रित माया से इस चराचर जगत की सृष्टि की, वही अब उसी माया से इसकी रक्षा में संलग्न है। फिर धर्मपरायण होकर वह मुझे मारना क्यों चाहते हैं?

श्लोक 32 (bhagavata.4.17.32)

नूनं बतेशस्य समीहितं जनै- स्तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभिः । न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयद् योऽनेक एकः परतश्च ईश्वरः ॥ ३२ ॥

nūnaṁ bateśasya samīhitaṁ janais tan-māyayā durjayayākṛtātmabhiḥ na lakṣyate yas tv akarod akārayad yo ’neka ekaḥ parataś ca īśvaraḥ

निश्चय ही ईश्वर का अभिप्राय सामान्य जनों द्वारा नहीं जाना जा सकता, जो उनकी उस दुर्जय माया से मोहित तथा असंस्कृत-आत्मा हैं — जो एक होकर भी अनेक कर्म स्वयं करते और अन्यों से करवाते हैं, और जो सबसे परे ईश्वर हैं।

श्लोक 33 (bhagavata.4.17.33)

सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि- र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तये नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥ ३३ ॥

sargādi yo ’syānuruṇaddhi śaktibhir dravya-kriyā-kāraka-cetanātmabhiḥ tasmai samunnaddha-niruddha-śaktaye namaḥ parasmai puruṣāya vedhase

जो अपनी उन शक्तियों से — द्रव्य, क्रिया, कारक तथा चेतना रूप — इस जगत की सृष्टि आदि का नियमन करते हैं, तथा जिनकी वे शक्तियाँ कभी उन्मुक्त होती हैं और कभी संयत — उन परम पुरुष विधाता को नमस्कार है।

श्लोक 34 (bhagavata.4.17.34)

स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद् भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो । संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला- दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः ॥ ३४ ॥

sa vai bhavān ātma-vinirmitaṁ jagad bhūtendriyāntaḥ-karaṇātmakaṁ vibho saṁsthāpayiṣyann aja māṁ rasātalād abhyujjahārāmbhasa ādi-sūkaraḥ

हे विभो, अजन्मा प्रभु! आपने ही, भूतों, इन्द्रियों तथा अंतःकरण से बने इस अपने जगत को स्थापित करने के लिए, आदिवराह का रूप धारण कर मुझे रसातल के जल से ऊपर उठाया था।

श्लोक 35 (bhagavata.4.17.35)

अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल । स वीरमूर्तिः समभूद्धराधरो यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥ ३५ ॥

apām upasthe mayi nāvy avasthitāḥ prajā bhavān adya rirakṣiṣuḥ kila sa vīra-mūrtiḥ samabhūd dharā-dharo yo māṁ payasy ugra-śaro jighāṁsasi

जल के ऊपर, नौका के समान मुझ पर स्थित प्रजाओं की रक्षा करने की इच्छा तो आपने ही की थी। वही वीरमूर्ति धराधर अब उग्र बाणों से जल में मुझे मारना चाहते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.4.17.36)

नूनं जनैरीहितमीश्वराणा- मस्मद्विधैस्तद्गुणसर्गमायया । न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि- स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः ॥ ३६ ॥

nūnaṁ janair īhitam īśvarāṇām asmad-vidhais tad-guṇa-sarga-māyayā na jñāyate mohita-citta-vartmabhis tebhyo namo vīra-yaśas-karebhyaḥ

निश्चय ही ईश्वरों की लीलाएँ हम जैसे प्राणियों द्वारा नहीं जानी जा सकतीं, जिनका चित्त उन गुणों की सृष्टि-रूपी माया से मोहित है। वीरों को यश प्रदान करने वाले उन (भगवान) को नमस्कार है।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18