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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18

पृथु द्वारा पृथ्वी का दोहन

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (bhagavata.4.18.1)

मैत्रेय उवाच इत्थं पृथुमभिष्टूय रुषा प्रस्फुरिताधरम् । पुनराहावनिर्भीता संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥ १ ॥

maitreya uvāca itthaṁ pṛthum abhiṣṭūya ruṣā prasphuritādharam punar āhāvanir bhītā saṁstabhyātmānam ātmanā

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार क्रोध से जिनके अधर काँप रहे थे, उन पृथु की स्तुति करने के पश्चात् भी, भयभीत पृथ्वी ने अपने आप को संयत करके पुनः कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.4.18.2)

सन्नियच्छाभिभो मन्युं निबोध श्रावितं च मे । सर्वतः सारमादत्ते यथा मधुकरो बुधः ॥ २ ॥

sanniyacchābhibho manyuṁ nibodha śrāvitaṁ ca me sarvataḥ sāram ādatte yathā madhu-karo budhaḥ

हे स्वामी! अपने क्रोध को रोकिए और जो मैं निवेदन करती हूँ उसे सुनिए। बुद्धिमान व्यक्ति सर्वत्र से सार ग्रहण करता है, जैसे भ्रमर (फूलों से मधु)।

श्लोक 3 (bhagavata.4.18.3)

अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये ॥ ३ ॥

asmil loke ’thavāmuṣmin munibhis tattva-darśibhiḥ dṛṣṭā yogāḥ prayuktāś ca puṁsāṁ śreyaḥ-prasiddhaye

इस लोक अथवा परलोक के लिए, तत्त्वदर्शी मुनियों ने मनुष्यों के कल्याण की सिद्धि हेतु विभिन्न उपायों को देखा और प्रयोग में लाया है।

श्लोक 4 (bhagavata.4.18.4)

तानातिष्ठति यः सम्यगुपायान् पूर्वदर्शितान् । अवरः श्रद्धयोपेत उपेयान् विन्दतेऽञ्जसा ॥ ४ ॥

tān ātiṣṭhati yaḥ samyag upāyān pūrva-darśitān avaraḥ śraddhayopeta upeyān vindate ’ñjasā

जो कोई भी, चाहे वह सामान्य ही क्यों न हो, श्रद्धायुक्त होकर पूर्वजों द्वारा दिखाए गए उन उपायों का भलीभाँति अनुसरण करता है, वह सहज ही अपने अभीष्ट लक्ष्यों को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 5 (bhagavata.4.18.5)

ताननादृत्य योऽविद्वानर्थानारभते स्वयम् । तस्य व्यभिचरन्त्यर्था आरब्धाश्च पुनः पुनः ॥ ५ ॥

tān anādṛtya yo ’vidvān arthān ārabhate svayam tasya vyabhicaranty arthā ārabdhāś ca punaḥ punaḥ

किंतु जो अज्ञानी उन (उपायों) की उपेक्षा करके स्वयं अपने बल पर कार्यों का आरंभ करता है, उसके कार्य बार-बार आरंभ करने पर भी विफल होते जाते हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.4.18.6)

पुरा सृष्टा ह्योषधयो ब्रह्मणा या विशाम्पते । भुज्यमाना मया दृष्टा असद्भिरधृतव्रतैः ॥ ६ ॥

purā sṛṣṭā hy oṣadhayo brahmaṇā yā viśāmpate bhujyamānā mayā dṛṣṭā asadbhir adhṛta-vrataiḥ

हे विशाम्पते! ब्रह्मा द्वारा पूर्वकाल में सृजित जो औषधियाँ थीं, उन्हें मैंने व्रतहीन दुष्टजनों द्वारा भोगी जाते देखा।

श्लोक 7 (bhagavata.4.18.7)

अपालितानादृता च भवद्भिर्लोकपालकैः । चोरीभूतेऽथ लोकेऽहं यज्ञार्थेऽग्रसमोषधीः ॥ ७ ॥

apālitānādṛtā ca bhavadbhir loka-pālakaiḥ corī-bhūte ’tha loke ’haṁ yajñārthe ’grasam oṣadhīḥ

आप जैसे लोकपालों द्वारा अरक्षित और उपेक्षित होकर, तथा लोक के चोरों जैसा हो जाने पर, मैंने यज्ञ हेतु (नियत) उन औषधियों को निगल लिया।

श्लोक 8 (bhagavata.4.18.8)

नूनं ता वीरुधः क्षीणा मयि कालेन भूयसा । तत्र योगेन दृष्टेन भवानादातुमर्हति ॥ ८ ॥

nūnaṁ tā vīrudhaḥ kṣīṇā mayi kālena bhūyasā tatra yogena dṛṣṭena bhavān ādātum arhati

निश्चय ही मेरे भीतर दीर्घकाल तक रहने के कारण वे लताएँ (औषधियाँ) क्षीण हो गई होंगी। अतः आपको उन्हें (शास्त्रों में) दर्शाई गई विधि से पुनः प्राप्त करना चाहिए।

श्लोक 9 (bhagavata.4.18.9)

वत्सं कल्पय मे वीर येनाहं वत्सला तव । धोक्ष्ये क्षीरमयान्कामाननुरूपं च दोहनम् ॥ ९ ॥

vatsaṁ kalpaya me vīra yenāhaṁ vatsalā tava dhokṣye kṣīramayān kāmān anurūpaṁ ca dohanam

हे वीर! मेरे लिए एक बछड़ा नियत कीजिए, जिससे स्नेहवश मैं आपकी इच्छानुसार दुग्धमय वस्तुओं को दुह सकूँ — और एक उपयुक्त दोहन-पात्र भी।

श्लोक 10 (bhagavata.4.18.10)

दोग्धारं च महाबाहो भूतानां भूतभावन । अन्नमीप्सितमूर्जस्वद्भगवान् वाञ्छते यदि ॥ १० ॥

dogdhāraṁ ca mahā-bāho bhūtānāṁ bhūta-bhāvana annam īpsitam ūrjasvad bhagavān vāñchate yadi

हे महाबाहो! हे प्राणियों के पालक! यदि आप, हे भगवन्, अभीष्ट और पुष्टिकारक अन्न चाहते हैं, तो एक दोहन करने वाला भी नियत कीजिए।

श्लोक 11 (bhagavata.4.18.11)

समां च कुरु मां राजन्देववृष्टं यथा पयः । अपर्तावपि भद्रं ते उपावर्तेत मे विभो ॥ ११ ॥

samāṁ ca kuru māṁ rājan deva-vṛṣṭaṁ yathā payaḥ apartāv api bhadraṁ te upāvarteta me vibho

हे राजन्! मुझे समतल भी कीजिए, जिससे इन्द्र द्वारा भेजा गया जल (वर्षा) असमय में भी, हे विभो, आपके कल्याण हेतु मुझ पर ठहर सके।

श्लोक 12 (bhagavata.4.18.12)

इति प्रियं हितं वाक्यं भुव आदाय भूपतिः । वत्सं कृत्वा मनुं पाणावदुहत्सकलौषधीः ॥ १२ ॥

iti priyaṁ hitaṁ vākyaṁ bhuva ādāya bhūpatiḥ vatsaṁ kṛtvā manuṁ pāṇāv aduhat sakalauṣadhīḥ

पृथ्वी के इस प्रिय और हितकर वचन को स्वीकार कर, राजा ने मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथों में समस्त औषधियों को दुह लिया।

श्लोक 13 (bhagavata.4.18.13)

तथापरे च सर्वत्र सारमाददते बुधाः । ततोऽन्ये च यथाकामं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥ १३ ॥

tathāpare ca sarvatra sāram ādadate budhāḥ tato ’nye ca yathā-kāmaṁ duduhuḥ pṛthu-bhāvitām

इसी प्रकार अन्यत्र भी बुद्धिमान जन सर्वत्र सार ग्रहण करने लगे, और तत्पश्चात् अन्य लोगों ने भी पृथु द्वारा (दुहनीय) बनाई गई उस पृथ्वी को अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार दुहा।

श्लोक 14 (bhagavata.4.18.14)

ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम । वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि ॥ १४ ॥

ṛṣayo duduhur devīm indriyeṣv atha sattama vatsaṁ bṛhaspatiṁ kṛtvā payaś chandomayaṁ śuci

हे सत्तम! ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा और इन्द्रियों को पात्र बनाकर उस देवी से छन्दोमय पवित्र दूध दुहा।

श्लोक 15 (bhagavata.4.18.15)

कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् । हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५ ॥

kṛtvā vatsaṁ sura-gaṇā indraṁ somam adūduhan hiraṇmayena pātreṇa vīryam ojo balaṁ payaḥ

देवगणों ने इन्द्र को बछड़ा बनाकर स्वर्णपात्र से सोम-रूपी दूध — वीर्य, ओज और बल — दुहा।

श्लोक 16 (bhagavata.4.18.16)

दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् । विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६ ॥

daiteyā dānavā vatsaṁ prahlādam asurarṣabham vidhāyādūduhan kṣīram ayaḥ-pātre surāsavam

दैत्यों और दानवों ने असुरों में श्रेष्ठ प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर, लौह-पात्र में सुरा-रूपी दूध दुहा।

श्लोक 17 (bhagavata.4.18.17)

गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः । वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं मधु सौभगम् ॥ १७ ॥

gandharvāpsaraso ’dhukṣan pātre padmamaye payaḥ vatsaṁ viśvāvasuṁ kṛtvā gāndharvaṁ madhu saubhagam

गन्धर्वों और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर, कमल-पात्र में मधुर सौभाग्यदायी गान्धर्व-रूपी दूध दुहा।

श्लोक 18 (bhagavata.4.18.18)

वत्सेन पितरोऽर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत । आमपात्रे महाभागाः श्रद्धया श्राद्धदेवताः ॥ १८ ॥

vatsena pitaro ’ryamṇā kavyaṁ kṣīram adhukṣata āma-pātre mahā-bhāgāḥ śraddhayā śrāddha-devatāḥ

अत्यंत भाग्यशाली, श्राद्ध के अधिष्ठाता पितरों ने अर्यमा को बछड़ा बनाकर, कच्चे मिट्टी के पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य-रूपी दूध दुहा।

श्लोक 19 (bhagavata.4.18.19)

प्रकल्प्य वत्सं कपिलं सिद्धाः सङ्कल्पनामयीम् । सिद्धिं नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादयः ॥ १९ ॥

prakalpya vatsaṁ kapilaṁ siddhāḥ saṅkalpanāmayīm siddhiṁ nabhasi vidyāṁ ca ye ca vidyādharādayaḥ

सिद्धों ने कपिल को बछड़ा बनाकर आकाश को पात्र मानकर संकल्पमयी सिद्धि दुही, और विद्याधर आदि ने (अपनी) विद्या को दुहा।

श्लोक 20 (bhagavata.4.18.20)

अन्ये च मायिनो मायामन्तर्धानाद्भुतात्मनाम् । मयं प्रकल्प्य वत्सं ते दुदुहुर्धारणामयीम् ॥ २० ॥

anye ca māyino māyām antardhānādbhutātmanām mayaṁ prakalpya vatsaṁ te duduhur dhāraṇāmayīm

और अन्य मायावी जनों ने मय को बछड़ा बनाकर, अंतर्धान होने की अद्भुत क्षमता वाली धारणामयी माया को दुहा।

श्लोक 21 (bhagavata.4.18.21)

यक्षरक्षांसि भूतानि पिशाचाः पिशिताशनाः । भूतेशवत्सा दुदुहुः कपाले क्षतजासवम् ॥ २१ ॥

yakṣa-rakṣāṁsi bhūtāni piśācāḥ piśitāśanāḥ bhūteśa-vatsā duduhuḥ kapāle kṣatajāsavam

यक्ष, राक्षस, भूत तथा मांसभक्षी पिशाचों ने भूतेश (शिव) के अवतार को बछड़ा बनाकर, कपाल में रक्तमय मादक पेय दुहा।

श्लोक 22 (bhagavata.4.18.22)

तथाहयो दन्दशूकाः सर्पा नागाश्च तक्षकम् । विधाय वत्सं दुदुहुर्बिलपात्रे विषं पयः ॥ २२ ॥

tathāhayo dandaśūkāḥ sarpā nāgāś ca takṣakam vidhāya vatsaṁ duduhur bila-pātre viṣaṁ payaḥ

इसी प्रकार दंश करने वाले सर्पों, नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाकर, बिल-रूपी पात्र में विषमय दूध दुहा।

श्लोक 23 (bhagavata.4.18.23)

पशवो यवसं क्षीरं वत्सं कृत्वा च गोवृषम् । अरण्यपात्रे चाधुक्षन्मृगेन्द्रेण च दंष्ट्रिणः ॥ २३ ॥

paśavo yavasaṁ kṣīraṁ vatsaṁ kṛtvā ca go-vṛṣam araṇya-pātre cādhukṣan mṛgendreṇa ca daṁṣṭriṇaḥ

पशुओं ने बैल को बछड़ा बनाकर, वन-रूपी पात्र में घास-रूपी दूध दुहा; और दाढ़ों वाले हिंस्र पशुओं ने मृगराज (सिंह) को बछड़ा बनाकर (मांस दुहा)।

श्लोक 24 (bhagavata.4.18.24)

क्रव्यादाः प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे कलेवरे । सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च ॥ २४ ॥

kravyādāḥ prāṇinaḥ kravyaṁ duduhuḥ sve kalevare suparṇa-vatsā vihagāś caraṁ cācaram eva ca

मांसभक्षी प्राणियों ने अपने ही शरीर को पात्र बनाकर मांस-रूपी दूध दुहा; और गरुड़ को बछड़ा बनाकर पक्षियों ने चर तथा अचर दोनों प्रकार का (आहार) दुहा।

श्लोक 25 (bhagavata.4.18.25)

वटवत्सा वनस्पतयः पृथग्रसमयं पयः । गिरयो हिमवद्वत्सा नानाधातून् स्वसानुषु ॥ २५ ॥

vaṭa-vatsā vanaspatayaḥ pṛthag rasamayaṁ payaḥ girayo himavad-vatsā nānā-dhātūn sva-sānuṣu

वृक्षों ने वट को बछड़ा बनाकर अपना-अपना रसमय दूध दुहा; पर्वतों ने हिमालय को बछड़ा बनाकर अपने-अपने शिखरों में नाना प्रकार की धातुएँ दुहीं।

श्लोक 26 (bhagavata.4.18.26)

सर्वे स्वमुख्यवत्सेन स्वे स्वे पात्रे पृथक् पयः । सर्वकामदुघां पृथ्वीं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥ २६ ॥

sarve sva-mukhya-vatsena sve sve pātre pṛthak payaḥ sarva-kāma-dughāṁ pṛthvīṁ duduhuḥ pṛthu-bhāvitām

इस प्रकार सभी ने अपने-अपने प्रमुख को बछड़ा बनाकर, अपने-अपने पात्र में पृथक-पृथक दूध, पृथु द्वारा अनुकूल बनाई गई सर्वकामदा पृथ्वी से दुहा।

श्लोक 27 (bhagavata.4.18.27)

एवं पृथ्वादयः पृथ्वीमन्नादाः स्वन्नमात्मनः । दोहवत्सादिभेदेन क्षीरभेदं कुरूद्वह ॥ २७ ॥

evaṁ pṛthv-ādayaḥ pṛthvīm annādāḥ svannam ātmanaḥ doha-vatsādi-bhedena kṣīra-bhedaṁ kurūdvaha

हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार पृथु तथा अन्य समस्त अन्नभोगी प्राणियों ने दोहनकर्ता, बछड़े आदि के भेद से भिन्न-भिन्न दूध के रूप में पृथ्वी से अपना-अपना अन्न प्राप्त किया।

श्लोक 28 (bhagavata.4.18.28)

ततो महीपतिः प्रीतः सर्वकामदुघां पृथुः । दुहितृत्वे चकारेमां प्रेम्णा दुहितृवत्सलः ॥ २८ ॥

tato mahīpatiḥ prītaḥ sarva-kāma-dughāṁ pṛthuḥ duhitṛtve cakāremāṁ premṇā duhitṛ-vatsalaḥ

तब पृथ्वी के स्वामी, सर्वकामदा पृथ्वी से प्रसन्न पृथु ने प्रेमपूर्वक, पुत्री के समान वत्सल होकर, उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।

श्लोक 29 (bhagavata.4.18.29)

चूर्णयन् स्वधनुष्कोट्या गिरिकूटानि राजराट् । भूमण्डलमिदं वैन्यः प्रायश्चक्रे समं विभुः ॥ २९ ॥

cūrṇayan sva-dhanuṣ-koṭyā giri-kūṭāni rāja-rāṭ bhū-maṇḍalam idaṁ vainyaḥ prāyaś cakre samaṁ vibhuḥ

अपने धनुष के अग्रभाग से पर्वत-शिखरों को चूर्ण करते हुए, राजाधिराज, प्रभावशाली वेन-पुत्र ने इस समस्त भूमंडल को प्रायः समतल कर दिया।

श्लोक 30 (bhagavata.4.18.30)

अथास्मिन् भगवान् वैन्यः प्रजानां वृत्तिदः पिता । निवासान् कल्पयां चक्रे तत्र तत्र यथार्हतः ॥ ३० ॥

athāsmin bhagavān vainyaḥ prajānāṁ vṛttidaḥ pitā nivāsān kalpayāṁ cakre tatra tatra yathārhataḥ

तत्पश्चात् प्रजाओं के लिए जीविका देने वाले पिता-तुल्य भगवान् वेन-पुत्र ने इस (समतल भूमि) पर यथोचित स्थानों पर निवास-स्थल व्यवस्थित किए।

श्लोक 31 (bhagavata.4.18.31)

ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च । घोषान् व्रजान् सशिबिरानाकरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१ ॥

grāmān puraḥ pattanāni durgāṇi vividhāni ca ghoṣān vrajān sa-śibirān ākarān kheṭa-kharvaṭān

गाँव, नगर तथा पत्तन, और विविध प्रकार के दुर्ग; गोपग्राम, गोशालाएँ शिविरों सहित, खानें, तथा कस्बे और छोटे गाँव — (इन सबका उसने निर्माण किया)।

श्लोक 32 (bhagavata.4.18.32)

प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना । यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभयाः ॥ ३२ ॥

prāk pṛthor iha naivaiṣā pura-grāmādi-kalpanā yathā-sukhaṁ vasanti sma tatra tatrākutobhayāḥ

पृथु से पूर्व यहाँ नगर-ग्राम आदि की ऐसी कोई योजना नहीं थी। लोग जहाँ चाहे, सुखपूर्वक, निर्भय होकर बस जाते थे।

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