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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19

राजा पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (bhagavata.4.19.1)

मैत्रेय उवाच अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः । ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥ १ ॥

maitreya uvāca athādīkṣata rājā tu hayamedha-śatena saḥ brahmāvarte manoḥ kṣetre yatra prācī sarasvatī

मैत्रेय ने कहा — तत्पश्चात् उस राजा ने मनु के क्षेत्र ब्रह्मावर्त में, जहाँ सरस्वती पूर्व दिशा की ओर बहती है, सौ अश्वमेध यज्ञों के लिए दीक्षा ली।

श्लोक 2 (bhagavata.4.19.2)

तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः । शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ २ ॥

tad abhipretya bhagavān karmātiśayam ātmanaḥ śata-kratur na mamṛṣe pṛthor yajña-mahotsavam

अपने कर्मों की उस अधिकता को समझकर, भगवान शतक्रतु (इन्द्र) पृथु के उस महान यज्ञोत्सव को सहन न कर सके।

श्लोक 3 (bhagavata.4.19.3)

यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्भगवान् हरिरीश्वरः । अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः ॥ ३ ॥

yatra yajña-patiḥ sākṣād bhagavān harir īśvaraḥ anvabhūyata sarvātmā sarva-loka-guruḥ prabhuḥ

वहाँ यज्ञ के स्वामी, सबके आत्मस्वरूप, समस्त लोकों के गुरु, स्वयं भगवान् हरि साक्षात् अनुभव किए गए।

श्लोक 4 (bhagavata.4.19.4)

अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालैः सहानुगैः । उपगीयमानो गन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणैः ॥ ४ ॥

anvito brahma-śarvābhyāṁ loka-pālaiḥ sahānugaiḥ upagīyamāno gandharvair munibhiś cāpsaro-gaṇaiḥ

ब्रह्मा और शिव के साथ, तथा अपने अनुचरों सहित लोकपालों के साथ, वे गन्धर्वों, मुनियों और अप्सराओं के समूहों द्वारा गान द्वारा स्तुत किए जा रहे थे।

श्लोक 5 (bhagavata.4.19.5)

सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्यकादयः । सुनन्दनन्दप्रमुखाः पार्षदप्रवरा हरेः ॥ ५ ॥

siddhā vidyādharā daityā dānavā guhyakādayaḥ sunanda-nanda-pramukhāḥ pārṣada-pravarā hareḥ

सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, गुह्यक आदि, तथा सुनन्द और नन्द के नेतृत्व में हरि के प्रमुख पार्षद (वहाँ उपस्थित थे)।

श्लोक 6 (bhagavata.4.19.6)

कपिलो नारदो दत्तो योगेशाः सनकादयः । तमन्वीयुर्भागवता ये च तत्सेवनोत्सुकाः ॥ ६ ॥

kapilo nārado datto yogeśāḥ sanakādayaḥ tam anvīyur bhāgavatā ye ca tat-sevanotsukāḥ

कपिल, नारद, दत्त, सनक आदि योगेश्वर, तथा उनकी सेवा के इच्छुक अन्य समस्त भागवत भक्तजन उनके साथ-साथ चले।

श्लोक 7 (bhagavata.4.19.7)

यत्र धर्मदुघा भूमिः सर्वकामदुघा सती । दोग्धि स्माभीप्सितानर्थान् यजमानस्य भारत ॥ ७ ॥

yatra dharma-dughā bhūmiḥ sarva-kāma-dughā satī dogdhi smābhīpsitān arthān yajamānasya bhārata

हे भारत! वहाँ धर्म को दुहने वाली तथा सर्वकामदा सती पृथ्वी ने यजमान की समस्त अभीष्ट वस्तुओं को उत्पन्न किया।

श्लोक 8 (bhagavata.4.19.8)

ऊहुः सर्वरसान्नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान् । तरवो भूरिवर्ष्माणः प्रासूयन्त मधुच्युतः ॥ ८ ॥

ūhuḥ sarva-rasān nadyaḥ kṣīra-dadhy-anna-go-rasān taravo bhūri-varṣmāṇaḥ prāsūyanta madhu-cyutaḥ

नदियाँ सभी प्रकार के रस बहाने लगीं, दूध, दही, अन्न तथा गोरस भी; और विशाल वृक्ष मधु टपकाते हुए फल देने लगे।

श्लोक 9 (bhagavata.4.19.9)

सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्नं चतुर्विधम् । उपायनमुपाजह्रुः सर्वे लोकाः सपालकाः ॥ ९ ॥

sindhavo ratna-nikarān girayo ’nnaṁ catur-vidham upāyanam upājahruḥ sarve lokāḥ sa-pālakāḥ

समुद्रों ने रत्न-राशि भेंट स्वरूप अर्पित की, पर्वतों ने चार प्रकार का अन्न, और अपने पालकों सहित समस्त लोकों ने भेंट अर्पित की।

श्लोक 10 (bhagavata.4.19.10)

इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् । असूयन् भगवानिन्द्रः प्रतिघातमचीकरत् ॥ १० ॥

iti cādhokṣajeśasya pṛthos tu paramodayam asūyan bhagavān indraḥ pratighātam acīkarat

इस प्रकार अधोक्षज (भगवान्) के स्वामित्व वाले पृथु की उस परम समृद्धि से ईर्ष्या करते हुए, भगवान् इन्द्र ने उसमें विघ्न डालना आरंभ किया।

श्लोक 11 (bhagavata.4.19.11)

चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् । वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ ११ ॥

carameṇāśvamedhena yajamāne yajuṣ-patim vainye yajña-paśuṁ spardhann apovāha tirohitaḥ

जब यज्ञ-मंत्रों के स्वामी वेन-पुत्र अंतिम अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे, तब स्पर्धावश छिपकर इन्द्र यज्ञ-पशु (अश्व) को हर ले गया।

श्लोक 12 (bhagavata.4.19.12)

तमत्रिर्भगवानैक्षत्त्वरमाणं विहायसा । आमुक्तमिव पाखण्डं योऽधर्मे धर्मविभ्रमः ॥ १२ ॥

tam atrir bhagavān aikṣat tvaramāṇaṁ vihāyasā āmuktam iva pākhaṇḍaṁ yo ’dharme dharma-vibhramaḥ

भगवान् अत्रि ने उसे आकाश में शीघ्रता से जाते हुए देखा, मानो वह पाखंड का वेश धारण किए हो — जो अधर्म में धर्म का आभास मात्र है।

श्लोक 13 (bhagavata.4.19.13)

अत्रिणा चोदितो हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः । अन्वधावत सङ्कुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १३ ॥

atriṇā codito hantuṁ pṛthu-putro mahā-rathaḥ anvadhāvata saṅkruddhas tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt

अत्रि द्वारा उसे मारने के लिए प्रेरित किए जाने पर, महारथी पृथु-पुत्र अत्यंत क्रुद्ध होकर 'ठहरो! ठहरो!' कहते हुए उसका पीछा करने लगे।

श्लोक 14 (bhagavata.4.19.14)

तं तादृशाकृतिं वीक्ष्य मेने धर्मं शरीरिणम् । जटिलं भस्मनाच्छन्नं तस्मै बाणं न मुञ्चति ॥ १४ ॥

taṁ tādṛśākṛtiṁ vīkṣya mene dharmaṁ śarīriṇam jaṭilaṁ bhasmanācchannaṁ tasmai bāṇaṁ na muñcati

उसके उस रूप को देखकर — जटाधारी, भस्म से आच्छादित — उसने उसे साक्षात् शरीरधारी धर्म समझा, और उस पर बाण नहीं चलाया।

श्लोक 15 (bhagavata.4.19.15)

वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेऽत्रिरचोदयत् । जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम् ॥ १५ ॥

vadhān nivṛttaṁ taṁ bhūyo hantave ’trir acodayat jahi yajña-hanaṁ tāta mahendraṁ vibudhādhamam

जब वह वध से विरत हो गया, तो अत्रि ने उसे पुनः वध हेतु प्रेरित किया — हे तात! यज्ञ के विनाशक, देवताओं में अधम, महेन्द्र का वध करो।

श्लोक 16 (bhagavata.4.19.16)

एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा । अन्वद्रवदभिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६ ॥

evaṁ vainya-sutaḥ proktas tvaramāṇaṁ vihāyasā anvadravad abhikruddho rāvaṇaṁ gṛdhra-rāḍ iva

इस प्रकार कहे जाने पर, वेन-पौत्र आकाश में तेजी से जाते हुए उसका, अत्यंत क्रुद्ध होकर, वैसे ही पीछा करने लगे, जैसे गृध्रराज ने रावण का किया था।

श्लोक 17 (bhagavata.4.19.17)

सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट् । वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥ १७ ॥

so ’śvaṁ rūpaṁ ca tad dhitvā tasmā antarhitaḥ svarāṭ vīraḥ sva-paśum ādāya pitur yajñam upeyivān

वह स्वराट् (इन्द्र) उस अश्व और उस वेष को छोड़कर वहीं से अंतर्धान हो गया; और वीर ने अपने पशु को लेकर पिता के यज्ञ की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 18 (bhagavata.4.19.18)

तत्तस्य चाद्भुतं कर्म विचक्ष्य परमर्षयः । नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥ १८ ॥

tat tasya cādbhutaṁ karma vicakṣya paramarṣayaḥ nāmadheyaṁ dadus tasmai vijitāśva iti prabho

हे प्रभो! उसके उस अद्भुत कर्म को देखकर, परम ऋषियों ने उसे 'विजिताश्व' नामक उपाधि प्रदान की।

श्लोक 19 (bhagavata.4.19.19)

उपसृज्य तमस्तीव्रं जहाराश्वं पुनर्हरिः । चषालयूपतश्छन्नो हिरण्यरशनं विभुः ॥ १९ ॥

upasṛjya tamas tīvraṁ jahārāśvaṁ punar hariḥ caṣāla-yūpataś channo hiraṇya-raśanaṁ vibhuḥ

घोर अंधकार फैलाकर, शक्तिशाली इन्द्र ने छिपकर, यूप के शिखर पर स्वर्ण-रज्जु से बँधे उस अश्व को पुनः हर लिया।

श्लोक 20 (bhagavata.4.19.20)

अत्रिः सन्दर्शयामास त्वरमाणं विहायसा । कपालखट्वाङ्गधरं वीरो नैनमबाधत ॥ २० ॥

atriḥ sandarśayām āsa tvaramāṇaṁ vihāyasā kapāla-khaṭvāṅga-dharaṁ vīro nainam abādhata

अत्रि ने पुनः आकाश में शीघ्रता से जाते हुए, कपाल तथा खट्वांग धारण किए उसे दिखाया; परंतु वीर ने फिर भी उसे बाधा नहीं पहुँचाई।

श्लोक 21 (bhagavata.4.19.21)

अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा । सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ॥ २१ ॥

atriṇā coditas tasmai sandadhe viśikhaṁ ruṣā so ’śvaṁ rūpaṁ ca tad dhitvā tasthāv antarhitaḥ svarāṭ

अत्रि द्वारा पुनः प्रेरित किए जाने पर उसने क्रोधवश उस पर बाण चढ़ाया; तब वह स्वराट् उस अश्व और वेष को छोड़कर अंतर्धान होकर वहीं ठहर गया।

श्लोक 22 (bhagavata.4.19.22)

वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत् । तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः ॥ २२ ॥

vīraś cāśvam upādāya pitṛ-yajñam athāvrajat tad avadyaṁ hare rūpaṁ jagṛhur jñāna-durbalāḥ

और वीर उस अश्व को लेकर पुनः पिता के यज्ञ में गए। इन्द्र के उस निन्दनीय वेष को बाद में ज्ञान से हीन लोगों ने अपना लिया।

श्लोक 23 (bhagavata.4.19.23)

यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया । तानि पापस्य खण्डानि लिङ्गं खण्डमिहोच्यते ॥ २३ ॥

yāni rūpāṇi jagṛhe indro haya-jihīrṣayā tāni pāpasya khaṇḍāni liṅgaṁ khaṇḍam ihocyate

अश्व-हरण की इच्छा से इन्द्र ने जो-जो रूप धारण किए, वे यहाँ पाप के खंड कहे जाते हैं, और उनका बाह्य चिह्न ही 'खंड' कहलाता है।

श्लोक 24 (bhagavata.4.19.24)

एवमिन्द्रे हरत्यश्वं वैन्ययज्ञजिघांसया । तद्गृहीतविसृष्टेषु पाखण्डेषु मतिर्नृणाम् ॥ २४ ॥

evam indre haraty aśvaṁ vainya-yajña-jighāṁsayā tad-gṛhīta-visṛṣṭeṣu pākhaṇḍeṣu matir nṛṇām

इस प्रकार वेन-पुत्र के यज्ञ को नष्ट करने की इच्छा से इन्द्र द्वारा अश्व-हरण किए जाने पर, उनके द्वारा ग्रहण किए गए तथा त्यागे गए उन पाखंडों में मनुष्यों की बुद्धि आसक्त हो गई।

श्लोक 25 (bhagavata.4.19.25)

धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु । प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५ ॥

dharma ity upadharmeṣu nagna-rakta-paṭādiṣu prāyeṇa sajjate bhrāntyā peśaleṣu ca vāgmiṣu

इसी को धर्म समझकर मनुष्य प्रायः भ्रमवश नग्नता, रक्त-वस्त्र आदि जैसे उपधर्मों में, तथा उनके मृदुभाषी वाक्पटु (उपदेशकों) में आसक्त हो जाते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.4.19.26)

तदभिज्ञाय भगवान्पृथुः पृथुपराक्रमः । इन्द्राय कुपितो बाणमादत्तोद्यतकार्मुकः ॥ २६ ॥

tad abhijñāya bhagavān pṛthuḥ pṛthu-parākramaḥ indrāya kupito bāṇam ādattodyata-kārmukaḥ

यह जानकर, अत्यंत पराक्रमी भगवान् पृथु इन्द्र पर क्रुद्ध हो गए, और धनुष उठाकर बाण ले लिया।

श्लोक 27 (bhagavata.4.19.27)

तमृत्विजः शक्रवधाभिसन्धितंविचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम् । निवारयामासुरहो महामतेन युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात् ॥ २७ ॥

tam ṛtvijaḥ śakra-vadhābhisandhitaṁ vicakṣya duṣprekṣyam asahya-raṁhasam nivārayām āsur aho mahā-mate na yujyate ’trānya-vadhaḥ pracoditāt

इन्द्र-वध पर उतारू, दुर्दर्श तथा असह्य वेग वाले उस राजा को देखकर, ऋत्विजों ने उन्हें रोका — हे महामते! यहाँ जो (यज्ञ हेतु) नियत नहीं है, उसका वध उचित नहीं है।

श्लोक 28 (bhagavata.4.19.28)

वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनंह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम् । अयातयामोपहवैरनन्तरंप्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम् ॥ २८ ॥

vayaṁ marutvantam ihārtha-nāśanaṁ hvayāmahe tvac-chravasā hata-tviṣam ayātayāmopahavair anantaraṁ prasahya rājan juhavāma te ’hitam

हे राजन्! हम यहाँ (तुम्हारे कार्य के) विघातक, तुम्हारी कीर्ति से जिसका तेज पहले ही नष्ट हो चुका है, उस मरुत्वान् (इन्द्र) का आह्वान करेंगे; और अक्षत मंत्रों द्वारा शीघ्र ही तुम्हारे इस शत्रु को बलपूर्वक हवन कर देंगे।

श्लोक 29 (bhagavata.4.19.29)

इत्यामन्त्र्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा । स्रुग्घस्ताञ्जुह्वतोऽभ्येत्य स्वयम्भूः प्रत्यषेधत ॥ २९ ॥

ity āmantrya kratu-patiṁ vidurāsyartvijo ruṣā srug-ghastāñ juhvato ’bhyetya svayambhūḥ pratyaṣedhata

हे विदुर! इस प्रकार क्रोधवश यज्ञपति (इन्द्र) का आह्वान करके, स्रुक् हाथों में लिए हवन करने को उद्यत उन ऋत्विजों को, वहाँ आकर स्वयंभू ब्रह्मा ने रोक दिया।

श्लोक 30 (bhagavata.4.19.30)

न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनुः । यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः ॥ ३० ॥

na vadhyo bhavatām indro yad yajño bhagavat-tanuḥ yaṁ jighāṁsatha yajñena yasyeṣṭās tanavaḥ surāḥ

इन्द्र तुम लोगों के द्वारा वध्य नहीं है, क्योंकि यज्ञ स्वयं भगवान् का शरीर है, और जिसे तुम इस यज्ञ द्वारा मारना चाहते हो, देवगण भी उसी के प्रिय अंग-स्वरूप हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.4.19.31)

तदिदं पश्यत महद्धर्मव्यतिकरं द्विजाः । इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञः कर्मैतद्विजिघांसता ॥ ३१ ॥

tad idaṁ paśyata mahad- dharma-vyatikaraṁ dvijāḥ indreṇānuṣṭhitaṁ rājñaḥ karmaitad vijighāṁsatā

हे द्विजो! देखो, राजा के इस यज्ञ-कर्म को नष्ट करने की इच्छा से इन्द्र द्वारा किया गया यह धर्म का महान् विपर्यय।

श्लोक 32 (bhagavata.4.19.32)

पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतुः । अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित् ॥ ३२ ॥

pṛthu-kīrteḥ pṛthor bhūyāt tarhy ekona-śata-kratuḥ alaṁ te kratubhiḥ sviṣṭair yad bhavān mokṣa-dharma-vit

अतः विशाल कीर्ति वाले पृथु के निन्यानबे यज्ञ ही सम्पन्न हों — तुम्हारे लिए इतने सुसम्पन्न यज्ञ पर्याप्त हैं, क्योंकि तुम मोक्ष-धर्म के ज्ञाता हो।

श्लोक 33 (bhagavata.4.19.33)

नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि । उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ ॥ ३३ ॥

naivātmane mahendrāya roṣam āhartum arhasi ubhāv api hi bhadraṁ te uttamaśloka-vigrahau

तुम्हें महेन्द्र के प्रति, मानो वह तुम्हारा ही स्वरूप हो, क्रोध नहीं करना चाहिए — तुम्हारा कल्याण हो, तुम दोनों ही उत्तमश्लोक (भगवान्) के विग्रह हो।

श्लोक 34 (bhagavata.4.19.34)

मास्मिन्महाराज कृथाः स्म चिन्तांनिशामयास्मद्वच आदृतात्मा । यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुंमनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम् ॥ ३४ ॥

māsmin mahārāja kṛthāḥ sma cintāṁ niśāmayāsmad-vaca ādṛtātmā yad dhyāyato daiva-hataṁ nu kartuṁ mano ’tiruṣṭaṁ viśate tamo ’ndham

हे महाराज! इस पर चिंता न करो, हमारे वचनों को आदरपूर्वक सुनो। क्योंकि दैव द्वारा विफल किए गए कार्य को पुनः करने का निरंतर चिंतन करता हुआ अत्यंत क्रुद्ध मन अंधकारमय तमस् में प्रवेश कर जाता है।

श्लोक 35 (bhagavata.4.19.35)

क्रतुर्विरमतामेष देवेषु दुरवग्रहः । धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैरिन्द्रनिर्मितैः ॥ ३५ ॥

kratur viramatām eṣa deveṣu duravagrahaḥ dharma-vyatikaro yatra pākhaṇḍair indra-nirmitaiḥ

देवताओं के प्रति यह दुराग्रह उत्पन्न करने वाला यह यज्ञ अब विराम ले, जिसमें इन्द्र द्वारा रचे गए पाखंडों से धर्म का विपर्यय हो गया है।

श्लोक 36 (bhagavata.4.19.36)

एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम् । ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट् ॥ ३६ ॥

ebhir indropasaṁsṛṣṭaiḥ pākhaṇḍair hāribhir janam hriyamāṇaṁ vicakṣvainaṁ yas te yajña-dhrug aśva-muṭ

देखो, जिसने तुम्हारे यज्ञ के साथ द्रोह किया और अश्व चुराया, वह इन्द्र द्वारा रचित इन आकर्षक पाखंडों से लोगों को (सन्मार्ग से) हर ले जाने वाला है।

श्लोक 37 (bhagavata.4.19.37)

भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो धर्मं जनानां समयानुरूपम् । वेनापचारादवलुप्तमद्य तद्देहतो विष्णुकलासि वैन्य ॥ ३७ ॥

bhavān paritrātum ihāvatīrṇo dharmaṁ janānāṁ samayānurūpam venāpacārād avaluptam adya tad-dehato viṣṇu-kalāsi vainya

हे वैन्य! तुम प्रजा के, युगानुकूल उस धर्म की रक्षा हेतु अवतरित हुए हो, जो आज वेन के अपराध से लुप्त हो गया था — क्योंकि तुम उसी शरीर से (प्रकट) विष्णु के अंश हो।

श्लोक 38 (bhagavata.4.19.38)

स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि । ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥ ३८ ॥

sa tvaṁ vimṛśyāsya bhavaṁ prajāpate saṅkalpanaṁ viśva-sṛjāṁ pipīpṛhi aindrīṁ ca māyām upadharma-mātaraṁ pracaṇḍa-pākhaṇḍa-pathaṁ prabho jahi

अतः, हे प्रजापते! अपने इस अवतार का प्रयोजन विचार कर, विश्व के स्रष्टाओं के संकल्प को पूर्ण करो। और हे प्रभो! उपधर्मों की जननी उस ऐन्द्री माया को, प्रचंड पाखंड-मार्ग को नष्ट करो।

श्लोक 39 (bhagavata.4.19.39)

मैत्रेय उवाच इत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पतिः । तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ॥ ३९ ॥

maitreya uvāca itthaṁ sa loka-guruṇā samādiṣṭo viśāmpatiḥ tathā ca kṛtvā vātsalyaṁ maghonāpi ca sandadhe

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार लोकगुरु (ब्रह्मा) द्वारा उपदिष्ट होकर, प्रजापालक (पृथु) ने वैसा ही किया, और स्नेहपूर्वक मघवान् (इन्द्र) से भी संधि कर ली।

श्लोक 40 (bhagavata.4.19.40)

कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे । वरान्ददुस्ते वरदा ये तद्बर्हिषि तर्पिताः ॥ ४० ॥

kṛtāvabhṛtha-snānāya pṛthave bhūri-karmaṇe varān dadus te varadā ye tad-barhiṣi tarpitāḥ

जब अनेक महान् कर्म करने वाले पृथु ने अवभृथ-स्नान कर लिया, तब उनके यज्ञ में तृप्त हुए वरदाता देवगणों ने उन्हें वर प्रदान किए।

श्लोक 41 (bhagavata.4.19.41)

विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः । आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः ॥ ४१ ॥

viprāḥ satyāśiṣas tuṣṭāḥ śraddhayā labdha-dakṣiṇāḥ āśiṣo yuyujuḥ kṣattar ādi-rājāya sat-kṛtāḥ

हे क्षत्तः! जिनका आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता, उन ब्राह्मणों ने, श्रद्धापूर्वक दी गई दक्षिणा पाकर संतुष्ट तथा सम्मानित होकर, आदिराज (पृथु) को आशीर्वाद दिए।

श्लोक 42 (bhagavata.4.19.42)

त्वयाहूता महाबाहो सर्व एव समागताः । पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवाः ॥ ४२ ॥

tvayāhūtā mahā-bāho sarva eva samāgatāḥ pūjitā dāna-mānābhyāṁ pitṛ-devarṣi-mānavāḥ

हे महाबाहो! तुम्हारे आह्वान से पितर, देवगण, ऋषि तथा मनुष्य — सभी यहाँ एकत्र हुए हैं, और तुमने दान तथा सम्मान से उन सबका पूजन किया है।

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