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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20

महाराज पृथु के यज्ञमंडप में भगवान् विष्णु का प्राकट्य

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (bhagavata.4.20.1)

मैत्रेय उवाच । भगवानपि वैकुण्ठः साकं मघवता विभुः । यज्ञैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक् तमभाषत ॥ १ ॥

maitreya uvāca bhagavān api vaikuṇṭhaḥ sākaṁ maghavatā vibhuḥ yajñair yajña-patis tuṣṭo yajña-bhuk tam abhāṣata

मैत्रेय ने कहा — तब यज्ञों से संतुष्ट, यज्ञ के भोक्ता तथा स्वामी, वैकुण्ठवासी प्रभावशाली भगवान् ने मघवान् (इन्द्र) के साथ आकर उससे (पृथु से) कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.4.20.2)

श्रीभगवानुवाच एष तेऽकार्षीद्भङ्गं हयमेधशतस्य ह । क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमर्हसि ॥ २ ॥

śrī-bhagavān uvāca eṣa te ’kārṣīd bhaṅgaṁ haya-medha-śatasya ha kṣamāpayata ātmānam amuṣya kṣantum arhasi

भगवान् ने कहा — इसने तुम्हारे सौ अश्वमेध यज्ञों में विघ्न डाला था; अब यह क्षमा-याचना करने आया है, तुम्हें इसे क्षमा कर देना चाहिए।

श्लोक 3 (bhagavata.4.20.3)

सुधियः साधवो लोके नरदेव नरोत्तमाः । नाभिद्रुह्यन्ति भूतेभ्यो यर्हि नात्मा कलेवरम् ॥ ३ ॥

sudhiyaḥ sādhavo loke naradeva narottamāḥ nābhidruhyanti bhūtebhyo yarhi nātmā kalevaram

हे नरदेव! जब तक आत्मा शरीर नहीं है (यह जानते हुए), संसार में सद्बुद्धि, सज्जन तथा श्रेष्ठ पुरुष किसी भी प्राणी से द्रोह नहीं करते।

श्लोक 4 (bhagavata.4.20.4)

पुरुषा यदि मुह्यन्ति त्वादृशा देवमायया । श्रम एव परं जातो दीर्घया वृद्धसेवया ॥ ४ ॥

puruṣā yadi muhyanti tvādṛśā deva-māyayā śrama eva paraṁ jāto dīrghayā vṛddha-sevayā

यदि तुम्हारे जैसे पुरुष भी दैवी माया से मोहित हो जाएँ, तो दीर्घकाल तक की गई वृद्धजनों की सेवा केवल व्यर्थ का परिश्रम ही सिद्ध होगी।

श्लोक 5 (bhagavata.4.20.5)

अतः कायमिमं विद्वानविद्याकामकर्मभिः । आरब्ध इति नैवास्मिन्प्रतिबुद्धोऽनुषज्जते ॥ ५ ॥

ataḥ kāyam imaṁ vidvān avidyā-kāma-karmabhiḥ ārabdha iti naivāsmin pratibuddho ’nuṣajjate

अतः जो विद्वान जानता है कि यह शरीर अविद्या, काम और कर्म से उत्पन्न हुआ है, वह जाग्रत होकर इसमें आसक्त नहीं होता।

श्लोक 6 (bhagavata.4.20.6)

असंसक्तः शरीरेऽस्मिन्नमुनोत्पादिते गृहे । अपत्ये द्रविणे वापि कः कुर्यान्ममतां बुधः ॥ ६ ॥

asaṁsaktaḥ śarīre ’sminn amunotpādite gṛhe apatye draviṇe vāpi kaḥ kuryān mamatāṁ budhaḥ

जो इस शरीर के प्रति भी अनासक्त है, वह बुद्धिमान इससे उत्पन्न घर, संतान अथवा धन के प्रति ममता भला क्यों करेगा?

श्लोक 7 (bhagavata.4.20.7)

एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः । सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्मात्मात्मनः परः ॥ ७ ॥

ekaḥ śuddhaḥ svayaṁ-jyotir nirguṇo ’sau guṇāśrayaḥ sarva-go ’nāvṛtaḥ sākṣī nirātmātmātmanaḥ paraḥ

वह (आत्मा) एक, शुद्ध, स्वयं-प्रकाशित, गुणों से रहित होते हुए भी गुणों का आश्रय है; सर्वव्यापी, अनावृत, साक्षी, अपने अतिरिक्त अन्य किसी आत्मा से रहित, तथा जीवात्मा से भी परे है।

श्लोक 8 (bhagavata.4.20.8)

य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुषः । नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः स मयि स्थितः ॥ ८ ॥

ya evaṁ santam ātmānam ātma-sthaṁ veda pūruṣaḥ nājyate prakṛti-stho ’pi tad-guṇaiḥ sa mayi sthitaḥ

जो पुरुष इस प्रकार आत्मस्थ, विद्यमान आत्मा को जानता है, वह प्रकृति में स्थित रहते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता — वह मुझमें ही स्थित रहता है।

श्लोक 9 (bhagavata.4.20.9)

यः स्वधर्मेण मां नित्यं निराशीः श्रद्धयान्वितः । भजते शनकैस्तस्य मनो राजन् प्रसीदति ॥ ९ ॥

yaḥ sva-dharmeṇa māṁ nityaṁ nirāśīḥ śraddhayānvitaḥ bhajate śanakais tasya mano rājan prasīdati

हे राजन्! जो अपने स्वधर्म द्वारा, निष्काम भाव से तथा श्रद्धा सहित, मेरा नित्य भजन करता है, उसका मन धीरे-धीरे प्रसन्न (शांत) हो जाता है।

श्लोक 10 (bhagavata.4.20.10)

परित्यक्तगुणः सम्यग्दर्शनो विशदाशयः । शान्तिं मे समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमश्नुते ॥ १० ॥

parityakta-guṇaḥ samyag darśano viśadāśayaḥ śāntiṁ me samavasthānaṁ brahma kaivalyam aśnute

गुणों को त्यागकर, सम्यक् दृष्टि तथा निर्मल हृदय वाला वह पुरुष शांति, मेरे समान स्थिति, ब्रह्म तथा कैवल्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (bhagavata.4.20.11)

उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् । कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ ११ ॥

udāsīnam ivādhyakṣaṁ dravya-jñāna-kriyātmanām kūṭa-stham imam ātmānaṁ yo vedāpnoti śobhanam

जो द्रव्य, ज्ञान और क्रिया-स्वरूप (शरीर) के मानो उदासीन अध्यक्ष, अपरिवर्तनशील इस आत्मा को जानता है, वह कल्याण को प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (bhagavata.4.20.12)

भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहो द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः । दृष्टासु सम्पत्सु विपत्सु सूरयो न विक्रियन्ते मयि बद्धसौहृदाः ॥ १२ ॥

bhinnasya liṅgasya guṇa-pravāho dravya-kriyā-kāraka-cetanātmanaḥ dṛṣṭāsu sampatsu vipatsu sūrayo na vikriyante mayi baddha-sauhṛdāḥ

द्रव्य, क्रिया, कारक तथा चेतना से बना यह लिंग-शरीर (आत्मा से) भिन्न, गुणों का मात्र प्रवाह है। सम्पत्ति अथवा विपत्ति को देखकर भी, मुझमें सौहार्दपूर्वक बंधे हुए बुद्धिमान जन विचलित नहीं होते।

श्लोक 13 (bhagavata.4.20.13)

समः समानोत्तममध्यमाधमः सुखे च दुःखे च जितेन्द्रियाशयः । मयोपक्लृप्ताखिललोकसंयुतो विधत्स्व वीराखिललोकरक्षणम् ॥ १३ ॥

samaḥ samānottama-madhyamādhamaḥ sukhe ca duḥkhe ca jitendriyāśayaḥ mayopakḷptākhila-loka-saṁyuto vidhatsva vīrākhila-loka-rakṣaṇam

हे वीर! समान, श्रेष्ठ और निम्न — सभी के प्रति, सुख और दुःख में भी, समभाव रखो, अपने चित्त और इन्द्रियों को जीतो; तथा मेरे द्वारा सम्पूर्ण लोक के साधनों से युक्त होकर, समस्त प्रजाओं की रक्षा का दायित्व निभाओ।

श्लोक 14 (bhagavata.4.20.14)

श्रेयः प्रजापालनमेव राज्ञो यत्साम्पराये सुकृतात् षष्ठमंशम् । हर्तान्यथा हृतपुण्यः प्रजाना- मरक्षिता करहारोऽघमत्ति ॥ १४ ॥

śreyaḥ prajā-pālanam eva rājño yat sāmparāye sukṛtāt ṣaṣṭham aṁśam hartānyathā hṛta-puṇyaḥ prajānām arakṣitā kara-hāro ’gham atti

राजा का कल्याण केवल प्रजा-पालन में ही है, जिससे परलोक में वह प्रजा के पुण्य का छठा भाग प्राप्त करता है; अन्यथा जो कर तो लेता है पर रक्षा नहीं करता, वह अपना पुण्य खोकर अरक्षित प्रजा के पाप को ही भोगता है।

श्लोक 15 (bhagavata.4.20.15)

एवं द्विजाग्र्यानुमतानुवृत्त धर्मप्रधानोऽन्यतमोऽवितास्याः । ह्रस्वेन कालेन गृहोपयातान् द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोकः ॥ १५ ॥

evaṁ dvijāgryānumatānuvṛtta- dharma-pradhāno ’nyatamo ’vitāsyāḥ hrasvena kālena gṛhopayātān draṣṭāsi siddhān anurakta-lokaḥ

इस प्रकार श्रेष्ठ द्विजों द्वारा अनुमोदित धर्म को प्रधानता देकर, अन्य किसी के समान इसकी रक्षा करते हुए, अल्प काल में ही, प्रजा द्वारा अनुरक्त होकर, तुम अपने घर आए हुए सिद्ध पुरुषों को देखोगे।

श्लोक 16 (bhagavata.4.20.16)

वरं च मत्कञ्चन मानवेन्द्र वृणीष्व तेऽहं गुणशीलयन्त्रितः । नाहं मखैर्वै सुलभस्तपोभि- र्योगेन वा यत्समचित्तवर्ती ॥ १६ ॥

varaṁ ca mat kañcana mānavendra vṛṇīṣva te ’haṁ guṇa-śīla-yantritaḥ nāhaṁ makhair vai sulabhas tapobhir yogena vā yat sama-citta-vartī

हे मानवेन्द्र! तुम्हारे गुण और शील से बँधा हुआ मैं तुमसे कोई भी वर माँगने को कहता हूँ। मैं यज्ञों, तपस्याओं अथवा योग से सहज सुलभ नहीं हूँ — मैं तो समचित्त वाले के हृदय में ही निवास करता हूँ।

श्लोक 17 (bhagavata.4.20.17)

मैत्रेय उवाच स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित् । अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः ॥ १७ ॥

maitreya uvāca sa itthaṁ loka-guruṇā viṣvaksenena viśva-jit anuśāsita ādeśaṁ śirasā jagṛhe hareḥ

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार लोकगुरु विष्वक्सेन (भगवान्) द्वारा उपदेशित होकर, विश्वविजयी पृथु ने हरि की आज्ञा को शिरोधार्य किया।

श्लोक 18 (bhagavata.4.20.18)

स्पृशन्तं पादयोः प्रेम्णा व्रीडितं स्वेन कर्मणा । शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १८ ॥

spṛśantaṁ pādayoḥ premṇā vrīḍitaṁ svena karmaṇā śata-kratuṁ pariṣvajya vidveṣaṁ visasarja ha

अपने ही कृत्य से लज्जित शतक्रतु (इन्द्र) जब प्रेमपूर्वक उनके चरण स्पर्श कर रहे थे, तब पृथु ने उन्हें आलिंगन कर सारी शत्रुता त्याग दी।

श्लोक 19 (bhagavata.4.20.19)

भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः । समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः ॥ १९ ॥

bhagavān atha viśvātmā pṛthunopahṛtārhaṇaḥ samujjihānayā bhaktyā gṛhīta-caraṇāmbujaḥ

तब विश्वात्मा भगवान्, पृथु द्वारा अर्घ्य से पूजित होकर, उमड़ती हुई भक्ति के साथ (पृथु द्वारा) उनके चरण-कमल पकड़े गए।

श्लोक 20 (bhagavata.4.20.20)

प्रस्थानाभिमुखोऽप्येनमनुग्रहविलम्बितः । पश्यन् पद्मपलाशाक्षो न प्रतस्थे सुहृत्सताम् ॥ २० ॥

prasthānābhimukho ’py enam anugraha-vilambitaḥ paśyan padma-palāśākṣo na pratasthe suhṛt satām

प्रस्थान के लिए उद्यत होते हुए भी, अनुग्रहवश विलंबित, कमलनयन तथा साधुओं के सुहृद वे भगवान् उसे देखते हुए प्रस्थान न कर सके।

श्लोक 21 (bhagavata.4.20.21)

स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं विलोकितुं नाशकदश्रुलोचनः । न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो हृदोपगुह्यामुमधादवस्थितः ॥ २१ ॥

sa ādi-rājo racitāñjalir hariṁ vilokituṁ nāśakad aśru-locanaḥ na kiñcanovāca sa bāṣpa-viklavo hṛdopaguhyāmum adhād avasthitaḥ

वह आदिराज, हाथ जोड़े, आँसुओं से भरे नेत्रों वाले होकर हरि को देख भी न सके; अश्रुगद्गद होकर कुछ भी न कह सके, और मात्र हृदय में उन्हें आलिंगन किए हुए खड़े रहे।

श्लोक 22 (bhagavata.4.20.22)

अथावमृज्याश्रुकला विलोकयन्- नतृप्तदृग्गोचरमाह पूरुषम् । पदा स्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नते विन्यस्तहस्ताग्रमुरङ्गविद्विषः ॥ २२ ॥

athāvamṛjyāśru-kalā vilokayann atṛpta-dṛg-gocaram āha pūruṣam padā spṛśantaṁ kṣitim aṁsa unnate vinyasta-hastāgram uraṅga-vidviṣaḥ

तब अश्रु-बिंदुओं को पोंछकर, अतृप्त नेत्रों से उस पुरुष को देखते हुए, जिनके चरण पृथ्वी को स्पर्श मात्र कर रहे थे और जिनका हस्ताग्र उरगशत्रु (गरुड़) के उन्नत कंधे पर टिका था, उसने (उनसे) कहा।

श्लोक 23 (bhagavata.4.20.23)

पृथुरुवाच वरान्विभो त्वद्वरदेश्वराद् बुधः कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम् । ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां तानीश कैवल्यपते वृणे न च ॥ २३ ॥

pṛthur uvāca varān vibho tvad varadeśvarād budhaḥ kathaṁ vṛṇīte guṇa-vikriyātmanām ye nārakāṇām api santi dehināṁ tān īśa kaivalya-pate vṛṇe na ca

पृथु ने कहा — हे विभो! आप जैसे वरदाताओं के भी ईश्वर से बुद्धिमान पुरुष गुणों से विकृत प्राणियों के वे वर भला क्यों माँगे, जो नारकीय जीवों को भी प्राप्त होते हैं? हे कैवल्यपते! उन्हें मैं नहीं माँगता।

श्लोक 24 (bhagavata.4.20.24)

न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन् न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः । महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः ॥ २४ ॥

na kāmaye nātha tad apy ahaṁ kvacin na yatra yuṣmac-caraṇāmbujāsavaḥ mahattamāntar-hṛdayān mukha-cyuto vidhatsva karṇāyutam eṣa me varaḥ

हे नाथ! मैं उस (मुक्ति) की भी कहीं कामना नहीं करता, जहाँ आपके चरण-कमलों का वह मधुरस, जो महापुरुषों के अंतःकरण से मुख द्वारा प्रवाहित होता है, न हो। मुझे तो यह वर दीजिए — दस हजार कान।

श्लोक 25 (bhagavata.4.20.25)

स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतो भवत्पदाम्भोजसुधा कणानिलः । स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनां कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः ॥ २५ ॥

sa uttamaśloka mahan-mukha-cyuto bhavat-padāmbhoja-sudhā kaṇānilaḥ smṛtiṁ punar vismṛta-tattva-vartmanāṁ kuyogināṁ no vitaraty alaṁ varaiḥ

हे उत्तमश्लोक! महापुरुषों के मुख से प्रवाहित होने वाला, आपके चरण-कमलों के सुधा-कणों से युक्त वह पवन, सत्य-मार्ग को भूले हुए कुयोगियों को भी पुनः स्मृति प्रदान करता है — मुझे इसके अतिरिक्त अन्य वरों की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 26 (bhagavata.4.20.26)

यशः शिवं सुश्रव आर्यसङ्गमे यदृच्छया चोपशृणोति ते सकृत् । कथं गुणज्ञो विरमेद्विना पशुं श्रीर्यत्प्रवव्रे गुणसङ्ग्रहेच्छया ॥ २६ ॥

yaśaḥ śivaṁ suśrava ārya-saṅgame yadṛcchayā copaśṛṇoti te sakṛt kathaṁ guṇa-jño viramed vinā paśuṁ śrīr yat pravavre guṇa-saṅgrahecchayā

आपकी वह मंगलमय, सुनने योग्य कीर्ति, जिसे कोई सज्जनों के संग में एक बार भी अनायास सुन ले, उससे उसका गुणज्ञ पुरुष विमुख कैसे हो सकता है, जब तक वह पशु न हो — जबकि स्वयं लक्ष्मी ने भी उन गुणों को प्राप्त करने की इच्छा से इसे स्वीकार किया।

श्लोक 27 (bhagavata.4.20.27)

अथाभजे त्वाखिलपूरुषोत्तमं गुणालयं पद्मकरेव लालसः । अप्यावयोरेकपतिस्पृधोः कलि- र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः ॥ २७ ॥

athābhaje tvākhila-pūruṣottamaṁ guṇālayaṁ padma-kareva lālasaḥ apy āvayor eka-pati-spṛdhoḥ kalir na syāt kṛta-tvac-caraṇaika-tānayoḥ

अतः अब मैं, कमल-हस्ता (लक्ष्मी) के समान लालायित होकर, गुणों के आगार, सम्पूर्ण पुरुषोत्तम की सेवा करता हूँ — यद्यपि आशंका है कि एक ही स्वामी के प्रति स्पर्धा रखने वाले हम दोनों में, आपके चरणों में एकनिष्ठ हो जाने पर, कहीं कलह न उत्पन्न हो जाए।

श्लोक 28 (bhagavata.4.20.28)

जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम् । करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सलः स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥ २८ ॥

jagaj-jananyāṁ jagad-īśa vaiśasaṁ syād eva yat-karmaṇi naḥ samīhitam karoṣi phalgv apy uru dīna-vatsalaḥ sva eva dhiṣṇye ’bhiratasya kiṁ tayā

हे जगदीश! जिस सेवा की मुझे कामना है, उसमें संभवतः जगज्जननी (लक्ष्मी) के प्रति कुछ अनिष्ट ही हो — परंतु आप दीनवत्सल होकर तुच्छ कर्म को भी महान् बना देते हैं, और अपने ही पद में रत रहने वाले के लिए उससे (लक्ष्मी की स्पर्धा से) क्या प्रयोजन?

श्लोक 29 (bhagavata.4.20.29)

भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । भवत्पदानुस्मरणादृते सतां निमित्तमन्यद्भगवन्न विद्महे ॥ २९ ॥

bhajanty atha tvām ata eva sādhavo vyudasta-māyā-guṇa-vibhramodayam bhavat-padānusmaraṇād ṛte satāṁ nimittam anyad bhagavan na vidmahe

इसीलिए सज्जन जन आपकी उपासना करते हैं, जिनमें माया के गुणों से उत्पन्न भ्रम पूर्णतः दूर हो चुका है; हे भगवन्! सत्पुरुषों के लिए आपके चरणों के स्मरण के अतिरिक्त अन्य कोई कारण हम नहीं जानते।

श्लोक 30 (bhagavata.4.20.30)

मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत् । वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसितः कथं पुनः कर्म करोति मोहितः ॥ ३० ॥

manye giraṁ te jagatāṁ vimohinīṁ varaṁ vṛṇīṣveti bhajantam āttha yat vācā nu tantyā yadi te jano ’sitaḥ kathaṁ punaḥ karma karoti mohitaḥ

मुझे लगता है, आपका यह वचन — 'वर माँगो' — जो एक भक्त से कहा गया है, संसार को मोहित करने वाला है। क्योंकि यदि आपकी उस वाणी-रूपी रस्सी से बँधा हुआ जन उसमें फँस जाए, तो वह मोहित होकर पुनः-पुनः कर्म कैसे करता है?

श्लोक 31 (bhagavata.4.20.31)

त्वन्माययाद्धा जन ईश खण्डितो यदन्यदाशास्त ऋतात्मनोऽबुधः । यथा चरेद् बालहितं पिता स्वयं तथा त्वमेवार्हसि नः समीहितुम् ॥ ३१ ॥

tvan-māyayāddhā jana īśa khaṇḍito yad anyad āśāsta ṛtātmano ’budhaḥ yathā cared bāla-hitaṁ pitā svayaṁ tathā tvam evārhasi naḥ samīhitum

हे ईश! आपकी माया से खंडित हुआ जन, अपने सत्य-स्वरूप के अतिरिक्त अन्य कुछ चाहता है, यह उसकी अज्ञानता है। जैसे पिता स्वयं बालक के हित का आचरण करता है, वैसे ही आप ही हमारे लिए (हित का) विचार करने योग्य हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.4.20.32)

मैत्रेय उवाच इत्यादिराजेन नुतः स विश्वदृक् तमाह राजन्मयि भक्तिरस्तु ते । दिष्ट्येदृशी धीर्मयि ते कृता यया मायां मदीयां तरति स्म दुस्त्यजाम् ॥ ३२ ॥

maitreya uvāca ity ādi-rājena nutaḥ sa viśva-dṛk tam āha rājan mayi bhaktir astu te diṣṭyedṛśī dhīr mayi te kṛtā yayā māyāṁ madīyāṁ tarati sma dustyajām

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार आदिराज द्वारा स्तुत होकर, विश्वदृक् भगवान् ने उनसे कहा — हे राजन्! मुझमें तुम्हारी भक्ति बनी रहे। सौभाग्य से तुम्हारी मुझमें ऐसी बुद्धि हुई है, जिससे मेरी उस दुस्त्यज माया को पार किया जाता है।

श्लोक 33 (bhagavata.4.20.33)

तत्त्वं कुरु मयादिष्टमप्रमत्तः प्रजापते । मदादेशकरो लोकः सर्वत्राप्नोति शोभनम् ॥ ३३ ॥

tat tvaṁ kuru mayādiṣṭam apramattaḥ prajāpate mad-ādeśa-karo lokaḥ sarvatrāpnoti śobhanam

अतः हे प्रजापते! सावधान होकर मेरे द्वारा बताए गए (कर्तव्य) का पालन करो। मेरी आज्ञा का पालन करने वाला व्यक्ति सर्वत्र कल्याण को प्राप्त करता है।

श्लोक 34 (bhagavata.4.20.34)

मैत्रेय उवाच इति वैन्यस्य राजर्षेः प्रतिनन्द्यार्थवद्वचः । पूजितोऽनुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रेऽच्युतो मतिम् ॥ ३४ ॥

maitreya uvāca iti vainyasya rājarṣeḥ pratinandyārthavad vacaḥ pūjito ’nugṛhītvainaṁ gantuṁ cakre ’cyuto matim

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार वेन-पुत्र राजर्षि के अर्थपूर्ण वचनों का अभिनंदन कर तथा उनके द्वारा पूजित होकर, अच्युत भगवान् ने उन्हें अनुगृहीत करके प्रस्थान करने का विचार किया।

श्लोक 35 (bhagavata.4.20.35)

देवर्षिपितृगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगाः । किन्नराप्सरसो मर्त्याः खगा भूतान्यनेकशः ॥ ३५ ॥

devarṣi-pitṛ-gandharva- siddha-cāraṇa-pannagāḥ kinnarāpsaraso martyāḥ khagā bhūtāny anekaśaḥ

देवगण, ऋषिगण, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग; किन्नर, अप्सराएँ, मनुष्य, पक्षी तथा अनेक प्रकार के अन्य प्राणी (वहाँ उपस्थित थे)।

श्लोक 36 (bhagavata.4.20.36)

यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३६ ॥

yajñeśvara-dhiyā rājñā vāg-vittāñjali-bhaktitaḥ sabhājitā yayuḥ sarve vaikuṇṭhānugatās tataḥ

राजा द्वारा यज्ञेश्वर-बुद्धि से, वचन, धन, अंजलि और भक्ति द्वारा सम्मानित होकर, वे सभी तत्पश्चात् वैकुण्ठवासी भगवान् के पीछे-पीछे चले गए।

श्लोक 37 (bhagavata.4.20.37)

भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः । हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ ३७ ॥

bhagavān api rājarṣeḥ sopādhyāyasya cācyutaḥ harann iva mano ’muṣya sva-dhāma pratyapadyata

अच्युत भगवान् भी, मानो उस राजर्षि तथा उनके पुरोहितों के मन को हरते हुए, अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 38 (bhagavata.4.20.38)

अदृष्टाय नमस्कृत्य नृपः सन्दर्शितात्मने । अव्यक्ताय च देवानां देवाय स्वपुरं ययौ ॥ ३८ ॥

adṛṣṭāya namaskṛtya nṛpaḥ sandarśitātmane avyaktāya ca devānāṁ devāya sva-puraṁ yayau

जो साधारण दृष्टि से अदृष्ट होते हुए भी अपना दर्शन दे चुके थे, तथा जो अव्यक्त, देवों के भी देव हैं, उन्हें नमस्कार करके राजा अपने नगर को लौट गए।

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