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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21

महाराज पृथु का उपदेश

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (bhagavata.4.21.1)

मैत्रेय उवाच । मौक्तिकैः कुसुमस्रग्भिर् दुकूलैः स्वर्णतोरणैः । महासुरभिभिर्धूपैर् मण्डितं तत्र तत्र वै ॥ १ ॥

maitreya uvāca mauktikaiḥ kusuma-sragbhir dukūlaiḥ svarṇa-toraṇaiḥ mahā-surabhibhir dhūpair maṇḍitaṁ tatra tatra vai

मैत्रेय ने कहा — वहाँ (नगर) सर्वत्र मोतियों, पुष्प-मालाओं, उत्तम वस्त्रों, स्वर्ण-तोरणों तथा सुगंधित धूप से अलंकृत था।

श्लोक 2 (bhagavata.4.21.2)

चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् । पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिरर्चितम् ॥ २ ॥

candanāguru-toyārdra- rathyā-catvara-mārgavat puṣpākṣata-phalais tokmair lājair arcirbhir arcitam

गलियाँ, चौराहे और मार्ग चंदन तथा अगुरु से सुगंधित जल से सिक्त थे, और पुष्प, अक्षत, फल, अंकुर, लाजा तथा दीपशिखाओं से पूजित थे।

श्लोक 3 (bhagavata.4.21.3)

सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम् । तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलङ्कृतम् ॥ ३ ॥

savṛndaiḥ kadalī-stambhaiḥ pūga-potaiḥ pariṣkṛtam taru-pallava-mālābhiḥ sarvataḥ samalaṅkṛtam

वह गुच्छों सहित केले के स्तंभों तथा सुपारी के नवोदित पौधों से संवारा गया था, और सर्वत्र वृक्षों की पल्लव-मालाओं से सुसज्जित था।

श्लोक 4 (bhagavata.4.21.4)

प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमङ्गलैः । अभीयुर्मृष्टकन्याश्च मृष्टकुण्डलमण्डिताः ॥ ४ ॥

prajās taṁ dīpa-balibhiḥ sambhṛtāśeṣa-maṅgalaiḥ abhīyur mṛṣṭa-kanyāś ca mṛṣṭa-kuṇḍala-maṇḍitāḥ

प्रजाजन समस्त मंगल-द्रव्यों से सुसज्जित दीप तथा भेंट लेकर उनसे मिलने गए, और सुंदर कुण्डलों से अलंकृत सुसज्जित कन्याएँ भी उनके स्वागत को गईं।

श्लोक 5 (bhagavata.4.21.5)

शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम् । विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः ॥ ५ ॥

śaṅkha-dundubhi-ghoṣeṇa brahma-ghoṣeṇa cartvijām viveśa bhavanaṁ vīraḥ stūyamāno gata-smayaḥ

शंख और दुंदुभि की ध्वनि के साथ, तथा ऋत्विजों के वेद-घोष के साथ, वह वीर स्तुत होते हुए भी अभिमानरहित होकर अपने भवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 6 (bhagavata.4.21.6)

पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः । पौराञ्जानपदांस्तांस्तान्प्रीतः प्रियवरप्रदः ॥ ६ ॥

pūjitaḥ pūjayām āsa tatra tatra mahā-yaśāḥ paurāñ jānapadāṁs tāṁs tān prītaḥ priya-vara-pradaḥ

पूजित होकर, वह अत्यंत यशस्वी राजा, यत्र-तत्र उन सभी नगरवासियों और ग्रामवासियों का, प्रसन्न होकर, प्रिय वर देते हुए, सम्मान करने लगे।

श्लोक 7 (bhagavata.4.21.7)

स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः । कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम् ॥ ७ ॥

sa evam ādīny anavadya-ceṣṭitaḥ karmāṇi bhūyāṁsi mahān mahattamaḥ kurvan śaśāsāvani-maṇḍalaṁ yaśaḥ sphītaṁ nidhāyāruruhe paraṁ padam

इस प्रकार निर्दोष आचरण वाले, महानों में महान् उस राजा ने ये तथा अन्य अनेक कर्म करते हुए इस भूमंडल का शासन किया, और व्यापक यश स्थापित करके अंततः परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 8 (bhagavata.4.21.8)

सूत उवाच तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् । क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् ॥ ८ ॥

sūta uvāca tad ādi-rājasya yaśo vijṛmbhitaṁ guṇair aśeṣair guṇavat-sabhājitam kṣattā mahā-bhāgavataḥ sadaspate kauṣāraviṁ prāha gṛṇantam arcayan

सूत ने कहा — हे सभापते! समस्त गुणों से विस्तारित तथा गुणवानों द्वारा प्रशंसित उस आदिराज के यश का इस प्रकार वर्णन होने पर, परम भागवत क्षत्ता (विदुर) ने कौषारवि (मैत्रेय) का, उनके कथन के मध्य ही, सम्मान करते हुए यह कहा।

श्लोक 9 (bhagavata.4.21.9)

विदुर उवाच सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुरार्हणः । बिभ्रत् स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम् ॥ ९ ॥

vidura uvāca so ’bhiṣiktaḥ pṛthur viprair labdhāśeṣa-surārhaṇaḥ bibhrat sa vaiṣṇavaṁ tejo bāhvor yābhyāṁ dudoha gām

विदुर ने कहा — ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त तथा समस्त देवताओं की भेंट पाकर, वैष्णव तेज धारण करते हुए, पृथु ने जिन भुजाओं से पृथ्वी को दुहा था।

श्लोक 10 (bhagavata.4.21.10)

को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः । लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम- मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥ १० ॥

ko nv asya kīrtiṁ na śṛṇoty abhijño yad-vikramocchiṣṭam aśeṣa-bhūpāḥ lokāḥ sa-pālā upajīvanti kāmam adyāpi tan me vada karma śuddham

उसकी कीर्ति को कौन बुद्धिमान सुनना नहीं चाहेगा — जिनके पराक्रम की उच्छिष्ट (शेष) पर आज भी समस्त राजा तथा अपने-अपने पालकों सहित समस्त लोक जीवन-यापन करते हैं? कृपया उनके उन पवित्र कर्मों का, जैसा मैं चाहता हूँ, वर्णन कीजिए।

श्लोक 11 (bhagavata.4.21.11)

मैत्रेय उवाच गङ्गायमुनयोर्नद्योरन्तरा क्षेत्रमावसन् । आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया ॥ ११ ॥

maitreya uvāca gaṅgā-yamunayor nadyor antarā kṣetram āvasan ārabdhān eva bubhuje bhogān puṇya-jihāsayā

मैत्रेय ने कहा — गंगा और यमुना नदियों के मध्यवर्ती क्षेत्र में निवास करते हुए, वे अपने पुण्य को क्षीण करने की इच्छा से केवल पूर्व-आरब्ध भोगों का ही उपभोग करते रहे।

श्लोक 12 (bhagavata.4.21.12)

सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक् । अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः ॥ १२ ॥

sarvatrāskhalitādeśaḥ sapta-dvīpaika-daṇḍa-dhṛk anyatra brāhmaṇa-kulād anyatrācyuta-gotrataḥ

सर्वत्र अस्खलित आज्ञा वाले, वे अकेले सातों द्वीपों के एकमात्र दंडधारी थे — केवल ब्राह्मण-कुल तथा अच्युत के गोत्र (वैष्णवों) को छोड़कर।

श्लोक 13 (bhagavata.4.21.13)

एकदासीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम् । समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥ १३ ॥

ekadāsīn mahā-satra- dīkṣā tatra divaukasām samājo brahmarṣīṇāṁ ca rājarṣīṇāṁ ca sattama

हे सत्तम! एक बार वहाँ महायज्ञ की दीक्षा हुई, और देवताओं, ब्रह्मर्षियों तथा राजर्षियों की सभा एकत्र हुई।

श्लोक 14 (bhagavata.4.21.14)

तस्मिन्नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः । उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव ॥ १४ ॥

tasminn arhatsu sarveṣu sv-arciteṣu yathārhataḥ utthitaḥ sadaso madhye tārāṇām uḍurāḍ iva

उस सभा में जब सभी योग्य अतिथि यथोचित रूप से पूजित हो चुके, तब वे सभा के मध्य में, तारागणों के मध्य चंद्रमा के समान, उठ खड़े हुए।

श्लोक 15 (bhagavata.4.21.15)

प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः । सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः ॥ १५ ॥

prāṁśuḥ pīnāyata-bhujo gauraḥ kañjāruṇekṣaṇaḥ sunāsaḥ sumukhaḥ saumyaḥ pīnāṁsaḥ sudvija-smitaḥ

वे लंबे, पुष्ट तथा दीर्घ भुजाओं वाले, गौरवर्ण, कमल के समान अरुण नेत्रों वाले, सुंदर नासिका, सुंदर मुख, सौम्य स्वभाव, पुष्ट कंधों तथा सुंदर दांतों की मुस्कान वाले थे।

श्लोक 16 (bhagavata.4.21.16)

व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः । आवर्तनाभिरोजस्वी काञ्चनोरुरुदग्रपात् ॥ १६ ॥

vyūḍha-vakṣā bṛhac-chroṇir vali-valgu-dalodaraḥ āvarta-nābhir ojasvī kāñcanorur udagra-pāt

वे विशाल वक्ष, विस्तृत कटि, वट-पत्र के समान सुंदर रेखाओं वाले उदर, गहरी भँवरदार नाभि, तेजस्वी, स्वर्ण-वर्ण जंघाओं तथा उन्नत पैरों वाले थे।

श्लोक 17 (bhagavata.4.21.17)

सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः । महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च ॥ १७ ॥

sūkṣma-vakrāsita-snigdha- mūrdhajaḥ kambu-kandharaḥ mahā-dhane dukūlāgrye paridhāyopavīya ca

उनके केश सूक्ष्म, घुँघराले, काले तथा चिकने थे, कंठ शंख के समान था; उन्होंने अत्यंत मूल्यवान उत्तम रेशमी वस्त्र धारण किए हुए थे — नीचे लपेटकर और ऊपर ओढ़कर भी।

श्लोक 18 (bhagavata.4.21.18)

व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः । कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिःकृतोचितः ॥ १८ ॥

vyañjitāśeṣa-gātra-śrīr niyame nyasta-bhūṣaṇaḥ kṛṣṇājina-dharaḥ śrīmān kuśa-pāṇiḥ kṛtocitaḥ

व्रत के लिए आभूषण त्यागकर, समस्त अंगों की शोभा प्रकट हुई थी; श्रीमान, कृष्णमृगचर्म धारण किए, हाथ में कुश लिए, वे यथोचित रूप से सज्जित थे।

श्लोक 19 (bhagavata.4.21.19)

शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः । ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्निव ॥ १९ ॥

śiśira-snigdha-tārākṣaḥ samaikṣata samantataḥ ūcivān idam urvīśaḥ sadaḥ saṁharṣayann iva

शिशिर-ऋतु के तारों के समान स्निग्ध नेत्रों वाले उस भूपति ने सब ओर देखा, और मानो सभा को हर्षित करते हुए यह कहा।

श्लोक 20 (bhagavata.4.21.20)

चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम् । सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्निव ॥ २० ॥

cāru citra-padaṁ ślakṣṇaṁ mṛṣṭaṁ gūḍham aviklavam sarveṣām upakārārthaṁ tadā anuvadann iva

मनोहर, चित्ताकर्षक पदों से युक्त, सुललित, परिष्कृत, गूढ़ तथा अविचलित उस वाणी में, मानो सबके हित के लिए पहले से ज्ञात सत्य को ही दोहराते हुए, उन्होंने कहा।

श्लोक 21 (bhagavata.4.21.21)

राजोवाच सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः । सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम् ॥ २१ ॥

rājovāca sabhyāḥ śṛṇuta bhadraṁ vaḥ sādhavo ya ihāgatāḥ satsu jijñāsubhir dharmam āvedyaṁ sva-manīṣitam

राजा ने कहा — हे सभासदो! सुनिए, आपका कल्याण हो, आप सब साधुजन जो यहाँ पधारे हैं। जिज्ञासु व्यक्ति को अपना विचारित मत सज्जनों के समक्ष प्रकट करना चाहिए।

श्लोक 22 (bhagavata.4.21.22)

अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ॥ २२ ॥

ahaṁ daṇḍa-dharo rājā prajānām iha yojitaḥ rakṣitā vṛttidaḥ sveṣu setuṣu sthāpitā pṛthak

मैं यहाँ प्रजा का दंडधारी राजा, उनका रक्षक, वृत्तिदाता के रूप में नियुक्त किया गया हूँ, तथा उनकी अपनी-अपनी मर्यादाओं में पृथक्-पृथक् स्थापित किया गया हूँ।

श्लोक 23 (bhagavata.4.21.23)

तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः । लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ॥ २३ ॥

tasya me tad-anuṣṭhānād yān āhur brahma-vādinaḥ lokāḥ syuḥ kāma-sandohā yasya tuṣyati diṣṭa-dṛk

अपने इस कर्तव्य के पालन से, मुझे उन लोकों की प्राप्ति हो, जिन्हें ब्रह्मवादी सर्वकामप्रद कहते हैं — जो उसे मिलते हैं जिससे नियति के द्रष्टा (भगवान्) प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.4.21.24)

य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् । प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ॥ २४ ॥

ya uddharet karaṁ rājā prajā dharmeṣv aśikṣayan prajānāṁ śamalaṁ bhuṅkte bhagaṁ ca svaṁ jahāti saḥ

जो राजा प्रजा को धर्म में शिक्षित किए बिना ही कर वसूल करता है, वह प्रजा के पाप को भोगता है और अपने भाग्य को खो देता है।

श्लोक 25 (bhagavata.4.21.25)

तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः । कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः ॥ २५ ॥

tat prajā bhartṛ-piṇḍārthaṁ svārtham evānasūyavaḥ kurutādhokṣaja-dhiyas tarhi me ’nugrahaḥ kṛtaḥ

अतः हे प्रजाजनो! ईर्ष्यारहित होकर, अधोक्षज (भगवान्) में मन लगाकर, अपने स्वामी को पिण्डदान हेतु, अपने ही हित के लिए कार्य करो — तभी मुझ पर तुम्हारा अनुग्रह किया हुआ माना जाएगा।

श्लोक 26 (bhagavata.4.21.26)

यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः । कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥ २६ ॥

yūyaṁ tad anumodadhvaṁ pitṛ-devarṣayo ’malāḥ kartuḥ śāstur anujñātus tulyaṁ yat pretya tat phalam

हे निर्मल पितर, देव तथा ऋषिगण! आप इसका अनुमोदन करें — क्योंकि मृत्यु के पश्चात्, कर्ता, आदेश देने वाले तथा अनुमति देने वाले, तीनों को कर्म का फल समान रूप से प्राप्त होता है।

श्लोक 27 (bhagavata.4.21.27)

अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः । इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्भुवः ॥ २७ ॥

asti yajña-patir nāma keṣāñcid arha-sattamāḥ ihāmutra ca lakṣyante jyotsnāvatyaḥ kvacid bhuvaḥ

हे परम पूज्यजनो! निश्चय ही 'यज्ञपति' नामक कोई तत्त्व है — अन्यथा इस लोक तथा परलोक में कहीं-कहीं ज्योतिर्मय लोक कैसे दृष्टिगोचर होते?

श्लोक 28 (bhagavata.4.21.28)

मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः । प्रियव्रतस्य राजर्षेरङ्गस्यास्मत्पितुः पितुः ॥ २८ ॥

manor uttānapādasya dhruvasyāpi mahīpateḥ priyavratasya rājarṣer aṅgasyāsmat-pituḥ pituḥ

मनु के, उत्तानपाद के, राजा ध्रुव के भी; राजर्षि प्रियव्रत के, तथा मेरे पितामह अंग के — (इनके जीवन इसकी पुष्टि करते हैं)।

श्लोक 29 (bhagavata.4.21.29)

ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च । प्रह्लादस्य बलेश्चापि कृत्यमस्ति गदाभृता ॥ २९ ॥

īdṛśānām athānyeṣām ajasya ca bhavasya ca prahlādasya baleś cāpi kṛtyam asti gadābhṛtā

— तथा इन जैसे अन्य लोगों के, और अज (ब्रह्मा) तथा भव (शिव) के भी, प्रह्लाद तथा बलि के भी — इन सबका गदाधारी (भगवान्) से संबंध सिद्ध है।

श्लोक 30 (bhagavata.4.21.30)

दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् । वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥ ३० ॥

dauhitrādīn ṛte mṛtyoḥ śocyān dharma-vimohitān varga-svargāpavargāṇāṁ prāyeṇaikātmya-hetunā

मृत्यु के दौहित्र (मेरे पिता वेन) जैसे धर्म-विमूढ़, शोचनीय जनों को छोड़कर — (ये सभी महापुरुष इस बात पर सहमत हैं कि) वही, एकनिष्ठता के कारण, प्रायः धर्म, स्वर्ग तथा मोक्ष का एकमात्र कारण है।

श्लोक 31 (bhagavata.4.21.31)

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः । सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ ३१ ॥

yat-pāda-sevābhirucis tapasvinām aśeṣa-janmopacitaṁ malaṁ dhiyaḥ sadyaḥ kṣiṇoty anvaham edhatī satī yathā padāṅguṣṭha-viniḥsṛtā sarit

उनके चरणों की सेवा के प्रति उत्पन्न रुचि, तपस्वियों की अनेक जन्मों में संचित बुद्धि की मलिनता को तत्काल नष्ट कर देती है, तथा प्रतिदिन बढ़ती हुई पवित्र होती जाती है — ठीक वैसे ही, जैसे उनके पादांगुष्ठ से निकली नदी (गंगा)।

श्लोक 32 (bhagavata.4.21.32)

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा- नसङ्गविज्ञानविशेषवीर्यवान् । यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुन- र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ॥ ३२ ॥

vinirdhutāśeṣa-mano-malaḥ pumān asaṅga-vijñāna-viśeṣa-vīryavān yad-aṅghri-mūle kṛta-ketanaḥ punar na saṁsṛtiṁ kleśa-vahāṁ prapadyate

जिसकी मन की समस्त मलिनता धुल चुकी है, जो अनासक्ति के विशेष ज्ञान से बलवान् हो चुका है, तथा जिसने उनके चरणों के मूल में अपना निवास बना लिया है, वह पुनः क्लेशमयी संसृति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 33 (bhagavata.4.21.33)

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि- र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः । अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३ ॥

tam eva yūyaṁ bhajatātma-vṛttibhir mano-vacaḥ-kāya-guṇaiḥ sva-karmabhiḥ amāyinaḥ kāma-dughāṅghri-paṅkajaṁ yathādhikārāvasitārtha-siddhayaḥ

अतः तुम सब उन्हीं की उपासना करो — अपनी स्वाभाविक वृत्तियों से, मन, वाणी और शरीर के गुणों से, तथा अपने-अपने कर्मों से — मायारहित उन (भगवान्) के सर्वकामप्रद चरण-कमल की उपासना करो, जिससे अपने-अपने अधिकार के अनुसार अभीष्ट सिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 34 (bhagavata.4.21.34)

असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभि- र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः ॥ ३४ ॥

asāv ihāneka-guṇo ’guṇo ’dhvaraḥ pṛthag-vidha-dravya-guṇa-kriyoktibhiḥ sampadyate ’rthāśaya-liṅga-nāmabhir viśuddha-vijñāna-ghanaḥ svarūpataḥ

यह यज्ञ, यद्यपि गुणातीत (भगवान्) को अर्पित है, विभिन्न द्रव्यों, गुणों, क्रियाओं तथा मंत्रों के द्वारा यहाँ अनेक रूपों में प्रतीत होता है — जबकि वे स्वयं अपने स्वरूप से विशुद्ध विज्ञानघन ही हैं, जो विभिन्न प्रयोजनों, भावों, चिह्नों तथा नामों से प्रकट होते हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.4.21.35)

प्रधानकालाशयधर्मसङ्ग्रहे शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् । क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते यथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ॥ ३५ ॥

pradhāna-kālāśaya-dharma-saṅgrahe śarīra eṣa pratipadya cetanām kriyā-phalatvena vibhur vibhāvyate yathānalo dāruṣu tad-guṇātmakaḥ

प्रधान (प्रकृति), काल, आशय और धर्म के संग्रह-रूप शरीर में प्रवेश कर तथा वहाँ चेतना धारण करके, वह सर्वव्यापी (आत्मा) क्रिया के फल द्वारा ही प्रतीत होता है — जैसे अग्नि, काष्ठ के गुणों के अनुरूप बनकर, काष्ठ में ही प्रकट होती है।

श्लोक 36 (bhagavata.4.21.36)

अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम् । स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः ॥ ३६ ॥

aho mamāmī vitaranty anugrahaṁ hariṁ guruṁ yajña-bhujām adhīśvaram sva-dharma-yogena yajanti māmakā nirantaraṁ kṣoṇi-tale dṛḍha-vratāḥ

आह! ये मेरी प्रजाएँ, दृढ़ व्रत वाली होकर, इस पृथ्वी पर निरंतर अपने स्वधर्म के अनुष्ठान द्वारा गुरु, यज्ञ-भोक्ताओं के अधीश्वर, हरि की उपासना करती हैं — इस प्रकार वे मुझ पर अनुग्रह करती हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.4.21.37)

मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि- स्तितिक्षया तपसा विद्यया च । देदीप्यमानेऽजितदेवतानां कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम् ॥ ३७ ॥

mā jātu tejaḥ prabhaven maharddhibhis titikṣayā tapasā vidyayā ca dedīpyamāne ’jita-devatānāṁ kule svayaṁ rāja-kulād dvijānām

क्षमा, तपस्या और विद्या द्वारा दीप्तिमान, अजित देवताओं के कुल-स्वरूप द्विज-वंश के प्रति, राज-कुल का तेज कभी भी प्रबल न हो।

श्लोक 38 (bhagavata.4.21.38)

ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् । अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ॥ ३८ ॥

brahmaṇya-devaḥ puruṣaḥ purātano nityaṁ harir yac-caraṇābhivandanāt avāpa lakṣmīm anapāyinīṁ yaśo jagat-pavitraṁ ca mahattamāgraṇīḥ

वे नित्य, पुरातन पुरुष, ब्राह्मणों के देवता हरि, महानतमों में अग्रणी, उन्हीं के चरणों की बारंबार वंदना करने से अक्षय लक्ष्मी तथा जगत्-पवित्र यश को प्राप्त हुए।

श्लोक 39 (bhagavata.4.21.39)

यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड् विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वरः । तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ॥ ३९ ॥

yat-sevayāśeṣa-guhāśayaḥ sva-rāḍ vipra-priyas tuṣyati kāmam īśvaraḥ tad eva tad-dharma-parair vinītaiḥ sarvātmanā brahma-kulaṁ niṣevyatām

जिनकी सेवा से समस्त हृदयों में निवास करने वाले, विप्रप्रिय, स्वराट् ईश्वर पूर्णतः संतुष्ट होते हैं — उन्हीं धर्मपरायण, विनम्र जनों द्वारा उस ब्राह्मण-कुल की सर्वात्मना सेवा की जानी चाहिए।

श्लोक 40 (bhagavata.4.21.40)

पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥ ४० ॥

pumāḻ labhetānativelam ātmanaḥ prasīdato ’tyanta-śamaṁ svataḥ svayam yan-nitya-sambandha-niṣevayā tataḥ paraṁ kim atrāsti mukhaṁ havir-bhujām

मनुष्य निरंतर उस संबंध की सेवा से, अपने आप, स्वतः प्रसन्न आत्मा की असीम शांति प्राप्त करता है — इससे बढ़कर यहाँ और क्या है? यही तो हविष्य-भोक्ताओं (देवताओं) का मुख है।

श्लोक 41 (bhagavata.4.21.41)

अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । न वै तथा चेतनया बहिष्कृते हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः ॥ ४१ ॥

aśnāty anantaḥ khalu tattva-kovidaiḥ śraddhā-hutaṁ yan-mukha ijya-nāmabhiḥ na vai tathā cetanayā bahiṣ-kṛte hutāśane pāramahaṁsya-paryaguḥ

अनंत (भगवान्) उस भोजन को, जो तत्त्वज्ञ पुरुषों द्वारा यज्ञ-देवताओं के नामों से श्रद्धापूर्वक उस मुख में हवन किया जाता है, ग्रहण करते हैं — वैसे नहीं, जैसे चेतनारहित, बाह्य अग्नि के माध्यम से; ऐसा परमहंसों ने निश्चय किया है।

श्लोक 42 (bhagavata.4.21.42)

यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं श्रद्धातपोमङ्गलमौनसंयमैः । समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये यत्रेदमादर्श इवावभासते ॥ ४२ ॥

yad brahma nityaṁ virajaṁ sanātanaṁ śraddhā-tapo-maṅgala-mauna-saṁyamaiḥ samādhinā bibhrati hārtha-dṛṣṭaye yatredam ādarśa ivāvabhāsate

उस नित्य, निर्मल, सनातन ब्रह्म को, वे श्रद्धा, तप, मंगल, मौन और संयम के साथ समाधि द्वारा, अर्थ-दर्शन हेतु धारण करते हैं — जिसमें यह (जगत्) मानो दर्पण में प्रतिबिंबित होकर प्रकाशित होता है।

श्लोक 43 (bhagavata.4.21.43)

तेषामहं पादसरोजरेणु- मार्या वहेयाधिकिरीटमायुः । यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥ ४३ ॥

teṣām ahaṁ pāda-saroja-reṇum āryā vaheyādhi-kirīṭam āyuḥ yaṁ nityadā bibhrata āśu pāpaṁ naśyaty amuṁ sarva-guṇā bhajanti

हे आर्यजनो! मैं उनके चरण-कमलों की धूलि को अपने मुकुट पर जीवन-भर धारण करता रहूँ — जो उसे निरंतर धारण करता है, उसका पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है, और सारे सद्गुण उसका आश्रय लेते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.4.21.44)

गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः । प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम् ॥ ४४ ॥

guṇāyanaṁ śīla-dhanaṁ kṛta-jñaṁ vṛddhāśrayaṁ saṁvṛṇate ’nu sampadaḥ prasīdatāṁ brahma-kulaṁ gavāṁ ca janārdanaḥ sānucaraś ca mahyam

जो गुणों का आश्रय है, शील ही जिसका धन है, जो कृतज्ञ है और वृद्धों का आश्रय लेता है, संपत्ति स्वयं उसके पीछे-पीछे आती है। ब्राह्मण-कुल, गौएँ तथा अनुचरों सहित जनार्दन, मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 45 (bhagavata.4.21.45)

मैत्रेय उवाच इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः । तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः ॥ ४५ ॥

maitreya uvāca iti bruvāṇaṁ nṛpatiṁ pitṛ-deva-dvijātayaḥ tuṣṭuvur hṛṣṭa-manasaḥ sādhu-vādena sādhavaḥ

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार बोलते हुए राजा की, पितरों, देवताओं तथा द्विजों — उन साधुजनों ने, प्रसन्नचित्त होकर, साधुवाद से स्तुति की।

श्लोक 46 (bhagavata.4.21.46)

पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः । ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः ॥ ४६ ॥

putreṇa jayate lokān iti satyavatī śrutiḥ brahma-daṇḍa-hataḥ pāpo yad veno ’tyatarat tamaḥ

'पुत्र द्वारा (उत्तम) लोकों की विजय होती है' — यह श्रुति-वचन सत्य सिद्ध हुआ, क्योंकि ब्रह्मदंड से आहत वह पापी वेन भी उस अंधकार को पार कर गया।

श्लोक 47 (bhagavata.4.21.47)

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥ ४७ ॥

hiraṇyakaśipuś cāpi bhagavan-nindayā tamaḥ vivikṣur atyagāt sūnoḥ prahlādasyānubhāvataḥ

हिरण्यकशिपु भी, भगवान् की निंदा के कारण अंधकार में प्रवेश करने को उद्यत होते हुए भी, अपने पुत्र प्रह्लाद के प्रभाव से उसे पार कर गया।

श्लोक 48 (bhagavata.4.21.48)

वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः सञ्जीव शाश्वतीः । यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि ॥ ४८ ॥

vīra-varya pitaḥ pṛthvyāḥ samāḥ sañjīva śāśvatīḥ yasyedṛśy acyute bhaktiḥ sarva-lokaika-bhartari

हे वीरवर! हे पृथ्वी के पिता! आप शाश्वत वर्षों तक जीवित रहें — आप जैसी भक्ति समस्त लोकों के एकमात्र भर्ता उन अच्युत के प्रति रखते हैं।

श्लोक 49 (bhagavata.4.21.49)

अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः । य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णो- र्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति ॥ ४९ ॥

aho vayaṁ hy adya pavitra-kīrte tvayaiva nāthena mukunda-nāthāḥ ya uttamaślokatamasya viṣṇor brahmaṇya-devasya kathāṁ vyanakti

आह! हे पवित्र-कीर्ति! आज आपके ही, स्वामी के रूप में, हम मुकुंद के अधीन हैं — आप, जो सबसे अधिक स्तुत, ब्राह्मणों के देवता विष्णु की कथा को स्पष्ट करते हैं।

श्लोक 50 (bhagavata.4.21.50)

नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम् । प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम् ॥ ५० ॥

nātyadbhutam idaṁ nātha tavājīvyānuśāsanam prajānurāgo mahatāṁ prakṛtiḥ karuṇātmanām

हे नाथ! आपका यह जीवनदायी शासन कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है — प्रजा के प्रति अनुराग तो महापुरुषों का, करुणामय आत्माओं का स्वभाव ही है।

श्लोक 51 (bhagavata.4.21.51)

अद्य नस्तमसः पारस्त्वयोपासादितः प्रभो । भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्दैवसंज्ञितैः ॥ ५१ ॥

adya nas tamasaḥ pāras tvayopāsāditaḥ prabho bhrāmyatāṁ naṣṭa-dṛṣṭīnāṁ karmabhir daiva-saṁjñitaiḥ

हे प्रभो! कर्मों से, जिन्हें दैव कहा जाता है, भटकते हुए तथा दृष्टि खो चुके हम लोगों को, आपने आज अंधकार के पार पहुँचा दिया है।

श्लोक 52 (bhagavata.4.21.52)

नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे । यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा ॥ ५२ ॥

namo vivṛddha-sattvāya puruṣāya mahīyase yo brahma kṣatram āviśya bibhartīdaṁ sva-tejasā

अत्यंत विवर्धित सत्त्वगुण वाले, महिमामय पुरुष को नमस्कार, जो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों में प्रविष्ट होकर, अपने ही तेज से इस जगत् को धारण करते हैं।

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