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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27

चण्डवेग का पुरंजन-नगर पर आक्रमण और कालकन्या का चरित्र

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (bhagavata.4.27.1)

नारद उवाच इत्थं पुरञ्जनं सध्र्यग्वशमानीय विभ्रमैः । पुरञ्जनी महाराज रेमे रमयती पतिम् ॥ 27.1 ॥

nārada uvāca itthaṁ purañjanaṁ sadhryag vaśamānīya vibhramaiḥ purañjanī mahārāja reme ramayatī patim

नारद ने कहा — हे महाराज! इस प्रकार अपने विभ्रमों से पुरंजन को पूर्णतः वश में करके, पुरंजनी अपने पति को रमाती हुई स्वयं भी रमण करने लगी।

श्लोक 2 (bhagavata.4.27.2)

स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम् । कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम् ॥ 27.2 ॥

sa rājā mahiṣīṁ rājan susnātāṁ rucirānanām kṛta-svastyayanāṁ tṛptām abhyanandad upāgatām

हे राजन्! वह राजा अपनी उस रानी का स्वागत करने लगा, जो भलीभाँति स्नान की हुई, मनोहर मुख वाली, मंगल-कृत्य सम्पन्न किये हुए और तृप्त होकर उसके समीप आई थी।

श्लोक 3 (bhagavata.4.27.3)

तयोपगूढः परिरब्धकन्धरो रहोऽनुमन्त्रैरपकृष्टचेतनः । न कालरंहो बुबुधे दुरत्ययं दिवा निशेति प्रमदापरिग्रहः ॥ 27.3 ॥

tayopagūḍhaḥ parirabdha-kandharo raho ’numantrair apakṛṣṭa-cetanaḥ na kāla-raṁho bubudhe duratyayaṁ divā niśeti pramadā-parigrahaḥ

उसके आलिंगन में बँधा, उसकी बाहों में गर्दन थामे, एकांत में मधुर गूढ़ वार्ता से जिसका चित्त हर लिया गया था — वह स्त्री का दास राजा काल की उस दुरत्यय गति को न जान सका, कि दिन और रात्रि किस प्रकार बीते जा रहे हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.4.27.4)

शयान उन्नद्धमदो महामना महार्हतल्पे महिषीभुजोपधिः । तामेव वीरो मनुते परं यत- स्तमोऽभिभूतो न निजं परं च यत् ॥ 27.4 ॥

śayāna unnaddha-mado mahā-manā mahārha-talpe mahiṣī-bhujopadhiḥ tām eva vīro manute paraṁ yatas tamo-’bhibhūto na nijaṁ paraṁ ca yat

बहुमूल्य शय्या पर लेटा, गर्व से उन्मत्त, रानी की भुजा को तकिया बनाये — यद्यपि महामना था, फिर भी वह वीर उसी को अपना परम लक्ष्य मानने लगा; तमस से इतना अभिभूत हो गया कि न अपने आत्मस्वरूप को जान सका, न परमात्मा को।

श्लोक 5 (bhagavata.4.27.5)

तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः । क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः ॥ 27.5 ॥

tayaivaṁ ramamāṇasya kāma-kaśmala-cetasaḥ kṣaṇārdham iva rājendra vyatikrāntaṁ navaṁ vayaḥ

हे राजेन्द्र! इस प्रकार उसके साथ रमण करते हुए, काम से मलिन-चित्त पुरंजन का नवयौवन आधे क्षण के समान बीत गया।

श्लोक 6 (bhagavata.4.27.6)

तस्यामजनयत्पुत्रान् पुरञ्जन्यां पुरञ्जनः । शतान्येकादश विराडायुषोऽर्धमथात्यगात् ॥ 27.6 ॥

tasyām ajanayat putrān purañjanyāṁ purañjanaḥ śatāny ekādaśa virāḍ āyuṣo ’rdham athātyagāt

हे विराट्! पुरंजन ने पुरंजनी के गर्भ से ग्यारह सौ पुत्र उत्पन्न किये; इस प्रकार उसकी आयु का आधा भाग व्यतीत हो गया।

श्लोक 7 (bhagavata.4.27.7)

दुहितृर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः । शीलौदार्यगुणोपेताः पौरञ्जन्यः प्रजापते ॥ 27.7 ॥

duhitṝr daśottara-śataṁ pitṛ-mātṛ-yaśaskarīḥ śīlaudārya-guṇopetāḥ paurañjanyaḥ prajā-pate

हे प्रजापते! उसने एक सौ दस कन्याएँ भी उत्पन्न कीं, जो अपने माता-पिता का यश बढ़ाने वाली थीं; पुरंजन की वे पुत्रियाँ शील, उदारता और सद्गुणों से सम्पन्न थीं।

श्लोक 8 (bhagavata.4.27.8)

स पञ्चालपतिः पुत्रान् पितृवंशविवर्धनान् । दारैः संयोजयामास दुहितृः सदृशैर्वरैः ॥ 27.8 ॥

sa pañcāla-patiḥ putrān pitṛ-vaṁśa-vivardhanān dāraiḥ saṁyojayām āsa duhitṝḥ sadṛśair varaiḥ

उस पंचाल-नरेश ने अपने पितृवंश को बढ़ाने वाले पुत्रों का विवाह उपयुक्त कन्याओं से किया, और अपनी पुत्रियों को उपयुक्त वरों को सौंपा।

श्लोक 9 (bhagavata.4.27.9)

पुत्राणां चाभवन्पुत्रा एकैकस्य शतं शतम् । यैर्वै पौरञ्जनो वंशः पञ्चालेषु समेधितः ॥ 27.9 ॥

putrāṇāṁ cābhavan putrā ekaikasya śataṁ śatam yair vai paurañjano vaṁśaḥ pañcāleṣu samedhitaḥ

उन पुत्रों में से प्रत्येक के भी सौ-सौ पुत्र हुए, जिनसे पुरंजन का वंश पंचाल देश में खूब बढ़ गया।

श्लोक 10 (bhagavata.4.27.10)

तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहकोशानुजीविषु । निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥ 27.10 ॥

teṣu tad-riktha-hāreṣu gṛha-kośānujīviṣu nirūḍhena mamatvena viṣayeṣv anvabadhyata

वे सभी उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी थे, उसके घर और कोष पर आश्रित रहते थे; उनके प्रति गहरी ममता से बँधकर वह विषयों में और अधिक उलझता गया।

श्लोक 11 (bhagavata.4.27.11)

ईजे च क्रतुभिर्घोरैर्दीक्षितः पशुमारकैः । देवान् पितृन् भूतपतीन्नानाकामो यथा भवान् ॥ 27.11 ॥

īje ca kratubhir ghorair dīkṣitaḥ paśu-mārakaiḥ devān pitṝn bhūta-patīn nānā-kāmo yathā bhavān

तुम्हारे ही समान, हे राजन्, नाना कामनाओं से प्रेरित होकर वह पशु-वध वाले भीषण यज्ञों में दीक्षित हुआ, और उनके द्वारा देवताओं, पितरों तथा भूतपतियों की पूजा करता रहा।

श्लोक 12 (bhagavata.4.27.12)

युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः । आससाद स वै कालो योऽप्रियः प्रिययोषिताम् ॥ 27.12 ॥

yukteṣv evaṁ pramattasya kuṭumbāsakta-cetasaḥ āsasāda sa vai kālo yo ’priyaḥ priya-yoṣitām

इस प्रकार अपने कुटुम्ब में आसक्त-चित्त और प्रमत्त रहते हुए, अंततः उस पर वह समय आ पहुँचा, जो प्रिय स्त्रियों के प्रियजनों को भी अप्रिय होता है।

श्लोक 13 (bhagavata.4.27.13)

चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिर्नृप । गन्धर्वास्तस्य बलिनः षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ 27.13 ॥

caṇḍavega iti khyāto gandharvādhipatir nṛpa gandharvās tasya balinaḥ ṣaṣṭy-uttara-śata-trayam

हे राजन्! चण्डवेग नामक एक गन्धर्वाधिपति है; उसके अधीन तीन सौ साठ बलशाली गन्धर्व हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.4.27.14)

गन्धर्व्यस्तादृशीरस्य मैथुन्यश्च सितासिताः । परिवृत्त्या विलुम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम् ॥ 27.14 ॥

gandharvyas tādṛśīr asya maithunyaś ca sitāsitāḥ parivṛttyā vilumpanti sarva-kāma-vinirmitām

उसके साथ उतनी ही संख्या में श्वेत और श्याम गन्धर्वियाँ भी हैं, जो बारी-बारी से समस्त काम-भोग की सामग्री को लूटती रहती हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.4.27.15)

ते चण्डवेगानुचराः पुरञ्जनपुरं यदा । हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः ॥ 27.15 ॥

te caṇḍavegānucarāḥ purañjana-puraṁ yadā hartum ārebhire tatra pratyaṣedhat prajāgaraḥ

जब चण्डवेग के अनुचरों ने पुरंजन के नगर को लूटने का प्रयत्न किया, तब वहाँ सदा जागरूक रहने वाले उस सर्प ने उन्हें रोक दिया।

श्लोक 16 (bhagavata.4.27.16)

स सप्तभिः शतैरेको विंशत्या च शतं समाः । पुरञ्जनपुराध्यक्षो गन्धर्वैर्युयुधे बली ॥ 27.16 ॥

sa saptabhiḥ śatair eko viṁśatyā ca śataṁ samāḥ purañjana-purādhyakṣo gandharvair yuyudhe balī

पुरंजन के नगर का वह बलशाली रक्षक अकेला ही सात सौ बीस गन्धर्वों से सौ वर्षों तक युद्ध करता रहा।

श्लोक 17 (bhagavata.4.27.17)

क्षीयमाणे स्वसम्बन्धे एकस्मिन् बहुभिर्युधा । चिन्तां परां जगामार्तः सराष्ट्रपुरबान्धवः ॥ 27.17 ॥

kṣīyamāṇe sva-sambandhe ekasmin bahubhir yudhā cintāṁ parāṁ jagāmārtaḥ sa-rāṣṭra-pura-bāndhavaḥ

जब उसका वह अकेला बन्धु अनेकों के साथ युद्ध करते-करते क्षीण होने लगा, तब पुरंजन अपने राष्ट्र, नगर और सुहृदों सहित अत्यंत चिंतातुर तथा व्याकुल हो उठा।

श्लोक 18 (bhagavata.4.27.18)

स एव पुर्यां मधुभुक्पञ्चालेषु स्वपार्षदैः । उपनीतं बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम् ॥ 27.18 ॥

sa eva puryāṁ madhu-bhuk pañcāleṣu sva-pārṣadaiḥ upanītaṁ baliṁ gṛhṇan strī-jito nāvidad bhayam

इसी बीच वह राजा अपने नगर में विषय-सुख भोगता रहा और पंचाल से अपने सहचरों द्वारा लाई गई भेंट ग्रहण करता रहा; स्त्री से पराजित वह किसी भय को नहीं जान सका।

श्लोक 19 (bhagavata.4.27.19)

कालस्य दुहिता काचित्त्रिलोकीं वरमिच्छती । पर्यटन्ती न बर्हिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्चन ॥ 27.19 ॥

kālasya duhitā kācit tri-lokīṁ varam icchatī paryaṭantī na barhiṣman pratyanandata kaścana

हे बर्हिष्मन्! इसी बीच काल की एक कन्या पति की खोज में तीनों लोकों में भटकती रही, किन्तु कहीं भी किसी ने उसका स्वागत नहीं किया।

श्लोक 20 (bhagavata.4.27.20)

दौर्भाग्येनात्मनो लोके विश्रुता दुर्भगेति सा । या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात्पूरवे वरम् ॥ 27.20 ॥

daurbhāgyenātmano loke viśrutā durbhageti sā yā tuṣṭā rājarṣaye tu vṛtādāt pūrave varam

अपने ही दुर्भाग्य के कारण वह संसार में दुर्भगा के नाम से विख्यात हुई; किन्तु एक बार पुरुवंशी राजर्षि से प्रसन्न होकर, जिसे उसने वरण किया था, उसने उसे वरदान दिया।

श्लोक 21 (bhagavata.4.27.21)

कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् । वव्रे बृहद्व्रतं मां तु जानती काममोहिता ॥ 27.21 ॥

kadācid aṭamānā sā brahma-lokān mahīṁ gatam vavre bṛhad-vrataṁ māṁ tu jānatī kāma-mohitā

एक बार भटकते हुए वह मुझसे मिली, जब मैं ब्रह्मलोक से पृथ्वी की ओर जा रहा था; मुझे बृहद्व्रत-धारी जानते हुए भी वह काम-मोहित होकर मुझे वरण करने लगी।

श्लोक 22 (bhagavata.4.27.22)

मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम् । स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥ 27.22 ॥

mayi saṁrabhya vipula- madāc chāpaṁ suduḥsaham sthātum arhasi naikatra mad-yācñā-vimukho mune

महान क्रोध और अहंकार से भरकर उसने मुझे अत्यंत दुःसह शाप दिया — हे मुने! चूँकि तुमने मेरी याचना से मुख मोड़ लिया है, तुम कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सकोगे।

श्लोक 23 (bhagavata.4.27.23)

ततो विहतसङ्कल्पा कन्यका यवनेश्वरम् । मयोपदिष्टमासाद्य वव्रे नाम्ना भयं पतिम् ॥ 27.23 ॥

tato vihata-saṅkalpā kanyakā yavaneśvaram mayopadiṣṭam āsādya vavre nāmnā bhayaṁ patim

तब मुझसे निराश होकर, उस कन्या ने मेरी ही सलाह पर यवनों के स्वामी भय नामक राजा के पास जाकर उसे अपना पति वरण किया।

श्लोक 24 (bhagavata.4.27.24)

ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् । सङ्कल्पस्त्वयि भूतानां कृतः किल न रिष्यति ॥ 27.24 ॥

ṛṣabhaṁ yavanānāṁ tvāṁ vṛṇe vīrepsitaṁ patim saṅkalpas tvayi bhūtānāṁ kṛtaḥ kila na riṣyati

उसने कहा — हे यवनों में श्रेष्ठ! मैं तुम्हें वरण करती हूँ, जो हर वीर की चाहत हो — जो भी तुम पर अपना संकल्प रखता है, वह कभी नष्ट नहीं होता, ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 25 (bhagavata.4.27.25)

द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ । यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ 27.25 ॥

dvāv imāv anuśocanti bālāv asad-avagrahau yal loka-śāstropanataṁ na rāti na tad icchati

दो प्रकार के मूढ़ और असत्-हठी लोग अंततः पछताते हैं — एक तो वह जो लोक और शास्त्र द्वारा निर्धारित को नहीं देता, और दूसरा वह जो उसे स्वीकार नहीं करता।

श्लोक 26 (bhagavata.4.27.26)

अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु । एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥ 27.26 ॥

atho bhajasva māṁ bhadra bhajantīṁ me dayāṁ kuru etāvān pauruṣo dharmo yad ārtān anukampate

काल-कन्या ने कहा — अतः, हे भद्र! मुझ पर, जो तुम्हारी शरणागत हूँ, कृपा करो और मुझे स्वीकार करो; दुःखी पर करुणा करना ही सच्चा पौरुष और धर्म है।

श्लोक 27 (bhagavata.4.27.27)

कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वरः । चिकीर्षुर्देवगुह्यं स सस्मितं तामभाषत ॥ 27.27 ॥

kāla-kanyodita-vaco niśamya yavaneśvaraḥ cikīrṣur deva-guhyaṁ sa sasmitaṁ tām abhāṣata

काल-कन्या के इस प्रकार कहे गए वचन सुनकर, यवनों का वह स्वामी, विधाता के उस गुह्य प्रयोजन को पूर्ण करने की इच्छा से, मुस्कुराते हुए उससे बोला।

श्लोक 28 (bhagavata.4.27.28)

मया निरूपितस्तुभ्यं पतिरात्मसमाधिना । नाभिनन्दति लोकोऽयं त्वामभद्रामसम्मताम् ॥ 27.28 ॥

mayā nirūpitas tubhyaṁ patir ātma-samādhinā nābhinandati loko ’yaṁ tvām abhadrām asammatām

उसने कहा — गहन आत्म-चिंतन के द्वारा मैंने तुम्हारे लिये एक पति निश्चित कर लिया है; क्योंकि यह संसार तुम्हें, अशुभ और अस्वीकृत मानकर, स्वागत नहीं करता।

श्लोक 29 (bhagavata.4.27.29)

त्वमव्यक्तगतिर्भुङ्क्ष्व लोकं कर्मविनिर्मितम् । या हि मे पृतनायुक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि ॥ 27.29 ॥

tvam avyakta-gatir bhuṅkṣva lokaṁ karma-vinirmitam yā hi me pṛtanā-yuktā prajā-nāśaṁ praṇeṣyasi

अदृश्य गति से विचरण करती हुई तुम इस लोक का उपभोग करो, जो कर्मों से ही रचा गया है; मेरी सेना के साथ मिलकर तुम प्रजा का विनाश करोगी।

श्लोक 30 (bhagavata.4.27.30)

प्रज्वारोऽयं मम भ्राता त्वं च मे भगिनी भव । चराम्युभाभ्यां लोकेऽस्मिन्नव्यक्तो भीमसैनिकः ॥ 27.30 ॥

prajvāro ’yaṁ mama bhrātā tvaṁ ca me bhaginī bhava carāmy ubhābhyāṁ loke ’sminn avyakto bhīma-sainikaḥ

यह मेरा भाई प्रज्वार है; तुम भी मेरी बहन बन जाओ — इस प्रकार तुम दोनों तथा मेरे भयंकर सैनिकों के साथ, मैं अदृश्य रूप से इस लोक में विचरण करूँगा।

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