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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29

नारद और राजा प्राचीनबर्हि का संवाद

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (bhagavata.4.29.1)

प्राचीनबर्हिरुवाच भगवंस्ते वचोऽस्माभिर्न सम्यगवगम्यते । कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः ॥ 29.1 ॥

prācīnabarhir uvāca bhagavaṁs te vaco ’smābhir na samyag avagamyate kavayas tad vijānanti na vayaṁ karma-mohitāḥ

प्राचीनबर्हि ने कहा — हे भगवन्! आपके वचनों को हम भलीभाँति नहीं समझ पाए। कवि (ज्ञानीजन) ही इसे जानते हैं; हम तो कर्मों से मोहित हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.4.29.2)

नारद उवाच पुरुषं पुरञ्जनं विद्याद्यद् व्यनक्त्यात्मनः पुरम् । एकद्वित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम् ॥ 29.2 ॥

nārada uvāca puruṣaṁ purañjanaṁ vidyād yad vyanakty ātmanaḥ puram eka-dvi-tri-catuṣ-pādaṁ bahu-pādam apādakam

नारद ने कहा — पुरंजन को उस पुरुष (जीवात्मा) के रूप में जानो, जो अपने लिये एक, दो, तीन, चार, अनेक अथवा बिना पैरों वाला शरीर-नगर रचता है।

श्लोक 3 (bhagavata.4.29.3)

योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः । यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः ॥ 29.3 ॥

yo ’vijñātāhṛtas tasya puruṣasya sakheśvaraḥ yan na vijñāyate pumbhir nāmabhir vā kriyā-guṇaiḥ

जिसे मैंने 'अविज्ञात' कहा, वह उस पुरुष का सखा और ईश्वर है, जिसे मनुष्य नामों, कर्मों या गुणों से नहीं जान सकते।

श्लोक 4 (bhagavata.4.29.4)

यदा जिघृक्षन् पुरुषः कार्त्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् । नवद्वारं द्विहस्ताङ्घ्रि तत्रामनुत साध्विति ॥ 29.4 ॥

yadā jighṛkṣan puruṣaḥ kārtsnyena prakṛter guṇān nava-dvāraṁ dvi-hastāṅghri tatrāmanuta sādhv iti

जब जीवात्मा प्रकृति के गुणों को समग्रता से भोगना चाहता है, तब वह दो हाथों और दो पैरों वाले उस नवद्वार शरीर को इसके लिये उपयुक्त मानता है।

श्लोक 5 (bhagavata.4.29.5)

बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् । यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ॥ 29.5 ॥

buddhiṁ tu pramadāṁ vidyān mamāham iti yat-kṛtam yām adhiṣṭhāya dehe ’smin pumān bhuṅkte ’kṣabhir guṇān

बुद्धि को ही उस स्त्री (पुरंजनी) के रूप में जानो, जो 'मैं' और 'मेरा' का भाव उत्पन्न करती है; उसका आश्रय लेकर पुरुष इस शरीर में इन्द्रियों द्वारा गुणों को भोगता है।

श्लोक 6 (bhagavata.4.29.6)

सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् । सख्यस्तद्वृत्तयः प्राणः पञ्चवृत्तिर्यथोरगः ॥ 29.6 ॥

sakhāya indriya-gaṇā jñānaṁ karma ca yat-kṛtam sakhyas tad-vṛttayaḥ prāṇaḥ pañca-vṛttir yathoragaḥ

वे पुरुष-सखा ज्ञान और कर्म करने वाली इन्द्रियाँ हैं; उनकी सखियाँ उनके ही कार्य हैं; और पाँच प्रकार से गतिशील वह सर्प प्राणवायु है।

श्लोक 7 (bhagavata.4.29.7)

बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् । पञ्चालाः पञ्च विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ॥ 29.7 ॥

bṛhad-balaṁ mano vidyād ubhayendriya-nāyakam pañcālāḥ pañca viṣayā yan-madhye nava-khaṁ puram

बृहद्बल नामक ग्यारहवें सखा को दोनों प्रकार की इन्द्रियों के नायक मन के रूप में जानो; पंचाल पाँच विषय हैं, जिनके मध्य में यह नवद्वार नगर स्थित है।

श्लोक 8 (bhagavata.4.29.8)

अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदाविति । द्वे द्वे द्वारौ बहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः ॥ 29.8 ॥

akṣiṇī nāsike karṇau mukhaṁ śiśna-gudāv iti dve dve dvārau bahir yāti yas tad-indriya-saṁyutaḥ

दो आँखें, दो नासापुट, दो कान, मुख तथा शिश्न और गुदा — ये दो-दो के जोड़े में नौ द्वार हैं, जिनसे इन्द्रियों से युक्त होकर पुरुष बाहर जाता है।

श्लोक 9 (bhagavata.4.29.9)

अक्षिणी नासिके आस्यमिति पञ्चपुरः कृताः । दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः । पश्चिमे इत्यधोद्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते ॥ 29.9 ॥

akṣiṇī nāsike āsyam iti pañca puraḥ kṛtāḥ dakṣiṇā dakṣiṇaḥ karṇa uttarā cottaraḥ smṛtaḥ paścime ity adho dvārau gudaṁ śiśnam ihocyate

दो आँखें, दो नासापुट और मुख — इस प्रकार पाँच पूर्वी द्वार हैं; दायाँ कान दक्षिण द्वार है और बायाँ उत्तर द्वार; नीचे स्थित गुदा और शिश्न को यहाँ पश्चिमी द्वार कहा जाता है।

श्लोक 10 (bhagavata.4.29.10)

खद्योताविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते । रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः ॥ 29.10 ॥

khadyotāvirmukhī cātra netre ekatra nirmite rūpaṁ vibhrājitaṁ tābhyāṁ vicaṣṭe cakṣuṣeśvaraḥ

खद्योता और आविर्मुखी वे दोनों नेत्र हैं, जो साथ-साथ स्थित हैं; उनके द्वारा चक्षु का स्वामी विभ्राजित नामक रूप को देखता है।

श्लोक 11 (bhagavata.4.29.11)

नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते । घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग्रसविद्रसः ॥ 29.11 ॥

nalinī nālinī nāse gandhaḥ saurabha ucyate ghrāṇo ’vadhūto mukhyāsyaṁ vipaṇo vāg rasavid rasaḥ

नलिनी और नालिनी दोनों नासापुट हैं, और गंध को सौरभ कहा जाता है; घ्राणेन्द्रिय अवधूत है; मुख मुख्या है, वाणी विपण है, और स्वादेन्द्रिय रसज्ञ है तथा उसका विषय रस है।

श्लोक 12 (bhagavata.4.29.12)

आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् । पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ॥ 29.12 ॥

āpaṇo vyavahāro ’tra citram andho bahūdanam pitṛhūr dakṣiṇaḥ karṇa uttaro devahūḥ smṛtaḥ

आपण जिह्वा का व्यवहार (वाणी) है, और उसका विविध विषय बहूदन अन्न है; दायाँ कान पितृहू द्वार कहलाता है, और बायाँ देवहू।

श्लोक 13 (bhagavata.4.29.13)

प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्चालसंज्ञितम् । पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्व्रजेत् ॥ 29.13 ॥

pravṛttaṁ ca nivṛttaṁ ca śāstraṁ pañcāla-saṁjñitam pitṛ-yānaṁ deva-yānaṁ śrotrāc chruta-dharād vrajet

भोग की ओर प्रवृत्त करने वाला और उससे निवृत्त करने वाला शास्त्र क्रमशः दक्षिण-पंचाल और उत्तर-पंचाल कहलाता है; श्रवण-शक्ति (श्रुतधर) से युक्त कान के द्वारा पितृयान अथवा देवयान का मार्ग प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (bhagavata.4.29.14)

आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः । उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निऋर्तिर्गुद उच्यते ॥ 29.14 ॥

āsurī meḍhram arvāg-dvār vyavāyo grāmiṇāṁ ratiḥ upastho durmadaḥ prokto nirṛtir guda ucyate

आसुरी शिश्न-रूपी निम्न द्वार है, जिसके द्वारा सांसारिक जनों का प्रिय मैथुन होता है; जननेन्द्रिय को दुर्मद कहा गया है, और गुदा को निऋति कहते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.4.29.15)

वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मे शृणु । हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥ 29.15 ॥

vaiśasaṁ narakaṁ pāyur lubdhako ’ndhau tu me śṛṇu hasta-pādau pumāṁs tābhyāṁ yukto yāti karoti ca

वैशस नरक है, और गुदा लुब्धक है; अब मुझसे उन दो अंधों के विषय में सुनो — वे हाथ और पैर हैं, जिनसे युक्त होकर पुरुष चलता और कर्म करता है।

श्लोक 16 (bhagavata.4.29.16)

अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते । तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः ॥ 29.16 ॥

antaḥ-puraṁ ca hṛdayaṁ viṣūcir mana ucyate tatra mohaṁ prasādaṁ vā harṣaṁ prāpnoti tad-guṇaiḥ

अंतःपुर हृदय है, और विषूचीन मन कहलाता है; वहाँ गुणों के प्रभाव से मोह, प्रसन्नता अथवा हर्ष की प्राप्ति होती है।

श्लोक 17 (bhagavata.4.29.17)

यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा । तथा तथोपद्रष्टात्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ॥ 29.17 ॥

yathā yathā vikriyate guṇākto vikaroti vā tathā tathopadraṣṭātmā tad-vṛttīr anukāryate

जैसे-जैसे गुणों से रंजित वह मन विकारग्रस्त होता है या स्वयं विकार उत्पन्न करता है, वैसे ही साक्षी-रूप आत्मा भी उसकी वृत्तियों का अनुकरण करने लगता है।

श्लोक 18 (bhagavata.4.29.18)

देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः । द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पञ्चासुबन्धुरः ॥ 29.18 ॥

deho rathas tv indriyāśvaḥ saṁvatsara-rayo ’gatiḥ dvi-karma-cakras tri-guṇa- dhvajaḥ pañcāsu-bandhuraḥ

शरीर रथ है, इन्द्रियाँ उसके अश्व हैं, जिनका वेग वर्षों के बीतने में है, यद्यपि वे कहीं नहीं पहुँचातीं; उसके दो चक्र पुण्य और पाप कर्म हैं, ध्वज तीन गुण हैं, और बंधन पाँच प्राण हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.4.29.19)

मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबरः । पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ॥ 29.19 ॥

mano-raśmir buddhi-sūto hṛn-nīḍo dvandva-kūbaraḥ pañcendriyārtha-prakṣepaḥ sapta-dhātu-varūthakaḥ

उसकी रास मन है, सारथी बुद्धि है, आसन हृदय है, धुरादंड द्वन्द्व (सुख-दुःखादि) है; उसका भार पाँच इन्द्रिय-विषय हैं, और आवरण सात धातुएँ हैं।

श्लोक 20 (bhagavata.4.29.20)

आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति । एकादशेन्द्रियचमूः पञ्चसूनाविनोदकृत् ॥ 29.20 ॥

ākūtir vikramo bāhyo mṛga-tṛṣṇāṁ pradhāvati ekādaśendriya-camūḥ pañca-sūnā-vinoda-kṛt

उसकी बाह्य प्रेरक शक्ति संकल्प है, और वह मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता है; उसकी सेना ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, और वह पाँच सूनाओं (हिंसा-स्थलों) में अपना विनोद करता है।

श्लोक 21 (bhagavata.4.29.21)

संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः । तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः । हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ 29.21 ॥

saṁvatsaraś caṇḍavegaḥ kālo yenopalakṣitaḥ tasyāhānīha gandharvā gandharvyo rātrayaḥ smṛtāḥ haranty āyuḥ parikrāntyā ṣaṣṭy-uttara-śata-trayam

चण्डवेग वर्ष है, जिससे काल का बोध होता है; उसके दिन गन्धर्व और रात्रियाँ गन्धर्वियाँ कही गई हैं — तीन सौ साठ की संख्या में — और अपने घूमने से वे आयु को हर लेती हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.4.29.22)

कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति । स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ॥ 29.22 ॥

kāla-kanyā jarā sākṣāl lokas tāṁ nābhinandati svasāraṁ jagṛhe mṛtyuḥ kṣayāya yavaneśvaraḥ

कालकन्या साक्षात् जरा (वृद्धावस्था) है, जिसका इस लोक में कोई स्वागत नहीं करता; यवनेश्वर, जो मृत्यु है, ने प्राणियों के विनाश हेतु उसे अपनी बहन के रूप में ग्रहण किया।

श्लोक 23 (bhagavata.4.29.23)

आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः । भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥ 29.23 ॥

ādhayo vyādhayas tasya sainikā yavanāś carāḥ bhūtopasargāśu-rayaḥ prajvāro dvi-vidho jvaraḥ

उसके भ्रमणशील सैनिक यवन, मानसिक व्यथाएँ और शारीरिक रोग हैं, जो अन्य प्राणियों द्वारा उत्पन्न शीघ्रगामी उपद्रव हैं; प्रज्वार दो प्रकार का ज्वर है।

श्लोक 24 (bhagavata.4.29.24)

एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः । क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ॥ 29.24 ॥

evaṁ bahu-vidhair duḥkhair daiva-bhūtātma-sambhavaiḥ kliśyamānaḥ śataṁ varṣaṁ dehe dehī tamo-vṛtaḥ

इस प्रकार दैव, अन्य प्राणियों तथा अपने ही शरीर-मन से उत्पन्न अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित, तमस से आवृत देही सौ वर्षों तक शरीर में क्लेश भोगता है।

श्लोक 25 (bhagavata.4.29.25)

प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः । शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ॥ 29.25 ॥

prāṇendriya-mano-dharmān ātmany adhyasya nirguṇaḥ śete kāma-lavān dhyāyan mamāham iti karma-kṛt

वह स्वभाव से निर्गुण होते हुए भी प्राण, इन्द्रिय और मन के धर्मों को आत्मा पर आरोपित कर लेता है, और कामनाओं के टुकड़ों का चिंतन करते हुए 'मैं' और 'मेरा' के भाव से कर्म करता रहता है।

श्लोक 26 (bhagavata.4.29.26)

यदात्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् । पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥ 29.26 ॥

yadātmānam avijñāya bhagavantaṁ paraṁ gurum puruṣas tu viṣajjeta guṇeṣu prakṛteḥ sva-dṛk

जब पुरुष, स्वयं द्रष्टा होते हुए भी, अपने आत्मा और अपने परम गुरु भगवान को नहीं जानता, तब वह प्रकृति के गुणों में उलझ जाता है।

श्लोक 27 (bhagavata.4.29.27)

गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः । शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते ॥ 29.27 ॥

guṇābhimānī sa tadā karmāṇi kurute ’vaśaḥ śuklaṁ kṛṣṇaṁ lohitaṁ vā yathā-karmābhijāyate

तब गुणों से अपनी पहचान बनाकर वह विवशतापूर्वक कर्म करता है, और उन्हीं कर्मों के अनुसार वह श्वेत, कृष्ण अथवा लोहित (गुण) में जन्म लेता है।

श्लोक 28 (bhagavata.4.29.28)

शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति कर्हिचित् । दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमःशोकोत्कटान् क्वचित् ॥ 29.28 ॥

śuklāt prakāśa-bhūyiṣṭhāḻ lokān āpnoti karhicit duḥkhodarkān kriyāyāsāṁs tamaḥ-śokotkaṭān kvacit

श्वेत गुण से वह कभी अत्यंत प्रकाशयुक्त लोकों को प्राप्त होता है; रक्त गुण से दुःखांत, श्रमसाध्य कर्मों वाले लोकों को; और कृष्ण गुण से कहीं अंधकार और शोक से भरे लोकों को।

श्लोक 29 (bhagavata.4.29.29)

क्वचित्पुमान् क्वचिच्च स्त्री क्वचिन्नोभयमन्धधीः । देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भवः ॥ 29.29 ॥

kvacit pumān kvacic ca strī kvacin nobhayam andha-dhīḥ devo manuṣyas tiryag vā yathā-karma-guṇaṁ bhavaḥ

कभी पुरुष, कभी स्त्री, कभी बुद्धि-अंध होकर न पुरुष न स्त्री — देवता, मनुष्य अथवा पशु के रूप में — उसका जन्म उसके कर्म-गुण के अनुसार होता है।

श्लोक 30 (bhagavata.4.29.30)

क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् । चरन्विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥ 29.30 ॥

kṣut-parīto yathā dīnaḥ sārameyo gṛhaṁ gṛham caran vindati yad-diṣṭaṁ daṇḍam odanam eva vā

जैसे भूख से पीड़ित कोई दीन कुत्ता घर-घर घूमता हुआ अपने भाग्य के अनुसार कभी दण्ड और कभी अन्न का कौर पाता है —

श्लोक 31 (bhagavata.4.29.31)

तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् । उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥ 29.31 ॥

tathā kāmāśayo jīva uccāvaca-pathā bhraman upary adho vā madhye vā yāti diṣṭaṁ priyāpriyam

उसी प्रकार कामनाओं से भरा हुआ जीव, ऊँचे-नीचे मार्गों में भटकते हुए, ऊपर, नीचे अथवा मध्य में, भाग्य के अनुसार प्रिय अथवा अप्रिय को प्राप्त करता है।

श्लोक 32 (bhagavata.4.29.32)

दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥ 29.32 ॥

duḥkheṣv ekatareṇāpi daiva-bhūtātma-hetuṣu jīvasya na vyavacchedaḥ syāc cet tat-tat-pratikriyā

दैव, अन्य प्राणियों तथा स्वयं से उत्पन्न दुःखों में से किसी एक का भी प्रतिकार करने पर जीव को उनसे वास्तविक मुक्ति नहीं मिलती।

श्लोक 33 (bhagavata.4.29.33)

यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् । तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥ 29.33 ॥

yathā hi puruṣo bhāraṁ śirasā gurum udvahan taṁ skandhena sa ādhatte tathā sarvāḥ pratikriyāḥ

जैसे सिर पर भारी बोझ ढोने वाला पुरुष उसे कंधे पर रख लेता है — वैसे ही सभी प्रतिकार होते हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.4.29.34)

नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् । द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥ 29.34 ॥

naikāntataḥ pratīkāraḥ karmaṇāṁ karma kevalam dvayaṁ hy avidyopasṛtaṁ svapne svapna ivānagha

हे अनघ! केवल कर्म ही कर्म का अंतिम प्रतिकार नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों ही अविद्या से उत्पन्न हैं — जैसे स्वप्न में स्वप्न के द्वारा स्वप्न का निवारण।

श्लोक 35 (bhagavata.4.29.35)

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ 29.35 ॥

arthe hy avidyamāne ’pi saṁsṛtir na nivartate manasā liṅga-rūpeṇa svapne vicarato yathā

जैसे स्वप्न में मन द्वारा रचित रूप में विचरण करने वाला पुरुष, वस्तु के वास्तव में न होते हुए भी दुःख भोगता है, वैसे ही संसार-बंधन उस वस्तु के अभाव में भी समाप्त नहीं होता।

श्लोक 36 (bhagavata.4.29.36)

अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा । संसृतिस्तद्वयवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥ 29.36 ॥

athātmano ’rtha-bhūtasya yato ’nartha-paramparā saṁsṛtis tad-vyavacchedo bhaktyā paramayā gurau

आत्मा का वास्तविक हित तो इस अनर्थ-परम्परा रूपी संसार-बंधन का उच्छेद है — और वह उच्छेद केवल गुरु के प्रति परम भक्ति से ही संभव है।

श्लोक 37 (bhagavata.4.29.37)

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः । सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥ 29.37 ॥

vāsudeve bhagavati bhakti-yogaḥ samāhitaḥ sadhrīcīnena vairāgyaṁ jñānaṁ ca janayiṣyati

भगवान वासुदेव में सम्यक् रूप से स्थिर भक्तियोग, समुचित क्रम से वैराग्य और ज्ञान दोनों को उत्पन्न करेगा।

श्लोक 38 (bhagavata.4.29.38)

सोऽचिरादेव राजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः । शृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥ 29.38 ॥

so ’cirād eva rājarṣe syād acyuta-kathāśrayaḥ śṛṇvataḥ śraddadhānasya nityadā syād adhīyataḥ

हे राजर्षे! जो श्रद्धापूर्वक निरंतर सुनता और अध्ययन करता है, वह शीघ्र ही अच्युत भगवान की कथाओं का आश्रय पाने वाला हो जाता है।

श्लोक 39 (bhagavata.4.29.39)

यत्र भागवता राजन् साधवो विशदाशयाः । भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥ 29.39 ॥

yatra bhāgavatā rājan sādhavo viśadāśayāḥ bhagavad-guṇānukathana- śravaṇa-vyagra-cetasaḥ

हे राजन्! जहाँ शुद्ध-हृदय भागवत भक्तजन एकत्रित होते हैं, जिनका चित्त भगवान के गुणों के कथन और श्रवण में तल्लीन रहता है —

श्लोक 40 (bhagavata.4.29.40)

तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र- पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति । ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णै- स्तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ 29.40 ॥

tasmin mahan-mukharitā madhubhic-caritra- pīyūṣa-śeṣa-saritaḥ paritaḥ sravanti tā ye pibanty avitṛṣo nṛpa gāḍha-karṇais tān na spṛśanty aśana-tṛḍ-bhaya-śoka-mohāḥ

वहाँ महापुरुषों के मुख से उच्चारित मधुसूदन के चरित्ररूपी अमृत की नदियाँ चारों ओर बहती हैं; हे राजन्! जो लोग कान खोलकर, कभी तृप्त न होकर उन्हें पीते रहते हैं, उन्हें भूख, प्यास, भय, शोक और मोह कभी स्पर्श नहीं कर पाते।

श्लोक 41 (bhagavata.4.29.41)

एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः । न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ 29.41 ॥

etair upadruto nityaṁ jīva-lokaḥ svabhāvajaiḥ na karoti harer nūnaṁ kathāmṛta-nidhau ratim

अपने ही स्वभाव से उत्पन्न इन बाधाओं से नित्य पीड़ित हुआ यह संसारी जीव, निश्चय ही हरि-कथा के उस अमृत-सागर में अनुराग नहीं कर पाता।

श्लोक 42 (bhagavata.4.29.42)

प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः । दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ 29.42 ॥

prajāpati-patiḥ sākṣād bhagavān giriśo manuḥ dakṣādayaḥ prajādhyakṣā naiṣṭhikāḥ sanakādayaḥ

प्रजापतियों के स्वामी स्वयं ब्रह्मा; भगवान गिरीश (शिव); मनु; दक्ष आदि प्रजा के अधिपति; तथा सनक आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी —

श्लोक 43 (bhagavata.4.29.43)

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥ 29.43 ॥

marīcir atry-aṅgirasau pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ bhṛgur vasiṣṭha ity ete mad-antā brahma-vādinaḥ

मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ — ये सब, मुझ (नारद) तक, ब्रह्मवादी हैं —

श्लोक 44 (bhagavata.4.29.44)

अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥ 29.44 ॥

adyāpi vācas-patayas tapo-vidyā-samādhibhiḥ paśyanto ’pi na paśyanti paśyantaṁ parameśvaram

फिर भी ये वाणी के स्वामी, अपनी तपस्या, विद्या और समाधि के होते हुए भी, देखते हुए भी उस सर्वद्रष्टा परमेश्वर को नहीं देख पाते।

श्लोक 45 (bhagavata.4.29.45)

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे । मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ 29.45 ॥

śabda-brahmaṇi duṣpāre caranta uru-vistare mantra-liṅgair vyavacchinnaṁ bhajanto na viduḥ param

शब्दब्रह्म (वेद) के उस अपार, विस्तृत सागर में विचरण करते हुए और मंत्र-लक्षणों से सीमित तत्व की उपासना करते हुए भी वे परमतत्व को नहीं जान पाते।

श्लोक 46 (bhagavata.4.29.46)

यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः । स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ 29.46 ॥

yadā yasyānugṛhṇāti bhagavān ātma-bhāvitaḥ sa jahāti matiṁ loke vede ca pariniṣṭhitām

किन्तु जब आत्मभावित भगवान किसी पर अनुग्रह करते हैं, तब वह लोक और वेद दोनों में स्थिर अपनी बुद्धि को भी त्याग देता है।

श्लोक 47 (bhagavata.4.29.47)

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु । मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥ 29.47 ॥

tasmāt karmasu barhiṣmann ajñānād artha-kāśiṣu mārtha-dṛṣṭiṁ kṛthāḥ śrotra- sparśiṣv aspṛṣṭa-vastuṣu

अतः हे बर्हिष्मन्! अज्ञानवश उन कर्मों में लाभ-दृष्टि मत रखो, जो केवल कानों को सुनने में अच्छे लगते हैं, किन्तु वास्तविक तत्व का स्पर्श नहीं करते।

श्लोक 48 (bhagavata.4.29.48)

स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः । आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥ 29.48 ॥

svaṁ lokaṁ na vidus te vai yatra devo janārdanaḥ āhur dhūmra-dhiyo vedaṁ sakarmakam atad-vidaḥ

धूम्र-बुद्धि वाले वे लोग, जो अपने उस वास्तविक निवास को नहीं जानते, जहाँ भगवान जनार्दन विराजते हैं, इसी अज्ञान के कारण वेद को केवल सकाम कर्मों तक सीमित मानते हैं।

श्लोक 49 (bhagavata.4.29.49)

आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम् । स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम् । तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥ 29.49 ॥

āstīrya darbhaiḥ prāg-agraiḥ kārtsnyena kṣiti-maṇḍalam stabdho bṛhad-vadhān mānī karma nāvaiṣi yat param tat karma hari-toṣaṁ yat sā vidyā tan-matir yayā

पूर्वाग्र कुशों से समस्त पृथ्वी-मण्डल को आच्छादित कर, अपने महान यज्ञों से गर्वित होकर भी तुम उस परम कर्म को नहीं जानते; वही कर्म सार्थक है जो हरि को संतुष्ट करे, और वही विद्या है जो उस समझ को उत्पन्न करे।

श्लोक 50 (bhagavata.4.29.50)

हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्वरः । तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह ॥ 29.50 ॥

harir deha-bhṛtām ātmā svayaṁ prakṛtir īśvaraḥ tat-pāda-mūlaṁ śaraṇaṁ yataḥ kṣemo nṛṇām iha

हरि ही समस्त देहधारियों की आत्मा हैं, वे स्वयं प्रकृति के भी ईश्वर हैं; उन्हीं के चरणों की शरण से इस लोक में मनुष्यों का वास्तविक कल्याण होता है।

श्लोक 51 (bhagavata.4.29.51)

स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि । इति वेद स वै विद्वान्यो विद्वान्स गुरुर्हरिः ॥ 29.51 ॥

sa vai priyatamaś cātmā yato na bhayam aṇv api iti veda sa vai vidvān yo vidvān sa gurur hariḥ

वे ही सबके अत्यंत प्रिय आत्मा हैं, जिनसे किंचित् भी भय नहीं होता; जो यह जानता है, वही सच्चा विद्वान है, और जो सच्चा विद्वान है, वही स्वयं हरि-रूप गुरु है।

श्लोक 52 (bhagavata.4.29.52)

नारद उवाच प्रश्न एवं हि सञ्छिन्नो भवतः पुरुषर्षभ । अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥ 29.52 ॥

nārada uvāca praśna evaṁ hi sañchinno bhavataḥ puruṣarṣabha atra me vadato guhyaṁ niśāmaya suniścitam

नारद ने कहा — हे पुरुषश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हारा प्रश्न पूर्णतः निवृत्त हो गया; अब मुझसे कहे जा रहे इस निश्चित गुह्य तत्व को सुनो।

श्लोक 53 (bhagavata.4.29.53)

क्षुद्रं चरं सुमनसां शरणे मिथित्वा रक्तं षडङ्घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम् । अग्रे वृकानसुतृपोऽविगणय्य यान्तं पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम् ॥ 29.53 ॥

kṣudraṁ caraṁ sumanasāṁ śaraṇe mithitvā raktaṁ ṣaḍaṅghri-gaṇa-sāmasu lubdha-karṇam agre vṛkān asu-tṛpo ’vigaṇayya yāntaṁ pṛṣṭhe mṛgaṁ mṛgaya lubdhaka-bāṇa-bhinnam

उस छोटे मृग को खोजो, जो फूलों के आश्रय में अपनी संगिनी के साथ विचरण करता है, भ्रमर-समूह के गुंजार में जिसके कान लुभाये हुए हैं, जो आगे मांसभक्षी भेड़ियों की और पीछे शिकारी के बाण की परवाह न करते हुए चला जा रहा है।

श्लोक 54 (bhagavata.4.29.54)

सुमनःसमधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधुगन्धवत्क्षुद्रतमं काम्यकर्मविपाकजं कामसुखलवं जैह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तदभिनिवेशितमनसंषडङ्घ्रिगणसामगीत वदतिमनोहरवनितादिजनालापेष्वतितरामतिप्रलोभितकर्णमग्रे वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतोऽहोरात्रान्तान् काललवविशेषानविगणय्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकः कृतान्तोऽन्तःशरेण यमिह पराविध्यति तमिममात्मानमहो राजन् भिन्नहृदयं द्रष्टुमर्हसीति ॥ 29.54 ॥

sumanaḥ-sama-dharmaṇāṁ strīṇāṁ śaraṇa āśrame puṣpa-madhu-gandhavat kṣudratamaṁ kāmya-karma-vipākajaṁ kāma-sukha-lavaṁ jaihvyaupasthyādi vicinvantaṁ mithunī-bhūya tad-abhiniveśita-manasaṁ ṣaḍaṅghri-gaṇa-sāma-gītavad atimanohara-vanitādi-janālāpeṣv atitarām atipralobhita-karṇam agre vṛka-yūthavad ātmana āyur harato ’ho-rātrān tān kāla-lava-viśeṣān avigaṇayya gṛheṣu viharantaṁ pṛṣṭhata eva parokṣam anupravṛtto lubdhakaḥ kṛtānto ’ntaḥ śareṇa yam iha parāvidhyati tam imam ātmānam aho rājan bhinna-hṛdayaṁ draṣṭum arhasīti.

फूल के समान स्वभाव वाली स्त्रियाँ — जो सुगंध और मधु के समान आरम्भ में मोहक, किन्तु अंत में अत्यंत तुच्छ हैं, कामनामय कर्मों का फल मात्र हैं — जिनके आश्रय में मनुष्य जिह्वा और जननेन्द्रिय के क्षणिक सुख की खोज में उनके साथ एकरूप हो जाता है। जैसे भ्रमर पुष्प-पुष्प पर गुंजार करते हैं, वैसे ही सुंदर स्त्री और संतान की मधुर बातों में कान लगाकर मोहित हुआ मनुष्य अपने घर में विचरण करता रहता है, और उसे यह भान नहीं रहता कि भेड़िये के समान दिन-रात उसकी आयु को हर रहे हैं, न ही उसे यह पता चलता कि मृत्यु-रूपी शिकारी पीछे से गुप्त रूप से आकर अपने अंतर्बाण से उसे बींध रहा है। हे राजन्! अब तुम्हें अपने-आपको इसी बिंधे हुए हृदय वाले मृग के समान देखना चाहिए।

श्लोक 55 (bhagavata.4.29.55)

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्त- श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते । जह्यङ्गनाश्रममसत्तमयूथगाथं प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥ 29.55 ॥

sa tvaṁ vicakṣya mṛga-ceṣṭitam ātmano ’ntaś cittaṁ niyaccha hṛdi karṇa-dhunīṁ ca citte jahy aṅganāśramam asattama-yūtha-gāthaṁ prīṇīhi haṁsa-śaraṇaṁ virama krameṇa

इस प्रकार मृग की चेष्टा को अपनी ही देखकर, अपने चित्त को हृदय में स्थिर करो, और अपनी श्रवण-धारा को भी वहीं मोड़ो; स्त्री के आश्रय और उसकी नीच जन-समूह की गाथाओं को त्याग दो, हंस (मुक्त पुरुषों) की शरण से प्रीति करो, और क्रमशः विरत हो जाओ।

श्लोक 56 (bhagavata.4.29.56)

राजोवाच श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत । नैतज्जानन्त्युपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥ 29.56 ॥

rājovāca śrutam anvīkṣitaṁ brahman bhagavān yad abhāṣata naitaj jānanty upādhyāyāḥ kiṁ na brūyur vidur yadi

राजा ने कहा — हे ब्रह्मन्! आपने जो कुछ कहा, मैंने उसे सुना और विचार किया। मेरे उपाध्याय इसे नहीं जानते थे — यदि जानते होते, तो क्यों न बताते?

श्लोक 57 (bhagavata.4.29.57)

संशयोऽत्र तु मे विप्र सञ्छिन्नस्तत्कृतो महान् । ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ॥ 29.57 ॥

saṁśayo ’tra tu me vipra sañchinnas tat-kṛto mahān ṛṣayo ’pi hi muhyanti yatra nendriya-vṛttayaḥ

हे विप्र! उस उपदेश से उत्पन्न मेरा एक बड़ा संशय अब दूर हो गया है — क्योंकि जहाँ इन्द्रियों की वृत्तियों का कोई स्थान नहीं, वहाँ ऋषिजन भी मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 58 (bhagavata.4.29.58)

कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम् । अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥ 29.58 ॥

karmāṇy ārabhate yena pumān iha vihāya tam amutrānyena dehena juṣṭāni sa yad aśnute

जिस शरीर से मनुष्य यहाँ कर्म आरम्भ करता है, उसे तो वह त्याग देता है; फिर वह किसी अन्य शरीर से, अन्यत्र, उन कर्मों के फल का भोग कैसे करता है?

श्लोक 59 (bhagavata.4.29.59)

इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह । कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥ 29.59 ॥

iti veda-vidāṁ vādaḥ śrūyate tatra tatra ha karma yat kriyate proktaṁ parokṣaṁ na prakāśate

वेद के ज्ञाताओं में जगह-जगह ऐसा ही तर्क सुनने को मिलता है — किन्तु जो कर्म किया जाता है, वह परोक्ष रूप से फल देने की बात कही तो जाती है, पर स्पष्ट नहीं होती।

श्लोक 60 (bhagavata.4.29.60)

नारद उवाच येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् । भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिङ्गेन मनसा स्वयम् ॥ 29.60 ॥

nārada uvāca yenaivārabhate karma tenaivāmutra tat pumān bhuṅkte hy avyavadhānena liṅgena manasā svayam

नारद ने कहा — जिस सूक्ष्म शरीर अर्थात् मन से पुरुष यहाँ कर्म आरम्भ करता है, उसी से वह स्वयं, बिना किसी वास्तविक व्यवधान के, परलोक में भी उसका फल भोगता है।

श्लोक 61 (bhagavata.4.29.61)

शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा । कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ॥ 29.61 ॥

śayānam imam utsṛjya śvasantaṁ puruṣo yathā karmātmany āhitaṁ bhuṅkte tādṛśenetareṇa vā

जैसे पुरुष अपने सोते हुए, श्वास लेते हुए शरीर को छोड़कर स्वप्न में अपने ही कर्मों द्वारा संचित फल का भोग करता है, वैसे ही वह इस शरीर के समान अथवा भिन्न शरीर में अपने कर्मों का फल भोगता है।

श्लोक 62 (bhagavata.4.29.62)

ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् । गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः ॥ 29.62 ॥

mamaite manasā yad yad asāv aham iti bruvan gṛhṇīyāt tat pumān rāddhaṁ karma yena punar bhavaḥ

'ये मेरे हैं' और 'मैं यह हूँ' — इस प्रकार मन से जो कुछ भी पुरुष स्वीकार करता है, वही उसका सम्पन्न कर्म बन जाता है, जिससे उसका पुनर्जन्म होता है।

श्लोक 63 (bhagavata.4.29.63)

यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितैः । एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः ॥ 29.63 ॥

yathānumīyate cittam ubhayair indriyehitaiḥ evaṁ prāg-dehajaṁ karma lakṣyate citta-vṛttibhiḥ

जैसे दोनों प्रकार की इन्द्रियों की क्रियाओं से चित्त की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है, वैसे ही पूर्वजन्म में किये गए कर्म को चित्त की वृत्तियों से पहचाना जाता है।

श्लोक 64 (bhagavata.4.29.64)

नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् । कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं यादृगात्मनि ॥ 29.64 ॥

nānubhūtaṁ kva cānena dehenādṛṣṭam aśrutam kadācid upalabhyeta yad rūpaṁ yādṛg ātmani

इस वर्तमान शरीर में जो कभी अनुभव, दृष्ट अथवा श्रुत नहीं हुआ, वह किसी भी रूप में आत्मा में कभी प्रकट नहीं हो सकता।

श्लोक 65 (bhagavata.4.29.65)

तेनास्य तादृशं राजँल्लिङ्गिनो देहसम्भवम् । श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति ॥ 29.65 ॥

tenāsya tādṛśaṁ rājaḻ liṅgino deha-sambhavam śraddhatsvānanubhūto ’rtho na manaḥ spraṣṭum arhati

अतः हे राजन्! जानो कि इस जीव के ऐसे भाव किसी पूर्वदेह से ही उत्पन्न होते हैं — क्योंकि जो वस्तु कभी अनुभव में न आई हो, वह मन को छू भी नहीं सकती।

श्लोक 66 (bhagavata.4.29.66)

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति । भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥ 29.66 ॥

mana eva manuṣyasya pūrva-rūpāṇi śaṁsati bhaviṣyataś ca bhadraṁ te tathaiva na bhaviṣyataḥ

तुम्हारा कल्याण हो! मनुष्य का मन ही उसके पूर्व-रूपों को प्रकट करता है, और उसी प्रकार भविष्य के रूपों को भी — अथवा उनके न होने को भी।

श्लोक 67 (bhagavata.4.29.67)

अदृष्टमश्रुतं चात्र क्वचिन्मनसि दृश्यते । यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम् ॥ 29.67 ॥

adṛṣṭam aśrutaṁ cātra kvacin manasi dṛśyate yathā tathānumantavyaṁ deśa-kāla-kriyāśrayam

जब कभी न देखी और न सुनी हुई कोई वस्तु मन में दिखाई देती है, तो उसे किसी अन्य देश, काल अथवा क्रिया के आश्रित समझना चाहिए।

श्लोक 68 (bhagavata.4.29.68)

सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः । आयान्ति बहुशो यान्ति सर्वे समनसो जनाः ॥ 29.68 ॥

sarve kramānurodhena manasīndriya-gocarāḥ āyānti bahuśo yānti sarve samanaso janāḥ

अपने ही क्रम के अनुसार समस्त इन्द्रिय-विषय बार-बार मन में आते और चले जाते हैं — यह मन वाले सभी प्राणियों के साथ होता है।

श्लोक 69 (bhagavata.4.29.69)

सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि । तमश्चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते ॥ 29.69 ॥

sattvaika-niṣṭhe manasi bhagavat-pārśva-vartini tamaś candramasīvedam uparajyāvabhāsate

जब मन पूर्णतः सत्त्वगुण में स्थित होकर भगवान के समीप रहता है, तब यह अंधकार (माया) उस पर वैसे ही आभासित होता है, जैसे चन्द्रमा पर ग्रहण की छाया।

श्लोक 70 (bhagavata.4.29.70)

नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते । यावद् बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान् ॥ 29.70 ॥

nāhaṁ mameti bhāvo ’yaṁ puruṣe vyavadhīyate yāvad buddhi-mano-’kṣārtha- guṇa-vyūho hy anādimān

यह 'मैं' और 'मेरा' का भाव पुरुष को तभी तक आवृत करता है, जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और गुणों का यह अनादि समूह विद्यमान रहता है।

श्लोक 71 (bhagavata.4.29.71)

सुप्तिमूर्च्छोपतापेषु प्राणायनविघाततः । नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥ 29.71 ॥

supti-mūrcchopatāpeṣu prāṇāyana-vighātataḥ nehate ’ham iti jñānaṁ mṛtyu-prajvārayor api

गहरी निद्रा में, मूर्च्छा में, गम्भीर व्याधि में, प्राणवायु की गति रुकने पर, तथा मृत्यु और तीव्र ज्वर में भी 'मैं हूँ' का यह बोध सक्रिय नहीं रहता।

श्लोक 72 (bhagavata.4.29.72)

गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा । लिङ्गं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा ॥ 29.72 ॥

garbhe bālye ’py apauṣkalyād ekādaśa-vidhaṁ tadā liṅgaṁ na dṛśyate yūnaḥ kuhvāṁ candramaso yathā

गर्भ में और बाल्यावस्था में भी, अपूर्ण विकास के कारण, युवा का वह ग्यारह-अंगी लिंग-शरीर वैसे ही अदृश्य रहता है, जैसे अमावस्या की रात्रि में चन्द्रमा।

श्लोक 73 (bhagavata.4.29.73)

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ 29.73 ॥

arthe hy avidyamāne ’pi saṁsṛtir na nivartate dhyāyato viṣayān asya svapne ’narthāgamo yathā

वस्तु के वास्तव में न होते हुए भी संसार-बंधन समाप्त नहीं होता — जैसे स्वप्न में विषयों का चिंतन करते हुए भी अनर्थ की प्राप्ति होती है।

श्लोक 74 (bhagavata.4.29.74)

एवं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडश विस्तृतम् । एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ 29.74 ॥

evaṁ pañca-vidhaṁ liṅgaṁ tri-vṛt ṣoḍaśa vistṛtam eṣa cetanayā yukto jīva ity abhidhīyate

इस प्रकार यह पंचविध लिंग-शरीर, त्रिविध होकर सोलह भागों में विस्तृत हुआ, चेतना से युक्त होने पर जीव कहलाता है।

श्लोक 75 (bhagavata.4.29.75)

अनेन पुरुषो देहानुपादत्ते विमुञ्चति । हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥ 29.75 ॥

anena puruṣo dehān upādatte vimuñcati harṣaṁ śokaṁ bhayaṁ duḥkhaṁ sukhaṁ cānena vindati

इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से पुरुष शरीरों को धारण करता और छोड़ता है, और इसी के द्वारा वह हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख का अनुभव करता है।

श्लोक 76 (bhagavata.4.29.76)

यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च । न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जनः ॥ 29.76 ॥

yathā tṛṇa-jalūkeyaṁ nāpayāty apayāti ca na tyajen mriyamāṇo ’pi prāg-dehābhimatiṁ janaḥ

जैसे तिनके पर चढ़ने वाली जोंक तब तक पहला आधार नहीं छोड़ती, जब तक दूसरे को न पकड़ ले, वैसे ही मनुष्य मरते समय भी अपने पूर्व-शरीर के प्रति ममत्व को नहीं त्यागता।

श्लोक 77 (bhagavata.4.29.77)

यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् । मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥ 29.77 ॥

yāvad anyaṁ na vindeta vyavadhānena karmaṇām mana eva manuṣyendra bhūtānāṁ bhava-bhāvanam

जब तक वह अपने कर्मों की मध्यस्थता से दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर लेता; क्योंकि हे नरेन्द्र! मन ही समस्त प्राणियों के पुनर्जन्म का निर्माता है।

श्लोक 78 (bhagavata.4.29.78)

यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् । सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः ॥ 29.78 ॥

yadākṣaiś caritān dhyāyan karmāṇy ācinute ’sakṛt sati karmaṇy avidyāyāṁ bandhaḥ karmaṇy anātmanaḥ

जब इन्द्रियों द्वारा किये गए कर्मों का चिंतन करते हुए वह बार-बार कर्मों का संचय करता है, तब जब तक उस कर्म में अविद्या बनी रहती है, तब तक अनात्मा (देह-मन) कर्म से बँधा रहता है।

श्लोक 79 (bhagavata.4.29.79)

अतस्तदपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् । पश्यंस्तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥ 29.79 ॥

atas tad apavādārthaṁ bhaja sarvātmanā harim paśyaṁs tad-ātmakaṁ viśvaṁ sthity-utpatty-apyayā yataḥ

अतः इससे मुक्ति पाने के लिये पूर्ण मन से हरि का भजन करो, इस समस्त विश्व को उन्हीं का स्वरूप देखते हुए, क्योंकि उन्हीं से इसकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है।

श्लोक 80 (bhagavata.4.29.80)

मैत्रेय उवाच भागवतमुख्यो भगवान्नारदो हंसयोर्गतिम् । प्रदर्श्य ह्यमुमामन्त्र्य सिद्धलोकं ततोऽगमत् ॥ 29.80 ॥

maitreya uvāca bhāgavata-mukhyo bhagavān nārado haṁsayor gatim pradarśya hy amum āmantrya siddha-lokaṁ tato ’gamat

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार उन दोनों हंसों की गति दिखाकर, भागवतों में श्रेष्ठ भगवान नारद ने राजा से विदा ली और सिद्धलोक को चले गए।

श्लोक 81 (bhagavata.4.29.81)

प्राचीनबर्ही राजर्षिः प्रजासर्गाभिरक्षणे । आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम् ॥ 29.81 ॥

prācīnabarhī rājarṣiḥ prajā-sargābhirakṣaṇe ādiśya putrān agamat tapase kapilāśramam

राजर्षि प्राचीनबर्हि अपने पुत्रों को प्रजा की रक्षा और वृद्धि का आदेश देकर, तपस्या हेतु कपिलाश्रम को चले गए।

श्लोक 82 (bhagavata.4.29.82)

तत्रैकाग्रमना धीरो गोविन्दचरणाम्बुजम् । विमुक्तसङ्गोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात् ॥ 29.82 ॥

tatraikāgra-manā dhīro govinda-caraṇāmbujam vimukta-saṅgo ’nubhajan bhaktyā tat-sāmyatām agāt

वहाँ स्थिरचित्त और एकाग्रमन होकर, समस्त आसक्ति से मुक्त होकर, भक्तिपूर्वक गोविन्द के चरणकमलों की उपासना करते हुए उन्होंने उन्हीं के समान पद प्राप्त किया।

श्लोक 83 (bhagavata.4.29.83)

एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ । यः श्रावयेद्यः शृणुयात्स लिङ्गेन विमुच्यते ॥ 29.83 ॥

etad adhyātma-pārokṣyaṁ gītaṁ devarṣiṇānagha yaḥ śrāvayed yaḥ śṛṇuyāt sa liṅgena vimucyate

हे अनघ! जो कोई भी देवर्षि द्वारा परोक्ष रूप से कहे गए इस अध्यात्म-तत्त्व को सुनाता अथवा सुनता है, वह लिंग-शरीर के बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 84 (bhagavata.4.29.84)

एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम् । यः कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः ॥ 29.84 ॥

etan mukunda-yaśasā bhuvanaṁ punānaṁ devarṣi-varya-mukha-niḥsṛtam ātma-śaucam yaḥ kīrtyamānam adhigacchati pārameṣṭhyaṁ nāsmin bhave bhramati mukta-samasta-bandhaḥ

मुकुन्द के यश से जगत् को पवित्र करने वाली, देवर्षियों में श्रेष्ठ के मुख से निःसृत और आत्मा को शुद्ध करने वाली यह कथा, जो इसे कीर्तित होते हुए ग्रहण करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है, और समस्त बंधनों से मुक्त होकर इस संसार में पुनः नहीं भटकता।

श्लोक 85 (bhagavata.4.29.85)

अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् । एवं स्त्रियाश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः ॥ 29.85 ॥

adhyātma-pārokṣyam idaṁ mayādhigatam adbhutam evaṁ striyāśramaḥ puṁsaś chinno ’mutra ca saṁśayaḥ

मैत्रेय ने निष्कर्ष में कहा — परोक्ष रूप से कहा गया यह अद्भुत अध्यात्म-तत्त्व मुझे इसी प्रकार प्राप्त हुआ; इस प्रकार उस स्त्री और पुरुष के आश्रम की कथा कही गई, और परलोक विषयक संशय भी दूर हो गया।

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