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चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7

दक्ष द्वारा सम्पन्न यज्ञ

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (bhagavata.4.7.1)

मैत्रेय उवाच इत्यजेनानुनीतेन भवेन परितुष्यता । अभ्यधायि महाबाहो प्रहस्य श्रूयतामिति ॥ १ ॥

maitreya uvāca ity ajenānunītena bhavena parituṣyatā abhyadhāyi mahā-bāho prahasya śrūyatām iti

श्री मैत्रेय जी ने कहा — हे महाबाहो! अजन्मा ब्रह्मा जी के इन वचनों से शांत होकर, प्रसन्नचित्त भगवान भव (शिव) मुस्कुराते हुए बोले — "सुनो।"

श्लोक 2 (bhagavata.4.7.2)

महादेव उवाच नाघं प्रजेश बालानां वर्णये नानुचिन्तये । देवमायाभिभूतानां दण्डस्तत्र धृतो मया ॥ २ ॥

mahādeva uvāca nāghaṁ prajeśa bālānāṁ varṇaye nānucintaye deva-māyābhibhūtānāṁ daṇḍas tatra dhṛto mayā

श्री महादेव जी ने कहा — हे प्रजापते! इन बालक-सम देवताओं के, जो दैवी माया से अभिभूत हैं, अपराध को मैं न तो पाप मानता हूँ और न ही उस पर विचार करता हूँ; मैंने वह दण्ड केवल सुधार के लिए दिया था।

श्लोक 3 (bhagavata.4.7.3)

प्रजापतेर्दग्धशीर्ष्णो भवत्वजमुखं शिरः । मित्रस्य चक्षुषेक्षेत भागं स्वं बर्हिषो भगः ॥ ३ ॥

prajāpater dagdha-śīrṣṇo bhavatv aja-mukhaṁ śiraḥ mitrasya cakṣuṣekṣeta bhāgaṁ svaṁ barhiṣo bhagaḥ

चूँकि प्रजापति (दक्ष) का सिर जल चुका है, अतः उसे अब बकरे का सिर धारण करना पड़े; तथा भग देवता मित्र देव के नेत्रों के माध्यम से अपने यज्ञ-भाग को देखें।

श्लोक 4 (bhagavata.4.7.4)

पूषा तु यजमानस्य दद्भिर्जक्षतु पिष्टभुक् । देवाः प्रकृतसर्वाङ्गा ये म उच्छेषणं ददुः ॥ ४ ॥

pūṣā tu yajamānasya dadbhir jakṣatu piṣṭa-bhuk devāḥ prakṛta-sarvāṅgā ye ma uccheṣaṇaṁ daduḥ

पूषा देवता यजमान (दक्ष) के दाँतों से भोजन चबाएँ और आटे के भक्षण से ही जीवन-निर्वाह करें; किन्तु जिन देवताओं ने मुझे यज्ञ का शेष-भाग दिया, उनके सभी अंग पूर्ववत् हो जाएँ।

श्लोक 5 (bhagavata.4.7.5)

बाहुभ्यामश्विनोः पूष्णो हस्ताभ्यां कृतबाहवः । भवन्त्वध्वर्यवश्चान्ये बस्तश्मश्रुर्भृगुर्भवेत् ॥ ५ ॥

bāhubhyām aśvinoḥ pūṣṇo hastābhyāṁ kṛta-bāhavaḥ bhavantv adhvaryavaś cānye basta-śmaśrur bhṛgur bhavet

जिनकी भुजाएँ कट गई हैं, उन्हें अश्विनीकुमारों की भुजाओं से भुजाएँ प्राप्त हों; अन्य अध्वर्यु भी पूषा के हाथों से हाथ प्राप्त करें; तथा भृगु को अब बकरे की दाढ़ी प्राप्त हो।

श्लोक 6 (bhagavata.4.7.6)

मैत्रेय उवाच तदा सर्वाणि भूतानि श्रुत्वा मीढुष्टमोदितम् । परितुष्टात्मभिस्तात साधु साध्वित्यथाब्रुवन् ॥ ६ ॥

maitreya uvāca tadā sarvāṇi bhūtāni śrutvā mīḍhuṣṭamoditam parituṣṭātmabhis tāta sādhu sādhv ity athābruvan

श्री मैत्रेय जी ने कहा — हे तात! मीढुष्टम (वरदाताओं में श्रेष्ठ शिव) के इन वचनों को सुनकर सभी उपस्थित प्राणी अत्यंत संतुष्ट होकर "साधु! साधु!" कहने लगे।

श्लोक 7 (bhagavata.4.7.7)

ततो मीढ्वांसमामन्त्र्य शुनासीराः सहर्षिभिः । भूयस्तद्देवयजनं समीढ्वद्वेधसो ययुः ॥ ७ ॥

tato mīḍhvāṁsam āmantrya śunāsīrāḥ saharṣibhiḥ bhūyas tad deva-yajanaṁ sa-mīḍhvad-vedhaso yayuḥ

तत्पश्चात् मीढ्वान् (शिव) को इन्द्र और ऋषियों सहित आमंत्रित करके, तथा विधाता ब्रह्मा जी सहित, वे सब पुनः उसी देव-यजन-स्थल की ओर चल पड़े।

श्लोक 8 (bhagavata.4.7.8)

विधाय कार्त्स्न्येन च तद्यदाह भगवान् भवः । सन्दधुः कस्य कायेन सवनीयपशोः शिरः ॥ ८ ॥

vidhāya kārtsnyena ca tad yad āha bhagavān bhavaḥ sandadhuḥ kasya kāyena savanīya-paśoḥ śiraḥ

भगवान भव द्वारा कहे गए निर्देश को पूर्णतः पूर्ण करते हुए, उन्होंने यज्ञ के पशु के सिर को दक्ष के शरीर से जोड़ दिया।

श्लोक 9 (bhagavata.4.7.9)

सन्धीयमाने शिरसि दक्षो रुद्राभिवीक्षितः । सद्यः सुप्त इवोत्तस्थौ ददृशे चाग्रतो मृडम् ॥ ९ ॥

sandhīyamāne śirasi dakṣo rudrābhivīkṣitaḥ sadyaḥ supta ivottasthau dadṛśe cāgrato mṛḍam

सिर के जुड़ते ही, रुद्र की दृष्टि से देखे गए दक्ष तत्काल ही सोते से जागे हुए के समान उठ बैठे, और अपने समक्ष मृड (शिव) को देखा।

श्लोक 10 (bhagavata.4.7.10)

तदा वृषध्वजद्वेषकलिलात्मा प्रजापतिः । शिवावलोकादभवच्छरद्ध्रद इवामलः ॥ १० ॥

tadā vṛṣadhvaja-dveṣa- kalilātmā prajāpatiḥ śivāvalokād abhavac charad-dhrada ivāmalaḥ

तब वृषध्वज (शिव) के प्रति द्वेष से मलिन हुआ प्रजापति (दक्ष) का हृदय, शिव जी की उस कृपापूर्ण दृष्टि से तत्काल निर्मल हो गया — जैसे शरद ऋतु आने पर सरोवर स्वच्छ हो जाता है।

श्लोक 11 (bhagavata.4.7.11)

भवस्तवाय कृतधीर्नाशक्नोदनुरागतः । औत्कण्ठ्याद्बाष्पकलया सम्परेतां सुतां स्मरन् ॥ ११ ॥

bhava-stavāya kṛta-dhīr nāśaknod anurāgataḥ autkaṇṭhyād bāṣpa-kalayā samparetāṁ sutāṁ smaran

भव (शिव) की स्तुति करने का निश्चय होने पर भी, दक्ष अपनी दिवंगत पुत्री का स्मरण करते हुए उत्कंठा और अश्रुओं से इतने अभिभूत हो गए कि वे कुछ बोल न सके।

श्लोक 12 (bhagavata.4.7.12)

कृच्छ्रात्संस्तभ्य च मनः प्रेमविह्वलितः सुधीः । शशंस निर्व्यलीकेन भावेनेशं प्रजापतिः ॥ १२ ॥

kṛcchrāt saṁstabhya ca manaḥ prema-vihvalitaḥ sudhīḥ śaśaṁsa nirvyalīkena bhāveneśaṁ prajāpatiḥ

प्रेम से अभिभूत होते हुए भी बड़े प्रयास से अपने मन को स्थिर करके, बुद्धिमान प्रजापति दक्ष ने निष्कपट भाव से भगवान की स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 13 (bhagavata.4.7.13)

दक्ष उवाच भूयाननुग्रह अहो भवता कृतो मे दण्डस्त्वया मयि भृतो यदपि प्रलब्धः । न ब्रह्मबन्धुषु च वां भगवन्नवज्ञा तुभ्यं हरेश्च कुत एव धृतव्रतेषु ॥ १३ ॥

dakṣa uvāca bhūyān anugraha aho bhavatā kṛto me daṇḍas tvayā mayi bhṛto yad api pralabdhaḥ na brahma-bandhuṣu ca vāṁ bhagavann avajñā tubhyaṁ hareś ca kuta eva dhṛta-vrateṣu

दक्ष ने कहा — हे प्रभो! सचमुच आपने मुझ पर महान अनुग्रह किया है — क्योंकि आपने मुझे जो दण्ड दिया, वह भी वस्तुतः कृपा ही थी। हे भगवन्! आप और भगवान हरि तो अयोग्य ब्राह्मण-बन्धुओं के प्रति भी कभी अवज्ञा नहीं दिखाते — फिर व्रतधारियों के प्रति भला कैसे दिखाएँगे?

श्लोक 14 (bhagavata.4.7.14)

विद्यातपोव्रतधरान् मुखतः स्म विप्रान् ब्रह्मात्मतत्त्वमवितुं प्रथमं त्वमस्राक् । तद्ब्राह्मणान् परम सर्वविपत्सु पासि पालः पशूनिव विभो प्रगृहीतदण्डः ॥ १४ ॥

vidyā-tapo-vrata-dharān mukhataḥ sma viprān brahmātma-tattvam avituṁ prathamaṁ tvam asrāk tad brāhmaṇān parama sarva-vipatsu pāsi pālaḥ paśūn iva vibho pragṛhīta-daṇḍaḥ

हे परम प्रभो! आप ही सर्वप्रथम ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, ताकि आप विद्या, तप और व्रत धारण करने वाले, ब्रह्मतत्त्व के रक्षक ब्राह्मणों की रक्षा कर सकें; और इस प्रकार, हे प्रभु, आप सदैव दण्ड धारण किए हुए, गोपाल के समान, समस्त विपत्तियों में ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.4.7.15)

योऽसौ मयाविदिततत्त्वदृशा सभायां क्षिप्तो दुरुक्तिविशिखैर्विगणय्य तन्माम् । अर्वाक् पतन्तमर्हत्तमनिन्दयापाद् दृष्टयार्द्रया स भगवान्स्वकृतेन तुष्येत् ॥ १५ ॥

yo ’sau mayāvidita-tattva-dṛśā sabhāyāṁ kṣipto durukti-viśikhair vigaṇayya tan mām arvāk patantam arhattama-nindayāpād dṛṣṭyārdrayā sa bhagavān sva-kṛtena tuṣyet

आपकी सच्ची महिमा को न जानते हुए मैंने उस सभा में आपके प्रति कटु वचनों के बाण छोड़े थे; फिर भी आपने उसकी परवाह नहीं की, और पूज्यतम की निन्दा करने के कारण अधोगति की ओर जाते हुए मुझे अपनी करुणा-सिक्त दृष्टि से बचा लिया — भगवान अब अपने ही इस कृपापूर्ण कर्म से प्रसन्न हों, क्योंकि मैं स्वयं अपने वचनों से उन्हें प्रसन्न करने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 16 (bhagavata.4.7.16)

मैत्रेय उवाच क्षमाप्यैवं स मीढ्वांसं ब्रह्मणा चानुमन्त्रितः । कर्म सन्तानयामास सोपाध्यायर्त्विगादिभिः ॥ १६ ॥

maitreya uvāca kṣamāpyaivaṁ sa mīḍhvāṁsaṁ brahmaṇā cānumantritaḥ karma santānayām āsa sopādhyāyartvig-ādibhiḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — इस प्रकार मीढ्वान् (शिव) से क्षमा प्राप्त करके, तथा ब्रह्मा जी की अनुमति से, दक्ष ने आचार्यों, ऋत्विजों आदि सहित यज्ञ-कार्य को पुनः प्रारम्भ किया।

श्लोक 17 (bhagavata.4.7.17)

वैष्णवं यज्ञसन्तत्यै त्रिकपालं द्विजोत्तमाः । पुरोडाशं निरवपन् वीरसंसर्गशुद्धये ॥ १७ ॥

vaiṣṇavaṁ yajña-santatyai tri-kapālaṁ dvijottamāḥ puroḍāśaṁ niravapan vīra-saṁsarga-śuddhaye

यज्ञ को पुनः आगे बढ़ाने तथा वीरभद्र के संसर्ग से हुई अशुद्धि को दूर करने के लिए, श्रेष्ठ द्विजों ने भगवान विष्णु को त्रिकपाल पुरोडाश की आहुति दी।

श्लोक 18 (bhagavata.4.7.18)

अध्वर्युणात्तहविषा यजमानो विशाम्पते । धिया विशुद्धया दध्यौ तथा प्रादुरभूद्धरिः ॥ १८ ॥

adhvaryuṇātta-haviṣā yajamāno viśāmpate dhiyā viśuddhayā dadhyau tathā prādurabhūd dhariḥ

हे विशांपते (विदुर)! जब अध्वर्यु पुरोहित के हाथों में आहुति रखी हुई थी, और यजमान (दक्ष) शुद्ध चित्त से ध्यानमग्न थे, तब भगवान हरि स्वयं वहाँ प्रकट हो गए।

श्लोक 19 (bhagavata.4.7.19)

तदा स्वप्रभया तेषां द्योतयन्त्या दिशो दश । मुष्णंस्तेज उपानीतस्तार्क्ष्येण स्तोत्रवाजिना ॥ १९ ॥

tadā sva-prabhayā teṣāṁ dyotayantyā diśo daśa muṣṇaṁs teja upānītas tārkṣyeṇa stotra-vājinā

गरुड़ पर आरूढ़ होकर पधारे भगवान ने अपनी ही कान्ति से दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया, और उस क्षण वहाँ उपस्थित सबका तेज फीका पड़ गया।

श्लोक 20 (bhagavata.4.7.20)

श्यामो हिरण्यरशनोऽर्ककिरीटजुष्टो नीलालकभ्रमरमण्डितकुण्डलास्यः । शङ्खाब्जचक्रशरचापगदासिचर्म- व्यग्रैर्हिरण्मयभुजैरिव कर्णिकारः ॥ २० ॥

śyāmo hiraṇya-raśano ’rka-kirīṭa-juṣṭo nīlālaka-bhramara-maṇḍita-kuṇḍalāsyaḥ śaṅkhābja-cakra-śara-cāpa-gadāsi-carma- vyagrair hiraṇmaya-bhujair iva karṇikāraḥ

श्याम वर्ण, सुवर्ण-मेखला से सुशोभित, सूर्य के समान तेजस्वी मुकुट धारण किए, नील घुँघराले केशों और कुण्डलों से सुशोभित मुख वाले, शंख, कमल, चक्र, बाण, धनुष, गदा, खड्ग तथा ढाल से युक्त सुवर्णमय भुजाओं वाले — वे भगवान मानो पुष्पित कर्णिकार वृक्ष के समान प्रतीत हो रहे थे।

श्लोक 21 (bhagavata.4.7.21)

वक्षस्यधिश्रितवधूर्वनमाल्युदार हासावलोककलया रमयंश्च विश्वम् । पार्श्वभ्रमद्वयजनचामरराजहंसः श्वेतातपत्रशशिनोपरि रज्यमानः ॥ २१ ॥

vakṣasy adhiśrita-vadhūr vana-māly udāra- hāsāvaloka-kalayā ramayaṁś ca viśvam pārśva-bhramad-vyajana-cāmara-rāja-haṁsaḥ śvetātapatra-śaśinopari rajyamānaḥ

वक्षस्थल पर लक्ष्मी जी को धारण किए, वनमाला पहने, अपनी उदार मुस्कान और दृष्टि की लीला से सम्पूर्ण विश्व को आनन्दित करते हुए, दोनों ओर राजहंस के समान श्वेत चामर और पंखे झलते हुए, तथा ऊपर चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र से सुशोभित —

श्लोक 22 (bhagavata.4.7.22)

तमुपागतमालक्ष्य सर्वे सुरगणादयः । प्रणेमुः सहसोत्थाय ब्रह्मेन्द्रत्र्यक्षनायकाः ॥ २२ ॥

tam upāgatam ālakṣya sarve sura-gaṇādayaḥ praṇemuḥ sahasotthāya brahmendra-tryakṣa-nāyakāḥ

— इस प्रकार पधारे हुए उन्हें देखकर ब्रह्मा, इन्द्र और त्रिनेत्रधारी शिव सहित समस्त देवगण तत्काल उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 23 (bhagavata.4.7.23)

तत्तेजसा हतरुचः सन्नजिह्वाः ससाध्वसाः । मूर्ध्ना धृताञ्जलिपुटा उपतस्थुरधोक्षजम् ॥ २३ ॥

tat-tejasā hata-rucaḥ sanna-jihvāḥ sa-sādhvasāḥ mūrdhnā dhṛtāñjali-puṭā upatasthur adhokṣajam

उनके तेज से अपना तेज फीका पड़ जाने पर, वाणी मौन हो जाने पर, तथा श्रद्धामिश्रित भय से युक्त होकर, वे सभी अधोक्षज (विष्णु) के समक्ष अपने मस्तक पर अंजलि बाँधे खड़े हो गए।

श्लोक 24 (bhagavata.4.7.24)

अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महि त्वात्मभुवादयः । यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥

apy arvāg-vṛttayo yasya mahi tv ātmabhuv-ādayaḥ yathā-mati gṛṇanti sma kṛtānugraha-vigraham

यद्यपि आत्मभू (ब्रह्मा) आदि की बुद्धि सीमित ही है और उनकी महिमा को पूर्णतः जान पाना असंभव है, तथापि उन्होंने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उस अनुग्रहपूर्वक धारण किए गए स्वरूप की स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 25 (bhagavata.4.7.25)

दक्षो गृहीतार्हणसादनोत्तमं यज्ञेश्वरं विश्वसृजां परं गुरुम् । सुनन्दनन्दाद्यनुगैर्वृतं मुदा गृणन् प्रपेदे प्रयतः कृताञ्जलिः ॥ २५ ॥

dakṣo gṛhītārhaṇa-sādanottamaṁ yajñeśvaraṁ viśva-sṛjāṁ paraṁ gurum sunanda-nandādy-anugair vṛtaṁ mudā gṛṇan prapede prayataḥ kṛtāñjaliḥ

अपनी पूजा के स्वीकार किए जाने और उत्तम आसन के अर्पित होने पर दक्ष ने शुद्ध हृदय और जुड़े हाथों से, सुनन्द-नन्द आदि अनुचरों से घिरे हुए, यज्ञेश्वर तथा समस्त सृष्टिकर्ताओं के परम गुरु की स्तुति करते हुए उनकी शरण ली।

श्लोक 26 (bhagavata.4.7.26)

दक्ष उवाच शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् । तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्या- मास्ते भवानपरिशुद्ध इवात्मतन्त्रः ॥ २६ ॥

dakṣa uvāca śuddhaṁ sva-dhāmny uparatākhila-buddhy-avasthaṁ cin-mātram ekam abhayaṁ pratiṣidhya māyām tiṣṭhaṁs tayaiva puruṣatvam upetya tasyām āste bhavān apariśuddha ivātma-tantraḥ

दक्ष ने कहा — आप शुद्ध हैं, अपने ही धाम में स्थित हैं, समस्त बुद्धि की अवस्थाओं से परे हैं, एकमात्र चिन्मात्र और निर्भय हैं — फिर भी अपनी उसी माया को नियंत्रण में रखते हुए, उसी के माध्यम से पुरुष-रूप धारण करके उसमें विराजमान होते हैं, मानो अशुद्ध हों, यद्यपि आप सदैव स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.4.7.27)

ऋत्विज ऊचुः तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात् कर्मण्यवग्रहधियो भगवन्विदामः । धर्मोपलक्षणमिदं त्रिवृदध्वराख्यं ज्ञातं यदर्थमधिदैवमदो व्यवस्थाः ॥ २७ ॥

ṛtvija ūcuḥ tattvaṁ na te vayam anañjana rudra-śāpāt karmaṇy avagraha-dhiyo bhagavan vidāmaḥ dharmopalakṣaṇam idaṁ trivṛd adhvarākhyaṁ jñātaṁ yad-artham adhidaivam ado vyavasthāḥ

ऋत्विजों ने कहा — हे निर्मल भगवन्! रुद्र के अनुचरों के शाप के कारण हमारी बुद्धि केवल कर्मकाण्ड में ही बँध गई थी, और इसीलिए हम आपके तत्त्व को न जान सके; हम केवल इस त्रिवृत यज्ञ को धर्म का चिह्न मात्र मानते रहे, यह न समझ सके कि यह किस दैवी व्यवस्था के निमित्त है।

श्लोक 28 (bhagavata.4.7.28)

सदस्या ऊचुः उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽन्तकोग्र व्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्यात्मगेहोरुभारः । द्वन्द्वश्वभ्रे खलमृगभये शोकदावेऽज्ञसार्थः पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसृष्टः ॥ २८ ॥

sadasyā ūcuḥ utpatty-adhvany aśaraṇa uru-kleśa-durge ’ntakogra- vyālānviṣṭe viṣaya-mṛga-tṛṣy ātma-gehoru-bhāraḥ dvandva-śvabhre khala-mṛga-bhaye śoka-dāve ’jña-sārthaḥ pādaukas te śaraṇada kadā yāti kāmopasṛṣṭaḥ

सभासदों ने कहा — इस निराश्रय जन्म-मार्ग पर, इस विशाल दुर्गम क्लेश-दुर्ग में, जो मृत्यु के भयंकर सर्पों से भरा है, विषय-मृगतृष्णा और गृहस्थी के भारी बोझ से लदा है, द्वन्द्वों के गड्ढों, दुष्ट पशुओं के भय और शोक की दावाग्नि से युक्त है — हे शरणदाता! कामनाओं से प्रेरित यह अज्ञानी समुदाय कब आपके चरणों की शरण को प्राप्त होगा?

श्लोक 29 (bhagavata.4.7.29)

रुद्र उवाच तव वरद वराङ्घ्रावाशिषेहाखिलार्थे ह्यपि मुनिभिरसक्तैरादरेणार्हणीये । यदि रचितधियं माविद्यलोकोऽपविद्धं जपति न गणये तत्त्वत्परानुग्रहेण ॥ २९ ॥

rudra uvāca tava varada varāṅghrāv āśiṣehākhilārthe hy api munibhir asaktair ādareṇārhaṇīye yadi racita-dhiyaṁ māvidya-loko ’paviddhaṁ japati na gaṇaye tat tvat-parānugraheṇa

श्री रुद्र (शिव) ने कहा — हे वरदाता! जिनके सर्वार्थदायक श्रेष्ठ चरणों की, अनासक्त मुनि भी आदरपूर्वक अर्चना करते हैं — यदि आपके चरणों में लगा हुआ मेरा यह चित्त अज्ञानी लोगों द्वारा अशुद्ध कहकर निंदित होता है, तो मैं उसकी परवाह नहीं करता, और यह भी आपकी ही कृपा से संभव है।

श्लोक 30 (bhagavata.4.7.30)

भृगुरुवाच यन्मायया गहनयापहृतात्मबोधा ब्रह्मादयस्तनुभृतस्तमसि स्वपन्तः । नात्मन् श्रितं तव विदन्त्यधुनापि तत्त्वं सोऽयं प्रसीदतु भवान्प्रणतात्मबन्धुः ॥ ३० ॥

bhṛgur uvāca yan māyayā gahanayāpahṛtātma-bodhā brahmādayas tanu-bhṛtas tamasi svapantaḥ nātman-śritaṁ tava vidanty adhunāpi tattvaṁ so ’yaṁ prasīdatu bhavān praṇatātma-bandhuḥ

श्री भृगु ने कहा — आपकी गहन माया से ब्रह्मा से लेकर सभी देहधारी अपने आत्मबोध को खोकर अंधकार में सोए हुए हैं; वे अब भी आपके उस तत्त्व को नहीं जानते, जो स्वयं के भीतर ही विराजमान है। शरणागतों के सुहृद वे भगवान हम पर प्रसन्न हों।

श्लोक 31 (bhagavata.4.7.31)

ब्रह्मोवाच नैतत्स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ भेदग्रहैः पुरुषो यावदीक्षेत् । ज्ञानस्य चार्थस्य गुणस्य चाश्रयो मायामयाद्वयतिरिक्तो मतस्त्वम् ॥ ३१ ॥

brahmovāca naitat svarūpaṁ bhavato ’sau padārtha- bheda-grahaiḥ puruṣo yāvad īkṣet jñānasya cārthasya guṇasya cāśrayo māyāmayād vyatirikto matas tvam

श्री ब्रह्मा जी ने कहा — जो पुरुष पदार्थों के भेद-बोध से देखता है, वह आपके इस वास्तविक स्वरूप को कभी नहीं देख सकता; ज्ञान, ज्ञेय और गुण — इन सबके आश्रय होते हुए भी आप मायामय समस्त पदार्थों से सर्वथा भिन्न माने जाते हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.4.7.32)

इन्द्र उवाच इदमप्यच्युत विश्वभावनं वपुरानन्दकरं मनोदृशाम् । सुरविद्विट्क्षपणैरुदायुधै र्भुजदण्डैरुपपन्नमष्टभिः ॥ ३२ ॥

indra uvāca idam apy acyuta viśva-bhāvanaṁ vapur ānanda-karaṁ mano-dṛśām sura-vidviṭ-kṣapaṇair udāyudhair bhuja-daṇḍair upapannam aṣṭabhiḥ

श्री इन्द्र ने कहा — हे अच्युत! आपका यह स्वरूप भी, जो सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए है, तथा मन और नेत्रों को आनन्द देने वाला है, आठ शक्तिशाली भुजाओं से युक्त है, जो देवद्रोहियों के संहार हेतु शस्त्र उठाए हुए हैं।

श्लोक 33 (bhagavata.4.7.33)

पत्न्य ऊचुः यज्ञोऽयं तव यजनाय केन सृष्टो विध्वस्तः पशुपतिनाद्य दक्षकोपात् । तं नस्त्वं शवशयनाभशान्तमेधं यज्ञात्मन्नलिनरुचा दृशा पुनीहि ॥ ३३ ॥

patnya ūcuḥ yajño ’yaṁ tava yajanāya kena sṛṣṭo vidhvastaḥ paśupatinādya dakṣa-kopāt taṁ nas tvaṁ śava-śayanābha-śānta-medhaṁ yajñātman nalina-rucā dṛśā punīhi

पत्नियों ने कहा — यह यज्ञ, जो आपकी ही आराधना हेतु रचा गया था, आज दक्ष पर क्रोधवश पशुपति (शिव) द्वारा नष्ट कर दिया गया; हे यज्ञस्वरूप! अब शव के समान शांत हो चुके इस यज्ञ को अपने कमल-सम नेत्रों की दृष्टि से पुनः पवित्र कीजिए।

श्लोक 34 (bhagavata.4.7.34)

ऋषय ऊचुः अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं यदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे । विभूतये यत उपसेदुरीश्वरीं न मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान् ॥ ३४ ॥

ṛṣaya ūcuḥ ananvitaṁ te bhagavan viceṣṭitaṁ yad ātmanā carasi hi karma nājyase vibhūtaye yata upasedur īśvarīṁ na manyate svayam anuvartatīṁ bhavān

ऋषियों ने कहा — हे भगवन्! आपकी लीलाएँ अनुपम हैं — आप अपनी शक्तियों द्वारा कर्म करते हुए भी उससे सर्वथा अलिप्त रहते हैं; जिस लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए अन्य लोग उनकी उपासना करते हैं, आप स्वयं उसकी परवाह भी नहीं करते, यद्यपि वह स्वयं सदैव आपके अनुगमन में रहती हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.4.7.35)

सिद्धा ऊचुः अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां मनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः । तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्नः ॥ ३५ ॥

siddhā ūcuḥ ayaṁ tvat-kathā-mṛṣṭa-pīyūṣa-nadyāṁ mano-vāraṇaḥ kleśa-dāvāgni-dagdhaḥ tṛṣārto ’vagāḍho na sasmāra dāvaṁ na niṣkrāmati brahma-sampannavan naḥ

सिद्धों ने कहा — क्लेश की दावाग्नि से जला हुआ, प्यास से व्याकुल, हमारा यह मनरूपी गज आपकी कथारूपी अमृत-नदी में डूबकर उस दावाग्नि को भूल गया है, और मानो ब्रह्म-प्राप्ति के समान इससे बाहर निकलना ही नहीं चाहता।

श्लोक 36 (bhagavata.4.7.36)

यजमान्युवाच स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः । त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पुरुषः ॥ ३६ ॥

yajamāny uvāca svāgataṁ te prasīdeśa tubhyaṁ namaḥ śrīnivāsa śriyā kāntayā trāhi naḥ tvām ṛte ’dhīśa nāṅgair makhaḥ śobhate śīrṣa-hīnaḥ ka-bandho yathā puruṣaḥ

यजमान-पत्नी ने कहा — आपका स्वागत हो, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, आपको नमस्कार हो, हे श्रीनिवास! अपनी प्रियतमा लक्ष्मी सहित हमारी रक्षा कीजिए। हे अधीश्वर! आपके बिना यह यज्ञ, अपने समस्त अंगों के होते हुए भी, वैसे ही शोभा नहीं पाता, जैसे सिर-रहित धड़ पुरुष नहीं कहलाता।

श्लोक 37 (bhagavata.4.7.37)

लोकपाला ऊचुः दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं प्रत्यग्द्रष्टा दृश्यते येन विश्वम् । माया ह्येषा भवदीया हि भूमन् यस्त्वं षष्ठः पञ्चभिर्भासि भूतैः ॥ ३७ ॥

lokapālā ūcuḥ dṛṣṭaḥ kiṁ no dṛgbhir asad-grahais tvaṁ pratyag-draṣṭā dṛśyate yena viśvam māyā hy eṣā bhavadīyā hi bhūman yas tvaṁ ṣaṣṭhaḥ pañcabhir bhāsi bhūtaiḥ

लोकपालों ने कहा — क्या हमने वस्तुतः इन असत्-ग्राही नेत्रों से आपको देखा है, जबकि इस सम्पूर्ण विश्व को देखने वाले तो आप ही, अन्तःसाक्षी, हैं? हे अनन्त! यह आपकी ही माया है, कि छठे तत्त्वस्वरूप होकर भी आप पंचभूतों के समान प्रकट होते हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.4.7.38)

योगेश्वरा ऊचु प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमुतस्त्वयि प्रभो विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग्य आत्मनः । अथापि भक्त्येश तयोपधावता- मनन्यवृत्त्यानुगृहाण वत्सल ॥ ३८ ॥

yogeśvarā ūcuḥ preyān na te ’nyo ’sty amutas tvayi prabho viśvātmanīkṣen na pṛthag ya ātmanaḥ athāpi bhaktyeśa tayopadhāvatām ananya-vṛttyānugṛhāṇa vatsala

योगेश्वरों ने कहा — हे प्रभो! आपको उससे बढ़कर प्रिय कोई नहीं, जो आपको विश्वात्मा जानकर स्वयं को आपसे भिन्न नहीं मानता; फिर भी, हे वत्सल! अनन्य भक्ति से आपकी सेवा में लगे हुए, आपके सेवकभाव से आपके पास आने वालों पर भी कृपा कीजिए।

श्लोक 39 (bhagavata.4.7.39)

जगदुद्भवस्थितिलयेषु दैवतो बहुभिद्यमानगुणयात्ममायया । रचितात्मभेदमतये स्वसंस्थया विनिवर्तितभ्रमगुणात्मने नमः ॥ ३९ ॥

jagad-udbhava-sthiti-layeṣu daivato bahu-bhidyamāna-guṇayātma-māyayā racitātma-bheda-mataye sva-saṁsthayā vinivartita-bhrama-guṇātmane namaḥ

उस दिव्य पुरुष को नमस्कार, जो अपनी माया द्वारा विविध गुणों में विभाजित होकर जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में विविध रूपों में प्रकट होता है — जो दूसरों में तो पृथकत्व का भ्रम उत्पन्न करता है, किन्तु स्वयं अपने ही स्वरूप से इन गुणों के भ्रम से सदैव मुक्त रहता है।

श्लोक 40 (bhagavata.4.7.40)

ब्रह्मोवाच नमस्ते श्रितसत्त्वाय धर्मादीनां च सूतये । निर्गुणाय च यत्काष्ठां नाहं वेदापरेऽपि च ॥ ४० ॥

brahmovāca namas te śrita-sattvāya dharmādīnāṁ ca sūtaye nirguṇāya ca yat-kāṣṭhāṁ nāhaṁ vedāpare ’pi ca

[मूर्तिमान वेदों ने कहा —] आपको नमस्कार, जो सत्त्वगुण के आश्रयभूत तथा धर्म आदि के स्रोत हैं, और जो गुणातीत हैं — मैं भी, अन्यों सहित, आपकी महिमा की चरम सीमा नहीं जानता।

श्लोक 41 (bhagavata.4.7.41)

अग्निरुवाच यत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजा हव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् । तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभिः स्विष्टं यजुर्भिः प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१ ॥

agnir uvāca yat-tejasāhaṁ susamiddha-tejā havyaṁ vahe svadhvara ājya-siktam taṁ yajñiyaṁ pañca-vidhaṁ ca pañcabhiḥ sviṣṭaṁ yajurbhiḥ praṇato ’smi yajñam

श्री अग्निदेव ने कहा — जिनके तेज से प्रज्वलित होकर मैं यज्ञ में घृत-सिक्त हविष्य को वहन करता हूँ, उस पंचविध यज्ञ-स्वरूप, पाँच प्रकार के यजुर्मंत्रों से भलीभाँति पूजित यज्ञ-पुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 42 (bhagavata.4.7.42)

देवा ऊचुः पुरा कल्पापाये स्वकृतमुदरीकृत्य विकृतं त्वमेवाद्यस्तस्मिन् सलिल उरगेन्द्राधिशयने । पुमान्शेषे सिद्धैर्हृदि विमृशिताध्यात्मपदविः स एवाद्याक्ष्णोर्यः पथि चरसि भृत्यानवसि नः ॥ ४२ ॥

devā ūcuḥ purā kalpāpāye sva-kṛtam udarī-kṛtya vikṛtaṁ tvam evādyas tasmin salila uragendrādhiśayane pumān śeṣe siddhair hṛdi vimṛśitādhyātma-padaviḥ sa evādyākṣṇor yaḥ pathi carasi bhṛtyān avasi naḥ

देवताओं ने कहा — प्राचीन काल में, कल्प के अंत में, अपनी ही रची हुई सृष्टि को अपने भीतर समेटकर, आप ही वह आदि पुरुष प्रलय-जल में शेषनाग की शय्या पर विराजमान रहते थे, जिन्हें सिद्धगण हृदय में अध्यात्म-चिंतन द्वारा खोजते थे — वही आप आज हमारी आँखों के समक्ष साक्षात् विचरण कर रहे हैं; हम आपके सेवकों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 43 (bhagavata.4.7.43)

गन्धर्वा ऊचुः अंशांशास्ते देव मरीच्यादय एते ब्रह्मेन्द्राद्या देवगणा रुद्रपुरोगाः । क्रीडाभाण्डं विश्वमिदं यस्य विभूमन् तस्मै नित्यं नाथ नमस्ते करवाम ॥ ४३ ॥

gandharvā ūcuḥ aṁśāṁśās te deva marīcy-ādaya ete brahmendrādyā deva-gaṇā rudra-purogāḥ krīḍā-bhāṇḍaṁ viśvam idaṁ yasya vibhūman tasmai nityaṁ nātha namas te karavāma

गन्धर्वों ने कहा — हे देव! मरीचि आदि ऋषि, तथा ब्रह्मा, इन्द्र और रुद्र-प्रमुख देवगण — ये सब आपके अंश के भी अंश हैं। हे विभो! जिनके लिए यह सम्पूर्ण विश्व क्रीड़ा-मात्र है, उन आपको, हे नाथ, हम सदैव नमस्कार करते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.4.7.44)

विद्याधरा ऊचुः त्वन्माययार्थमभिपद्य कलेवरेऽस्मिन् कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथैः स्वैः । क्षिप्तोऽप्यसद्विषयलालस आत्ममोहं युष्मत्कथामृतनिषेवक उद्वयुदस्येत् ॥ ४४ ॥

vidyādharā ūcuḥ tvan-māyayārtham abhipadya kalevare ’smin kṛtvā mamāham iti durmatir utpathaiḥ svaiḥ kṣipto ’py asad-viṣaya-lālasa ātma-mohaṁ yuṣmat-kathāmṛta-niṣevaka udvyudasyet

विद्याधरों ने कहा — आपकी माया से मोहित होकर जो मूढ़ इस शरीर को ही लक्ष्य मानकर "मैं" और "मेरा" के भाव में पड़ जाता है, और कुमार्गों पर चलते हुए मिथ्या विषय-सुख की लालसा में गिरता रहता है — वह भी यदि आपकी पावन कथाओं के अमृत का निरंतर पान करने लगे, तो अपने आत्म-मोह को दूर कर सकता है।

श्लोक 45 (bhagavata.4.7.45)

ब्राह्मणा ऊचुः त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयंत्वं हि मन्त्रः समिद्दर्भपात्राणि च । त्वं सदस्यर्त्विजो दम्पती देवताअग्निहोत्रं स्वधा सोम आज्यं पशुः ॥ ४५ ॥

brāhmaṇā ūcuḥ tvaṁ kratus tvaṁ havis tvaṁ hutāśaḥ svayaṁ tvaṁ hi mantraḥ samid-darbha-pātrāṇi ca tvaṁ sadasyartvijo dampatī devatā agnihotraṁ svadhā soma ājyaṁ paśuḥ

ब्राह्मणों ने कहा — आप ही यज्ञ हैं, आप ही हविष्य हैं, आप ही स्वयं अग्नि हैं, आप ही मंत्र, समिधा, कुश और पात्र हैं। आप ही सभासद, ऋत्विक्, यजमान-पत्नी, आराध्य देवता, अग्निहोत्र, स्वधा, सोम, घृत तथा यज्ञ-पशु हैं।

श्लोक 46 (bhagavata.4.7.46)

त्वं पुरा गां रसाया महासूकरो दंष्ट्रया पद्मिनीं वारणेन्द्रो यथा । स्तूयमानो नदल्लीलया योगिभि- र्व्युज्जहर्थ त्रयीगात्र यज्ञक्रतुः ॥ ४६ ॥

tvaṁ purā gāṁ rasāyā mahā-sūkaro daṁṣṭrayā padminīṁ vāraṇendro yathā stūyamāno nadal līlayā yogibhir vyujjahartha trayī-gātra yajña-kratuḥ

हे त्रयीमूर्ते! प्राचीन काल में महावराह-रूप धारण करके आपने अपने दाँत पर पृथ्वी को जल से उसी प्रकार उठा लिया था, जैसे गजराज सरोवर से कमल उठा लेता है, तथा योगिजनों द्वारा स्तुति किए जाते हुए आपने लीलापूर्वक गर्जना की थी — क्योंकि वह वराह-रूप स्वयं यज्ञ का ही साक्षात् स्वरूप था।

श्लोक 47 (bhagavata.4.7.47)

स प्रसीद त्वमस्माकमाकाङ्क्षतां दर्शनं ते परिभ्रष्टसत्कर्मणाम् । कीर्त्यमाने नृभिर्नाम्नि यज्ञेश ते यज्ञविघ्नाः क्षयं यान्ति तस्मै नमः ॥ ४७ ॥

sa prasīda tvam asmākam ākāṅkṣatāṁ darśanaṁ te paribhraṣṭa-sat-karmaṇām kīrtyamāne nṛbhir nāmni yajñeśa te yajña-vighnāḥ kṣayaṁ yānti tasmai namaḥ

हे यज्ञेश्वर! सत्कर्मों से भ्रष्ट होकर आपके दर्शन की आकांक्षा रखने वाले हम पर प्रसन्न होइए। जब मनुष्य आपके नाम का कीर्तन करते हैं, तब यज्ञ की समस्त बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं — आपके उस नाम को नमस्कार है।

श्लोक 48 (bhagavata.4.7.48)

मैत्रेय उवाच इति दक्षः कविर्यज्ञं भद्र रुद्राभिमर्शितम् । कीर्त्यमाने हृषीकेशे सन्निन्ये यज्ञभावने ॥ ४८ ॥

maitreya uvāca iti dakṣaḥ kavir yajñaṁ bhadra rudrābhimarśitam kīrtyamāne hṛṣīkeśe sanninye yajña-bhāvane

श्री मैत्रेय जी ने कहा — हे भद्र! इस प्रकार यज्ञ के उद्गम, हृषीकेश (विष्णु) की स्तुति होते हुए, विद्वान दक्ष ने रुद्र के अनुचरों द्वारा बाधित उस यज्ञ को पुनः आगे बढ़ाया।

श्लोक 49 (bhagavata.4.7.49)

भगवान् स्वेन भागेन सर्वात्मा सर्वभागभुक् । दक्षं बभाष आभाष्य प्रीयमाण इवानघ ॥ ४९ ॥

bhagavān svena bhāgena sarvātmā sarva-bhāga-bhuk dakṣaṁ babhāṣa ābhāṣya prīyamāṇa ivānagha

हे निष्पाप विदुर! सर्वात्मा तथा समस्त यज्ञ-भागों के भोक्ता भगवान, अपने ही भाग से संतुष्ट होकर, प्रसन्नचित्त होते हुए दक्ष को संबोधित करके इस प्रकार बोले।

श्लोक 50 (bhagavata.4.7.50)

श्रीभगवानुवाच अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् । आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयंदृगविशेषणः ॥ ५० ॥

śrī-bhagavān uvāca ahaṁ brahmā ca śarvaś ca jagataḥ kāraṇaṁ param ātmeśvara upadraṣṭā svayan-dṛg aviśeṣaṇaḥ

श्री भगवान ने कहा — मैं, ब्रह्मा और शर्व (शिव) — हम तीनों ही जगत के परम कारण हैं। मैं आत्मेश्वर हूँ, सबका द्रष्टा हूँ, स्वयं-प्रकाश हूँ, तथा इन दोनों से अभिन्न हूँ।

श्लोक 51 (bhagavata.4.7.51)

आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज । सृजन् रक्षन् हरन् विश्वं दध्रे संज्ञां क्रियोचिताम् ॥ ५१ ॥

ātma-māyāṁ samāviśya so ’haṁ guṇamayīṁ dvija sṛjan rakṣan haran viśvaṁ dadhre saṁjñāṁ kriyocitām

हे द्विज! अपनी त्रिगुणमयी माया में प्रविष्ट होकर, इस विश्व की सृष्टि, पालन और संहार करते हुए, मैं प्रत्येक कार्य के अनुरूप उपयुक्त नाम धारण करता हूँ।

श्लोक 52 (bhagavata.4.7.52)

तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि । ब्रह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥

tasmin brahmaṇy advitīye kevale paramātmani brahma-rudrau ca bhūtāni bhedenājño ’nupaśyati

उस अद्वितीय, केवल परमात्मा-स्वरूप ब्रह्म में ब्रह्मा, रुद्र और समस्त प्राणियों को अज्ञानी ही भेद-दृष्टि से पृथक्-पृथक् देखता है।

श्लोक 53 (bhagavata.4.7.53)

यथा पुमान्न स्वाङ्गेषु शिरःपाण्यादिषु क्वचित् । पारक्यबुद्धिं कुरुते एवं भूतेषु मत्परः ॥ ५३ ॥

yathā pumān na svāṅgeṣu śiraḥ-pāṇy-ādiṣu kvacit pārakya-buddhiṁ kurute evaṁ bhūteṣu mat-paraḥ

जैसे मनुष्य अपने ही शरीर के सिर, हाथ आदि अंगों को कभी दूसरे का नहीं मानता, वैसे ही मुझमें तत्पर मेरा भक्त किसी भी प्राणी को अपने से पृथक् नहीं मानता।

श्लोक 54 (bhagavata.4.7.54)

त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् । सर्वभूतात्मनां ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४ ॥

trayāṇām eka-bhāvānāṁ yo na paśyati vai bhidām sarva-bhūtātmanāṁ brahman sa śāntim adhigacchati

हे ब्राह्मण! जो इन तीनों में, जो वास्तव में एक ही हैं और समस्त प्राणियों की आत्मा हैं, कोई भेद नहीं देखता, वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।

श्लोक 55 (bhagavata.4.7.55)

मैत्रेय उवाच एवं भगवतादिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् । अर्चित्वा क्रतुना स्वेन देवानुभयतोऽयजत् ॥ ५५ ॥

maitreya uvāca evaṁ bhagavatādiṣṭaḥ prajāpati-patir harim arcitvā kratunā svena devān ubhayato ’yajat

श्री मैत्रेय जी ने कहा — इस प्रकार भगवान द्वारा उपदिष्ट होकर प्रजापतियों के स्वामी दक्ष ने अपने यज्ञ द्वारा भगवान हरि की आराधना की, और फिर दोनों ओर के अन्य देवताओं की भी आराधना की।

श्लोक 56 (bhagavata.4.7.56)

रुद्रं च स्वेन भागेन ह्युपाधावत्समाहितः । कर्मणोदवसानेन सोमपानितरानपि । उदवस्य सहर्त्विग्भिः सस्नाववभृथं ततः ॥ ५६ ॥

rudraṁ ca svena bhāgena hy upādhāvat samāhitaḥ karmaṇodavasānena somapān itarān api udavasya sahartvigbhiḥ sasnāv avabhṛthaṁ tataḥ

एकाग्रचित्त होकर उन्होंने रुद्र की भी उनके भाग से आराधना की, तथा कर्म के समापन पर सोमपायी देवताओं और अन्य सभी को भी संतुष्ट किया; फिर ऋत्विजों सहित समापन-कृत्य पूर्ण करके उन्होंने अवभृथ-स्नान किया।

श्लोक 57 (bhagavata.4.7.57)

तस्मा अप्यनुभावेन स्वेनैवावाप्तराधसे । धर्म एव मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययुः ॥ ५७ ॥

tasmā apy anubhāvena svenaivāvāpta-rādhase dharma eva matiṁ dattvā tridaśās te divaṁ yayuḥ

अपनी ही भक्ति द्वारा इस सफलता को प्राप्त हुए दक्ष को यह आशीर्वाद देकर कि उनका चित्त सदैव धर्म में लगा रहे, त्रिदश (देवगण) स्वर्गलोक को चले गए।

श्लोक 58 (bhagavata.4.7.58)

एवं दाक्षायणी हित्वा सती पूर्वकलेवरम् । जज्ञे हिमवतः क्षेत्रे मेनायामिति शुश्रुम ॥ ५८ ॥

evaṁ dākṣāyaṇī hitvā satī pūrva-kalevaram jajñe himavataḥ kṣetre menāyām iti śuśruma

श्री मैत्रेय जी ने कहा — इस प्रकार, ऐसा मैंने सुना है, दाक्षायणी (सती) ने अपने पूर्व शरीर का त्याग करके हिमवान के क्षेत्र में मेना के गर्भ से जन्म लिया।

श्लोक 59 (bhagavata.4.7.59)

तमेव दयितं भूय आवृङ्क्ते पतिमम्बिका । अनन्यभावैकगतिं शक्तिः सुप्तेव पूरुषम् ॥ ५९ ॥

tam eva dayitaṁ bhūya āvṛṅkte patim ambikā ananya-bhāvaika-gatiṁ śaktiḥ supteva pūruṣam

अनन्य भाव से जिनकी एकमात्र गति वही पति हैं, ऐसी अम्बिका (देवी) ने पुनः उसी प्रियतम पति (शिव) को स्वीकार किया — ठीक वैसे ही जैसे शक्ति, सुप्त रहकर भी, पुरुष के पास ही लौट आती है।

श्लोक 60 (bhagavata.4.7.60)

एतद्भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः । श्रुतं भागवताच्छिष्यादुद्धवान्मे बृहस्पतेः ॥ ६० ॥

etad bhagavataḥ śambhoḥ karma dakṣādhvara-druhaḥ śrutaṁ bhāgavatāc chiṣyād uddhavān me bṛhaspateḥ

श्री मैत्रेय जी ने कहा — भगवान शम्भु द्वारा दक्ष के यज्ञ के विध्वंस का यह वृत्तान्त मैंने बृहस्पति के शिष्य, भक्तवर उद्धव जी से सुना है।

श्लोक 61 (bhagavata.4.7.61)

इदं पवित्रं परमीशचेष्टितं यशस्यमायुष्यमघौघमर्षणम् । यो नित्यदाकर्ण्य नरोऽनुकीर्तयेद् धुनोत्यघं कौरव भक्तिभावतः ॥ ६१ ॥

idaṁ pavitraṁ param īśa-ceṣṭitaṁ yaśasyam āyuṣyam aghaugha-marṣaṇam yo nityadākarṇya naro ’nukīrtayed dhunoty aghaṁ kaurava bhakti-bhāvataḥ

हे कौरव! भगवान की इस लीला का यह परम पवित्र वृत्तान्त यश और आयु प्रदान करने वाला तथा पापों के समूह को नष्ट करने वाला है; जो मनुष्य इसे नित्य सुनता है और भक्तिभाव से इसका पुनः कीर्तन करता है, वह अपने पापों को दूर कर देता है।

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