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पंचम स्कन्ध · अध्याय 11

जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को उपदेश

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (bhagavata.5.11.1)

ब्राह्मण उवाच अकोविदः कोविदवादवादान्वदस्यथो नातिविदां वरिष्ठः । न सूरयो हि व्यवहारमेनंतत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति ॥ १ ॥

brāhmaṇa uvāca akovidaḥ kovida-vāda-vādān vadasy atho nāti-vidāṁ variṣṭhaḥ na sūrayo hi vyavahāram enaṁ tattvāvamarśena sahāmananti

ब्राह्मण ने कहा — अनभिज्ञ होते हुए भी आप विद्वानों जैसी भाषा बोल रहे हैं; और न ही आप वस्तुतः महाज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि ज्ञानीजन इस प्रकार के लौकिक व्यवहार-सम्बन्धी वचन को तत्त्व-विवेचन के साथ सम्बद्ध नहीं मानते।

श्लोक 2 (bhagavata.5.11.2)

तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-वितानविद्योरुविजृम्भितेषु । न वेदवादेषु हि तत्त्ववादःप्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधुः ॥ २ ॥

tathaiva rājann uru-gārhamedha- vitāna-vidyoru-vijṛmbhiteṣu na veda-vādeṣu hi tattva-vādaḥ prāyeṇa śuddho nu cakāsti sādhuḥ

उसी प्रकार, हे राजन्, गृहस्थ-यज्ञ सम्बन्धी उस विशाल वैदिक कर्मकाण्ड के विस्तार में, तत्त्व-सम्बन्धी वार्ता प्रायः शुद्ध और निर्मल रूप से प्रकाशित नहीं होती।

श्लोक 3 (bhagavata.5.11.3)

न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद्वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यंन यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥ ३ ॥

na tasya tattva-grahaṇāya sākṣād varīyasīr api vācaḥ samāsan svapne niruktyā gṛhamedhi-saukhyaṁ na yasya heyānumitaṁ svayaṁ syāt

उस तत्त्व को ग्रहण करने के लिए, प्रत्यक्ष श्रवण किए हुए अत्यंत उत्तम वचन भी पर्याप्त नहीं होते — जैसे स्वप्न में अनुभव किया गया गृहस्थ-सुख, जागने पर, बिना स्वयं अनुमान किए ही, केवल शब्दार्थ मात्र से त्याज्य समझ लिया जाता है।

श्लोक 4 (bhagavata.5.11.4)

यावन्मनो रजसा पूरुषस्यसत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम् । चेतोभिराकूतिभिरातनोतिनिरङ्कुशं कुशलं चेतरं वा ॥ ४ ॥

yāvan mano rajasā pūruṣasya sattvena vā tamasā vānuruddham cetobhir ākūtibhir ātanoti niraṅkuśaṁ kuśalaṁ cetaraṁ vā

जब तक पुरुष का मन रजस्, सत्त्व अथवा तमस् से बँधा रहता है, तब तक वह अपने विचारों और संकल्पों के द्वारा, निरंकुश होकर, शुभ अथवा अशुभ कर्मों का विस्तार करता रहता है।

श्लोक 5 (bhagavata.5.11.5)

स वासनात्मा विषयोपरक्तोगुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । बिभ्रत्पृथङ्नामभि रूपभेद-मन्तर्बहिष्ट्वं च पुरैस्तनोति ॥ ५ ॥

sa vāsanātmā viṣayoparakto guṇa-pravāho vikṛtaḥ ṣoḍaśātmā bibhrat pṛthaṅ-nāmabhi rūpa-bhedam antar-bahiṣṭvaṁ ca purais tanoti

वह मन, जिसका स्वरूप ही वासना है, विषयों से रंजित, तीनों गुणों की धारा से विकृत होकर सोलह रूपों में परिणत, पृथक्-पृथक् नामों और रूप-भेदों को धारण करता हुआ, विभिन्न शरीरों के द्वारा अंतः और बाह्य दोनों प्रकार के अस्तित्व का विस्तार करता है।

श्लोक 6 (bhagavata.5.11.6)

दुःखं सुखं व्यतिरिक्तं च तीव्रंकालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति । आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मास्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटः ॥ ६ ॥

duḥkhaṁ sukhaṁ vyatiriktaṁ ca tīvraṁ kālopapannaṁ phalam āvyanakti āliṅgya māyā-racitāntarātmā sva-dehinaṁ saṁsṛti-cakra-kūṭaḥ

सुख, दुःख और इन दोनों से परे की अवस्थाओं को, तीव्र और काल द्वारा पके हुए फलरूप में प्रकट करता हुआ, संसार-चक्र की यह नाभि (मन), माया द्वारा रचित आत्मभाव से देहधारी को आलिंगन में बाँधकर, उसे अपने वश में रखता है।

श्लोक 7 (bhagavata.5.11.7)

तावानयं व्यवहारः सदाविःक्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्मः । तस्मान्मनो लिङ्गमदो वदन्तिगुणागुणत्वस्य परावरस्य ॥ ७ ॥

tāvān ayaṁ vyavahāraḥ sadāviḥ kṣetrajña-sākṣyo bhavati sthūla-sūkṣmaḥ tasmān mano liṅgam ado vadanti guṇāguṇatvasya parāvarasya

यह सम्पूर्ण व्यवहार-जगत — स्थूल और सूक्ष्म, सदैव प्रकट, क्षेत्रज्ञ (आत्मा) जिसका मात्र साक्षी है — मन तक ही सीमित है; इसीलिए ज्ञानीजन मन को ही गुणयुक्त एवं गुणरहित, उच्च और निम्न आत्मा का चिह्न कहते हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.5.11.8)

गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् । पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥ ८ ॥

guṇānuraktaṁ vyasanāya jantoḥ kṣemāya nairguṇyam atho manaḥ syāt yathā pradīpo ghṛta-vartim aśnan śikhāḥ sadhūmā bhajati hy anyadā svam padaṁ tathā guṇa-karmānubaddhaṁ vṛttīr manaḥ śrayate ’nyatra tattvam

गुणों में आसक्त मन जीव के लिए अनर्थकारी होता है, जबकि गुणों से रहित मन ही उसके कल्याण का कारण बनता है। जैसे घी से सिक्त बत्ती को ग्रहण करने वाला दीपक कभी धूम्र-मिश्रित ज्वाला धारण करता है, तो कभी अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त होता है — उसी प्रकार गुणों तथा उनसे उत्पन्न कर्मों से बँधा हुआ मन, किसी अन्य समय, उन सबसे परे तत्त्व का ही आश्रय ले लेता है।

श्लोक 9 (bhagavata.5.11.9)

एकादशासन्मनसो हि वृत्तय आकूतयः पञ्च धियोऽभिमानः । मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां वदन्ति हैकादश वीर भूमीः ॥ ९ ॥

ekādaśāsan manaso hi vṛttaya ākūtayaḥ pañca dhiyo ’bhimānaḥ mātrāṇi karmāṇi puraṁ ca tāsāṁ vadanti haikādaśa vīra bhūmīḥ

मन की वृत्तियाँ ग्यारह हैं — पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, तथा अहंकार। हे वीर, ज्ञानीजन इन्द्रियों के विषयों, शारीरिक क्रियाओं और शरीर को ही इन ग्यारह वृत्तियों के 'क्षेत्र' कहते हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.5.11.10)

गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि विसर्गरत्यर्त्यभिजल्पशिल्पाः । एकादशं स्वीकरणं ममेति शय्यामहं द्वादशमेक आहुः ॥ १० ॥

gandhākṛti-sparśa-rasa-śravāṁsi visarga-raty-arty-abhijalpa-śilpāḥ ekādaśaṁ svīkaraṇaṁ mameti śayyām ahaṁ dvādaśam eka āhuḥ

गंध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द; उत्सर्ग, रति, गति, वाणी और शिल्प-कर्म — ये, तथा ग्यारहवीं वृत्ति 'यह मेरा है' का भाव, और कुछ के मत में बारहवीं वृत्ति 'मैं' का भाव — इन सबका आश्रय-स्थान यह शरीर ही है।

श्लोक 11 (bhagavata.5.11.11)

द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- रेकादशामी मनसो विकाराः । सहस्रशः शतशः कोटिशश्च क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ ११ ॥

dravya-svabhāvāśaya-karma-kālair ekādaśāmī manaso vikārāḥ sahasraśaḥ śataśaḥ koṭiśaś ca kṣetrajñato na mitho na svataḥ syuḥ

ये मन की ग्यारह वृत्तियाँ, द्रव्य, स्वभाव, आशय, कर्म और काल के संयोग से, सैकड़ों, हजारों, यहाँ तक कि करोड़ों रूपों में बदल जाती हैं — फिर भी ये न तो क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के परस्पर संयोग से उत्पन्न होती हैं, न स्वयं अपने आप से।

श्लोक 12 (bhagavata.5.11.12)

क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूती- र्जीवस्य मायारचितस्य नित्याः । आविर्हिताः क्वापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥ १२ ॥

kṣetrajña etā manaso vibhūtīr jīvasya māyā-racitasya nityāḥ āvirhitāḥ kvāpi tirohitāś ca śuddho vicaṣṭe hy aviśuddha-kartuḥ

हे क्षेत्रज्ञ, मन की ये शक्तियाँ माया द्वारा रचित जीव की अनादि काल से साथी हैं — कभी प्रकट, कभी छिपी हुई। जो स्वयं शुद्ध है, वह इन्हें स्पष्ट रूप से देखता है, यद्यपि ये उसकी हैं जिसका कर्तृत्व ही अशुद्ध है।

श्लोक 13 (bhagavata.5.11.13)

क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात्स्वयंज्योतिरजः परेशः । नारायणो भगवान् वासुदेवः स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः ॥ १३ ॥

kṣetrajña ātmā puruṣaḥ purāṇaḥ sākṣāt svayaṁ jyotir ajaḥ pareśaḥ nārāyaṇo bhagavān vāsudevaḥ sva-māyayātmany avadhīyamānaḥ

दूसरा क्षेत्रज्ञ स्वयं आत्मा, वह पुरुष, वह पुराण पुरुष है, साक्षात् स्वयं-प्रकाश, अजन्मा, परमेश्वर — नारायण, भगवान वासुदेव — जो अपनी ही माया से मानो प्रत्येक जीवात्मा में सीमित होकर स्थित प्रतीत होते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.5.11.14)

यथानिलः स्थावरजङ्गमाना- मात्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत् । एवं परो भगवान् वासुदेवः क्षेत्रज्ञ आत्मेदमनुप्रविष्टः ॥ १४ ॥

yathānilaḥ sthāvara-jaṅgamānām ātma-svarūpeṇa niviṣṭa īśet evaṁ paro bhagavān vāsudevaḥ kṣetrajña ātmedam anupraviṣṭaḥ

जैसे वायु, चराचर समस्त वस्तुओं में अपने सूक्ष्म रूप से प्रविष्ट होकर, उन्हें भीतर से नियंत्रित करती है — उसी प्रकार परम भगवान वासुदेव, वह क्षेत्रज्ञ, आत्मरूप में प्रविष्ट होकर, इस सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.5.11.15)

न यावदेतां तनुभृन्नरेन्द्र विधूय मायां वयुनोदयेन । विमुक्तसङ्गो जितषट्सपत्नो वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् ॥ १५ ॥

na yāvad etāṁ tanu-bhṛn narendra vidhūya māyāṁ vayunodayena vimukta-saṅgo jita-ṣaṭ-sapatno vedātma-tattvaṁ bhramatīha tāvat

हे नरेन्द्र, जब तक यह देहधारी, सम्यक् ज्ञान के उदय से इस माया को दूर नहीं कर लेता, आसक्ति से मुक्त नहीं हो जाता, और अपने छह शत्रुओं (काम, क्रोध आदि) पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता — तब तक वह आत्म-तत्त्व के विषय में भ्रमित होकर यहाँ भटकता रहता है।

श्लोक 16 (bhagavata.5.11.16)

न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं संसारतापावपनं जनस्य । यच्छोकमोहामयरागलोभ- वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥ १६ ॥

na yāvad etan mana ātma-liṅgaṁ saṁsāra-tāpāvapanaṁ janasya yac choka-mohāmaya-rāga-lobha- vairānubandhaṁ mamatāṁ vidhatte

जब तक यह मन — जो आत्मा का मिथ्या चिह्न है, मनुष्य के लिए संसार-ताप का मूल कारण है — पहचाना नहीं जाता, तब तक वह शोक, मोह, रोग, आसक्ति, लोभ और वैर से जुड़ी हुई 'ममता' की स्थापना करता रहता है।

श्लोक 17 (bhagavata.5.11.17)

भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य- मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्तः । गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥ १७ ॥

bhrātṛvyam enaṁ tad adabhra-vīryam upekṣayādhyedhitam apramattaḥ guror hareś caraṇopāsanāstro jahi vyalīkaṁ svayam ātma-moṣam

यह शत्रु (मन), अत्यंत बलशाली होते हुए भी, यदि असावधानी से उपेक्षित किया जाए तो और भी सशक्त हो जाता है। अतः सदा सजग रहते हुए, गुरु और हरि के चरणों की उपासना रूपी अस्त्र से इसका वध कीजिए — यह एक छलिया है, आत्मा को चुराने वाला चोर है, यद्यपि वस्तुतः मिथ्या ही है।

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