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पंचम स्कन्ध · अध्याय 17

गंगा का अवतरण

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.5.17.1)

श्रीशुक उवाच तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो वामपादाङ्गुष्ठनखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोऽभिधीयमानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca tatra bhagavataḥ sākṣād yajña-liṅgasya viṣṇor vikramato vāma-pādāṅguṣṭha-nakha-nirbhinnordhvāṇḍa-kaṭāha-vivareṇāntaḥ-praviṣṭā yā bāhya-jala-dhārā tac-caraṇa-paṅkajāvanejanāruṇa-kiñjalkoparañjitākhila-jagad-agha-malāpahopasparśanāmalā sākṣād bhagavat-padīty anupalakṣita-vaco ’bhidhīyamānāti-mahatā kālena yuga-sahasropalakṣaṇena divo mūrdhany avatatāra yat tad viṣṇu-padam āhuḥ.

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! जब यज्ञस्वरूप साक्षात् भगवान विष्णु ने पग बढ़ाया, तब उनके बाएँ पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड के ऊपरी आवरण में एक छिद्र हो गया, जिससे बाहर का जल भीतर प्रविष्ट हो गया। भगवान के अरुण-किंजल्क के समान चरण-कमलों को धोने से वह जल परम निर्मल हो गया, जो स्पर्शमात्र से समस्त जगत के पाप और मल का नाश करने वाला है। साक्षात् भगवान के चरणों से उत्पन्न होने के कारण अव्यक्त रूप से 'विष्णुपदी' कहलाने वाला वह जल सहस्र युगों के बराबर अत्यंत दीर्घ काल में आकाश के मस्तक पर उतरा। इसीलिए विद्वान लोग उस स्थान को 'विष्णुपद' कहते हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.5.17.2)

यत्र ह वाव वीरव्रत औत्तानपादिः परमभागवतोऽस्मत्कुलदेवताचरणारविन्दोदकमिति यामनुसवनमुत्कृष्यमाणभगवद्भक्तियोगेन दृढं क्लिद्यमानान्तर्हृदय औत्कण्ठ्यविवशामीलितलोचनयुगलकुड्मलविगलितामलबाष्पकलयाभिव्यज्यमानरोमपुलककुलकोऽधुनापि परमादरेण शिरसा बिभर्ति ॥ २ ॥

yatra ha vāva vīra-vrata auttānapādiḥ parama-bhāgavato ’smat-kula-devatā-caraṇāravindodakam iti yām anusavanam utkṛṣyamāṇa-bhagavad-bhakti-yogena dṛḍhaṁ klidyamānāntar-hṛdaya autkaṇṭhya-vivaśāmīlita-locana-yugala-kuḍmala-vigalitāmala-bāṣpa-kalayābhivyajyamāna-roma-pulaka-kulako ’dhunāpi paramādareṇa śirasā bibharti.

उत्तानपाद के पुत्र, वीरव्रती परम भागवत ध्रुव — यह जानकर कि यही जल हमारे कुलदेवता भगवान विष्णु के चरण-कमलों को धोकर आया है — आज भी निरंतर बढ़ती हुई भक्ति-योग की साधना से हृदय को भिगोते हुए, उत्कण्ठा से अर्ध-निमीलित नेत्रों से निर्मल अश्रु बहाते और रोमांच से पुलकित होते हुए, उस जल को परम आदर के साथ अपने मस्तक पर धारण करते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.5.17.3)

ततः सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपसआत्यन्तिकी सिद्धिरेतावती भगवति सर्वात्मनि वासुदेवेऽनुपरतभक्तियोगलाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षव इव सबहुमानमद्यापि जटाजूटैरुद्वहन्ति ॥ ३ ॥

tataḥ sapta ṛṣayas tat prabhāvābhijñā yāṁ nanu tapasa ātyantikī siddhir etāvatī bhagavati sarvātmani vāsudeve ’nuparata-bhakti-yoga-lābhenaivopekṣitānyārthātma-gatayo muktim ivāgatāṁ mumukṣava iva sabahu-mānam adyāpi jaṭā-jūṭair udvahanti.

इसके पश्चात् उसके प्रभाव को जानने वाले सप्त ऋषि, जो सर्वात्मा भगवान वासुदेव की अखण्ड भक्ति पाकर अन्य समस्त प्रयोजनों की उपेक्षा कर चुके हैं, आज भी उसे तप की चरम सिद्धि मानकर अत्यंत आदर के साथ अपनी जटाओं में धारण करते हैं — उनके लिए मुक्ति भी, मुमुक्षुओं के समान, स्वयं ही चली आई हुई प्रतीत होती है।

श्लोक 4 (bhagavata.5.17.4)

ततोऽनेकसहस्रकोटिविमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दुमण्डलमावार्य ब्रह्मसदने निपतति ॥ ४ ॥

tato ’neka-sahasra-koṭi-vimānānīka-saṅkula-deva-yānenāvatar-antīndu maṇḍalam āvārya brahma-sadane nipatati.

तदनन्तर वह देवताओं के मार्ग से, जो असंख्य करोड़ों विमानों की भीड़ से भरा है, नीचे उतरती हुई चन्द्रमण्डल को आवृत्त कर ब्रह्मा के धाम पर गिरती है।

श्लोक 5 (bhagavata.5.17.5)

तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदीपतिमेवाभिनिविशति सीतालकनन्दा चक्षुर्भद्रेति ॥ ५ ॥

tatra caturdhā bhidyamānā caturbhir nāmabhiś catur-diśam abhispandantī nada-nadī-patim evābhiniviśati sītālakanandā cakṣur bhadreti.

वहाँ वह चार भागों में विभक्त होकर चार नामों से चारों दिशाओं में बहती हुई नदों के स्वामी समुद्र में जा मिलती है — सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा।

श्लोक 6 (bhagavata.5.17.6)

सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरेभ्योऽधोऽधः प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति ॥ ६ ॥

sītā tu brahma-sadanāt kesarācalādi-giri-śikharebhyo ’dho ’dhaḥ prasravantī gandhamādana-mūrdhasu patitvāntareṇa bhadrāśva-varṣaṁ prācyāṁ diśi kṣāra-samudram abhipraviśati.

सीता नदी ब्रह्मा के धाम से केसराचल आदि पर्वत-शिखरों को एक के बाद एक लांघती हुई नीचे उतरती है, गन्धमादन पर्वत के शिखर पर गिरकर पूर्व दिशा में भद्राश्व-वर्ष से होती हुई खारे समुद्र में प्रवेश करती है।

श्लोक 7 (bhagavata.5.17.7)

एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोऽनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षुः प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥ ७ ॥

evaṁ mālyavac-chikharān niṣpatantī tato ’nuparata-vegā ketumālam abhi cakṣuḥ pratīcyāṁ diśi sarit-patiṁ praviśati.

इसी प्रकार माल्यवान पर्वत के शिखरों से गिरकर सतत प्रवाहित होती हुई चक्षु नदी पश्चिम दिशा में केतुमाल-वर्ष से होती हुई समुद्र में प्रवेश करती है।

श्लोक 8 (bhagavata.5.17.8)

भद्रा चोत्तरतो मेरुशिरसो निपतिता गिरिशिखराद्गिरिशिखरमतिहाय शृङ्गवतः शृङ्गादवस्यन्दमाना उत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥ ८ ॥

bhadrā cottarato meru-śiraso nipatitā giri-śikharād giri-śikharam atihāya śṛṅgavataḥ śṛṅgād avasyandamānā uttarāṁs tu kurūn abhita udīcyāṁ diśi jaladhim abhipraviśati.

भद्रा नदी मेरु के उत्तर दिशा वाले शिखर से गिरकर एक पर्वत-शिखर से दूसरे शिखर को लांघते हुए शृंगवान पर्वत के शिखर से बहती हुई उत्तर कुरु के चारों ओर होकर उत्तर दिशा के समुद्र में प्रवेश करती है।

श्लोक 9 (bhagavata.5.17.9)

तथैवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्बहूनि गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्धैमकूटान्यतिरभसतररंहसा लुठयन्ती भारतमभिवर्षं दक्षिणस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्नानार्थं चागच्छतः पुंसः पदे पदेऽश्वमेधराजसूयादीनां फलं न दुर्लभमिति ॥ ९ ॥

tathaivālakanandā dakṣiṇena brahma-sadanād bahūni giri-kūṭāny atikramya hemakūṭād dhaimakūṭāny ati-rabhasatara-raṁhasā luṭhayantī bhāratam abhivarṣaṁ dakṣiṇasyāṁ diśi jaladhim abhipraviśati yasyāṁ snānārthaṁ cāgacchataḥ puṁsaḥ pade pade ’śvamedha-rājasūyādīnāṁ phalaṁ na durlabham iti.

इसी प्रकार अलकनन्दा नदी ब्रह्मा के धाम से दक्षिण दिशा में बहती हुई अनेक पर्वत-शिखरों को लांघकर हेमकूट और हैमकूट पर्वतों पर अत्यंत वेग से लुढ़कती हुई भारतवर्ष को भिगोती हुई दक्षिण दिशा के समुद्र में प्रवेश करती है। जो पुरुष उसमें स्नान के लिए आता है, उसे पग-पग पर अश्वमेध, राजसूय आदि यज्ञों का फल दुर्लभ नहीं रह जाता।

श्लोक 10 (bhagavata.5.17.10)

अन्ये च नदा नद्यश्च वर्षे वर्षे सन्ति बहुशो मेर्वादिगिरिदुहितरः शतशः ॥ १० ॥

anye ca nadā nadyaś ca varṣe varṣe santi bahuśo merv-ādi-giri-duhitaraḥ śataśaḥ.

इनके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष में मेरु आदि पर्वतों की मानो पुत्रियों के समान सैकड़ों अन्य बड़ी-छोटी नदियाँ भी हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.5.17.11)

तत्रापि भारतमेव वर्षं कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट वर्षाणि स्वर्गिणां पुण्यशेषोपभोगस्थानानि भौमानि स्वर्गपदानि व्यपदिशन्ति ॥ ११ ॥

tatrāpi bhāratam eva varṣaṁ karma-kṣetram anyāny aṣṭa varṣāṇi svargiṇāṁ puṇya-śeṣopabhoga-sthānāni bhaumāni svarga-padāni vyapadiśanti.

इनमें भी भारतवर्ष को ही कर्मक्षेत्र कहा गया है; शेष आठ वर्षों को स्वर्ग के पुण्य-शेष का उपभोग करने वाले स्वर्गवासियों के भौमिक स्वर्ग-पद कहा जाता है।

श्लोक 12 (bhagavata.5.17.12)

एषु पुरुषाणामयुतपुरुषायुर्वर्षाणां देवकल्पानां नागायुतप्राणानां वज्रसंहननबलवयोमोदप्रमुदितमहासौरतमिथुनव्यवायापवर्गवर्षधृतैकगर्भ कलत्राणां तत्र तु त्रेतायुगसमः कालो वर्तते ॥ १२ ॥

eṣu puruṣāṇām ayuta-puruṣāyur-varṣāṇāṁ deva-kalpānāṁ nāgāyuta-prāṇānāṁ vajra-saṁhanana-bala-vayo-moda-pramudita-mahā-saurata-mithuna-vyavāyāpavarga-varṣa-dhṛtaika-garbha-kalatrāṇāṁ tatra tu tretā-yuga-samaḥ kālo vartate.

इन वर्षों में मनुष्यों की आयु दस हजार वर्ष होती है, वे देवताओं के समान होते हैं, दस हजार हाथियों के बल के समान उनका बल होता है, उनके शरीर वज्र के समान द‍ृढ़ होते हैं; अपने यौवन तथा बल के आनंद में मग्न होकर वे परस्पर महान सुरत-सुख का भोग करते हैं, और जब केवल एक वर्ष शेष रह जाता है, तब पत्नी एक ही संतान को गर्भ में धारण करती है। वहाँ त्रेतायुग के समान काल विद्यमान रहता है।

श्लोक 13 (bhagavata.5.17.13)

यत्र ह देवपतयः स्वैः स्वैर्गणनायकैर्विहितमहार्हणाः सर्वर्तुकुसुमस्तबकफलकिसलयश्रियाऽऽनम्यमानविटपलता विटपिभिरुपशुम्भमानरुचिरकाननाश्रमायतनवर्षगिरिद्रोणीषु तथा चामलजलाशयेषु विकचविविधनववनरुहामोदमुदितराजहंसजलकुक्कुटकारण्डवसारसचक्रवाकादिभिर्मधुकरनिकराकृतिभिरुपकूजितेषु जलक्रीडादिभिर्विचित्रविनोदैः सुललितसुरसुन्दरीणां कामकलिलविलासहासलीलावलोकाकृष्टमनोदृष्टयः स्वैरं विहरन्ति ॥ १३ ॥

yatra ha deva-patayaḥ svaiḥ svair gaṇa-nāyakair vihita-mahārhaṇāḥ sarvartu-kusuma-stabaka-phala-kisalaya-śriyānamyamāna-viṭapa-latā-viṭapibhir upaśumbhamāna-rucira-kānanāśramāyatana-varṣa-giri-droṇīṣu tathā cāmala-jalāśayeṣu vikaca-vividha-nava-vanaruhāmoda-mudita-rāja-haṁsa-jala-kukkuṭa-kāraṇḍava-sārasa-cakravākādibhir madhukara-nikarākṛtibhir upakūjiteṣu jala-krīḍādibhir vicitra-vinodaiḥ sulalita-sura-sundarīṇāṁ kāma-kalila-vilāsa-hāsa-līlāvalokākṛṣṭa-mano-dṛṣṭayaḥ svairaṁ viharanti.

उन वर्षों में देवताओं के स्वामी अपने-अपने गणनायकों द्वारा यथोचित सम्मान पाते हुए, पर्वत-द्रोणियों में स्थित उन मनोहर वन-आश्रमों में स्वच्छन्द विचरण करते हैं, जो सभी ऋतुओं के फूलों के गुच्छों, फलों और कोमल पल्लवों की शोभा से झुकी हुई लताओं-वृक्षों से सुशोभित हैं, तथा उन निर्मल जलाशयों के समीप, जो नवविकसित विविध कमलों की सुगन्ध से हर्षित राजहंस, जलमुर्गी, कारण्डव, सारस और चक्रवाक आदि पक्षियों तथा भ्रमरों की गुंजार से गूँजते रहते हैं। वहाँ जलक्रीड़ा आदि विविध विनोदों में रमण करते हुए वे सुन्दरी देवांगनाओं के कामोद्दीपक विलास, हास्य और लीला-अवलोकन से आकर्षित मन और द‍ृष्टि वाले होकर स्वच्छन्द विहार करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.5.17.14)

नवस्वपि वर्षेषु भगवान्नारायणो महापुरुषः पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि सन्निधीयते ॥ १४ ॥

navasv api varṣeṣu bhagavān nārāyaṇo mahā-puruṣaḥ puruṣāṇāṁ tad-anugrahāyātma-tattva-vyūhenātmanādyāpi sannidhīyate.

इन नवों वर्षों में भगवान महापुरुष नारायण अपने आत्मतत्त्व के चतुर्व्यूह रूप से लोगों पर अनुग्रह करने हेतु आज भी उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.5.17.15)

इलावृते तु भगवान् भव एक एव पुमान्न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्याः शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतः स्त्रीभावस्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि ॥ १५ ॥

ilāvṛte tu bhagavān bhava eka eva pumān na hy anyas tatrāparo nirviśati bhavānyāḥ śāpa-nimitta-jño yat-pravekṣyataḥ strī-bhāvas tat paścād vakṣyāmi.

किन्तु इलावृत-वर्ष में भगवान भव (शिव) ही एकमात्र पुरुष हैं; अन्य कोई पुरुष वहाँ प्रवेश नहीं करता — क्योंकि भवानी के शाप का कारण यह है कि जो भी अन्य पुरुष वहाँ प्रवेश करेगा, वह स्त्री-रूप को प्राप्त हो जाएगा। यह मैं आगे बताऊँगा।

श्लोक 16 (bhagavata.5.17.16)

भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन् भव उप-धावति ॥ १६ ॥

bhavānī-nāthaiḥ strī-gaṇārbuda-sahasrair avarudhyamāno bhagavataś catur-mūrter mahā-puruṣasya turīyāṁ tāmasīṁ mūrtiṁ prakṛtim ātmanaḥ saṅkarṣaṇa-saṁjñām ātma-samādhi-rūpeṇa sannidhāpyaitad abhigṛṇan bhava upadhāvati.

भवानी की स्त्री-परिचारिकाओं के अरबों समूहों से घिरे हुए शिव अपने ध्यान-समाधि द्वारा भगवान के चतुर्व्यूह स्वरूप के चौथे, तामसी रूप — संकर्षण नामक, जो उनकी अपनी उत्पत्ति के कारण हैं — को समीप ले आकर, इस स्तोत्र का उच्चारण करते हुए उनकी उपासना करते हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.5.17.17)

श्रीभगवानुवाच ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति ॥ १७ ॥

śrī-bhagavān uvāca oṁ namo bhagavate mahā-puruṣāya sarva-guṇa-saṅkhyānāyānantāyāvyaktāya nama iti.

श्री भगवान (शिव) ने कहा — ॐ, समस्त गुणों की परिगणना करने वाले, अनन्त, अव्यक्त भगवान महापुरुष को नमस्कार है।

श्लोक 18 (bhagavata.5.17.18)

भजे भजन्यारणपादपङ्कजंभगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् । भक्तेष्वलं भावितभूतभावनंभवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् ॥ १८ ॥

bhaje bhajanyāraṇa-pāda-paṅkajaṁ bhagasya kṛtsnasya paraṁ parāyaṇam bhakteṣv alaṁ bhāvita-bhūta-bhāvanaṁ bhavāpahaṁ tvā bhava-bhāvam īśvaram

मैं आपके उन आश्रय देने योग्य चरण-कमलों की उपासना करता हूँ, जो समस्त ऐश्वर्य के परम आश्रय हैं, जो भक्तों के प्रति अत्यंत अनुकूल हैं, जो समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करने वाले हैं, जो संसार-भय को दूर करने वाले हैं — हे ईश्वर, आप ही संसार की उत्पत्ति के कारण भी हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.5.17.19)

न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-र्निरीक्षतो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते । ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसांकस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः ॥ १९ ॥

na yasya māyā-guṇa-citta-vṛttibhir nirīkṣato hy aṇv api dṛṣṭir ajyate īśe yathā no ’jita-manyu-raṁhasāṁ kas taṁ na manyeta jigīṣur ātmanaḥ

जो माया के गुणों की चित्तवृत्तियों से देखते हुए भी अणुमात्र भी आसक्त नहीं होते — हमारे विपरीत, जिनका क्रोध पापों के वेग पर अभी तक विजित नहीं हुआ है — ऐसे प्रभु को कौन ऐसा पुरुष न मानेगा, जो अपने ऊपर विजय पाना चाहता है?

श्लोक 20 (bhagavata.5.17.20)

असद्दृशो यः प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः । न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रियायत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः ॥ २० ॥

asad-dṛśo yaḥ pratibhāti māyayā kṣībeva madhv-āsava-tāmra-locanaḥ na nāga-vadhvo ’rhaṇa īśire hriyā yat-pādayoḥ sparśana-dharṣitendriyāḥ

जो अशुद्ध द‍ृष्टि वालों को माया के कारण मानो मधु के नशे में चूर, ताम्रवर्ण नेत्रों वाले प्रतीत होते हैं — जबकि नागपत्नियाँ भी उनके चरण-स्पर्श मात्र से इन्द्रियों के विह्वल हो जाने के कारण लज्जावश उनकी अर्चना पूर्ण न कर सकीं।

श्लोक 21 (bhagavata.5.17.21)

यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमंत्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः । न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितंभूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु॒ ॥ २१ ॥

yam āhur asya sthiti-janma-saṁyamaṁ tribhir vihīnaṁ yam anantam ṛṣayaḥ na veda siddhārtham iva kvacit sthitaṁ bhū-maṇḍalaṁ mūrdha-sahasra-dhāmasu

जिन्हें ऋषिगण जन्म, स्थिति और संयम — इन तीनों से रहित होने के कारण अनन्त कहते हैं, जिनके सहस्र फणों पर स्थित यह भूमण्डल उन्हें एक सरसों के दाने के समान भी प्रतीत नहीं होता।

श्लोक 22 (bhagavata.5.17.22)

यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान्विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल । यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसावैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥ २२ ॥

yasyādya āsīd guṇa-vigraho mahān vijñāna-dhiṣṇyo bhagavān ajaḥ kila yat-sambhavo ’haṁ tri-vṛtā sva-tejasā vaikārikaṁ tāmasam aindriyaṁ sṛje

जिनसे सर्वप्रथम गुणों के महान् साक्षात् स्वरूप, बुद्धि के आश्रयस्थान, अजन्मा भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए; और जिनसे उनके त्रिविध तेज द्वारा मैं (रुद्र) उत्पन्न हुआ, तथा जो वैकारिक (सात्त्विक), तामस और ऐन्द्रिय (राजस इन्द्रिय-तत्त्व) की सृष्टि करता हूँ।

श्लोक 23 (bhagavata.5.17.23)

एते वयं यस्य वशे महात्मनःस्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः । महानहं वैकृततामसेन्द्रियाःसृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥ २३ ॥

ete vayaṁ yasya vaśe mahātmanaḥ sthitāḥ śakuntā iva sūtra-yantritāḥ mahān ahaṁ vaikṛta-tāmasendriyāḥ sṛjāma sarve yad-anugrahād idam

हम — महान् ब्रह्मा और विकृत-तामस इन्द्रियों वाला मैं — डोरी से बंधे पक्षियों के समान सर्वथा जिनके वश में स्थित हैं, उन्हीं की कृपा से हम सब मिलकर इस सृष्टि की रचना करते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.5.17.24)

यन्निर्मितां कर्ह्यपि कर्मपर्वणींमायां जनोऽयं गुणसर्गमोहितः । न वेद निस्तारणयोगमञ्जसातस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥ २४ ॥

yan-nirmitāṁ karhy api karma-parvaṇīṁ māyāṁ jano ’yaṁ guṇa-sarga-mohitaḥ na veda nistāraṇa-yogam añjasā tasmai namas te vilayodayātmane

जो जीव गुणों की सृष्टि से मोहित होकर आपके द्वारा रचित कर्म-बद्ध माया को पार करने का उपाय स्वयं नहीं जान पाता — हे सृष्टि और प्रलय-स्वरूप प्रभु, आपको नमस्कार है।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18