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पंचम स्कन्ध · अध्याय 19

जम्बूद्वीप का भूगोल

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (bhagavata.5.19.1)

श्रीशुक उवाच किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसन्निकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca kimpuruṣe varṣe bhagavantam ādi-puruṣaṁ lakṣmaṇāgrajaṁ sītābhirāmaṁ rāmaṁ tac-caraṇa-sannikarṣābhirataḥ parama-bhāgavato hanumān saha kimpuruṣair avirata-bhaktir upāste.

किम्पुरुष-वर्ष में परम भागवत हनुमान, आदिपुरुष भगवान राम — लक्ष्मण के अग्रज, सीता के प्रियतम — के चरणों की समीपता में लीन रहकर, किम्पुरुषों सहित अविरत भक्ति से उनकी उपासना करते हैं।

श्लोक 2 (bhagavata.5.19.2)

आर्ष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥ २ ॥

ārṣṭiṣeṇena saha gandharvair anugīyamānāṁ parama-kalyāṇīṁ bhartṛ-bhagavat-kathāṁ samupaśṛṇoti svayaṁ cedaṁ gāyati.

आर्ष्टिषेण के साथ वे गन्धर्वों द्वारा गाई जा रही अपने स्वामी की परम कल्याणकारी कथा को निरंतर सुनते हैं, और स्वयं भी यह गाते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.5.19.3)

ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥ ३ ॥

oṁ namo bhagavate uttamaślokāya nama ārya-lakṣaṇa-śīla-vratāya nama upaśikṣitātmana upāsita-lokāya namaḥ sādhu-vāda-nikaṣaṇāya namo brahmaṇya-devāya mahā-puruṣāya mahā-rājāya nama iti.

ॐ, उत्तम कीर्ति वाले भगवान को नमस्कार है। आर्य-लक्षण, शील और व्रत वाले, सुशिक्षित आत्मा, सम्पूर्ण जगत् द्वारा उपासित, सत्य-वाणी की कसौटी-स्वरूप, ब्राह्मणों के देवता, महापुरुष, महाराज को नमस्कार है।

श्लोक 4 (bhagavata.5.19.4)

यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक्प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

yat tad viśuddhānubhava-mātram ekaṁ sva-tejasā dhvasta-guṇa-vyavastham pratyak praśāntaṁ sudhiyopalambhanaṁ hy anāma-rūpaṁ nirahaṁ prapadye

जो केवल विशुद्ध अनुभवमात्र, एक, अपने ही तेज से गुणों की व्यवस्था को नष्ट कर देने वाला, अन्तर्मुखी, शान्त, सद्बुद्धि द्वारा ही उपलब्ध होने वाला, नाम-रूप और अहंकार से रहित है — उसकी मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 5 (bhagavata.5.19.5)

मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥ ५ ॥

martyāvatāras tv iha martya-śikṣaṇaṁ rakṣo-vadhāyaiva na kevalaṁ vibhoḥ kuto ’nyathā syād ramataḥ sva ātmanaḥ sītā-kṛtāni vyasanānīśvarasya

प्रभु का यह मर्त्य-अवतार केवल राक्षस-वध के लिए नहीं, अपितु मर्त्यों को शिक्षा देने के लिए भी था; अन्यथा अपने ही आत्मा में रमण करने वाले, आत्मतृप्त ईश्वर को सीता के कारण उत्पन्न कष्ट कैसे हो सकते थे?

श्लोक 6 (bhagavata.5.19.6)

न वै स आत्मात्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ ६ ॥

na vai sa ātmātmavatāṁ suhṛttamaḥ saktas tri-lokyāṁ bhagavān vāsudevaḥ na strī-kṛtaṁ kaśmalam aśnuvīta na lakṣmaṇaṁ cāpi vihātum arhati

वे भगवान वासुदेव, आत्मवानों के परम सुहृद्, आत्मा-स्वरूप, तीनों लोकों में कहीं आसक्त नहीं हैं; वे स्त्री के कारण उत्पन्न मलिनता को ग्रहण नहीं कर सकते, और न ही लक्ष्मण को त्यागना उनके लिए उचित है।

श्लोक 7 (bhagavata.5.19.7)

न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ्न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस- श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥ ७ ॥

na janma nūnaṁ mahato na saubhagaṁ na vāṅ na buddhir nākṛtis toṣa-hetuḥ tair yad visṛṣṭān api no vanaukasaś cakāra sakhye bata lakṣmaṇāgrajaḥ

निश्चय ही न उच्च जन्म, न सौभाग्य, न वाणी, न बुद्धि और न ही रूप उनकी प्रसन्नता का कारण है — क्योंकि इनसे रहित होते हुए भी हम वनवासियों को लक्ष्मण के अग्रज ने सखा-भाव से स्वीकार किया, यह कितना अद्भुत है!

श्लोक 8 (bhagavata.5.19.8)

सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥ ८ ॥

suro ’suro vāpy atha vānaro naraḥ sarvātmanā yaḥ sukṛtajñam uttamam bhajeta rāmaṁ manujākṛtiṁ hariṁ ya uttarān anayat kosalān divam iti

देव हो या असुर, वानर हो या मनुष्य — जो भी सर्वात्मना सुकृत को जानने वाले, सर्वश्रेष्ठ, मनुष्य-रूपधारी हरि, राम की उपासना करता है, जिन्होंने उत्तर कोसलवासियों को स्वर्ग तक पहुँचाया, वह उन्हें प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (bhagavata.5.19.9)

भारतेऽपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्य आकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपशमोपरमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति ॥ ९ ॥

bhārate ’pi varṣe bhagavān nara-nārāyaṇākhya ākalpāntam upacita-dharma-jñāna-vairāgyaiśvaryopaśamoparamātmopalambhanam anugrahāyātmavatām anukampayā tapo ’vyakta-gatiś carati.

भारतवर्ष में भी भगवान नर-नारायण नामक स्वरूप में, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को पूर्णता तक बढ़ाते हुए, कल्प के अन्त तक अव्यक्त गति से तप करते हैं — आत्मवान् भक्तों पर अनुकम्पा करके उन्हें उपशम और आत्म-साक्षात्कार प्रदान करने हेतु।

श्लोक 10 (bhagavata.5.19.10)

तं भगवान्नारदो वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्यां साङ्ख्ययोगाभ्यां भगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्यमाणः परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति ॥ १० ॥

taṁ bhagavān nārado varṇāśramavatībhir bhāratībhiḥ prajābhir bhagavat-proktābhyāṁ sāṅkhya-yogābhyāṁ bhagavad-anubhāvopavarṇanaṁ sāvarṇer upadekṣyamāṇaḥ parama-bhakti-bhāvenopasarati idaṁ cābhigṛṇāti.

उन्हें, भगवान नारद, वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने वाली भारतवासी प्रजा के लिए, भगवान द्वारा ही कथित सांख्य और योग के माध्यम से भगवद्-महिमा का वर्णन सावर्णि (मनु) को सिखाने हेतु, परम भक्ति-भाव से समीप जाकर, यह स्तोत्र गाते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.5.19.11)

ॐ नमो भगवते उपशमशीलायोपरतानात्म्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति ॥ ११ ॥

oṁ namo bhagavate upaśama-śīlāyoparatānātmyāya namo ’kiñcana-vittāya ṛṣi-ṛṣabhāya nara-nārāyaṇāya paramahaṁsa-parama-gurave ātmārāmādhipataye namo nama iti.

ॐ, उपशम-स्वभाव, पृथक् आत्म-भाव से रहित भगवान को नमस्कार है। अकिंचनों के धन को नमस्कार है। ऋषियों में श्रेष्ठ, परमहंसों के परम गुरु, आत्माराम जनों के अधिपति नर-नारायण को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 12 (bhagavata.5.19.12)

गायति चेदम्— कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः । द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥ १२ ॥

gāyati cedam — kartāsya sargādiṣu yo na badhyate na hanyate deha-gato ’pi daihikaiḥ draṣṭur na dṛg yasya guṇair vidūṣyate tasmai namo ’sakta-vivikta-sākṣiṇe

और वे यह गाते हैं — जो सृष्टि आदि के कर्ता होते हुए भी बद्ध नहीं होते, जो देहधारी होते हुए भी देह-सम्बन्धी कष्टों से नहीं मरते, जिनकी द‍ृष्टि द‍ृश्य के गुणों से दूषित नहीं होती — उस असक्त, विशुद्ध साक्षी को नमस्कार है।

श्लोक 13 (bhagavata.5.19.13)

इदं हि योगेश्वर योगनैपुणं हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत् । यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो भक्त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः ॥ १३ ॥

idaṁ hi yogeśvara yoga-naipuṇaṁ hiraṇyagarbho bhagavāñ jagāda yat yad anta-kāle tvayi nirguṇe mano bhaktyā dadhītojjhita-duṣkalevaraḥ

हे योगेश्वर, यह वही योग-कौशल है, जो भगवान हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) ने कहा था — कि अन्तकाल में इस दुष्कलेवर को त्यागकर भक्ति द्वारा निर्गुण आप में मन को स्थिर करना चाहिए।

श्लोक 14 (bhagavata.5.19.14)

यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् । शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद् यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥

yathaihikāmuṣmika-kāma-lampaṭaḥ suteṣu dāreṣu dhaneṣu cintayan śaṅketa vidvān kukalevarātyayād yas tasya yatnaḥ śrama eva kevalam

जैसे इहलोक-परलोक के सुख का लोभी, पुत्र, पत्नी और धन की चिन्ता में डूबा हुआ मनुष्य इस दुष्कलेवर के नाश से आशंकित रहता है, वैसे ही यदि विद्वान भी उतना ही आसक्त रहे, तो उसका सारा प्रयास केवल व्यर्थ श्रम ही है।

श्लोक 15 (bhagavata.5.19.15)

तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां त्वन्माययाहंममतामधोक्षज । भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति ॥ १५ ॥

tan naḥ prabho tvaṁ kukalevarārpitāṁ tvan-māyayāhaṁ-mamatām adhokṣaja bhindyāma yenāśu vayaṁ sudurbhidāṁ vidhehi yogaṁ tvayi naḥ svabhāvam iti

अतः हे प्रभो, हे अधोक्षज! आपकी माया द्वारा इस दुष्कलेवर में अर्पित इस अत्यंत दुर्भेद्य अहं-ममता को हम शीघ्र ही भेद सकें, ऐसा करें, और हमें अपने में वह योग प्रदान करें, जो हमारा स्वभाव है।

श्लोक 16 (bhagavata.5.19.16)

भारतेऽप्यस्मिन्वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवो मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभः कूटकः कोल्लकः सह्यो देवगिरिऋर्ष्यमूकः श्रीशैलो वेङ्कटो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च सन्त्यसङ्ख्याताः ॥ १६ ॥

bhārate ’py asmin varṣe saric-chailāḥ santi bahavo malayo maṅgala-prastho mainākas trikūṭa ṛṣabhaḥ kūṭakaḥ kollakaḥ sahyo devagirir ṛṣyamūkaḥ śrī-śailo veṅkaṭo mahendro vāridhāro vindhyaḥ śuktimān ṛkṣagiriḥ pāriyātro droṇaś citrakūṭo govardhano raivatakaḥ kakubho nīlo gokāmukha indrakīlaḥ kāmagirir iti cānye ca śata-sahasraśaḥ śailās teṣāṁ nitamba-prabhavā nadā nadyaś ca santy asaṅkhyātāḥ.

इस भारतवर्ष में भी अनेक पर्वत और नदियाँ हैं — मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, कोल्लक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, शुक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील, कामगिरि तथा इनके अतिरिक्त लाखों अन्य पर्वत भी हैं, जिनकी घाटियों से असंख्य बड़ी-छोटी नदियाँ निकलती हैं।

श्लोक 17 (bhagavata.5.19.17)

एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति ॥ १७ ॥

etāsām apo bhāratyaḥ prajā nāmabhir eva punantīnām ātmanā copaspṛśanti;

भारतवासी इन नदियों के जल का, जो अपने नाम-मात्र से ही पवित्र करने वाली हैं, स्वयं स्पर्श कर अपने को पवित्र करते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.5.19.18)

चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्मृतिऋर्षिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रूश्चन्द्रभागा मरुद्वृधा वितस्ता असिक्नी विश्वेति महानद्यः ॥ १८ ॥

candravasā tāmraparṇī avaṭodā kṛtamālā vaihāyasī kāverī veṇī payasvinī śarkarāvartā tuṅgabhadrā kṛṣṇāveṇyā bhīmarathī godāvarī nirvindhyā payoṣṇī tāpī revā surasā narmadā carmaṇvatī sindhur andhaḥ śoṇaś ca nadau mahānadī vedasmṛtir ṛṣikulyā trisāmā kauśikī mandākinī yamunā sarasvatī dṛṣadvatī gomatī sarayū rodhasvatī saptavatī suṣomā śatadrūś candrabhāgā marudvṛdhā vitastā asiknī viśveti mahā-nadyaḥ.

उनके नाम हैं — चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावर्ता, तुंगभद्रा, कृष्णावेण्या, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, पयोष्णी, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती, सिन्धु और शोण नामक दो महानद, महानदी, वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, द‍ृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्नी और विश्वा — ये सभी महानदियाँ हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.5.19.19)

अस्मिन्नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्व्यः आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति ॥ १९ ॥

asminn eva varṣe puruṣair labdha-janmabhiḥ śukla-lohita-kṛṣṇa-varṇena svārabdhena karmaṇā divya-mānuṣa-nāraka-gatayo bahvya ātmana ānupūrvyeṇa sarvā hy eva sarveṣāṁ vidhīyante yathā-varṇa-vidhānam apavargaś cāpi bhavati.

इसी वर्ष में जन्म लेने वाले पुरुषों के लिए, अपने ही आरम्भ किए गए शुक्ल, रक्त या कृष्ण वर्ण वाले कर्म के अनुसार, दिव्य, मानुष अथवा नारकीय गतियाँ यथाक्रम विहित होती हैं, अपने-अपने वर्ण की विधि के अनुसार, और यहीं मोक्ष भी सम्भव है।

श्लोक 20 (bhagavata.5.19.20)

योऽसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने परमात्मनि वासुदेवेऽनन्यनिमित्तभक्तियोगलक्षणो नानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धनद्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसङ्गः ॥ २० ॥

yo ’sau bhagavati sarva-bhūtātmany anātmye ’nirukte ’nilayane paramātmani vāsudeve ’nanya-nimitta-bhakti-yoga-lakṣaṇo nānā-gati-nimittāvidyā-granthi-randhana-dvāreṇa yadā hi mahā-puruṣa-puruṣa-prasaṅgaḥ.

सर्वभूतात्मा, निरात्म्य, अनिर्वचनीय, निरालय, परमात्मा भगवान वासुदेव के प्रति जो अनन्य निमित्त वाली भक्ति-योग-लक्षणा भक्ति है — वह तभी सम्भव होती है, जब विविध गतियों के कारणभूत अविद्या की गाँठ को भेदने वाले द्वार से महापुरुष के भक्तों का संग प्राप्त होता है।

श्लोक 21 (bhagavata.5.19.21)

एतदेव हि देवा गायन्ति— अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः । यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः ॥ २१ ॥

etad eva hi devā gāyanti — aho amīṣāṁ kim akāri śobhanaṁ prasanna eṣāṁ svid uta svayaṁ hariḥ yair janma labdhaṁ nṛṣu bhāratājire mukunda-sevaupayikaṁ spṛhā hi naḥ

यही देवगण गाते हैं — अहो! इन्होंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, अथवा स्वयं हरि ही इन पर प्रसन्न हो गए हैं, कि इन्हें भारत-भूमि में मनुष्यों के बीच वह जन्म मिला है, जो मुकुन्द की सेवा के अनुकूल है — जिसकी हमें भी लालसा है।

श्लोक 22 (bhagavata.5.19.22)

किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै- र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना । न यत्र नारायणपादपङ्कज- स्मृतिः प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात् ॥ २२ ॥

kiṁ duṣkarair naḥ kratubhis tapo-vratair dānādibhir vā dyujayena phalgunā na yatra nārāyaṇa-pāda-paṅkaja- smṛtiḥ pramuṣṭātiśayendriyotsavāt

हमें दुष्कर यज्ञों, तप, व्रत, दान आदि से, अथवा स्वर्ग की उस तुच्छ विजय से क्या लाभ, जिसमें अत्यधिक इन्द्रिय-भोग के कारण नारायण के चरण-कमलों की स्मृति ही नष्ट हो जाती है?

श्लोक 23 (bhagavata.5.19.23)

कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात् क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् । क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः सन्न्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ॥ २३ ॥

kalpāyuṣāṁ sthānajayāt punar-bhavāt kṣaṇāyuṣāṁ bhārata-bhūjayo varam kṣaṇena martyena kṛtaṁ manasvinaḥ sannyasya saṁyānty abhayaṁ padaṁ hareḥ

कल्प-भर आयु वाले स्थान की विजय से, जो पुनर्जन्म देने वाली है, क्षणभंगुर आयु वाली भारत-भूमि की विजय श्रेष्ठ है। बुद्धिमान पुरुष क्षणभर में किए गए मर्त्य कर्मों का संन्यास कर हरि के अभय पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.5.19.24)

न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः । न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ २४ ॥

na yatra vaikuṇṭha-kathā-sudhāpagā na sādhavo bhāgavatās tadāśrayāḥ na yatra yajñeśa-makhā mahotsavāḥ sureśa-loko ’pi na vai sa sevyatām

जहाँ वैकुण्ठ-कथा की अमृत-सरिता प्रवाहित नहीं होती, जहाँ उसका आश्रय लेने वाले साधु भागवत नहीं हैं, जहाँ यज्ञेश के महान् उत्सव नहीं होते — वह स्थान, चाहे वह इन्द्रलोक ही क्यों न हो, सेवन के योग्य नहीं है।

श्लोक 25 (bhagavata.5.19.25)

प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् । न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ २५ ॥

prāptā nṛ-jātiṁ tv iha ye ca jantavo jñāna-kriyā-dravya-kalāpa-sambhṛtām na vai yaterann apunar-bhavāya te bhūyo vanaukā iva yānti bandhanam

जो प्राणी यहाँ ज्ञान, क्रिया और साधन-सामग्री से सम्पन्न मनुष्य-जन्म पाकर भी पुनर्जन्म से मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करते, वे वन के मुक्त पशु-पक्षियों के समान पुनः बन्धन में पड़ जाते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.5.19.26)

यैः श्रद्धया बर्हिषि भागशो हवि- र्निरुप्तमिष्टं विधिमन्त्रवस्तुतः । एकः पृथङ्नामभिराहुतो मुदा गृह्णाति पूर्णः स्वयमाशिषां प्रभुः ॥ २६ ॥

yaiḥ śraddhayā barhiṣi bhāgaśo havir niruptam iṣṭaṁ vidhi-mantra-vastutaḥ ekaḥ pṛthaṅ-nāmabhir āhuto mudā gṛhṇāti pūrṇaḥ svayam āśiṣāṁ prabhuḥ

जो लोग श्रद्धापूर्वक कुश पर विधि, मन्त्र और द्रव्य के अनुसार भाग-भाग करके हवि अर्पित करते हैं — यद्यपि पृथक्-पृथक् नामों से आहूत, फिर भी वह एक, पूर्ण, सभी आशीर्वादों के स्वामी प्रभु ही स्वयं प्रसन्नतापूर्वक उसे ग्रहण करते हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.5.19.27)

सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः । स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ २७ ॥

satyaṁ diśaty arthitam arthito nṛṇāṁ naivārthado yat punar arthitā yataḥ svayaṁ vidhatte bhajatām anicchatām icchāpidhānaṁ nija-pāda-pallavam

मनुष्यों की माँगी हुई वस्तु वे सत्य में देते हैं, फिर भी वे वास्तविक अर्थदाता नहीं हैं, क्योंकि उससे पुनः माँग उत्पन्न होती है; परन्तु जो बिना इच्छा के भक्ति करते हैं, उन्हें वे स्वयं अपने चरण-कमल प्रदान करते हैं, जो समस्त इच्छाओं को ढक देते हैं।

श्लोक 28 (bhagavata.5.19.28)

यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं स्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम् । तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्याद् वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति ॥ २८ ॥

yady atra naḥ svarga-sukhāvaśeṣitaṁ sviṣṭasya sūktasya kṛtasya śobhanam tenājanābhe smṛtimaj janma naḥ syād varṣe harir yad-bhajatāṁ śaṁ tanoti

यदि यहाँ हमारे स्विष्ट यज्ञ, सुन्दर सूक्त-पाठ और सुकृत का कोई शुभ अंश शेष रह गया हो, तो उससे हमें अजनाभवर्ष (भारतवर्ष) में स्मृतिसम्पन्न जन्म प्राप्त हो, जहाँ हरि अपने भक्तों का कल्याण करते हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.5.19.29)

श्रीशुक उवाच जम्बूद्वीपस्य च राजन्नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भिरुपकल्पितान् ॥ २९ ॥

śrī-śuka uvāca jambūdvīpasya ca rājann upadvīpān aṣṭau haika upadiśanti sagarātmajair aśvānveṣaṇa imāṁ mahīṁ parito nikhanadbhir upakalpitān;

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! जम्बूद्वीप के विषय में कुछ विद्वान आठ उपद्वीपों का भी उपदेश देते हैं, जो सगर के पुत्रों द्वारा अश्व की खोज में इस समस्त पृथ्वी को चारों ओर खोदने से बने थे।

श्लोक 30 (bhagavata.5.19.30)

तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणः पाञ्चजन्यः सिंहलो लङ्केति ॥ ३० ॥

tad yathā svarṇaprasthaś candraśukla āvartano ramaṇako mandarahariṇaḥ pāñcajanyaḥ siṁhalo laṅketi.

उनके नाम इस प्रकार हैं — स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण, पाञ्चजन्य, सिंहल और लंका।

श्लोक 31 (bhagavata.5.19.31)

एवं तव भारतोत्तम जम्बूद्वीपवर्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति ॥ ३१ ॥

evaṁ tava bhāratottama jambūdvīpa-varṣa-vibhāgo yathopadeśam upavarṇita iti.

हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जम्बूद्वीप के वर्षों का विभाजन आपको, जैसा मुझे सिखाया गया, वैसा ही वर्णन करके बताया गया।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20