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पंचम स्कन्ध · अध्याय 23

शिशुमार चक्र

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (bhagavata.5.23.1)

श्रीशुक उवाच अथ तस्मात्परतस्त्रयोदशलक्षयोजनान्तरतो यत्तद्विष्णोः परमं पदमभिवदन्ति यत्र ह महाभागवतो ध्रुव औत्तानपादिरग्निनेन्द्रेण प्रजापतिना कश्यपेन धर्मेण च समकालयुग्भिः सबहुमानं दक्षिणतः क्रियमाण इदानीमपि कल्पजीविनामाजीव्य उपास्ते तस्येहानुभाव उपवर्णितः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca atha tasmāt paratas trayodaśa-lakṣa-yojanāntarato yat tad viṣṇoḥ paramaṁ padam abhivadanti yatra ha mahā-bhāgavato dhruva auttānapādir agninendreṇa prajāpatinā kaśyapena dharmeṇa ca samakāla-yugbhiḥ sabahu-mānaṁ dakṣiṇataḥ kriyamāṇa idānīm api kalpa-jīvinām ājīvya upāste tasyehānubhāva upavarṇitaḥ.

श्री शुकदेव जी ने कहा — इसके आगे तेरह लाख योजन की दूरी पर वह स्थान है, जिसे विद्वान विष्णु का परम पद कहते हैं, जहाँ महाभागवत उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव, कल्पपर्यन्त जीवित रहने वालों के जीवन-आधार बनकर आज भी विराजमान हैं; अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, कश्यप और धर्म — एक ही समय पर वहाँ उपस्थित होकर उन्हें अत्यंत आदर के साथ अपने दाहिने रखकर प्रदक्षिणा करते हैं। उनकी महिमा का वर्णन यहाँ पहले ही किया जा चुका है।

श्लोक 2 (bhagavata.5.23.2)

स हि सर्वेषां ज्योतिर्गणानां ग्रहनक्षत्रादीनामनिमिषेणाव्यक्तरंहसा भगवता कालेन भ्राम्यमाणानां स्थाणुरिवावष्टम्भ ईश्वरेण विहितः शश्वदवभासते ॥ २ ॥

sa hi sarveṣāṁ jyotir-gaṇānāṁ graha-nakṣatrādīnām animiṣeṇāvyakta-raṁhasā bhagavatā kālena bhrāmyamāṇānāṁ sthāṇur ivāvaṣṭambha īśvareṇa vihitaḥ śaśvad avabhāsate.

वे (ध्रुव) ही, ईश्वर द्वारा स्थापित अचल आधार के समान, अनिमेष, अव्यक्त वेग वाले भगवान काल द्वारा घुमाए जाते हुए समस्त ज्योतिर्गणों — ग्रह, नक्षत्र आदि — के आधार-स्तम्भ के रूप में सदा प्रकाशित रहते हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.5.23.3)

यथा मेढीस्तम्भ आक्रमणपशवः संयोजितास्त्रिभिस्त्रिभिः सवनैर्यथास्थानं मण्डलानि चरन्त्येवं भगणा ग्रहादय एतस्मिन्नन्तर्बहिर्योगेन कालचक्र आयोजिता ध्रुवमेवावलम्ब्य वायुनोदीर्यमाणा आकल्पान्तं परिचङ्क्रमन्ति नभसि यथा मेघाः श्येनादयो वायुवशाः कर्मसारथयः परिवर्तन्ते एवं ज्योतिर्गणाः प्रकृतिपुरुषसंयोगानुगृहीताः कर्मनिर्मितगतयो भुवि न पतन्ति ॥ ३ ॥

yathā meḍhīstambha ākramaṇa-paśavaḥ saṁyojitās tribhis tribhiḥ savanair yathā-sthānaṁ maṇḍalāni caranty evaṁ bhagaṇā grahādaya etasminn antar-bahir-yogena kāla-cakra āyojitā dhruvam evāvalambya vāyunodīryamāṇā ākalpāntaṁ paricaṅ kramanti nabhasi yathā meghāḥ śyenādayo vāyu-vaśāḥ karma-sārathayaḥ parivartante evaṁ jyotirgaṇāḥ prakṛti-puruṣa-saṁyogānugṛhītāḥ karma-nirmita-gatayo bhuvi na patanti.

जैसे केन्द्रीय खम्भे से बँधे हुए बैल तीन-तीन चक्करों में अपने-अपने स्थान के अनुसार मण्डलों में चलते हैं, वैसे ही नक्षत्र, ग्रह आदि के समूह, इस काल-चक्र से भीतर-बाहर के सम्बन्ध द्वारा बँधे हुए, केवल ध्रुव का ही अवलम्बन लेकर, वायु द्वारा प्रेरित होकर कल्पान्त तक भ्रमण करते रहते हैं। जैसे आकाश में बादल चलते हैं, अथवा जैसे बाज आदि पक्षी वायु के अधीन होते हुए भी अपने कर्म से संचालित होकर उड़ते हैं और गिरते नहीं — वैसे ही प्रकृति-पुरुष के संयोग से अनुगृहीत, कर्म-निर्मित गति वाले ज्योतिर्गण पृथ्वी पर नहीं गिरते।

श्लोक 4 (bhagavata.5.23.4)

केचनैतज्ज्योतिरनीकं शिशुमारसंस्थानेन भगवतो वासुदेवस्य योगधारणायामनुवर्णयन्ति ॥ ४ ॥

kecanaitaj jyotir-anīkaṁ śiśumāra-saṁsthānena bhagavato vāsudevasya yoga-dhāraṇāyām anuvarṇayanti.

कुछ लोग इस ज्योति-समूह की रचना को भगवान वासुदेव के योग-ध्यान हेतु शिशुमार (जलचर) के आकार में वर्णित करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.5.23.5)

यस्य पुच्छाग्रेऽवाक्शिरसः कुण्डलीभूतदेहस्य ध्रुव उपकल्पितस्तस्य लाङ्गूले प्रजापतिरग्निरिन्द्रो धर्म इति पुच्छमूले धाता विधाता च कट्यां सप्तर्षयः । तस्य दक्षिणावर्तकुण्डलीभूतशरीरस्य यान्युदगयनानि दक्षिणपार्श्वे तु नक्षत्राण्युपकल्पयन्ति दक्षिणायनानि तु सव्ये । यथा शिशुमारस्य कुण्डलाभोगसन्निवेशस्य पार्श्वयोरुभयोरप्यवयवाः समसंख्या भवन्ति । पृष्ठे त्वजवीथी आकाशगङ्गा चोदरतः ॥ ५ ॥

yasya pucchāgre ’vākśirasaḥ kuṇḍalī-bhūta-dehasya dhruva upakalpitas tasya lāṅgūle prajāpatir agnir indro dharma iti puccha-mūle dhātā vidhātā ca kaṭyāṁ saptarṣayaḥ; tasya dakṣiṇāvarta-kuṇḍalī-bhūta-śarīrasya yāny udagayanāni dakṣiṇa-pārśve tu nakṣatrāṇy upakalpayanti dakṣiṇāyanāni tu savye; yathā śiśumārasya kuṇḍalā-bhoga-sanniveśasya pārśvayor ubhayor apy avayavāḥ samasaṅkhyā bhavanti; pṛṣṭhe tv ajavīthī ākāśa-gaṅgā codarataḥ.

उसका शरीर कुण्डलाकार, सिर नीचे की ओर है; उसकी पूँछ के अग्रभाग में ध्रुव स्थापित हैं; पूँछ में ही प्रजापति, अग्नि, इन्द्र और धर्म हैं; पूँछ के मूल में धाता और विधाता हैं; उसके कटि-भाग में सप्तर्षि हैं। दाहिनी ओर मुड़े हुए उसके शरीर के दाहिने पार्श्व में उदगयन के नक्षत्र और बाएँ पार्श्व में दक्षिणायन के नक्षत्र स्थापित हैं। जैसे शिशुमार का कुण्डलाकार स्वरूप है, वैसे ही उसके दोनों पार्श्वों के अंग संख्या में समान हैं। उसकी पीठ पर अजवीथी और उदर में आकाश-गंगा (मन्दाकिनी) है।

श्लोक 6 (bhagavata.5.23.6)

पुनर्वसुपुष्यौ दक्षिणवामयोः श्रोण्योरार्द्राश्लेषे च दक्षिणवामयोः पश्चिमयोः पादयोरभिजिदुत्तराषाढे दक्षिणवामयोर्नासिकयोर्यथासङ्ख्यं श्रवणपूर्वाषाढे दक्षिणवामयोर्लोचनयोर्धनिष्ठा मूलं च दक्षिणवामयोः कर्णयोर्मघादीन्यष्ट नक्षत्राणि दक्षिणायनानि वामपार्श्ववङ्क्रिषु युञ्जीत तथैव मृगशीर्षादीन्युदगयनानि दक्षिणपार्श्ववङ्क्रिषु प्रातिलोम्येन प्रयुञ्जीत शतभिषाज्येष्ठे स्कन्धयोर्दक्षिणवामयोर्न्यसेत् ॥ ६ ॥

punarvasu-puṣyau dakṣiṇa-vāmayoḥ śroṇyor ārdrāśleṣe ca dakṣiṇa-vāmayoḥ paścimayoḥ pādayor abhijid-uttarāṣāḍhe dakṣiṇa-vāmayor nāsikayor yathā-saṅkhyaṁ śravaṇa-pūrvāṣāḍhe dakṣiṇa-vāmayor locanayor dhaniṣṭhā mūlaṁ ca dakṣiṇa-vāmayoḥ karṇayor maghādīny aṣṭa nakṣatrāṇi dakṣiṇāyanāni vāma-pārśva-vaṅkriṣu yuñjīta tathaiva mṛga-śīrṣādīny udagayanāni dakṣiṇa-pārśva-vaṅkriṣu prātilomyena prayuñjīta śatabhiṣā-jyeṣṭhe skandhayor dakṣiṇa-vāmayor nyaset.

उसके दाहिने और बाएँ कूल्हों पर पुनर्वसु और पुष्य, दाहिने और बाएँ पैरों पर आर्द्रा और आश्लेषा, दाहिने और बाएँ नथुनों पर अभिजित और उत्तराषाढ़ा, दाहिने और बाएँ नेत्रों पर श्रवण और पूर्वाषाढ़ा, दाहिने और बाएँ कानों पर धनिष्ठा और मूल नक्षत्र स्थापित हैं। मघा आदि आठ नक्षत्र, जो दक्षिणायन के हैं, उसके बाएँ पार्श्व की पसलियों पर, तथा मृगशिरा आदि आठ नक्षत्र, जो उदगयन के हैं, विपरीत क्रम में उसके दाहिने पार्श्व की पसलियों पर स्थापित करने चाहिए। शतभिषा और ज्येष्ठा उसके दाहिने और बाएँ कन्धों पर रखने चाहिए।

श्लोक 7 (bhagavata.5.23.7)

उत्तराहनावगस्तिरधराहनौ यमो मुखेषु चाङ्गारकः शनैश्चर उपस्थे बृहस्पतिः ककुदि वक्षस्यादित्यो हृदये नारायणो मनसि चन्द्रो नाभ्यामुशना स्तनयोरश्विनौ बुधः प्राणापानयो राहुर्गले केतवः सर्वाङ्गेषु रोमसु सर्वे तारागणाः ॥ ७ ॥

uttarā-hanāv agastir adharā-hanau yamo mukheṣu cāṅgārakaḥ śanaiścara upasthe bṛhaspatiḥ kakudi vakṣasy ādityo hṛdaye nārāyaṇo manasi candro nābhyām uśanā stanayor aśvinau budhaḥ prāṇāpānayo rāhur gale ketavaḥ sarvāṅgeṣu romasu sarve tārā-gaṇāḥ.

ऊपरी जबड़े पर अगस्त्य, निचले जबड़े पर यम, मुख पर मंगल, गुह्य-स्थान पर शनि, ककुद (गर्दन के पीछे) पर बृहस्पति, वक्षस्थल पर सूर्य, तथा हृदय में साक्षात् नारायण हैं। मन में चन्द्रमा, नाभि में शुक्र, दोनों स्तनों पर अश्विनीकुमार हैं। प्राण-अपान में बुध, कण्ठ पर राहु, समस्त अंगों पर केतु, तथा रोमकूपों में समस्त तारागण हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.5.23.8)

एतदु हैव भगवतो विष्णोः सर्वदेवतामयं रूपमहरहः सन्ध्यायां प्रयतो वाग्यतो निरीक्षमाण उपतिष्ठेत नमो ज्योतिर्लोकाय कालायनायानिमिषां पतये महापुरुषायाभिधीमहीति ॥ ८ ॥

etad u haiva bhagavato viṣṇoḥ sarva-devatāmayaṁ rūpam aharahaḥ sandhyāyāṁ prayato vāgyato nirīkṣamāṇa upatiṣṭheta namo jyotir-lokāya kālāyanāyānimiṣāṁ pataye mahā-puruṣāyābhidhīmahīti.

यह वही समस्त देवतामय भगवान विष्णु का रूप है; प्रतिदिन तीनों संध्याओं में मौन और द‍ृष्टि को संयत रखते हुए इसका दर्शन करते हुए इस मंत्र से उपासना करनी चाहिए — हे ज्योतिर्लोक, कालस्वरूप, अनिमेषों के स्वामी, महापुरुष, आपको नमस्कार है, हम आपका ध्यान करते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.5.23.9)

ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं पापापहं मन्त्रकृतां त्रिकालम् । नमस्यतः स्मरतो वा त्रिकालं नश्येत तत्कालजमाशु पापम् ॥ ९ ॥

graharkṣatārāmayam ādhidaivikaṁ pāpāpahaṁ mantra-kṛtāṁ tri-kālam namasyataḥ smarato vā tri-kālaṁ naśyeta tat-kālajam āśu pāpam

ग्रह, नक्षत्र और तारामय, आधिदैविक, पाप को दूर करने वाले इस मंत्र का जो तीनों समय जप, नमस्कार अथवा स्मरण करता है, उसका उस काल में उत्पन्न पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है।

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