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पंचम स्कन्ध · अध्याय 8

राजा भरत और मृग-शावक

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (bhagavata.5.8.1)

श्रीशुक उवाच एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca ekadā tu mahā-nadyāṁ kṛtābhiṣeka-naiyamikāvaśyako brahmākṣaram abhigṛṇāno muhūrta-trayam udakānta upaviveśa.

श्रीशुकदेव ने कहा — एक दिन, महानदी में स्नान और अपने नित्य आवश्यक कर्मों को पूर्ण कर, वे प्रणव (ॐकार) ब्रह्माक्षर का जप करते हुए जल के तट पर तीन मुहूर्त तक बैठे रहे।

श्लोक 2 (bhagavata.5.8.2)

तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २ ॥

tatra tadā rājan hariṇī pipāsayā jalāśayābhyāśam ekaivopajagāma.

हे राजन्! उसी समय एक हिरणी अकेली प्यास से व्याकुल होकर उस जलाशय के निकट आई।

श्लोक 3 (bhagavata.5.8.3)

तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत् ॥ ३ ॥

tayā pepīyamāna udake tāvad evāvidūreṇa nadato mṛga-pater unnādo loka-bhayaṅkara udapatat.

वह जब जल पी ही रही थी कि उसी समय समीप ही कहीं से एक सिंह की भयंकर गर्जना, जो सबको भयभीत कर देने वाली थी, गूँज उठी।

श्लोक 4 (bhagavata.5.8.4)

तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपिहरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम ॥ ४ ॥

tam upaśrutya sā mṛga-vadhūḥ prakṛti-viklavā cakita-nirīkṣaṇā sutarām api hari-bhayābhiniveśa-vyagra-hṛdayā pāriplava-dṛṣṭir agata-tṛṣā bhayāt sahasaivoccakrāma.

यह सुनकर स्वभाव से ही भीरु, सशंकित दृष्टि वाली वह हिरणी, सिंह के भय से हृदय में अत्यन्त व्याकुल होकर, चंचल नेत्रों से इधर-उधर देखती हुई, प्यास बुझाए बिना ही, भय के मारे सहसा वहाँ से कूद पड़ी।

श्लोक 5 (bhagavata.5.8.5)

तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात ॥ ५ ॥

tasyā utpatantyā antarvatnyā uru-bhayāvagalito yoni-nirgato garbhaḥ srotasi nipapāta.

वह गर्भवती थी; उस भारी भय के कारण छलाँग लगाते ही उसका गर्भ योनि से निकलकर नदी की धारा में जा गिरा।

श्लोक 6 (bhagavata.5.8.6)

तत्प्रसवोत्सर्पणभयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार ॥ ६ ॥

tat-prasavotsarpaṇa-bhaya-khedāturā sva-gaṇena viyujyamānā kasyāñcid daryāṁ kṛṣṇa-sārasatī nipapātātha ca mamāra.

उस समय के प्रसव, कूदने, भय और थकावट से पीड़ित तथा अपने झुण्ड से बिछुड़ी हुई वह काली हिरणी किसी कन्दरा में गिर पड़ी, और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

श्लोक 7 (bhagavata.5.8.7)

तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभिवीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षिर्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥ ७ ॥

taṁ tv eṇa-kuṇakaṁ kṛpaṇaṁ srotasānūhyamānam abhivīkṣyāpaviddhaṁ bandhur ivānukampayā rājarṣir bharata ādāya mṛta-mātaram ity āśrama-padam anayat.

उस असहाय, धारा में बहते हुए मृग-शावक को देखकर, राजर्षि भरत ने उसे किसी बन्धु के समान करुणावश उठा लिया, और यह जानकर कि इसकी माता मर चुकी है, उसे अपने आश्रम ले आए।

श्लोक 8 (bhagavata.5.8.8)

तस्य ह वा एणकुणक उच्चैरेतस्मिन् कृतनिजाभिमानस्याहरहस्तत्पोषणपालनलालनप्रीणनानुध्यानेनात्मनियमाः सहयमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन् ॥ ८ ॥

tasya ha vā eṇa-kuṇaka uccair etasmin kṛta-nijābhimānasyāhar-ahas tat-poṣaṇa-pālana-lālana-prīṇanānudhyānenātma-niyamāḥ saha-yamāḥ puruṣa-paricaryādaya ekaikaśaḥ katipayenāhar-gaṇena viyujyamānāḥ kila sarva evodavasan.

उस मृग-शावक के प्रति उन्होंने इतना गहरा ममत्व कर लिया कि उसके पोषण, पालन, दुलार और प्रसन्नता के निरन्तर चिन्तन में लगे रहने के कारण उनके अपने नियम, यम और भगवद्-सेवा आदि सभी नियम एक-एक करके थोड़े ही दिनों में छूटते चले गए और अन्ततः सब समाप्त हो गए।

श्लोक 9 (bhagavata.5.8.9)

अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद् बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा ॥ ९ ॥

aho batāyaṁ hariṇa-kuṇakaḥ kṛpaṇa īśvara-ratha-caraṇa-paribhramaṇa-rayeṇa sva-gaṇa-suhṛd-bandhubhyaḥ parivarjitaḥ śaraṇaṁ ca mopasādito mām eva mātā-pitarau bhrātṛ-jñātīn yauthikāṁś caivopeyāya nānyaṁ kañcana veda mayy ati-visrabdhaś cāta eva mayā mat-parāyaṇasya poṣaṇa-pālana-prīṇana-lālanam anasūyunānuṣṭheyaṁ śaraṇyopekṣā-doṣa-viduṣā.

वे मन-ही-मन सोचने लगे — हाय! यह असहाय मृग-शावक, काल के रथ-चक्र की गति से अपने कुटुम्ब, मित्रों और बन्धुओं से बिछुड़कर मेरी शरण में आ गया है। यह मुझे ही अपना माता-पिता, भाई और सम्बन्धी मानता है, और मुझ पर पूर्ण विश्वास करता है। अतः जो कोई इस पर आश्रित होकर उस पर विश्वास करता है, उसके प्रति ईर्ष्या न रखकर, इस दोष को समझने वाले सज्जन पुरुष को उसका पोषण, पालन, प्रसन्नता और दुलार अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 10 (bhagavata.5.8.10)

नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते ॥ १० ॥

nūnaṁ hy āryāḥ sādhava upaśama-śīlāḥ kṛpaṇa-suhṛda evaṁ-vidhārthe svārthān api gurutarān upekṣante.

निश्चय ही, आर्य पुरुष, जो शान्तस्वभाव के साधु होते हैं तथा असहायों के सच्चे मित्र होते हैं, ऐसे अवसरों पर अपने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्वार्थों की भी उपेक्षा कर देते हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.5.8.11)

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्नानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११ ॥

iti kṛtānuṣaṅga āsana-śayanāṭana-snānāśanādiṣu saha mṛga-jahunā snehānubaddha-hṛdaya āsīt.

इस प्रकार उससे घनिष्ठता कर, बैठने, सोने, घूमने, स्नान करने और भोजन करने में भी उस मृग-शिशु के साथ ही रहकर, उनका हृदय स्नेह के बन्धन में बँध गया।

श्लोक 12 (bhagavata.5.8.12)

कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति ॥ १२ ॥

kuśa-kusuma-samit-palāśa-phala-mūlodakāny āhariṣyamāṇo vṛkasālā-vṛkādibhyo bhayam āśaṁsamāno yadā saha hariṇa-kuṇakena vanaṁ samāviśati.

जब वे कुश, पुष्प, समिधा, पत्ते, फल, मूल तथा जल लाने के लिए वन में जाते, तो भेड़िये, कुत्ते आदि से मृग-शावक को भय होने की आशंका से उसे भी अपने साथ ले जाते।

श्लोक 13 (bhagavata.5.8.13)

पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप ॥ १३ ॥

pathiṣu ca mugdha-bhāvena tatra tatra viṣakta-mati-praṇaya-bhara-hṛdayaḥ kārpaṇyāt skandhenodvahati evam utsaṅga urasi cādhāyopalālayan mudaṁ paramām avāpa.

मार्ग में भी वह अपनी मुग्ध चेष्टाओं से जहाँ-तहाँ उलझ जाता, तो वे अपने स्नेह-भरे हृदय से, दयावश उसे कंधे पर उठा लेते; कभी गोद में, कभी छाती से लगाकर उसे दुलारते हुए वे परम आनन्द का अनुभव करते।

श्लोक 14 (bhagavata.5.8.14)

क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति ॥ १४ ॥

kriyāyāṁ nirvartyamānāyām antarāle ’py utthāyotthāya yadainam abhicakṣīta tarhi vāva sa varṣa-patiḥ prakṛti-sthena manasā tasmā āśiṣa āśāste svasti stād vatsa te sarvata iti.

यहाँ तक कि यज्ञ-कर्म करते समय भी, बीच-बीच में उठकर उसे देखते, और जब उसे सुरक्षित देख लेते, तो वे भूपति सन्तुष्ट मन से उसे आशीर्वाद देते — "हे वत्स, तुम्हारा सर्वत्र कल्याण हो।"

श्लोक 15 (bhagavata.5.8.15)

अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपणः सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणक विरहविह्वलहृदयसन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभिरम्भित इति होवाच ॥ १५ ॥

anyadā bhṛśam udvigna-manā naṣṭa-draviṇa iva kṛpaṇaḥ sakaruṇam ati-tarṣeṇa hariṇa-kuṇaka-viraha-vihvala-hṛdaya-santāpas tam evānuśocan kila kaśmalaṁ mahad abhirambhita iti hovāca.

एक बार, जब वह मृग-शावक कहीं दिखाई नहीं दिया, तो वे अत्यन्त व्याकुल होकर, मानो अपना सम्पूर्ण धन खो चुके किसी कंजूस के समान, करुण एवं तीव्र वेदना से भरे हृदय से उसी का शोक करते हुए, महामोह में डूबकर इस प्रकार कहने लगे।

श्लोक 16 (bhagavata.5.8.16)

अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति ॥ १६ ॥

api bata sa vai kṛpaṇa eṇa-bālako mṛta-hariṇī-suto ’ho mamānāryasya śaṭha-kirāta-mater akṛta-sukṛtasya kṛta-visrambha ātma-pratyayena tad avigaṇayan sujana ivāgamiṣyati.

हाय! क्या वह असहाय, मृत हिरणी का पुत्र, मुझ जैसे नीच, कपटी शिकारी-सी बुद्धि वाले, अपुण्यात्मा पर विश्वास करते हुए भी, यह सब भूलकर किसी सज्जन की भाँति फिर लौट आएगा?

श्लोक 17 (bhagavata.5.8.17)

अपि क्षेमेणास्मिन्नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि ॥ १७ ॥

api kṣemeṇāsminn āśramopavane śaṣpāṇi carantaṁ deva-guptaṁ drakṣyāmi.

क्या मैं उसे कुशलपूर्वक, भगवान द्वारा सुरक्षित होकर, इस आश्रम के उपवन में कोमल घास चरते हुए फिर देख पाऊँगा?

श्लोक 18 (bhagavata.5.8.18)

अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति ॥ १८ ॥

api ca na vṛkaḥ sālā-vṛko ’nyatamo vā naika-cara eka-caro vā bhak-ṣayati.

कहीं उसे किसी भेड़िये, जंगली कुत्ते, अथवा झुण्ड में या अकेले विचरने वाले किसी अन्य हिंसक पशु ने तो नहीं खा लिया?

श्लोक 19 (bhagavata.5.8.19)

निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत्क्षेमोदयस्त्रय्यात्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति ॥ १९ ॥

nimlocati ha bhagavān sakala-jagat-kṣemodayas trayy-ātmādyāpi mama na mṛga-vadhū-nyāsa āgacchati.

समस्त जगत का कल्याण करने वाले, वेद-स्वरूप भगवान सूर्य अब अस्त हो रहे हैं, फिर भी हिरणी द्वारा मुझे सौंपा गया वह शिशु अब तक नहीं लौटा।

श्लोक 20 (bhagavata.5.8.20)

अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन् ॥ २० ॥

api svid akṛta-sukṛtam āgatya māṁ sukhayiṣyati hariṇa-rāja-kumāro vividha-rucira-darśanīya-nija-mṛga-dāraka-vinodair asantoṣaṁ svānām apanudan.

क्या वह मृग-राजकुमार-सा प्यारा शावक लौटकर, अपने विविध सुन्दर, दर्शनीय बाल-क्रीड़ाओं से अपनों के असन्तोष को दूर करते हुए, मुझ अभागे को भी सुख देगा?

श्लोक 21 (bhagavata.5.8.21)

क्ष्वेलिकायां मां मृषासमाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति ॥ २१ ॥

kṣvelikāyāṁ māṁ mṛṣā-samādhināmīlita-dṛśaṁ prema-saṁrambheṇa cakita-cakita āgatya pṛṣad-aparuṣa-viṣāṇāgreṇa luṭhati.

क्रीड़ा करते समय, जब मैं झूठमूठ आँखें बन्द कर समाधि का अभिनय करता, तो वह प्रेम-भरे आवेश से बार-बार डरता-डरता पास आकर अपने कोमल सींगों की नोक से मुझसे लिपट जाया करता था।

श्लोक 22 (bhagavata.5.8.22)

आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवदवहितकरणकलाप आस्ते ॥ २२ ॥

āsādita-haviṣi barhiṣi dūṣite mayopālabdho bhīta-bhītaḥ sapady uparata-rāsa ṛṣi-kumāravad avahita-karaṇa-kalāpa āste.

जब वह यज्ञ-सामग्री रखे हुए कुश को अपने खेल में दूषित कर देता, और मैं उसे डाँट देता, तो वह तुरन्त अत्यन्त भयभीत होकर अपनी क्रीड़ा छोड़ देता, और किसी ऋषि-कुमार के समान संयत होकर, अपनी सभी इन्द्रियों को सचेत करके चुपचाप बैठ जाता।

श्लोक 23 (bhagavata.5.8.23)

किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसुभगशिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविणविधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति ॥ २३ ॥

kiṁ vā are ācaritaṁ tapas tapasvinyānayā yad iyam avaniḥ savinaya-kṛṣṇa-sāra-tanaya-tanutara-subhaga-śivatamākhara-khura-pada-paṅktibhir draviṇa-vidhurāturasya kṛpaṇasya mama draviṇa-padavīṁ sūcayanty ātmānaṁ ca sarvataḥ kṛta-kautukaṁ dvijānāṁ svargāpavarga-kāmānāṁ deva-yajanaṁ karoti.

अरे, इस तपस्विनी पृथ्वी ने कैसी तपस्या की होगी, कि उस विनम्र काले मृग के शिशु के छोटे, सुन्दर, अत्यन्त मंगलमय, कोमल खुरों की यह पद-पंक्ति, धन खोकर व्याकुल मुझ अभागे को उसका मार्ग दिखाती है, और स्वयं को सर्वत्र सुरम्य बनाकर, स्वर्ग तथा मोक्ष के अभिलाषी ब्राह्मणों के लिए देव-यज्ञ के योग्य बना देती है।

श्लोक 24 (bhagavata.5.8.24)

अपिस्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभयान्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पया कृपणजनवत्सलः परिपाति ॥ २४ ॥

api svid asau bhagavān uḍu-patir enaṁ mṛga-pati-bhayān mṛta-mātaraṁ mṛga-bālakaṁ svāśrama-paribhraṣṭam anukampayā kṛpaṇa-jana-vatsalaḥ paripāti.

क्या वह भगवान चन्द्रमा, जो असहायों के प्रति वत्सल हैं, इस अपने आश्रम से बिछुड़े, माता-विहीन तथा सिंह के भय से त्रस्त मृग-शिशु की करुणावश रक्षा कर रहे हैं?

श्लोक 25 (bhagavata.5.8.25)

किं वाऽऽत्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभिरुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृतमृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणितनिजवदनसलिलामृतमयगभस्तिभिः स्वधयतीति च ॥ २५ ॥

kiṁ vātmaja-viśleṣa-jvara-dava-dahana-śikhābhir upatapyamāna-hṛdaya-sthala-nalinīkaṁ mām upasṛta-mṛgī-tanayaṁ śiśira-śāntānurāga-guṇita-nija-vadana-salilāmṛtamaya-gabhastibhiḥ svadhayatīti ca.

अथवा क्या वह चन्द्रमा, अपने पुत्र-सदृश उस मृग-शिशु के वियोग की ज्वर-अग्नि से जल रहे मेरे हृदय-सरोवर को देखकर, अपनी शीतल, स्नेह से भरी, अमृतमय मुख-किरणों से उसे सींच रहा है?

श्लोक 26 (bhagavata.5.8.26)

एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्निःश्रेयसप्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहत योगारम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणाविगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत ॥ २६ ॥

evam aghaṭamāna-manorathākula-hṛdayo mṛga-dārakābhāsena svārabdha-karmaṇā yogārambhaṇato vibhraṁśitaḥ sa yoga-tāpaso bhagavad-ārādhana-lakṣaṇāc ca katham itarathā jāty-antara eṇa-kuṇaka āsaṅgaḥ sākṣān niḥśreyasa-pratipakṣatayā prāk-parityakta-dustyaja-hṛdayābhijātasya tasyaivam antarāya-vihata-yogārambhaṇasya rājarṣer bharatasya tāvan mṛgārbhaka-poṣaṇa-pālana-prīṇana-lālanānuṣaṅgeṇāvigaṇayata ātmānam ahir ivākhu-bilaṁ duratikramaḥ kālaḥ karāla-rabhasa āpadyata.

इस प्रकार असम्भव कामनाओं से व्याकुल हृदय वाले, तथा मृग-शिशु के आभास-रूपी अपने ही किए हुए कर्म के कारण योग-साधना से भ्रष्ट हो चुके वे योग-तपस्वी, भगवद्-आराधना से भी विचलित हो गए — अन्यथा, जिन्होंने पहले अपने अत्यन्त प्रिय पुत्रों तक को मोक्ष-मार्ग का विघ्न समझकर त्याग दिया था, वे किसी अन्य जाति के मृग-शावक के प्रति ऐसी आसक्ति भला और किस कारण से रखते? इस प्रकार अपनी योग-साधना में इस विघ्न के कारण, राजर्षि भरत, मृग-शिशु के पोषण, पालन, प्रसन्नता और दुलार में इतने तल्लीन हो गए कि उन्हें अपनी सुध ही न रही — और तभी वह दुर्निवार, भयंकर वेगवान काल, चूहे के बिल में घुसने वाले सर्प के समान, उन पर आ पहुँचा।

श्लोक 27 (bhagavata.5.8.27)

तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्तमभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मानुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७ ॥

tadānīm api pārśva-vartinam ātmajam ivānuśocantam abhivīkṣamāṇo mṛga evābhiniveśita-manā visṛjya lokam imaṁ saha mṛgeṇa kalevaraṁ mṛtam anu na mṛta-janmānusmṛtir itaravan mṛga-śarīram avāpa.

उस समय भी, अपने पास बैठकर पुत्र के समान शोक करते हुए उस मृग को ही देखते-देखते, उसी में मन लगाए हुए, वे इस लोक को त्यागकर, उस मृग के साथ अपना शरीर छोड़ गए — किन्तु मृत्यु के पश्चात्, अन्य साधारण जीवों के विपरीत, अपने पूर्व-जन्म की स्मृति खोए बिना ही, उन्होंने मृग-शरीर प्राप्त किया।

श्लोक 28 (bhagavata.5.8.28)

तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनुतप्यमान आह ॥ २८ ॥

tatrāpi ha vā ātmano mṛgatva-kāraṇaṁ bhagavad-ārādhana-samīhānubhāvenānusmṛtya bhṛśam anutapyamāna āha.

उस मृग-योनि में भी वे भगवद्-आराधना के प्रभाव से अपने मृग-रूप में जन्म लेने का कारण स्मरण कर, अत्यन्त पश्चात्तापपूर्वक इस प्रकार बोले।

श्लोक 29 (bhagavata.5.8.29)

अहो कष्टं भ्रष्टोऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्तसमस्तसङ्गस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनि सर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणाभियोगेनाशून्यसकलयामेन कालेन समावेशितं समाहितं कार्त्स्न्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्यारान्मृगसुतमनु परिसुस्राव ॥ २९ ॥

aho kaṣṭaṁ bhraṣṭo ’ham ātmavatām anupathād yad-vimukta-samasta-saṅgasya vivikta-puṇyāraṇya-śaraṇasyātmavata ātmani sarveṣām ātmanāṁ bhagavati vāsudeve tad-anuśravaṇa-manana-saṅkīrtanārādhanānusmaraṇābhiyogenāśūnya-sakala-yāmena kālena samāveśitaṁ samāhitaṁ kārtsnyena manas tat tu punar mamābudhasyārān mṛga-sutam anu parisusrāva.

हाय! कितने कष्ट की बात है कि मैं आत्म-ज्ञानी पुरुषों के मार्ग से भ्रष्ट हो गया। सम्पूर्ण संग से मुक्त, पवित्र एकान्त वन का आश्रय लेकर, आत्म-संयमी बन, समस्त प्राणियों की आत्मा भगवान वासुदेव में — श्रवण, मनन, संकीर्तन, आराधना और स्मरण द्वारा, दिन के हर प्रहर में — अपने मन को पूर्णतः स्थिर कर दिया था। किन्तु मुझ मूर्ख का वही मन, अन्ततः, एक मृग-शिशु के प्रति बहकर चला गया!

श्लोक 30 (bhagavata.5.8.30)

इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनर्भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरात्प्रत्याजगाम ॥ ३० ॥

ity evaṁ nigūḍha-nirvedo visṛjya mṛgīṁ mātaraṁ punar bhagavat-kṣetram upaśama-śīla-muni-gaṇa-dayitaṁ śālagrāmaṁ pulastya-pulahāśramaṁ kālañjarāt pratyājagāma.

इस प्रकार गहरे वैराग्य को प्राप्त होकर, वे अपनी मृग-माता को छोड़, कालञ्जर पर्वत से पुनः शान्तस्वभाव मुनियों के प्रिय, भगवद्-क्षेत्र शालग्राम स्थित पुलस्त्य-पुलहाश्रम को लौट गए।

श्लोक 31 (bhagavata.5.8.31)

तस्मिन्न् अपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच् च भृशम् उद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानम् एव गणयन् मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्नम् उत्ससर्ज ॥ ३१ ॥

tasminn api kālaṁ pratīkṣamāṇaḥ saṅgāc ca bhṛśam udvigna ātma-sahacaraḥ śuṣka-parṇa-tṛṇa-vīrudhā vartamāno mṛgatva-nimittāvasānam eva gaṇayan mṛga-śarīraṁ tīrthodaka-klinnam ut-sasarja.

वहाँ भी वे मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए, संगति से अत्यन्त उद्विग्न होकर, केवल स्वयं के ही सहचर बने रहकर, सूखे पत्तों, तिनकों और लताओं पर निर्वाह करते हुए, मृग-योनि के कारणभूत कर्म के अन्त की ही प्रतीक्षा करते रहे, और अन्ततः तीर्थ-जल से भीगे उस मृग-शरीर को त्याग दिया।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9