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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10

देवताओं और वृत्रासुर का युद्ध

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (bhagavata.6.10.1)

श्रीबादरायणिरुवाच इन्द्रमेवं समादिश्य भगवान् विश्वभावनः । पश्यतामनिमेषाणां तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥ 10.1 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca indram evaṁ samādiśya bhagavān viśva-bhāvanaḥ paśyatām animeṣāṇāṁ tatraivāntardadhe hariḥ

श्री बादरायणि ने कहा — इन्द्र को इस प्रकार निर्देश देकर, विश्व के रचयिता भगवान् हरि निर्निमेष देवताओं के देखते-देखते वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 2 (bhagavata.6.10.2)

तथाभियाचितो देवैर्ऋषिराथर्वणो महान् । मोदमान उवाचेदं प्रहसन्निव भारत ॥ 10.2 ॥

tathābhiyācito devair ṛṣir ātharvaṇo mahān modamāna uvācedaṁ prahasann iva bhārata

हे भारतवंशी, देवताओं द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, अथर्वापुत्र महान् ऋषि दध्यङ्ग प्रसन्न होते हुए मानो मुस्कराते हुए यह बोले।

श्लोक 3 (bhagavata.6.10.3)

अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम् । संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापहः ॥ 10.3 ॥

api vṛndārakā yūyaṁ na jānītha śarīriṇām saṁsthāyāṁ yas tv abhidroho duḥsahaś cetanāpahaḥ

"क्या तुम श्रेष्ठ देवतागण यह नहीं जानते कि देहधारी प्राणियों को मृत्यु के समय जो पीड़ा होती है, वह असह्य होती है और चेतना को ही हर लेती है?

श्लोक 4 (bhagavata.6.10.4)

जिजीविषूणां जीवानामात्मा प्रेष्ठ इहेप्सितः । क उत्सहेत तं दातुं भिक्षमाणाय विष्णवे ॥ 10.4 ॥

jijīviṣūṇāṁ jīvānām ātmā preṣṭha ihepsitaḥ ka utsaheta taṁ dātuṁ bhikṣamāṇāya viṣṇave

जीने की इच्छा रखने वाले प्राणियों के लिए इस संसार में सबसे प्रिय वस्तु स्वयं यह शरीर ही है — तो भला उसे भिक्षा माँगने वाले साक्षात् विष्णु को भी देने का साहस कौन करेगा?

श्लोक 5 (bhagavata.6.10.5)

श्रीदेवा ऊचुः किं नु तद् दुस्त्यजं ब्रह्मन् पुंसां भूतानुकम्पिनाम् । भवद्विधानां महतां पुण्यश्लोकेड्यकर्मणाम् ॥ 10.5 ॥

śrī-devā ūcuḥ kiṁ nu tad dustyajaṁ brahman puṁsāṁ bhūtānukampinām bhavad-vidhānāṁ mahatāṁ puṇya-ślokeḍya-karmaṇām

देवताओं ने कहा — हे ब्रह्मन्, आप जैसे सभी प्राणियों के प्रति दयालु महापुरुष, जिनके कर्म पुण्यश्लोक जनों द्वारा प्रशंसित हैं, उनके लिए भला ऐसा क्या है जो त्याग के योग्य न हो?

श्लोक 6 (bhagavata.6.10.6)

नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् । यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ 10.6 ॥

nūnaṁ svārtha-paro loko na veda para-saṅkaṭam yadi veda na yāceta neti nāha yad īśvaraḥ

निश्चय ही स्वार्थपरायण जन दूसरे के कष्ट को नहीं समझते; यदि याचक यह समझ लेता, तो वह माँगता ही नहीं, और यदि समर्थ दाता समझ लेता, तो वह कभी मना नहीं करता।

श्लोक 7 (bhagavata.6.10.7)

श्रीऋषिरुवाच धर्मं वः श्रोतुकामेन यूयं मे प्रत्युदाहृताः । एष वः प्रियमात्मानं त्यजन्तं सन्त्यजाम्यहम् ॥ 10.7 ॥

śrī-ṛṣir uvāca dharmaṁ vaḥ śrotu-kāmena yūyaṁ me pratyudāhṛtāḥ eṣa vaḥ priyam ātmānaṁ tyajantaṁ santyajāmy aham

ऋषि ने कहा — मैंने तो केवल तुम्हारे धर्म-विषयक विचार सुनने की इच्छा से ही तुम्हें इस प्रकार परखा। अब यह शरीर मुझे प्रिय होते हुए भी, चूँकि यह वैसे भी छूटने वाला है, मैं इसे तुम्हारे लिए सहर्ष त्याग देता हूँ।

श्लोक 8 (bhagavata.6.10.8)

योऽध्रुवेणात्मना नाथा न धर्मं न यशः पुमान् । ईहेत भूतदयया स शोच्यः स्थावरैरपि ॥ 10.8 ॥

yo ’dhruveṇātmanā nāthā na dharmaṁ na yaśaḥ pumān īheta bhūta-dayayā sa śocyaḥ sthāvarair api

हे स्वामियो, जो मनुष्य प्राणियों के प्रति दया रखते हुए भी इस नश्वर शरीर से धर्म अथवा यश की प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्षों द्वारा भी शोक के योग्य समझा जाता है।

श्लोक 9 (bhagavata.6.10.9)

एतावानव्ययो धर्मः पुण्यश्लोकैरुपासितः । यो भूतशोकहर्षाभ्यामात्मा शोचति हृष्यति ॥ 10.9 ॥

etāvān avyayo dharmaḥ puṇya-ślokair upāsitaḥ yo bhūta-śoka-harṣābhyām ātmā śocati hṛṣyati

पुण्यश्लोक जनों द्वारा उपासित यही वह अविनाशी धर्म है — कि दूसरों के दुःख से स्वयं दुखी हो और दूसरों के हर्ष से स्वयं हर्षित हो।

श्लोक 10 (bhagavata.6.10.10)

अहो दैन्यमहो कष्टं पारक्यैः क्षणभङ्गुरैः । यन्नोपकुर्यादस्वार्थैर्मर्त्यः स्वज्ञातिविग्रहैः ॥ 10.10 ॥

aho dainyam aho kaṣṭaṁ pārakyaiḥ kṣaṇa-bhaṅguraiḥ yan nopakuryād asvārthair martyaḥ sva-jñāti-vigrahaiḥ

हाय, कैसी दीनता, कैसा कष्ट है, यदि मनुष्य इस शरीर से — जो अंततः औरों का ही है, क्षणभंगुर है, तथा अपने ही स्वजनों के भी किसी काम का नहीं — दूसरों की सहायता न करे!

श्लोक 11 (bhagavata.6.10.11)

श्रीबादरायणिरुवाच एवं कृतव्यवसितो दध्यङ्ङाथर्वणस्तनुम् । परे भगवति ब्रह्मण्यात्मानं सन्नयञ्जहौ ॥ 10.11 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca evaṁ kṛta-vyavasito dadhyaṅṅ ātharvaṇas tanum pare bhagavati brahmaṇy ātmānaṁ sannayañ jahau

श्री बादरायणि ने कहा — इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके, अथर्वापुत्र दध्यङ्ग ने परब्रह्म भगवान् में अपने आपको स्थिर कर अपने शरीर का त्याग कर दिया।

श्लोक 12 (bhagavata.6.10.12)

यताक्षासुमनोबुद्धिस्तत्त्वदृग् ध्वस्तबन्धनः । आस्थितः परमं योगं न देहं बुबुधे गतम् ॥ 10.12 ॥

yatākṣāsu-mano-buddhis tattva-dṛg dhvasta-bandhanaḥ āsthitaḥ paramaṁ yogaṁ na dehaṁ bubudhe gatam

इन्द्रियों, प्राण, मन तथा बुद्धि को वश में किए, तत्त्वदर्शी, समस्त बंधनों से मुक्त, परम योग में स्थित उस मुनि को अपने शरीर के छूटने का भी बोध नहीं हुआ।

श्लोक 13 (bhagavata.6.10.13)

अथेन्द्रो वज्रमुद्यम्य निर्मितं विश्वकर्मणा । मुनेः शक्तिभिरुत्सिक्तो भगवत्तेजसान्वितः ॥ 10.13 ॥

athendro vajram udyamya nirmitaṁ viśvakarmaṇā muneḥ śaktibhir utsikto bhagavat-tejasānvitaḥ

तब इन्द्र ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित उस वज्र को उठाया, जो मुनि की शक्तियों से परिपूर्ण तथा भगवान् के तेज से युक्त था।

श्लोक 14 (bhagavata.6.10.14)

वृतो देवगणैः सर्वैर्गजेन्द्रोपर्यशोभत । स्तूयमानो मुनिगणैस्त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥ 10.14 ॥

vṛto deva-gaṇaiḥ sarvair gajendropary aśobhata stūyamāno muni-gaṇais trailokyaṁ harṣayann iva

समस्त देवगणों से घिरे हुए, अपने गजराज पर आरूढ़ हुए वे अत्यंत शोभायमान हो रहे थे, मुनिगणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, मानो तीनों लोकों को हर्षित कर रहे हों।

श्लोक 15 (bhagavata.6.10.15)

वृत्रमभ्यद्रवच्छत्रुमसुरानीकयूथपैः । पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम् ॥ 10.15 ॥

vṛtram abhyadravac chatrum asurānīka-yūthapaiḥ paryastam ojasā rājan kruddho rudra ivāntakam

हे राजन्, वे क्रोधित होकर उस वृत्र शत्रु पर टूट पड़े, जो असुर सेनाओं के प्रमुख सेनापतियों से घिरा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे रुद्र ने कुपित होकर काल पर आक्रमण किया था।

श्लोक 16 (bhagavata.6.10.16)

ततः सुराणामसुरै रणः परमदारुणः । त्रेतामुखे नर्मदायामभवत्प्रथमे युगे ॥ 10.16 ॥

tataḥ surāṇām asurai raṇaḥ parama-dāruṇaḥ tretā-mukhe narmadāyām abhavat prathame yuge

तत्पश्चात् त्रेतायुग के आरंभ में, नर्मदा नदी के तट पर, देवताओं और असुरों के बीच एक अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ।

श्लोक 17 (bhagavata.6.10.17)

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां पितृवह्निभिः । मरुद्भिर्ऋभुभिः साध्यैर्विश्वेदेवैर्मरुत्पतिम् ॥ 10.17 ॥

rudrair vasubhir ādityair aśvibhyāṁ pitṛ-vahnibhiḥ marudbhir ṛbhubhiḥ sādhyair viśvedevair marut-patim

रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनीकुमारों, पितरों, अग्नि, मरुद्गणों, ऋभुओं, साध्यों तथा विश्वेदेवों से घिरे हुए मरुत्पति इन्द्र को —

श्लोक 18 (bhagavata.6.10.18)

दृष्ट्वा वज्रधरं शक्रं रोचमानं स्वया श्रिया । नामृष्यन्नसुरा राजन्मृधे वृत्रपुरःसराः ॥ 10.18 ॥

dṛṣṭvā vajra-dharaṁ śakraṁ rocamānaṁ svayā śriyā nāmṛṣyann asurā rājan mṛdhe vṛtra-puraḥsarāḥ

— वज्रधारी तथा अपने ही तेज से देदीप्यमान उस इन्द्र को युद्धभूमि में देखकर, हे राजन्, वृत्र के नेतृत्व में आए असुर उसे सहन न कर सके।

श्लोक 19 (bhagavata.6.10.19)

नमुचिः शम्बरोऽनर्वा द्विमूर्धा ऋषभोऽसुरः । हयग्रीवः शङ्कुशिरा विप्रचित्तिरयोमुखः ॥ 10.19 ॥

namuciḥ śambaro ’narvā dvimūrdhā ṛṣabho ’suraḥ hayagrīvaḥ śaṅkuśirā vipracittir ayomukhaḥ

नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, असुर ऋषभ, हयग्रीव, शंकुशिरा, विप्रचित्ति तथा अयोमुख,

श्लोक 20 (bhagavata.6.10.20)

पुलोमा वृषपर्वा च प्रहेतिर्हेतिरुत्कलः । दैतेया दानवा यक्षा रक्षांसि च सहस्रशः ॥ 10.20 ॥

pulomā vṛṣaparvā ca prahetir hetir utkalaḥ daiteyā dānavā yakṣā rakṣāṁsi ca sahasraśaḥ

पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति तथा उत्कल — ये और सहस्रों की संख्या में दैत्य, दानव, यक्ष तथा राक्षस,

श्लोक 21 (bhagavata.6.10.21)

सुमालिमालिप्रमुखाः कार्तस्वरपरिच्छदाः । प्रतिषिध्येन्द्रसेनाग्रं मृत्योरपि दुरासदम् ॥ 10.21 ॥

sumāli-māli-pramukhāḥ kārtasvara-paricchadāḥ pratiṣidhyendra-senāgraṁ mṛtyor api durāsadam

सुमाली और माली को अग्रणी मानकर, स्वर्ण-आभूषणों से सुसज्जित होकर, उन्होंने इन्द्र की उस सेना के अग्रभाग को रोक दिया, जो साक्षात् मृत्यु के लिए भी दुर्गम थी।

श्लोक 22 (bhagavata.6.10.22)

अभ्यर्दयन्नसम्भ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः । गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्गरतोमरैः ॥ 10.22 ॥

abhyardayann asambhrāntāḥ siṁha-nādena durmadāḥ gadābhiḥ parighair bāṇaiḥ prāsa-mudgara-tomaraiḥ

निर्भीक तथा उन्मत्त होकर सिंहनाद करते हुए, उन्होंने गदाओं, परिघों, बाणों, भालों, मुद्गरों तथा तोमरों से देवताओं को पीड़ित करना आरंभ किया।

श्लोक 23 (bhagavata.6.10.23)

शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः । सर्वतोऽवाकिरन् शस्त्रैरस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ॥ 10.23 ॥

śūlaiḥ paraśvadhaiḥ khaḍgaiḥ śataghnībhir bhuśuṇḍibhiḥ sarvato ’vākiran śastrair astraiś ca vibudharṣabhān

त्रिशूलों, फरसों, तलवारों, शतघ्नियों तथा भुशुण्डियों से, उन्होंने देवश्रेष्ठों पर चारों ओर से शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा कर दी।

श्लोक 24 (bhagavata.6.10.24)

न तेऽदृश्यन्त सञ्छन्नाः शरजालैः समन्ततः । पुङ्खानुपुङ्खपतितैर्ज्योतींषीव नभोघनैः ॥ 10.24 ॥

na te ’dṛśyanta sañchannāḥ śara-jālaiḥ samantataḥ puṅkhānupuṅkha-patitair jyotīṁṣīva nabho-ghanaiḥ

पंख-दर-पंख गिरते हुए बाणों के सघन जाल से चारों ओर से आच्छादित होकर देवता दिखाई नहीं दे रहे थे — जैसे आकाश में घने बादलों से ढके तारे दिखाई नहीं देते।

श्लोक 25 (bhagavata.6.10.25)

न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् । छिन्नाः सिद्धपथे देवैर्लघुहस्तैः सहस्रधा ॥ 10.25 ॥

na te śastrāstra-varṣaughā hy āseduḥ sura-sainikān chinnāḥ siddha-pathe devair laghu-hastaiḥ sahasradhā

फिर भी शस्त्रों और अस्त्रों की वे वर्षाएँ देवसैनिकों तक नहीं पहुँच सकीं, क्योंकि चतुर हाथों वाले देवताओं ने उन्हें आकाश-मार्ग में ही सहस्रों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 26 (bhagavata.6.10.26)

अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिशृङ्गद्रुमोपलैः । अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ॥ 10.26 ॥

atha kṣīṇāstra-śastraughā giri-śṛṅga-drumopalaiḥ abhyavarṣan sura-balaṁ cicchidus tāṁś ca pūrvavat

अपने अस्त्र-शस्त्रों का भंडार समाप्त होने पर असुरों ने पर्वत-शिखरों, वृक्षों तथा पत्थरों की वर्षा देवसेना पर आरंभ कर दी; किंतु देवताओं ने पूर्ववत् उन्हें भी काट डाला।

श्लोक 27 (bhagavata.6.10.27)

तानक्षतान् स्वस्तिमतो निशाम्य शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथाः । द्रुमैर्दृषद्भिर्विविधाद्रिशृङ्गै रविक्षतांस्तत्रसुरिन्द्रसैनिकान् ॥ 10.27 ॥

tān akṣatān svastimato niśāmya śastrāstra-pūgair atha vṛtra-nāthāḥ drumair dṛṣadbhir vividhādri-śṛṅgair avikṣatāṁs tatrasur indra-sainikān

वृत्र के अनुयायियों ने जब देखा कि अस्त्र-शस्त्रों के समूह, वृक्षों, पत्थरों तथा नाना पर्वत-शिखरों की वर्षा के बावजूद इन्द्र के सैनिक पूर्णतः सुरक्षित और अक्षत बने हुए हैं, तो वे भयभीत हो उठे।

श्लोक 28 (bhagavata.6.10.28)

सर्वे प्रयासा अभवन् विमोघाः कृताः कृता देवगणेषु दैत्यैः । कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु क्षुद्रैः प्रयुक्ता ऊषती रूक्षवाचः ॥ 10.28 ॥

sarve prayāsā abhavan vimoghāḥ kṛtāḥ kṛtā deva-gaṇeṣu daityaiḥ kṛṣṇānukūleṣu yathā mahatsu kṣudraiḥ prayuktā ūṣatī rūkṣa-vācaḥ

दैत्यों द्वारा देवगणों के विरुद्ध बार-बार किए गए वे सभी प्रयास व्यर्थ हो गए — जैसे कृष्ण के अनुकूल महापुरुषों पर क्षुद्र जनों द्वारा बार-बार प्रयुक्त कठोर, दाहक वचन भी उन पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते।

श्लोक 29 (bhagavata.6.10.29)

ते स्वप्रयासं वितथं निरीक्ष्य हरावभक्ता हतयुद्धदर्पाः । पलायनायाजिमुखे विसृज्य पतिं मनस्ते दधुरात्तसाराः ॥ 10.29 ॥

te sva-prayāsaṁ vitathaṁ nirīkṣya harāv abhaktā hata-yuddha-darpāḥ palāyanāyāji-mukhe visṛjya patiṁ manas te dadhur ātta-sārāḥ

अपने प्रयासों को व्यर्थ होते देखकर, हरि के प्रति अभक्त वे असुर, जिनका युद्ध-गर्व चूर हो चुका था और शक्ति क्षीण हो गई थी, युद्ध के आरंभ में ही अपने स्वामी को छोड़कर भाग जाने का निश्चय करने लगे।

श्लोक 30 (bhagavata.6.10.30)

वृत्रोऽसुरांस्ताननुगान् मनस्वी प्रधावतः प्रेक्ष्य बभाष एतत् । पलायितं प्रेक्ष्य बलं च भग्नं भयेन तीव्रेण विहस्य वीरः ॥ 10.30 ॥

vṛtro ’surāṁs tān anugān manasvī pradhāvataḥ prekṣya babhāṣa etat palāyitaṁ prekṣya balaṁ ca bhagnaṁ bhayena tīvreṇa vihasya vīraḥ

अपने अनुयायी असुरों को भागते हुए तथा तीव्र भय से अपनी सेना को छिन्न-भिन्न होते देखकर, उदारचेता वीर वृत्रासुर ने मुस्कराते हुए यह वचन कहे।

श्लोक 31 (bhagavata.6.10.31)

कालोपपन्नां रुचिरां मनस्विनां जगाद वाचं पुरुषप्रवीरः । हे विप्रचित्ते नमुचे पुलोमन् मयानर्वञ्छम्बर मे शृणुध्वम् ॥ 10.31 ॥

kālopapannāṁ rucirāṁ manasvināṁ jagāda vācaṁ puruṣa-pravīraḥ he vipracitte namuce puloman mayānarvañ chambara me śṛṇudhvam

उस पुरुषश्रेष्ठ ने अवसर के अनुकूल तथा विचारशीलों को प्रिय लगने वाले ये वचन कहे — "हे विप्रचित्ति! हे नमुचि! हे पुलोमा! हे माया, अनर्वा, शम्बर — मेरी बात सुनो!

श्लोक 32 (bhagavata.6.10.32)

जातस्य मृत्युर्ध्रुव एव सर्वतः प्रतिक्रिया यस्य न चेह क्लृप्ता । लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥ 10.32 ॥

jātasya mṛtyur dhruva eva sarvataḥ pratikriyā yasya na ceha kḷptā loko yaśaś cātha tato yadi hy amuṁ ko nāma mṛtyuṁ na vṛṇīta yuktam

जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु सर्वत्र निश्चित है, और इस संसार में उसका कोई उपाय नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि वही मृत्यु स्वर्गलोक और यश दिला सके, तो भला ऐसी उपयुक्त मृत्यु को कौन नहीं चुनेगा?

श्लोक 33 (bhagavata.6.10.33)

द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ यद् ब्रह्मसन्धारणया जितासुः । कलेवरं योगरतो विजह्याद् यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥ 10.33 ॥

dvau sammatāv iha mṛtyū durāpau yad brahma-sandhāraṇayā jitāsuḥ kalevaraṁ yoga-rato vijahyād yad agraṇīr vīra-śaye ’nivṛttaḥ

इस संसार में दो प्रकार की मृत्यु सम्मानित मानी गई हैं, और दोनों ही दुर्लभ हैं — एक, जब प्राणों को वश में किए हुआ योगी ब्रह्म में लीन होकर योगपूर्वक शरीर त्यागता है; दूसरी, जब सेना का अग्रणी वीर कभी पीठ न दिखाते हुए वीरशय्या पर गिर पड़ता है।"

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