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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11

वृत्रासुर के दिव्य गुण

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (bhagavata.6.11.1)

श्रीशुक उवाच त एवं शंसतो धर्मं वचः पत्युरचेतसः । नैवागृह्णन्त सम्भ्रान्ताः पलायनपरा नृप ॥ 11.1 ॥

śrī-śuka uvāca ta evaṁ śaṁsato dharmaṁ vacaḥ patyur acetasaḥ naivāgṛhṇanta sambhrāntāḥ palāyana-parā nṛpa

श्री शुकदेव ने कहा — हे राजन्, अपने स्वामी द्वारा इस प्रकार धर्म का उपदेश दिए जाने पर भी, भागने में तत्पर वे भयभीत असुर सैनिक उनके वचनों को ग्रहण न कर सके।

श्लोक 2 (bhagavata.6.11.2)

विशीर्यमाणां पृतनामासुरीमसुरर्षभः । कालानुकूलैस्त्रिदशैः काल्यमानामनाथवत् ॥ 11.2 ॥

viśīryamāṇāṁ pṛtanām āsurīm asurarṣabhaḥ kālānukūlais tridaśaiḥ kālyamānām anāthavat

असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर, अपनी असुरसेना को काल के अनुकूल देवताओं द्वारा मानो अनाथ के समान तितर-बितर तथा खदेड़ी जाती देखकर,

श्लोक 3 (bhagavata.6.11.3)

दृष्ट्वातप्यत सङ्कुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षितः । तान् निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्येदमुवाच ह ॥ 11.3 ॥

dṛṣṭvātapyata saṅkruddha indra-śatrur amarṣitaḥ tān nivāryaujasā rājan nirbhartsyedam uvāca ha

— यह देखकर इन्द्रशत्रु नामक वे वृत्रासुर संतप्त, अत्यंत क्रुद्ध तथा असहिष्णु हो उठे; और हे राजन्, अपने बल से उन असुरों को रोककर उन्हें फटकारते हुए यह कहा।

श्लोक 4 (bhagavata.6.11.4)

किं व उच्चरितैर्मातुर्धावद्भिः पृष्ठतो हतैः । न हि भीतवधः श्लाघ्यो न स्वर्ग्यः शूरमानिनाम् ॥ 11.4 ॥

kiṁ va uccaritair mātur dhāvadbhiḥ pṛṣṭhato hataiḥ na hi bhīta-vadhaḥ ślāghyo na svargyaḥ śūra-māninām

"तुम्हारा क्या उपयोग है, जो अपनी माताओं के मल के समान होकर भाग रहे हो और पीछे से मारे जा रहे हो? भयभीत को मारना न तो प्रशंसनीय है और न ही स्वयं को शूर मानने वालों के लिए स्वर्गदायक।

श्लोक 5 (bhagavata.6.11.5)

यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि । अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥ 11.5 ॥

yadi vaḥ pradhane śraddhā sāraṁ vā kṣullakā hṛdi agre tiṣṭhata mātraṁ me na ced grāmya-sukhe spṛhā

हे तुच्छ जनो, यदि तुम्हें युद्ध में श्रद्धा है, अथवा हृदय में कुछ भी सार है, तो केवल एक क्षण मेरे सामने खड़े रहो — यदि तुम्हें साधारण सुखों की लालसा नहीं है।"

श्लोक 6 (bhagavata.6.11.6)

एवं सुरगणान् क्रुद्धो भीषयन् वपुषा रिपून् । व्यनदत् सुमहाप्राणो येन लोका विचेतसः ॥ 11.6 ॥

evaṁ sura-gaṇān kruddho bhīṣayan vapuṣā ripūn vyanadat sumahā-prāṇo yena lokā vicetasaḥ

इस प्रकार क्रोधित होकर, अपने शरीर से ही देवगणों को भयभीत करते हुए, उस अत्यंत बलशाली वृत्रासुर ने इतनी भीषण गर्जना की कि समस्त प्राणी सुध-बुध खो बैठे।

श्लोक 7 (bhagavata.6.11.7)

तेन देवगणाः सर्वे वृत्रविस्फोटनेन वै । निपेतुर्मूर्च्छिता भूमौ यथैवाशनिना हताः ॥ 11.7 ॥

tena deva-gaṇāḥ sarve vṛtra-visphoṭanena vai nipetur mūrcchitā bhūmau yathaivāśaninā hatāḥ

वृत्रासुर की उस भीषण गर्जना से सभी देवता मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े, मानो वज्र से आहत हो गए हों।

श्लोक 8 (bhagavata.6.11.8)

ममर्द पद्भ्यां सुरसैन्यमातुरं निमीलिताक्षं रणरङ्गदुर्मदः । गां कम्पयन्नुद्यतशूल ओजसा नालं वनं यूथपतिर्यथोन्मदः ॥ 11.8 ॥

mamarda padbhyāṁ sura-sainyam āturaṁ nimīlitākṣaṁ raṇa-raṅga-durmadaḥ gāṁ kampayann udyata-śūla ojasā nālaṁ vanaṁ yūtha-patir yathonmadaḥ

युद्ध के उन्माद से उन्मत्त, त्रिशूल उठाए, अपने बल से पृथ्वी को कँपाते हुए, उसने आँखें मूँदे व्याकुल देवसेना को अपने पैरों से रौंद डाला, जैसे उन्मत्त गजराज बाँस के वन को रौंद देता है।

श्लोक 9 (bhagavata.6.11.9)

विलोक्य तं वज्रधरोऽत्यमर्षितः स्वशत्रवेऽभिद्रवते महागदाम् । चिक्षेप तामापततीं सुदुःसहां जग्राह वामेन करेण लीलया ॥ 11.9 ॥

vilokya taṁ vajra-dharo ’tyamarṣitaḥ sva-śatrave ’bhidravate mahā-gadām cikṣepa tām āpatatīṁ suduḥsahāṁ jagrāha vāmena kareṇa līlayā

उसे इस प्रकार देखकर, असहिष्णु होकर, वज्रधारी इन्द्र ने अपने आक्रमण करते शत्रु पर एक विशाल गदा फेंकी; किंतु वृत्रासुर ने उस दुःसह्य आती हुई गदा को लीलामात्र में अपने बाएँ हाथ से पकड़ लिया।

श्लोक 10 (bhagavata.6.11.10)

स इन्द्रशत्रुः कुपितो भृशं तया महेन्द्रवाहं गदयोरुविक्रमः । जघान कुम्भस्थल उन्नदन्मृधे तत्कर्म सर्वे समपूजयन्नृप ॥ 11.10 ॥

sa indra-śatruḥ kupito bhṛśaṁ tayā mahendra-vāhaṁ gadayoru-vikramaḥ jaghāna kumbha-sthala unnadan mṛdhe tat karma sarve samapūjayan nṛpa

हे राजन्, अत्यंत पराक्रमी वह इन्द्रशत्रु अत्यंत क्रोधित होकर उसी गदा से महेन्द्र के गजराज के मस्तक पर युद्धभूमि में गरजते हुए प्रहार किया; और सभी ने उसके इस पराक्रम की प्रशंसा की।

श्लोक 11 (bhagavata.6.11.11)

ऐरावतो वृत्रगदाभिमृष्टो विघूर्णितोऽद्रिः कुलिशाहतो यथा । अपासरद् भिन्नमुखः सहेन्द्रो मुञ्चन्नसृक् सप्तधनुर्भृशार्तः ॥ 11.11 ॥

airāvato vṛtra-gadābhimṛṣṭo vighūrṇito ’driḥ kuliśāhato yathā apāsarad bhinna-mukhaḥ sahendro muñcann asṛk sapta-dhanur bhṛśārtaḥ

वृत्रासुर की गदा से आहत ऐरावत गजराज वज्र से आहत पर्वत के समान डगमगा गया, और मुख फटा होने से रक्त बहाते हुए अत्यंत पीड़ा में इन्द्र सहित सात धनुष पीछे हट गया।

श्लोक 12 (bhagavata.6.11.12)

न सन्नवाहाय विषण्णचेतसे प्रायुङ्क्त भूयः स गदां महात्मा । इन्द्रोऽमृतस्यन्दिकराभिमर्श वीतव्यथक्षतवाहोऽवतस्थे ॥ 11.12 ॥

na sanna-vāhāya viṣaṇṇa-cetase prāyuṅkta bhūyaḥ sa gadāṁ mahātmā indro ’mṛta-syandi-karābhimarśa- vīta-vyatha-kṣata-vāho ’vatasthe

उस महात्मा ने थके हुए वाहन तथा विषण्णचित्त सवार पर पुनः गदा का प्रहार नहीं किया; इतने में इन्द्र ने अपने अमृतस्रावी हाथ से घायल गजराज को स्पर्श कर उसकी पीड़ा और घाव को दूर कर दिया, और दोनों शांत खड़े रहे।

श्लोक 13 (bhagavata.6.11.13)

स तं नृपेन्द्राहवकाम्यया रिपुं वज्रायुधं भ्रातृहणं विलोक्य । स्मरंश्च तत्कर्म नृशंसमंहः शोकेन मोहेन हसञ्जगाद ॥ 11.13 ॥

sa taṁ nṛpendrāhava-kāmyayā ripuṁ vajrāyudhaṁ bhrātṛ-haṇaṁ vilokya smaraṁś ca tat-karma nṛ-śaṁsam aṁhaḥ śokena mohena hasañ jagāda

हे राजेन्द्र, युद्ध की कामना से वज्रधारी उस अपने भ्राता के हन्ता शत्रु को अपने सम्मुख देखकर, तथा उस क्रूर और पापपूर्ण कर्म का स्मरण कर, शोक और मोह से अभिभूत वृत्रासुर व्यंग्यपूर्वक हँसते हुए बोले।

श्लोक 14 (bhagavata.6.11.14)

श्रीवृत्र उवाच दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपु- र्यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च । दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया मच्छूलनिर्भिन्नदृषद्धृदाचिरात् ॥ 11.14 ॥

śrī-vṛtra uvāca diṣṭyā bhavān me samavasthito ripur yo brahma-hā guru-hā bhrātṛ-hā ca diṣṭyānṛṇo ’dyāham asattama tvayā mac-chūla-nirbhinna-dṛṣad-dhṛdācirāt

श्री वृत्रासुर ने कहा — "सौभाग्य से मेरा वह शत्रु आज मेरे सम्मुख खड़ा है — जो ब्रह्महन्ता, गुरुहन्ता तथा मेरे भाई का हन्ता है! हे अधम, सौभाग्य से आज मैं शीघ्र ही ऋणमुक्त हो जाऊँगा, जब मेरा त्रिशूल तुम्हारे पाषाणहृदय को विदीर्ण करेगा।

श्लोक 15 (bhagavata.6.11.15)

यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजाते- र्गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य । विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चत् पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः ॥ 11.15 ॥

yo no ’grajasyātma-vido dvijāter guror apāpasya ca dīkṣitasya viśrabhya khaḍgena śirāṁsy avṛścat paśor ivākaruṇaḥ svarga-kāmaḥ

तुमने केवल स्वर्ग की कामना से, मेरे अग्रज — आत्मज्ञानी, निष्पाप ब्राह्मण तथा तुम्हारे ही दीक्षागुरु — के, जो तुम पर पूर्णतः विश्वास करते थे, सिरों को पशु के समान निर्दयतापूर्वक खड्ग से काट डाला।

श्लोक 16 (bhagavata.6.11.16)

श्रीह्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् । कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेह- मस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः ॥ 11.16 ॥

śrī-hrī-dayā-kīrtibhir ujjhitaṁ tvāṁ sva-karmaṇā puruṣādaiś ca garhyam kṛcchreṇa mac-chūla-vibhinna-deham aspṛṣṭa-vahniṁ samadanti gṛdhrāḥ

अपने ही कर्म से श्री, ह्री, दया तथा कीर्ति से रहित, नरभक्षकों द्वारा भी निंदित तुम्हारा शरीर, मेरे त्रिशूल से भारी प्रयत्न से विदीर्ण होकर, अग्नि को स्पर्श किए बिना ही, गिद्धों द्वारा भक्षित होगा।

श्लोक 17 (bhagavata.6.11.17)

अन्येऽनु ये त्वेह नृशंसमज्ञा यदुद्यतास्त्राः प्रहरन्ति मह्यम् । तैर्भूतनाथान् सगणान् निशात त्रिशूलनिर्भिन्नगलैर्यजामि ॥ 11.17 ॥

anye ’nu ye tveha nṛ-śaṁsam ajñā yad udyatāstrāḥ praharanti mahyam tair bhūta-nāthān sagaṇān niśāta- triśūla-nirbhinna-galair yajāmi

जो अन्य देवता भी मेरे क्रूर बल को न जानते हुए शस्त्र उठाकर मुझ पर प्रहार करेंगे — उनके गलों को इस तीक्ष्ण त्रिशूल से बींधकर, मैं भूतनाथ और उनके गणों की पूजा करूँगा।

श्लोक 18 (bhagavata.6.11.18)

अथो हरे मे कुलिशेन वीर हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह । तत्रानृणो भूतबलिं विधाय मनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये ॥ 11.18 ॥

atho hare me kuliśena vīra hartā pramathyaiva śiro yadīha tatrānṛṇo bhūta-baliṁ vidhāya manasvināṁ pāda-rajaḥ prapatsye

किन्तु हे वीर इन्द्र, यदि इस युद्ध में तुम अपने वज्र से मेरा ही सिर काट लोगे, तो अपने शरीर को प्राणियों को बलि रूप में अर्पित कर, ऋणमुक्त होकर, मैं ज्ञानीजनों के चरणों की रज को प्राप्त करूँगा।

श्लोक 19 (bhagavata.6.11.19)

सुरेश कस्मान्न हिनोषि वज्रं पुरः स्थिते वैरिणि मय्यमोघम् । मा संशयिष्ठा न गदेव वज्रः स्यान्निष्फलः कृपणार्थेव याच्ञा ॥ 11.19 ॥

sureśa kasmān na hinoṣi vajraṁ puraḥ sthite vairiṇi mayy amogham mā saṁśayiṣṭhā na gadeva vajraḥ syān niṣphalaḥ kṛpaṇārtheva yācñā

हे सुरेश्वर, तुम्हारा वह अमोघ वज्र, शत्रु के सम्मुख होते हुए भी, क्यों नहीं चलाते? संदेह मत करो — गदा के समान वह वज्र निष्फल नहीं होगा, जैसे कृपण से की गई याचना निष्फल होती है।

श्लोक 20 (bhagavata.6.11.20)

नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः । तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ॥ 11.20 ॥

nanv eṣa vajras tava śakra tejasā harer dadhīces tapasā ca tejitaḥ tenaiva śatruṁ jahi viṣṇu-yantrito yato harir vijayaḥ śrīr guṇās tataḥ

क्योंकि निश्चय ही, हे शक्र, यह तुम्हारा वज्र हरि के तेज तथा दधीचि की तपस्या से तेजस्वी बना है; विष्णु द्वारा नियंत्रित होकर उसी से अपने शत्रु का वध करो — क्योंकि जहाँ हरि हैं, वहीं विजय, श्री तथा समस्त सद्गुण हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.6.11.21)

अहं समाधाय मनो यथाह नः सङ्कर्षणस्तच्चरणारविन्दे । त्वद्वज्ररंहोलुलितग्राम्यपाशो गतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोकः ॥ 11.21 ॥

ahaṁ samādhāya mano yathāha naḥ saṅkarṣaṇas tac-caraṇāravinde tvad-vajra-raṁho-lulita-grāmya-pāśo gatiṁ muner yāmy apaviddha-lokaḥ

भगवान् संकर्षण के हमें दिए गए उपदेश के अनुसार अपना मन उनके चरणकमलों में स्थिर करके, तुम्हारे वज्र के वेग से सांसारिक बंधनों के टूट जाने पर, इस लोक को त्यागकर, मैं मुनियों की उस गति को प्राप्त करूँगा।

श्लोक 22 (bhagavata.6.11.22)

पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां याः सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम् । न राति यद्द्वेष उद्वेग आधि- र्मदः कलिर्व्यसनं सम्प्रयासः ॥ 11.22 ॥

puṁsāṁ kilaikānta-dhiyāṁ svakānāṁ yāḥ sampado divi bhūmau rasāyām na rāti yad dveṣa udvega ādhir madaḥ kalir vyasanaṁ samprayāsaḥ

अपने एकनिष्ठ भक्तों को भगवान् स्वर्ग, पृथ्वी अथवा पाताल की वह सम्पदा नहीं देते, जो द्वेष, उद्वेग, मानसिक पीड़ा, मद, कलह, विपत्ति तथा निरंतर परिश्रम ही उत्पन्न करती है।

श्लोक 23 (bhagavata.6.11.23)

त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत्- पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र । ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो यो दुर्लभोऽकिञ्चनगोचरोऽन्यैः ॥ 11.23 ॥

trai-vargikāyāsa-vighātam asmat- patir vidhatte puruṣasya śakra tato ’numeyo bhagavat-prasādo yo durlabho ’kiñcana-gocaro ’nyaiḥ

हे शक्र, हमारे स्वामी अपने भक्त के लिए धर्म, अर्थ तथा काम इन तीनों की प्राप्ति के परिश्रम को भी बाधित कर देते हैं; इसी से भगवान् की उस कृपा का अनुमान लगाया जा सकता है, जो अकिंचनों के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 24 (bhagavata.6.11.24)

अहं हरे तव पादैकमूल- दासानुदासो भवितास्मि भूयः । मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः ॥ 11.24 ॥

ahaṁ hare tava pādaika-mūla- dāsānudāso bhavitāsmi bhūyaḥ manaḥ smaretāsu-pater guṇāṁs te gṛṇīta vāk karma karotu kāyaḥ

हे हरि, मैं पुनः आपके चरणमूल के आश्रित दासों का भी दास बनूँ — हे मेरे प्राणपति, मेरा मन आपके गुणों का स्मरण करे, वाणी उनका गान करे, तथा शरीर आपकी सेवा में लगा रहे।

श्लोक 25 (bhagavata.6.11.25)

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे ॥ 11.25 ॥

na nāka-pṛṣṭhaṁ na ca pārameṣṭhyaṁ na sārva-bhaumaṁ na rasādhipatyam na yoga-siddhīr apunar-bhavaṁ vā samañjasa tvā virahayya kāṅkṣe

हे न्यायपूर्ण भगवन्, मुझे न स्वर्ग का शिखर चाहिए, न ब्रह्मा का पद, न सम्पूर्ण पृथ्वी का साम्राज्य, न पाताल का आधिपत्य, न योग की सिद्धियाँ, और न ही मुक्ति — यदि उसके लिए आपसे वियोग सहना पड़े।

श्लोक 26 (bhagavata.6.11.26)

अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः । प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥ 11.26 ॥

ajāta-pakṣā iva mātaraṁ khagāḥ stanyaṁ yathā vatsatarāḥ kṣudh-ārtāḥ priyaṁ priyeva vyuṣitaṁ viṣaṇṇā mano ’ravindākṣa didṛkṣate tvām

जैसे बिना पंख निकले पक्षी अपनी माता को चाहते हैं, जैसे भूख से व्याकुल बछड़े माता के दूध को चाहते हैं, जैसे विरहिणी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम को चाहती है — वैसे ही, हे कमलनयन, मेरा मन आपके दर्शन के लिए लालायित है।

श्लोक 27 (bhagavata.6.11.27)

ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः । त्वन्माययात्मात्मजदारगेहे- ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥ 11.27 ॥

mamottamaśloka-janeṣu sakhyaṁ saṁsāra-cakre bhramataḥ sva-karmabhiḥ tvan-māyayātmātmaja-dāra-geheṣv āsakta-cittasya na nātha bhūyāt

अपने ही कर्मों से इस संसार-चक्र में भटकते हुए, मुझे उत्तमश्लोक भगवान् के भक्तों के साथ ही मित्रता प्राप्त हो; और, हे नाथ, आपकी माया से मेरा चित्त पुनः इस शरीर, पुत्र, पत्नी तथा गृह में आसक्त न हो।"

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