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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13

इन्द्र का पापमुक्त होना

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (bhagavata.6.13.1)

श्रीशुक उवाच वृत्रे हते त्रयो लोका विना शक्रेण भूरिद । सपाला ह्यभवन् सद्यो विज्वरा निर्वृतेन्द्रियाः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca vṛtre hate trayo lokā vinā śakreṇa bhūrida sapālā hy abhavan sadyo vijvarā nirvṛtendriyāḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे महान दानी परीक्षित्! जब वृत्रासुर मारा गया, तो शासकों सहित तीनों लोक तुरंत भयरहित हो गये और उनकी इन्द्रियाँ शांत हो गयीं — केवल इन्द्र को छोड़कर।

श्लोक 2 (bhagavata.6.13.2)

देवर्षिपितृभूतानि दैत्या देवानुगाः स्वयम् । प्रतिजग्मुः स्वधिष्ण्यानि ब्रह्मेशेन्द्रादयस्ततः ॥ २ ॥

devarṣi-pitṛ-bhūtāni daityā devānugāḥ svayam pratijagmuḥ sva-dhiṣṇyāni brahmeśendrādayas tataḥ

देवर्षिगण, पितरगण, भूतगण, दैत्यगण तथा देवताओं के अनुचर स्वयं अपने-अपने धामों को लौट गये। तत्पश्चात् ब्रह्मा, शिव, इन्द्र आदि भी वहाँ से चले गये।

श्लोक 3 (bhagavata.6.13.3)

श्रीराजोवाच इन्द्रस्यानिर्वृतेर्हेतुं श्रोतुमिच्छामि भो मुने । येनासन् सुखिनो देवा हरेर्दुःखं कुतोऽभवत् ॥ ३ ॥

śrī-rājovāca indrasyānirvṛter hetuṁ śrotum icchāmi bho mune yenāsan sukhino devā harer duḥkhaṁ kuto ’bhavat

राजा परीक्षित् ने कहा — हे मुने! मैं इन्द्र के असंतोष का कारण सुनना चाहता हूँ। जिस कर्म से समस्त देवगण सुखी हुए, उसी से इन्द्र को दुःख कैसे हुआ?

श्लोक 4 (bhagavata.6.13.4)

श्रीशुक उवाच वृत्रविक्रमसंविग्नाः सर्वे देवाः सहर्षिभिः । तद्वधायार्थयन्निन्द्रं नैच्छद् भीतो बृहद्वधात् ॥ ४ ॥

śrī-śuka uvāca vṛtra-vikrama-saṁvignāḥ sarve devāḥ saharṣibhiḥ tad-vadhāyārthayann indraṁ naicchad bhīto bṛhad-vadhāt

श्रीशुकदेव जी ने कहा — वृत्रासुर के पराक्रम से भयभीत होकर ऋषियों सहित सभी देवगण उसके वध हेतु इन्द्र से प्रार्थना करने लगे, किंतु इन्द्र उस महान (ब्राह्मण) के वध से डरकर ऐसा नहीं चाहते थे।

श्लोक 5 (bhagavata.6.13.5)

इन्द्र उवाच स्त्रीभूद्रुमजलैरेनो विश्वरूपवधोद्भवम् । विभक्तमनुगृह्णद्भिर्वृत्रहत्यां क्व मार्ज्म्यहम् ॥ ५ ॥

indra uvāca strī-bhū-druma-jalair eno viśvarūpa-vadhodbhavam vibhaktam anugṛhṇadbhir vṛtra-hatyāṁ kva mārjmy aham

इन्द्र ने कहा — विश्वरूप के वध से उत्पन्न पाप को स्त्रियों, पृथ्वी, वृक्षों और जल ने कृपापूर्वक बाँट लिया था। किंतु वृत्र-हत्या के पाप को मैं कहाँ और कैसे धोऊँ?

श्लोक 6 (bhagavata.6.13.6)

श्रीशुक उवाच ऋषयस्तदुपाकर्ण्य महेन्द्रमिदमब्रुवन् । याजयिष्याम भद्रं ते हयमेधेन मा स्म भैः ॥ ६ ॥

śrī-śuka uvāca ṛṣayas tad upākarṇya mahendram idam abruvan yājayiṣyāma bhadraṁ te hayamedhena mā sma bhaiḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — यह सुनकर ऋषियों ने महेन्द्र से कहा — तुम्हारा कल्याण हो, हम अश्वमेध यज्ञ द्वारा तुमसे यज्ञ करवाएँगे; भयभीत मत हो।

श्लोक 7 (bhagavata.6.13.7)

हयमेधेन पुरुषं परमात्मानमीश्वरम् । इष्ट्वा नारायणं देवं मोक्ष्यसेऽपि जगद्वधात् ॥ ७ ॥

hayamedhena puruṣaṁ paramātmānam īśvaram iṣṭvā nārāyaṇaṁ devaṁ mokṣyase ’pi jagad-vadhāt

अश्वमेध यज्ञ द्वारा परमपुरुष, परमात्मा, ईश्वर भगवान नारायण की आराधना करके तुम समस्त जगत के वध के पाप से भी मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 8 (bhagavata.6.13.8)

ब्रह्महा पितृहा गोघ्नो मातृहाचार्यहाघवान् । श्वादः पुल्कसको वापि शुद्ध्येरन् यस्य कीर्तनात् ॥ ८ ॥

brahma-hā pitṛ-hā go-ghno mātṛ-hācārya-hāghavān śvādaḥ pulkasako vāpi śuddhyeran yasya kīrtanāt

ब्रह्महत्यारा, पितृहत्यारा, गोहत्यारा, मातृहत्यारा अथवा आचार्यहत्यारा जैसा महापापी, या श्वपच (कुत्ता खाने वाला) और पुल्कस जैसा नीच जन भी, जिनके नाम-कीर्तन मात्र से शुद्ध हो जाता है,

श्लोक 9 (bhagavata.6.13.9)

तमश्वमेधेन महामखेन श्रद्धान्वितोऽस्माभिरनुष्ठितेन । हत्वापि सब्रह्मचराचरं त्वं न लिप्यसे किं खलनिग्रहेण ॥ ९ ॥

tam aśvamedhena mahā-makhena śraddhānvito ’smābhir anuṣṭhitena hatvāpi sabrahma-carācaraṁ tvaṁ na lipyase kiṁ khala-nigraheṇa

श्रद्धापूर्वक हमारे द्वारा सम्पन्न इस महान अश्वमेध यज्ञ से उन्हीं नारायण का यजन करके, तुम ब्राह्मणों सहित सम्पूर्ण चराचर जगत को मारकर भी लिप्त नहीं होओगे — फिर एक दुष्ट के दमन मात्र से क्या पाप लगेगा?

श्लोक 10 (bhagavata.6.13.10)

श्रीशुक उवाच एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद्रिपुम् । ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ sañcodito viprair marutvān ahanad ripum brahma-hatyā hate tasminn āsasāda vṛṣākapim

श्रीशुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा प्रेरित होकर मरुत्वान (इन्द्र) ने शत्रु का वध कर दिया। उसके मारे जाने पर ब्रह्महत्या साक्षात् इन्द्र के पास आ पहुँची।

श्लोक 11 (bhagavata.6.13.11)

तयेन्द्रः स्मासहत्तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥

tayendraḥ smāsahat tāpaṁ nirvṛtir nāmum āviśat hrīmantaṁ vācyatāṁ prāptaṁ sukhayanty api no guṇāḥ

उस पाप के कारण इन्द्र संताप सहते रहे, उन्हें शांति प्राप्त नहीं हुई। लज्जाशील स्वभाव के होते हुए लोकनिंदा को प्राप्त इन्द्र को उनके गुण भी सुख नहीं दे सके।

श्लोक 12 (bhagavata.6.13.12)

तां ददर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम् । जरया वेपमानाङ्गीं यक्ष्मग्रस्तामसृक्पटाम् ॥ १२ ॥

tāṁ dadarśānudhāvantīṁ cāṇḍālīm iva rūpiṇīm jarayā vepamānāṅgīṁ yakṣma-grastām asṛk-paṭām

उसने देखा — वह साक्षात् पाप एक चाण्डाली के रूप में उसका पीछा कर रही थी, बुढ़ापे से उसके अंग काँप रहे थे, वह क्षयरोग से ग्रस्त थी, और उसके वस्त्र रक्त से सने थे।

श्लोक 13 (bhagavata.6.13.13)

विकीर्य पलितान् केशांस्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणीम् । मीनगन्ध्यसुगन्धेन कुर्वतीं मार्गदूषणम् ॥ १३ ॥

vikīrya palitān keśāṁs tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣiṇīm mīna-gandhy-asu-gandhena kurvatīṁ mārga-dūṣaṇam

उसके पके हुए बाल बिखरे हुए थे, वह "ठहरो, ठहरो" कहकर पुकार रही थी, तथा मछली जैसी दुर्गंध से मार्ग को दूषित कर रही थी।

श्लोक 14 (bhagavata.6.13.14)

नभो गतो दिशः सर्वाः सहस्राक्षो विशाम्पते । प्रागुदीचीं दिशं तूर्णं प्रविष्टो नृप मानसम् ॥ १४ ॥

nabho gato diśaḥ sarvāḥ sahasrākṣo viśāmpate prāg-udīcīṁ diśaṁ tūrṇaṁ praviṣṭo nṛpa mānasam

हे प्रजापालक! सहस्राक्ष इन्द्र आकाश में गये, फिर सभी दिशाओं में भटके; अंततः हे राजन्, वे शीघ्र ही ईशान दिशा में मानसरोवर में प्रविष्ट हो गये।

श्लोक 15 (bhagavata.6.13.15)

स आवसत्पुष्करनालतन्तू- नलब्धभोगो यदिहाग्निदूतः । वर्षाणि साहस्रमलक्षितोऽन्तः सञ्चिन्तयन् ब्रह्मवधाद्विमोक्षम् ॥ १५ ॥

sa āvasat puṣkara-nāla-tantūn alabdha-bhogo yad ihāgni-dūtaḥ varṣāṇi sāhasram alakṣito ’ntaḥ sañcintayan brahma-vadhād vimokṣam

वे कमल-नाल के तंतुओं में छिपकर, अलक्षित रहकर, सहस्र वर्षों तक निवास करते रहे। चूँकि अग्नि वहाँ नहीं पहुँच सका, अतः वे भोग से वंचित रहे और निरंतर ब्रह्महत्या से मुक्ति का चिंतन करते रहे।

श्लोक 16 (bhagavata.6.13.16)

तावत्त्रिणाकं नहुषः शशास विद्यातपोयोगबलानुभावः । स सम्पदैश्वर्यमदान्धबुद्धि- र्नीतस्तिरश्चां गतिमिन्द्रपत्न्या ॥ १६ ॥

tāvat triṇākaṁ nahuṣaḥ śaśāsa vidyā-tapo-yoga-balānubhāvaḥ sa sampad-aiśvarya-madāndha-buddhir nītas tiraścāṁ gatim indra-patnyā

इतने में नहुष अपनी विद्या, तप और योगबल के प्रभाव से त्रिलोक पर शासन करने लगा। परंतु ऐश्वर्य के मद से अंधबुद्धि होकर उसने इन्द्राणी के प्रति दुर्व्यवहार किया, जिसके कारण वह पशु-योनि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 17 (bhagavata.6.13.17)

ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूत ऋतम्भरध्याननिवारिताघः । पापस्तु दिग्देवतया हतौजा- स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्न्या ॥ १७ ॥

tato gato brahma-giropahūta ṛtambhara-dhyāna-nivāritāghaḥ pāpas tu digdevatayā hataujās taṁ nābhyabhūd avitaṁ viṣṇu-patnyā

तत्पश्चात् ब्राह्मणों के वचन से बुलाए गये इन्द्र वहाँ से गये; सत्य-निष्ठ ध्यान के प्रभाव से उनका पाप निवारित हो गया था। दिशाओं की अधिष्ठात्री देवी के प्रभाव से क्षीण हुआ वह पाप, विष्णुपत्नी लक्ष्मी द्वारा रक्षित इन्द्र पर आक्रमण न कर सका।

श्लोक 18 (bhagavata.6.13.18)

तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत । यथावद्दीक्षञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह ॥ १८ ॥

taṁ ca brahmarṣayo ’bhyetya hayamedhena bhārata yathāvad dīkṣayāṁ cakruḥ puruṣārādhanena ha

हे भरतवंशी! तदनन्तर ब्रह्मर्षिगण उनके पास पहुँचकर, परमपुरुष की आराधना हेतु अश्वमेध यज्ञ में विधिपूर्वक उनकी दीक्षा सम्पन्न करने लगे।

श्लोक 19 (bhagavata.6.13.19)

अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि । अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभिः ॥ १९ ॥

athejyamāne puruṣe sarva-devamayātmani aśvamedhe mahendreṇa vitate brahma-vādibhiḥ

तदनन्तर, जब सम्पूर्ण देवस्वरूप परमपुरुष की आराधना, वेदवेत्ता ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न महेन्द्र के इस अश्वमेध यज्ञ में की गई,

श्लोक 20 (bhagavata.6.13.20)

स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप । नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ॥ २० ॥

sa vai tvāṣṭra-vadho bhūyān api pāpa-cayo nṛpa nītas tenaiva śūnyāya nīhāra iva bhānunā

तब हे राजन्! त्वष्टा-पुत्र वृत्र के वध का वह महान पापसंचय भी उसी यज्ञ के प्रभाव से उसी प्रकार शून्य हो गया, जैसे सूर्योदय होते ही कुहासा विलीन हो जाता है।

श्लोक 21 (bhagavata.6.13.21)

स वाजिमेधेन यथोदितेन वितायमानेन मरीचिमिश्रैः । इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण- मिन्द्रो महानास विधूतपापः ॥ २१ ॥

sa vājimedhena yathoditena vitāyamānena marīci-miśraiḥ iṣṭvādhiyajñaṁ puruṣaṁ purāṇam indro mahān āsa vidhūta-pāpaḥ

मरीचि आदि ऋषियों द्वारा विधिपूर्वक सम्पन्न किये गये उस अश्वमेध यज्ञ के द्वारा, अधियज्ञस्वरूप सनातन परमपुरुष की आराधना करके, इन्द्र अपने पापों से मुक्त होकर पुनः महान् इन्द्रपद को प्राप्त हुए।

श्लोक 22 (bhagavata.6.13.22)

इदं महाख्यानमशेषपाप्मनांप्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् । भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनंमहेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः ॥ २२ ॥

idaṁ mahākhyānam aśeṣa-pāpmanāṁ prakṣālanaṁ tīrthapadānukīrtanam bhakty-ucchrayaṁ bhakta-janānuvarṇanaṁ mahendra-mokṣaṁ vijayaṁ marutvataḥ

यह महान आख्यान समस्त पापों का प्रक्षालन करने वाला, तीर्थस्वरूप भगवान के चरणों का कीर्तन करने वाला, भक्ति की महिमा बढ़ाने वाला, भक्तजनों का वर्णन करने वाला, तथा महेन्द्र की मुक्ति और उनकी विजय का वर्णन करने वाला है।

श्लोक 23 (bhagavata.6.13.23)

पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधाःशृण्वन्त्यथो पर्वणि पर्वणीन्द्रियम् । धन्यं यशस्यं निखिलाघमोचनंरिपुञ्जयं स्वस्त्ययनं तथायुषम् ॥ २३ ॥

paṭheyur ākhyānam idaṁ sadā budhāḥ śṛṇvanty atho parvaṇi parvaṇīndriyam dhanyaṁ yaśasyaṁ nikhilāgha-mocanaṁ ripuñjayaṁ svasty-ayanaṁ tathāyuṣam

विद्वज्जन इस आख्यान का सदैव पाठ करें और विशेषतः प्रत्येक पर्व पर इसे श्रवण करें; यह धन्य, यशस्वी, समस्त पापों से मुक्ति देने वाला, शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला, कल्याणकारी तथा आयुवर्धक है।

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