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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14

राजा चित्रकेतु का विलाप

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (bhagavata.6.14.1)

श्रीपरीक्षिदुवाच रजस्तमःस्वभावस्य ब्रह्मन् वृत्रस्य पाप्मनः । नारायणे भगवति कथमासीद् दृढा मतिः ॥ १ ॥

śrī-parīkṣid uvāca rajas-tamaḥ-svabhāvasya brahman vṛtrasya pāpmanaḥ nārāyaṇe bhagavati katham āsīd dṛḍhā matiḥ

श्रीपरीक्षित् ने कहा — हे ब्रह्मन्! वृत्रासुर का स्वभाव तो रज-तम प्रधान था और वह पापी था, फिर भगवान नारायण में उसकी बुद्धि इतनी दृढ़ कैसे स्थापित हुई?

श्लोक 2 (bhagavata.6.14.2)

देवानां शुद्धसत्त्वानामृषीणां चामलात्मनाम् । भक्तिर्मुकुन्दचरणे न प्रायेणोपजायते ॥ २ ॥

devānāṁ śuddha-sattvānām ṛṣīṇāṁ cāmalātmanām bhaktir mukunda-caraṇe na prāyeṇopajāyate

शुद्ध सत्त्वगुणी देवताओं की और निर्मल अन्तःकरण वाले ऋषियों की भी भगवान मुकुन्द के चरणों में प्रायः ऐसी भक्ति उत्पन्न नहीं होती।

श्लोक 3 (bhagavata.6.14.3)

रजोभिः समसङ्ख्याताः पार्थिवैरिह जन्तवः । तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादयः ॥ ३ ॥

rajobhiḥ sama-saṅkhyātāḥ pārthivair iha jantavaḥ teṣāṁ ye kecanehante śreyo vai manujādayaḥ

इस जगत में जीव, धूलिकणों के समान असंख्य हैं। उनमें से जो मनुष्यादि हैं, उनमें भी केवल कुछ ही कल्याण की चेष्टा करते हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.6.14.4)

प्रायो मुमुक्षवस्तेषां केचनैव द्विजोत्तम । मुमुक्षूणां सहस्रेषु कश्चिन्मुच्येत सिध्यति ॥ ४ ॥

prāyo mumukṣavas teṣāṁ kecanaiva dvijottama mumukṣūṇāṁ sahasreṣu kaścin mucyeta sidhyati

हे द्विजोत्तम! उनमें से भी प्रायः कुछ ही मुमुक्षु (मोक्षेच्छु) होते हैं, और हजारों मुमुक्षुओं में कोई एक ही वास्तव में मुक्त होकर सिद्धि पाता है।

श्लोक 5 (bhagavata.6.14.5)

मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥

muktānām api siddhānāṁ nārāyaṇa-parāyaṇaḥ su-durlabhaḥ praśāntātmā koṭiṣv api mahā-mune

हे महामुने! मुक्त और सिद्ध पुरुषों में भी करोड़ों में कोई एक ही नारायण-परायण होता है, जो शांतचित्त और अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 6 (bhagavata.6.14.6)

वृत्रस्तु स कथं पापः सर्वलोकोपतापनः । इत्थं दृढमतिः कृष्ण आसीत्सङ्ग्राम उल्बणे ॥ ६ ॥

vṛtras tu sa kathaṁ pāpaḥ sarva-lokopatāpanaḥ itthaṁ dṛḍha-matiḥ kṛṣṇa āsīt saṅgrāma ulbaṇe

किंतु वृत्रासुर तो पापी और समस्त लोकों को संतप्त करने वाला था — फिर घोर संग्राम में भी उसकी बुद्धि कृष्ण में इस प्रकार दृढ़ कैसे रही?

श्लोक 7 (bhagavata.6.14.7)

अत्र नः संशयो भूयाञ्छ्रोतुं कौतूहलं प्रभो । यः पौरुषेण समरे सहस्राक्षमतोषयत् ॥ ७ ॥

atra naḥ saṁśayo bhūyāñ chrotuṁ kautūhalaṁ prabho yaḥ pauruṣeṇa samare sahasrākṣam atoṣayat

हे प्रभो! इस विषय में हमें बड़ा संशय है और सुनने की उत्कंठा भी, कि जिसने अपने पराक्रम से युद्ध में सहस्राक्ष इन्द्र को भी संतुष्ट कर दिया, वह कैसा था।

श्लोक 8 (bhagavata.6.14.8)

श्रीसूत उवाच परीक्षितोऽथ सम्प्रश्नं भगवान् बादरायणिः । निशम्य श्रद्दधानस्य प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८ ॥

śrī-sūta uvāca parīkṣito ’tha sampraśnaṁ bhagavān bādarāyaṇiḥ niśamya śraddadhānasya pratinandya vaco ’bravīt

श्रीसूत जी ने कहा — तब भगवान बादरायणि (शुकदेव) ने परीक्षित् के इस प्रश्न को सुनकर, उनकी श्रद्धा देखकर, प्रसन्नतापूर्वक कहना आरम्भ किया।

श्लोक 9 (bhagavata.6.14.9)

श्रीशुक उवाच शृणुष्वावहितो राजन्नितिहासमिमं यथा । श्रुतं द्वैपायनमुखान्नारदाद्देवलादपि ॥ ९ ॥

śrī-śuka uvāca śṛṇuṣvāvahito rājann itihāsam imaṁ yathā śrutaṁ dvaipāyana-mukhān nāradād devalād api

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! अब मैं यह इतिहास सुनाता हूँ, जैसा मैंने व्यासदेव, नारद और देवल के मुख से सुना था; ध्यानपूर्वक सुनो।

श्लोक 10 (bhagavata.6.14.10)

आसीद्राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप । चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत्कामधुङ्मही ॥ १० ॥

āsīd rājā sārvabhaumaḥ śūraseneṣu vai nṛpa citraketur iti khyāto yasyāsīt kāmadhuṅ mahī

शूरसेन देश में चित्रकेतु नामक एक चक्रवर्ती राजा हुए, हे नृप, जिनके राज्य में पृथ्वी सब कुछ इच्छानुसार प्रदान करने वाली गौ के समान थी।

श्लोक 11 (bhagavata.6.14.11)

तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् । सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥ ११ ॥

tasya bhāryā-sahasrāṇāṁ sahasrāṇi daśābhavan sāntānikaś cāpi nṛpo na lebhe tāsu santatim

उस राजा की दस हजार रानियाँ थीं, फिर भी संतान उत्पन्न करने में समर्थ होते हुए भी वह राजा उनसे कोई संतान न पा सका।

श्लोक 12 (bhagavata.6.14.12)

रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभिः । सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैश्चिन्ता बन्ध्यापतेरभूत् ॥ १२ ॥

rūpaudārya-vayo-janma- vidyaiśvarya-śriyādibhiḥ sampannasya guṇaiḥ sarvaiś cintā bandhyā-pater abhūt

रूप, उदारता, युवावस्था, कुल, विद्या, ऐश्वर्य और श्री आदि सभी गुणों से सम्पन्न होते हुए भी, संतानहीन उस पति को सदा चिंता बनी रहती थी।

श्लोक 13 (bhagavata.6.14.13)

न तस्य सम्पदः सर्वा महिष्यो वामलोचनाः । सार्वभौमस्य भूश्चेयमभवन्प्रीतिहेतवः ॥ १३ ॥

na tasya sampadaḥ sarvā mahiṣyo vāma-locanāḥ sārvabhaumasya bhūś ceyam abhavan prīti-hetavaḥ

उसकी वे सारी सम्पदाएँ, सुनयना रानियाँ, और सम्पूर्ण पृथ्वी का साम्राज्य — कोई भी वस्तु उसे प्रसन्नता का कारण न बन सकी।

श्लोक 14 (bhagavata.6.14.14)

तस्यैकदा तु भवनमङ्गिरा भगवानृषिः । लोकाननुचरन्नेतानुपागच्छद्यदृच्छया ॥ १४ ॥

tasyaikadā tu bhavanam aṅgirā bhagavān ṛṣiḥ lokān anucarann etān upāgacchad yadṛcchayā

एक बार भगवान अंगिरा ऋषि, समस्त लोकों में विचरण करते हुए, अपनी इच्छा से सहज ही उसके राजमहल में आ पहुँचे।

श्लोक 15 (bhagavata.6.14.15)

तं पूजयित्वा विधिवत्प्रत्युत्थानार्हणादिभिः । कृतातिथ्यमुपासीदत्सुखासीनं समाहितः ॥ १५ ॥

taṁ pūjayitvā vidhivat pratyutthānārhaṇādibhiḥ kṛtātithyam upāsīdat sukhāsīnaṁ samāhitaḥ

राजा ने खड़े होकर विधिपूर्वक उनका पूजन किया और अतिथि-सत्कार सम्पन्न कर, सुखपूर्वक आसीन उन ऋषि की एकाग्रचित्त होकर सेवा की।

श्लोक 16 (bhagavata.6.14.16)

महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ । प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत् ॥ १६ ॥

maharṣis tam upāsīnaṁ praśrayāvanataṁ kṣitau pratipūjya mahārāja samābhāṣyedam abravīt

हे महाराज! विनम्रतापूर्वक भूमि पर बैठे राजा का महर्षि ने सम्मान करते हुए, उनसे संभाषण करते हुए यह कहा।

श्लोक 17 (bhagavata.6.14.17)

अङ्गिरा उवाच अपि तेऽनामयं स्वस्ति प्रकृतीनां तथात्मनः । यथा प्रकृतिभिर्गुप्तः पुमान् राजा च सप्तभिः ॥ १७ ॥

aṅgirā uvāca api te ’nāmayaṁ svasti prakṛtīnāṁ tathātmanaḥ yathā prakṛtibhir guptaḥ pumān rājā ca saptabhiḥ

अंगिरा ने कहा — क्या तुम्हारे शरीर, मन तथा प्रजा का कुशल-क्षेम है? क्या राजा तथा सातों प्रकृतियों (अंगों) से युक्त पुरुष की भाँति तुम सुरक्षित हो?

श्लोक 18 (bhagavata.6.14.18)

आत्मानं प्रकृतिष्वद्धा निधाय श्रेय आप्नुयात् । राज्ञा तथा प्रकृतयो नरदेवाहिताधयः ॥ १८ ॥

ātmānaṁ prakṛtiṣv addhā nidhāya śreya āpnuyāt rājñā tathā prakṛtayo naradevāhitādhayaḥ

अपने-आपको प्रकृतियों (राज्य के अंगों) पर पूर्णतः निर्भर रखकर ही राजा कल्याण पाता है, और वैसे ही प्रजा भी राजा के प्रति समर्पित रहकर सुखी होती है।

श्लोक 19 (bhagavata.6.14.19)

अपि दाराः प्रजामात्या भृत्याः श्रेण्योऽथ मन्त्रिणः । पौरा जानपदा भूपा आत्मजा वशवर्तिनः ॥ १९ ॥

api dārāḥ prajāmātyā bhṛtyāḥ śreṇyo ’tha mantriṇaḥ paurā jānapadā bhūpā ātmajā vaśa-vartinaḥ

क्या तुम्हारी पत्नियाँ, प्रजा, अमात्य, सेवकगण, श्रेणियाँ (व्यापारी-संघ), मंत्री, नगरवासी, ग्रामवासी, अन्य राजागण और पुत्रगण — सब तुम्हारे वश में हैं?

श्लोक 20 (bhagavata.6.14.20)

यस्यात्मानुवशश्चेत्स्यात्सर्वे तद्वशगा इमे । लोकाः सपाला यच्छन्ति सर्वे बलिमतन्द्रिताः ॥ २० ॥

yasyātmānuvaśaś cet syāt sarve tad-vaśagā ime lokāḥ sapālā yacchanti sarve balim atandritāḥ

जिसका मन स्वयं उसके वश में है, उसके अधीन ये सब स्वतः हो जाते हैं; तब समस्त लोक अपने-अपने शासकों सहित बिना आलस्य के उसे कर अर्पित करते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.6.14.21)

आत्मनः प्रीयते नात्मा परतः स्वत एव वा । लक्षयेऽलब्धकामं त्वां चिन्तया शबलं मुखम् ॥ २१ ॥

ātmanaḥ prīyate nātmā parataḥ svata eva vā lakṣaye ’labdha-kāmaṁ tvāṁ cintayā śabalaṁ mukham

किंतु आत्मा को न तो पर से और न स्वयं से ही संतोष प्राप्त होता प्रतीत होता है — मुझे लगता है कि तुम्हारी अभिलाषा अपूर्ण है, क्योंकि तुम्हारा मुख चिंता से म्लान है।

श्लोक 22 (bhagavata.6.14.22)

एवं विकल्पितो राजन् विदुषा मुनिनापि सः । प्रश्रयावनतोऽभ्याह प्रजाकामस्ततो मुनिम् ॥ २२ ॥

evaṁ vikalpito rājan viduṣā munināpi saḥ praśrayāvanato ’bhyāha prajā-kāmas tato munim

हे राजन्! यद्यपि वह विद्वान मुनि सब कुछ जानते थे, तथापि इस प्रकार पूछे जाने पर, संतानेच्छु राजा चित्रकेतु ने विनम्रतापूर्वक मुनि से यह कहा।

श्लोक 23 (bhagavata.6.14.23)

चित्रकेतुरुवाच भगवन् किं न विदितं तपोज्ञानसमाधिभिः । योगिनां ध्वस्तपापानां बहिरन्तः शरीरिषु ॥ २३ ॥

citraketur uvāca bhagavan kiṁ na viditaṁ tapo-jñāna-samādhibhiḥ yogināṁ dhvasta-pāpānāṁ bahir antaḥ śarīriṣu

चित्रकेतु ने कहा — हे भगवन्! तप, ज्ञान और समाधि से जिनके पाप नष्ट हो चुके हैं, ऐसे योगियों से देहधारियों का बाह्य-आभ्यंतर कुछ भी अज्ञात नहीं रहता।

श्लोक 24 (bhagavata.6.14.24)

तथापि पृच्छतो ब्रूयां ब्रह्मन्नात्मनि चिन्तितम् । भवतो विदुषश्चापि चोदितस्त्वदनुज्ञया ॥ २४ ॥

tathāpi pṛcchato brūyāṁ brahmann ātmani cintitam bhavato viduṣaś cāpi coditas tvad-anujñayā

फिर भी, हे ब्रह्मन्! आपने पूछा है और आपकी अनुमति से प्रेरित होकर, मैं अपने मन में जो चिंतित है, वह आप जैसे ज्ञानी को भी बताता हूँ।

श्लोक 25 (bhagavata.6.14.25)

लोकपालैरपि प्रार्थ्याः साम्राज्यैश्वर्यसम्पदः । न नन्दयन्त्यप्रजं मां क्षुत्तृट्काममिवापरे ॥ २५ ॥

loka-pālair api prārthyāḥ sāmrājyaiśvarya-sampadaḥ na nandayanty aprajaṁ māṁ kṣut-tṛṭ-kāmam ivāpare

जो साम्राज्य-ऐश्वर्य की सम्पदाएँ लोकपालों को भी वांछनीय हैं, वे भी संतानहीन मुझे प्रसन्न नहीं करतीं, जैसे भूख-प्यास से पीड़ित व्यक्ति को अन्य वस्तुएँ सुख नहीं देतीं।

श्लोक 26 (bhagavata.6.14.26)

ततः पाहि महाभाग पूर्वैः सह गतं तमः । यथा तरेम दुष्पारं प्रजया तद्विधेहि नः ॥ २६ ॥

tataḥ pāhi mahā-bhāga pūrvaiḥ saha gataṁ tamaḥ yathā tarema duṣpāraṁ prajayā tad vidhehi naḥ

अतः हे महाभाग! मेरी और मेरे पूर्वजों की, जो मेरे साथ ही अंधकार को प्राप्त हो रहे हैं, रक्षा कीजिये; ऐसी व्यवस्था कीजिये कि हम संतान द्वारा उस दुस्तर अंधकार को पार कर सकें।

श्लोक 27 (bhagavata.6.14.27)

श्रीशुक उवाच इत्यर्थितः स भगवान् कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः । श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद्विभुः ॥ २७ ॥

śrī-śuka uvāca ity arthitaḥ sa bhagavān kṛpālur brahmaṇaḥ sutaḥ śrapayitvā caruṁ tvāṣṭraṁ tvaṣṭāram ayajad vibhuḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर, ब्रह्माजी के दयालु पुत्र अंगिरा ऋषि ने त्वष्टा-सम्बन्धी चरु पकाकर, त्वष्टा देवता का यजन किया।

श्लोक 28 (bhagavata.6.14.28)

ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणां च भारत । नाम्ना कृतद्युतिस्तस्यै यज्ञोच्छिष्टमदाद् द्विजः ॥ २८ ॥

jyeṣṭhā śreṣṭhā ca yā rājño mahiṣīṇāṁ ca bhārata nāmnā kṛtadyutis tasyai yajñocchiṣṭam adād dvijaḥ

हे भरतवंशी! राजा की रानियों में जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ थी, कृतद्युति नामक उस रानी को उस द्विज (अंगिरा) ने यज्ञ की शेष सामग्री प्रदान की।

श्लोक 29 (bhagavata.6.14.29)

अथाह नृपतिं राजन् भवितैकस्तवात्मजः । हर्षशोकप्रदस्तुभ्यमिति ब्रह्मसुतो ययौ ॥ २९ ॥

athāha nṛpatiṁ rājan bhavitaikas tavātmajaḥ harṣa-śoka-pradas tubhyam iti brahma-suto yayau

तत्पश्चात् उन्होंने राजा से कहा — हे राजन्! अब तुम्हें एक पुत्र प्राप्त होगा, जो तुम्हें हर्ष और शोक दोनों देने वाला होगा — ऐसा कहकर ब्रह्मपुत्र अंगिरा वहाँ से चले गये।

श्लोक 30 (bhagavata.6.14.30)

सापि तत्प्राशनादेव चित्रकेतोरधारयत् । गर्भं कृतद्युतिर्देवी कृत्तिकाग्नेरिवात्मजम् ॥ ३० ॥

sāpi tat-prāśanād eva citraketor adhārayat garbhaṁ kṛtadyutir devī kṛttikāgner ivātmajam

वह चरु ग्रहण करते ही देवी कृतद्युति ने चित्रकेतु से गर्भ धारण किया, ठीक जैसे कृत्तिका ने अग्नि से (शिव के तेज से) पुत्र धारण किया था।

श्लोक 31 (bhagavata.6.14.31)

तस्या अनुदिनं गर्भः शुक्लपक्ष इवोडुपः । ववृधे शूरसेनेशतेजसा शनकैर्नृप ॥ ३१ ॥

tasyā anudinaṁ garbhaḥ śukla-pakṣa ivoḍupaḥ vavṛdhe śūraseneśa- tejasā śanakair nṛpa

हे राजन्! शूरसेनपति चित्रकेतु के तेज से वह गर्भ, शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान, प्रतिदिन धीरे-धीरे बढ़ता गया।

श्लोक 32 (bhagavata.6.14.32)

अथ काल उपावृत्ते कुमारः समजायत । जनयन् शूरसेनानां शृण्वतां परमां मुदम् ॥ ३२ ॥

atha kāla upāvṛtte kumāraḥ samajāyata janayan śūrasenānāṁ śṛṇvatāṁ paramāṁ mudam

समय पूर्ण होने पर एक कुमार का जन्म हुआ, जिससे शूरसेन देश के समस्त श्रोताजनों को परम आनंद हुआ।

श्लोक 33 (bhagavata.6.14.33)

हृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचिरलङ्कृतः । वाचयित्वाशिषो विप्रैः कारयामास जातकम् ॥ ३३ ॥

hṛṣṭo rājā kumārasya snātaḥ śucir alaṅkṛtaḥ vācayitvāśiṣo vipraiḥ kārayām āsa jātakam

हर्षित राजा ने स्नान कर, पवित्र और आभूषित होकर, ब्राह्मणों से आशीर्वचन कहलवाकर कुमार का जातकर्म संस्कार सम्पन्न कराया।

श्लोक 34 (bhagavata.6.14.34)

तेभ्यो हिरण्यं रजतं वासांस्याभरणानि च । ग्रामान् हयान् गजान् प्रादाद् धेनूनामर्बुदानि षट् ॥ ३४ ॥

tebhyo hiraṇyaṁ rajataṁ vāsāṁsy ābharaṇāni ca grāmān hayān gajān prādād dhenūnām arbudāni ṣaṭ

उन्होंने ब्राह्मणों को सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण, गाँव, घोड़े, हाथी तथा साठ करोड़ गौएँ दान में दीं।

श्लोक 35 (bhagavata.6.14.35)

ववर्ष कामानन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः ॥ ३५ ॥

vavarṣa kāmān anyeṣāṁ parjanya iva dehinām dhanyaṁ yaśasyam āyuṣyaṁ kumārasya mahā-manāḥ

उदारचित्त राजा ने पुत्र के धन्य, यशस्वी और दीर्घायु होने की कामना से, मानो वर्षा के समान, सबकी इच्छित वस्तुएँ बरसा दीं।

श्लोक 36 (bhagavata.6.14.36)

कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेस्तनयेऽनुदिनं पितुः । यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत ॥ ३६ ॥

kṛcchra-labdhe ’tha rājarṣes tanaye ’nudinaṁ pituḥ yathā niḥsvasya kṛcchrāpte dhane sneho ’nvavardhata

जैसे किसी निर्धन को बड़ी कठिनाई से प्राप्त धन में स्नेह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है, वैसे ही राजर्षि का, बड़ी कठिनाई से प्राप्त उस पुत्र के प्रति स्नेह भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया।

श्लोक 37 (bhagavata.6.14.37)

मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्भवः । कृतद्युतेः सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत् ॥ ३७ ॥

mātus tv atitarāṁ putre sneho moha-samudbhavaḥ kṛtadyuteḥ sapatnīnāṁ prajā-kāma-jvaro ’bhavat

माता का स्नेह पुत्र के प्रति और भी अधिक, मोहवश उत्पन्न हुआ। इस कारण कृतद्युति की सौतों में संतान पाने की तीव्र लालसा ज्वर के समान उत्पन्न हो गई।

श्लोक 38 (bhagavata.6.14.38)

चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति । न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम् ॥ ३८ ॥

citraketor atiprītir yathā dāre prajāvati na tathānyeṣu sañjajñe bālaṁ lālayato ’nvaham

जितना प्रेम चित्रकेतु का उस संतानवती पत्नी के प्रति दिन-प्रतिदिन बालक को दुलारते हुए बढ़ता गया, उतना प्रेम अन्य किसी रानी के प्रति उत्पन्न नहीं हुआ।

श्लोक 39 (bhagavata.6.14.39)

ताः पर्यतप्यन्नात्मानं गर्हयन्त्योऽभ्यसूयया । आनपत्येन दुःखेन राज्ञश्चानादरेण च ॥ ३९ ॥

tāḥ paryatapyann ātmānaṁ garhayantyo ’bhyasūyayā ānapatyena duḥkhena rājñaś cānādareṇa ca

वे रानियाँ संतानहीनता के दुःख से और राजा की उपेक्षा से ईर्ष्यावश स्वयं को धिक्कारती हुई निरंतर संतप्त रहने लगीं।

श्लोक 40 (bhagavata.6.14.40)

धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम् । सुप्रजाभिः सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम् ॥ ४० ॥

dhig aprajāṁ striyaṁ pāpāṁ patyuś cāgṛha-sammatām suprajābhiḥ sapatnībhir dāsīm iva tiraskṛtām

धिक्कार है उस संतानहीन, पापिनी और पति के घर में अनादृत स्त्री को, जो सुसंतान वाली सौतों द्वारा दासी के समान तिरस्कृत होती है।

श्लोक 41 (bhagavata.6.14.41)

दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया । अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः ॥ ४१ ॥

dāsīnāṁ ko nu santāpaḥ svāminaḥ paricaryayā abhīkṣṇaṁ labdha-mānānāṁ dāsyā dāsīva durbhagāḥ

स्वामी की निरंतर सेवा करने वाली दासियों को भी आदर मिलता रहता है, उन्हें भला क्या संताप हो — किंतु हम तो उस दासी की भी दासी हैं, अतः हम अत्यंत अभागी हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.6.14.42)

एवं सन्दह्यमानानां सपत्न्याः पुत्रसम्पदा । राज्ञोऽसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत् ॥ ४२ ॥

evaṁ sandahyamānānāṁ sapatnyāḥ putra-sampadā rājño ’sammata-vṛttīnāṁ vidveṣo balavān abhūt

इस प्रकार सौत के पुत्र-सम्पदा से संतप्त होती हुई तथा राजा द्वारा अनादृत उन रानियों में यह द्वेष अत्यंत प्रबल हो गया।

श्लोक 43 (bhagavata.6.14.43)

विद्वेषनष्टमतयः स्त्रियो दारुणचेतसः । गरं ददुः कुमाराय दुर्मर्षा नृपतिं प्रति ॥ ४३ ॥

vidveṣa-naṣṭa-matayaḥ striyo dāruṇa-cetasaḥ garaṁ daduḥ kumārāya durmarṣā nṛpatiṁ prati

द्वेष से बुद्धिभ्रष्ट, कठोर हृदय वाली तथा राजा की उपेक्षा को असह्य समझने वाली उन स्त्रियों ने अंततः उस कुमार को विष दे दिया।

श्लोक 44 (bhagavata.6.14.44)

कृतद्युतिरजानन्ती सपत्नीनामघं महत् । सुप्त एवेति सञ्चिन्त्य निरीक्ष्य व्यचरद्गृहे ॥ ४४ ॥

kṛtadyutir ajānantī sapatnīnām aghaṁ mahat supta eveti sañcintya nirīkṣya vyacarad gṛhe

सौतों के इस महापाप से अनजान कृतद्युति यही सोचकर घर में विचरण करती रही कि उसका पुत्र गहरी नींद में सो रहा है, और उसे देखती रही।

श्लोक 45 (bhagavata.6.14.45)

शयानं सुचिरं बालमुपधार्य मनीषिणी । पुत्रमानय मे भद्रे इति धात्रीमचोदयत् ॥ ४५ ॥

śayānaṁ suciraṁ bālam upadhārya manīṣiṇī putram ānaya me bhadre iti dhātrīm acodayat

देर तक बालक को सोया हुआ देखकर, बुद्धिमती रानी ने धाय से कहा — हे भद्रे! मेरे पुत्र को यहाँ ले आओ।

श्लोक 46 (bhagavata.6.14.46)

सा शयानमुपव्रज्य दृष्ट्वा चोत्तारलोचनम् । प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्तं हतास्मीत्यपतद्भुवि ॥ ४६ ॥

sā śayānam upavrajya dṛṣṭvā cottāra-locanam prāṇendriyātmabhis tyaktaṁ hatāsmīty apatad bhuvi

वह धाय सोए हुए बालक के पास गई और उसकी आँखें ऊपर की ओर स्थिर देखकर, प्राण-इन्द्रियों से रहित समझकर, 'मैं मारी गई' यह कहते हुए भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 47 (bhagavata.6.14.47)

तस्यास्तदाकर्ण्य भृशातुरं स्वरं घ्नन्त्याः कराभ्यामुर उच्चकैरपि । प्रविश्य राज्ञी त्वरयात्मजान्तिकं ददर्श बालं सहसा मृतं सुतम् ॥ ४७ ॥

tasyās tadākarṇya bhṛśāturaṁ svaraṁ ghnantyāḥ karābhyām ura uccakair api praviśya rājñī tvarayātmajāntikaṁ dadarśa bālaṁ sahasā mṛtaṁ sutam

उसका अत्यंत व्याकुल स्वर सुनकर, दोनों हाथों से छाती पीटते हुए उसका करुण-क्रंदन सुनकर, रानी शीघ्रता से पुत्र के पास गई और अचानक अपने पुत्र को मृत पाया।

श्लोक 48 (bhagavata.6.14.48)

पपात भूमौ परिवृद्धया शुचा मुमोह विभ्रष्टशिरोरुहाम्बरा ॥ ४८ ॥

papāta bhūmau parivṛddhayā śucā mumoha vibhraṣṭa-śiroruhāmbarā

अत्यंत गहरे शोक से वह भूमि पर गिर पड़ी, उसके केश और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये, और वह मूर्च्छित हो गई।

श्लोक 49 (bhagavata.6.14.49)

ततो नृपान्तः पुरवर्तिनो जना नराश्च नार्यश्च निशम्य रोदनम् । आगत्य तुल्यव्यसनाः सुदुःखिता- स्ताश्च व्यलीकं रुरुदुः कृतागसः ॥ ४९ ॥

tato nṛpāntaḥpura-vartino janā narāś ca nāryaś ca niśamya rodanam āgatya tulya-vyasanāḥ suduḥkhitās tāś ca vyalīkaṁ ruruduḥ kṛtāgasaḥ

तब राजमहल में रहने वाले स्त्री-पुरुष, इस रुदन को सुनकर वहाँ आये, और स्वयं को भी उतना ही दुःखी दिखाते हुए रोने लगे; अपने अपराध को जानने वाली वे (सौतें) भी कपटपूर्वक रोने लगीं।

श्लोक 50 (bhagavata.6.14.50)

श्रुत्वा मृतं पुत्रमलक्षितान्तकं विनष्टदृष्टिः प्रपतन् स्खलन् पथि । स्नेहानुबन्धैधितया शुचा भृशं विमूर्च्छितोऽनुप्रकृतिर्द्विजैर्वृतः ॥ ५० ॥

śrutvā mṛtaṁ putram alakṣitāntakaṁ vinaṣṭa-dṛṣṭiḥ prapatan skhalan pathi snehānubandhaidhitayā śucā bhṛśaṁ vimūrcchito ’nuprakṛtir dvijair vṛtaḥ

अज्ञात कारण से पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर, राजा की दृष्टि क्षीण हो गई; मार्ग में डगमगाते और गिरते हुए, अत्यधिक स्नेहवश उत्पन्न प्रबल शोक से, ब्राह्मणों और अनुचरों से घिरे हुए राजा मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 51 (bhagavata.6.14.51)

पपात बालस्य स पादमूले मृतस्य विस्रस्तशिरोरुहाम्बरः । दीर्घं श्वसन् बाष्पकलोपरोधतो निरुद्धकण्ठो न शशाक भाषितुम् ॥ ५१ ॥

papāta bālasya sa pāda-mūle mṛtasya visrasta-śiroruhāmbaraḥ dīrghaṁ śvasan bāṣpa-kaloparodhato niruddha-kaṇṭho na śaśāka bhāṣitum

वे मृत बालक के चरणों में गिर पड़े, उनके केश और वस्त्र बिखर गए; लंबी साँसें लेते हुए, अश्रुओं से अवरुद्ध कंठ के कारण वे कुछ भी बोल न सके।

श्लोक 52 (bhagavata.6.14.52)

पतिं निरीक्ष्योरुशुचार्पितं तदा मृतं च बालं सुतमेकसन्ततिम् । जनस्य राज्ञी प्रकृतेश्च हृद्रुजं सती दधाना विललाप चित्रधा ॥ ५२ ॥

patiṁ nirīkṣyoru-śucārpitaṁ tadā mṛtaṁ ca bālaṁ sutam eka-santatim janasya rājñī prakṛteś ca hṛd-rujaṁ satī dadhānā vilalāpa citradhā

अपने पति को अत्यंत शोक में डूबा और अपने एकमात्र पुत्र को मृत देखकर, वह सती रानी, प्रजा और अंतःपुरवासियों के हृदय में भी पीड़ा उत्पन्न करती हुई, नाना प्रकार से विलाप करने लगी।

श्लोक 53 (bhagavata.6.14.53)

स्तनद्वयं कुङ्कुमपङ्कमण्डितं निषिञ्चती साञ्जनबाष्पबिन्दुभिः । विकीर्य केशान् विगलत्स्रजः सुतं शुशोच चित्रं कुररीव सुस्वरम् ॥ ५३ ॥

stana-dvayaṁ kuṅkuma-paṅka-maṇḍitaṁ niṣiñcatī sāñjana-bāṣpa-bindubhiḥ vikīrya keśān vigalat-srajaḥ sutaṁ śuśoca citraṁ kurarīva susvaram

कुंकुम से रँगे अपने दोनों स्तनों को काजल मिश्रित अश्रुबिंदुओं से भिगोती हुई, बिखरे केशों और गिरती माला के साथ, वह कुररी पक्षी के समान करुण स्वर में अपने पुत्र के लिए विचित्र प्रकार से शोक करने लगी।

श्लोक 54 (bhagavata.6.14.54)

अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे । परे नु जीवत्यपरस्य या मृति- र्विपर्ययश्चेत्त्वमसि ध्रुवः परः ॥ ५४ ॥

aho vidhātas tvam atīva bāliśo yas tv ātma-sṛṣṭy-apratirūpam īhase pare nu jīvaty aparasya yā mṛtir viparyayaś cet tvam asi dhruvaḥ paraḥ

हाय विधाता! तुम अत्यंत बालक-सुलभ (अबोध) हो, जो अपनी ही रचना के विपरीत आचरण करते हो — यदि पिता के जीवित रहते पुत्र की मृत्यु ही तुम्हारा नियम है, तो निश्चय ही तुम शत्रु हो, दयालु नहीं।

श्लोक 55 (bhagavata.6.14.55)

न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः शरीरिणामस्तु तदात्मकर्मभिः । यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५५ ॥

na hi kramaś ced iha mṛtyu-janmanoḥ śarīriṇām astu tad ātma-karmabhiḥ yaḥ sneha-pāśo nija-sarga-vṛddhaye svayaṁ kṛtas te tam imaṁ vivṛścasi

यदि यहाँ जन्म और मृत्यु का यह क्रम प्राणियों के अपने ही कर्मों के अनुसार ही चलता है (और किसी नियन्ता की आवश्यकता नहीं), तो जो स्नेह-पाश तुमने स्वयं ही अपनी सृष्टि की वृद्धि के लिए रचा था, उसे तुम स्वयं ही क्यों काट देते हो?

श्लोक 56 (bhagavata.6.14.56)

त्वं तात नार्हसि च मां कृपणामनाथां त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् । अञ्जस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद् ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५६ ॥

tvaṁ tāta nārhasi ca māṁ kṛpaṇām anāthāṁ tyaktuṁ vicakṣva pitaraṁ tava śoka-taptam añjas tarema bhavatāpraja-dustaraṁ yad dhvāntaṁ na yāhy akaruṇena yamena dūram

हे तात! तुम्हें मुझ असहाय और अनाथ को इस प्रकार त्यागना उचित नहीं। अपने शोकसंतप्त पिता की ओर तो देखो! हम तुम्हारे बिना उस दुस्तर अंधकार को सहज ही पार कर लें — इसलिये निर्दयी यमराज के साथ इतनी दूर मत जाओ।

श्लोक 57 (bhagavata.6.14.57)

उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या- स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् । सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो भुङ्क्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५७ ॥

uttiṣṭha tāta ta ime śiśavo vayasyās tvām āhvayanti nṛpa-nandana saṁvihartum suptaś ciraṁ hy aśanayā ca bhavān parīto bhuṅkṣva stanaṁ piba śuco hara naḥ svakānām

हे तात, उठो! ये तुम्हारे बाल-सखा तुम्हें खेलने के लिए बुला रहे हैं। तुम बहुत देर से सोये हो और भूखे भी होगे — उठो, स्तनपान करो, और हम सबका शोक दूर करो।

श्लोक 58 (bhagavata.6.14.58)

नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् । किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं नीतोऽघृणेन न शृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५८ ॥

nāhaṁ tanūja dadṛśe hata-maṅgalā te mugdha-smitaṁ mudita-vīkṣaṇam ānanābjam kiṁ vā gato ’sy apunar-anvayam anya-lokaṁ nīto ’ghṛṇena na śṛṇomi kalā giras te

हे पुत्र! अभागी मैं अब तुम्हारी मुग्ध मुस्कान और आनंदित दृष्टि वाला वह कमल-सदृश मुख नहीं देख पा रही हूँ। क्या तुम फिर कभी न लौटने वाले किसी अन्य लोक को चले गए हो? हे निर्दयी विधाता, अब मैं तुम्हारी मधुर वाणी भी नहीं सुन पाती।

श्लोक 59 (bhagavata.6.14.59)

श्रीशुक उवाच विलपन्त्या मृतं पुत्रमिति चित्रविलापनैः । चित्रकेतुर्भृशं तप्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥ ५९ ॥

śrī-śuka uvāca vilapantyā mṛtaṁ putram iti citra-vilāpanaiḥ citraketur bhṛśaṁ tapto mukta-kaṇṭho ruroda ha

श्रीशुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार अपनी पत्नी को मृत पुत्र के लिए विचित्र प्रकार से विलाप करते देखकर, अत्यंत संतप्त चित्रकेतु भी खुले कंठ से फूट-फूटकर रो पड़े।

श्लोक 60 (bhagavata.6.14.60)

तयोर्विलपतोः सर्वे दम्पत्योस्तदनुव्रताः । रुरुदुः स्म नरा नार्यः सर्वमासीदचेतनम् ॥ ६० ॥

tayor vilapatoḥ sarve dampatyos tad-anuvratāḥ ruruduḥ sma narā nāryaḥ sarvam āsīd acetanam

इस प्रकार विलाप करते हुए उस दम्पति के साथ उनके सभी अनुयायी स्त्री-पुरुष भी रोने लगे, और सम्पूर्ण राजभवन मानो चेतनाशून्य हो गया।

श्लोक 61 (bhagavata.6.14.61)

एवं कश्मलमापन्नं नष्टसंज्ञमनायकम् । ज्ञात्वाङ्गिरा नाम ऋषिराजगाम सनारदः ॥ ६१ ॥

evaṁ kaśmalam āpannaṁ naṣṭa-saṁjñam anāyakam jñātvāṅgirā nāma ṛṣir ājagāma sanāradaḥ

इस प्रकार राजा को मोहग्रस्त, चेतनाशून्य और अनाथ के समान जानकर, अंगिरा ऋषि नारद जी के साथ वहाँ आये।

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