षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16
राजा चित्रकेतु का भगवद्दर्शन
श्लोक 1 (bhagavata.6.16.1)
श्रीबादरायणिरुवाच अथ देवऋषी राजन् सम्परेतं नृपात्मजम् । दर्शयित्वेति होवाच ज्ञातीनामनुशोचताम् ॥ १ ॥
śrī-bādarāyaṇir uvāca atha deva-ṛṣī rājan samparetaṁ nṛpātmajam darśayitveti hovāca jñātīnām anuśocatām
श्रीबादरायणि (शुकदेव) ने कहा — हे राजन्! तब देवर्षि नारद ने मृत राजकुमार को शोकसंतप्त कुटुम्बीजनों को साक्षात् दिखाकर यह कहा।
श्लोक 2 (bhagavata.6.16.2)
श्रीनारद उवाच जीवात्मन् पश्य भद्रं ते मातरं पितरं च ते । सुहृदो बान्धवास्तप्ताः शुचा त्वत्कृतया भृशम् ॥ २ ॥
śrī-nārada uvāca jīvātman paśya bhadraṁ te mātaraṁ pitaraṁ ca te suhṛdo bāndhavās taptāḥ śucā tvat-kṛtayā bhṛśam
श्रीनारद जी ने कहा — हे जीवात्मन्! तुम्हारा कल्याण हो, देखो अपनी माता और अपने पिता को; तुम्हारे मित्र और बंधुगण तुम्हारे कारण उत्पन्न शोक से अत्यंत संतप्त हैं।
श्लोक 3 (bhagavata.6.16.3)
कलेवरं स्वमाविश्य शेषमायुः सुहृद्वृतः । भुङ्क्ष्व भोगान् पितृप्रत्तानधितिष्ठ नृपासनम् ॥ ३ ॥
kalevaraṁ svam āviśya śeṣam āyuḥ suhṛd-vṛtaḥ bhuṅkṣva bhogān pitṛ-prattān adhitiṣṭha nṛpāsanam
अपने इसी शरीर में पुनः प्रवेश करो, शेष आयु को अपने बंधुजनों से घिरे हुए भोगो; अपने पिता द्वारा दिये गये भोगों को भोगते हुए राजसिंहासन पर आरूढ़ हो जाओ।
श्लोक 4 (bhagavata.6.16.4)
जीव उवाच कस्मिञ्जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन् । कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्नृयोनिषु ॥ ४ ॥
jīva uvāca kasmiñ janmany amī mahyaṁ pitaro mātaro ’bhavan karmabhir bhrāmyamāṇasya deva-tiryaṅ-nṛ-yoniṣu
जीव ने कहा — देव, तिर्यक् और मनुष्य योनियों में अपने-अपने कर्मों के अनुसार भटकते हुए मेरे किस-किस जन्म में ये लोग मेरे माता-पिता रहे हैं?
श्लोक 5 (bhagavata.6.16.5)
बन्धुज्ञात्यरिमध्यस्थमित्रोदासीनविद्विषः । सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथः ॥ ५ ॥
bandhu-jñāty-ari-madhyastha- mitrodāsīna-vidviṣaḥ sarva eva hi sarveṣāṁ bhavanti kramaśo mithaḥ
बंधु, ज्ञातिजन, शत्रु, तटस्थ, मित्र, उदासीन और द्वेषी — ये सब क्रमशः एक-दूसरे के लिए ही बन जाते हैं।
श्लोक 6 (bhagavata.6.16.6)
यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः । पर्यटन्ति नरेष्वेवं जीवो योनिषु कर्तृषु ॥ ६ ॥
yathā vastūni paṇyāni hemādīni tatas tataḥ paryaṭanti nareṣv evaṁ jīvo yoniṣu kartṛṣu
जैसे सोना आदि क्रय-विक्रय की वस्तुएँ इस से उस स्थान को घूमती रहती हैं, वैसे ही जीव भी विभिन्न योनियों में विभिन्न कर्ता-रूप (माता-पिताओं) के बीच भटकता रहता है।
श्लोक 7 (bhagavata.6.16.7)
नित्यस्यार्थस्य सम्बन्धो ह्यनित्यो दृश्यते नृषु । यावद्यस्य हि सम्बन्धो ममत्वं तावदेव हि ॥ ७ ॥
nityasyārthasya sambandho hy anityo dṛśyate nṛṣu yāvad yasya hi sambandho mamatvaṁ tāvad eva hi
नित्य वस्तु (आत्मा) का, मनुष्यों में देखे जाने वाला सम्बन्ध वास्तव में अनित्य ही है। जब तक जिससे सम्बन्ध रहता है, तब तक ही उसके प्रति ममत्व बना रहता है।
श्लोक 8 (bhagavata.6.16.8)
एवं योनिगतो जीवः स नित्यो निरहङ्कृतः । यावद्यत्रोपलभ्येत तावत्स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८ ॥
evaṁ yoni-gato jīvaḥ sa nityo nirahaṅkṛtaḥ yāvad yatropalabhyeta tāvat svatvaṁ hi tasya tat
इस प्रकार विभिन्न योनियों में जाने वाला जीव स्वयं नित्य और अहंकाररहित है; जिस स्थान में जितने काल तक वह प्राप्त होता है, उतने ही काल तक उसका उससे अपनत्व रहता है।
श्लोक 9 (bhagavata.6.16.9)
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक् । आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥
eṣa nityo ’vyayaḥ sūkṣma eṣa sarvāśrayaḥ svadṛk ātmamāyā-guṇair viśvam ātmānaṁ sṛjate prabhuḥ
यह जीव नित्य, अविनाशी, सूक्ष्म, सबका आश्रय और स्वयंप्रकाश है; वह प्रभु अपनी माया के गुणों द्वारा ही इस समस्त विश्व को अपने भीतर रचता है।
श्लोक 10 (bhagavata.6.16.10)
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । एकः सर्वधियां द्रष्टा कर्तृणां गुणदोषयोः ॥ १० ॥
na hy asyāsti priyaḥ kaścin nāpriyaḥ svaḥ paro ’pi vā ekaḥ sarva-dhiyāṁ draṣṭā kartṝṇāṁ guṇa-doṣayoḥ
इसका न तो कोई प्रिय है और न अप्रिय, न कोई अपना है और न पराया; वह अकेला ही समस्त बुद्धियों का तथा गुण-दोष के कर्ताओं का द्रष्टा (साक्षी) है।
श्लोक 11 (bhagavata.6.16.11)
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् । उदासीनवदासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥
nādatta ātmā hi guṇaṁ na doṣaṁ na kriyā-phalam udāsīnavad āsīnaḥ parāvara-dṛg īśvaraḥ
आत्मा न तो गुण ग्रहण करता है, न दोष, न कर्म का फल — वह उदासीन के समान स्थित रहता है, यद्यपि वह उच्च और निम्न सबका द्रष्टा, ईश्वर है।
श्लोक 12 (bhagavata.6.16.12)
श्रीबादरायणिरुवाच इत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा । विस्मिता मुमुचुः शोकं छित्त्वात्मस्नेहशृङ्खलाम् ॥ १२ ॥
śrī-bādarāyaṇir uvāca ity udīrya gato jīvo jñātayas tasya te tadā vismitā mumucuḥ śokaṁ chittvātma-sneha-śṛṅkhalām
श्रीबादरायणि ने कहा — इस प्रकार कहकर वह जीव चला गया। तब उसके सम्बन्धीजन आश्चर्यचकित होकर, स्नेह की उस शृंखला को काटकर, अपना शोक त्यागने लगे।
श्लोक 13 (bhagavata.6.16.13)
निर्हृत्य ज्ञातयो ज्ञातेर्देहं कृत्वोचिताः क्रियाः । तत्यजुर्दुस्त्यजं स्नेहं शोकमोहभयार्तिदम् ॥ १३ ॥
nirhṛtya jñātayo jñāter dehaṁ kṛtvocitāḥ kriyāḥ tatyajur dustyajaṁ snehaṁ śoka-moha-bhayārtidam
ज्ञातिजनों ने मृतक की देह का उचित संस्कार सम्पन्न करके, उस दुस्त्यज स्नेह को त्याग दिया, जो शोक, मोह, भय और पीड़ा का कारण होता है।
श्लोक 14 (bhagavata.6.16.14)
बालघ्न्यो व्रीडितास्तत्र बालहत्याहतप्रभाः । बालहत्याव्रतं चेरुर्ब्राह्मणैर्यन्निरूपितम् । यमुनायां महाराज स्मरन्त्यो द्विजभाषितम् ॥ १४ ॥
bāla-ghnyo vrīḍitās tatra bāla-hatyā-hata-prabhāḥ bāla-hatyā-vrataṁ cerur brāhmaṇair yan nirūpitam yamunāyāṁ mahārāja smarantyo dvija-bhāṣitam
बालघातिनी वे रानियाँ, बालहत्या से लज्जित और कांतिहीन होकर, ब्राह्मणों द्वारा बताये गये बालहत्या-प्रायश्चित्त व्रत का पालन करने लगीं; हे महाराज, वे यमुना तट पर उन द्विजों के वचनों को स्मरण करती रहीं।
श्लोक 15 (bhagavata.6.16.15)
स इत्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः । गृहान्धकूपान्निष्क्रान्तः सरःपङ्कादिव द्विपः ॥ १५ ॥
sa itthaṁ pratibuddhātmā citraketur dvijoktibhiḥ gṛhāndha-kūpān niṣkrāntaḥ saraḥ-paṅkād iva dvipaḥ
इस प्रकार ब्राह्मणों (अंगिरा और नारद) के उपदेशों से जागृत हुए चित्रकेतु, गृहस्थी के अंधकूप से वैसे ही बाहर निकल आये, जैसे कोई हाथी सरोवर के कीचड़ से निकल आता है।
श्लोक 16 (bhagavata.6.16.16)
कालिन्द्यां विधिवत् स्नात्वा कृतपुण्यजलक्रियः । मौनेन संयतप्राणो ब्रह्मपुत्राववन्दत ॥ १६ ॥
kālindyāṁ vidhivat snātvā kṛta-puṇya-jala-kriyaḥ maunena saṁyata-prāṇo brahma-putrāv avandata
कालिन्दी (यमुना) में विधिपूर्वक स्नान करके, पवित्र जलक्रिया सम्पन्न करके, मौन रहकर तथा प्राणों को संयत करके, उन्होंने ब्रह्मा के दोनों पुत्रों (अंगिरा और नारद) को प्रणाम किया।
श्लोक 17 (bhagavata.6.16.17)
अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने । भगवान्नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह ॥ १७ ॥
atha tasmai prapannāya bhaktāya prayatātmane bhagavān nāradaḥ prīto vidyām etām uvāca ha
तत्पश्चात् उस शरणागत, भक्त तथा संयमी आत्मा वाले राजा से प्रसन्न होकर भगवान नारद ने उसे यह विद्या (मंत्र) प्रदान की।
श्लोक 18 (bhagavata.6.16.18)
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥ १८ ॥
oṁ namas tubhyaṁ bhagavate vāsudevāya dhīmahi pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṅkarṣaṇāya ca
ॐ, भगवान वासुदेव को नमस्कार करते हुए हम उनका ध्यान करें; प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण को भी नमस्कार है।
श्लोक 19 (bhagavata.6.16.19)
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये । आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ॥ १९ ॥
namo vijñāna-mātrāya paramānanda-mūrtaye ātmārāmāya śāntāya nivṛtta-dvaita-dṛṣṭaye
शुद्ध विज्ञान-स्वरूप, परमानन्द-मूर्ति, आत्माराम, शांत तथा द्वैत-दृष्टि से रहित उन भगवान को नमस्कार है।
श्लोक 20 (bhagavata.6.16.20)
आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नमः । हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये ॥ २० ॥
ātmānandānubhūtyaiva nyasta-śakty-ūrmaye namaḥ hṛṣīkeśāya mahate namas te ’nanta-mūrtaye
जिन्होंने अपने ही आत्मानन्द के अनुभव से समस्त शक्ति की तरंगों को समेट रखा है, उन्हें नमस्कार है; इन्द्रियों के स्वामी, महान और अनंत स्वरूप वाले आपको मेरा नमस्कार है।
श्लोक 21 (bhagavata.6.16.21)
वचस्युपरतेऽप्राप्य य एको मनसा सह । अनामरूपश्चिन्मात्रः सोऽव्यान्नः सदसत्परः ॥ २१ ॥
vacasy uparate ’prāpya ya eko manasā saha anāma-rūpaś cin-mātraḥ so ’vyān naḥ sad-asat-paraḥ
वाणी और मन जिन्हें एक साथ मिलकर भी नहीं पा सकते, जो नाम-रूप से रहित, केवल चैतन्य-स्वरूप हैं, वे सत् और असत् से परे भगवान हमारी रक्षा करें।
श्लोक 22 (bhagavata.6.16.22)
यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । मृण्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥
yasminn idaṁ yataś cedaṁ tiṣṭhaty apyeti jāyate mṛṇmayeṣv iva mṛj-jātis tasmai te brahmaṇe namaḥ
जिनमें, जिनसे तथा जिनके कारण यह सृष्टि स्थित रहती है, उत्पन्न होती है और लीन होती है — जैसे मिट्टी के पात्रों में मिट्टी की ही सत्ता व्याप्त रहती है — उन ब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है।
श्लोक 23 (bhagavata.6.16.23)
यन्न स्पृशन्ति न विदुर्मनोबुद्धीन्द्रियासवः । अन्तर्बहिश्च विततं व्योमवत्तन्नतोऽस्म्यहम् ॥ २३ ॥
yan na spṛśanti na vidur mano-buddhīndriyāsavaḥ antar bahiś ca vitataṁ vyomavat tan nato ’smy aham
जिसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण न तो स्पर्श कर सकते हैं और न जान सकते हैं, जो आकाश के समान भीतर-बाहर सर्वत्र व्याप्त है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 24 (bhagavata.6.16.24)
देहेन्द्रियप्राणमनोधियोऽमी यदंशविद्धाः प्रचरन्ति कर्मसु । नैवान्यदा लौहमिवाप्रतप्तं स्थानेषु तद् द्रष्ट्रपदेशमेति ॥ २४ ॥
dehendriya-prāṇa-mano-dhiyo ’mī yad-aṁśa-viddhāḥ pracaranti karmasu naivānyadā lauham ivāprataptaṁ sthāneṣu tad draṣṭrapadeśam eti
जैसे बिना तपाया हुआ लोहा जल नहीं सकता, वैसे ही यह देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन और बुद्धि — जब तक इनमें भगवान का अंश व्याप्त नहीं होता, तब तक ये अपने-अपने स्थान पर कर्म करने में समर्थ नहीं होते; उसी अंश के प्रवेश से ही ये 'द्रष्टा' का आभास पाते हैं।
श्लोक 25 (bhagavata.6.16.25)
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सकलसात्वतपरिवृढनिकर करकमलकुड्मलोपलालितचरणारविन्दयुगल परमपरमेष्ठिन्नमस्ते ॥ २५ ॥
oṁ namo bhagavate mahā-puruṣāya mahānubhāvāya mahā-vibhūti-pataye sakala-sātvata-parivṛḍha-nikara-kara-kamala-kuḍmalopalālita-caraṇāravinda-yugala parama-parameṣṭhin namas te.
ॐ, समस्त सात्वतश्रेष्ठ भक्तों के कर-कमलों की कलियों द्वारा सेवित युगल चरणकमलों वाले, महापुरुष, महानुभाव, महाविभूतिपति, परम परमेष्ठी भगवान को मेरा नमस्कार है।
श्लोक 26 (bhagavata.6.16.26)
श्रीशुक उवाच भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारदः । ययावङ्गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो ॥ २६ ॥
śrī-śuka uvāca bhaktāyaitāṁ prapannāya vidyām ādiśya nāradaḥ yayāv aṅgirasā sākaṁ dhāma svāyambhuvaṁ prabho
श्रीशुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार शरणागत भक्त चित्रकेतु को यह विद्या प्रदान करके, नारद जी अंगिरा ऋषि के साथ, हे प्रभो, स्वायम्भुव धाम (ब्रह्मलोक) को चले गये।
श्लोक 27 (bhagavata.6.16.27)
चित्रकेतुस्तु तां विद्यां यथा नारदभाषिताम् । धारयामास सप्ताहमब्भक्षः सुसमाहितः ॥ २७ ॥
citraketus tu tāṁ vidyāṁ yathā nārada-bhāṣitām dhārayām āsa saptāham ab-bhakṣaḥ susamāhitaḥ
चित्रकेतु ने नारद द्वारा बताई गई उस विद्या को, केवल जल पीकर उपवास करते हुए, अत्यंत एकाग्रचित्त होकर सात दिनों तक धारण किया।
श्लोक 28 (bhagavata.6.16.28)
ततः स सप्तरात्रान्ते विद्यया धार्यमाणया । विद्याधराधिपत्यं च लेभेऽप्रतिहतं नृप ॥ २८ ॥
tataḥ sa sapta-rātrānte vidyayā dhāryamāṇayā vidyādharādhipatyaṁ ca lebhe ’pratihataṁ nṛpa
हे राजन्! सात रात्रियों के अंत में, उस निरंतर धारण की गई विद्या के प्रभाव से, उन्होंने विद्याधरों का निष्कंटक आधिपत्य प्राप्त कर लिया।
श्लोक 29 (bhagavata.6.16.29)
ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः । जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥
tataḥ katipayāhobhir vidyayeddha-mano-gatiḥ jagāma deva-devasya śeṣasya caraṇāntikam
तत्पश्चात् कुछ ही दिनों में, उस विद्या के प्रभाव से जिनका मनोगति उन्नत हो चुकी थी, वे देवाधिदेव शेषनाग के चरणों के समीप जा पहुँचे।
श्लोक 30 (bhagavata.6.16.30)
मृणालगौरं शितिवाससं स्फुरत्- किरीटकेयूरकटित्रकङ्कणम् । प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनं वृतं ददर्श सिद्धेश्वरमण्डलैः प्रभुम् ॥ ३० ॥
mṛṇāla-gauraṁ śiti-vāsasaṁ sphurat- kirīṭa-keyūra-kaṭitra-kaṅkaṇam prasanna-vaktrāruṇa-locanaṁ vṛtaṁ dadarśa siddheśvara-maṇḍalaiḥ prabhum
वहाँ उन्होंने कमल-नाल के समान श्वेतवर्ण, नीलाम्बरधारी, चमकते मुकुट-केयूर-करधनी-कंकणों से सुशोभित, प्रसन्न मुखमंडल और अरुण नेत्रों वाले, सिद्धेश्वरों के मंडल से घिरे प्रभु को देखा।
श्लोक 31 (bhagavata.6.16.31)
तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वस्थामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः । प्रवृद्धभक्त्या प्रणयाश्रुलोचनः प्रहृष्टरोमानमदादिपुरुषम् ॥ ३१ ॥
tad-darśana-dhvasta-samasta-kilbiṣaḥ svasthāmalāntaḥkaraṇo ’bhyayān muniḥ pravṛddha-bhaktyā praṇayāśru-locanaḥ prahṛṣṭa-romānamad ādi-puruṣam
उनके दर्शन मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाने पर, स्वस्थ और निर्मल अंतःकरण वाले वे मुनि (चित्रकेतु) प्रेम के आँसुओं से भरे नेत्रों तथा रोमांचित शरीर के साथ, प्रगाढ़ भक्ति से आदिपुरुष के समीप गये और उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 32 (bhagavata.6.16.32)
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहुः । प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम् ॥ ३२ ॥
sa uttamaśloka-padābja-viṣṭaraṁ premāśru-leśair upamehayan muhuḥ premoparuddhākhila-varṇa-nirgamo naivāśakat taṁ prasamīḍituṁ ciram
वे भगवान के चरणकमलों के आसन को अपने प्रेमाश्रुओं की बूँदों से बार-बार सींचते रहे; किंतु प्रेम से अवरुद्ध होने के कारण उनके मुख से कोई शब्द ही न निकल सका, और वे बहुत देर तक भगवान की स्तुति करने में असमर्थ रहे।
श्लोक 33 (bhagavata.6.16.33)
ततः समाधाय मनो मनीषया बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ । नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं जगद्गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम् ॥ ३३ ॥
tataḥ samādhāya mano manīṣayā babhāṣa etat pratilabdha-vāg asau niyamya sarvendriya-bāhya-vartanaṁ jagad-guruṁ sātvata-śāstra-vigraham
तत्पश्चात् मन को बुद्धि द्वारा शांत करके, वाणी को पुनः प्राप्त करके, समस्त बाह्य इंद्रिय-वृत्तियों को संयत करते हुए, उन्होंने सात्वत-शास्त्रों के साक्षात् स्वरूप, जगद्गुरु भगवान की यह स्तुति की।
श्लोक 34 (bhagavata.6.16.34)
चित्रकेतुरुवाच अजित जितः सममतिभिः साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता । विजितास्तेऽपि च भजता- मकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुणः ॥ ३४ ॥
citraketur uvāca ajita jitaḥ sama-matibhiḥ sādhubhir bhavān jitātmabhir bhavatā vijitās te ’pi ca bhajatām akāmātmanāṁ ya ātmado ’ti-karuṇaḥ
चित्रकेतु ने कहा — हे अजित! आप किसी से पराजित नहीं होते, फिर भी समदर्शी, जितेन्द्रिय साधुजनों द्वारा आप जीत लिये जाते हैं। और वे साधु भी, आपकी शरण में जाकर, आपके द्वारा ही विजित हो जाते हैं — क्योंकि जो निष्काम भाव से आपका भजन करते हैं, आप उन्हें अत्यंत करुणावश स्वयं को ही दे देते हैं।
श्लोक 35 (bhagavata.6.16.35)
तव विभवः खलु भगवन् जगदुदयस्थितिलयादीनि । विश्वसृजस्तेꣷशांशा स्तत्र मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥ ३५ ॥
tava vibhavaḥ khalu bhagavan jagad-udaya-sthiti-layādīni viśva-sṛjas te ’ṁśāṁśās tatra mṛṣā spardhanti pṛthag abhimatyā
हे भगवन्! जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय आदि जो कुछ भी है, वह सब निश्चय ही आपका ही ऐश्वर्य है। विश्व की रचना करने वाले ब्रह्मादि तो आपके अंश के भी अंश मात्र हैं; तथापि वे पृथक् अभिमानवश व्यर्थ ही अपने-अपने को स्वतंत्र ईश्वर मानकर होड़ करते हैं।
श्लोक 36 (bhagavata.6.16.36)
परमाणुपरममहतो- स्त्वमाद्यन्तान्तरवर्ती त्रयविधुरः । आदावन्तेऽपि च सत्त्वानां यद् ध्रुवं तदेवान्तरालेऽपि ॥ ३६ ॥
paramāṇu-parama-mahatos tvam ādy-antāntara-vartī traya-vidhuraḥ ādāv ante ’pi ca sattvānāṁ yad dhruvaṁ tad evāntarāle ’pi
अणु से लेकर महत्तत्त्व तक की समस्त वस्तुओं के आदि, अंत और मध्य में आप ही व्याप्त हैं, फिर भी तीनों कालों (आदि, मध्य, अंत) से रहित हैं। जो कुछ भी प्राणियों के आदि और अंत में ध्रुव (नित्य) है, वही उनके मध्यकाल में भी नित्य विद्यमान रहता है।
श्लोक 37 (bhagavata.6.16.37)
क्षित्यादिभिरेष किलावृतः सप्तभिर्दशगुणोत्तरैरण्डकोशः । यत्र पतत्यणुकल्पः सहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्तः ॥ ३७ ॥
kṣity-ādibhir eṣa kilāvṛtaḥ saptabhir daśa-guṇottarair aṇḍa-kośaḥ yatra pataty aṇu-kalpaḥ sahāṇḍa-koṭi-koṭibhis tad anantaḥ
प्रत्येक ब्रह्माण्डकोश, पृथ्वी आदि सात आवरणों से घिरा हुआ है, जिनमें प्रत्येक आगे वाले से दस गुना अधिक है; ऐसे करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड भी, हे अनन्त, आपमें अणु के समान ही गिरते हैं — इसीलिए आप अनन्त कहलाते हैं।
श्लोक 38 (bhagavata.6.16.38)
विषयतृषो नरपशवो य उपासते विभूतीर्न परं त्वाम् । तेषामाशिष ईश तदनु विनश्यन्ति यथा राजकुलम् ॥ ३८ ॥
viṣaya-tṛṣo nara-paśavo ya upāsate vibhūtīr na paraṁ tvām teṣām āśiṣa īśa tad anu vinaśyanti yathā rāja-kulam
जो विषय-लोलुप, पशुतुल्य मनुष्य आपको न भजकर केवल आपकी विभूतियों (देवताओं) की उपासना करते हैं, हे ईश्वर, उनकी वे मनोकामनाएँ भी उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जैसे राजा के पतन के साथ उसका सारा राजकुल नष्ट हो जाता है।
श्लोक 39 (bhagavata.6.16.39)
कामधियस्त्वयि रचिता न परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि । ज्ञानात्मन्यगुणमये गुणगणतोऽस्य द्वन्द्वजालानि ॥ ३९ ॥
kāma-dhiyas tvayi racitā na parama rohanti yathā karambha-bījāni jñānātmany aguṇamaye guṇa-gaṇato ’sya dvandva-jālāni
हे परम! जैसे भुने हुए तिलों के बीज अंकुरित नहीं होते, वैसे ही ज्ञानस्वरूप, गुणातीत आप में रची हुई कामनाएँ पुनः जन्म नहीं लेतीं; गुणों के समूह से उत्पन्न होने वाले द्वंद्व-जाल इस जीव को (केवल भौतिक स्तर पर ही) बांधते हैं।
श्लोक 40 (bhagavata.6.16.40)
जितमजित तदा भवता यदाह भागवतं धर्ममनवद्यम् । निष्किञ्चना ये मुनय आत्मारामा यमुपासतेऽपवर्गाय ॥ ४० ॥
jitam ajita tadā bhavatā yadāha bhāgavataṁ dharmam anavadyam niṣkiñcanā ye munaya ātmārāmā yam upāsate ’pavargāya
हे अजित! आपने जो निर्दोष भागवत-धर्म का उपदेश दिया, वही आपकी सच्ची विजय है — जिसे निष्किंचन, आत्माराम मुनिजन भी मोक्ष के लिए ही उपासते हैं।
श्लोक 41 (bhagavata.6.16.41)
विषममतिर्न यत्र नृणां त्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र । विषमधिया रचितो यः स ह्यविशुद्धः क्षयिष्णुरधर्मबहुलः ॥ ४१ ॥
viṣama-matir na yatra nṛṇāṁ tvam aham iti mama taveti ca yad anyatra viṣama-dhiyā racito yaḥ sa hy aviśuddhaḥ kṣayiṣṇur adharma-bahulaḥ
जहाँ मनुष्यों की बुद्धि विषम (भेदभावयुक्त) नहीं होती — अर्थात् जहाँ 'तुम' और 'मैं', 'मेरा' और 'तेरा' का भेद नहीं रहता — वही (भागवत-धर्म) है; इसके अतिरिक्त जो कुछ भी विषम बुद्धि से रचा गया है, वह अशुद्ध, क्षयशील और अधर्म से परिपूर्ण है।
श्लोक 42 (bhagavata.6.16.42)
कः क्षेमो निजपरयोः कियान्वार्थः स्वपरद्रुहा धर्मेण । स्वद्रोहात्तव कोपः परसम्पीडया च तथाधर्मः ॥ ४२ ॥
kaḥ kṣemo nija-parayoḥ kiyān vārthaḥ sva-para-druhā dharmeṇa sva-drohāt tava kopaḥ para-sampīḍayā ca tathādharmaḥ
अपने और पराये में भेद करने वाले धर्म से भला क्या कल्याण हो सकता है, और उससे कितना ही लाभ हो सकता है? अपने प्रति द्रोह से आप ही का कोप उत्पन्न होता है, और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से भी वैसा ही अधर्म फलित होता है।
श्लोक 43 (bhagavata.6.16.43)
न व्यभिचरति तवेक्षा यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः । स्थिरचरसत्त्वकदम्बे- ष्वपृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः ॥ ४३ ॥
na vyabhicarati tavekṣā yayā hy abhihito bhāgavato dharmaḥ sthira-cara-sattva-kadambeṣv apṛthag-dhiyo yam upāsate tv āryāḥ
आपकी वह दृष्टि कभी असफल नहीं होती, जिसके द्वारा भागवत-धर्म का वर्णन किया गया है — जिसे स्थावर-जंगम समस्त प्राणियों में अभेद-बुद्धि रखने वाले आर्यजन ही आपकी उपासना के रूप में अपनाते हैं।
श्लोक 44 (bhagavata.6.16.44)
न हि भगवन्नघटितमिदं त्वद्दर्शनान्नृणामखिलपापक्षयः । यन्नाम सकृच्छ्रवणात् पुक्कशोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
na hi bhagavann aghaṭitam idaṁ tvad-darśanān nṛṇām akhila-pāpa-kṣayaḥ yan-nāma sakṛc chravaṇāt pukkaśo ’pi vimucyate saṁsārāt
हे भगवन्! आपके दर्शन मात्र से मनुष्यों के समस्त पापों का नाश हो जाना कोई असंभव बात नहीं — क्योंकि आपके नाम का एक बार श्रवण करने मात्र से ही पुक्कस (अत्यंत नीच जाति का मनुष्य) भी संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 45 (bhagavata.6.16.45)
अथ भगवन् वयमधुना त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः । सुरऋषिणा यत्कथितं तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥
atha bhagavan vayam adhunā tvad-avaloka-parimṛṣṭāśaya-malāḥ sura-ṛṣiṇā yat kathitaṁ tāvakena katham anyathā bhavati
हे भगवन्! अब हम आपके दर्शन से अपने चित्त की सम्पूर्ण मलिनता से मुक्त हो चुके हैं। आपके ही देवर्षि नारद ने जो कुछ भी कहा था, वह भला अन्यथा कैसे हो सकता है?
श्लोक 46 (bhagavata.6.16.46)
विदितमनन्त समस्तं तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम् । विज्ञाप्यं परमगुरोः कियदिव सवितुरिव खद्योतैः ॥ ४६ ॥
viditam ananta samastaṁ tava jagad-ātmano janair ihācaritam vijñāpyaṁ parama-guroḥ kiyad iva savitur iva khadyotaiḥ
हे अनन्त! इस जगत में जीवों द्वारा किया गया कोई भी आचरण, जो सबकी आत्मा हैं ऐसे आपसे छिपा नहीं है; फिर आप जैसे परम गुरु के समक्ष कुछ निवेदन करना वैसा ही है जैसे सूर्य के समक्ष जुगनू अपना प्रकाश दिखाये।
श्लोक 47 (bhagavata.6.16.47)
नमस्तुभ्यं भगवते सकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय । दुरवसितात्मगतये कुयोगिनां भिदा परमहंसाय ॥ ४७ ॥
namas tubhyaṁ bhagavate sakala-jagat-sthiti-layodayeśāya duravasitātma-gataye kuyogināṁ bhidā paramahaṁsāya
समस्त जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय के स्वामी, दुर्बोध आत्मगति वाले, कुयोगियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाले किंतु स्वयं परमहंस-स्वरूप भगवान, आपको नमस्कार है।
श्लोक 48 (bhagavata.6.16.48)
यं वै श्वसन्तमनु विश्वसृजः श्वसन्ति यं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति । भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्ध्नि तस्मै नमो भगवतेऽस्तु सहस्रमूर्ध्ने ॥ ४८ ॥
yaṁ vai śvasantam anu viśva-sṛjaḥ śvasanti yaṁ cekitānam anu cittaya uccakanti bhū-maṇḍalaṁ sarṣapāyati yasya mūrdhni tasmai namo bhagavate ’stu sahasra-mūrdhne
जिनके श्वास लेने के अनुसार ही सृष्टिकर्ता (ब्रह्मादि) श्वास लेते हैं, जिनके सचेत होने के अनुसार ही अन्य चित्त सचेत होते हैं, जिनके मस्तक पर यह भूमण्डल सरसों के दाने के समान प्रतीत होता है, उन सहस्र-मस्तकों वाले भगवान को नमस्कार हो।
श्लोक 49 (bhagavata.6.16.49)
श्रीशुक उवाच संस्तुतो भगवानेवमनन्तस्तमभाषत । विद्याधरपतिं प्रीतश्चित्रकेतुं कुरूद्वह ॥ ४९ ॥
śrī-śuka uvāca saṁstuto bhagavān evam anantas tam abhāṣata vidyādhara-patiṁ prītaś citraketuṁ kurūdvaha
श्रीशुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार स्तुति किये जाने पर, भगवान अनन्त ने प्रसन्न होकर विद्याधरपति चित्रकेतु से यह कहा, हे कुरुश्रेष्ठ (परीक्षित्)।
श्लोक 50 (bhagavata.6.16.50)
श्रीभगवानुवाच यन्नारदाङ्गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् । संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
śrī-bhagavān uvāca yan nāradāṅgirobhyāṁ te vyāhṛtaṁ me ’nuśāsanam saṁsiddho ’si tayā rājan vidyayā darśanāc ca me
श्रीभगवान ने कहा — हे राजन्! नारद और अंगिरा द्वारा तुम्हें दिये गये मेरे इस उपदेश-रूप विद्या तथा मेरे इस दर्शन के द्वारा, तुम पूर्णतः सिद्ध हो चुके हो।
श्लोक 51 (bhagavata.6.16.51)
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
ahaṁ vai sarva-bhūtāni bhūtātmā bhūta-bhāvanaḥ śabda-brahma paraṁ brahma mamobhe śāśvatī tanū
मैं ही समस्त भूतों में व्याप्त, सबका अंतरात्मा और सबकी उत्पत्ति करने वाला हूँ। शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म — ये दोनों ही मेरे शाश्वत रूप हैं।
श्लोक 52 (bhagavata.6.16.52)
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
loke vitatam ātmānaṁ lokaṁ cātmani santatam ubhayaṁ ca mayā vyāptaṁ mayi caivobhayaṁ kṛtam
अपने-आप को जगत में विस्तृत और जगत को अपने भीतर व्याप्त मानने वाला यह भाव — दोनों ही मेरे द्वारा व्याप्त हैं, और वे दोनों ही मुझमें ही रचे गये हैं।
श्लोक 53 (bhagavata.6.16.53)
यथा सुषुप्तः पुरुषो विश्वं पश्यति चात्मनि । आत्मानमेकदेशस्थं मन्यते स्वप्न उत्थितः ॥ ५३ ॥
yathā suṣuptaḥ puruṣo viśvaṁ paśyati cātmani ātmānam eka-deśa-sthaṁ manyate svapna utthitaḥ
जैसे गहरी नींद में सोया हुआ पुरुष अपने ही भीतर सम्पूर्ण विश्व को देखता है, और स्वप्न से जागने पर स्वयं को एक ही स्थान पर स्थित मानने लगता है,
श्लोक 54 (bhagavata.6.16.54)
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । मायामात्राणि विज्ञाय तद् द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥
evaṁ jāgaraṇādīni jīva-sthānāni cātmanaḥ māyā-mātrāṇi vijñāya tad-draṣṭāraṁ paraṁ smaret
इसी प्रकार जागृति आदि जीव की समस्त अवस्थाओं को केवल माया-मात्र जानकर, उन सबके द्रष्टा उस परम तत्त्व का ही स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 55 (bhagavata.6.16.55)
येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा । सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
yena prasuptaḥ puruṣaḥ svāpaṁ vedātmanas tadā sukhaṁ ca nirguṇaṁ brahma tam ātmānam avehi mām
जिसके द्वारा सोया हुआ पुरुष अपनी निद्रा, सुख तथा निर्गुण ब्रह्म को जान पाता है, उस आत्मस्वरूप को ही मुझ ही जानो।
श्लोक 56 (bhagavata.6.16.56)
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
ubhayaṁ smarataḥ puṁsaḥ prasvāpa-pratibodhayoḥ anveti vyatiricyeta taj jñānaṁ brahma tat param
जो पुरुष निद्रा और जागृति दोनों अवस्थाओं का स्मरण करता है, वह दोनों में अन्वित रहता है और साथ ही दोनों से पृथक् भी — यही ज्ञान परब्रह्म को जानने वाला है।
श्लोक 57 (bhagavata.6.16.57)
यदेतद्विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्नमात्मनः । ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
yad etad vismṛtaṁ puṁso mad-bhāvaṁ bhinnam ātmanaḥ tataḥ saṁsāra etasya dehād deho mṛter mṛtiḥ
जब पुरुष अपने आत्मा से भिन्न मेरे इस स्वरूप को भूल जाता है, तब उसके लिए संसार-चक्र आरम्भ होता है — एक देह से दूसरी देह, एक मृत्यु से दूसरी मृत्यु।
श्लोक 58 (bhagavata.6.16.58)
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् । आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचित्क्षेममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
labdhveha mānuṣīṁ yoniṁ jñāna-vijñāna-sambhavām ātmānaṁ yo na buddhyeta na kvacit kṣemam āpnuyāt
ज्ञान और विज्ञान की उत्पत्ति के योग्य इस मनुष्य-योनि को पाकर भी जो अपने आत्मा को नहीं जानता, वह कभी भी वास्तविक कल्याण को प्राप्त नहीं कर पाता।
श्लोक 59 (bhagavata.6.16.59)
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् । अभयं चाप्यनीहायां सङ्कल्पाद्विरमेत्कविः ॥ ५९ ॥
smṛtvehāyāṁ parikleśaṁ tataḥ phala-viparyayam abhayaṁ cāpy anīhāyāṁ saṅkalpād viramet kaviḥ
इस लोक और परलोक में फल के प्रति होने वाले क्लेश और उसके विपरीत परिणाम का स्मरण करते हुए, तथा निष्काम अवस्था में प्राप्त होने वाली निर्भयता को जानते हुए, बुद्धिमान पुरुष को सकाम संकल्पों से विरत हो जाना चाहिए।
श्लोक 60 (bhagavata.6.16.60)
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः । ततोऽनिवृत्तिरप्राप्तिर्दुःखस्य च सुखस्य च ॥ ६० ॥
sukhāya duḥkha-mokṣāya kurvāte dampatī kriyāḥ tato ’nivṛttir aprāptir duḥkhasya ca sukhasya ca
सुख पाने और दुःख से मुक्ति पाने के लिए ही पति-पत्नी नाना कर्म करते हैं, फिर भी न तो दुःख की निवृत्ति होती है और न सुख की प्राप्ति ही होती है।
श्लोक 61 (bhagavata.6.16.61)
एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् । आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ॥ ६१ ॥
evaṁ viparyayaṁ buddhvā nṛṇāṁ vijñābhimāninām ātmanaś ca gatiṁ sūkṣmāṁ sthāna-traya-vilakṣaṇām
इस प्रकार अपने को विज्ञ मानने वाले मनुष्यों की इस विपरीत स्थिति को समझकर, तथा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीनों अवस्थाओं से विलक्षण आत्मा की उस सूक्ष्म गति को जानकर,
श्लोक 62 (bhagavata.6.16.62)
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिर्निर्मुक्तः स्वेन तेजसा । ज्ञानविज्ञानसन्तृप्तो मद्भक्तः पुरुषो भवेत् ॥ ६२ ॥
dṛṣṭa-śrutābhir mātrābhir nirmuktaḥ svena tejasā jñāna-vijñāna-santṛpto mad-bhaktaḥ puruṣo bhavet
देखी और सुनी हुई वस्तुओं के प्रभाव से मुक्त होकर, अपने ही तेज से युक्त, ज्ञान और विज्ञान से पूर्णतः तृप्त पुरुष ही मेरा भक्त बनने योग्य होता है।
श्लोक 63 (bhagavata.6.16.63)
एतावानेव मनुजैर्योगनैपुण्यबुद्धिभिः । स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥ ६३ ॥
etāvān eva manujair yoga-naipuṇya-buddhibhiḥ svārthaḥ sarvātmanā jñeyo yat parātmaika-darśanam
योग में निपुण बुद्धि रखने वाले मनुष्यों के लिए यही एकमात्र स्वार्थ (सच्चा प्रयोजन) समझने योग्य है — कि परमात्मा और जीवात्मा को एक (अभिन्न स्वरूप) देखा जाये।
श्लोक 64 (bhagavata.6.16.64)
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन्नप्रमत्तो वचो मम । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥ ६४ ॥
tvam etac chraddhayā rājann apramatto vaco mama jñāna-vijñāna-sampanno dhārayann āśu sidhyasi
हे राजन्! यदि तुम श्रद्धापूर्वक, प्रमादरहित होकर मेरे इस वचन को ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न होकर धारण करते रहोगे, तो शीघ्र ही सिद्धि को प्राप्त करोगे।
श्लोक 65 (bhagavata.6.16.65)
श्रीशुक उवाच आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्गुरुः । पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ॥ ६५ ॥
śrī-śuka uvāca āśvāsya bhagavān itthaṁ citraketuṁ jagad-guruḥ paśyatas tasya viśvātmā tataś cāntardadhe hariḥ
श्रीशुकदेव जी ने कहा — जगद्गुरु, विश्वात्मा भगवान हरि, चित्रकेतु को इस प्रकार आश्वस्त करके, उनके देखते-देखते ही वहाँ से अंतर्धान हो गये।