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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17

माता पार्वती का चित्रकेतु को शाप

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.6.17.1)

श्रीशुक उवाच यतश्चान्तर्हितोऽनन्तस्तस्यै कृत्वा दिशे नमः । विद्याधरश्चित्रकेतुश्चचार गगने चरः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca yataś cāntarhito ’nantas tasyai kṛtvā diśe namaḥ vidyādharaś citraketuś cacāra gagane caraḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — जिस दिशा से भगवान अनन्त अंतर्धान हुए थे, उस दिशा को प्रणाम करके, विद्याधरों में विचरण करने वाले चित्रकेतु आकाश में विचरण करने लगे।

श्लोक 2 (bhagavata.6.17.2)

स लक्षं वर्षलक्षाणामव्याहतबलेन्द्रियः । स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणैः ॥ २ ॥

sa lakṣaṁ varṣa-lakṣāṇām avyāhata-balendriyaḥ stūyamāno mahā-yogī munibhiḥ siddha-cāraṇaiḥ

अबाधित बल और इन्द्रियों से युक्त वह महायोगी, लाखों वर्षों तक सिद्धों और चारणों द्वारा तथा मुनियों द्वारा स्तुति किये जाते हुए विचरण करता रहा।

श्लोक 3 (bhagavata.6.17.3)

कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्कल्पसिद्धिषु । रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन् हरिमीश्वरम् ॥ ३ ॥

kulācalendra-droṇīṣu nānā-saṅkalpa-siddhiṣu reme vidyādhara-strībhir gāpayan harim īśvaram

वह नाना प्रकार के सिद्धियों से पूर्ण कुलपर्वतों की घाटियों में, भगवान हरि की महिमा का गान कराते हुए, विद्याधर-स्त्रियों के साथ विहार करता रहा।

श्लोक 4 (bhagavata.6.17.4)

एकदा स विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता । गिरिशं ददृशे गच्छन् परीतं सिद्धचारणैः ॥ ४ ॥

ekadā sa vimānena viṣṇu-dattena bhāsvatā giriśaṁ dadṛśe gacchan parītaṁ siddha-cāraṇaiḥ

एक बार भगवान विष्णु द्वारा प्रदत्त अपने तेजस्वी विमान से जाते हुए, उन्होंने सिद्धों और चारणों से घिरे हुए गिरीश (शिव) को देखा।

श्लोक 5 (bhagavata.6.17.5)

आलिङ्गयाङ्कीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि । उवाच देव्याः शृण्वन्त्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥ ५ ॥

āliṅgyāṅkīkṛtāṁ devīṁ bāhunā muni-saṁsadi uvāca devyāḥ śṛṇvantyā jahāsoccais tad-antike

मुनियों की सभा में देवी (पार्वती) को अपनी भुजा से आलिंगन कर अपने अंक में बिठाये हुए शिव को देखकर, देवी के सुनते हुए ही, उनके निकट वे ऊँची आवाज़ में हँस पड़े।

श्लोक 6 (bhagavata.6.17.6)

चित्रकेतुरुवाच एष लोकगुरुः साक्षाद्धर्मं वक्ता शरीरिणाम् । आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥

citraketur uvāca eṣa loka-guruḥ sākṣād dharmaṁ vaktā śarīriṇām āste mukhyaḥ sabhāyāṁ vai mithunī-bhūya bhāryayā

चित्रकेतु ने कहा — ये तो साक्षात् लोकगुरु हैं, देहधारियों को धर्म का उपदेश देने वाले, और सभा में सबसे प्रमुख होकर भी अपनी पत्नी के साथ मिथुनरत होकर विराजमान हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.6.17.7)

जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः । अङ्कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥

jaṭā-dharas tīvra-tapā brahmavādi-sabhā-patiḥ aṅkīkṛtya striyaṁ cāste gata-hrīḥ prākṛto yathā

जटाधारी, घोर तपस्वी, ब्रह्मवादियों की सभा के अध्यक्ष यह शिव, स्त्री को अपने अंक में बिठाकर, मानो किसी साधारण लज्जाहीन गृहस्थ के समान बैठे हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.6.17.8)

प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति । अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥

prāyaśaḥ prākṛtāś cāpi striyaṁ rahasi bibhrati ayaṁ mahā-vrata-dharo bibharti sadasi striyam

साधारण गृहस्थ लोग भी प्रायः एकांत में ही अपनी पत्नी के साथ रहते हैं, किंतु यह महाव्रतधारी तो सभा के बीच ही स्त्री को धारण किये हुए हैं!

श्लोक 9 (bhagavata.6.17.9)

श्रीशुक उवाच भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप । तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥

śrī-śuka uvāca bhagavān api tac chrutvā prahasyāgādha-dhīr nṛpa tūṣṇīṁ babhūva sadasi sabhyāś ca tad-anuvratāḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! अगाध बुद्धि वाले भगवान शिव यह सुनकर केवल मुस्कुरा दिये और मौन रहे, और सभा के अन्य सदस्य भी उन्हीं का अनुसरण करते हुए चुप रहे।

श्लोक 10 (bhagavata.6.17.10)

इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् । रुषाह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥

ity atad-vīrya-viduṣi bruvāṇe bahv-aśobhanam ruṣāha devī dhṛṣṭāya nirjitātmābhimānine

शिव-पार्वती के वास्तविक सामर्थ्य को न जानते हुए, चित्रकेतु द्वारा इस प्रकार अनुचित वचन कहे जाने पर, अपने आत्मसंयम पर अभिमान करने वाले उस धृष्ट व्यक्ति के प्रति देवी क्रोधित होकर बोलीं।

श्लोक 11 (bhagavata.6.17.11)

श्रीपार्वत्युवाच अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः । अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥ ११ ॥

śrī-pārvaty uvāca ayaṁ kim adhunā loke śāstā daṇḍa-dharaḥ prabhuḥ asmad-vidhānāṁ duṣṭānāṁ nirlajjānāṁ ca viprakṛt

श्रीपार्वती ने कहा — क्या अब इस संसार में यही शासक और दण्डधारी स्वामी बन गया है, जो हम जैसे दुष्ट और निर्लज्ज लोगों को दण्डित करने वाला है?

श्लोक 12 (bhagavata.6.17.12)

न वेद धर्मं किल पद्मयोनि- र्न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । न वै कुमारः कपिलो मनुश्च ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥ १२ ॥

na veda dharmaṁ kila padmayonir na brahma-putrā bhṛgu-nāradādyāḥ na vai kumāraḥ kapilo manuś ca ye no niṣedhanty ati-vartinaṁ haram

क्या कमलयोनि ब्रह्मा भी धर्म नहीं जानते? क्या ब्रह्मपुत्र भृगु, नारद आदि भी नहीं जानते? क्या सनत्कुमार, कपिल और मनु भी नहीं जानते? — तभी तो वे इस मर्यादा-उल्लंघन करने वाले हर (शिव) को नहीं रोकते!

श्लोक 13 (bhagavata.6.17.13)

एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् । यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥ १३ ॥

eṣām anudhyeya-padābja-yugmaṁ jagad-guruṁ maṅgala-maṅgalaṁ svayam yaḥ kṣatra-bandhuḥ paribhūya sūrīn praśāsti dhṛṣṭas tad ayaṁ hi daṇḍyaḥ

जिनके युगल चरणकमलों का ये सब निरंतर ध्यान करते हैं, वे जगद्गुरु स्वयं ही समस्त मंगलों के मंगल हैं — और यह क्षत्रियाधम, विद्वानों का तिरस्कार करके धृष्टतापूर्वक उन्हें ही शासित करने चला है; अतः यह दंड के ही योग्य है।

श्लोक 14 (bhagavata.6.17.14)

नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम् । सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥ १४ ॥

nāyam arhati vaikuṇṭha- pāda-mūlopasarpaṇam sambhāvita-matiḥ stabdhaḥ sādhubhiḥ paryupāsitam

अपनी बुद्धि पर अभिमान करने वाला और अकड़ में डूबा यह व्यक्ति, साधुजनों द्वारा सेवित वैकुण्ठनाथ के चरणों के समीप पहुँचने का अधिकारी ही नहीं है।

श्लोक 15 (bhagavata.6.17.15)

अतः पापीयसीं योनिमासुरीं याहि दुर्मते । यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५ ॥

ataḥ pāpīyasīṁ yonim āsurīṁ yāhi durmate yatheha bhūyo mahatāṁ na kartā putra kilbiṣam

अतः हे दुर्बुद्धे! तू अत्यंत पापपूर्ण असुर-योनि को प्राप्त हो, ताकि आगे कभी भी महापुरुषों के प्रति ऐसा अपराध न करे — यह मैं तुझे पुत्रवत् समझकर ही कह रही हूँ।

श्लोक 16 (bhagavata.6.17.16)

श्रीशुक उवाच एवं शप्तश्चित्रकेतुर्विमानादवरुह्य सः । प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥ १६ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ śaptaś citraketur vimānād avaruhya saḥ prasādayām āsa satīṁ mūrdhnā namreṇa bhārata

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे भरतवंशी! इस प्रकार शापित होने पर चित्रकेतु अपने विमान से नीचे उतरे और सिर झुकाकर सती पार्वती को प्रसन्न करने लगे।

श्लोक 17 (bhagavata.6.17.17)

चित्रकेतुरुवाच प्रतिगृह्णामि ते शापमात्मनोऽञ्जलिनाम्बिके । देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥ १७ ॥

citraketur uvāca pratigṛhṇāmi te śāpam ātmano ’ñjalināmbike devair martyāya yat proktaṁ pūrva-diṣṭaṁ hi tasya tat

चित्रकेतु ने कहा — हे अम्बिके! मैं अपने ही हाथ जोड़कर तुम्हारा यह शाप स्वीकार करता हूँ, क्योंकि देवताओं द्वारा किसी मनुष्य के लिए जो कुछ भी कहा जाता है, वह उसके पूर्वनिर्धारित कर्मफल के अनुरूप ही होता है।

श्लोक 18 (bhagavata.6.17.18)

संसारचक्र एतस्मिञ्जन्तुरज्ञानमोहितः । भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥ १८ ॥

saṁsāra-cakra etasmiñ jantur ajñāna-mohitaḥ bhrāmyan sukhaṁ ca duḥkhaṁ ca bhuṅkte sarvatra sarvadā

इस संसार-चक्र में अज्ञान से मोहित यह जीव सर्वत्र और सदा भ्रमण करते हुए सुख और दुःख दोनों भोगता रहता है।

श्लोक 19 (bhagavata.6.17.19)

नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः । कर्तारं मन्यतेऽत्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥ १९ ॥

naivātmā na paraś cāpi kartā syāt sukha-duḥkhayoḥ kartāraṁ manyate ’trājña ātmānaṁ param eva ca

न तो स्वयं आत्मा और न कोई अन्य ही सुख-दुःख का कर्ता है; किंतु अज्ञानी मनुष्य ही स्वयं को अथवा दूसरे को उसका कर्ता मान बैठता है।

श्लोक 20 (bhagavata.6.17.20)

गुणप्रवाह एतस्मिन् कः शापः को न्वनुग्रहः । कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥ २० ॥

guṇa-pravāha etasmin kaḥ śāpaḥ ko nv anugrahaḥ kaḥ svargo narakaḥ ko vā kiṁ sukhaṁ duḥkham eva vā

गुणों के इस निरंतर प्रवाह में शाप ही क्या और अनुग्रह ही क्या? स्वर्ग ही क्या और नरक ही क्या? सुख ही क्या और दुःख ही क्या?

श्लोक 21 (bhagavata.6.17.21)

एकः सृजति भूतानि भगवानात्ममायया । एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥ २१ ॥

ekaḥ sṛjati bhūtāni bhagavān ātma-māyayā eṣāṁ bandhaṁ ca mokṣaṁ ca sukhaṁ duḥkhaṁ ca niṣkalaḥ

भगवान अकेले ही अपनी माया से समस्त प्राणियों की रचना करते हैं; वे स्वयं अंशरहित रहकर ही इनके बंधन और मोक्ष, सुख और दुःख को भी रचते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.6.17.22)

न तस्य कश्चिद्दयितः प्रतीपो न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥

na tasya kaścid dayitaḥ pratīpo na jñāti-bandhur na paro na ca svaḥ samasya sarvatra nirañjanasya sukhe na rāgaḥ kuta eva roṣaḥ

उनका न तो कोई प्रिय है, न कोई शत्रु, न कोई ज्ञातिबंधु, न कोई पराया और न कोई अपना। सर्वत्र समभाव रखने वाले, निर्लिप्त उन भगवान को न तो सुख के प्रति कोई आसक्ति है, तो फिर क्रोध कहाँ से हो?

श्लोक 23 (bhagavata.6.17.23)

तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां सुखाय दुःखाय हिताहिताय । बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥ २३ ॥

tathāpi tac-chakti-visarga eṣāṁ sukhāya duḥkhāya hitāhitāya bandhāya mokṣāya ca mṛtyu-janmanoḥ śarīriṇāṁ saṁsṛtaye ’vakalpate

फिर भी उन्हीं की शक्ति का यह विस्तार ही देहधारी प्राणियों के लिए सुख-दुःख, हित-अहित, बंधन-मोक्ष तथा जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्र के लिए कारण बनता है।

श्लोक 24 (bhagavata.6.17.24)

अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि । यन्मन्यसे ह्यसाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥ २४ ॥

atha prasādaye na tvāṁ śāpa-mokṣāya bhāmini yan manyase hy asādhūktaṁ mama tat kṣamyatāṁ sati

अतः हे भामिनी! मैं तुमसे शाप-मुक्ति के लिए प्रार्थना नहीं करता। हे सती! जो कुछ भी मैंने कहा और तुम्हें अनुचित प्रतीत हुआ, उसके लिए मुझे क्षमा कर दो।

श्लोक 25 (bhagavata.6.17.25)

श्रीशुक उवाच इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥ २५ ॥

śrī-śuka uvāca iti prasādya giriśau citraketur arindama jagāma sva-vimānena paśyatoḥ smayatos tayoḥ

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे शत्रुदमन! इस प्रकार गिरीश-दम्पति को प्रसन्न करके चित्रकेतु अपने विमान से चले गये, और वे दोनों आश्चर्यचकित होकर मुस्कुराते हुए उन्हें देखते रहे।

श्लोक 26 (bhagavata.6.17.26)

ततस्तु भगवान् रुद्रो रुद्राणीमिदमब्रवीत् । देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च शृण्वताम् ॥ २६ ॥

tatas tu bhagavān rudro rudrāṇīm idam abravīt devarṣi-daitya-siddhānāṁ pārṣadānāṁ ca śṛṇvatām

तत्पश्चात् भगवान रुद्र ने देवर्षियों, दैत्यों, सिद्धों तथा अपने पार्षदों के सुनते हुए रुद्राणी (पार्वती) से यह कहा।

श्लोक 27 (bhagavata.6.17.27)

श्रीरुद्र उवाच दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्भुतकर्मणः । माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥ २७ ॥

śrī-rudra uvāca dṛṣṭavaty asi suśroṇi harer adbhuta-karmaṇaḥ māhātmyaṁ bhṛtya-bhṛtyānāṁ niḥspṛhāṇāṁ mahātmanām

श्रीरुद्र ने कहा — हे सुश्रोणि! तुमने अद्भुत कर्म करने वाले भगवान हरि के भृत्यों के भी भृत्य, निःस्पृह महात्माओं की महिमा देख ली।

श्लोक 28 (bhagavata.6.17.28)

नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति । स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ २८ ॥

nārāyaṇa-parāḥ sarve na kutaścana bibhyati svargāpavarga-narakeṣv api tulyārtha-darśinaḥ

भगवान नारायण के परायण समस्त भक्तगण किसी से भी भयभीत नहीं होते; स्वर्ग, मोक्ष तथा नरक — इन सबको वे समान दृष्टि से देखते हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.6.17.29)

देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया । सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥

dehināṁ deha-saṁyogād dvandvānīśvara-līlayā sukhaṁ duḥkhaṁ mṛtir janma śāpo ’nugraha eva ca

देहधारियों को देह के संयोग से, ईश्वर की लीला द्वारा ही, सुख-दुःख, मृत्यु-जन्म तथा शाप-अनुग्रह जैसे द्वंद्व प्राप्त होते रहते हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.6.17.30)

अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि । गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३० ॥

aviveka-kṛtaḥ puṁso hy artha-bheda ivātmani guṇa-doṣa-vikalpaś ca bhid eva srajivat kṛtaḥ

जैसे अविवेक के कारण मनुष्य के मन में आत्मा के विषय में भ्रम से भेद उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही गुण और दोष का यह भेद भी माला में (सर्प-भ्रम के समान) कल्पित मात्र है।

श्लोक 31 (bhagavata.6.17.31)

वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम् । ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद् व्यपाश्रयः ॥ ३१ ॥

vāsudeve bhagavati bhaktim udvahatāṁ nṛṇām jñāna-vairāgya-vīryāṇāṁ na hi kaścid vyapāśrayaḥ

भगवान वासुदेव के प्रति भक्ति धारण करने वाले मनुष्यों के लिए ज्ञान, वैराग्य और पराक्रम — इनमें से किसी का भी अभाव नहीं रहता।

श्लोक 32 (bhagavata.6.17.32)

नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । विदाम यस्येहितमंशकांशका न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥ ३२ ॥

nāhaṁ viriñco na kumāra-nāradau na brahma-putrā munayaḥ sureśāḥ vidāma yasyehitam aṁśakāṁśakā na tat-svarūpaṁ pṛthag-īśa-māninaḥ

न मैं (शिव), न ब्रह्मा, न सनत्कुमार और नारद, न ब्रह्मा के अन्य मुनि-पुत्र, न देवगण — कोई भी उनकी लीलाओं को नहीं जान पाता, क्योंकि हम सब तो उनके अंश के भी अंश मात्र हैं, फिर भी अपने-आप को पृथक् ईश्वर मानते हैं, अतः उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाते।

श्लोक 33 (bhagavata.6.17.33)

न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३ ॥

na hy asyāsti priyaḥ kaścin nāpriyaḥ svaḥ paro ’pi vā ātmatvāt sarva-bhūtānāṁ sarva-bhūta-priyo hariḥ

उनका न कोई प्रिय है, न अप्रिय, न कोई अपना है, न पराया; क्योंकि वे स्वयं ही समस्त प्राणियों की आत्मा हैं, अतः भगवान हरि समस्त प्राणियों के प्रिय हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.6.17.34)

तस्य चायं महाभागश्चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः । सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४ ॥

tasya cāyaṁ mahā-bhāgaś citraketuḥ priyo ’nugaḥ sarvatra sama-dṛk śānto hy ahaṁ caivācyuta-priyaḥ

उन्हीं का यह महाभाग्यशाली प्रिय अनुगामी चित्रकेतु है, जो सर्वत्र समदर्शी और शांत है; और मैं भी उसी भगवान अच्युत का प्रिय हूँ।

श्लोक 35 (bhagavata.6.17.35)

तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु । महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥

tasmān na vismayaḥ kāryaḥ puruṣeṣu mahātmasu mahāpuruṣa-bhakteṣu śānteṣu sama-darśiṣu

अतः महात्मा पुरुषों में, भगवान के भक्तों में, जो शांत और समदर्शी हैं, उनके आचरण पर कभी विस्मय नहीं करना चाहिए।

श्लोक 36 (bhagavata.6.17.36)

श्रीशुक उवाच इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम् । बभूव शान्तधी राजन् देवी विगतविस्मया ॥ ३६ ॥

śrī-śuka uvāca iti śrutvā bhagavataḥ śivasyomābhibhāṣitam babhūva śānta-dhī rājan devī vigata-vismayā

श्रीशुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! भगवान शिव के इस वचन को सुनकर, देवी उमा का चित्त शांत हो गया और उनका विस्मय दूर हो गया।

श्लोक 37 (bhagavata.6.17.37)

इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । मूर्ध्ना स जगृहे शापमेतावत्साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥

iti bhāgavato devyāḥ pratiśaptum alantamaḥ mūrdhnā sa jagṛhe śāpam etāvat sādhu-lakṣaṇam

इस प्रकार, यद्यपि वह परम भागवत देवी को प्रतिशाप देने में पूर्णतः समर्थ था, तथापि उसने सिर झुकाकर ही उस शाप को स्वीकार कर लिया — यही साधुजनों का सच्चा लक्षण है।

श्लोक 38 (bhagavata.6.17.38)

जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः । वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ३८ ॥

jajñe tvaṣṭur dakṣiṇāgnau dānavīṁ yonim āśritaḥ vṛtra ity abhivikhyāto jñāna-vijñāna-saṁyutaḥ

उस चित्रकेतु ने त्वष्टा के दक्षिणाग्नि में दानव-योनि को प्राप्त किया, और ज्ञान-विज्ञान से युक्त होते हुए भी वृत्र नामक इस विख्यात असुर के रूप में जन्म लिया।

श्लोक 39 (bhagavata.6.17.39)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । वृत्रस्यासुरजातेश्च कारणं भगवन्मतेः ॥ ३९ ॥

etat te sarvam ākhyātaṁ yan māṁ tvaṁ paripṛcchasi vṛtrasyāsura-jāteś ca kāraṇaṁ bhagavan-mateḥ

हे राजन्! तुमने जो मुझसे पूछा था, वह सब — वृत्र के असुर-जन्म का कारण और उसकी भगवद्भक्तिपूर्ण बुद्धि का रहस्य — मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 40 (bhagavata.6.17.40)

इतिहासमिमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मनः । माहात्म्यं विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद्विमुच्यते ॥ ४० ॥

itihāsam imaṁ puṇyaṁ citraketor mahātmanaḥ māhātmyaṁ viṣṇu-bhaktānāṁ śrutvā bandhād vimucyate

महात्मा चित्रकेतु के इस पुण्य इतिहास को तथा विष्णुभक्तों की इस महिमा को सुनकर, मनुष्य संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 41 (bhagavata.6.17.41)

य एतत्प्रातरुत्थाय श्रद्धया वाग्यतः पठेत् । इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥ ४१ ॥

ya etat prātar utthāya śraddhayā vāg-yataḥ paṭhet itihāsaṁ hariṁ smṛtvā sa yāti paramāṁ gatim

जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर श्रद्धापूर्वक, वाणी को संयत रखकर, भगवान हरि का स्मरण करते हुए इस इतिहास का पाठ करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

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