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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3

यमराज का अपने दूतों को उपदेश

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (bhagavata.6.3.1)

श्रीराजोवाच निशम्य देवः स्वभटोपवर्णितं प्रत्याह किं तानपि धर्मराजः । एवं हताज्ञो विहतान्मुरारे- र्नैदेशिकैर्यस्य वशे जनोऽयम् ॥ १ ॥

śrī-rājovāca niśamya devaḥ sva-bhaṭopavarṇitaṁ pratyāha kiṁ tān api dharmarājaḥ evaṁ hatājño vihatān murārer naideśikair yasya vaśe jano ’yam

राजा ने कहा — अपने ही सेवकों द्वारा वर्णित वृत्तांत सुनकर, धर्मराज ने, जिनके वश में समस्त जन हैं, मुरारि के दूतों द्वारा इस प्रकार पराजित और अपनी आज्ञा भंग होने पर, उन्हें क्या उत्तर दिया?

श्लोक 2 (bhagavata.6.3.2)

यमस्य देवस्य न दण्डभङ्गः कुतश्चनर्षे श्रुतपूर्व आसीत् । एतन्मुने वृश्चति लोकसंशयं न हि त्वदन्य इति मे विनिश्चितम् ॥ २ ॥

yamasya devasya na daṇḍa-bhaṅgaḥ kutaścanarṣe śruta-pūrva āsīt etan mune vṛścati loka-saṁśayaṁ na hi tvad-anya iti me viniścitam

हे ऋषे! यमराज देव का दंड कभी भंग हुआ हो, ऐसा पहले कभी सुना नहीं गया। हे मुनि! इस लोक-संशय को केवल आप ही दूर कर सकते हैं — यह मैंने निश्चित कर लिया है।

श्लोक 3 (bhagavata.6.3.3)

श्रीशुक उवाच भगवत्पुरुषै राजन् याम्याः प्रतिहतोद्यमाः । पतिं विज्ञापयामासुर्यमं संयमनीपतिम् ॥ ३ ॥

śrī-śuka uvāca bhagavat-puruṣai rājan yāmyāḥ pratihatodyamāḥ patiṁ vijñāpayām āsur yamaṁ saṁyamanī-patim

श्रीशुक ने कहा — हे राजन्! भगवान् के पुरुषों द्वारा जिनका प्रयत्न विफल हो गया था, उन यमदूतों ने संयमनी-पुरी के स्वामी अपने प्रभु यमराज को सारा वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 4 (bhagavata.6.3.4)

यमदूता ऊचुः कति सन्तीह शास्तारो जीवलोकस्य वै प्रभो । त्रैविध्यं कुर्वतः कर्म फलाभिव्यक्तिहेतवः ॥ ४ ॥

yamadūtā ūcuḥ kati santīha śāstāro jīva-lokasya vai prabho trai-vidhyaṁ kurvataḥ karma phalābhivyakti-hetavaḥ

यमदूतों ने कहा — हे प्रभो! इस जीव-लोक के कितने शासक हैं, जो त्रिगुणों के अनुसार किए गए कर्मों के फल को प्रकट करने वाले कारण हैं?

श्लोक 5 (bhagavata.6.3.5)

यदि स्युर्बहवो लोके शास्तारो दण्डधारिणः । कस्य स्यातां न वा कस्य मृत्युश्चामृतमेव वा ॥ ५ ॥

yadi syur bahavo loke śāstāro daṇḍa-dhāriṇaḥ kasya syātāṁ na vā kasya mṛtyuś cāmṛtam eva vā

यदि लोक में दंड धारण करने वाले अनेक शासक होते, तो किसका निर्णय मान्य होता और किसका नहीं — किसके द्वारा मृत्यु होती और किसके द्वारा अमरत्व?

श्लोक 6 (bhagavata.6.3.6)

किन्तु शास्तृबहुत्वे स्याद्बहूनामिह कर्मिणाम् । शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ ६ ॥

kintu śāstṛ-bahutve syād bahūnām iha karmiṇām śāstṛtvam upacāro hi yathā maṇḍala-vartinām

परंतु यहाँ कर्म करने वालों की बहुलता के कारण अनेक शासक हो सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे विभिन्न मंडलों के अधिकारी होते हैं, जो एक केंद्रीय सत्ता के अधीन कार्य करते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.6.3.7)

अतस्त्वमेको भूतानां सेश्वराणामधीश्वरः । शास्ता दण्डधरो नृणां शुभाशुभविवेचनः ॥ ७ ॥

atas tvam eko bhūtānāṁ seśvarāṇām adhīśvaraḥ śāstā daṇḍa-dharo nṝṇāṁ śubhāśubha-vivecanaḥ

अतः आप ही समस्त प्राणियों के, देवताओं सहित, एकमात्र परम अधीश्वर हैं; आप ही मनुष्यों के शासक, दंडधारी और शुभ-अशुभ के विवेचक हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.6.3.8)

तस्य ते विहितो दण्डो न लोके वर्ततेऽधुना । चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैराज्ञा ते विप्रलम्भिता ॥ ८ ॥

tasya te vihito daṇḍo na loke vartate ’dhunā caturbhir adbhutaiḥ siddhair ājñā te vipralambhitā

किंतु अब आपके द्वारा विहित वह दंड इस लोक में प्रभावी नहीं रह गया है, क्योंकि चार अद्भुत सिद्ध पुरुषों ने आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर दिया है।

श्लोक 9 (bhagavata.6.3.9)

नीयमानं तवादेशादस्माभिर्यातनागृहान् । व्यामोचयन्पातकिनं छित्त्वा पाशान प्रसह्य ते ॥ ९ ॥

nīyamānaṁ tavādeśād asmābhir yātanā-gṛhān vyāmocayan pātakinaṁ chittvā pāśān prasahya te

आपकी आज्ञा से जब हम उस पापी को यातना-गृहों की ओर ले जा रहे थे, तब उन्होंने बलपूर्वक पाशों को काटकर उसे मुक्त कर दिया।

श्लोक 10 (bhagavata.6.3.10)

तांस्ते वेदितुमिच्छामो यदि नो मन्यसे क्षमम् । नारायणेत्यभिहिते मा भैरित्याययुर्द्रुतम् ॥ १० ॥

tāṁs te veditum icchāmo yadi no manyase kṣamam nārāyaṇety abhihite mā bhair ity āyayur drutam

हम आपसे उनके विषय में जानना चाहते हैं, यदि आप हमें योग्य समझें। 'नारायण' शब्द का उच्चारण होते ही वे तत्काल आ पहुँचे और बोले — मत डरो, मत डरो।

श्लोक 11 (bhagavata.6.3.11)

श्रीबादरायणिरुवाच इति देवः स आपृष्टः प्रजासंयमनो यमः । प्रीतः स्वदूतान्प्रत्याह स्मरन् पादाम्बुजं हरेः ॥ ११ ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca iti devaḥ sa āpṛṣṭaḥ prajā-saṁyamano yamaḥ prītaḥ sva-dūtān pratyāha smaran pādāmbujaṁ hareḥ

श्री बादरायणि ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर, प्रजाओं के नियंता देव यमराज, हरि के चरण-कमलों का स्मरण करते हुए और प्रसन्न होकर, अपने दूतों को उत्तर देने लगे।

श्लोक 12 (bhagavata.6.3.12)

यम उवाच परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्वम् । यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा नस्योतवद्यस्य वशे च लोकः ॥ १२ ॥

yama uvāca paro mad-anyo jagatas tasthuṣaś ca otaṁ protaṁ paṭavad yatra viśvam yad-aṁśato ’sya sthiti-janma-nāśā nasy otavad yasya vaśe ca lokaḥ

यमराज ने कहा — मुझसे भी परे एक सर्वोच्च सत्ता है, जो चराचर सब पर है, जिसमें यह विश्व वस्त्र के समान आड़े-तिरछे बुना हुआ है। उसी के अंश से इस जगत् की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय होती है; समस्त लोक उसी के वश में हैं, जैसे नाथी हुई रस्सी से बैल वश में रहता है।

श्लोक 13 (bhagavata.6.3.13)

यो नामभिर्वाचि जनं निजायां बध्नाति तन्त्र्यामिव दामभिर्गाः । यस्मै बलिं त इमे नामकर्म- निबन्धबद्धाश्चकिता वहन्ति ॥ १३ ॥

yo nāmabhir vāci janaṁ nijāyāṁ badhnāti tantryām iva dāmabhir gāḥ yasmai baliṁ ta ime nāma-karma- nibandha-baddhāś cakitā vahanti

जो अपनी ही वाणी अर्थात् वेद में नामों के द्वारा जनों को उसी प्रकार बाँधता है जैसे रस्सी से बैलों को बाँधा जाता है — जिसके लिए ये सब लोग, अपने-अपने नाम और कर्म के बंधन में बँधे हुए, भयभीत होकर भेंट अर्पित करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.6.3.14)

अहं महेन्द्रो निऋर्तिः प्रचेताः सोमोऽग्निरीशः पवनो विरिञ्चिः । आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः ॥ १४ ॥

ahaṁ mahendro nirṛtiḥ pracetāḥ somo ’gnir īśaḥ pavano viriñciḥ āditya-viśve vasavo ’tha sādhyā marud-gaṇā rudra-gaṇāḥ sasiddhāḥ

मैं, महेंद्र, निऋति, प्रचेता अर्थात् वरुण, सोम, अग्नि, ईश अर्थात् शिव, पवन, विरिंचि अर्थात् ब्रह्मा, आदित्य, विश्वेदेव, वसुगण, साध्यगण, मरुद्गण तथा रुद्रगण — सिद्धों सहित —

श्लोक 15 (bhagavata.6.3.15)

अन्ये च ये विश्वसृजोऽमरेशा भृग्वादयोऽस्पृष्टरजस्तमस्काः । यस्येहितं न विदुः स्पृष्टमायाः सत्त्वप्रधाना अपि किं ततोऽन्ये ॥ १५ ॥

anye ca ye viśva-sṛjo ’mareśā bhṛgv-ādayo ’spṛṣṭa-rajas-tamaskāḥ yasyehitaṁ na viduḥ spṛṣṭa-māyāḥ sattva-pradhānā api kiṁ tato ’nye

तथा सृष्टि-कर्ता अन्य देवेश्वर और भृगु आदि ऋषिगण, जो रज और तम से अस्पृष्ट हैं — वे भी, माया से स्पृष्ट होने पर, सत्त्वप्रधान होते हुए भी उनकी लीला को नहीं जान पाते, तो फिर औरों की क्या बात!

श्लोक 16 (bhagavata.6.3.16)

यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते । आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम् ॥ १६ ॥

yaṁ vai na gobhir manasāsubhir vā hṛdā girā vāsu-bhṛto vicakṣate ātmānam antar-hṛdi santam ātmanāṁ cakṣur yathaivākṛtayas tataḥ param

जिसे प्राणी न तो इंद्रियों से, न मन से, न प्राण से, न हृदय से, न वाणी से देख पाते हैं — जो सबकी आत्माओं के भीतर हृदय में स्थित है, फिर भी उनसे परे है, ठीक वैसे ही जैसे शरीर के अन्य अंग नेत्र को नहीं देख पाते।

श्लोक 17 (bhagavata.6.3.17)

तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितुः परस्य मायाधिपतेर्महात्मनः । प्रायेण दूता इह वै मनोहरा- श्चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावाः ॥ १७ ॥

tasyātma-tantrasya harer adhīśituḥ parasya māyādhipater mahātmanaḥ prāyeṇa dūtā iha vai manoharāś caranti tad-rūpa-guṇa-svabhāvāḥ

उस स्वतंत्र, सर्वोपरि, माया के अधिपति, महात्मा हरि के दूत, जो प्रायः उन्हीं के रूप, गुण और स्वभाव से युक्त तथा अत्यंत मनोहर होते हैं, इस संसार में विचरण करते रहते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.6.3.18)

भूतानि विष्णोः सुरपूजितानि दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भुतानि । रक्षन्ति तद्भक्तिमतः परेभ्यो मत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ॥ १८ ॥

bhūtāni viṣṇoḥ sura-pūjitāni durdarśa-liṅgāni mahādbhutāni rakṣanti tad-bhaktimataḥ parebhyo mattaś ca martyān atha sarvataś ca

विष्णु के वे सेवक, जो देवताओं द्वारा भी पूजित हैं, जिनके रूप विरल ही दिखाई देते हैं और जो अत्यंत अद्भुत हैं, उनके भक्तों की रक्षा अन्य शत्रुओं से, मुझसे और वस्तुतः प्रत्येक संकट से करते हैं।

श्लोक 19 (bhagavata.6.3.19)

धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं न वै विदुऋर्षयो नापि देवाः । न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः कुतो नु विद्याधरचारणादयः ॥ १९ ॥

dharmaṁ tu sākṣād bhagavat-praṇītaṁ na vai vidur ṛṣayo nāpi devāḥ na siddha-mukhyā asurā manuṣyāḥ kuto nu vidyādhara-cāraṇādayaḥ

परंतु भगवान् द्वारा साक्षात् विहित सच्चा धर्म — उसे न तो ऋषि जानते हैं, न देवता, न सिद्धों के प्रमुख, न असुर, न मनुष्य — तो फिर विद्याधर, चारण आदि उसे कैसे जान सकते हैं?

श्लोक 20 (bhagavata.6.3.20)

स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः । प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥ २० ॥

svayambhūr nāradaḥ śambhuḥ kumāraḥ kapilo manuḥ prahlādo janako bhīṣmo balir vaiyāsakir vayam

स्वयंभू अर्थात् ब्रह्मा, नारद, शंभु अर्थात् शिव, सनकादि कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, व्यास-पुत्र शुकदेव, और मैं स्वयं —

श्लोक 21 (bhagavata.6.3.21)

द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः । गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ २१ ॥

dvādaśaite vijānīmo dharmaṁ bhāgavataṁ bhaṭāḥ guhyaṁ viśuddhaṁ durbodhaṁ yaṁ jñātvāmṛtam aśnute

— हम बारह ही भागवत-धर्म को जानते हैं, हे मेरे सेवको, जो अत्यंत गोपनीय, विशुद्ध और दुर्बोध है — जिसे जानकर मनुष्य अमरत्व प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (bhagavata.6.3.22)

एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः । भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥ २२ ॥

etāvān eva loke ’smin puṁsāṁ dharmaḥ paraḥ smṛtaḥ bhakti-yogo bhagavati tan-nāma-grahaṇādibhiḥ

इस लोक में मनुष्यों के लिए यही सर्वोच्च धर्म माना गया है — भगवान् के प्रति भक्तियोग, जिसका आरंभ उनके नाम के उच्चारण से होता है।

श्लोक 23 (bhagavata.6.3.23)

नामोच्चारणमाहात्म्यं हरेः पश्यत पुत्रकाः । अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ॥ २३ ॥

nāmoccāraṇa-māhātmyaṁ hareḥ paśyata putrakāḥ ajāmilo ’pi yenaiva mṛtyu-pāśād amucyata

हे मेरे प्रिय पुत्रो! हरि के नाम-उच्चारण की महिमा देखो — जिसके द्वारा अजामिल भी मृत्यु के पाश से मुक्त हो गया।

श्लोक 24 (bhagavata.6.3.24)

एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां सङ्कीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम् । विक्रुश्य पुत्रमघवान् यदजामिलोऽपि नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम् ॥ २४ ॥

etāvatālam agha-nirharaṇāya puṁsāṁ saṅkīrtanaṁ bhagavato guṇa-karma-nāmnām vikruśya putram aghavān yad ajāmilo ’pi nārāyaṇeti mriyamāṇa iyāya muktim

मनुष्यों के पाप को दूर करने के लिए भगवान् के गुण, कर्म और नाम का संकीर्तन ही पर्याप्त है — क्योंकि पापी अजामिल भी, अपने पुत्र को पुकारते हुए ही, मरते समय 'नारायण' कहकर मुक्ति को प्राप्त हो गया।

श्लोक 25 (bhagavata.6.3.25)

प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं देव्या विमोहितमतिर्बत माययालम् । त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः ॥ २५ ॥

prāyeṇa veda tad idaṁ na mahājano ’yaṁ devyā vimohita-matir bata māyayālam trayyāṁ jaḍī-kṛta-matir madhu-puṣpitāyāṁ vaitānike mahati karmaṇi yujyamānaḥ

यह बात प्रायः वह महाजन भी नहीं जानता, जिसकी बुद्धि माया से पूर्णतः मोहित है, तथा जो वेदत्रयी की मधुर, पुष्पित भाषा में उलझकर जड़बुद्धि हो गया है और महान् यज्ञ-कर्मों में लगा रहता है।

श्लोक 26 (bhagavata.6.3.26)

एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् । ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरुगायवादः ॥ २६ ॥

evaṁ vimṛśya sudhiyo bhagavaty anante sarvātmanā vidadhate khalu bhāva-yogam te me na daṇḍam arhanty atha yady amīṣāṁ syāt pātakaṁ tad api hanty urugāya-vādaḥ

इस प्रकार विचार करके, बुद्धिमान् पुरुष अनंत भगवान् के प्रति सर्वात्मना भाव-योग को अपनाते हैं; वे मेरे दंड के भागी नहीं हैं, और यदि उनमें कोई पाप शेष भी रह जाए, तो उसे भी उरुगाय अर्थात् व्यापक कीर्ति वाले भगवान् के नाम-कीर्तन से नष्ट कर दिया जाता है।

श्लोक 27 (bhagavata.6.3.27)

ते देवसिद्धपरिगीतपवित्रगाथा ये साधवः समदृशो भगवत्प्रपन्नाः । तान्नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान् नैषां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे ॥ २७ ॥

te deva-siddha-parigīta-pavitra-gāthā ye sādhavaḥ samadṛśo bhagavat-prapannāḥ tān nopasīdata harer gadayābhiguptān naiṣāṁ vayaṁ na ca vayaḥ prabhavāma daṇḍe

वे साधुजन, जिनकी पवित्र कथाएँ देवता और सिद्धगण गाते हैं, जो समदर्शी हैं और भगवान् के शरणागत हैं — उनके पास मत जाना, क्योंकि वे हरि की गदा से सुरक्षित हैं; न हम और न ही काल स्वयं उन्हें दंड देने में समर्थ हैं।

श्लोक 28 (bhagavata.6.3.28)

तानानयध्वमसतो विमुखान् मुकुन्द- पादारविन्दमकरन्दरसादजस्रम् । निष्किञ्चनैः परमहंसकुलैरसङ्गै- र्जुष्टाद्गृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान् ॥ २८ ॥

tān ānayadhvam asato vimukhān mukunda- pādāravinda-makaranda-rasād ajasram niṣkiñcanaiḥ paramahaṁsa-kulair asaṅgair juṣṭād gṛhe niraya-vartmani baddha-tṛṣṇān

उन्हीं असत् पुरुषों को मेरे पास लाना, जो मुकुंद के चरण-कमलों के उस निरंतर मकरंद-रस से विमुख हैं, जिसका पान अकिंचन, असंग परमहंसजन करते हैं — जो घर-गृहस्थी में ही अपनी तृष्णा बाँधे रखते हैं, जो नरक का मार्ग है।

श्लोक 29 (bhagavata.6.3.29)

जिह्वा न वक्ति भगवद्गुणनामधेयं चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम् । कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापि तानानयध्वमसतोऽकृतविष्णुकृत्यान् ॥ २९ ॥

jihvā na vakti bhagavad-guṇa-nāmadheyaṁ cetaś ca na smarati tac-caraṇāravindam kṛṣṇāya no namati yac-chira ekadāpi tān ānayadhvam asato ’kṛta-viṣṇu-kṛtyān

जिनकी जिह्वा भगवान् के गुण और नाम का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरण-कमलों का स्मरण नहीं करता, जिनका सिर कृष्ण को एक बार भी प्रणाम नहीं करता — ऐसे विष्णु-कर्तव्य से रहित असत् पुरुषों को ही मेरे पास लाना।

श्लोक 30 (bhagavata.6.3.30)

तत् क्षम्यतां स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं नः । स्वानामहो न विदुषां रचिताञ्जलीनां क्षान्तिर्गरीयसि नमः पुरुषाय भूम्ने ॥ ३० ॥

tat kṣamyatāṁ sa bhagavān puruṣaḥ purāṇo nārāyaṇaḥ sva-puruṣair yad asat kṛtaṁ naḥ svānām aho na viduṣāṁ racitāñjalīnāṁ kṣāntir garīyasi namaḥ puruṣāya bhūmne

वह भगवान्, वह पुराण-पुरुष नारायण, हमारे इन सेवकों द्वारा किए गए इस अशिष्ट कृत्य को क्षमा करें। हाय! अनजाने में हुई इस भूल के लिए हम अपने ही जन, हाथ जोड़कर खड़े हैं — महापुरुषों में क्षमा ही सबसे बड़ा गुण है। उस सर्वव्यापी परम पुरुष को नमस्कार है।

श्लोक 31 (bhagavata.6.3.31)

तस्मात् सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम् । महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतम् ॥ ३१ ॥

tasmāt saṅkīrtanaṁ viṣṇor jagan-maṅgalam aṁhasām mahatām api kauravya viddhy aikāntika-niṣkṛtam

अतः, हे कौरव्य! जान लो कि विष्णु का संकीर्तन ही सम्पूर्ण जगत् का मंगल है, और यहाँ तक कि महापापों का भी वह परम और निश्चित प्रायश्चित्त है।

श्लोक 32 (bhagavata.6.3.32)

शृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहुः । यथा सुजातया भक्त्या शुद्ध्येन्नात्मा व्रतादिभिः ॥ ३२ ॥

śṛṇvatāṁ gṛṇatāṁ vīryāṇy uddāmāni harer muhuḥ yathā sujātayā bhaktyā śuddhyen nātmā vratādibhiḥ

जो निरंतर हरि के अद्भुत पराक्रमों को सुनते और गाते हैं, उनकी आत्मा उस सहज उत्पन्न भक्ति से जितनी शुद्ध होती है, उतनी व्रत आदि साधनों से नहीं होती।

श्लोक 33 (bhagavata.6.3.33)

कृष्णाङ्घ्रिपद्ममधुलिण् न पुनर्विसृष्ट- मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु । अन्यस्तु कामहत आत्मरजः प्रमार्ष्टु- मीहेत कर्म यत एव रजः पुनः स्यात् ॥ ३३ ॥

kṛṣṇāṅghri-padma-madhu-liṇ na punar visṛṣṭa- māyā-guṇeṣu ramate vṛjināvaheṣu anyas tu kāma-hata ātma-rajaḥ pramārṣṭum īheta karma yata eva rajaḥ punaḥ syāt

कृष्ण के चरण-कमलों का मधु चखने वाला व्यक्ति, त्यागी हुई माया के उन गुणों में पुनः रमण नहीं करता, जो दुःखदायी हैं; परंतु काम से पीड़ित दूसरा व्यक्ति, कर्म द्वारा अपनी आत्मा की मलिनता मिटाने का प्रयत्न करता है — जिससे वह मलिनता पुनः उत्पन्न हो जाती है।

श्लोक 34 (bhagavata.6.3.34)

इत्थं स्वभर्तृगदितं भगवन्महित्वं संस्मृत्य विस्मितधियो यमकिङ्करास्ते । नैवाच्युताश्रयजनं प्रतिशङ्कमाना द्रष्टुं च बिभ्यति ततः प्रभृति स्म राजन् ॥ ३४ ॥

itthaṁ svabhartṛ-gaditaṁ bhagavan-mahitvaṁ saṁsmṛtya vismita-dhiyo yama-kiṅkarās te naivācyutāśraya-janaṁ pratiśaṅkamānā draṣṭuṁ ca bibhyati tataḥ prabhṛti sma rājan

हे राजन्! अपने स्वामी द्वारा कहे गए भगवान् के इस महिमापूर्ण वृत्तांत का स्मरण करके, यम के वे दूत आश्चर्यचकित हो गए, और तभी से भयभीत होकर वे अच्युत की शरण में आए हुए किसी भी व्यक्ति की ओर देखने से भी डरने लगे।

श्लोक 35 (bhagavata.6.3.35)

इतिहासमिमं गुह्यं भगवान् कुम्भसम्भवः । कथयामास मलय आसीनो हरिमर्चयन् ॥ ३५ ॥

itihāsam imaṁ guhyaṁ bhagavān kumbha-sambhavaḥ kathayām āsa malaya āsīno harim arcayan

इस गोपनीय इतिहास को महर्षि अगस्त्य, जो कुम्भ से उत्पन्न हुए, मलय पर्वत पर बैठकर हरि की उपासना करते हुए, मुझे सुनाया था।

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