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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11

आदर्श समाज — चार वर्ण

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (bhagavata.7.11.1)

श्रीशुक उवाच श्रुत्वेहितं साधु सभासभाजितं महत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मनः । युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदान्वितः पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca śrutvehitaṁ sādhu sabhā-sabhājitaṁ mahattamāgraṇya urukramātmanaḥ yudhiṣṭhiro daitya-pater mudānvitaḥ papraccha bhūyas tanayaṁ svayambhuvaḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — दैत्यराज-पुत्र प्रह्लाद के उन उत्तम आचरणों को सुनकर, जो प्रत्येक सभा में सराहे जाते हैं और जिन्हें महानतम पुरुष भी आदर देते हैं, क्योंकि प्रह्लाद का सम्पूर्ण अस्तित्व उरुक्रम भगवान विष्णु में समर्पित था — युधिष्ठिर आनन्द से भरकर पुनः स्वयम्भू के पुत्र नारद मुनि से प्रश्न करने लगे।

श्लोक 2 (bhagavata.7.11.2)

श्रीयुधिष्ठिर उवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम् । वर्णाश्रमाचारयुतं यत्पुमान्विन्दते परम् ॥ २ ॥

śrī-yudhiṣṭhira uvāca bhagavan śrotum icchāmi nṛṇāṁ dharmaṁ sanātanam varṇāśramācāra-yutaṁ yat pumān vindate param

श्री युधिष्ठिर ने कहा — हे भगवन्! मैं मनुष्यों के सनातन धर्म को सुनना चाहता हूँ, जो वर्ण और आश्रम के आचार से युक्त है और जिसके द्वारा पुरुष परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (bhagavata.7.11.3)

भवान्प्रजापतेः साक्षादात्मजः परमेष्ठिनः । सुतानां सम्मतो ब्रह्मंस्तपोयोगसमाधिभिः ॥ ३ ॥

bhavān prajāpateḥ sākṣād ātmajaḥ parameṣṭhinaḥ sutānāṁ sammato brahmaṁs tapo-yoga-samādhibhiḥ

हे ब्रह्मन्! आप प्रजापति परमेष्ठी ब्रह्मा के साक्षात् पुत्र हैं, और अपनी तपस्या, योग तथा समाधि के कारण उनके समस्त पुत्रों में सम्मानित हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.7.11.4)

नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदुः । करुणाः साधवः शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥ ४ ॥

nārāyaṇa-parā viprā dharmaṁ guhyaṁ paraṁ viduḥ karuṇāḥ sādhavaḥ śāntās tvad-vidhā na tathāpare

नारायण-परायण ब्राह्मण ही परम गुह्य धर्म को जानते हैं; वे करुणामय, साधु-स्वभाव तथा शान्त होते हैं — आपके समान अन्य कोई नहीं है।

श्लोक 5 (bhagavata.7.11.5)

श्रीनारद उवाच नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्मसेतवे । वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ५ ॥

śrī-nārada uvāca natvā bhagavate ’jāya lokānāṁ dharma-setave vakṣye sanātanaṁ dharmaṁ nārāyaṇa-mukhāc chrutam

श्री नारद जी ने कहा — अजन्मा भगवान को, जो समस्त लोकों के धर्म के सेतु हैं, नमस्कार करके मैं उस सनातन धर्म का वर्णन करूँगा जिसे मैंने साक्षात् नारायण के मुख से सुना है।

श्लोक 6 (bhagavata.7.11.6)

योऽवतीर्यात्मनोंऽशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः । लोकानां स्वस्तयेऽध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥ ६ ॥

yo ’vatīryātmano ’ṁśena dākṣāyaṇyāṁ tu dharmataḥ lokānāṁ svastaye ’dhyāste tapo badarikāśrame

जो भगवान अपने अंश से धर्मपूर्वक दक्ष-पुत्री मूर्ति के गर्भ से अवतरित हुए, और लोकों के कल्याण हेतु आज भी बदरिकाश्रम में तपस्या में स्थित हैं —

श्लोक 7 (bhagavata.7.11.7)

धर्ममूलं हि भगवान्सर्ववेदमयो हरिः । स्मृतं च तद्विदां राजन्येन चात्मा प्रसीदति ॥ ७ ॥

dharma-mūlaṁ hi bhagavān sarva-vedamayo hariḥ smṛtaṁ ca tad-vidāṁ rājan yena cātmā prasīdati

भगवान हरि, जो समस्त वेदों के साररूप हैं, ही धर्म के मूल हैं; हे राजन्! धर्मज्ञों द्वारा स्मृत वह धर्म भी वही है, जिसके पालन से आत्मा शान्ति को प्राप्त होती है।

श्लोक 8 (bhagavata.7.11.8)

सत्यं दया तपः शौचं तितिक्षेक्षा शमो दमः । अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्यागः स्वाध्याय आर्जवम् ॥ ८ ॥

satyaṁ dayā tapaḥ śaucaṁ titikṣekṣā śamo damaḥ ahiṁsā brahmacaryaṁ ca tyāgaḥ svādhyāya ārjavam

सत्य, दया, तप, शौच, सहनशीलता, विवेक, मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय और सरलता;

श्लोक 9 (bhagavata.7.11.9)

सन्तोषः समदृक्सेवा ग्राम्येहोपरमः शनैः । नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम् ॥ ९ ॥

santoṣaḥ samadṛk-sevā grāmyehoparamaḥ śanaiḥ nṛṇāṁ viparyayehekṣā maunam ātma-vimarśanam

सन्तोष, समदर्शी सज्जनों की सेवा, सांसारिक कार्यों से क्रमशः विरक्ति, मनुष्यों के व्यर्थ प्रयासों की निरर्थकता का अवलोकन, मौन और आत्म-चिन्तन;

श्लोक 10 (bhagavata.7.11.10)

अन्नाद्यादेः संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । तेष्वात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषु पाण्डव ॥ १० ॥

annādyādeḥ saṁvibhāgo bhūtebhyaś ca yathārhataḥ teṣv ātma-devatā-buddhiḥ sutarāṁ nṛṣu pāṇḍava

अन्न आदि का सभी प्राणियों में यथायोग्य वितरण, तथा हे पाण्डव! विशेषतः मनुष्यों में आत्मा और परमात्मा की भावना रखना;

श्लोक 11 (bhagavata.7.11.11)

श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः । सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥

śravaṇaṁ kīrtanaṁ cāsya smaraṇaṁ mahatāṁ gateḥ sevejyāvanatir dāsyaṁ sakhyam ātma-samarpaṇam

महापुरुषों के परम गन्तव्य भगवान के विषय में श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण, उनकी सेवा, पूजा, प्रणाम, दास्य-भाव, सख्य-भाव तथा आत्म-समर्पण;

श्लोक 12 (bhagavata.7.11.12)

नृणामयं परो धर्मः सर्वेषां समुदाहृतः । त्रिंशल्लक्षणवान् राजन्सर्वात्मा येन तुष्यति ॥ १२ ॥

nṛṇām ayaṁ paro dharmaḥ sarveṣāṁ samudāhṛtaḥ triṁśal-lakṣaṇavān rājan sarvātmā yena tuṣyati

हे राजन्! यही मनुष्यों का परम धर्म कहा गया है, जो इन तीस लक्षणों से युक्त है और जिससे सर्वात्मा भगवान सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.7.11.13)

संस्कारा यत्राविच्छिन्नाः स द्विजोऽजो जगाद यम् । इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम् । जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः ॥ १३ ॥

saṁskārā yatrāvicchinnāḥ sa dvijo ’jo jagāda yam ijyādhyayana-dānāni vihitāni dvijanmanām janma-karmāvadātānāṁ kriyāś cāśrama-coditāḥ

जिसमें संस्कार अविच्छिन्न रूप से सम्पन्न हुए हों, उसे द्विज कहा गया है — ऐसा स्वयं अजन्मा भगवान ने कहा है। द्विजों के लिए यज्ञ, अध्ययन और दान विहित हैं, तथा जन्म एवं कर्म से शुद्ध व्यक्तियों के लिए आश्रम के अनुसार अन्य कर्म भी निर्धारित हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.7.11.14)

विप्रस्याध्ययनादीनि षडन्यस्याप्रतिग्रहः । राज्ञो वृत्तिः प्रजागोप्तुरविप्राद्वा करादिभिः ॥ १४ ॥

viprasyādhyayanādīni ṣaḍ-anyasyāpratigrahaḥ rājño vṛttiḥ prajā-goptur aviprād vā karādibhiḥ

ब्राह्मण के छह कर्तव्य हैं (अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान देना व दान लेना); क्षत्रिय के लिए दान ग्रहण को छोड़कर शेष पाँच कर्तव्य हैं। प्रजा के रक्षक राजा की जीविका अब्राह्मणों से कर आदि लेकर होती है।

श्लोक 15 (bhagavata.7.11.15)

वैश्यस्तु वार्तावृत्तिः स्यान्नित्यं ब्रह्मकुलानुगः । शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा वृत्तिश्च स्वामिनो भवेत् ॥ १५ ॥

vaiśyas tu vārtā-vṛttiḥ syān nityaṁ brahma-kulānugaḥ śūdrasya dvija-śuśrūṣā vṛttiś ca svāmino bhavet

वैश्य की जीविका वार्ता (कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा) है, जो सदा ब्राह्मण-कुल के अनुगमन में हो; शूद्र का कर्तव्य द्विजों की सेवा है और उसकी जीविका अपने स्वामी से प्राप्त होती है।

श्लोक 16 (bhagavata.7.11.16)

वार्ता विचित्रा शालीनयायावरशिलोञ्छनम् । विप्रवृत्तिश्चतुर्धेयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा ॥ १६ ॥

vārtā vicitrā śālīna- yāyāvara-śiloñchanam vipra-vṛttiś caturdheyaṁ śreyasī cottarottarā

ब्राह्मण की जीविका के विविध प्रकार हैं — शालीन (बिना माँगे प्राप्त वस्तु से निर्वाह), यायावर (खेत में शेष अन्न बीनना) तथा शिलोञ्छन (बिखरे दानों का संग्रह); वार्ता सहित ये चार जीविकाएँ हैं, और इनमें प्रत्येक उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है।

श्लोक 17 (bhagavata.7.11.17)

जघन्यो नोत्तमां वृत्तिमनापदि भजेन्नरः । ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वशः ॥ १७ ॥

jaghanyo nottamāṁ vṛttim anāpadi bhajen naraḥ ṛte rājanyam āpatsu sarveṣām api sarvaśaḥ

निम्न वर्ण का व्यक्ति आपत्ति के बिना उच्च वर्ण की जीविका को न अपनाए; परन्तु आपत्तिकाल में क्षत्रिय को छोड़कर सभी को सर्वथा किसी भी अन्य वर्ण की जीविका अपनाने की अनुमति है।

श्लोक 18 (bhagavata.7.11.18)

ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा । सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ १८ ॥

ṛtāmṛtābhyāṁ jīveta mṛtena pramṛtena vā satyānṛtābhyām api vā na śva-vṛttyā kadācana

मनुष्य ऋत और अमृत से, अथवा मृत और प्रमृत से, अथवा सत्यानृत से भी जीवन-निर्वाह कर सकता है — परन्तु कभी भी श्ववृत्ति (कुत्ते की वृत्ति) से नहीं।

श्लोक 19 (bhagavata.7.11.19)

ऋतमुञ्छशिलं प्रोक्तममृतं यदयाचितम् । मृतं तु नित्ययाच्ञा स्यात्प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ १९ ॥

ṛtam uñchaśilaṁ proktam amṛtaṁ yad ayācitam mṛtaṁ tu nitya-yācñā syāt pramṛtaṁ karṣaṇaṁ smṛtam

ऋत का अर्थ है खेत में शेष बचे अन्न को बीनना; अमृत वह है जो बिना माँगे प्राप्त हो; मृत का अर्थ है नित्य याचना करना; प्रमृत को कृषि-कर्म कहा गया है;

श्लोक 20 (bhagavata.7.11.20)

सत्यानृतं च वाणिज्यं श्ववृत्तिर्नीचसेवनम् । वर्जयेत्तां सदा विप्रो राजन्यश्च जुगुप्सिताम् । सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २० ॥

satyānṛtaṁ ca vāṇijyaṁ śva-vṛttir nīca-sevanam varjayet tāṁ sadā vipro rājanyaś ca jugupsitām sarva-vedamayo vipraḥ sarva-devamayo nṛpaḥ

और सत्यानृत का अर्थ है वाणिज्य। नीच व्यक्ति की सेवा श्ववृत्ति (कुत्ते की वृत्ति) है — इस निन्दनीय मार्ग को ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों को सदा त्याग देना चाहिए। ब्राह्मण समस्त वेदों का स्वरूप है और राजा समस्त देवताओं का स्वरूप है।

श्लोक 21 (bhagavata.7.11.21)

शमो दमस्तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् । ज्ञानं दयाच्युतात्मत्वं सत्यं च ब्रह्मलक्षणम् ॥ २१ ॥

śamo damas tapaḥ śaucaṁ santoṣaḥ kṣāntir ārjavam jñānaṁ dayācyutātmatvaṁ satyaṁ ca brahma-lakṣaṇam

मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, दया, अच्युत भगवान में अटल भाव, तथा सत्य — ये ब्राह्मण के लक्षण हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.7.11.22)

शौर्यं वीर्यं धृतिस्तेजस्त्यागश्चात्मजयः क्षमा । ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यं च क्षत्रलक्षणम् ॥ २२ ॥

śauryaṁ vīryaṁ dhṛtis tejas tyāgaś cātmajayaḥ kṣamā brahmaṇyatā prasādaś ca satyaṁ ca kṣatra-lakṣaṇam

शौर्य, बल, धृति, तेज, त्याग, आत्मजय, क्षमा, ब्राह्मणों के प्रति आदर, प्रसन्नता तथा सत्य — ये क्षत्रिय के लक्षण हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.7.11.23)

देवगुर्वच्युते भक्तिस्त्रिवर्गपरिपोषणम् । आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्यलक्षणम् ॥ २३ ॥

deva-gurv-acyute bhaktis tri-varga-paripoṣaṇam āstikyam udyamo nityaṁ naipuṇyaṁ vaiśya-lakṣaṇam

देवताओं, गुरु तथा अच्युत भगवान विष्णु के प्रति भक्ति, धर्म-अर्थ-काम इन तीनों का समुचित पोषण, आस्तिकता, निरन्तर उद्यम तथा कार्यकुशलता — ये वैश्य के लक्षण हैं।

श्लोक 24 (bhagavata.7.11.24)

शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया । अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गोविप्ररक्षणम् ॥ २४ ॥

śūdrasya sannatiḥ śaucaṁ sevā svāminy amāyayā amantra-yajño hy asteyaṁ satyaṁ go-vipra-rakṣaṇam

विनम्रता, शौच, स्वामी की निष्कपट सेवा, बिना मन्त्रों के यज्ञ करना, चोरी न करना, सत्य बोलना, तथा गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा करना — ये शूद्र के लक्षण हैं।

श्लोक 25 (bhagavata.7.11.25)

स्त्रीणां च पतिदेवानां तच्छुश्रूषानुकूलता । तद्बन्धुष्वनुवृत्तिश्च नित्यं तद्व्रतधारणम् ॥ २५ ॥

strīṇāṁ ca pati-devānāṁ tac-chuśrūṣānukūlatā tad-bandhuṣv anuvṛttiś ca nityaṁ tad-vrata-dhāraṇam

और पति को ही देवता मानने वाली स्त्रियों के लिए — उनकी अनुकूल सेवा, उनके प्रति सद्भाव, उनके सम्बन्धियों के प्रति स्नेह तथा सदैव उनके व्रतों का पालन —

श्लोक 26 (bhagavata.7.11.26)

सम्मार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डनवर्तनैः । स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा ॥ २६ ॥

sammārjanopalepābhyāṁ gṛha-maṇḍana-vartanaiḥ svayaṁ ca maṇḍitā nityaṁ parimṛṣṭa-paricchadā

ये सती स्त्री के चार सिद्धान्त हैं। घर को झाड़ू व लेपन से स्वच्छ रखते हुए तथा उसे सजाते हुए, और स्वयं भी सदा सुसज्जित तथा अपनी गृहस्थी की वस्तुओं को स्वच्छ रखते हुए,

श्लोक 27 (bhagavata.7.11.27)

कामैरुच्चावचैः साध्वी प्रश्रयेण दमेन च । वाक्यैः सत्यैः प्रियैः प्रेम्णा काले काले भजेत्पतिम् ॥ २७ ॥

kāmair uccāvacaiḥ sādhvī praśrayeṇa damena ca vākyaiḥ satyaiḥ priyaiḥ premṇā kāle kāle bhajet patim

सती स्त्री को चाहिए कि वह पति की विविध कामनाओं की पूर्ति करते हुए, विनय व संयम से, सत्य तथा प्रिय वचनों से एवं प्रेमपूर्वक समय-समय पर उसकी सेवा करे।

श्लोक 28 (bhagavata.7.11.28)

सन्तुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रियसत्यवाक् । अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत् ॥ २८ ॥

santuṣṭālolupā dakṣā dharma-jñā priya-satya-vāk apramattā śuciḥ snigdhā patiṁ tv apatitaṁ bhajet

सन्तुष्ट, लोभरहित, कुशल, धर्मज्ञ, प्रिय व सत्य वचन बोलने वाली, सजग, पवित्र तथा स्नेहमयी — इस प्रकार पत्नी को उस पति की सेवा करनी चाहिए जो पतित न हो।

श्लोक 29 (bhagavata.7.11.29)

या पतिं हरिभावेन भजेत् श्रीरिव तत्परा । हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ २९ ॥

yā patiṁ hari-bhāvena bhajet śrīr iva tat-parā hary-ātmanā harer loke patyā śrīr iva modate

जो स्त्री अपने पति की सेवा भगवद्भाव से इस प्रकार करती है मानो स्वयं लक्ष्मी हरि की सेवा में तत्पर हों, वह हरि-भाव से युक्त अपने पति के साथ हरि के धाम में उसी प्रकार आनन्दित होती है जैसे लक्ष्मी जी आनन्दित होती हैं।

श्लोक 30 (bhagavata.7.11.30)

वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुलकृता भवेत् । अचौराणामपापानामन्त्यजान्तेवसायिनाम् ॥ ३० ॥

vṛttiḥ saṅkara-jātīnāṁ tat-tat-kula-kṛtā bhavet acaurāṇām apāpānām antyajāntevasāyinām

वर्णसंकर जातियों की जीविका उनके अपने-अपने कुल के अनुसार होती है — इनमें अन्त्यज और अन्तेवासायी वे हैं जो चोरी और पाप से रहित होते हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.7.11.31)

प्रायः स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे । वेददृग्भिः स्मृतो राजन्प्रेत्य चेह च शर्मकृत् ॥ ३१ ॥

prāyaḥ sva-bhāva-vihito nṛṇāṁ dharmo yuge yuge veda-dṛgbhiḥ smṛto rājan pretya ceha ca śarma-kṛt

हे राजन्! प्रायः मनुष्य का स्वभावानुसार निर्धारित धर्म ही प्रत्येक युग में वेदद्रष्टा ऋषियों द्वारा मान्य किया गया है, और वही इस लोक तथा परलोक दोनों में कल्याणकारी है।

श्लोक 32 (bhagavata.7.11.32)

वृत्त्या स्वभावकृतया वर्तमानः स्वकर्मकृत् । हित्वा स्वभावजं कर्म शनैर्निर्गुणतामियात् ॥ ३२ ॥

vṛttyā sva-bhāva-kṛtayā vartamānaḥ sva-karma-kṛt hitvā sva-bhāva-jaṁ karma śanair nirguṇatām iyāt

अपने स्वभाव से उत्पन्न वृत्ति द्वारा जीवनयापन करते हुए, अपना निजी कर्म करने वाला व्यक्ति, धीरे-धीरे उस स्वभावजन्य कर्म को भी त्यागकर निर्गुण अवस्था को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 33 (bhagavata.7.11.33)

उप्यमानं मुहुः क्षेत्रं स्वयं निर्वीर्यतामियात् । न कल्पते पुनः सूत्यै उप्तं बीजं च नश्यति ॥ ३३ ॥

upyamānaṁ muhuḥ kṣetraṁ svayaṁ nirvīryatām iyāt na kalpate punaḥ sūtyai uptaṁ bījaṁ ca naśyati

बार-बार बोया गया खेत स्वयं ही निर्वीर्य (उर्वरता-रहित) हो जाता है; वह पुनः उपज देने योग्य नहीं रहता और उसमें बोया गया बीज भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 34 (bhagavata.7.11.34)

एवं कामाशयं चित्तं कामानामतिसेवया । विरज्येत यथा राजन्नग्निवत् कामबिन्दुभिः ॥ ३४ ॥

evaṁ kāmāśayaṁ cittaṁ kāmānām atisevayā virajyeta yathā rājann agnivat kāma-bindubhiḥ

हे राजन्! इसी प्रकार कामनामय चित्त भी कामनाओं के अत्यधिक भोग से विरक्त हो जाता है — ठीक वैसे ही जैसे बूँद-बूँद डाले गए जल की बूँदों से अग्नि प्रज्वलित होने के बजाय बुझ जाती है।

श्लोक 35 (bhagavata.7.11.35)

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम् । यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥ ३५ ॥

yasya yal lakṣaṇaṁ proktaṁ puṁso varṇābhivyañjakam yad anyatrāpi dṛśyeta tat tenaiva vinirdiśet

जिस व्यक्ति के जो लक्षण उसके वर्ण को प्रकट करने वाले कहे गए हैं, यदि वही लक्षण किसी अन्य में भी दिखाई दे, तो उसे उसी लक्षण के अनुसार ही पहचाना जाए।

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