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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5

हिरण्यकशिपु के साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (bhagavata.7.5.1)

श्रीनारद उवाच पौरोहित्याय भगवान्वृतः काव्यः किलासुरैः । षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ॥ १ ॥

śrī-nārada uvāca paurohityāya bhagavān vṛtaḥ kāvyaḥ kilāsuraiḥ ṣaṇḍāmarkau sutau tasya daitya-rāja-gṛhāntike

श्रीनारद ने कहा — असुरों ने पुरोहित-कार्य के लिए भगवान शुक्राचार्य को चुना था। उनके पुत्र षण्ड और अमर्क दैत्यराज के भवन के निकट रहते थे।

श्लोक 2 (bhagavata.7.5.2)

तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्लादं नयकोविदम् । पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ॥ २ ॥

tau rājñā prāpitaṁ bālaṁ prahlādaṁ naya-kovidam pāṭhayām āsatuḥ pāṭhyān anyāṁś cāsura-bālakān

राजा द्वारा भेजे गए, नीतिशास्त्र में निपुण बालक प्रह्लाद को, तथा अन्य असुर-बालकों को भी वे पाठ्य विषय पढ़ाने लगे।

श्लोक 3 (bhagavata.7.5.3)

यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनुपपाठ च । न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ॥ ३ ॥

yat tatra guruṇā proktaṁ śuśruve ’nupapāṭha ca na sādhu manasā mene sva-parāsad-grahāśrayam

गुरु द्वारा वहाँ जो कुछ पढ़ाया जाता, वह उसे सुनता और दोहराता भी था; परंतु स्व-पर के मिथ्या भेद पर आधारित उस शिक्षा को वह मन से उचित नहीं मानता था।

श्लोक 4 (bhagavata.7.5.4)

एकदासुरराट् पुत्रमङ्कमारोप्य पाण्डव । पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्भवान् ॥ ४ ॥

ekadāsura-rāṭ putram aṅkam āropya pāṇḍava papraccha kathyatāṁ vatsa manyate sādhu yad bhavān

हे पाण्डव! एक दिन असुरराज ने अपने पुत्र को गोद में बिठाकर पूछा — "हे वत्स! जो तुम्हें सबसे उत्तम लगता है, वह बताओ।"

श्लोक 5 (bhagavata.7.5.5)

श्रीप्रह्लाद उवाच तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात् । हित्वात्मपातं गृहमन्धकूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥ ५ ॥

śrī-prahlāda uvāca tat sādhu manye ’sura-varya dehināṁ sadā samudvigna-dhiyām asad-grahāt hitvātma-pātaṁ gṛham andha-kūpaṁ vanaṁ gato yad dharim āśrayeta

श्रीप्रह्लाद ने कहा — हे असुरश्रेष्ठ! मैं इसे ही उत्तम मानता हूँ कि सदा मिथ्या आग्रह से व्याकुल-चित्त देहधारी, अपने पतन के कारणस्वरूप इस अंधकूप-सम गृह को त्यागकर वन में जाकर भगवान हरि की शरण ग्रहण करे।

श्लोक 6 (bhagavata.7.5.6)

श्रीनारद उवाच श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्यः परपक्षसमाहिताः । जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभिः ॥ ६ ॥

śrī-nārada uvāca śrutvā putra-giro daityaḥ para-pakṣa-samāhitāḥ jahāsa buddhir bālānāṁ bhidyate para-buddhibhiḥ

श्रीनारद ने कहा — पुत्र के ये शत्रु-पक्ष के अनुरूप वचन सुनकर दैत्य हँस पड़ा और बोला — "बालकों की बुद्धि दूसरों की बातों से यूँ ही बिगड़ जाती है।"

श्लोक 7 (bhagavata.7.5.7)

सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभिः । विष्णुपक्षैः प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ॥ ७ ॥

samyag vidhāryatāṁ bālo guru-gehe dvi-jātibhiḥ viṣṇu-pakṣaiḥ praticchannair na bhidyetāsya dhīr yathā

"इस बालक की गुरुकुल में भली-भाँति रक्षा की जाए, ताकि छिपे हुए विष्णु-भक्त ब्राह्मणों द्वारा इसकी बुद्धि पुनः न बिगड़े।"

श्लोक 8 (bhagavata.7.5.8)

गृहमानीतमाहूय प्रह्रादं दैत्ययाजकाः । प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः ॥ ८ ॥

gṛham ānītam āhūya prahrādaṁ daitya-yājakāḥ praśasya ślakṣṇayā vācā samapṛcchanta sāmabhiḥ

दैत्यों के पुरोहित प्रह्लाद को गुरुकुल में बुलाकर, उसकी प्रशंसा करते हुए, मधुर वाणी में सामनीति से उससे पूछने लगे।

श्लोक 9 (bhagavata.7.5.9)

वत्स प्रह्राद भद्रं ते सत्यं कथय मा मृषा । बालानति कुतस्तुभ्यमेष बुद्धिविपर्ययः ॥ ९ ॥

vatsa prahrāda bhadraṁ te satyaṁ kathaya mā mṛṣā bālān ati kutas tubhyam eṣa buddhi-viparyayaḥ

"हे वत्स प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। सत्य कहो, झूठ मत बोलो। अन्य बालकों से भिन्न तुम्हारी बुद्धि में यह विपर्यास कहाँ से आया?"

श्लोक 10 (bhagavata.7.5.10)

बुद्धिभेदः परकृत उताहो ते स्वतोऽभवत् । भण्यतां श्रोतुकामानां गुरूणां कुलनन्दन ॥ १० ॥

buddhi-bhedaḥ para-kṛta utāho te svato ’bhavat bhaṇyatāṁ śrotu-kāmānāṁ gurūṇāṁ kula-nandana

"हे कुलनंदन! यह बुद्धि-भेद किसी और के द्वारा उत्पन्न किया गया, या स्वयं तुम्हारे भीतर से आया? हम गुरुजन सुनने के इच्छुक हैं, बताओ।"

श्लोक 11 (bhagavata.7.5.11)

श्रीप्रह्राद उवाच परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः । विमोहितधियां दृष्टस्तस्मै भगवते नमः ॥ ११ ॥

śrī-prahrāda uvāca paraḥ svaś cety asad-grāhaḥ puṁsāṁ yan-māyayā kṛtaḥ vimohita-dhiyāṁ dṛṣṭas tasmai bhagavate namaḥ

श्रीप्रह्लाद ने कहा — "अपना" और "पराया" — यह मिथ्या भेद जिनकी माया से मनुष्यों में उत्पन्न होता है, और जो मोहित बुद्धि वालों को ही दिखाई देता है, उन भगवान को नमस्कार है।

श्लोक 12 (bhagavata.7.5.12)

स यदानुव्रतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते । अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ॥ १२ ॥

sa yadānuvrataḥ puṁsāṁ paśu-buddhir vibhidyate anya eṣa tathānyo ’ham iti bheda-gatāsatī

जब वे भगवान मनुष्यों पर प्रसन्न होते हैं, तब उनकी पशु-सदृश बुद्धि टूट जाती है, और "यह अन्य है, मैं अन्य हूँ" — यह भेद-बुद्धि मिथ्या सिद्ध हो जाती है।

श्लोक 13 (bhagavata.7.5.13)

स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि- र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते । मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ॥ १३ ॥

sa eṣa ātmā sva-parety abuddhibhir duratyayānukramaṇo nirūpyate muhyanti yad-vartmani veda-vādino brahmādayo hy eṣa bhinatti me matim

"अपना-पराया" मानने वाले अज्ञानी लोगों के लिए वही आत्मा अत्यंत दुर्गम और अगम्य निरूपित होता है। जिनके मार्ग में वेदवादी ब्रह्मा आदि भी मोहित हो जाते हैं, वही मेरी बुद्धि को भेद रहे हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.7.5.14)

यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन् स्वयमाकर्षसन्निधौ । तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया ॥ १४ ॥

yathā bhrāmyaty ayo brahman svayam ākarṣa-sannidhau tathā me bhidyate cetaś cakra-pāṇer yadṛcchayā

हे ब्राह्मणो! जैसे चुंबक की समीपता में लोहा स्वयं खिंचने लगता है, वैसे ही चक्रधारी भगवान की इच्छा से मेरा चित्त उनकी ओर खिंचता जाता है।

श्लोक 15 (bhagavata.7.5.15)

श्रीनारद उवाच एतावद्ब्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामतिः । तं सन्निभर्त्स्य कुपितः सुदीनो राजसेवकः ॥ १५ ॥

śrī-nārada uvāca etāvad brāhmaṇāyoktvā virarāma mahā-matiḥ taṁ sannibhartsya kupitaḥ sudīno rāja-sevakaḥ

श्रीनारद ने कहा — इतना कहकर वह महामति चुप हो गया। तब क्रुद्ध होकर, दीन बना वह राजसेवक उसे कड़ी फटकार लगाने लगा।

श्लोक 16 (bhagavata.7.5.16)

आनीयतामरे वेत्रमस्माकमयशस्करः । कुलाङ्गारस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थोऽस्योदितो दमः ॥ १६ ॥

ānīyatām are vetram asmākam ayaśaskaraḥ kulāṅgārasya durbuddheś caturtho ’syodito damaḥ

"अरे! एक छड़ी लाओ। यह हमारे लिए अपयश लाने वाला है। इस दुर्बुद्धि, कुलांगार के लिए अब चौथा उपाय — दण्ड — ही उचित बताया गया है।"

श्लोक 17 (bhagavata.7.5.17)

दैतेयचन्दनवने जातोऽयं कण्टकद्रुमः । यन्मूलोन्मूलपरशोर्विष्णोर्नालायितोऽर्भकः ॥ १७ ॥

daiteya-candana-vane jāto ’yaṁ kaṇṭaka-drumaḥ yan-mūlonmūla-paraśor viṣṇor nālāyito ’rbhakaḥ

दैत्यों के चंदन-वन में यह काँटेदार वृक्ष उग आया है, जिसकी जड़ उखाड़ने वाली कुल्हाड़ी विष्णु के लिए यह बालक मानो हत्था बन गया है।

श्लोक 18 (bhagavata.7.5.18)

इति तं विविधोपायैर्भीषयंस्तर्जनादिभिः । प्रह्रादं ग्राहयामास त्रिवर्गस्योपपादनम् ॥ १८ ॥

iti taṁ vividhopāyair bhīṣayaṁs tarjanādibhiḥ prahrādaṁ grāhayām āsa tri-vargasyopapādanam

इस प्रकार अनेक उपायों से डाँट-फटकार कर भयभीत करते हुए, उन्होंने प्रह्लाद को धर्म, अर्थ और काम के त्रिवर्ग की शिक्षा ग्रहण कराई।

श्लोक 19 (bhagavata.7.5.19)

तत एनं गुरुर्ज्ञात्वा ज्ञातज्ञेयचतुष्टयम् । दैत्येन्द्रं दर्शयामास मातृमृष्टमलङ्कृतम् ॥ १९ ॥

tata enaṁ gurur jñātvā jñāta-jñeya-catuṣṭayam daityendraṁ darśayām āsa mātṛ-mṛṣṭam alaṅkṛtam

तत्पश्चात् गुरु ने यह समझकर कि उसने राजनीति के चारों उपायों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, माता द्वारा स्नान कराए और अलंकृत किए गए उस बालक को दैत्यराज के समक्ष प्रस्तुत किया।

श्लोक 20 (bhagavata.7.5.20)

पादयोः पतितं बालं प्रतिनन्द्याशिषासुरः । परिष्वज्य चिरं दोर्भ्यां परमामाप निर्वृतिम् ॥ २० ॥

pādayoḥ patitaṁ bālaṁ pratinandyāśiṣāsuraḥ pariṣvajya ciraṁ dorbhyāṁ paramām āpa nirvṛtim

अपने चरणों में गिरे उस बालक को आशीर्वाद देकर स्वागत करते हुए, उसे अपनी दोनों भुजाओं से देर तक आलिंगन कर, वह असुर परम आनंद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 21 (bhagavata.7.5.21)

आरोप्याङ्कमवघ्राय मूर्धन्यश्रुकलाम्बुभिः । आसिञ्चन् विकसद्वक्त्रमिदमाह युधिष्ठिर ॥ २१ ॥

āropyāṅkam avaghrāya mūrdhany aśru-kalāmbubhiḥ āsiñcan vikasad-vaktram idam āha yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! उसे गोद में बिठाकर, उसके सिर को सूँघकर, आनंद के आँसुओं से उसके खिले हुए मुख को सींचते हुए, उसने यह कहा।

श्लोक 22 (bhagavata.7.5.22)

हिरण्यकशिपुरुवाच प्रह्रादानूच्यतां तात स्वधीतं किञ्चिदुत्तमम् । कालेनैतावतायुष्मन् यदशिक्षद्गुरोर्भवान् ॥ २२ ॥

hiraṇyakaśipur uvāca prahrādānūcyatāṁ tāta svadhītaṁ kiñcid uttamam kālenaitāvatāyuṣman yad aśikṣad guror bhavān

हिरण्यकशिपु ने कहा — "हे प्रह्लाद, हे तात! हे चिरंजीवी! इतने समय में तुमने अपने गुरु से जो कुछ सीखा है, उसमें से जो भी उत्तम हो, वह मुझे सुनाओ।"

श्लोक 23 (bhagavata.7.5.23)

श्रीप्रह्राद उवाच श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥

śrī-prahrāda uvāca śravaṇaṁ kīrtanaṁ viṣṇoḥ smaraṇaṁ pāda-sevanam arcanaṁ vandanaṁ dāsyaṁ sakhyam ātma-nivedanam

श्रीप्रह्लाद ने कहा — विष्णु के विषय में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनके चरणों की सेवा, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।

श्लोक 24 (bhagavata.7.5.24)

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा । क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ २४ ॥

iti puṁsārpitā viṣṇau bhaktiś cen nava-lakṣaṇā kriyeta bhagavaty addhā tan manye ’dhītam uttamam

इस प्रकार यदि मनुष्य द्वारा भगवान विष्णु में यह नवधा भक्ति साक्षात् समर्पित की जाए, तो मैं इसी को उत्तम शिक्षा मानता हूँ।

श्लोक 25 (bhagavata.7.5.25)

निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा । गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधरः ॥ २५ ॥

niśamyaitat suta-vaco hiraṇyakaśipus tadā guru-putram uvācedaṁ ruṣā prasphuritādharaḥ

पुत्र के इस वचन को सुनकर हिरण्यकशिपु उसी क्षण क्रोध से काँपते होंठों के साथ गुरुपुत्र से यह कहने लगा।

श्लोक 26 (bhagavata.7.5.26)

ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षं श्रयतासता । असारं ग्राहितो बालो मामनादृत्य दुर्मते ॥ २६ ॥

brahma-bandho kim etat te vipakṣaṁ śrayatāsatā asāraṁ grāhito bālo mām anādṛtya durmate

"हे कुब्राह्मण! यह क्या है? दुष्ट होकर तुमने विपक्ष का आश्रय लिया है। हे दुर्बुद्धे! मेरी अवहेलना करके तुमने इस बालक को यह निस्सार शिक्षा ग्रहण कराई है।"

श्लोक 27 (bhagavata.7.5.27)

सन्ति ह्यसाधवो लोके दुर्मैत्राश्छद्मवेषिणः । तेषामुदेत्यघं काले रोगः पातकिनामिव ॥ २७ ॥

santi hy asādhavo loke durmaitrāś chadma-veṣiṇaḥ teṣām udety aghaṁ kāle rogaḥ pātakinām iva

संसार में ऐसे दुष्ट लोग हैं जो कपट-मित्रता का वेश धारण करते हैं। समय आने पर उनका पाप उसी प्रकार प्रकट हो जाता है, जैसे पापियों का रोग प्रकट होता है।

श्लोक 28 (bhagavata.7.5.28)

श्रीगुरुपुत्र उवाच न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं सुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो । नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन् नियच्छ मन्युं कददाः स्म मा नः ॥ २८ ॥

śrī-guru-putra uvāca na mat-praṇītaṁ na para-praṇītaṁ suto vadaty eṣa tavendra-śatro naisargikīyaṁ matir asya rājan niyaccha manyuṁ kad adāḥ sma mā naḥ

श्रीगुरुपुत्र ने कहा — "हे इंद्रशत्रु! आपका यह पुत्र जो कह रहा है, वह न तो मेरे द्वारा सिखाया गया है और न किसी अन्य के द्वारा। हे राजन्! इसकी यह बुद्धि स्वाभाविक ही है। अपना क्रोध शांत कीजिए, हमें व्यर्थ ही अपराधी न ठहराइए।"

श्लोक 29 (bhagavata.7.5.29)

श्रीनारद उवाच गुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुरः सुतम् । न चेद्गुरुमुखीयं ते कुतोऽभद्रासती मतिः ॥ २९ ॥

śrī-nārada uvāca guruṇaivaṁ pratiprokto bhūya āhāsuraḥ sutam na ced guru-mukhīyaṁ te kuto ’bhadrāsatī matiḥ

श्रीनारद ने कहा — गुरु द्वारा इस प्रकार उत्तर दिए जाने पर, वह असुर पुनः अपने पुत्र से बोला — "यदि यह गुरु के मुख से नहीं आई, तो तुम्हारी यह अशुभ और मिथ्या बुद्धि कहाँ से आई?"

श्लोक 30 (bhagavata.7.5.30)

श्रीप्रह्राद उवाच मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् । अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥ ३० ॥

śrī-prahrāda uvāca matir na kṛṣṇe parataḥ svato vā mitho ’bhipadyeta gṛha-vratānām adānta-gobhir viśatāṁ tamisraṁ punaḥ punaś carvita-carvaṇānām

श्रीप्रह्लाद ने कहा — गृहस्थ-जीवन के व्रतधारी, अनियंत्रित इंद्रियों से बार-बार चर्वण किए हुए को ही पुनः चबाते हुए, अंधकार में प्रवेश करने वालों की कृष्ण में बुद्धि न तो किसी अन्य के उपदेश से जगती है, न स्वयं से, न दोनों के मेल से।

श्लोक 31 (bhagavata.7.5.31)

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः । अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना- स्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ॥ ३१ ॥

na te viduḥ svārtha-gatiṁ hi viṣṇuṁ durāśayā ye bahir-artha-māninaḥ andhā yathāndhair upanīyamānās te ’pīśa-tantryām uru-dāmni baddhāḥ

जो दुराशा से बाह्य वस्तुओं को ही सत्य मानते हैं, वे विष्णु को, जो कि अपने वास्तविक हित की गति हैं, नहीं जान पाते। जैसे अंधे अंधों से ले जाए जाते हैं, वैसे ही वे भी कर्म की सुदृढ़ रस्सी से बँधे रहते हैं।

श्लोक 32 (bhagavata.7.5.32)

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः । महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥ ३२ ॥

naiṣāṁ matis tāvad urukramāṅghriṁ spṛśaty anarthāpagamo yad-arthaḥ mahīyasāṁ pāda-rajo-’bhiṣekaṁ niṣkiñcanānāṁ na vṛṇīta yāvat

जब तक वे निष्किंचन महापुरुषों के चरण-रज का अभिषेक ग्रहण नहीं करते, तब तक उनकी बुद्धि उन उरुक्रम भगवान के चरणों का, जिनका स्पर्श ही समस्त अनर्थों को दूर करने वाला है, स्पर्श नहीं कर पाती।

श्लोक 33 (bhagavata.7.5.33)

इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा । अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले ॥ ३३ ॥

ity uktvoparataṁ putraṁ hiraṇyakaśipū ruṣā andhīkṛtātmā svotsaṅgān nirasyata mahī-tale

यह कहकर चुप हुए पुत्र को, क्रोध से अंधे हुए हिरण्यकशिपु ने अपनी गोद से पृथ्वी पर पटक दिया।

श्लोक 34 (bhagavata.7.5.34)

आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभूतलोचनः । वध्यतामाश्वयं वध्यो निःसारयत नैर्ऋताः ॥ ३४ ॥

āhāmarṣa-ruṣāviṣṭaḥ kaṣāyī-bhūta-locanaḥ vadhyatām āśv ayaṁ vadhyo niḥsārayata nairṛtāḥ

क्रोध और असहनशीलता से भरकर, ताम्रवर्ण हुई आँखों से उसने कहा — "यह वध्य है, इसे तुरंत मार डालो! हे राक्षसो! इसे मेरे सामने से हटा दो।"

श्लोक 35 (bhagavata.7.5.35)

अयं मे भ्रातृहा सोऽयं हित्वा स्वान् सुहृदोऽधमः । पितृव्यहन्तुः पादौ यो विष्णोर्दासवदर्चति ॥ ३५ ॥

ayaṁ me bhrātṛ-hā so ’yaṁ hitvā svān suhṛdo ’dhamaḥ pitṛvya-hantuḥ pādau yo viṣṇor dāsavad arcati

"यही मेरे भाई का हत्यारा है, जो अपने ही सुहृदों को त्यागकर, अपने चाचा के हत्यारे विष्णु के चरणों की सेवक के समान पूजा करता है, यह अधम है।"

श्लोक 36 (bhagavata.7.5.36)

विष्णोर्वा साध्वसौ किं नु करिष्यत्यसमञ्जसः । सौहृदं दुस्त्यजं पित्रोरहाद्यः पञ्चहायनः ॥ ३६ ॥

viṣṇor vā sādhv asau kiṁ nu kariṣyaty asamañjasaḥ sauhṛdaṁ dustyajaṁ pitror ahād yaḥ pañca-hāyanaḥ

जो पाँच वर्ष का बालक होते हुए भी माता-पिता के दुर्लभ स्नेह को त्याग चुका है, ऐसे इस असंगत बालक से भला विष्णु के प्रति साधु व्यवहार की क्या आशा की जाए?

श्लोक 37 (bhagavata.7.5.37)

परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहितः । छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात् ॥ ३७ ॥

paro ’py apatyaṁ hita-kṛd yathauṣadhaṁ sva-dehajo ’py āmayavat suto ’hitaḥ chindyāt tad aṅgaṁ yad utātmano ’hitaṁ śeṣaṁ sukhaṁ jīvati yad-vivarjanāt

जैसे वन में उगी औषधि यदि हितकारी हो तो अपनी न होते हुए भी संतान के समान पाली जाती है, वैसे ही अपने ही शरीर से उत्पन्न पुत्र भी यदि रोगवत् अहितकर हो तो त्याज्य है। शरीर का जो अंग स्वयं के लिए अहितकर हो, उसे काट देना चाहिए, जिससे शेष शरीर सुखपूर्वक जीवित रहे।

श्लोक 38 (bhagavata.7.5.38)

सर्वैरुपायैर्हन्तव्यः सम्भोजशयनासनैः । सुहृल्लिङ्गधरः शत्रुर्मुनेर्दुष्टमिवेन्द्रियम् ॥ ३८ ॥

sarvair upāyair hantavyaḥ sambhoja-śayanāsanaiḥ suhṛl-liṅga-dharaḥ śatrur muner duṣṭam ivendriyam

जो शत्रु मित्र का वेश धारण किए हो, उसे भोजन, शयन और आसन के समय — हर उपाय से मार डालना चाहिए, जैसे मुनि अपनी दुष्ट इंद्रिय का दमन करता है।

श्लोक 39 (bhagavata.7.5.39)

नैऋर्तास्ते समादिष्टा भर्त्रा वै शूलपाणयः । तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः ॥ ३९ ॥

nairṛtās te samādiṣṭā bhartrā vai śūla-pāṇayaḥ tigma-daṁṣṭra-karālāsyās tāmra-śmaśru-śiroruhāḥ

अपने स्वामी की इस आज्ञा को पाकर, त्रिशूलधारी, तीक्ष्ण दाढ़ों और भयानक मुख वाले, ताम्रवर्ण दाढ़ी-केश वाले वे राक्षस तैयार हो गए।

श्लोक 40 (bhagavata.7.5.40)

नदन्तो भैरवं नादं छिन्धि भिन्धीति वादिनः । आसीनं चाहनञ्शूलैः प्रह्रादं सर्वमर्मसु ॥ ४० ॥

nadanto bhairavaṁ nādaṁ chindhi bhindhīti vādinaḥ āsīnaṁ cāhanañ śūlaiḥ prahrādaṁ sarva-marmasu

भयानक गर्जना करते हुए, "काटो, बींधो" चिल्लाते हुए, उन्होंने शांत बैठे हुए प्रह्लाद को उसके समस्त मर्मस्थलों पर त्रिशूलों से प्रहार करना आरंभ किया।

श्लोक 41 (bhagavata.7.5.41)

परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि । युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः ॥ ४१ ॥

pare brahmaṇy anirdeśye bhagavaty akhilātmani yuktātmany aphalā āsann apuṇyasyeva sat-kriyāḥ

उस निर्देश-रहित परब्रह्म, सर्वात्मा भगवान में जिसका चित्त युक्त था, उस पर वे प्रहार वैसे ही निष्फल हो गए जैसे पुण्यहीन व्यक्ति के सत्कर्म निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक 42 (bhagavata.7.5.42)

प्रयासेऽपहते तस्मिन्दैत्येन्द्रः परिशङ्कितः । चकार तद्वधोपायान्निर्बन्धेन युधिष्ठिर ॥ ४२ ॥

prayāse ’pahate tasmin daityendraḥ pariśaṅkitaḥ cakāra tad-vadhopāyān nirbandhena yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! उस प्रयास के विफल होने पर, अत्यंत शंकित हुआ दैत्यराज उसे मारने के अन्य उपाय दृढ़तापूर्वक रचने लगा।

श्लोक 43 (bhagavata.7.5.43)

दिग्गजैर्दन्दशूकेन्द्रैरभिचारावपातनैः । मायाभिः सन्निरोधैश्च गरदानैरभोजनैः । हिमवाय्वग्निसलिलैः पर्वताक्रमणैरपि ॥ ४३ ॥

dig-gajair dandaśūkendrair abhicārāvapātanaiḥ māyābhiḥ sannirodhaiś ca gara-dānair abhojanaiḥ

दिग्गजों के पैरों तले कुचलवाकर, विशाल सर्पों के बीच डालकर, अभिचार और ऊँचाई से गिराकर, माया के प्रयोगों से, बंदी बनाकर, विष देकर, भूखा रखकर, शीत, वायु, अग्नि और जल के प्रयोग से, तथा पर्वतों तले दबाकर भी...

श्लोक 44 (bhagavata.7.5.44)

न शशाक यदा हन्तुमपापमसुरः सुतम् । चिन्तां दीर्घतमां प्राप्तस्तत्कर्तुं नाभ्यपद्यत ॥ ४४ ॥

hima-vāyv-agni-salilaiḥ parvatākramaṇair api na śaśāka yadā hantum apāpam asuraḥ sutam cintāṁ dīrghatamāṁ prāptas tat-kartuṁ nābhyapadyata

...जब वह असुर अपने निष्पाप पुत्र को किसी भी प्रकार से मार न सका, तब वह अत्यंत गहरी चिंता में डूब गया, और आगे क्या करे, यह समझ नहीं पाया।

श्लोक 45 (bhagavata.7.5.45)

एष मे बह्वसाधूक्तो वधोपायाश्च निर्मिताः । तैस्तैर्द्रोहैरसद्धर्मैर्मुक्तः स्वेनैव तेजसा ॥ ४५ ॥

eṣa me bahv-asādhūkto vadhopāyāś ca nirmitāḥ tais tair drohair asad-dharmair muktaḥ svenaiva tejasā

"मैंने इसे बहुत बुरा-भला कहा और इसके वध के अनेक उपाय रचे, फिर भी यह उन सभी द्रोहपूर्ण दुष्ट कर्मों से अपने ही तेज से मुक्त बना रहा।"

श्लोक 46 (bhagavata.7.5.46)

वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम् । न विस्मरति मेऽनार्यं शुनः शेप इव प्रभुः ॥ ४६ ॥

vartamāno ’vidūre vai bālo ’py ajaḍa-dhīr ayam na vismarati me ’nāryaṁ śunaḥ śepa iva prabhuḥ

"मेरे इतने निकट रहते हुए भी, यह बालक होते हुए भी जड़बुद्धि नहीं है — यह कुत्ते की मुड़ी हुई पूँछ के समान है, जो मेरे अनार्य व्यवहार को कभी नहीं भूलता।"

श्लोक 47 (bhagavata.7.5.47)

अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः । नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा ॥ ४७ ॥

aprameyānubhāvo ’yam akutaścid-bhayo ’maraḥ nūnam etad-virodhena mṛtyur me bhavitā na vā

"इसका प्रभाव अपरिमेय है, यह किसी से भी भयभीत नहीं होता, मानो अमर हो। निश्चय ही इसके साथ इस वैर के कारण मेरी मृत्यु होगी, या शायद नहीं भी होगी।"

श्लोक 48 (bhagavata.7.5.48)

इति तच्चिन्तया किञ्चिन्म्लानश्रियमधोमुखम् । षण्डामर्कावौशनसौ विविक्त इति होचतुः ॥ ४८ ॥

iti tac-cintayā kiñcin mlāna-śriyam adho-mukham śaṇḍāmarkāv auśanasau vivikta iti hocatuḥ

इस चिंता से कुछ म्लान-कांति और नतमुख हुए उस दैत्यराज से, शुक्राचार्य के दोनों पुत्र षण्ड और अमर्क एकांत में यह कहने लगे।

श्लोक 49 (bhagavata.7.5.49)

जितं त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवोर् विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम् । न तस्य चिन्त्यं तव नाथ चक्ष्वहे न वै शिशूनां गुणदोषयोः पदम् ॥ ४९ ॥

jitaṁ tvayaikena jagat-trayaṁ bhruvor vijṛmbhaṇa-trasta-samasta-dhiṣṇyapam na tasya cintyaṁ tava nātha cakṣvahe na vai śiśūnāṁ guṇa-doṣayoḥ padam

"हे नाथ! केवल भ्रूभंग मात्र से समस्त लोकपालों को भयभीत करने वाले आपने अकेले ही तीनों लोक जीत लिए हैं। हमें इसमें कोई चिंता का विषय नहीं दिखता; बालकों के गुण-दोष का कोई महत्व नहीं होता।"

श्लोक 50 (bhagavata.7.5.50)

इमं तु पाशैर्वरुणस्य बद्ध्वा निधेहि भीतो न पलायते यथा । बुद्धिश्च पुंसो वयसार्यसेवया यावद्गुरुर्भार्गव आगमिष्यति ॥ ५० ॥

imaṁ tu pāśair varuṇasya baddhvā nidhehi bhīto na palāyate yathā buddhiś ca puṁso vayasārya-sevayā yāvad gurur bhārgava āgamiṣyati

"इसे वरुण के पाशों से बाँधकर रख दीजिए, ताकि यह भयभीत होकर भाग न सके। जब तक भार्गव गुरु नहीं लौटते, तब तक आयु और आर्यजनों की सेवा से इसकी बुद्धि स्वयं बदल जाएगी।"

श्लोक 51 (bhagavata.7.5.51)

तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत् । धर्मो ह्यस्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम् ॥ ५१ ॥

tatheti guru-putroktam anujñāyedam abravīt dharmo hy asyopadeṣṭavyo rājñāṁ yo gṛha-medhinām

"ऐसा ही हो" कहकर गुरुपुत्रों की बात स्वीकार करते हुए उसने कहा — "इसे गृहस्थ राजाओं के योग्य धर्म का उपदेश दिया जाए।"

श्लोक 52 (bhagavata.7.5.52)

धर्ममर्थं च कामं च नितरां चानुपूर्वशः । प्रह्रादायोचतू राजन्प्रश्रितावनताय च ॥ ५२ ॥

dharmam arthaṁ ca kāmaṁ ca nitarāṁ cānupūrvaśaḥ prahrādāyocatū rājan praśritāvanatāya ca

हे राजन्! तब उन दोनों ने अत्यंत विनम्र और झुके हुए प्रह्लाद को क्रमशः धर्म, अर्थ और काम की शिक्षा निरंतर देनी आरंभ कर दी।

श्लोक 53 (bhagavata.7.5.53)

यथा त्रिवर्गं गुरुभिरात्मने उपशिक्षितम् । न साधु मेने तच्छिक्षां द्वन्द्वारामोपवर्णिताम् ॥ ५३ ॥

yathā tri-vargaṁ gurubhir ātmane upaśikṣitam na sādhu mene tac-chikṣāṁ dvandvārāmopavarṇitām

गुरुओं द्वारा दी गई इस त्रिवर्ग की शिक्षा को, जो द्वंद्वों में रमण करने का ही वर्णन थी, प्रह्लाद ने अपने लिए उपयुक्त नहीं माना।

श्लोक 54 (bhagavata.7.5.54)

यदाचार्यः परावृत्तो गृहमेधीयकर्मसु । वयस्यैर्बालकैस्तत्र सोपहूतः कृतक्षणैः ॥ ५४ ॥

yadācāryaḥ parāvṛtto gṛhamedhīya-karmasu vayasyair bālakais tatra sopahūtaḥ kṛta-kṣaṇaiḥ

जब आचार्य अपने गृहस्थ-कार्यों में लौट जाते, तब अवसर पाकर उसके समवयस्क बालक उसे वहाँ बुला लेते थे।

श्लोक 55 (bhagavata.7.5.55)

अथ ताञ्श्लक्ष्णया वाचा प्रत्याहूय महाबुधः । उवाच विद्वांस्तन्निष्ठां कृपया प्रहसन्निव ॥ ५५ ॥

atha tāñ ślakṣṇayā vācā pratyāhūya mahā-budhaḥ uvāca vidvāṁs tan-niṣṭhāṁ kṛpayā prahasann iva

तब वह महाबुद्धिमान बालक उन्हें मधुर वाणी से बुलाकर, दयापूर्वक मुस्कुराते हुए, उन विद्वत्तापूर्ण शिक्षाओं की वास्तविक स्थिति के बारे में उन्हें समझाने लगा।

श्लोक 56 (bhagavata.7.5.56)

ते तु तद्गौरवात्सर्वे त्यक्तक्रीडापरिच्छदाः । बाला अदूषितधियो द्वन्द्वारामेरितेहितैः ॥ ५६ ॥

te tu tad-gauravāt sarve tyakta-krīḍā-paricchadāḥ bālā adūṣita-dhiyo dvandvārāmeritehitaiḥ

वे सभी बालक, जिनकी बुद्धि द्वंद्व-रमी शिक्षाओं से अभी दूषित नहीं हुई थी, उसके गौरव के कारण अपने खेल-खिलौने त्यागकर...

श्लोक 57 (bhagavata.7.5.57)

पर्युपासत राजेन्द्र तन्न्यस्तहृदयेक्षणाः । तानाह करुणो मैत्रो महाभागवतोऽसुरः ॥ ५७ ॥

paryupāsata rājendra tan-nyasta-hṛdayekṣaṇāḥ tān āha karuṇo maitro mahā-bhāgavato ’suraḥ

...हे राजेंद्र! अपने हृदय और दृष्टि उसी में लगाए हुए उसके चारों ओर बैठ गए। तब करुणामय, सबका मित्र, परम भागवत वह असुर-बालक उनसे यह कहने लगा।

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