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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9

प्रह्लाद द्वारा स्तुति से भगवान नृसिंह को शान्त करना

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (bhagavata.7.9.1)

श्रीनारद उवाच एवं सुरादयः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरः सराः । नोपैतुमशकन्मन्युसंरम्भं सुदुरासदम् ॥ १ ॥

śrī-nārada uvāca evaṁ surādayaḥ sarve brahma-rudra-puraḥ sarāḥ nopaitum aśakan manyu- saṁrambhaṁ sudurāsadam

नारद जी ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा और रुद्र सहित समस्त देवगण भी उस अत्यन्त दुर्धर्ष क्रोधावेश के समीप जाने में समर्थ न हो सके।

श्लोक 2 (bhagavata.7.9.2)

साक्षात् श्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तं महदद्भुतम् । अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥

sākṣāt śrīḥ preṣitā devair dṛṣṭvā taṁ mahad adbhutam adṛṣṭāśruta-pūrvatvāt sā nopeyāya śaṅkitā

देवताओं ने साक्षात् लक्ष्मी जी को भेजा, किन्तु उस महान अद्भुत रूप को देखकर, जो पहले कभी न देखा गया था और न सुना गया था, वे भी शंकित होकर समीप न जा सकीं।

श्लोक 3 (bhagavata.7.9.3)

प्रह्रादं प्रेषयामास ब्रह्मावस्थितमन्तिके । तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥

prahrādaṁ preṣayām āsa brahmāvasthitam antike tāta praśamayopehi sva-pitre kupitaṁ prabhum

तब ब्रह्मा जी ने अपने समीप खड़े प्रह्लाद को भेजा — 'हे तात, अपने पिता के कारण क्रुद्ध हुए प्रभु के पास जाकर उन्हें शान्त करो।'

श्लोक 4 (bhagavata.7.9.4)

तथेति शनकै राजन्महाभागवतोऽर्भकः । उपेत्य भुवि कायेन ननाम विधृताञ्जलिः ॥ ४ ॥

tatheti śanakai rājan mahā-bhāgavato ’rbhakaḥ upetya bhuvi kāyena nanāma vidhṛtāñjaliḥ

'ऐसा ही हो' कहकर, हे राजन्, वह महाभागवत बालक धीरे-धीरे आगे बढ़ा, और अपने सम्पूर्ण शरीर को पृथ्वी पर लिटाकर, हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

श्लोक 5 (bhagavata.7.9.5)

स्वपादमूले पतितं तमर्भकं विलोक्य देवः कृपया परिप्लुतः । उत्थाप्य तच्छीर्ष्ण्यदधात्कराम्बुजं कालाहिवित्रस्तधियां कृताभयम् ॥ ५ ॥

sva-pāda-mūle patitaṁ tam arbhakaṁ vilokya devaḥ kṛpayā pariplutaḥ utthāpya tac-chīrṣṇy adadhāt karāmbujaṁ kālāhi-vitrasta-dhiyāṁ kṛtābhayam

अपने चरणों के मूल में गिरे हुए उस बालक को देखकर भगवान करुणा से आप्लावित हो गए; उसे उठाकर उन्होंने उसके सिर पर अपना करकमल रख दिया, जो कालरूपी सर्प से भयभीत मनों को अभय प्रदान करने वाला है।

श्लोक 6 (bhagavata.7.9.6)

स तत्करस्पर्शधुताखिलाशुभः सपद्यभिव्यक्तपरात्मदर्शनः । तत्पादपद्मं हृदि निर्वृतो दधौ हृष्यत्तनुः क्लिन्नहृदश्रुलोचनः ॥ ६ ॥

sa tat-kara-sparśa-dhutākhilāśubhaḥ sapady abhivyakta-parātma-darśanaḥ tat-pāda-padmaṁ hṛdi nirvṛto dadhau hṛṣyat-tanuḥ klinna-hṛd-aśru-locanaḥ

उस स्पर्श से समस्त अशुभता से मुक्त हुए प्रह्लाद को तत्काल ही परमात्मा का साक्षात्कार हो गया; आनन्दमग्न होकर उन्होंने उन चरणकमलों को अपने हृदय में धारण कर लिया, उनका शरीर पुलकित हो उठा, हृदय द्रवित हो गया और नेत्र अश्रुओं से भर गए।

श्लोक 7 (bhagavata.7.9.7)

अस्तौषीद्धरिमेकाग्रमनसा सुसमाहितः । प्रेमगद्गदया वाचा तन्न्यस्तहृदयेक्षणः ॥ ७ ॥

astauṣīd dharim ekāgra- manasā susamāhitaḥ prema-gadgadayā vācā tan-nyasta-hṛdayekṣaṇaḥ

एकाग्रचित्त और सुसमाहित मन से, अपना हृदय और दृष्टि उन्हीं में लगाकर, वे प्रेम से गद्गद वाणी में हरि की स्तुति करने लगे।

श्लोक 8 (bhagavata.7.9.8)

श्रीप्रह्राद उवाच ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः सत्त्वैकतानगतयो वचसां प्रवाहैः । नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुः किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातेः ॥ ८ ॥

śrī-prahrāda uvāca brahmādayaḥ sura-gaṇā munayo ’tha siddhāḥ sattvaikatāna-gatayo vacasāṁ pravāhaiḥ nārādhituṁ puru-guṇair adhunāpi pipruḥ kiṁ toṣṭum arhati sa me harir ugra-jāteḥ

प्रह्लाद ने कहा — जिनका स्वभाव पूर्णतः सत्त्वगुण में स्थित है, वे ब्रह्मा आदि देवगण, मुनिगण तथा सिद्धगण भी अपनी उत्तम वाणी की धाराओं से आज तक उन्हें आराधना द्वारा तृप्त नहीं कर सके — तो फिर वे हरि, उग्र जाति में जन्मे मुझ जैसे से कैसे प्रसन्न हो सकते हैं?

श्लोक 9 (bhagavata.7.9.9)

मन्ये धनाभिजनरूपतपःश्रुतौज- स्तेजःप्रभावबलपौरुषबुद्धियोगाः । नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसो भक्त्या तुतोष भगवान्गजयूथपाय ॥ ९ ॥

manye dhanābhijana-rūpa-tapaḥ-śrutaujas- tejaḥ-prabhāva-bala-pauruṣa-buddhi-yogāḥ nārādhanāya hi bhavanti parasya puṁso bhaktyā tutoṣa bhagavān gaja-yūtha-pāya

मुझे लगता है कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योगशक्ति — इनमें से कोई भी परम पुरुष की आराधना के लिए पर्याप्त नहीं है; फिर भी गजराज की भक्ति मात्र से भगवान संतुष्ट हो गए थे।

श्लोक 10 (bhagavata.7.9.10)

विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥

viprād dvi-ṣaḍ-guṇa-yutād aravinda-nābha- pādāravinda-vimukhāt śvapacaṁ variṣṭham manye tad-arpita-mano-vacanehitārtha- prāṇaṁ punāti sa kulaṁ na tu bhūrimānaḥ

मैं यह मानता हूँ कि जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण भगवान को अर्पित कर दिए हैं, ऐसा श्वपच (चाण्डाल) भी, कमलनाभ के चरणकमलों से विमुख उन बारह गुणों से युक्त ब्राह्मण से श्रेष्ठ है। वह भक्त अपने सम्पूर्ण कुल को पवित्र कर देता है, किन्तु मिथ्या अभिमानी ब्राह्मण अपने आपको भी नहीं।

श्लोक 11 (bhagavata.7.9.11)

नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णो मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते । यद् यज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः ॥ ११ ॥

naivātmanaḥ prabhur ayaṁ nija-lābha-pūrṇo mānaṁ janād aviduṣaḥ karuṇo vṛṇīte yad yaj jano bhagavate vidadhīta mānaṁ tac cātmane prati-mukhasya yathā mukha-śrīḥ

यह प्रभु अपने ही लाभ से पूर्ण होने के कारण अज्ञानी जन से अपने लिए सम्मान नहीं चाहते; वे तो करुणावश ही उसे स्वीकार करते हैं। मनुष्य भगवान को जो भी सम्मान अर्पित करता है, वह वस्तुतः स्वयं उसी को लौट आता है, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख की शोभा स्वयं के मुख की ही होती है।

श्लोक 12 (bhagavata.7.9.12)

तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य सर्वात्मना महि गृणामि यथा मनीषम् । नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ॥ १२ ॥

tasmād ahaṁ vigata-viklava īśvarasya sarvātmanā mahi gṛṇāmi yathā manīṣam nīco ’jayā guṇa-visargam anupraviṣṭaḥ pūyeta yena hi pumān anuvarṇitena

अतः मैं संकोचरहित होकर, अपनी बुद्धि के अनुसार, सम्पूर्ण हृदय से प्रभु की महिमा का गान करता हूँ — क्योंकि अज्ञानवश गुणों की इस सृष्टि में प्रविष्ट हुआ नीच से नीच पुरुष भी उस गुणगान मात्र से पवित्र हो जाता है।

श्लोक 13 (bhagavata.7.9.13)

सर्वे ह्यमी विधिकरास्तव सत्त्वधाम्नो ब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्तः । क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्य विक्रीडितं भगवतो रुचिरावतारैः ॥ १३ ॥

sarve hy amī vidhi-karās tava sattva-dhāmno brahmādayo vayam iveśa na codvijantaḥ kṣemāya bhūtaya utātma-sukhāya cāsya vikrīḍitaṁ bhagavato rucirāvatāraiḥ

हे ईश, ब्रह्मा आदि ये सभी आपकी आज्ञा के पालक हैं, सत्त्वगुण में स्थित हैं, हम असुरों जैसे नहीं, और वे कभी उद्विग्न भी नहीं होते। भगवान की यह क्रीड़ा, अपने सुन्दर अवतारों के रूप में, इस जगत के कल्याण, समृद्धि तथा आत्मानन्द के लिए ही है।

श्लोक 14 (bhagavata.7.9.14)

तद्यच्छ मन्युमसुरश्च हतस्त्वयाद्य मोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या । लोकाश्च निर्वृतिमिताः प्रतियन्ति सर्वे रूपं नृसिंह विभयाय जनाः स्मरन्ति ॥ १४ ॥

tad yaccha manyum asuraś ca hatas tvayādya modeta sādhur api vṛścika-sarpa-hatyā lokāś ca nirvṛtim itāḥ pratiyanti sarve rūpaṁ nṛsiṁha vibhayāya janāḥ smaranti

अतः अब अपना क्रोध त्याग दीजिए, क्योंकि आज आपके द्वारा असुर मारा जा चुका है; बिच्छू या सर्प के मारे जाने पर तो साधुजन भी प्रसन्न होते हैं। समस्त लोक शान्ति पाकर आश्वस्त हो गए हैं; हे नृसिंह, लोग निर्भय होने के लिए आपके इस रूप का सदा स्मरण करेंगे।

श्लोक 15 (bhagavata.7.9.15)

नाहं बिभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य- जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् । आन्त्रस्रजः क्षतजकेशरशङ्कुकर्णा- न्निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ॥ १५ ॥

nāhaṁ bibhemy ajita te ’tibhayānakāsya- jihvārka-netra-bhrukuṭī-rabhasogra-daṁṣṭrāt āntra-srajaḥ-kṣataja-keśara-śaṅku-karṇān nirhrāda-bhīta-digibhād ari-bhin-nakhāgrāt

हे अजित, मुझे आपके अत्यन्त भयानक मुख और जिह्वा से, सूर्य-सम नेत्रों और तनी हुई भृकुटियों से, तीक्ष्ण उग्र दाढ़ों से, आँतों की माला से, रक्तसिक्त अयाल से, नुकीले कानों से, दिग्गजों को भयभीत करने वाले गर्जन से, और शत्रुओं को चीरने वाले नखाग्रों से — कोई भय नहीं है।

श्लोक 16 (bhagavata.7.9.16)

त्रस्तोऽस्म्यहं कृपणवत्सल दुःसहोग्र- संसारचक्रकदनाद् ग्रसतां प्रणीतः । बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽङ्घ्रिमूलं प्रीतोऽपवर्गशरणं ह्वयसे कदा नु ॥ १६ ॥

trasto ’smy ahaṁ kṛpaṇa-vatsala duḥsahogra- saṁsāra-cakra-kadanād grasatāṁ praṇītaḥ baddhaḥ sva-karmabhir uśattama te ’ṅghri-mūlaṁ prīto ’pavarga-śaraṇaṁ hvayase kadā nu

किन्तु हे दीनवत्सल, मैं इस असह्य और भयंकर संसार-चक्र की पीड़ा से भयभीत हूँ, जो मुझे निगलने वालों के हाथों सौंप देता है, अपने ही कर्मों से बंधा हुआ। हे परम वांछनीय, आप कब प्रसन्न होकर मुझे मुक्ति के आश्रयस्वरूप अपने चरणों के समीप बुलाएँगे?

श्लोक 17 (bhagavata.7.9.17)

यस्मात् प्रियाप्रियवियोगसंयोगजन्म- शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्यमानः । दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्धियाहं भूमन्भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् ॥ १७ ॥

yasmāt priyāpriya-viyoga-saṁyoga-janma- śokāgninā sakala-yoniṣu dahyamānaḥ duḥkhauṣadhaṁ tad api duḥkham atad-dhiyāhaṁ bhūman bhramāmi vada me tava dāsya-yogam

हे भूमन्, प्रिय के वियोग और अप्रिय के संयोग से उत्पन्न शोकाग्नि से समस्त योनियों में जलते हुए, तथा दुःख की उन औषधियों को भी, जो स्वयं दुःखरूप ही हैं, सुखरूप मानकर, मैं भटक रहा हूँ। मुझे अपनी दास्यभक्ति का मार्ग बताइए।

श्लोक 18 (bhagavata.7.9.18)

सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह विरिञ्चगीताः । अञ्जस्तितर्म्यनुगृणन्गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससङ्गः ॥ १८ ॥

so ’haṁ priyasya suhṛdaḥ paradevatāyā līlā-kathās tava nṛsiṁha viriñca-gītāḥ añjas titarmy anugṛṇan guṇa-vipramukto durgāṇi te pada-yugālaya-haṁsa-saṅgaḥ

हे नृसिंह, इस प्रकार मैं आपकी उन लीलाकथाओं का, जिन्हें स्वयं ब्रह्मा ने गाया है, बार-बार कीर्तन करते हुए, गुणों से मुक्त होकर, आपके चरणयुगल में निवास करने वाले हंसतुल्य भक्तों की संगति में सहज ही समस्त दुर्गमताओं को पार कर लूँगा।

श्लोक 19 (bhagavata.7.9.19)

बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः । तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाञ्जसेष्ट- स्तावद्विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥ १९ ॥

bālasya neha śaraṇaṁ pitarau nṛsiṁha nārtasya cāgadam udanvati majjato nauḥ taptasya tat-pratividhir ya ihāñjaseṣṭas tāvad vibho tanu-bhṛtāṁ tvad-upekṣitānām

हे नृसिंह, जैसे बालक के लिए माता-पिता कोई सच्चा आश्रय नहीं हैं, न रोगी के लिए औषधि, न समुद्र में डूबते हुए के लिए नौका — वैसे ही, हे विभो, आपके द्वारा उपेक्षित देहधारियों के लिए इस लोक में कोई भी उपाय सरलता से सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 20 (bhagavata.7.9.20)

यस्मिन्यतो यर्हि येन च यस्य यस्माद् यस्मै यथा यदुत यस्त्वपरः परो वा । भावः करोति विकरोति पृथक्स्वभावः सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥

yasmin yato yarhi yena ca yasya yasmād yasmai yathā yad uta yas tv aparaḥ paro vā bhāvaḥ karoti vikaroti pṛthak svabhāvaḥ sañcoditas tad akhilaṁ bhavataḥ svarūpam

जिसमें, जिससे, जिस समय, जिसके द्वारा, जिसका, जिससे, जिसके लिए, जिस प्रकार, जो कुछ भी, तथा जो भी अवर या परे हो — प्रत्येक भाव, जो अपने पृथक् स्वभाव से कर्म करता या रूपान्तरित होता है, प्रेरित होकर, वह सब कुछ ही आपका स्वरूप है।

श्लोक 21 (bhagavata.7.9.21)

माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं संसारचक्रमज कोऽतितरेत् त्वदन्यः ॥ २१ ॥

māyā manaḥ sṛjati karmamayaṁ balīyaḥ kālena codita-guṇānumatena puṁsaḥ chandomayaṁ yad ajayārpita-ṣoḍaśāraṁ saṁsāra-cakram aja ko ’titaret tvad-anyaḥ

हे अज, माया, काल से प्रेरित होकर और गुणों की सहमति से, पुरुष के लिए कर्ममय, अत्यन्त बलवान, छन्दोमय और सोलह अरों (आरों) से युक्त इस संसार-चक्ररूपी मन की रचना करती है — आपके सिवा और कौन इसे पार कर सकता है?

श्लोक 22 (bhagavata.7.9.22)

स त्वं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः । चक्रे विसृष्टमजयेश्वर षोडशारे निष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम् ॥ २२ ॥

sa tvaṁ hi nitya-vijitātma-guṇaḥ sva-dhāmnā kālo vaśī-kṛta-visṛjya-visarga-śaktiḥ cakre visṛṣṭam ajayeśvara ṣoḍaśāre niṣpīḍyamānam upakarṣa vibho prapannam

आप ही वह काल हैं, जिन्होंने अपने स्वधाम में स्थित होकर गुणों को सदा के लिए जीत लिया है, जिनकी सृष्टि और संहार की शक्ति पूर्णतः अपने वश में है। हे ईश्वर, हे विभो, माया द्वारा इस सोलह अरों वाले चक्र में डाला गया और उसमें पिसता हुआ मैं शरणागत हूँ — मुझे बाहर खींच लीजिए।

श्लोक 23 (bhagavata.7.9.23)

दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना- मायुः श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम् । येऽस्मत्पितुः कुपितहासविजृम्भितभ्रू- विस्फूर्जितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः ॥ २३ ॥

dṛṣṭā mayā divi vibho ’khila-dhiṣṇya-pānām āyuḥ śriyo vibhava icchati yāñ jano ’yam ye ’smat pituḥ kupita-hāsa-vijṛmbhita-bhrū- visphūrjitena lulitāḥ sa tu te nirastaḥ

हे विभो, मैंने स्वर्ग में समस्त लोकपालों की उस आयु, सम्पत्ति और ऐश्वर्य को देखा है, जिसकी यह जन-साधारण कामना करता है — और मैंने उन्हीं को अपने पिता की क्रोधपूर्ण हास्ययुक्त भृकुटियों के संचालनमात्र से तितर-बितर होते देखा है; फिर भी वही पिता अब आपके द्वारा निरस्त कर दिया गया।

श्लोक 24 (bhagavata.7.9.24)

तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषोऽज्ञ आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिञ्च्यात् । नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ॥ २४ ॥

tasmād amūs tanu-bhṛtām aham āśiṣo ’jña āyuḥ śriyaṁ vibhavam aindriyam āviriñcyāt necchāmi te vilulitān uruvikrameṇa kālātmanopanaya māṁ nija-bhṛtya-pārśvam

अतः, हे अज्ञानी होते हुए भी, अब मुझे देहधारियों की इन आशाओं — आयु, सम्पत्ति और ऐन्द्रिय ऐश्वर्य की, ब्रह्मा तक की, कोई कामना नहीं है, क्योंकि मैंने इन्हें कालस्वरूप आपके विशाल पराक्रम से बिखरते देख लिया है। हे काल-स्वरूप, मुझे अपने ही किसी भृत्य के समीप ले चलिए।

श्लोक 25 (bhagavata.7.9.25)

कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः । निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः ॥ २५ ॥

kutrāśiṣaḥ śruti-sukhā mṛgatṛṣṇi-rūpāḥ kvedaṁ kalevaram aśeṣa-rujāṁ virohaḥ nirvidyate na tu jano yad apīti vidvān kāmānalaṁ madhu-lavaiḥ śamayan durāpaiḥ

कहाँ हैं ये सुनने मात्र में मधुर, मृगतृष्णा के समान आशाएँ — और कहाँ यह शरीर, जो असंख्य रोगों की उत्पत्ति-भूमि है? फिर भी मनुष्य, यह सब जानते हुए भी, इससे विरक्त नहीं होता, और दुर्लभ मधुबिन्दुओं से काम की अग्नि को शान्त करने का प्रयास करता रहता है।

श्लोक 26 (bhagavata.7.9.26)

क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरः प्रसादः ॥ २६ ॥

kvāhaṁ rajaḥ-prabhava īśa tamo ’dhike ’smin jātaḥ suretara-kule kva tavānukampā na brahmaṇo na tu bhavasya na vai ramāyā yan me ’rpitaḥ śirasi padma-karaḥ prasādaḥ

हे ईश, कहाँ मैं, रज-तम से भरे इस दानवकुल में जन्मा हुआ — और कहाँ आपकी यह करुणा! जो कृपा आपने मेरे सिर पर अपना करकमल रखकर दी है, वह न तो ब्रह्मा को मिली, न शिव को, और न ही रमा (लक्ष्मी) को।

श्लोक 27 (bhagavata.7.9.27)

नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्या- ज्जन्तोर्यथात्मसुहृदो जगतस्तथापि । संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम् ॥ २७ ॥

naiṣā parāvara-matir bhavato nanu syāj jantor yathātma-suhṛdo jagatas tathāpi saṁsevayā surataror iva te prasādaḥ sevānurūpam udayo na parāvaratvam

आप तो समस्त प्राणियों के आत्मा और सुहृद हैं, अतः आपमें साधारण जीवों की भाँति ऊँच-नीच का यह भेदभाव नहीं हो सकता — फिर भी, कल्पवृक्ष के समान, आपकी कृपा सेवा के अनुरूप ही प्रकट होती है, किसी पूर्वस्थित ऊँच-नीच के अनुसार नहीं।

श्लोक 28 (bhagavata.7.9.28)

एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात् । कृत्वात्मसात् सुरर्षिणा भगवन्गृहीतः सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम् ॥ २८ ॥

evaṁ janaṁ nipatitaṁ prabhavāhi-kūpe kāmābhikāmam anu yaḥ prapatan prasaṅgāt kṛtvātmasāt surarṣiṇā bhagavan gṛhītaḥ so ’haṁ kathaṁ nu visṛje tava bhṛtya-sevām

हे भगवन्, इस प्रकार कुसंग के कारण एक के बाद एक कामनाओं का पीछा करते हुए, भवरूपी सर्पकूप में गिरते हुए मुझ जैसे को, देवर्षि नारद ने अपना बना लिया और स्वीकार कर लिया। भला मैं आपके उस भृत्य की सेवा को कैसे त्याग सकता हूँ?

श्लोक 29 (bhagavata.7.9.29)

मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्च मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम् । खड्गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सु- स्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि ॥ २९ ॥

mat-prāṇa-rakṣaṇam ananta pitur vadhaś ca manye sva-bhṛtya-ṛṣi-vākyam ṛtaṁ vidhātum khaḍgaṁ pragṛhya yad avocad asad-vidhitsus tvām īśvaro mad-aparo ’vatu kaṁ harāmi

हे अनन्त, मुझे लगता है कि मेरे प्राणों की रक्षा और मेरे पिता का वध — दोनों ही आपने केवल अपने भृत्य ऋषि नारद के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए किए, क्योंकि मुझे हानि पहुँचाने की इच्छा से तलवार उठाकर उन्होंने कहा था — 'मुझसे भिन्न ईश्वर तेरी रक्षा करे तो सही, अब मैं किसका सिर काटूँ?'

श्लोक 30 (bhagavata.7.9.30)

एकस्त्वमेव जगदेतममुष्य यत्त्व- माद्यन्तयोः पृथगवस्यसि मध्यतश्च । सृष्ट्वा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं नानेव तैरवसितस्तदनुप्रविष्टः ॥ ३० ॥

ekas tvam eva jagad etam amuṣya yat tvam ādy-antayoḥ pṛthag avasyasi madhyataś ca sṛṣṭvā guṇa-vyatikaraṁ nija-māyayedaṁ nāneva tair avasitas tad anupraviṣṭaḥ

आप ही अकेले यह सम्पूर्ण जगत हैं, क्योंकि आप इसके आदि में, अन्त में तथा मध्य में भी पृथक् रूप से विद्यमान रहते हैं; अपनी ही माया से इस गुणों के परस्पर संयोग की रचना करके, आप स्वयं एक होते हुए भी उसमें प्रविष्ट होकर मानो अनेक प्रतीत होते हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.7.9.31)

त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था । यद्यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद्वैतदेव वसुकालवदष्टितर्वोः ॥ ३१ ॥

tvaṁ vā idaṁ sadasad īśa bhavāṁs tato ’nyo māyā yad ātma-para-buddhir iyaṁ hy apārthā yad yasya janma nidhanaṁ sthitir īkṣaṇaṁ ca tad vaitad eva vasukālavad aṣṭi-tarvoḥ

हे ईश, आप ही यह सत् और असत् (व्यक्त-अव्यक्त जगत) हैं, फिर भी आप उससे पृथक् हैं; 'यह मैं हूँ' और 'यह पराया है' — यह भेदभाव ही मिथ्या माया है। जिसका जन्म, नाश, स्थिति और दर्शन जिससे होता है, वह सम्बन्ध ठीक वैसा ही है जैसा बीज और वृक्ष का, या धन और काल का।

श्लोक 32 (bhagavata.7.9.32)

न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्बुमध्ये शेषेत्मना निजसुखानुभवो निरीहः । योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्र- स्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्च युङ्क्षे ॥ ३२ ॥

nyasyedam ātmani jagad vilayāmbu-madhye śeṣetmanā nija-sukhānubhavo nirīhaḥ yogena mīlita-dṛg-ātma-nipīta-nidras turye sthito na tu tamo na guṇāṁś ca yuṅkṣe

प्रलयकाल के जलों में इस जगत को अपने में लीन करके, शेषनाग पर, स्वयं की ही आनन्दानुभूति में लीन, निष्काम भाव से शयन करते हुए, योगशक्ति से अर्धनिमीलित नेत्रों वाले, आत्मलीन निद्रा में स्थित, आप वस्तुतः चतुर्थ (तुरीय) अवस्था में ही स्थित रहते हैं, न तो अंधकार से और न ही गुणों से युक्त होते हैं।

श्लोक 33 (bhagavata.7.9.33)

तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या सञ्चोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम् । अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधे- र्नाभेरभूत् स्वकणिकावटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥

tasyaiva te vapur idaṁ nija-kāla-śaktyā sañcodita-prakṛti-dharmaṇa ātma-gūḍham ambhasy ananta-śayanād viramat-samādher nābher abhūt sva-kaṇikā-vaṭavan-mahābjam

अपनी ही कालशक्ति से प्रेरित प्रकृति के धर्मों वाला यह सम्पूर्ण जगत आपका ही गूढ़ शरीर है; अनन्त शय्या पर जलों में शयन करते हुए, समाधि से निवृत्त होकर, आपकी नाभि से वह महान कमल उत्पन्न हुआ, जैसे वटवृक्ष अपने ही सूक्ष्म बीज से उत्पन्न होता है।

श्लोक 34 (bhagavata.7.9.34)

तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्त्य । नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो जातेऽङ्कुरे कथमुहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥

tat-sambhavaḥ kavir ato ’nyad apaśyamānas tvāṁ bījam ātmani tataṁ sa bahir vicintya nāvindad abda-śatam apsu nimajjamāno jāte ’ṅkure katham uhopalabheta bījam

उस कमल से उत्पन्न कवि ब्रह्मा, अन्य कुछ न देखते हुए, अपने ही भीतर व्याप्त आपको बीजरूप में बाहर मानकर, सौ वर्षों तक जल में डुबकी लगाते रहे, किन्तु आपको न पा सके — क्योंकि अंकुर के उत्पन्न हो जाने पर भला बीज को कैसे खोजा जा सकता है?

श्लोक 35 (bhagavata.7.9.35)

स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥

sa tv ātma-yonir ativismita āśrito ’bjaṁ kālena tīvra-tapasā pariśuddha-bhāvaḥ tvām ātmanīśa bhuvi gandham ivātisūkṣmaṁ bhūtendriyāśayamaye vitataṁ dadarśa

अत्यन्त विस्मित वह स्वयंभू ब्रह्मा उस कमल का ही आश्रय लेकर, दीर्घकाल तक की गई कठोर तपस्या से शुद्धस्वभाव होकर, अन्ततः, हे ईश, अपने ही भूत-इन्द्रिय-मनोमय शरीर में व्याप्त आपको उसी प्रकार देख सके, जैसे पृथ्वी में अत्यन्त सूक्ष्म गंध व्याप्त रहती है।

श्लोक 36 (bhagavata.7.9.36)

एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु- नासाद्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् । मायामयं सदुपलक्षितसन्निवेशं दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥

evaṁ sahasra-vadanāṅghri-śiraḥ-karoru- nāsādya-karṇa-nayanābharaṇāyudhāḍhyam māyāmayaṁ sad-upalakṣita-sanniveśaṁ dṛṣṭvā mahā-puruṣam āpa mudaṁ viriñcaḥ

इस प्रकार सहस्रों मुख, चरण, शिर, हाथ, जंघा, नासिका, कान और नेत्रों से युक्त, आभूषणों और आयुधों से सुसज्जित, उस दिव्य महापुरुष को, शुद्ध सत्त्व से लक्षित उनके स्वरूप में देखकर, ब्रह्मा जी आनन्दमग्न हो गए।

श्लोक 37 (bhagavata.7.9.37)

तस्मै भवान्हयशिरस्तनुवं हि बिभ्रद् वेदद्रुहावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ । हत्वानयच्छ्रुतिगणांश्च रजस्तमश्च सत्त्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥ ३७ ॥

tasmai bhavān haya-śiras tanuvaṁ hi bibhrad veda-druhāv atibalau madhu-kaiṭabhākhyau hatvānayac chruti-gaṇāṁś ca rajas tamaś ca sattvaṁ tava priyatamāṁ tanum āmananti

उन्हीं के लिए, अश्व के मस्तक वाला हयग्रीव-रूप धारण करके, आपने वेदों के अत्यन्त बलवान शत्रु मधु-कैटभ का वध किया और वेदों को पुनः प्रदान किया — विद्वज्जन आपके उस सत्त्वमय रूप को ही आपका सर्वाधिक प्रिय रूप मानते हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.7.9.38)

इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै- र्लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् । धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम् ॥ ३८ ॥

itthaṁ nṛ-tiryag-ṛṣi-deva-jhaṣāvatārair lokān vibhāvayasi haṁsi jagat pratīpān dharmaṁ mahā-puruṣa pāsi yugānuvṛttaṁ channaḥ kalau yad abhavas tri-yugo ’tha sa tvam

इस प्रकार मनुष्य, पशु, ऋषि, देव और मत्स्य आदि अवतारों के द्वारा आप संसार का पालन करते हैं और जगत के विरोधियों का संहार करते हैं। हे महापुरुष, आप युग के अनुरूप धर्म की रक्षा करते हैं; और कलियुग में गुप्त रहने के कारण आप त्रियुग कहलाते हैं — वही आप हैं।

श्लोक 39 (bhagavata.7.9.39)

नैतन्मनस्तव कथासु विकुण्ठनाथ सम्प्रीयते दुरितदुष्टमसाधु तीव्रम् । कामातुरं हर्षशोकभयैषणार्तं तस्मिन्कथं तव गतिं विमृशामि दीनः ॥ ३९ ॥

naitan manas tava kathāsu vikuṇṭha-nātha samprīyate durita-duṣṭam asādhu tīvram kāmāturaṁ harṣa-śoka-bhayaiṣaṇārtaṁ tasmin kathaṁ tava gatiṁ vimṛśāmi dīnaḥ

हे वैकुण्ठनाथ, पाप से दूषित, नीच, अत्यन्त कामातुर, हर्ष-शोक-भय और तृष्णा से पीड़ित यह मेरा मन आपकी कथाओं में सच्ची रुचि नहीं ले पाता। ऐसे दीन मन से मैं भला आपकी गति का विचार कैसे कर सकता हूँ?

श्लोक 40 (bhagavata.7.9.40)

जिह्वैकतोऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति- र्बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ ४० ॥

jihvaikato ’cyuta vikarṣati māvitṛptā śiśno ’nyatas tvag-udaraṁ śravaṇaṁ kutaścit ghrāṇo ’nyataś capala-dṛk kva ca karma-śaktir bahvyaḥ sapatnya iva geha-patiṁ lunanti

हे अच्युत, कभी न तृप्त होने वाली मेरी जिह्वा मुझे एक ओर खींचती है, जननेन्द्रिय दूसरी ओर, त्वचा और उदर कहीं और, श्रवणेन्द्रिय कहीं और, घ्राणेन्द्रिय अन्यत्र, चंचल नेत्र कहीं और, और कर्मेन्द्रियाँ भी कहीं और — मानो अनेक सौतें अपने ही गृहपति को नोच-नोच कर बाँट रही हों।

श्लोक 41 (bhagavata.7.9.41)

एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्या- मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् । पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रं हन्तेति पारचर पीपृहि मूढमद्य ॥ ४१ ॥

evaṁ sva-karma-patitaṁ bhava-vaitaraṇyām anyonya-janma-maraṇāśana-bhīta-bhītam paśyañ janaṁ sva-para-vigraha-vaira-maitraṁ hanteti pāracara pīpṛhi mūḍham adya

अपने ही कर्मों से इस भव-वैतरणी में गिरे हुए, बार-बार जन्म-मृत्यु और भक्षण से भयभीत, 'अपने' और 'पराए' के भेद, वैर और मित्रता में उलझे हुए ऐसे जीव को देखते हुए — हे उस पार रहने वाले, हाय, इस मूर्ख को आज बचाइए और उसका पालन कीजिए।

श्लोक 42 (bhagavata.7.9.42)

को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन्प्रयास उत्तारणेऽस्य भवसम्भवलोपहेतोः । मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तबन्धो किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां नः ॥ ४२ ॥

ko nv atra te ’khila-guro bhagavan prayāsa uttāraṇe ’sya bhava-sambhava-lopa-hetoḥ mūḍheṣu vai mahad-anugraha ārta-bandho kiṁ tena te priya-janān anusevatāṁ naḥ

हे सर्वगुरु भगवन्, इस जीव के जन्म के मूल कारण को ही समाप्त करके उसका उद्धार करने में आपको भला क्या परिश्रम है? हे आर्तबन्धु, महापुरुषों की कृपा तो मूर्खों पर विशेष रूप से होती है — फिर आपके प्रियजनों की सेवा करने वाले हम लोगों के लिए तो कहना ही क्या!

श्लोक 43 (bhagavata.7.9.43)

नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्या- स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः । शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् ॥ ४३ ॥

naivodvije para duratyaya-vaitaraṇyās tvad-vīrya-gāyana-mahāmṛta-magna-cittaḥ śoce tato vimukha-cetasa indriyārtha- māyā-sukhāya bharam udvahato vimūḍhān

हे परम, मुझे उस दुस्तर वैतरणी का कोई भय नहीं है, क्योंकि मेरा चित्त आपके गुणगान के महान अमृत में डूबा हुआ है। किन्तु मुझे उन विमुखचित्त, मूर्ख जनों के लिए शोक होता है, जो इन्द्रियसुखरूपी मायिक सुख के लिए संसार का बोझ ढो रहे हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.7.9.44)

प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥

prāyeṇa deva munayaḥ sva-vimukti-kāmā maunaṁ caranti vijane na parārtha-niṣṭhāḥ naitān vihāya kṛpaṇān vimumukṣa eko nānyaṁ tvad asya śaraṇaṁ bhramato ’nupaśye

हे देव, अधिकांश मुनि केवल अपनी मुक्ति चाहते हुए, एकान्त में मौनव्रत धारण करते हैं, दूसरों के हित में उनकी निष्ठा नहीं होती। किन्तु मैं इन दीन-हीन जनों को त्यागकर अकेले मुक्त होना नहीं चाहता, क्योंकि इस भटकते हुए संसार के लिए आपके अतिरिक्त मुझे कोई अन्य आश्रय दिखाई नहीं देता।

श्लोक 45 (bhagavata.7.9.45)

यन्मैथुनादिगृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् । तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥ ४५ ॥

yan maithunādi-gṛhamedhi-sukhaṁ hi tucchaṁ kaṇḍūyanena karayor iva duḥkha-duḥkham tṛpyanti neha kṛpaṇā bahu-duḥkha-bhājaḥ kaṇḍūtivan manasijaṁ viṣaheta dhīraḥ

मैथुन आदि से प्राप्त गृहस्थ का यह सुख अत्यन्त तुच्छ है — जैसे हाथों से खुजली मिटाना, वह भी दुःख के ऊपर दुःख ही है। अनेक दुःखों से घिरे हुए दीन जन इससे कभी तृप्त नहीं होते; किन्तु धीर पुरुष इस काम-वासनारूपी खुजली को साधारण खुजली के समान ही सहन कर लेते हैं।

श्लोक 46 (bhagavata.7.9.46)

मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म- व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्याः । प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥ ४६ ॥

mauna-vrata-śruta-tapo-’dhyayana-sva-dharma- vyākhyā-raho-japa-samādhaya āpavargyāḥ prāyaḥ paraṁ puruṣa te tv ajitendriyāṇāṁ vārtā bhavanty uta na vātra tu dāmbhikānām

हे परम पुरुष, मौन, व्रत, श्रवण, तप, अध्ययन, स्वधर्म-पालन, प्रवचन, एकान्तवास, जप और समाधि — यद्यपि मुक्तिदायक हैं, तथापि जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को नहीं जीता है, उनके लिए ये प्रायः केवल आजीविका का साधन बन जाते हैं, और पाखंडियों के लिए तो और भी व्यर्थ हैं।

श्लोक 47 (bhagavata.7.9.47)

रूपे इमे सदसती तव वेदसृष्टे बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य । युक्ताः समक्षमुभयत्र विचक्षन्ते त्वां योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥

rūpe ime sad-asatī tava veda-sṛṣṭe bījāṅkurāv iva na cānyad arūpakasya yuktāḥ samakṣam ubhayatra vicakṣante tvāṁ yogena vahnim iva dāruṣu nānyataḥ syāt

वेदों द्वारा वर्णित ये कारण और कार्य नामक दोनों रूप बीज और अंकुर के समान हैं; अरूप आपसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। योगयुक्त पुरुष आपको इन दोनों में प्रत्यक्ष देख लेते हैं, जैसे उचित विधि से लकड़ी में व्याप्त अग्नि को देखा जाता है — अन्य किसी उपाय से नहीं।

श्लोक 48 (bhagavata.7.9.48)

त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बु मात्राः प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च । सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम् ॥ ४८ ॥

tvaṁ vāyur agnir avanir viyad ambu mātrāḥ prāṇendriyāṇi hṛdayaṁ cid anugrahaś ca sarvaṁ tvam eva saguṇo viguṇaś ca bhūman nānyat tvad asty api mano-vacasā niruktam

आप ही वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश और जल हैं, तथा उनकी सूक्ष्म तन्मात्राएँ भी; आप ही प्राण, इन्द्रियाँ, हृदय, चेतना और अनुग्रह हैं। हे भूमन्, आप ही सगुण और निर्गुण — सब कुछ हैं; मन और वाणी द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है, वह आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है।

श्लोक 49 (bhagavata.7.9.49)

नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये सर्वे मनः प्रभृतयः सहदेवमर्त्याः । आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा- मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ॥ ४९ ॥

naite guṇā na guṇino mahad-ādayo ye sarve manaḥ prabhṛtayaḥ sahadeva-martyāḥ ādy-antavanta urugāya vidanti hi tvām evaṁ vimṛśya sudhiyo viramanti śabdāt

हे उरुगाय (विस्तृत यशवाले), न ये गुण, न उनके अधिष्ठातृ देव, न महत्तत्त्व आदि, न मन आदि इन्द्रियाँ, देवता और मनुष्य सहित — इनमें से कोई भी, आदि-अन्त से युक्त होने के कारण, वास्तव में आपको नहीं जान सकता। यह विचार कर सुबुद्धि पुरुष केवल शब्द (वेदवाद) पर निर्भर रहना छोड़ देते हैं।

श्लोक 50 (bhagavata.7.9.50)

तत्तेऽर्हत्तम नमः स्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम् । संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं भक्तिं जनः परमहंसगतौ लभेत ॥ ५० ॥

tat te ’rhattama namaḥ stuti-karma-pūjāḥ karma smṛtiś caraṇayoḥ śravaṇaṁ kathāyām saṁsevayā tvayi vineti ṣaḍ-aṅgayā kiṁ bhaktiṁ janaḥ paramahaṁsa-gatau labheta

अतः, हे पूज्यतम, आपको नमस्कार है। स्तुति, कर्म-समर्पण, पूजा, चरणों का स्मरण और कथा-श्रवण — इस षडंगमय सेवा के बिना, आपके प्रति भक्ति के बिना, कोई मनुष्य परमहंसों के उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता है?

श्लोक 51 (bhagavata.7.9.51)

श्रीनारद उवाच एतावद्वर्णितगुणो भक्त्या भक्तेन निर्गुणः । प्रह्रादं प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत ॥ ५१ ॥

śrī-nārada uvāca etāvad varṇita-guṇo bhaktyā bhaktena nirguṇaḥ prahrādaṁ praṇataṁ prīto yata-manyur abhāṣata

नारद जी ने कहा — गुणातीत होते हुए भी अपने भक्त की भक्ति से इस प्रकार प्रशंसित होकर, अपना क्रोध शांत करते हुए, भगवान ने प्रसन्न होकर, अपने सामने प्रणत प्रह्लाद से कहा।

श्लोक 52 (bhagavata.7.9.52)

श्रीभगवानुवाच प्रह्राद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम । वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम् ॥ ५२ ॥

śrī-bhagavān uvāca prahrāda bhadra bhadraṁ te prīto ’haṁ te ’surottama varaṁ vṛṇīṣvābhimataṁ kāma-pūro ’smy ahaṁ nṛṇām

भगवान ने कहा — हे भद्र प्रह्लाद, तुम्हारा कल्याण हो। हे असुरश्रेष्ठ, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। जो भी वर तुम्हें अभीष्ट हो, माँगो, क्योंकि मैं ही मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला हूँ।

श्लोक 53 (bhagavata.7.9.53)

मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शनं दुर्लभं हि मे । दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति ॥ ५३ ॥

mām aprīṇata āyuṣman darśanaṁ durlabhaṁ hi me dṛṣṭvā māṁ na punar jantur ātmānaṁ taptum arhati

हे आयुष्मान, जो मुझे प्रसन्न नहीं करता, उसके लिए मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है। किन्तु जो एक बार मेरा दर्शन कर लेता है, उसे फिर स्वयं को सांसारिक शोक से संतप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती।

श्लोक 54 (bhagavata.7.9.54)

प्रीणन्ति ह्यथ मां धीराः सर्वभावेन साधवः । श्रेयस्कामा महाभाग सर्वासामाशिषां पतिम् ॥ ५४ ॥

prīṇanti hy atha māṁ dhīrāḥ sarva-bhāvena sādhavaḥ śreyas-kāmā mahā-bhāga sarvāsām āśiṣāṁ patim

हे महाभाग, जान लो कि धीर और साधुजन, अपने कल्याण की कामना से, समस्त आशाओं के स्वामी मुझे अपने सम्पूर्ण भाव से प्रसन्न करते हैं।

श्लोक 55 (bhagavata.7.9.55)

श्रीनारद उवाच एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः । एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छत्तानसुरोत्तमः ॥ ५५ ॥

śrī-nārada uvāca evaṁ pralobhyamāno ’pi varair loka-pralobhanaiḥ ekāntitvād bhagavati naicchat tān asurottamaḥ

नारद जी ने कहा — इस प्रकार संसार को लुभाने वाले वरों से प्रलोभित किए जाने पर भी, उस असुरश्रेष्ठ ने भगवान के प्रति अपनी अनन्य भक्ति के कारण उनमें से किसी की भी इच्छा नहीं की।

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