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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12

मोहिनी-मूर्ति द्वारा भगवान शिव का मोहित होना

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (bhagavata.8.12.1)

श्रीबादरायणिरुवाच वृषध्वजो निशम्येदं योषिद्रूपेण दानवान् । मोहयित्वा सुरगणान्हरिः सोममपाययत् ॥ 12.1 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca vṛṣa-dhvajo niśamyedaṁ yoṣid-rūpeṇa dānavān mohayitvā sura-gaṇān hariḥ somam apāyayat

श्री शुकदेव जी ने कहा — जब वृषध्वज (शिव जी) ने यह सुना कि भगवान हरि ने स्त्री-रूप धारण कर दानवों को मोहित करते हुए देवताओं को सोम (अमृत) पिलाया,

श्लोक 2 (bhagavata.8.12.2)

वृषमारुह्य गिरिशः सर्वभूतगणैर्वृतः । सह देव्या ययौ द्रष्टुं यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ 12.2 ॥

vṛṣam āruhya giriśaḥ sarva-bhūta-gaṇair vṛtaḥ saha devyā yayau draṣṭuṁ yatrāste madhusūdanaḥ

तब गिरिश (शिव जी) अपने बैल पर सवार होकर, समस्त भूत-गणों से घिरे हुए तथा देवी पार्वती के साथ, उस स्थान की ओर उस रूप को देखने के लिए चल पड़े जहाँ मधुसूदन विराजमान थे।

श्लोक 3 (bhagavata.8.12.3)

सभाजितो भगवता सादरं सोमया भवः । सूपविष्ट उवाचेदं प्रतिपूज्य स्मयन्हरिम् ॥ 12.3 ॥

sabhājito bhagavatā sādaraṁ somayā bhavaḥ sūpaviṣṭa uvācedaṁ pratipūjya smayan harim

भगवान ने पार्वती-सहित शिव जी का बड़े आदर से स्वागत किया, और सुखपूर्वक बैठकर तथा भगवान की विधिवत् पूजा करके, मुस्कुराते हुए भव (शिव) ने यह कहा।

श्लोक 4 (bhagavata.8.12.4)

श्रीमहादेव उवाच देवदेव जगद्वयापिञ्जगदीश जगन्मय । सर्वेषामपि भावानां त्वमात्मा हेतुरीश्वरः ॥ 12.4 ॥

śrī-mahādeva uvāca deva-deva jagad-vyāpiñ jagad-īśa jagan-maya sarveṣām api bhāvānāṁ tvam ātmā hetur īśvaraḥ

श्री महादेव जी ने कहा — हे देवाधिदेव, हे सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त, हे जगदीश, हे जगन्मय! आप ही समस्त भूतों के आत्मा, कारण और नियन्ता हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.8.12.5)

आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः । यतोऽव्ययस्य नैतानि तत् सत्यं ब्रह्म चिद्भवान् ॥ 12.5 ॥

ādy-antāv asya yan madhyam idam anyad ahaṁ bahiḥ yato ’vyayasya naitāni tat satyaṁ brahma cid bhavān

इस जगत् का आदि, अन्त और मध्य, यह 'यह' और यह 'मैं', भीतर और बाहर — ये सब आप अविनाशी में नहीं हैं। आप ही वह सत्य, चेतन ब्रह्म हैं।

श्लोक 6 (bhagavata.8.12.6)

तवैव चरणाम्भोजं श्रेयस्कामा निराशिषः । विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते ॥ 12.6 ॥

tavaiva caraṇāmbhojaṁ śreyas-kāmā nirāśiṣaḥ visṛjyobhayataḥ saṅgaṁ munayaḥ samupāsate

कल्याण की कामना रखने वाले तथा सभी सांसारिक इच्छाओं से मुक्त मुनिगण, इहलोक और परलोक दोनों की आसक्ति त्यागकर, केवल आपके ही चरण-कमलों की उपासना करते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.8.12.7)

त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विगुणं विशोक- मानन्दमात्रमविकारमनन्यदन्यत् । विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमाना- मात्मेश्वरश्च तदपेक्षतयानपेक्षः ॥ 12.7 ॥

tvaṁ brahma pūrṇam amṛtaṁ viguṇaṁ viśokam ānanda-mātram avikāram ananyad anyat viśvasya hetur udaya-sthiti-saṁyamānām ātmeśvaraś ca tad-apekṣatayānapekṣaḥ

आप वह पूर्ण, अविनाशी, गुणातीत, शोकरहित, केवल आनन्दस्वरूप, निर्विकार ब्रह्म हैं — जो अपने से भिन्न होते हुए भी अभिन्न हैं। आप ही सृष्टि, स्थिति और संहार के कारण हैं तथा सबके स्वामी हैं, फिर भी आप उन पर आश्रित होते हुए भी किसी पर आश्रित नहीं हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.8.12.8)

एकस्त्वमेव सदसद्द्वयमद्वयं च स्वर्णं कृताकृतमिवेह न वस्तुभेदः । अज्ञानतस्त्वयि जनैर्विहितो विकल्पो यस्माद् गुणव्यतिकरो निरुपाधिकस्य ॥ 12.8 ॥

ekas tvam eva sad asad dvayam advayaṁ ca svarṇaṁ kṛtākṛtam iveha na vastu-bhedaḥ ajñānatas tvayi janair vihito vikalpo yasmād guṇa-vyatikaro nirupādhikasya

आप ही अकेले सत् और असत्, द्वैत और अद्वैत हैं — जैसे बने और अनगढ़ स्वर्ण में कोई मूल भेद नहीं होता, वैसे ही (कारण और कार्य में भी कोई भेद नहीं)। लोग अज्ञानवश ही आप पर भेद और विकल्प थोपते हैं, क्योंकि आप उपाधि-रहित होते हुए भी गुणों से युक्त प्रतीत होते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.8.12.9)

त्वां ब्रह्म केचिदवयन्त्युत धर्ममेकेएके परं सदसतोः पुरुषं परेशम् । अन्येऽवयन्ति नवशक्तियुतं परं त्वांकेचिन्महापुरुषमव्ययमात्मतन्त्रम् ॥ 12.9 ॥

tvāṁ brahma kecid avayanty uta dharmam eke eke paraṁ sad-asatoḥ puruṣaṁ pareśam anye ’vayanti nava-śakti-yutaṁ paraṁ tvāṁ kecin mahā-puruṣam avyayam ātma-tantram

कुछ आपको ब्रह्म मानते हैं, कुछ धर्म; कुछ आपको सत् और असत् से परे परम पुरुष तथा परमेश्वर मानते हैं; अन्य आपको नौ शक्तियों से युक्त परमेश्वर मानते हैं, तो कुछ आपको अविनाशी, स्वतन्त्र महापुरुष मानते हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.8.12.10)

नाहं परायुर्ऋषयो न मरीचिमुख्याजानन्ति यद्विरचितं खलु सत्त्वसर्गाः । यन्मायया मुषितचेतस ईश दैत्य-मर्त्यादयः किमुत शश्वदभद्रवृत्ताः ॥ 12.10 ॥

nāhaṁ parāyur ṛṣayo na marīci-mukhyā jānanti yad-viracitaṁ khalu sattva-sargāḥ yan-māyayā muṣita-cetasa īśa daitya- martyādayaḥ kim uta śaśvad-abhadra-vṛttāḥ

हे ईश! न तो मैं, न ब्रह्मा, और न ही मरीचि आदि सत्त्वगुण से उत्पन्न महर्षि — जो सब आपकी माया द्वारा ही मोहित हैं — इस रचना को यथार्थ रूप से जान पाते हैं। फिर सदैव अशुभ आचरण करने वाले दैत्यों और मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 11 (bhagavata.8.12.11)

स त्वं समीहितमदः स्थितिजन्मनाशंभूतेहितं च जगतो भवबन्धमोक्षौ । वायुर्यथा विशति खं च चराचराख्यंसर्वं तदात्मकतयावगमोऽवरुन्त्से ॥ 12.11 ॥

sa tvaṁ samīhitam adaḥ sthiti-janma-nāśaṁ bhūtehitaṁ ca jagato bhava-bandha-mokṣau vāyur yathā viśati khaṁ ca carācarākhyaṁ sarvaṁ tad-ātmakatayāvagamo ’varuntse

आप ही इस सृष्टि की रचना, स्थिति और संहार, समस्त प्राणियों की चेष्टाओं तथा संसार के बन्धन और मोक्ष को जानने वाले हैं। जैसे वायु आकाश में तथा चर-अचर सभी में व्याप्त रहती है, वैसे ही आप सर्वज्ञ होकर सबमें व्याप्त रहते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.8.12.12)

अवतारा मया दृष्टा रममाणस्य ते गुणैः । सोऽहं तद्द्रष्टुमिच्छामि यत् ते योषिद्वपुर्धृतम् ॥ 12.12 ॥

avatārā mayā dṛṣṭā ramamāṇasya te guṇaiḥ so ’haṁ tad draṣṭum icchāmi yat te yoṣid-vapur dhṛtam

मैंने आपके गुणों से क्रीड़ा करते हुए आपके अनेक अवतार देखे हैं। अब मैं आपका वह रूप देखना चाहता हूँ जो आपने स्त्री-वेश में धारण किया था।

श्लोक 13 (bhagavata.8.12.13)

येन सम्मोहिता दैत्याः पायिताश्चामृतं सुराः । तद् दिदृक्षव आयाताः परं कौतूहलं हि नः ॥ 12.13 ॥

yena sammohitā daityāḥ pāyitāś cāmṛtaṁ surāḥ tad didṛkṣava āyātāḥ paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

जिस रूप से दैत्य पूर्णत: मोहित हो गए और देवताओं को अमृत का पान कराया गया, उसी को देखने की उत्कण्ठा से हम यहाँ आए हैं — हमें इसकी अत्यन्त उत्सुकता है।

श्लोक 14 (bhagavata.8.12.14)

श्रीशुक उवाच एवमभ्यर्थितो विष्णुर्भगवान् शूलपाणिना । प्रहस्य भावगम्भीरं गिरिशं प्रत्यभाषत ॥ 12.14 ॥

śrī-śuka uvāca evam abhyarthito viṣṇur bhagavān śūla-pāṇinā prahasya bhāva-gambhīraṁ giriśaṁ pratyabhāṣata

श्री शुकदेव जी ने कहा — त्रिशूलधारी शिव जी द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, भगवान विष्णु मुस्कुराए और गम्भीर भाव से गिरिश को उत्तर दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.8.12.15)

श्रीभगवानुवाच कौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया धृतः । पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने ॥ 12.15 ॥

śrī-bhagavān uvāca kautūhalāya daityānāṁ yoṣid-veṣo mayā dhṛtaḥ paśyatā sura-kāryāṇi gate pīyūṣa-bhājane

श्री भगवान ने कहा — जब अमृत का पात्र दैत्यों के हाथ चला गया था, तब देवताओं का हित साधने के लिए मैंने स्त्री का रूप धारण करके उन्हें कौतूहल में डाल दिया था।

श्लोक 16 (bhagavata.8.12.16)

तत्तेऽहं दर्शयिष्यामि दिदृक्षोः सुरसत्तम । कामिनां बहु मन्तव्यं सङ्कल्पप्रभवोदयम् ॥ 12.16 ॥

tat te ’haṁ darśayiṣyāmi didṛkṣoḥ sura-sattama kāmināṁ bahu mantavyaṁ saṅkalpa-prabhavodayam

हे देवश्रेष्ठ, चूँकि तुम उसे देखना चाहते हो, अत: मैं तुम्हें वह रूप दिखाऊँगा जो कामी पुरुषों को अत्यन्त वांछनीय प्रतीत होता है और जो संकल्प से ही उत्पन्न होने वाला है।

श्लोक 17 (bhagavata.8.12.17)

श्रीशुक उवाच इति ब्रुवाणो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । सर्वतश्चारयंश्चक्षुर्भव आस्ते सहोमया ॥ 12.17 ॥

śrī-śuka uvāca iti bruvāṇo bhagavāṁs tatraivāntaradhīyata sarvataś cārayaṁś cakṣur bhava āste sahomayā

श्री शुकदेव जी ने कहा — ऐसा कहते हुए भगवान वहीं अन्तर्धान हो गए, और शिव जी उमा के साथ वहीं रह गए, चारों ओर आँखें दौड़ाते हुए उन्हें ढूँढ़ने लगे।

श्लोक 18 (bhagavata.8.12.18)

ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियंविचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे । विक्रीडतीं कन्दुकलीलया लसद्-दुकूलपर्यस्तनितम्बमेखलाम् ॥ 12.18 ॥

tato dadarśopavane vara-striyaṁ vicitra-puṣpāruṇa-pallava-drume vikrīḍatīṁ kanduka-līlayā lasad- dukūla-paryasta-nitamba-mekhalām

तभी शिव जी ने पास के एक उपवन में, जिसके वृक्षों की कोपलें विचित्र फूलों से अरुण वर्ण हो रही थीं, एक परम सुन्दरी स्त्री को गेंद से खेलते देखा — उसकी कटि पर चमकते रेशमी वस्त्र और करधनी लहरा रही थी।

श्लोक 19 (bhagavata.8.12.19)

आवर्तनोद्वर्तनकम्पितस्तन-प्रकृष्टहारोरुभरैः पदे पदे । प्रभज्यमानामिव मध्यतश्चलत्-पदप्रवालं नयतीं ततस्ततः ॥ 12.19 ॥

āvartanodvartana-kampita-stana- prakṛṣṭa-hāroru-bharaiḥ pade pade prabhajyamānām iva madhyataś calat- pada-pravālaṁ nayatīṁ tatas tataḥ

गेंद के उछलने-गिरने पर उसके घूमने और झुकने से उसके स्तन काँप उठते और उन पर पड़े भारी हार के बोझ से उसकी कमर हर कदम पर मानो टूटी जा रही हो; इस प्रकार वह अपने मूँगे-से लाल पैरों को इधर-उधर बढ़ाती हुई घूम रही थी।

श्लोक 20 (bhagavata.8.12.20)

दिक्षु भ्रमत्कन्दुकचापलैर्भृशंप्रोद्विग्नतारायतलोललोचनाम् । स्वकर्णविभ्राजितकुण्डलोल्लसत्-कपोलनीलालकमण्डिताननाम् ॥ 12.20 ॥

dikṣu bhramat-kanduka-cāpalair bhṛśaṁ prodvigna-tārāyata-lola-locanām sva-karṇa-vibhrājita-kuṇḍalollasat- kapola-nīlālaka-maṇḍitānanām

गेंद के चारों दिशाओं में उछलने से उसके बड़े-बड़े नेत्र चंचल होकर घूम रहे थे; उसके कानों में चमकते कुण्डलों से आलोकित कपोल तथा मुख पर बिखरे काले घुँघराले बाल उसे और भी सुशोभित कर रहे थे।

श्लोक 21 (bhagavata.8.12.21)

श्लथद् दुकूलं कबरीं च विच्युतांसन्नह्यतीं वामकरेण वल्गुना । विनिघ्नतीमन्यकरेण कन्दुकंविमोहयन्तीं जगदात्ममायया ॥ 12.21 ॥

ślathad dukūlaṁ kabarīṁ ca vicyutāṁ sannahyatīṁ vāma-kareṇa valgunā vinighnatīm anya-kareṇa kandukaṁ vimohayantīṁ jagad-ātma-māyayā

उसका वस्त्र ढीला पड़ रहा था और वेणी खुल रही थी, जिसे वह अपने सुंदर बाएँ हाथ से बाँधने का प्रयत्न कर रही थी, जबकि दाहिने हाथ से गेंद को उछाल रही थी — इस प्रकार भगवान अपनी ही अन्तरंगा माया से सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर रहे थे।

श्लोक 22 (bhagavata.8.12.22)

तां वीक्ष्य देव इति कन्दुकलीलयेषद्-व्रीडास्फुटस्मितविसृष्टकटाक्षमुष्टः । स्त्रीप्रेक्षणप्रतिसमीक्षणविह्वलात्मानात्मानमन्तिक उमां स्वगणांश्च वेद ॥ 12.22 ॥

tāṁ vīkṣya deva iti kanduka-līlayeṣad- vrīḍāsphuṭa-smita-visṛṣṭa-kaṭākṣa-muṣṭaḥ strī-prekṣaṇa-pratisamīkṣaṇa-vihvalātmā nātmānam antika umāṁ sva-gaṇāṁś ca veda

उसे इस प्रकार गेंद खेलते देखकर शिव जी उसकी हल्की लजीली मुस्कान भरी चितवन से मानो चुराए गए-से हो गए। उस स्त्री को देखते और उसकी उत्तर-चितवन में उलझते हुए, वे अपने आपको, समीप खड़ी उमा को, तथा अपने गणों को भी भूल गए।

श्लोक 23 (bhagavata.8.12.23)

तस्याः कराग्रात् स तु कन्दुको यदागतो विदूरं तमनुव्रजत्स्त्रियाः । वासः ससूत्रं लघु मारुतोऽहरद्भवस्य देवस्य किलानुपश्यतः ॥ 12.23 ॥

tasyāḥ karāgrāt sa tu kanduko yadā gato vidūraṁ tam anuvrajat-striyāḥ vāsaḥ sasūtraṁ laghu māruto ’harad bhavasya devasya kilānupaśyataḥ

जब गेंद उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरी, तो वह स्त्री उसके पीछे दौड़ी, और ठीक उसी समय, शिव जी के देखते-देखते, एक झोंके ने उसका हल्का वस्त्र और करधनी उड़ा दिए।

श्लोक 24 (bhagavata.8.12.24)

एवं तां रुचिरापाङ्गीं दर्शनीयां मनोरमाम् । दृष्ट्वा तस्यां मनश्चक्रे विषज्जन्त्यां भवः किल ॥ 12.24 ॥

evaṁ tāṁ rucirāpāṅgīṁ darśanīyāṁ manoramām dṛṣṭvā tasyāṁ manaś cakre viṣajjantyāṁ bhavaḥ kila

इस प्रकार उस मनोहर, दर्शनीय तथा मनभावन नेत्रों वाली स्त्री को देखकर, और यह जान/मानकर कि वह भी उसकी ओर आकृष्ट हो रही है, शिव जी का मन भी सचमुच उसमें उलझ गया।

श्लोक 25 (bhagavata.8.12.25)

तयापहृतविज्ञानस्तत्कृतस्मरविह्वलः । भवान्या अपि पश्यन्त्या गतह्रीस्तत्पदं ययौ ॥ 12.25 ॥

tayāpahṛta-vijñānas tat-kṛta-smara-vihvalaḥ bhavānyā api paśyantyā gata-hrīs tat-padaṁ yayau

उसने शिव जी का विवेक हर लिया, और काम-भाव से विह्वल होकर, भवानी के देखते हुए भी बिना किसी लज्जा के, वे उस स्त्री के समीप चले गए।

श्लोक 26 (bhagavata.8.12.26)

सा तमायान्तमालोक्य विवस्त्रा व्रीडिता भृशम् । निलीयमाना वृक्षेषु हसन्ती नान्वतिष्ठत ॥ 12.26 ॥

sā tam āyāntam ālokya vivastrā vrīḍitā bhṛśam nilīyamānā vṛkṣeṣu hasantī nānvatiṣṭhata

वस्त्रहीन वह स्त्री, उन्हें अपनी ओर आते देख अत्यंत लज्जित हो गई और वृक्षों के पीछे छिपती हुई, हँसती हुई, एक स्थान पर स्थिर न रहकर इधर-उधर होती रही।

श्लोक 27 (bhagavata.8.12.27)

तामन्वगच्छद् भगवान् भवः प्रमुषितेन्द्रियः । कामस्य च वशं नीतः करेणुमिव यूथपः ॥ 12.27 ॥

tām anvagacchad bhagavān bhavaḥ pramuṣitendriyaḥ kāmasya ca vaśaṁ nītaḥ kareṇum iva yūthapaḥ

अपनी इन्द्रियों पर से नियन्त्रण खोकर तथा काम के वशीभूत होकर, भव उसके पीछे-पीछे ऐसे चल पड़े जैसे झुण्ड का प्रमुख हाथी किसी हथिनी के पीछे चलता है।

श्लोक 28 (bhagavata.8.12.28)

सोऽनुव्रज्यातिवेगेन गृहीत्वानिच्छतीं स्त्रियम् । केशबन्ध उपानीय बाहुभ्यां परिषस्वजे ॥ 12.28 ॥

so ’nuvrajyātivegena gṛhītvānicchatīṁ striyam keśa-bandha upānīya bāhubhyāṁ pariṣasvaje

अत्यंत वेग से उसका पीछा करके, शिव जी ने उस अनिच्छुक स्त्री को उसकी वेणी पकड़कर अपने निकट खींच लिया और अपनी दोनों भुजाओं से आलिंगन कर लिया।

श्लोक 29 (bhagavata.8.12.29)

सोपगूढा भगवता करिणा करिणी यथा । इतस्ततः प्रसर्पन्ती विप्रकीर्णशिरोरुहा ॥ 12.29 ॥

sopagūḍhā bhagavatā kariṇā kariṇī yathā itas tataḥ prasarpantī viprakīrṇa-śiroruhā

जैसे कोई हथिनी हाथी के आलिंगन में हो, वैसे ही आलिंगन में बँधी वह स्त्री, बाल बिखेरे हुए, इधर-उधर छटपटाने लगी।

श्लोक 30 (bhagavata.8.12.30)

आत्मानं मोचयित्वाङ्ग सुरर्षभभुजान्तरात् । प्राद्रवत्सा पृथुश्रोणी माया देवविनिर्मिता ॥ 12.30 ॥

ātmānaṁ mocayitvāṅga surarṣabha-bhujāntarāt prādravat sā pṛthu-śroṇī māyā deva-vinirmitā

हे राजन्, वह चौड़े नितम्बों वाली स्त्री, जो भगवान द्वारा रची गई माया ही थी, किसी प्रकार श्रेष्ठ देव शिव की भुजाओं से अपने को छुड़ाकर वहाँ से भाग निकली।

श्लोक 31 (bhagavata.8.12.31)

तस्यासौ पदवीं रुद्रो विष्णोरद्भुतकर्मणः । प्रत्यपद्यत कामेन वैरिणेव विनिर्जितः ॥ 12.31 ॥

tasyāsau padavīṁ rudro viṣṇor adbhuta-karmaṇaḥ pratyapadyata kāmena vairiṇeva vinirjitaḥ

मानो शत्रु-रूपी काम-वासना से पराजित होकर, रुद्र अद्भुत कर्म करने वाले विष्णु के उस मार्ग का अनुसरण करते ही चले गए।

श्लोक 32 (bhagavata.8.12.32)

तस्यानुधावतो रेतश्चस्कन्दामोघरेतसः । शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनुधावतः ॥ 12.32 ॥

tasyānudhāvato retaś caskandāmogha-retasaḥ śuṣmiṇo yūthapasyeva vāsitām anudhāvataḥ

जिस प्रकार मदमस्त गजराज किसी मादा हथिनी के पीछे दौड़ता हुआ वीर्यस्खलन कर देता है, वैसे ही उस स्त्री के पीछे दौड़ते हुए शिव जी का वीर्य, जो अन्यथा कभी व्यर्थ नहीं जाता, स्खलित हो गया।

श्लोक 33 (bhagavata.8.12.33)

यत्र यत्रापतन्मह्यां रेतस्तस्य महात्मनः । तानि रूप्यस्य हेम्नश्च क्षेत्राण्यासन्महीपते ॥ 12.33 ॥

yatra yatrāpatan mahyāṁ retas tasya mahātmanaḥ tāni rūpyasya hemnaś ca kṣetrāṇy āsan mahī-pate

हे महीपते, उस महात्मा शिव का वीर्य पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ गिरा, वे सभी स्थान आगे चलकर चाँदी और सोने की खानें बन गए।

श्लोक 34 (bhagavata.8.12.34)

सरित्सरःसु शैलेषु वनेषूपवनेषु च । यत्र क्व चासन्नृषयस्तत्र सन्निहितो हरः ॥ 12.34 ॥

sarit-saraḥsu śaileṣu vaneṣūpavaneṣu ca yatra kva cāsann ṛṣayas tatra sannihito haraḥ

शिव जी उस मायाविनी के पीछे नदियों, सरोवरों, पर्वतों, वनों तथा उपवनों में — और जहाँ-जहाँ ऋषिगण निवास करते थे, वहाँ-वहाँ भी — पहुँच गए।

श्लोक 35 (bhagavata.8.12.35)

स्कन्ने रेतसि सोऽपश्यदात्मानं देवमायया । जडीकृतं नृपश्रेष्ठ सन्न्यवर्तत कश्मलात् ॥ 12.35 ॥

skanne retasi so ’paśyad ātmānaṁ deva-māyayā jaḍīkṛtaṁ nṛpa-śreṣṭha sannyavartata kaśmalāt

हे राजश्रेष्ठ, अपना वीर्य स्खलित हो जाने पर शिव जी को भान हुआ कि वे भगवान की माया द्वारा जड़वत् बना दिए गए थे। तब वे उस मोह से लौट आए।

श्लोक 36 (bhagavata.8.12.36)

अथावगतमाहात्म्य आत्मनो जगदात्मनः । अपरिज्ञेयवीर्यस्य न मेने तदुहाद्भुतम् ॥ 12.36 ॥

athāvagata-māhātmya ātmano jagad-ātmanaḥ aparijñeya-vīryasya na mene tad u hādbhutam

तब उन्होंने अपनी तथा जगदात्मा भगवान की महिमा को भली-भाँति समझ लिया, जिनकी शक्ति अपरिमेय है, और इसलिए उन्होंने उस घटना को कोई विशेष आश्चर्यजनक बात नहीं माना।

श्लोक 37 (bhagavata.8.12.37)

तमविक्लवमव्रीडमालक्ष्य मधुसूदनः । उवाच परमप्रीतो बिभ्रत्स्वां पौरुषीं तनुम् ॥ 12.37 ॥

tam aviklavam avrīḍam ālakṣya madhusūdanaḥ uvāca parama-prīto bibhrat svāṁ pauruṣīṁ tanum

शिव जी को इस प्रकार अविचलित और निर्लज्ज देखकर मधुसूदन अत्यंत प्रसन्न हुए, और अपने पुरुष-रूप को पुनः धारण करते हुए उन्होंने यह कहा।

श्लोक 38 (bhagavata.8.12.38)

श्रीभगवानुवाच दिष्टया त्वं विबुधश्रेष्ठ स्वां निष्ठामात्मना स्थितः । यन्मे स्त्रीरूपया स्वैरं मोहितोऽप्यङ्ग मायया ॥ 12.38 ॥

śrī-bhagavān uvāca diṣṭyā tvaṁ vibudha-śreṣṭha svāṁ niṣṭhām ātmanā sthitaḥ yan me strī-rūpayā svairaṁ mohito ’py aṅga māyayā

श्री भगवान ने कहा — हे देवश्रेष्ठ, यद्यपि मेरी स्त्री-रूपा माया ने तुम्हें पूर्णत: मोहित कर दिया था, फिर भी यह सौभाग्य की बात है कि तुम अपने स्वरूप में स्वयं स्थिर बने रहे।

श्लोक 39 (bhagavata.8.12.39)

को नु मेऽतितरेन्मायां विषक्तस्त्वदृते पुमान् । तांस्तान्विसृजतीं भावान्दुस्तरामकृतात्मभिः ॥ 12.39 ॥

ko nu me ’titaren māyāṁ viṣaktas tvad-ṛte pumān tāṁs tān visṛjatīṁ bhāvān dustarām akṛtātmabhiḥ

तुम्हें छोड़कर और कौन-सा आसक्त पुरुष मेरी उस माया को पार कर सकता है, जो निरन्तर नाना भाव उत्पन्न करती रहती है और जिसे अनियन्त्रित मन वाले लोगों के लिए पार करना अत्यन्त कठिन है?

श्लोक 40 (bhagavata.8.12.40)

सेयं गुणमयी माया न त्वामभिभविष्यति । मया समेता कालेन कालरूपेण भागशः ॥ 12.40 ॥

seyaṁ guṇa-mayī māyā na tvām abhibhaviṣyati mayā sametā kālena kāla-rūpeṇa bhāgaśaḥ

यह त्रिगुणमयी माया, जो मुझमें और काल-रूप में विभक्त होकर विद्यमान रहती है, अब तुम्हें फिर कभी पराजित नहीं कर पाएगी।

श्लोक 41 (bhagavata.8.12.41)

श्रीशुक उवाच एवं भगवता राजन् श्रीवत्साङ्केन सत्कृतः । आमन्त्र्य तं परिक्रम्य सगणः स्वालयं ययौ ॥ 12.41 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ bhagavatā rājan śrīvatsāṅkena sat-kṛtaḥ āmantrya taṁ parikramya sagaṇaḥ svālayaṁ yayau

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्, श्रीवत्स के चिह्न वाले भगवान द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर, शिव जी ने उनकी परिक्रमा की, उनसे विदा ली, और अपने गणों सहित अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 42 (bhagavata.8.12.42)

आत्मांशभूतां तां मायां भवानीं भगवान्भवः । सम्मतामृषिमुख्यानां प्रीत्याचष्टाथ भारत ॥ 12.42 ॥

ātmāṁśa-bhūtāṁ tāṁ māyāṁ bhavānīṁ bhagavān bhavaḥ sammatām ṛṣi-mukhyānāṁ prītyācaṣṭātha bhārata

हे भारत, तत्पश्चात् भगवान भव ने बड़े प्रेम से अपनी पत्नी भवानी को, जिसे महर्षिगण भगवान की ही शक्ति का अंश मानते हैं, यह सारा वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 43 (bhagavata.8.12.43)

अयि व्यपश्यस्त्वमजस्य मायांपरस्य पुंसः परदेवतायाः । अहं कलानामृषभोऽपि मुह्येययावशोऽन्ये किमुतास्वतन्त्राः ॥ 12.43 ॥

ayi vyapaśyas tvam ajasya māyāṁ parasya puṁsaḥ para-devatāyāḥ ahaṁ kalānām ṛṣabho ’pi muhye yayāvaśo ’nye kim utāsvatantrāḥ

शिव जी ने कहा — हे देवी, तुमने अजन्मा परम पुरुष, परम देवता की उस माया को स्वयं देख लिया है। जब मैं, जो उनके अंशों में श्रेष्ठ हूँ, भी उसके वशीभूत होकर मोहित हो गया, तो अन्य पराधीन प्राणियों की तो बात ही क्या?

श्लोक 44 (bhagavata.8.12.44)

यं मामपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात्समासहस्रान्त उपारतं वै । स एष साक्षात् पुरुषः पुराणोन यत्र कालो विशते न वेदः ॥ 12.44 ॥

yaṁ mām apṛcchas tvam upetya yogāt samā-sahasrānta upārataṁ vai sa eṣa sākṣāt puruṣaḥ purāṇo na yatra kālo viśate na vedaḥ

जब सहस्र वर्षों की योग-साधना के अन्त में मैं ध्यान से निवृत्त हुआ, तब तुमने मुझसे पूछा था कि मैं किसका ध्यान कर रहा था — यही वह साक्षात् सनातन पुरुष हैं, जहाँ न तो काल की पहुँच है और न वेद की।

श्लोक 45 (bhagavata.8.12.45)

श्रीशुक उवाच इति तेऽभिहितस्तात विक्रमः शार्ङ्गधन्वनः । सिन्धोर्निर्मथने येन धृतः पृष्ठे महाचलः ॥ 12.45 ॥

śrī-śuka uvāca iti te ’bhihitas tāta vikramaḥ śārṅga-dhanvanaḥ sindhor nirmathane yena dhṛtaḥ pṛṣṭhe mahācalaḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे तात, इस प्रकार मैंने तुम्हें शार्ङ्गधन्वा भगवान के उस पराक्रम का वर्णन किया, जिन्होंने समुद्र-मंथन के समय अपने पृष्ठ पर महान् पर्वत को धारण किया था।

श्लोक 46 (bhagavata.8.12.46)

एतन्मुहुः कीर्तयतोऽनुशृण्वतो न रिष्यते जातु समुद्यमः क्वचित् । यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनं समस्तसंसारपरिश्रमापहम् ॥ 12.46 ॥

etan muhuḥ kīrtayato ’nuśṛṇvato na riṣyate jātu samudyamaḥ kvacit yad uttamaśloka-guṇānuvarṇanaṁ samasta-saṁsāra-pariśramāpaham

जो कोई इस कथा को बार-बार कीर्तन करता है या श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसका प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता — क्योंकि भगवान उत्तमश्लोक के गुणों का यह वर्णन संसार के समस्त क्लेशों को दूर करने वाला है।

श्लोक 47 (bhagavata.8.12.47)

असदविषयमङ्घ्रिं भावगम्यं प्रपन्ना- नमृतममरवर्यानाशयत् सिन्धुमथ्यम् । कपटयुवतिवेषो मोहयन्यः सुरारीं- स्तमहमुपसृतानां कामपूरं नतोऽस्मि ॥ 12.47 ॥

asad-aviṣayam aṅghriṁ bhāva-gamyaṁ prapannān amṛtam amara-varyān āśayat sindhu-mathyam kapaṭa-yuvati-veṣo mohayan yaḥ surārīṁs tam aham upasṛtānāṁ kāma-pūraṁ nato ’smi

जिन भगवान के चरण अभक्तों के लिए अगम्य हैं और केवल भावपूर्ण भक्ति से ही सुलभ हैं, उन्होंने अपने शरणागत श्रेष्ठ देवताओं को समुद्र-मन्थन से निकला अमृत पिलाया, तथा छद्म युवती-वेश धारण कर देवताओं के शत्रुओं को मोहित कर दिया। उन भगवान को, जो अपने शरणागतों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं, मैं नमस्कार करता हूँ।

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