Skip to main content

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15

बलि महाराज द्वारा स्वर्गलोक-विजय

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (bhagavata.8.15.1)

श्रीराजोवाच बलेः पदत्रयं भूमेः कस्माद्धरिरयाचत । भूतेश्वरः कृपणवल्लब्धार्थोऽपि बबन्ध तम् ॥ 15.1 ॥

śrī-rājovāca baleḥ pada-trayaṁ bhūmeḥ kasmād dharir ayācata bhūteśvaraḥ kṛpaṇa-val labdhārtho ’pi babandha tam

राजा परीक्षित ने पूछा — समस्त प्राणियों के स्वामी भगवान हरि ने बलि से भूमि के तीन पग क्यों माँगे, और वह याचित वस्तु प्राप्त हो जाने पर भी, मानो किसी दीन-हीन की तरह, उन्होंने बलि को क्यों बाँध दिया?

श्लोक 2 (bhagavata.8.15.2)

एतद् वेदितुमिच्छामो महत्कौतूहलं हि नः । याच्ञेश्वरस्य पूर्णस्य बन्धनं चाप्यनागसः ॥ 15.2 ॥

etad veditum icchāmo mahat kautūhalaṁ hi naḥ yācñeśvarasya pūrṇasya bandhanaṁ cāpy anāgasaḥ

हमें यह जानने की बड़ी उत्कण्ठा है कि, एक ओर तो वे स्वयं ईश्वर होकर भी याचक बने, और दूसरी ओर, पूर्णकाम होते हुए भी, उन्होंने निरपराध बलि को क्यों बाँधा — यह हमारे लिए महान कौतूहल का विषय है।

श्लोक 3 (bhagavata.8.15.3)

श्रीशुक उवाच पराजितश्रीरसुभिश्च हापितो हीन्द्रेण राजन्भृगुभिः स जीवितः । सर्वात्मना तानभजद् भृगून्बलिः शिष्यो महात्मार्थनिवेदनेन ॥ 15.3 ॥

śrī-śuka uvāca parājita-śrīr asubhiś ca hāpito hīndreṇa rājan bhṛgubhiḥ sa jīvitaḥ sarvātmanā tān abhajad bhṛgūn baliḥ śiṣyo mahātmārtha-nivedanena

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्, इन्द्र से पराजित होकर बलि ने अपनी सम्पदा और प्राण दोनों खो दिए थे, किन्तु भृगुवंशियों ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इस कृतज्ञता में, वह महात्मा बलि उनका शिष्य बनकर सर्वस्व अर्पण करते हुए पूर्ण हृदय से भृगुओं की सेवा करने लगे।

श्लोक 4 (bhagavata.8.15.4)

तं ब्राह्मणा भृगवः प्रीयमाणा अयाजयन्विश्वजिता त्रिणाकम् । जिगीषमाणं विधिनाभिषिच्य महाभिषेकेण महानुभावाः ॥ 15.4 ॥

taṁ brāhmaṇā bhṛgavaḥ prīyamāṇā ayājayan viśvajitā tri-ṇākam jigīṣamāṇaṁ vidhinābhiṣicya mahābhiṣekeṇa mahānubhāvāḥ

स्वर्ग को पुनः जीतने की इच्छा रखने वाले बलि से प्रसन्न होकर, महानुभाव भृगुवंशी ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक उनका महाभिषेक किया और उनसे 'विश्वजित्' नामक यज्ञ सम्पन्न कराया।

श्लोक 5 (bhagavata.8.15.5)

ततो रथः काञ्चनपट्टनद्धो हयाश्च हर्यश्वतुरङ्गवर्णाः । ध्वजश्च सिंहेन विराजमानो हुताशनादास हविर्भिरिष्टात् ॥ 15.5 ॥

tato rathaḥ kāñcana-paṭṭa-naddho hayāś ca haryaśva-turaṅga-varṇāḥ dhvajaś ca siṁhena virājamāno hutāśanād āsa havirbhir iṣṭāt

उस यज्ञ में जब हवि की आहुतियाँ दी गईं, तब अग्नि से स्वर्ण-पट्ट से मढ़ा हुआ एक रथ, इन्द्र के घोड़ों के समान वर्ण वाले घोड़े, तथा सिंह-चिह्न से सुशोभित एक ध्वजा प्रकट हुई।

श्लोक 6 (bhagavata.8.15.6)

धनुश्च दिव्यं पुरटोपनद्धं तूणावरिक्तौ कवचं च दिव्यम् । पितामहस्तस्य ददौ च माला- मम्लानपुष्पां जलजं च शुक्रः ॥ 15.6 ॥

dhanuś ca divyaṁ puraṭopanaddhaṁ tūṇāv ariktau kavacaṁ ca divyam pitāmahas tasya dadau ca mālām amlāna-puṣpāṁ jalajaṁ ca śukraḥ

एक दिव्य स्वर्ण-मढ़ित धनुष, दो अक्षय तूणीर और दिव्य कवच भी प्रकट हुए। उनके पितामह प्रह्लाद ने उन्हें कभी न मुरझाने वाले पुष्पों की माला दी, और शुक्राचार्य ने शंख भेंट किया।

श्लोक 7 (bhagavata.8.15.7)

एवं स विप्रार्जितयोधनार्थ- स्तैः कल्पितस्वस्त्ययनोऽथ विप्रान् । प्रदक्षिणीकृत्य कृतप्रणामः प्रह्लादमामन्त्र्य नमश्चकार ॥ 15.7 ॥

evaṁ sa viprārjita-yodhanārthas taiḥ kalpita-svastyayano ’tha viprān pradakṣiṇī-kṛtya kṛta-praṇāmaḥ prahrādam āmantrya namaś-cakāra

इस प्रकार ब्राह्मणों के प्रभाव से युद्ध की समस्त सामग्री प्राप्त कर, तथा उनके द्वारा स्वस्ति-वाचन कराए जाने के पश्चात्, बलि ने उन ब्राह्मणों की परिक्रमा कर प्रणाम किया, और फिर प्रह्लाद से विदा लेकर उन्हें भी नमस्कार किया।

श्लोक 8 (bhagavata.8.15.8)

अथारुह्य रथं दिव्यं भृगुदत्तं महारथः । सुस्रग्धरोऽथ सन्नह्य धन्वी खड्गी धृतेषुधिः ॥ 15.8 ॥

athāruhya rathaṁ divyaṁ bhṛgu-dattaṁ mahārathaḥ susrag-dharo ’tha sannahya dhanvī khaḍgī dhṛteṣudhiḥ

तत्पश्चात् वह महारथी बलि, भृगुओं द्वारा दिए गए उस दिव्य रथ पर सवार होकर, सुंदर माला धारण किए, कवच पहने, धनुष, तलवार और तूणीर लिए हुए,

श्लोक 9 (bhagavata.8.15.9)

हेमाङ्गदलसद्बाहुः स्फुरन्मकरकुण्डलः । रराज रथमारूढो धिष्ण्यस्थ इव हव्यवाट् ॥ 15.9 ॥

hemāṅgada-lasad-bāhuḥ sphuran-makara-kuṇḍalaḥ rarāja ratham ārūḍho dhiṣṇya-stha iva havyavāṭ

— उसकी भुजाओं पर स्वर्ण-बाजूबन्द दमक रहे थे और कानों में मकराकृति कुण्डल चमक रहे थे; रथ पर आरूढ़ वह ऐसे सुशोभित हो रहा था जैसे वेदी पर प्रतिष्ठित साक्षात् अग्निदेव।

श्लोक 10 (bhagavata.8.15.10)

तुल्यैश्वर्यबलश्रीभिः स्वयूथैर्दैत्ययूथपैः । पिबद्भिरिव खं दृग्भिर्दहद्भिः परिधीनिव ॥ 15.10 ॥

tulyaiśvarya-bala-śrībhiḥ sva-yūthair daitya-yūthapaiḥ pibadbhir iva khaṁ dṛgbhir dahadbhiḥ paridhīn iva

अपने समान ही ऐश्वर्य, बल और शोभा वाले दैत्य-सेनापतियों और अपनी सेनाओं के साथ, जो अपनी दृष्टि से मानो आकाश को पी जाने वाले तथा दिशाओं को जला डालने वाले प्रतीत होते थे,

श्लोक 11 (bhagavata.8.15.11)

वृतो विकर्षन् महतीमासुरीं ध्वजिनीं विभुः । ययाविन्द्रपुरीं स्वृद्धां कम्पयन्निव रोदसी ॥ 15.11 ॥

vṛto vikarṣan mahatīm āsurīṁ dhvajinīṁ vibhuḥ yayāv indra-purīṁ svṛddhāṁ kampayann iva rodasī

— उस विशाल शक्तिशाली दैत्य-सेना को साथ लेकर, महाबली बलि इन्द्र की समृद्ध नगरी की ओर चल पड़ा, मानो अपनी गति से आकाश और पृथ्वी दोनों को कम्पित कर रहा हो।

श्लोक 12 (bhagavata.8.15.12)

रम्यामुपवनोद्यानैः श्रीमद्भिर्नन्दनादिभिः । कूजद्विहङ्गमिथुनैर्गायन्मत्तमधुव्रतैः । प्रवालफलपुष्पोरुभारशाखामरद्रुमैः ॥ 15.12 ॥

ramyām upavanodyānaiḥ śrīmadbhir nandanādibhiḥ kūjad-vihaṅga-mithunair gāyan-matta-madhuvrataiḥ pravāla-phala-puṣporu- bhāra-śākhāmara-drumaiḥ

वह नगरी नन्दन आदि सुंदर उपवनों और उद्यानों से अत्यंत रमणीय थी, जहाँ पक्षी-युगल कूजते और मस्त भँवरे गुनगुनाते थे, तथा अमर वृक्षों की शाखाएँ कोंपलों, फलों और फूलों के भार से झुकी हुई थीं।

श्लोक 13 (bhagavata.8.15.13)

हंससारसचक्राह्वकारण्डवकुलाकुलाः । नलिन्यो यत्र क्रीडन्ति प्रमदाः सुरसेविताः ॥ 15.13 ॥

haṁsa-sārasa-cakrāhva- kāraṇḍava-kulākulāḥ nalinyo yatra krīḍanti pramadāḥ sura-sevitāḥ

जहाँ हंस, सारस, चक्रवाक और कारण्डव पक्षियों के झुण्डों से भरे कमल-सरोवरों में, देवताओं द्वारा सेवित सुंदरियाँ जल-क्रीड़ा करती थीं।

श्लोक 14 (bhagavata.8.15.14)

आकाशगङ्गया देव्या वृतां परिखभूतया । प्राकारेणाग्निवर्णेन साट्टालेनोन्नतेन च ॥ 15.14 ॥

ākāśa-gaṅgayā devyā vṛtāṁ parikha-bhūtayā prākāreṇāgni-varṇena sāṭṭālenonnatena ca

वह नगरी दिव्य आकाश-गंगा से घिरी हुई थी, जो उसकी खाई का काम करती थी, और अग्नि के समान रंग वाले, ऊँचे तथा गढ़-मीनारों से युक्त परकोटे से घिरी थी।

श्लोक 15 (bhagavata.8.15.15)

रुक्मपट्टकपाटैश्च द्वारैः स्फटिकगोपुरैः । जुष्टां विभक्तप्रपथां विश्वकर्मविनिर्मिताम् ॥ 15.15 ॥

rukma-paṭṭa-kapāṭaiś ca dvāraiḥ sphaṭika-gopuraiḥ juṣṭāṁ vibhakta-prapathāṁ viśvakarma-vinirmitām

उसमें स्वर्ण-पट्टों से मढ़े हुए किवाड़ों वाले द्वार तथा स्फटिक-मणि के गोपुर थे, और यह सुव्यवस्थित सड़कों वाली नगरी विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित थी।

श्लोक 16 (bhagavata.8.15.16)

सभाचत्वररथ्याढ्यां विमानैर्न्यर्बुदैर्युताम् । शृङ्गाटकैर्मणिमयैर्वज्रविद्रुमवेदिभिः ॥ 15.16 ॥

sabhā-catvara-rathyāḍhyāṁ vimānair nyarbudair yutām śṛṅgāṭakair maṇimayair vajra-vidruma-vedibhiḥ

वह नगरी सभाओं, चौराहों और मार्गों से समृद्ध थी, वहाँ करोड़ों विमान थे, चौराहे मणियों से जड़े थे, तथा वेदियाँ हीरे और मूँगे से बनी थीं।

श्लोक 17 (bhagavata.8.15.17)

यत्र नित्यवयोरूपाः श्यामा विरजवाससः । भ्राजन्ते रूपवन्नार्यो ह्यर्चिर्भिरिव वह्नयः ॥ 15.17 ॥

yatra nitya-vayo-rūpāḥ śyāmā viraja-vāsasaḥ bhrājante rūpavan-nāryo hy arcirbhir iva vahnayaḥ

वहाँ सदा युवा और सुरूप, निर्मल वस्त्र धारण किए हुए सुंदर स्त्रियाँ ऐसे चमकती थीं जैसे ज्वालाओं से युक्त अग्नि।

श्लोक 18 (bhagavata.8.15.18)

सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्रजाम् । यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः ॥ 15.18 ॥

sura-strī-keśa-vibhraṣṭa- nava-saugandhika-srajām yatrāmodam upādāya mārga āvāti mārutaḥ

वहाँ मार्गों पर बहने वाली हवा, देवांगनाओं के केशों से गिरी हुई नव-सुगन्धित पुष्पमालाओं की सुगन्ध को अपने साथ लिए हुए बहती थी।

श्लोक 19 (bhagavata.8.15.19)

हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना । पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः ॥ 15.19 ॥

hema-jālākṣa-nirgacchad- dhūmenāguru-gandhinā pāṇḍureṇa praticchanna- mārge yānti sura-priyāḥ

स्वर्ण-जालियों की खिड़कियों से निकलते हुए अगुरु की सुगन्ध वाले श्वेत धुएँ से ढके मार्गों पर देवताओं की प्रियाएँ (अप्सराएँ) विचरण करती थीं।

श्लोक 20 (bhagavata.8.15.20)

मुक्तावितानैर्मणिहेमकेतुभि- र्नानापताकावलभीभिरावृताम् । शिखण्डिपारावतभृङ्गनादितां वैमानिकस्त्रीकलगीतमङ्गलाम् ॥ 15.20 ॥

muktā-vitānair maṇi-hema-ketubhir nānā-patākā-valabhībhir āvṛtām śikhaṇḍi-pārāvata-bhṛṅga-nāditāṁ vaimānika-strī-kala-gīta-maṅgalām

वह नगरी मोतियों की चंदोवाओं और मणि-स्वर्ण की पताकाओं से, तथा भिन्न-भिन्न ध्वजाओं वाले शिखरों से ढकी हुई थी; वहाँ मोर, कबूतर और भ्रमरों की ध्वनि गूँजती रहती थी, और विमानों में बैठी स्त्रियों के मधुर मंगल-गीत सुनाई पड़ते थे।

श्लोक 21 (bhagavata.8.15.21)

मृदङ्गशङ्खानकदुन्दुभिस्वनैः सतालवीणामुरजेष्टवेणुभिः । नृत्यैः सवाद्यैरुपदेवगीतकै- र्मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम् ॥ 15.21 ॥

mṛdaṅga-śaṅkhānaka-dundubhi-svanaiḥ satāla-vīṇā-murajeṣṭa-veṇubhiḥ nṛtyaiḥ savādyair upadeva-gītakair manoramāṁ sva-prabhayā jita-prabhām

मृदंग, शंख, आनक और दुन्दुभि की ध्वनियों से, ताल सहित वीणा, मुरज और बाँसुरी के स्वरों से, तथा गन्धर्वों के संगीत-संगत नृत्यों से सुशोभित वह मनोहर नगरी अपने ही तेज से समस्त कान्ति को मात करती थी।

श्लोक 22 (bhagavata.8.15.22)

यां न व्रजन्त्यधर्मिष्ठाः खला भूतद्रुहः शठाः । मानिनः कामिनो लुब्धा एभिर्हीना व्रजन्ति यत् ॥ 15.22 ॥

yāṁ na vrajanty adharmiṣṭhāḥ khalā bhūta-druhaḥ śaṭhāḥ māninaḥ kāmino lubdhā ebhir hīnā vrajanti yat

जो अधर्मी, दुष्ट, प्राणियों से द्रोह रखने वाले, कपटी, अभिमानी, कामी अथवा लोभी हैं, वे उस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकते; केवल वे ही वहाँ जाते हैं जो इन दोषों से रहित हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.8.15.23)

तां देवधानीं स वरूथिनीपति- र्बहिः समन्ताद् रुरुधे पृतन्यया । आचार्यदत्तं जलजं महास्वनं दध्मौ प्रयुञ्जन्भयमिन्द्रयोषिताम् ॥ 15.23 ॥

tāṁ deva-dhānīṁ sa varūthinī-patir bahiḥ samantād rurudhe pṛtanyayā ācārya-dattaṁ jalajaṁ mahā-svanaṁ dadhmau prayuñjan bhayam indra-yoṣitām

उस विशाल सेना के स्वामी बलि ने देवताओं की उस नगरी को चारों ओर से अपनी सेना द्वारा घेर लिया, और अपने गुरु द्वारा दिए गए शंख को महाघोष से फूँकते हुए इन्द्र की स्त्रियों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया।

श्लोक 24 (bhagavata.8.15.24)

मघवांस्तमभिप्रेत्य बलेः परममुद्यमम् । सर्वदेवगणोपेतो गुरुमेतदुवाच ह ॥ 15.24 ॥

maghavāṁs tam abhipretya baleḥ paramam udyamam sarva-deva-gaṇopeto gurum etad uvāca ha

बलि के इस अत्यंत भीषण प्रयास को समझकर, मघवान (इन्द्र) समस्त देवगणों सहित अपने गुरु बृहस्पति के पास गए और यह निवेदन किया।

श्लोक 25 (bhagavata.8.15.25)

भगवन्नुद्यमो भूयान्बलेर्नः पूर्ववैरिणः । अविषह्यमिमं मन्ये केनासीत्तेजसोर्जितः ॥ 15.25 ॥

bhagavann udyamo bhūyān baler naḥ pūrva-vairiṇaḥ aviṣahyam imaṁ manye kenāsīt tejasorjitaḥ

हे भगवन्, हमारे पुराने शत्रु बलि का यह उद्यम अत्यंत बढ़ गया है। मुझे तो लगता है कि यह असहनीय हो चुका है — किसकी शक्ति से वह इतना तेजस्वी हो गया है?

श्लोक 26 (bhagavata.8.15.26)

नैनं कश्चित् कुतो वापि प्रतिव्योढुमधीश्वरः । पिबन्निव मुखेनेदं लिहन्निव दिशो दश । दहन्निव दिशो दृग्भिः संवर्ताग्निरिवोत्थितः ॥ 15.26 ॥

nainaṁ kaścit kuto vāpi prativyoḍhum adhīśvaraḥ pibann iva mukhenedaṁ lihann iva diśo daśa dahann iva diśo dṛgbhiḥ saṁvartāgnir ivotthitaḥ

कोई भी, कहीं से भी, इसका सामना करने में समर्थ नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अपने मुख से इस सम्पूर्ण जगत् को पी जाना चाहता हो, अपनी जिह्वा से दसों दिशाओं को चाट लेना चाहता हो, और अपनी दृष्टि से समस्त दिशाओं को जला डालना चाहता हो — मानो प्रलयकाल की संवर्तक अग्नि ही साक्षात् उठ खड़ी हुई हो।

श्लोक 27 (bhagavata.8.15.27)

ब्रूहि कारणमेतस्य दुर्धर्षत्वस्य मद्रिपोः । ओजः सहो बलं तेजो यत एतत्समुद्यमः ॥ 15.27 ॥

brūhi kāraṇam etasya durdharṣatvasya mad-ripoḥ ojaḥ saho balaṁ tejo yata etat samudyamaḥ

कृपया मुझे बताइए कि मेरे इस शत्रु के इस दुर्दमनीय पराक्रम का कारण क्या है, और किस स्रोत से उसे यह ओज, सहनशक्ति, बल, तेज तथा उत्साह प्राप्त हुआ है।

श्लोक 28 (bhagavata.8.15.28)

श्रीगुरुरुवाच जानामि मघवञ्छत्रोरुन्नतेरस्य कारणम् । शिष्यायोपभृतं तेजो भृगुभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ 15.28 ॥

śrī-gurur uvāca jānāmi maghavañ chatror unnater asya kāraṇam śiṣyāyopabhṛtaṁ tejo bhṛgubhir brahma-vādibhiḥ

श्री गुरु (बृहस्पति) ने कहा — हे मघवन्, मैं तुम्हारे इस शत्रु की इस उन्नति का कारण जानता हूँ। ब्रह्मवादी भृगुवंशियों ने अपने शिष्य को यह तेज प्रदान किया है।

श्लोक 29 (bhagavata.8.15.29)

ओजस्विनं बलिं जेतुं न समर्थोऽस्ति कश्चन । भवद्विधो भवान्वापि वर्जयित्वेश्वरं हरिम् ॥ 15.29 ॥

ojasvinaṁ baliṁ jetuṁ na samartho ’sti kaścana bhavad-vidho bhavān vāpi varjayitveśvaraṁ harim

अब उस ओजस्वी बलि को जीतने में कोई भी समर्थ नहीं है — न तुम्हारे समान कोई अन्य, और न स्वयं तुम भी — भगवान हरि को छोड़कर।

श्लोक 30 (bhagavata.8.15.30)

विजेष्यति न कोऽप्येनं ब्रह्मतेजःसमेधितम् । नास्य शक्तः पुरः स्थातुं कृतान्तस्य यथा जनाः ॥ 15.30 ॥

vijeṣyati na ko ’py enaṁ brahma-tejaḥ-samedhitam nāsya śaktaḥ puraḥ sthātuṁ kṛtāntasya yathā janāḥ

ब्राह्मण-तेज से इतना समृद्ध हुए इस बलि को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। जैसे कोई भी प्राणी काल के सामने खड़ा नहीं रह सकता, वैसे ही कोई भी इसके सामने टिक नहीं सकता।

श्लोक 31 (bhagavata.8.15.31)

तस्मान्निलयमुत्सृज्य यूयं सर्वे त्रिविष्टपम् । यात कालं प्रतीक्षन्तो यतः शत्रोर्विपर्ययः ॥ 15.31 ॥

tasmān nilayam utsṛjya yūyaṁ sarve tri-viṣṭapam yāta kālaṁ pratīkṣanto yataḥ śatror viparyayaḥ

इसलिए तुम सब स्वर्गलोक का यह निवास छोड़कर कहीं और चले जाओ, और उस काल की प्रतीक्षा करो जब तुम्हारे शत्रु की स्थिति में परिवर्तन आएगा।

श्लोक 32 (bhagavata.8.15.32)

एष विप्रबलोदर्कः सम्प्रत्यूर्जितविक्रमः । तेषामेवापमानेन सानुबन्धो विनङ्क्ष्यति ॥ 15.32 ॥

eṣa vipra-balodarkaḥ sampraty ūrjita-vikramaḥ teṣām evāpamānena sānubandho vinaṅkṣyati

यह बलि, जो अभी ब्राह्मणों के बल के फल से इतना पराक्रमी हो उठा है, अन्ततः उन्हीं ब्राह्मणों के अपमान के कारण अपने सम्बन्धियों सहित नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 33 (bhagavata.8.15.33)

एवं सुमन्त्रितार्थास्ते गुरुणार्थानुदर्शिना । हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्गीर्वाणाः कामरूपिणः ॥ 15.33 ॥

evaṁ sumantritārthās te guruṇārthānudarśinā hitvā tri-viṣṭapaṁ jagmur gīrvāṇāḥ kāma-rūpiṇaḥ

अपने कल्याण की दृष्टि रखने वाले गुरु से इस प्रकार सम्मति प्राप्तकर, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले देवगण स्वर्गलोक छोड़कर चले गए।

श्लोक 34 (bhagavata.8.15.34)

देवेष्वथ निलीनेषु बलिर्वैरोचनः पुरीम् । देवधानीमधिष्ठाय वशं निन्ये जगत्त्रयम् ॥ 15.34 ॥

deveṣv atha nilīneṣu balir vairocanaḥ purīm deva-dhānīm adhiṣṭhāya vaśaṁ ninye jagat-trayam

जब देवगण इस प्रकार छिप गए, तब विरोचन-पुत्र बलि ने देवताओं की उस नगरी पर अधिकार जमाकर तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया।

श्लोक 35 (bhagavata.8.15.35)

तं विश्वजयिनं शिष्यं भृगवः शिष्यवत्सलाः । शतेन हयमेधानामनुव्रतमयाजयन् ॥ 15.35 ॥

taṁ viśva-jayinaṁ śiṣyaṁ bhṛgavaḥ śiṣya-vatsalāḥ śatena hayamedhānām anuvratam ayājayan

अपने शिष्य के प्रति वात्सल्य रखने वाले भृगुवंशियों ने उस विश्व-विजयी शिष्य से, उसकी ही निष्ठा के अनुरूप, सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कराए।

श्लोक 36 (bhagavata.8.15.36)

ततस्तदनुभावेन भुवनत्रयविश्रुताम् । कीर्तिं दिक्षु वितन्वानः स रेज उडुराडिव ॥ 15.36 ॥

tatas tad-anubhāvena bhuvana-traya-viśrutām kīrtiṁ dikṣu-vitanvānaḥ sa reja uḍurāḍ iva

उन यज्ञों के प्रभाव से त्रिलोक-विख्यात कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाते हुए, वह चन्द्रमा के समान देदीप्यमान हो उठा।

श्लोक 37 (bhagavata.8.15.37)

बुभुजे च श्रियं स्वृद्धां द्विजदेवोपलम्भिताम् । कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानो महामनाः ॥ 15.37 ॥

bubhuje ca śriyaṁ svṛddhāṁ dvija-devopalambhitām kṛta-kṛtyam ivātmānaṁ manyamāno mahāmanāḥ

उदार-हृदय बलि, अपने आपको मानो कृतकृत्य मानते हुए, ब्राह्मण-देवताओं की कृपा से प्राप्त हुई उस समृद्ध सम्पदा का भोग करने लगा।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16