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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16

पयोव्रत की उपासना-विधि

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (bhagavata.8.16.1)

श्रीशुक उवाच एवं पुत्रेषु नष्टेषु देवमातादितिस्तदा । हृते त्रिविष्टपे दैत्यैः पर्यतप्यदनाथवत् ॥ 16.1 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ putreṣu naṣṭeṣu deva-mātāditis tadā hṛte tri-viṣṭape daityaiḥ paryatapyad anāthavat

श्री शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार जब देवताओं की माता अदिति के पुत्र लुप्त हो गए और दैत्यों ने स्वर्गलोक हड़प लिया, तब अदिति मानो अनाथ के समान संताप करने लगीं।

श्लोक 2 (bhagavata.8.16.2)

एकदा कश्यपस्तस्या आश्रमं भगवानगात् । निरुत्सवं निरानन्दं समाधेर्विरतश्चिरात् ॥ 16.2 ॥

ekadā kaśyapas tasyā āśramaṁ bhagavān agāt nirutsavaṁ nirānandaṁ samādher virataś cirāt

एक दिन दीर्घकाल तक चली समाधि से विरत होकर महर्षि कश्यप उस आश्रम में पहुँचे, जो अब उत्सव और आनन्द से रहित हो चुका था।

श्लोक 3 (bhagavata.8.16.3)

स पत्नीं दीनवदनां कृतासनपरिग्रहः । सभाजितो यथान्यायमिदमाह कुरूद्वह ॥ 16.3 ॥

sa patnīṁ dīna-vadanāṁ kṛtāsana-parigrahaḥ sabhājito yathā-nyāyam idam āha kurūdvaha

हे कुरुवंश-श्रेष्ठ, विधिवत् सत्कार पाकर आसन ग्रहण करने के बाद, कश्यप जी ने उदास मुख वाली अपनी पत्नी अदिति से यह कहा।

श्लोक 4 (bhagavata.8.16.4)

अप्यभद्रं न विप्राणां भद्रे लोकेऽधुनागतम् । न धर्मस्य न लोकस्य मृत्योश्छन्दानुवर्तिनः ॥ 16.4 ॥

apy abhadraṁ na viprāṇāṁ bhadre loke ’dhunāgatam na dharmasya na lokasya mṛtyoś chandānuvartinaḥ

हे कल्याणी, क्या ब्राह्मणों पर, धर्म पर, अथवा मृत्यु की इच्छा के अधीन इस जगत् की प्रजा पर, अभी कोई अशुभ घटना तो नहीं घटी है?

श्लोक 5 (bhagavata.8.16.5)

अपि वाकुशलं किञ्चिद् गृहेषु गृहमेधिनि । धर्मस्यार्थस्य कामस्य यत्र योगो ह्ययोगिनाम् ॥ 16.5 ॥

api vākuśalaṁ kiñcid gṛheṣu gṛha-medhini dharmasyārthasya kāmasya yatra yogo hy ayoginām

हे गृहस्थ-धर्म में निष्ठावती, क्या घर में — जहाँ गृहस्थों के लिए धर्म, अर्थ और काम का सुयोग है — कुछ भी अकुशल तो नहीं हुआ है?

श्लोक 6 (bhagavata.8.16.6)

अपि वातिथयोऽभ्येत्य कुटुम्बासक्तया त्वया । गृहादपूजिता याताः प्रत्युत्थानेन वा क्वचित् ॥ 16.6 ॥

api vātithayo ’bhyetya kuṭumbāsaktayā tvayā gṛhād apūjitā yātāḥ pratyutthānena vā kvacit

अथवा क्या कुटुम्ब में अत्यंत आसक्त होने के कारण, तुमने आए हुए अतिथियों का उचित सम्मान न करके, यहाँ तक कि उनके स्वागत में खड़े हुए बिना ही, उन्हें बिना अर्चना के लौटा दिया?

श्लोक 7 (bhagavata.8.16.7)

गृहेषु येष्वतिथयो नार्चिताः सलिलैरपि । यदि निर्यान्ति ते नूनं फेरुराजगृहोपमाः ॥ 16.7 ॥

gṛheṣu yeṣv atithayo nārcitāḥ salilair api yadi niryānti te nūnaṁ pherurāja-gṛhopamāḥ

जिन घरों से अतिथि बिना जल तक अर्पित हुए ही लौट जाते हैं, वे घर निश्चय ही सियारों के बिलों के समान माने जाते हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.8.16.8)

अप्यग्नयस्तु वेलायां न हुता हविषा सति । त्वयोद्विग्नधिया भद्रे प्रोषिते मयि कर्हिचित् ॥ 16.8 ॥

apy agnayas tu velāyāṁ na hutā haviṣā sati tvayodvigna-dhiyā bhadre proṣite mayi karhicit

हे सती, हे कल्याणी, क्या मेरे कहीं बाहर जाने पर तुम्हारा मन इतना उद्विग्न रहा कि तुमने समय पर अग्नि में हवि की आहुति देना भी छोड़ दिया?

श्लोक 9 (bhagavata.8.16.9)

यत्पूजया कामदुघान्याति लोकान्गृहान्वितः । ब्राह्मणोऽग्निश्च वै विष्णोः सर्वदेवात्मनो मुखम् ॥ 16.9 ॥

yat-pūjayā kāma-dughān yāti lokān gṛhānvitaḥ brāhmaṇo ’gniś ca vai viṣṇoḥ sarva-devātmano mukham

ब्राह्मण और अग्नि, दोनों ही समस्त देवताओं के आत्मा भगवान विष्णु का मुख हैं, जिनकी उपासना से गृहस्थ मनचाहे लोकों को प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 10 (bhagavata.8.16.10)

अपि सर्वे कुशलिनस्तव पुत्रा मनस्विनि । लक्षयेऽस्वस्थमात्मानं भवत्या लक्षणैरहम् ॥ 16.10 ॥

api sarve kuśalinas tava putrā manasvini lakṣaye ’svastham ātmānaṁ bhavatyā lakṣaṇair aham

हे उदार मन वाली, क्या तुम्हारे सभी पुत्र कुशल से हैं? तुम्हारे मुख के चिह्नों से ही मुझे लग रहा है कि तुम्हारा मन अस्वस्थ है।

श्लोक 11 (bhagavata.8.16.11)

श्रीअदितिरुवाच भद्रं द्विजगवां ब्रह्मन्धर्मस्यास्य जनस्य च । त्रिवर्गस्य परं क्षेत्रं गृहमेधिन्गृहा इमे ॥ 16.11 ॥

śrī-aditir uvāca bhadraṁ dvija-gavāṁ brahman dharmasyāsya janasya ca tri-vargasya paraṁ kṣetraṁ gṛhamedhin gṛhā ime

श्री अदिति ने कहा — हे ब्रह्मन्, ब्राह्मणों, गौओं, धर्म और प्रजा का सब कुशल है। हे गृहस्थ-धर्म के स्वामी, यह गृहस्थ-जीवन तो धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों की सिद्धि का सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र है।

श्लोक 12 (bhagavata.8.16.12)

अग्नयोऽतिथयो भृत्या भिक्षवो ये च लिप्सवः । सर्वं भगवतो ब्रह्मन्ननुध्यानान्न रिष्यति ॥ 16.12 ॥

agnayo ’tithayo bhṛtyā bhikṣavo ye ca lipsavaḥ sarvaṁ bhagavato brahmann anudhyānān na riṣyati

हे ब्रह्मन्, अग्नि, अतिथि, सेवक तथा जो भी याचक आते हैं, उन सबकी सेवा में कोई कमी नहीं है, क्योंकि आपके सतत ध्यान के प्रताप से यहाँ कुछ भी क्षतिग्रस्त नहीं होता।

श्लोक 13 (bhagavata.8.16.13)

को नु मे भगवन्कामो न सम्पद्येत मानसः । यस्या भवान्प्रजाध्यक्ष एवं धर्मान्प्रभाषते ॥ 16.13 ॥

ko nu me bhagavan kāmo na sampadyeta mānasaḥ yasyā bhavān prajādhyakṣa evaṁ dharmān prabhāṣate

हे भगवन्, जब आप स्वयं प्रजापति होकर मुझे इस प्रकार धर्म का उपदेश देते हैं, तो मेरी कौन-सी मन:कामना अपूर्ण रह सकती है?

श्लोक 14 (bhagavata.8.16.14)

तवैव मारीच मनःशरीरजाः प्रजा इमाः सत्त्वरजस्तमोजुषः । समो भवांस्तास्वसुरादिषु प्रभो तथापि भक्तं भजते महेश्वरः ॥ 16.14 ॥

tavaiva mārīca manaḥ-śarīrajāḥ prajā imāḥ sattva-rajas-tamo-juṣaḥ samo bhavāṁs tāsv asurādiṣu prabho tathāpi bhaktaṁ bhajate maheśvaraḥ

हे मारीच-पुत्र, ये समस्त प्रजाएँ — देव और असुर दोनों — जो सत्त्व, रज और तम गुणों से युक्त हैं, आपके ही मन और शरीर से उत्पन्न हैं। आप उन सबके प्रति समान भाव रखते हैं, फिर भी, हे प्रभो, जैसे परमेश्वर स्वयं अपने भक्त के प्रति विशेष स्नेह रखते हैं, वैसे ही आप भी करते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.8.16.15)

तस्मादीश भजन्त्या मे श्रेयश्चिन्तय सुव्रत । हृतश्रियो हृतस्थानान्सपत्नैः पाहि नः प्रभो ॥ 16.15 ॥

tasmād īśa bhajantyā me śreyaś cintaya suvrata hṛta-śriyo hṛta-sthānān sapatnaiḥ pāhi naḥ prabho

अतः हे स्वामी, हे उत्तम व्रतधारी, अपनी सेविका मुझ पर कृपा करके मेरे कल्याण का विचार कीजिए। हे प्रभो, हमारे प्रतिद्वन्द्वियों ने हमारी सम्पदा और स्थान दोनों छीन लिए हैं — कृपया हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 16 (bhagavata.8.16.16)

परैर्विवासिता साहं मग्ना व्यसनसागरे । ऐश्वर्यं श्रीर्यशः स्थानं हृतानि प्रबलैर्मम ॥ 16.16 ॥

parair vivāsitā sāhaṁ magnā vyasana-sāgare aiśvaryaṁ śrīr yaśaḥ sthānaṁ hṛtāni prabalair mama

बलशाली शत्रुओं ने मेरा ऐश्वर्य, समृद्धि, यश और स्थान — सब कुछ छीन लिया है, और मुझे निर्वासित करके संकट के सागर में डुबो दिया है।

श्लोक 17 (bhagavata.8.16.17)

यथा तानि पुनः साधो प्रपद्येरन् ममात्मजाः । तथा विधेहि कल्याणं धिया कल्याणकृत्तम ॥ 16.17 ॥

yathā tāni punaḥ sādho prapadyeran mamātmajāḥ tathā vidhehi kalyāṇaṁ dhiyā kalyāṇa-kṛttama

हे साधुश्रेष्ठ, हे मंगलकारियों में सर्वश्रेष्ठ, अपनी बुद्धि से ऐसा कोई कल्याणकारी उपाय बताइए, जिससे मेरे पुत्र वह सब पुनः प्राप्त कर सकें।

श्लोक 18 (bhagavata.8.16.18)

श्रीशुक उवाच एवमभ्यर्थितोऽदित्या कस्तामाह स्मयन्निव । अहो मायाबलं विष्णोः स्नेहबद्धमिदं जगत् ॥ 16.18 ॥

śrī-śuka uvāca evam abhyarthito ’dityā kas tām āha smayann iva aho māyā-balaṁ viṣṇoḥ sneha-baddham idaṁ jagat

श्री शुकदेव जी ने कहा — अदिति द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, कश्यप जी मानो मुस्कुराते हुए बोले — 'अहा, भगवान विष्णु की माया का बल कैसा है, जिससे यह सारा जगत् स्नेह के बन्धन में बँधा हुआ है!'

श्लोक 19 (bhagavata.8.16.19)

क्व देहो भौतिकोऽनात्मा क्व चात्मा प्रकृतेः परः । कस्य के पतिपुत्राद्या मोह एव हि कारणम् ॥ 16.19 ॥

kva deho bhautiko ’nātmā kva cātmā prakṛteḥ paraḥ kasya ke pati-putrādyā moha eva hi kāraṇam

कहाँ यह भौतिक, अनात्म शरीर, और कहाँ प्रकृति से परे आत्मा! फिर 'यह मेरा पति है, यह मेरा पुत्र है' — यह सब सम्बन्ध किसके हैं? यह सब मोह के कारण ही प्रतीत होता है।

श्लोक 20 (bhagavata.8.16.20)

उपतिष्ठस्व पुरुषं भगवन्तं जनार्दनम् । सर्वभूतगुहावासं वासुदेवं जगद्गुरुम् ॥ 16.20 ॥

upatiṣṭhasva puruṣaṁ bhagavantaṁ janārdanam sarva-bhūta-guhā-vāsaṁ vāsudevaṁ jagad-gurum

तुम भगवान पुरुष जनार्दन की, जो समस्त प्राणियों के हृदय-गुफा में निवास करने वाले वासुदेव तथा जगद्गुरु हैं, शरण ग्रहण करो।

श्लोक 21 (bhagavata.8.16.21)

स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पनः । अमोघा भगवद्भक्तिर्नेतरेति मतिर्मम ॥ 16.21 ॥

sa vidhāsyati te kāmān harir dīnānukampanaḥ amoghā bhagavad-bhaktir netareti matir mama

दीनों पर करुणा करने वाले भगवान हरि तुम्हारी कामनाओं को अवश्य पूर्ण करेंगे, क्योंकि भगवद्भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती — यही मेरा मत है, अन्य कोई उपाय इसके समान नहीं है।

श्लोक 22 (bhagavata.8.16.22)

श्रीअदितिरुवाच केनाहं विधिना ब्रह्मन्नुपस्थास्ये जगत्पतिम् । यथा मे सत्यसङ्कल्पो विदध्यात् स मनोरथम् ॥ 16.22 ॥

śrī-aditir uvāca kenāhaṁ vidhinā brahmann upasthāsye jagat-patim yathā me satya-saṅkalpo vidadhyāt sa manoratham

श्री अदिति ने कहा — हे ब्रह्मन्, मैं किस विधि से जगत्पति की उपासना करूँ, जिससे सत्य-संकल्प वाले वे भगवान मेरी मनोकामना पूर्ण कर दें?

श्लोक 23 (bhagavata.8.16.23)

आदिश त्वं द्विजश्रेष्ठ विधिं तदुपधावनम् । आशु तुष्यति मे देवः सीदन्त्याः सह पुत्रकैः ॥ 16.23 ॥

ādiśa tvaṁ dvija-śreṣṭha vidhiṁ tad-upadhāvanam āśu tuṣyati me devaḥ sīdantyāḥ saha putrakaiḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, आप मुझे उनकी उपासना की वह विधि बताइए, जिससे संकट में पड़ी हुई मुझ पर, मेरे पुत्रों सहित, भगवान शीघ्र ही प्रसन्न हो जाएँ।

श्लोक 24 (bhagavata.8.16.24)

श्रीकश्यप उवाच एतन्मे भगवान्पृष्टः प्रजाकामस्य पद्मजः । यदाह ते प्रवक्ष्यामि व्रतं केशवतोषणम् ॥ 16.24 ॥

śrī-kaśyapa uvāca etan me bhagavān pṛṣṭaḥ prajā-kāmasya padmajaḥ yad āha te pravakṣyāmi vrataṁ keśava-toṣaṇam

श्री कश्यप ने कहा — जब मैंने संतान की कामना से कमल-जन्मा ब्रह्मा जी से यही प्रश्न पूछा था, तब उन्होंने जो कहा, वही केशव को संतुष्ट करने वाला व्रत अब मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 25 (bhagavata.8.16.25)

फाल्गुनस्यामले पक्षे द्वादशाहं पयोव्रतम् । अर्चयेदरविन्दाक्षं भक्त्या परमयान्वितः ॥ 16.25 ॥

phālgunasyāmale pakṣe dvādaśāhaṁ payo-vratam arcayed aravindākṣaṁ bhaktyā paramayānvitaḥ

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में बारह दिनों तक 'पयोव्रत' का पालन करते हुए, परम भक्ति-भाव से कमल-नयन भगवान की उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 26 (bhagavata.8.16.26)

सिनीवाल्यां मृदालिप्य स्नायात् क्रोडविदीर्णया । यदि लभ्येत वै स्रोतस्येतं मन्त्रमुदीरयेत् ॥ 16.26 ॥

sinīvālyāṁ mṛdālipya snāyāt kroḍa-vidīrṇayā yadi labhyeta vai srotasy etaṁ mantram udīrayet

अमावस्या के दिन, यदि उपलब्ध हो सके, तो वराह के थूथन से खोदी गई मिट्टी को शरीर पर लगाकर बहते हुए जल में स्नान करना चाहिए, और स्नान करते समय यह मन्त्र बोलना चाहिए।

श्लोक 27 (bhagavata.8.16.27)

त्वं देव्यादिवराहेण रसायाः स्थानमिच्छता । उद्धृतासि नमस्तुभ्यं पाप्मानं मे प्रणाशय ॥ 16.27 ॥

tvaṁ devy ādi-varāheṇa rasāyāḥ sthānam icchatā uddhṛtāsi namas tubhyaṁ pāpmānaṁ me praṇāśaya

'हे देवी, आदि वराह भगवान ने, जो तुम्हें रसातल से एक स्थान देना चाहते थे, तुम्हें ऊपर उठाया था। तुम्हें नमस्कार है — मेरे समस्त पापों का नाश करो।'

श्लोक 28 (bhagavata.8.16.28)

निर्वर्तितात्मनियमो देवमर्चेत् समाहितः । अर्चायां स्थण्डिले सूर्ये जले वह्नौ गुरावपि ॥ 16.28 ॥

nirvartitātma-niyamo devam arcet samāhitaḥ arcāyāṁ sthaṇḍile sūrye jale vahnau gurāv api

अपने दैनिक नियमों को पूर्ण करके, एकाग्रचित्त होकर भगवान की — चाहे वे मूर्ति में हों, वेदी में, सूर्य में, जल में, अग्नि में, अथवा गुरु में — उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 29 (bhagavata.8.16.29)

नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महीयसे । सर्वभूतनिवासाय वासुदेवाय साक्षिणे ॥ 16.29 ॥

namas tubhyaṁ bhagavate puruṣāya mahīyase sarva-bhūta-nivāsāya vāsudevāya sākṣiṇe

'हे भगवन्, हे परम महिमावान पुरुष, हे समस्त प्राणियों के निवासस्थान, हे साक्षी वासुदेव, आपको नमस्कार है।'

श्लोक 30 (bhagavata.8.16.30)

नमोऽव्यक्ताय सूक्ष्माय प्रधानपुरुषाय च । चतुर्विंशद्गुणज्ञाय गुणसङ्ख्यानहेतवे ॥ 16.30 ॥

namo ’vyaktāya sūkṣmāya pradhāna-puruṣāya ca catur-viṁśad-guṇa-jñāya guṇa-saṅkhyāna-hetave

'अव्यक्त, सूक्ष्म, प्रकृति और पुरुष दोनों रूप, चौबीस तत्त्वों के ज्ञाता, तथा सांख्य-दर्शन के प्रवर्तक — आपको नमस्कार है।'

श्लोक 31 (bhagavata.8.16.31)

नमो द्विशीर्ष्णे त्रिपदे चतुःशृङ्गाय तन्तवे । सप्तहस्ताय यज्ञाय त्रयीविद्यात्मने नमः ॥ 16.31 ॥

namo dvi-śīrṣṇe tri-pade catuḥ-śṛṅgāya tantave sapta-hastāya yajñāya trayī-vidyātmane namaḥ

'दो सिरों, तीन पैरों, चार सींगों तथा सात हाथों वाले, यज्ञ-स्वरूप और त्रयी-विद्या (वेद) के आत्मा को नमस्कार है।'

श्लोक 32 (bhagavata.8.16.32)

नमः शिवाय रुद्राय नमः शक्तिधराय च । सर्वविद्याधिपतये भूतानां पतये नमः ॥ 16.32 ॥

namaḥ śivāya rudrāya namaḥ śakti-dharāya ca sarva-vidyādhipataye bhūtānāṁ pataye namaḥ

'शिव और रुद्र-रूप को नमस्कार, शक्ति के धारण करने वाले को नमस्कार, समस्त विद्याओं के अधिपति तथा समस्त प्राणियों के स्वामी को नमस्कार है।'

श्लोक 33 (bhagavata.8.16.33)

नमो हिरण्यगर्भाय प्राणाय जगदात्मने । योगैश्वर्यशरीराय नमस्ते योगहेतवे ॥ 16.33 ॥

namo hiraṇyagarbhāya prāṇāya jagad-ātmane yogaiśvarya-śarīrāya namas te yoga-hetave

'हिरण्यगर्भ, प्राण-स्वरूप, जगत् के आत्मा, योग-ऐश्वर्य के शरीर वाले तथा योग के मूल कारण, आपको नमस्कार है।'

श्लोक 34 (bhagavata.8.16.34)

नमस्त आदिदेवाय साक्षिभूताय ते नमः । नारायणाय ऋषये नराय हरये नमः ॥ 16.34 ॥

namas ta ādi-devāya sākṣi-bhūtāya te namaḥ nārāyaṇāya ṛṣaye narāya haraye namaḥ

'हे आदि-देव, आपको नमस्कार; हे साक्षी-स्वरूप, आपको नमस्कार। नारायण, ऋषि, नर तथा हरि को नमस्कार है।'

श्लोक 35 (bhagavata.8.16.35)

नमो मरकतश्यामवपुषेऽधिगतश्रिये । केशवाय नमस्तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ॥ 16.35 ॥

namo marakata-śyāma- vapuṣe ’dhigata-śriye keśavāya namas tubhyaṁ namas te pīta-vāsase

'मरकत-मणि के समान श्याम शरीर वाले, लक्ष्मी के अधिपति, केशव को नमस्कार है; पीताम्बरधारी आपको नमस्कार है।'

श्लोक 36 (bhagavata.8.16.36)

त्वं सर्ववरदः पुंसां वरेण्य वरदर्षभ । अतस्ते श्रेयसे धीराः पादरेणुमुपासते ॥ 16.36 ॥

tvaṁ sarva-varadaḥ puṁsāṁ vareṇya varadarṣabha atas te śreyase dhīrāḥ pāda-reṇum upāsate

हे वरेण्य, हे वरदाताओं में श्रेष्ठ, आप ही सब मनुष्यों को समस्त वर देने वाले हैं; इसीलिए धीर पुरुष अपने कल्याण हेतु आपके चरणों की धूलि की उपासना करते हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.8.16.37)

अन्ववर्तन्त यं देवाः श्रीश्च तत्पादपद्मयोः । स्पृहयन्त इवामोदं भगवान्मे प्रसीदताम् ॥ 16.37 ॥

anvavartanta yaṁ devāḥ śrīś ca tat-pāda-padmayoḥ spṛhayanta ivāmodaṁ bhagavān me prasīdatām

जिनके चरण-कमलों की सुगन्ध के लिए मानो देवगण और लक्ष्मी भी लालायित होकर उनकी सेवा करते हैं, वे भगवान मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 38 (bhagavata.8.16.38)

एतैर्मन्त्रैर्हृषीकेशमावाहनपुरस्कृतम् । अर्चयेच्छ्रद्धया युक्तः पाद्योपस्पर्शनादिभिः ॥ 16.38 ॥

etair mantrair hṛṣīkeśam āvāhana-puraskṛtam arcayec chraddhayā yuktaḥ pādyopasparśanādibhiḥ

इन मन्त्रों से भगवान हृषीकेश का आवाहन करके, श्रद्धापूर्वक पाद्य आदि अर्पण करते हुए उनकी उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 39 (bhagavata.8.16.39)

अर्चित्वा गन्धमाल्याद्यैः पयसा स्नपयेद् विभुम् । वस्त्रोपवीताभरणपाद्योपस्पर्शनैस्ततः । गन्धधूपादिभिश्चार्चेद्द्वादशाक्षरविद्यया ॥ 16.39 ॥

arcitvā gandha-mālyādyaiḥ payasā snapayed vibhum vastropavītābharaṇa- pādyopasparśanais tataḥ gandha-dhūpādibhiś cārced dvādaśākṣara-vidyayā

चन्दन, माला आदि से पूजा करके भगवान को दूध से स्नान कराना चाहिए, फिर वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण और पाद्य अर्पित कर, द्वादशाक्षर मन्त्र से गन्ध, धूप आदि द्वारा पुनः उनकी अर्चना करनी चाहिए।

श्लोक 40 (bhagavata.8.16.40)

शृतं पयसि नैवेद्यं शाल्यन्नं विभवे सति । ससर्पिः सगुडं दत्त्वा जुहुयान्मूलविद्यया ॥ 16.40 ॥

śṛtaṁ payasi naivedyaṁ śāly-annaṁ vibhave sati sasarpiḥ saguḍaṁ dattvā juhuyān mūla-vidyayā

यदि सामर्थ्य हो, तो दूध में पके हुए चावल को घी और गुड़ के साथ भोग लगाकर, मूल मन्त्र के साथ अग्नि में आहुति देनी चाहिए।

श्लोक 41 (bhagavata.8.16.41)

निवेदितं तद्भक्ताय दद्याद्भुञ्जीत वा स्वयम् । दत्त्वाचमनमर्चित्वा ताम्बूलं च निवेदयेत् ॥ 16.41 ॥

niveditaṁ tad-bhaktāya dadyād bhuñjīta vā svayam dattvācamanam arcitvā tāmbūlaṁ ca nivedayet

अर्पित किया गया वह प्रसाद किसी भक्त को दे देना चाहिए अथवा स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए। तत्पश्चात् आचमन कराकर, पुनः पूजा कर, भगवान को ताम्बूल अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 42 (bhagavata.8.16.42)

जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभिः प्रभुम् । कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेद् दण्डवन्मुदा ॥ 16.42 ॥

japed aṣṭottara-śataṁ stuvīta stutibhiḥ prabhum kṛtvā pradakṣiṇaṁ bhūmau praṇamed daṇḍavan mudā

तब मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करना चाहिए, भगवान की स्तुति करनी चाहिए, प्रदक्षिणा करके प्रसन्नतापूर्वक भूमि पर दण्डवत् प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 43 (bhagavata.8.16.43)

कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवमुद्वासयेत् ततः । द्वयवरान्भोजयेद् विप्रान्पायसेन यथोचितम् ॥ 16.43 ॥

kṛtvā śirasi tac-cheṣāṁ devam udvāsayet tataḥ dvy-avarān bhojayed viprān pāyasena yathocitam

पूजा में शेष रही सामग्री को सिर पर लगाकर भगवान को विदा करना चाहिए, और उसके पश्चात् कम से कम दो ब्राह्मणों को विधिपूर्वक खीर खिलानी चाहिए।

श्लोक 44 (bhagavata.8.16.44)

भुञ्जीत तैरनुज्ञातः सेष्टः शेषं सभाजितैः । ब्रह्मचार्यथ तद्रात्र्यां श्वोभूते प्रथमेऽहनि ॥ 16.44 ॥

bhuñjīta tair anujñātaḥ seṣṭaḥ śeṣaṁ sabhājitaiḥ brahmacāry atha tad-rātryāṁ śvo bhūte prathame ’hani

सम्मानपूर्वक भोजन कराए गए उन ब्राह्मणों की अनुमति लेकर, अपने प्रियजनों सहित शेष प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। उस रात्रि ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, और अगले दिन —

श्लोक 45 (bhagavata.8.16.45)

स्नातः शुचिर्यथोक्तेन विधिना सुसमाहितः । पयसा स्नापयित्वार्चेद् यावद्व्रतसमापनम् ॥ 16.45 ॥

snātaḥ śucir yathoktena vidhinā susamāhitaḥ payasā snāpayitvārced yāvad vrata-samāpanam

— स्नान करके शुद्ध हो, पूर्ण एकाग्रता से पूर्वोक्त विधि के अनुसार भगवान को दूध से स्नान कराकर, व्रत की समाप्ति तक इसी प्रकार पूजा करते रहना चाहिए।

श्लोक 46 (bhagavata.8.16.46)

पयोभक्षो व्रतमिदं चरेद् विष्णवर्चनादृतः । पूर्ववज्जुहुयादग्निं ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥ 16.46 ॥

payo-bhakṣo vratam idaṁ cared viṣṇv-arcanādṛtaḥ pūrvavaj juhuyād agniṁ brāhmaṇāṁś cāpi bhojayet

केवल दूध का सेवन करते हुए, भगवान विष्णु की पूजा में समर्पित होकर इस व्रत का पालन करना चाहिए। पहले की भाँति ही अग्नि में आहुति देनी चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 47 (bhagavata.8.16.47)

एवं त्वहरहः कुर्याद्द्वादशाहं पयोव्रतम् । हरेराराधनं होममर्हणं द्विजतर्पणम् ॥ 16.47 ॥

evaṁ tv ahar ahaḥ kuryād dvādaśāhaṁ payo-vratam harer ārādhanaṁ homam arhaṇaṁ dvija-tarpaṇam

इस प्रकार बारह दिनों तक प्रतिदिन इस पयोव्रत का पालन करते हुए, भगवान हरि की आराधना, हवन, पूजा तथा ब्राह्मणों को संतुष्ट करने का कार्य करते रहना चाहिए।

श्लोक 48 (bhagavata.8.16.48)

प्रतिपद्दिनमारभ्य यावच्छुक्लत्रयोदशीम् । ब्रह्मचर्यमधःस्वप्नं स्नानं त्रिषवणं चरेत् ॥ 16.48 ॥

pratipad-dinam ārabhya yāvac chukla-trayodaśīm brahmacaryam adhaḥ-svapnaṁ snānaṁ tri-ṣavaṇaṁ caret

प्रतिपदा से लेकर शुक्ल त्रयोदशी तक, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, भूमि पर सोते हुए, तथा दिन में तीन बार स्नान करते हुए यह व्रत करना चाहिए।

श्लोक 49 (bhagavata.8.16.49)

वर्जयेदसदालापं भोगानुच्चावचांस्तथा । अहिंस्रः सर्वभूतानां वासुदेवपरायणः ॥ 16.49 ॥

varjayed asad-ālāpaṁ bhogān uccāvacāṁs tathā ahiṁsraḥ sarva-bhūtānāṁ vāsudeva-parāyaṇaḥ

निरर्थक वार्तालाप तथा उच्च-नीच सभी प्रकार के भोगों का त्याग करना चाहिए, समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसा का पालन करना चाहिए, और पूर्णतः वासुदेव के प्रति समर्पित रहना चाहिए।

श्लोक 50 (bhagavata.8.16.50)

त्रयोदश्यामथो विष्णोः स्नपनं पञ्चकैर्विभोः । कारयेच्छास्त्रदृष्टेन विधिना विधिकोविदैः ॥ 16.50 ॥

trayodaśyām atho viṣṇoḥ snapanaṁ pañcakair vibhoḥ kārayec chāstra-dṛṣṭena vidhinā vidhi-kovidaiḥ

तेरहवें दिन, शास्त्रों में बताई गई विधि जानने वाले विद्वानों की सहायता से, शास्त्रोक्त विधि के अनुसार भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 51 (bhagavata.8.16.51)

पूजां च महतीं कुर्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः । चरुं निरूप्य पयसि शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ 16.51 ॥

pūjāṁ ca mahatīṁ kuryād vitta-śāṭhya-vivarjitaḥ caruṁ nirūpya payasi śipiviṣṭāya viṣṇave

धन के प्रति कोई कंजूसी न रखते हुए, भगवान विष्णु की भव्य पूजा करनी चाहिए, और उन सर्वव्यापी भगवान के लिए दूध में पकाया गया चरु तैयार करना चाहिए।

श्लोक 52 (bhagavata.8.16.52)

सूक्तेन तेन पुरुषं यजेत सुसमाहितः । नैवेद्यं चातिगुणवद् दद्यात्पुरुषतुष्टिदम् ॥ 16.52 ॥

sūktena tena puruṣaṁ yajeta susamāhitaḥ naivedyaṁ cātiguṇavad dadyāt puruṣa-tuṣṭidam

पूर्ण एकाग्रता से पुरुष-सूक्त द्वारा उस परम पुरुष की पूजा करनी चाहिए, तथा उन्हें प्रसन्न करने वाला अत्यंत उत्तम स्वाद वाला भोग अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 53 (bhagavata.8.16.53)

आचार्यं ज्ञानसम्पन्नं वस्त्राभरणधेनुभिः । तोषयेदृत्विजश्चैव तद्विद्ध्याराधनं हरेः ॥ 16.53 ॥

ācāryaṁ jñāna-sampannaṁ vastrābharaṇa-dhenubhiḥ toṣayed ṛtvijaś caiva tad viddhy ārādhanaṁ hareḥ

ज्ञान-सम्पन्न आचार्य को तथा यज्ञ करने वाले पुरोहितों को वस्त्र, आभूषण और गौएँ देकर संतुष्ट करना चाहिए — यही भगवान हरि की सच्ची आराधना समझनी चाहिए।

श्लोक 54 (bhagavata.8.16.54)

भोजयेत् तान्गुणवता सदन्नेन शुचिस्मिते । अन्यांश्च ब्राह्मणाञ्छक्त्या ये च तत्र समागताः ॥ 16.54 ॥

bhojayet tān guṇavatā sad-annena śuci-smite anyāṁś ca brāhmaṇāñ chaktyā ye ca tatra samāgatāḥ

हे निर्मल मुस्कान वाली, उन्हें उत्तम गुणों से युक्त शुद्ध भोजन कराना चाहिए, और वहाँ उपस्थित अन्य ब्राह्मणों को भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 55 (bhagavata.8.16.55)

दक्षिणां गुरवे दद्यादृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः । अन्नाद्येनाश्वपाकांश्च प्रीणयेत्समुपागतान् ॥ 16.55 ॥

dakṣiṇāṁ gurave dadyād ṛtvigbhyaś ca yathārhataḥ annādyenāśva-pākāṁś ca prīṇayet samupāgatān

गुरु तथा पुरोहितों को यथोचित दक्षिणा देनी चाहिए, और वहाँ आए हुए, यहाँ तक कि निम्नतम वर्ग के लोगों को भी, अन्न-भोजन देकर संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 56 (bhagavata.8.16.56)

भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्धकृपणादिषु । विष्णोस्तत्प्रीणनं विद्वान्भुञ्जीत सह बन्धुभिः ॥ 16.56 ॥

bhuktavatsu ca sarveṣu dīnāndha-kṛpaṇādiṣu viṣṇos tat prīṇanaṁ vidvān bhuñjīta saha bandhubhiḥ

जब निर्धन, अंधे और असहाय आदि सभी भोजन कर चुकें, तब यह जानते हुए कि यही भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, विद्वान पुरुष अपने बन्धु-बान्धवों सहित भोजन ग्रहण करे।

श्लोक 57 (bhagavata.8.16.57)

नृत्यवादित्रगीतैश्च स्तुतिभिः स्वस्तिवाचकैः । कारयेत्तत्कथाभिश्च पूजां भगवतोऽन्वहम् ॥ 16.57 ॥

nṛtya-vāditra-gītaiś ca stutibhiḥ svasti-vācakaiḥ kārayet tat-kathābhiś ca pūjāṁ bhagavato ’nvaham

नृत्य, वाद्य, गीत, स्तुतियों, मंगल-वचनों तथा भगवान की कथाओं के साथ, प्रतिदिन भगवान की पूजा सम्पन्न करनी चाहिए।

श्लोक 58 (bhagavata.8.16.58)

एतत्पयोव्रतं नाम पुरुषाराधनं परम् । पितामहेनाभिहितं मया ते समुदाहृतम् ॥ 16.58 ॥

etat payo-vrataṁ nāma puruṣārādhanaṁ param pitāmahenābhihitaṁ mayā te samudāhṛtam

यही पयोव्रत नामक परम पुरुष की सर्वोच्च आराधना है, जिसे मेरे पितामह ब्रह्मा ने मुझे बताया था, और मैंने उसी को तुम्हें विस्तार से सुना दिया है।

श्लोक 59 (bhagavata.8.16.59)

त्वं चानेन महाभागे सम्यक्चीर्णेन केशवम् । आत्मना शुद्धभावेन नियतात्मा भजाव्ययम् ॥ 16.59 ॥

tvaṁ cānena mahā-bhāge samyak cīrṇena keśavam ātmanā śuddha-bhāvena niyatātmā bhajāvyayam

हे परम सौभाग्यशालिनी, इसी व्रत का भली-भाँति पालन करते हुए, संयमित मन तथा शुद्ध भाव से अविनाशी केशव की उपासना करो।

श्लोक 60 (bhagavata.8.16.60)

अयं वै सर्वयज्ञाख्यः सर्वव्रतमिति स्मृतम् । तपःसारमिदं भद्रे दानं चेश्वरतर्पणम् ॥ 16.60 ॥

ayaṁ vai sarva-yajñākhyaḥ sarva-vratam iti smṛtam tapaḥ-sāram idaṁ bhadre dānaṁ ceśvara-tarpaṇam

हे कल्याणी, यही व्रत 'सर्व-यज्ञ' और 'सर्व-व्रत' कहलाता है — यही समस्त तपस्याओं का सार है, और यही ईश्वर को तृप्त करने वाला सच्चा दान भी है।

श्लोक 61 (bhagavata.8.16.61)

त एव नियमाः साक्षात्त एव च यमोत्तमाः । तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षजः ॥ 16.61 ॥

ta eva niyamāḥ sākṣāt ta eva ca yamottamāḥ tapo dānaṁ vrataṁ yajño yena tuṣyaty adhokṣajaḥ

वही साक्षात् सच्चा नियम है, वही श्रेष्ठतम संयम है, वही तप है, वही दान है, वही व्रत है, और वही यज्ञ है — जिसके द्वारा इन्द्रियातीत भगवान अधोक्षज संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 62 (bhagavata.8.16.62)

तस्मादेतद्व्रतं भद्रे प्रयता श्रद्धयाचर । भगवान्परितुष्टस्ते वरानाशु विधास्यति ॥ 16.62 ॥

tasmād etad vrataṁ bhadre prayatā śraddhayācara bhagavān parituṣṭas te varān āśu vidhāsyati

अतः हे कल्याणी, संयमपूर्वक श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करो। इससे प्रसन्न होकर भगवान शीघ्र ही तुम्हें मनवांछित वर प्रदान करेंगे।

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