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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20

बलि महाराज तीनों लोकों का दान करते हैं

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (bhagavata.8.20.1)

श्रीशुक उवाच बलिरेवं गृहपतिः कुलाचार्येण भाषितः । तूष्णीं भूत्वा क्षणं राजन्नुवाचावहितो गुरुम् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca balir evaṁ gṛha-patiḥ kulācāryeṇa bhāṣitaḥ tūṣṇīṁ bhūtvā kṣaṇaṁ rājann uvācāvahito gurum

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन, कुलाचार्य द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर गृहस्थाश्रमी बलि क्षणभर मौन रहे, फिर सम्यक् विचार कर अपने गुरु से यह कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.8.20.2)

श्रीबलिरुवाच सत्यं भगवता प्रोक्तं धर्मोऽयं गृहमेधिनाम् । अर्थं कामं यशो वृत्तिं यो न बाधेत कर्हिचित् ॥ २ ॥

śrī-balir uvāca satyaṁ bhagavatā proktaṁ dharmo ’yaṁ gṛhamedhinām arthaṁ kāmaṁ yaśo vṛttiṁ yo na bādheta karhicit

श्री बलि ने कहा — आपने जो कहा वह सत्य है — यह गृहस्थों का धर्म है, जो कभी अर्थ, काम, यश और आजीविका में बाधा न डाले।

श्लोक 3 (bhagavata.8.20.3)

स चाहं वित्तलोभेन प्रत्याचक्षे कथं द्विजम् । प्रतिश्रुत्य ददामीति प्राह्रादिः कितवो यथा ॥ ३ ॥

sa cāhaṁ vitta-lobhena pratyācakṣe kathaṁ dvijam pratiśrutya dadāmīti prāhrādiḥ kitavo yathā

किंतु धन के लोभ से मैं, प्रह्लाद का पौत्र होकर, किसी साधारण ठग की भाँति ब्राह्मण को दिया वचन कैसे तोड़ सकता हूँ, यह कहकर कि 'मैं दूँगा'?

श्लोक 4 (bhagavata.8.20.4)

न ह्यसत्यात् परोऽधर्म इति होवाच भूरियम् । सर्वं सोढुमलं मन्ये ऋतेऽलीकपरं नरम् ॥ ४ ॥

na hy asatyāt paro ’dharma iti hovāca bhūr iyam sarvaṁ soḍhum alaṁ manye ṛte ’līka-paraṁ naram

असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है — इस विषय में स्वयं पृथ्वी ने ही कहा है कि वह हर भार सह सकती है, केवल घोर झूठे मनुष्य को छोड़कर।

श्लोक 5 (bhagavata.8.20.5)

नाहं बिभेमि निरयान्नाधन्यादसुखार्णवात् । न स्थानच्यवनान्मृत्योर्यथा विप्रप्रलम्भनात् ॥ ५ ॥

nāhaṁ bibhemi nirayān nādhanyād asukhārṇavāt na sthāna-cyavanān mṛtyor yathā vipra-pralambhanāt

मुझे नरक से, दरिद्रता से, दुःखों के सागर से, अपने पद से गिरने से, अथवा मृत्यु से भी उतना भय नहीं है, जितना किसी ब्राह्मण को छलने से है।

श्लोक 6 (bhagavata.8.20.6)

यद् यद्धास्यति लोकेऽस्मिन्सम्परेतं धनादिकम् । तस्य त्यागे निमित्तं किं विप्रस्तुष्येन्न तेन चेत् ॥ ६ ॥

yad yad dhāsyati loke ’smin samparetaṁ dhanādikam tasya tyāge nimittaṁ kiṁ vipras tuṣyen na tena cet

इस लोक में जो धन-संपत्ति मृत्यु के समय व्यक्ति को छोड़ ही देगी, उसे त्यागने में क्या हानि है, यदि उससे यह ब्राह्मण संतुष्ट न भी हो?

श्लोक 7 (bhagavata.8.20.7)

श्रेयः कुर्वन्ति भूतानां साधवो दुस्त्यजासुभिः । दध्यङ्शिबिप्रभृतयः को विकल्पो धरादिषु ॥ ७ ॥

śreyaḥ kurvanti bhūtānāṁ sādhavo dustyajāsubhiḥ dadhyaṅ-śibi-prabhṛtayaḥ ko vikalpo dharādiṣu

साधुजन दधीचि, शिबि आदि की भाँति अपने कठिनतम त्याज्य प्राणों तक से प्राणिमात्र का कल्याण करते हैं; फिर पृथ्वी जैसी वस्तु देने में क्या दुविधा हो सकती है?

श्लोक 8 (bhagavata.8.20.8)

यैरियं बुभुजे ब्रह्मन्दैत्येन्द्रैरनिवर्तिभिः । तेषां कालोऽग्रसील्लोकान् न यशोऽधिगतं भुवि ॥ ८ ॥

yair iyaṁ bubhuje brahman daityendrair anivartibhiḥ teṣāṁ kālo ’grasīl lokān na yaśo ’dhigataṁ bhuvi

हे ब्रह्मन्, जिन अपराजित दैत्येंद्रों ने इस पृथ्वी को भोगा, काल ने उनसे सब कुछ छीन लिया — केवल उनका यश ही इस लोक में शेष रह गया।

श्लोक 9 (bhagavata.8.20.9)

सुलभा युधि विप्रर्षे ह्यनिवृत्तास्तनुत्यजः । न तथा तीर्थ आयाते श्रद्धया ये धनत्यजः ॥ ९ ॥

sulabhā yudhi viprarṣe hy anivṛttās tanu-tyajaḥ na tathā tīrtha āyāte śraddhayā ye dhana-tyajaḥ

हे विप्रर्षे, युद्धभूमि में प्राण त्यागने वाले अडिग वीर तो सहज ही मिल जाते हैं, परंतु किसी तीर्थ-स्वरूप महापुरुष के आगमन पर श्रद्धापूर्वक धन त्यागने वाले विरले ही होते हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.8.20.10)

मनस्विनः कारुणिकस्य शोभनं यदर्थिकामोपनयेन दुर्गतिः । कुतः पुनर्ब्रह्मविदां भवादृशां ततो वटोरस्य ददामि वाञ्छितम् ॥ १० ॥

manasvinaḥ kāruṇikasya śobhanaṁ yad arthi-kāmopanayena durgatiḥ kutaḥ punar brahma-vidāṁ bhavādṛśāṁ tato vaṭor asya dadāmi vāñchitam

उदार और करुणाशील पुरुष के लिए यह शोभनीय ही है कि याचक की इच्छा पूर्ण करते हुए उसे दरिद्रता का सामना करना पड़े — फिर आप जैसे ब्रह्मवेत्ता के लिए तो कहना ही क्या; अतः मैं इस वटु को इसकी वांछित वस्तु अवश्य दूँगा।

श्लोक 11 (bhagavata.8.20.11)

यजन्ति यज्ञंक्रतुभिर्यमादृता भवन्त आम्नायविधानकोविदाः । स एव विष्णुर्वरदोऽस्तु वा परो दास्याम्यमुष्मै क्षितिमीप्सितां मुने ॥ ११ ॥

yajanti yajñaṁ kratubhir yam ādṛtā bhavanta āmnāya-vidhāna-kovidāḥ sa eva viṣṇur varado ’stu vā paro dāsyāmy amuṣmai kṣitim īpsitāṁ mune

आप जैसे वेदविधि के ज्ञाता जिस यज्ञपुरुष की श्रद्धापूर्वक विविध क्रतुओं से पूजा करते हैं, वे ही साक्षात् विष्णु हैं — चाहे वे वरदाता बनकर आए हों या शत्रु बनकर, हे मुने, मैं तो उन्हें उनकी इच्छित भूमि दूँगा ही।

श्लोक 12 (bhagavata.8.20.12)

यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् । तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥

yadyapy asāv adharmeṇa māṁ badhnīyād anāgasam tathāpy enaṁ na hiṁsiṣye bhītaṁ brahma-tanuṁ ripum

यदि वे अधर्मपूर्वक भी मुझ निर्दोष को बाँध लें, तब भी मैं भयभीत होकर ब्राह्मण-रूप धारण किए हुए इस शत्रु की हिंसा नहीं करूँगा।

श्लोक 13 (bhagavata.8.20.13)

एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः । हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥

eṣa vā uttamaśloko na jihāsati yad yaśaḥ hatvā maināṁ hared yuddhe śayīta nihato mayā

यदि यह उत्तमश्लोक भगवान स्वयं हैं, तो अपने यश को त्यागना नहीं चाहेंगे — या तो युद्ध में यह मुझसे यह भूमि छीनकर मुझे मारकर ले जाएँगे, या फिर मेरे हाथों मारे जाकर गिरेंगे।

श्लोक 14 (bhagavata.8.20.14)

श्रीशुक उवाच एवमश्रद्धितं शिष्यमनादेशकरं गुरुः । शशाप दैवप्रहितः सत्यसन्धं मनस्विनम् ॥ १४ ॥

śrī-śuka uvāca evam aśraddhitaṁ śiṣyam anādeśakaraṁ guruḥ śaśāpa daiva-prahitaḥ satya-sandhaṁ manasvinam

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार अपने गुरु के आदेश की अवहेलना करने वाले, श्रद्धाहीन किंतु सत्यनिष्ठ, उदारचेता उस शिष्य को दैवप्रेरित होकर गुरु ने शाप दे दिया।

श्लोक 15 (bhagavata.8.20.15)

दृढं पण्डितमान्यज्ञः स्तब्धोऽस्यस्मदुपेक्षया । मच्छासनातिगो यस्त्वमचिराद्भ्रश्यसे श्रियः ॥ १५ ॥

dṛḍhaṁ paṇḍita-māny ajñaḥ stabdho ’sy asmad-upekṣayā mac-chāsanātigo yas tvam acirād bhraśyase śriyaḥ

'तूने अपने को दृढ़ता से पंडित मानकर हमारी उपेक्षा की है, यद्यपि तू मूर्ख ही है और अहंकारी हो गया है। मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाला तू शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य से च्युत हो जाएगा।'

श्लोक 16 (bhagavata.8.20.16)

एवं शप्तः स्वगुरुणा सत्यान्न चलितो महान् । वामनाय ददावेनामर्चित्वोदकपूर्वकम् ॥ १६ ॥

evaṁ śaptaḥ sva-guruṇā satyān na calito mahān vāmanāya dadāv enām arcitvodaka-pūrvakam

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार अपने ही गुरु द्वारा शापित होने पर भी वह महापुरुष सत्य से विचलित नहीं हुआ, और जल के साथ पूजा कर उसने वह भूमि वामन को अर्पित कर दी।

श्लोक 17 (bhagavata.8.20.17)

विन्ध्यावलिस्तदागत्य पत्नी जालकमालिनी । आनिन्ये कलशं हैममवनेजन्यपां भृतम् ॥ १७ ॥

vindhyāvalis tadāgatya patnī jālaka-mālinī āninye kalaśaṁ haimam avanejany-apāṁ bhṛtam

उस समय उनकी पत्नी विंध्यावली, जो मोतियों की माला पहने हुए थी, वहाँ आई और चरण धोने के लिए जल से भरा एक स्वर्ण-कलश लेकर आई।

श्लोक 18 (bhagavata.8.20.18)

यजमानः स्वयं तस्य श्रीमत् पादयुगं मुदा । अवनिज्यावहन्मूर्ध्नि तदपो विश्वपावनीः ॥ १८ ॥

yajamānaḥ svayaṁ tasya śrīmat pāda-yugaṁ mudā avanijyāvahan mūrdhni tad apo viśva-pāvanīḥ

यजमान बलि ने स्वयं अत्यंत हर्ष से उनके सुंदर चरण-युगल को पखार कर उस विश्व-पावन जल को अपने मस्तक पर धारण किया।

श्लोक 19 (bhagavata.8.20.19)

तदासुरेन्द्रं दिवि देवतागणा गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः । तत्कर्म सर्वेऽपि गृणन्त आर्जवं प्रसूनवर्षैर्ववृषुर्मुदान्विताः ॥ १९ ॥

tadāsurendraṁ divi devatā-gaṇā gandharva-vidyādhara-siddha-cāraṇāḥ tat karma sarve ’pi gṛṇanta ārjavaṁ prasūna-varṣair vavṛṣur mudānvitāḥ

उस समय स्वर्ग में देवगण, गंधर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण — सभी उस असुरेंद्र के इस सरल कर्म की सराहना करते हुए प्रसन्नतापूर्वक पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 20 (bhagavata.8.20.20)

नेदुर्मुहुर्दुन्दुभयः सहस्रशो गन्धर्वकिम्पूरुषकिन्नरा जगुः । मनस्विनानेन कृतं सुदुष्करं विद्वानदाद् यद् रिपवे जगत्त्रयम् ॥ २० ॥

nedur muhur dundubhayaḥ sahasraśo gandharva-kimpūruṣa-kinnarā jaguḥ manasvinānena kṛtaṁ suduṣkaraṁ vidvān adād yad ripave jagat-trayam

सहस्रों दुंदुभियाँ बार-बार बज उठीं, गंधर्व, किंपुरुष और किन्नर गा उठे — 'इस विद्वान महापुरुष ने कैसा दुष्कर कार्य किया, जिसने अपने शत्रु को ही तीनों लोक दान कर दिए!'

श्लोक 21 (bhagavata.8.20.21)

तद् वामनं रूपमवर्धताद्भुतं हरेरनन्तस्य गुणत्रयात्मकम् । भूः खं दिशो द्यौर्विवराः पयोधय- स्तिर्यङ्नृदेवा ऋषयो यदासत ॥ २१ ॥

tad vāmanaṁ rūpam avardhatādbhutaṁ harer anantasya guṇa-trayātmakam bhūḥ khaṁ diśo dyaur vivarāḥ payodhayas tiryaṅ-nṛ-devā ṛṣayo yad-āsata

फिर वह अद्भुत वामन-रूप बढ़ने लगा — त्रिगुणात्मक अनंत हरि का वह रूप, जिसमें पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, विवर, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषिगण — सभी समा गए।

श्लोक 22 (bhagavata.8.20.22)

काये बलिस्तस्य महाविभूतेः सहर्त्विगाचार्यसदस्य एतत् । ददर्श विश्वं त्रिगुणं गुणात्मके भूतेन्द्रियार्थाशयजीवयुक्तम् ॥ २२ ॥

kāye balis tasya mahā-vibhūteḥ sahartvig-ācārya-sadasya etat dadarśa viśvaṁ tri-guṇaṁ guṇātmake bhūtendriyārthāśaya-jīva-yuktam

उन ऐश्वर्यशाली भगवान के उस शरीर में बलि ने, अपने ऋत्विजों, आचार्यों और सभासदों सहित, त्रिगुणमय समस्त विश्व को — भूत, इंद्रिय, विषय, मन-बुद्धि-अहंकार और जीवों सहित — प्रत्यक्ष देखा।

श्लोक 23 (bhagavata.8.20.23)

रसामचष्टाङ्घ्रितलेऽथ पादयो- र्महीं महीध्रान्पुरुषस्य जङ्घयोः । पतत्त्रिणो जानुनि विश्वमूर्ते- रूर्वोर्गणं मारुतमिन्द्रसेनः ॥ २३ ॥

rasām acaṣṭāṅghri-tale ’tha pādayor mahīṁ mahīdhrān puruṣasya jaṅghayoḥ patattriṇo jānuni viśva-mūrter ūrvor gaṇaṁ mārutam indrasenaḥ

इंद्र का पद पाए हुए बलि ने विश्वरूप उस पुरुष के तलवों में पाताल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षियों को, तथा जंघाओं में वायु-समूहों को देखा।

श्लोक 24 (bhagavata.8.20.24)

सन्ध्यां विभोर्वाससि गुह्य ऐक्षत् प्रजापतीञ्जघने आत्ममुख्यान् । नाभ्यां नभः कुक्षिषु सप्तसिन्धू- नुरुक्रमस्योरसि चर्क्षमालाम् ॥ २४ ॥

sandhyāṁ vibhor vāsasi guhya aikṣat prajāpatīñ jaghane ātma-mukhyān nābhyāṁ nabhaḥ kukṣiṣu sapta-sindhūn urukramasyorasi carkṣa-mālām

उन प्रभु के वस्त्र में उसने संध्या को, उनके गुह्य अंग में समस्त प्रजापतियों को, कटि में अपने सहित मंत्रियों को, नाभि में आकाश को, उदर में सातों समुद्रों को, तथा उरुक्रम के वक्षस्थल पर नक्षत्रमाला को देखा।

श्लोक 25 (bhagavata.8.20.25)

हृद्यङ्ग धर्मं स्तनयोर्मुरारे- र्ऋतं च सत्यं च मनस्यथेन्दुम् । श्रियं च वक्षस्यरविन्दहस्तां कण्ठे च सामानि समस्तरेफान् ॥ २५ ॥

hṛdy aṅga dharmaṁ stanayor murārer ṛtaṁ ca satyaṁ ca manasy athendum śriyaṁ ca vakṣasy aravinda-hastāṁ kaṇṭhe ca sāmāni samasta-rephān

हे राजन, उस मुरारि के हृदय में धर्म, स्तनों पर सत्य और प्रिय वाणी, मन में चंद्रमा, वक्षस्थल पर कमलहस्ता लक्ष्मी, तथा कंठ में सामवेद के समस्त स्वर उसने देखे।

श्लोक 26 (bhagavata.8.20.26)

इन्द्रप्रधानानमरान्भुजेषु तत्कर्णयोः ककुभो द्यौश्च मूर्ध्नि । केशेषु मेघाञ्छ्वसनं नासिकाया- मक्ष्णोश्च सूर्यं वदने च वह्निम् ॥ २६ ॥

indra-pradhānān amarān bhujeṣu tat-karṇayoḥ kakubho dyauś ca mūrdhni keśeṣu meghāñ chvasanaṁ nāsikāyām akṣṇoś ca sūryaṁ vadane ca vahnim

इंद्र-प्रमुख देवगण उनकी भुजाओं में, दिशाएँ उनके कानों में, स्वर्ग उनके मस्तक पर, मेघ उनके केशों में, वायु उनकी नासिका में, सूर्य उनके नेत्रों में, और अग्नि उनके मुख में — यह सब उसने देखा।

श्लोक 27 (bhagavata.8.20.27)

वाण्यां च छन्दांसि रसे जलेशं भ्रुवोर्निषेधं च विधिं च पक्ष्मसु । अहश्च रात्रिं च परस्य पुंसो मन्युं ललाटेऽधर एव लोभम् ॥ २७ ॥

vāṇyāṁ ca chandāṁsi rase jaleśaṁ bhruvor niṣedhaṁ ca vidhiṁ ca pakṣmasu ahaś ca rātriṁ ca parasya puṁso manyuṁ lalāṭe ’dhara eva lobham

उनकी वाणी में वेदमंत्र, जिह्वा में जलदेवता वरुण, भौंहों में निषेध और पलकों में विधि, तथा उस परम पुरुष के दिन और रात, ललाट पर क्रोध और अधरों पर लोभ को उसने देखा।

श्लोक 28 (bhagavata.8.20.28)

स्पर्शे च कामं नृप रेतसाम्भः पृष्ठे त्वधर्मं क्रमणेषु यज्ञम् । छायासु मृत्युं हसिते च मायां तनूरुहेष्वोषधिजातयश्च ॥ २८ ॥

sparśe ca kāmaṁ nṛpa retasāmbhaḥ pṛṣṭhe tv adharmaṁ kramaṇeṣu yajñam chāyāsu mṛtyuṁ hasite ca māyāṁ tanū-ruheṣv oṣadhi-jātayaś ca

हे राजन, उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ पर अधर्म, पगों में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हास्य में माया, और शरीर के रोमों में समस्त औषधियाँ उसने देखी।

श्लोक 29 (bhagavata.8.20.29)

नदीश्च नाडीषु शिला नखेषु बुद्धावजं देवगणानृषींश्च । प्राणेषु गात्रे स्थिरजङ्गमानि सर्वाणि भूतानि ददर्श वीरः ॥ २९ ॥

nadīś ca nāḍīṣu śilā nakheṣu buddhāv ajaṁ deva-gaṇān ṛṣīṁś ca prāṇeṣu gātre sthira-jaṅgamāni sarvāṇi bhūtāni dadarśa vīraḥ

नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ, बुद्धि में ब्रह्मा, देवगण और ऋषिगण, तथा प्राणों और अंगों में स्थावर-जंगम सभी प्राणियों को — उस वीर बलि ने देखा।

श्लोक 30 (bhagavata.8.20.30)

सर्वात्मनीदं भुवनं निरीक्ष्य सर्वेऽसुराः कश्मलमापुरङ्ग । सुदर्शनं चक्रमसह्यतेजो धनुश्च शार्ङ्गं स्तनयित्नुघोषम् ॥ ३० ॥

sarvātmanīdaṁ bhuvanaṁ nirīkṣya sarve ’surāḥ kaśmalam āpur aṅga sudarśanaṁ cakram asahya-tejo dhanuś ca śārṅgaṁ stanayitnu-ghoṣam

हे राजन्, उस सर्वात्मा में इस समूचे विश्व को देखकर सभी असुर विषाद से भर उठे, जब उन्होंने असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्र और मेघ-गर्जन जैसी ध्वनि करते शार्ंग धनुष को देखा।

श्लोक 31 (bhagavata.8.20.31)

पर्जन्यघोषो जलजः पाञ्चजन्यः कौमोदकी विष्णुगदा तरस्विनी । विद्याधरोऽसिः शतचन्द्रयुक्त- स्तूणोत्तमावक्षयसायकौ च ॥ ३१ ॥

parjanya-ghoṣo jalajaḥ pāñcajanyaḥ kaumodakī viṣṇu-gadā tarasvinī vidyādharo ’siḥ śata-candra-yuktas tūṇottamāv akṣayasāyakau ca

मेघ के समान गर्जना करने वाला शंख पांचजन्य, वेगवती गदा कौमोदकी, सैकड़ों चंद्राकार चिह्नोंवाली विद्याधर नामक तलवार-ढाल, और अक्षयसायक नामक श्रेष्ठ तूणीर — ये सभी वहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 32 (bhagavata.8.20.32)

सुनन्दमुख्या उपतस्थुरीशं पार्षदमुख्याः सहलोकपालाः । स्फुरत्किरीटाङ्गदमीनकुण्डलः श्रीवत्सरत्नोत्तममेखलाम्बरैः ॥ ३२ ॥

sunanda-mukhyā upatasthur īśaṁ pārṣada-mukhyāḥ saha-loka-pālāḥ sphurat-kirīṭāṅgada-mīna-kuṇḍalaḥ śrīvatsa-ratnottama-mekhalāmbaraiḥ

सुनंद आदि प्रमुख पार्षद, समस्त लोकपालों सहित, उस ईश्वर की स्तुति में उपस्थित हुए, जो दीप्त मुकुट, बाजूबंद और मीनाकार कुंडलों से, श्रीवत्स और उत्तम कौस्तुभमणि, करधनी और वस्त्रों से सुशोभित थे।

श्लोक 33 (bhagavata.8.20.33)

मधुव्रतस्रग्वनमालयावृतो रराज राजन्भगवानुरुक्रमः । क्षितिं पदैकेन बलेर्विचक्रमे नभः शरीरेण दिशश्च बाहुभिः ॥ ३३ ॥

madhuvrata-srag-vanamālayāvṛto rarāja rājan bhagavān urukramaḥ kṣitiṁ padaikena baler vicakrame nabhaḥ śarīreṇa diśaś ca bāhubhiḥ

हे राजन, मधुर गुंजार करते भ्रमरों से युक्त वनमाला से आवृत वे उरुक्रम भगवान ऐसे सुशोभित हुए; और एक ही पग से उन्होंने बलि की समूची पृथ्वी को, अपने शरीर से आकाश को, तथा अपनी भुजाओं से समस्त दिशाओं को व्याप्त कर लिया।

श्लोक 34 (bhagavata.8.20.34)

पदं द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपं न वै तृतीयाय तदीयमण्वपि । उरुक्रमस्याङ्घ्रिरुपर्युपर्यथो महर्जनाभ्यां तपसः परं गतः ॥ ३४ ॥

padaṁ dvitīyaṁ kramatas triviṣṭapaṁ na vai tṛtīyāya tadīyam aṇv api urukramasyāṅghrir upary upary atho mahar-janābhyāṁ tapasaḥ paraṁ gataḥ

दूसरे पग से उन्होंने संपूर्ण स्वर्गलोक को नाप लिया, और तीसरे पग के लिए उनका अपना तनिक स्थान भी शेष न रहा — उरुक्रम का वह चरण महर्लोक और जनलोक को लांघकर तपोलोक से भी परे चला गया।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21