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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22

बलि महाराज अपना जीवन समर्पित करते हैं

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (bhagavata.8.22.1)

श्रीशुक उवाच एवं विप्रकृतो राजन् बलिर्भगवतासुरः । भिद्यमानोऽप्यभिन्नात्मा प्रत्याहाविक्लवं वचः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ viprakṛto rājan balir bhagavatāsuraḥ bhidyamāno ’py abhinnātmā pratyāhāviklavaṁ vacaḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन्, भगवान द्वारा इस प्रकार कष्ट में डाले जाने पर भी असुरराज बलि अपने मन में विचलित नहीं हुए, और अविचलित होकर उन्होंने यह वचन कहे।

श्लोक 2 (bhagavata.8.22.2)

श्रीबलिरुवाच यद्युत्तमश्लोक भवान् ममेरितं वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते । करोम्यृतं तन्न भवेत् प्रलम्भनं पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम् ॥ २ ॥

śrī-balir uvāca yady uttamaśloka bhavān mameritaṁ vaco vyalīkaṁ sura-varya manyate karomy ṛtaṁ tan na bhavet pralambhanaṁ padaṁ tṛtīyaṁ kuru śīrṣṇi me nijam

श्री बलि ने कहा — हे उत्तमश्लोक, हे देवश्रेष्ठ, यदि आप मेरे इस वचन को असत्य मानते हैं, तो मैं उसे सत्य कर दिखाऊँगा — यह छल कभी नहीं होगा; आप अपना तीसरा चरण मेरे मस्तक पर ही रख दीजिए।

श्लोक 3 (bhagavata.8.22.3)

बिभेमि नाहं निरयात् पदच्युतो न पाशबन्धाद् व्यसनाद् दुरत्ययात् । नैवार्थकृच्छ्राद् भवतो विनिग्रहा- दसाधुवादाद् भृशमुद्विजे यथा ॥ ३ ॥

bibhemi nāhaṁ nirayāt pada-cyuto na pāśa-bandhād vyasanād duratyayāt naivārtha-kṛcchrād bhavato vinigrahād asādhu-vādād bhṛśam udvije yathā

मुझे न तो अपने पद से च्युत होने का, न नरक का, न बंधन का, न असह्य विपत्ति का, न ही धन-हानि अथवा आपके इस दंड का भय है — जितना अपयश पाने का भय मुझे अत्यंत विचलित करता है।

श्लोक 4 (bhagavata.8.22.4)

पुंसां श्लाघ्यतमं मन्ये दण्डमर्हत्तमार्पितम् । यं न माता पिता भ्राता सुहृदश्चादिशन्ति हि ॥ ४ ॥

puṁsāṁ ślāghyatamaṁ manye daṇḍam arhattamārpitam yaṁ na mātā pitā bhrātā suhṛdaś cādiśanti hi

किसी भी पूजनीयतम पुरुष द्वारा दिया गया दंड मैं मनुष्यों के लिए सबसे अधिक प्रशंसनीय मानता हूँ — ऐसा दंड जो माता, पिता, भाई या मित्र भी नहीं देते।

श्लोक 5 (bhagavata.8.22.5)

त्वं नूनमसुराणां नः परोक्षः परमो गुरुः । यो नोऽनेकमदान्धानां विभ्रंशं चक्षुरादिशत् ॥ ५ ॥

tvaṁ nūnam asurāṇāṁ naḥ parokṣaḥ paramo guruḥ yo no ’neka-madāndhānāṁ vibhraṁśaṁ cakṣur ādiśat

निश्चय ही आप हम असुरों के परोक्ष परम गुरु हैं, जिन्होंने अनेक ऐश्वर्यों के मद से अंधे हुए हमें अपनी दृष्टि, अर्थात् सही दृष्टि, प्रदान की है।

श्लोक 6 (bhagavata.8.22.6)

यस्मिन् वैरानुबन्धेन व्यूढेन विबुधेतराः । बहवो लेभिरे सिद्धिं यामु हैकान्तयोगिनः ॥ ६ ॥

yasmin vairānubandhena vyūḍhena vibudhetarāḥ bahavo lebhire siddhiṁ yām u haikānta-yoginaḥ

जिनके साथ दृढ़ शत्रुता बाँधकर भी अनेक असुरों ने वही सिद्धि प्राप्त की जो एकांत-योगियों को प्राप्त होती है,

श्लोक 7 (bhagavata.8.22.7)

तेनाहं निगृहीतोऽस्मि भवता भूरिकर्मणा । बद्धश्च वारुणैः पाशैर्नातिव्रीडे न च व्यथे ॥ ७ ॥

tenāhaṁ nigṛhīto ’smi bhavatā bhūri-karmaṇā baddhaś ca vāruṇaiḥ pāśair nātivrīḍe na ca vyathe

उन्हीं महाकर्मा आपके द्वारा मैं इस प्रकार पकड़ा गया हूँ और वरुण-पाश से बंधा हूँ — तथापि मुझे इसमें न लज्जा है, न कोई पीड़ा।

श्लोक 8 (bhagavata.8.22.8)

पितामहो मे भवदीयसम्मतः प्रह्लाद आविष्कृतसाधुवादः । भवद्विपक्षेण विचित्रवैशसं सम्प्रापितस्त्वं परमः स्वपित्रा ॥ ८ ॥

pitāmaho me bhavadīya-sammataḥ prahrāda āviṣkṛta-sādhu-vādaḥ bhavad-vipakṣeṇa vicitra-vaiśasaṁ samprāpitas tvaṁ paramaḥ sva-pitrā

मेरे पितामह प्रह्लाद, जो आपके भक्तों द्वारा सम्मानित हैं और साधुता के लिए विख्यात हैं, अपने ही पिता द्वारा आपके विरुद्ध होने के कारण नाना प्रकार की यातनाएँ सहते हुए भी, आपको ही परम आश्रय मानते रहे।

श्लोक 9 (bhagavata.8.22.9)

किमात्मनानेन जहाति योऽन्ततः किं रिक्थहारैः स्वजनाख्यदस्युभिः । किं जायया संसृतिहेतुभूतया मर्त्यस्य गेहैः किमिहायुषो व्ययः ॥ ९ ॥

kim ātmanānena jahāti yo ’ntataḥ kiṁ riktha-hāraiḥ svajanākhya-dasyubhiḥ kiṁ jāyayā saṁsṛti-hetu-bhūtayā martyasya gehaiḥ kim ihāyuṣo vyayaḥ

इस शरीर से ही क्या लाभ, जो अंततः इसे त्याग ही देता है? स्वजन कहलाने वाले उन डाकुओं से भी क्या लाभ, जो धन लूटते हैं? संसार-बंधन का कारण बनी पत्नी से क्या लाभ? इस मरणधर्मा प्राणी के घर-परिवार में आयु व्यर्थ गँवाने से भी क्या लाभ?

श्लोक 10 (bhagavata.8.22.10)

इत्थं स निश्चित्य पितामहो महा- नगाधबोधो भवतः पादपद्मम् । ध्रुवं प्रपेदे ह्यकुतोभयं जनाद् भीतः स्वपक्षक्षपणस्य सत्तम ॥ १० ॥

itthaṁ sa niścitya pitāmaho mahān agādha-bodho bhavataḥ pāda-padmam dhruvaṁ prapede hy akutobhayaṁ janād bhītaḥ svapakṣa-kṣapaṇasya sattama

हे सत्तम, इस प्रकार निश्चय कर मेरे महान, अगाध-ज्ञानी पितामह प्रह्लाद ने, अपने ही पक्ष का संहार करने वाले सामान्यजनों से भयभीत होकर, आपके निर्भय चरणकमलों की दृढ़ शरण ले ली।

श्लोक 11 (bhagavata.8.22.11)

अथाहमप्यात्मरिपोस्तवान्तिकं दैवेन नीतः प्रसभं त्याजितश्रीः । इदं कृतान्तान्तिकवर्ति जीवितं ययाध्रुवं स्तब्धमतिर्न बुध्यते ॥ ११ ॥

athāham apy ātma-ripos tavāntikaṁ daivena nītaḥ prasabhaṁ tyājita-śrīḥ idaṁ kṛtāntāntika-varti jīvitaṁ yayādhruvaṁ stabdha-matir na budhyate

आज मैं भी, अपने ही कुल के परंपरागत शत्रु आपके निकट, दैव द्वारा बलपूर्वक लाया जाकर अपनी सारी संपदा से वंचित कर दिया गया हूँ; यह अनित्य जीवन सदा मृत्यु के निकट ही रहता है, फिर भी जड़बुद्धि मनुष्य इसे नहीं समझ पाता।

श्लोक 12 (bhagavata.8.22.12)

श्रीशुक उवाच तस्येत्थं भाषमाणस्य प्रह्लादो भगवत्प्रियः । आजगाम कुरुश्रेष्ठ राकापतिरिवोत्थितः ॥ १२ ॥

śrī-śuka uvāca tasyetthaṁ bhāṣamāṇasya prahrādo bhagavat-priyaḥ ājagāma kuru-śreṣṭha rākā-patir ivotthitaḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे कुरुश्रेष्ठ, बलि के इस प्रकार कहते समय, भगवान के परम प्रिय प्रह्लाद वहाँ उदित पूर्णचंद्र के समान आ पहुँचे।

श्लोक 13 (bhagavata.8.22.13)

तमिन्द्रसेनः स्वपितामहं श्रिया विराजमानं नलिनायतेक्षणम् । प्रांशुं पिशङ्गाम्बरमञ्जनत्विषं प्रलम्बबाहुं शुभगर्षभमैक्षत ॥ १३ ॥

tam indra-senaḥ sva-pitāmahaṁ śriyā virājamānaṁ nalināyatekṣaṇam prāṁśuṁ piśaṅgāmbaram añjana-tviṣaṁ pralamba-bāhuṁ śubhagarṣabham aikṣata

इंद्रपद प्राप्त बलि ने अपने उन पितामह को देखा — कमल के समान विशाल नेत्रोंवाले, ऊँचे कद, पीतांबरधारी, अंजन जैसी काली कांतिवाले, लंबी भुजाओंवाले, तथा सौभाग्यशाली पुरुषों में श्रेष्ठ, शोभा से देदीप्यमान।

श्लोक 14 (bhagavata.8.22.14)

तस्मै बलिर्वारुणपाशयन्त्रितः समर्हणं नोपजहार पूर्ववत् । ननाम मूर्ध्नाश्रुविलोललोचनः सव्रीडनीचीनमुखो बभूव ह ॥ १४ ॥

tasmai balir vāruṇa-pāśa-yantritaḥ samarhaṇaṁ nopajahāra pūrvavat nanāma mūrdhnāśru-vilola-locanaḥ sa-vrīḍa-nīcīna-mukho babhūva ha

वरुण-पाश से बंधे बलि पहले की भाँति उन्हें उचित सम्मान अर्पित न कर सके; केवल सिर झुकाकर प्रणाम किया, अश्रुपूरित नेत्रों और लज्जा से नत मुख के साथ।

श्लोक 15 (bhagavata.8.22.15)

स तत्र हासीनमुदीक्ष्य सत्पतिं हरिं सुनन्दाद्यनुगैरुपासितम् । उपेत्य भूमौ शिरसा महामना ननाम मूर्ध्ना पुलकाश्रुविक्लवः ॥ १५ ॥

sa tatra hāsīnam udīkṣya sat-patiṁ hariṁ sunandādy-anugair upāsitam upetya bhūmau śirasā mahā-manā nanāma mūrdhnā pulakāśru-viklavaḥ

वहाँ सुनंद आदि अनुचरों द्वारा सेवित हरि को बैठे हुए देखकर, महामना प्रह्लाद भूमि पर पहुँचकर रोमांचित और अश्रुविह्वल होकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगे।

श्लोक 16 (bhagavata.8.22.16)

श्रीप्रह्लाद उवाच त्वयैव दत्तं पदमैन्द्रमूर्जितं हृतं तदेवाद्य तथैव शोभनम् । मन्ये महानस्य कृतो ह्यनुग्रहो विभ्रंशितो यच्छ्रिय आत्ममोहनात् ॥ १६ ॥

śrī-prahrāda uvāca tvayaiva dattaṁ padam aindram ūrjitaṁ hṛtaṁ tad evādya tathaiva śobhanam manye mahān asya kṛto hy anugraho vibhraṁśito yac chriya ātma-mohanāt

श्री प्रह्लाद ने कहा — जो महान इंद्रपद आपने ही इसे दिया था, वही आज आपने छीन लिया है — यह भी उतना ही शोभनीय है; मैं तो इसे आप द्वारा किया गया महान अनुग्रह ही मानता हूँ, क्योंकि जिस ऐश्वर्य ने इसे मोहित कर रखा था, उससे इसे मुक्त कर दिया गया।

श्लोक 17 (bhagavata.8.22.17)

यया हि विद्वानपि मुह्यते यत- स्तत् को विचष्टे गतिमात्मनो यथा । तस्मै नमस्ते जगदीश्वराय वै नारायणायाखिललोकसाक्षिणे ॥ १७ ॥

yayā hi vidvān api muhyate yatas tat ko vicaṣṭe gatim ātmano yathā tasmai namas te jagad-īśvarāya vai nārāyaṇāyākhila-loka-sākṣiṇe

जिस माया से विद्वान भी मोहित हो जाता है, उससे स्वयं को कौन उसी प्रकार परख सकता है जैसे उसे परखा जाना चाहिए? उन जगदीश्वर, समस्त लोकों के साक्षी, नारायण को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 18 (bhagavata.8.22.18)

श्रीशुक उवाच तस्यानुशृण्वतो राजन् प्रह्लादस्य कृताञ्जलेः । हिरण्यगर्भो भगवानुवाच मधुसूदनम् ॥ १८ ॥

śrī-śuka uvāca tasyānuśṛṇvato rājan prahrādasya kṛtāñjaleḥ hiraṇyagarbho bhagavān uvāca madhusūdanam

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन्, अंजलिबद्ध खड़े प्रह्लाद के सुनते हुए, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने मधुसूदन भगवान से यह कहा।

श्लोक 19 (bhagavata.8.22.19)

बद्धं वीक्ष्य पतिं साध्वी तत्पत्नी भयविह्वला । प्राञ्जलिः प्रणतोपेन्द्रं बभाषेऽवाङ्मुखी नृप ॥ १९ ॥

baddhaṁ vīkṣya patiṁ sādhvī tat-patnī bhaya-vihvalā prāñjaliḥ praṇatopendraṁ babhāṣe ’vāṅ-mukhī nṛpa

हे राजन्, अपने पति को बंधा हुआ देखकर, भय से विह्वल हुई साध्वी विंध्यावली हाथ जोड़कर उपेंद्र को प्रणाम करती हुई, मुख नीचे किए यह बोली।

श्लोक 20 (bhagavata.8.22.20)

श्रीविन्ध्यावलिरुवाच क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥ २० ॥

śrī-vindhyāvalir uvāca krīḍārtham ātmana idaṁ tri-jagat kṛtaṁ te svāmyaṁ tu tatra kudhiyo ’para īśa kuryuḥ kartuḥ prabhos tava kim asyata āvahanti tyakta-hriyas tvad-avaropita-kartṛ-vādāḥ

श्री विंध्यावली ने कहा — हे ईश्वर, यह त्रिलोक आपने अपनी ही लीला के लिए रचा है; परंतु उस पर अन्य कुबुद्धि जन स्वामित्व जताते हैं। हे सृष्टिकर्ता, हे पालनकर्ता, हे संहारकर्ता — जो निर्लज्जतापूर्वक अपने ही ऊपर कर्तृत्व थोप बैठे हैं, वे आपको भला क्या दे सकते हैं?

श्लोक 21 (bhagavata.8.22.21)

श्रीब्रह्मोवाच भूतभावन भूतेश देवदेव जगन्मय । मुञ्चैनं हृतसर्वस्वं नायमर्हति निग्रहम् ॥ २१ ॥

śrī-brahmovāca bhūta-bhāvana bhūteśa deva-deva jaganmaya muñcainaṁ hṛta-sarvasvaṁ nāyam arhati nigraham

श्री ब्रह्मा ने कहा — हे प्राणियों के पालक, हे भूतेश, हे देवाधिदेव, हे जगन्मय, इसे छोड़ दीजिए — इसका सर्वस्व तो हर लिया गया है, यह अब और दंड का पात्र नहीं है।

श्लोक 22 (bhagavata.8.22.22)

कृत्स्ना तेऽनेन दत्ता भूर्लोकाः कर्मार्जिताश्च ये । निवेदितं च सर्वस्वमात्माविक्लवया धिया ॥ २२ ॥

kṛtsnā te ’nena dattā bhūr lokāḥ karmārjitāś ca ye niveditaṁ ca sarvasvam ātmāviklavayā dhiyā

इसने अपनी सारी पृथ्वी और अपने कर्मों से अर्जित सभी लोक आपको अर्पित कर दिए हैं, और अविचलित बुद्धि से अपना सर्वस्व — यहाँ तक कि अपना शरीर भी — आपको निवेदित कर दिया है।

श्लोक 23 (bhagavata.8.22.23)

यत्पादयोरशठधीः सलिलं प्रदाय दूर्वाङ्कुरैरपि विधाय सतीं सपर्याम् । अप्युत्तमां गतिमसौ भजते त्रिलोकीं दाश्वानविक्लवमनाः कथमार्तिमृच्छेत् ॥ २३ ॥

yat-pādayor aśaṭha-dhīḥ salilaṁ pradāya dūrvāṅkurair api vidhāya satīṁ saparyām apy uttamāṁ gatim asau bhajate tri-lokīṁ dāśvān aviklava-manāḥ katham ārtim ṛcchet

जो निष्कपट बुद्धि वाला व्यक्ति आपके चरणों में केवल जल, दूर्वांकुर अर्पित कर सच्चे भाव से पूजा करता है, वह भी परम गति और तीनों लोकों का ऐश्वर्य पाने योग्य हो जाता है; तब निष्कपट मन से सर्वस्व अर्पण करने वाला यह बलि भला संकट का भागी कैसे हो सकता है?

श्लोक 24 (bhagavata.8.22.24)

श्रीभगवानुवाच ब्रह्मन् यमनुगृह्णामि तद्विशो विधुनोम्यहम् । यन्मदः पुरुषः स्तब्धो लोकं मां चावमन्यते ॥ २४ ॥

śrī-bhagavān uvāca brahman yam anugṛhṇāmi tad-viśo vidhunomy aham yan-madaḥ puruṣaḥ stabdho lokaṁ māṁ cāvamanyate

श्री भगवान ने कहा — हे ब्रह्मन्, जिस पर मैं अनुग्रह करता हूँ, उसका धन-वैभव मैं ही हर लेता हूँ; क्योंकि उसी मद से मनुष्य अहंकारी होकर लोक को और मुझे भी तुच्छ मानने लगता है।

श्लोक 25 (bhagavata.8.22.25)

यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभिः । नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत् ॥ २५ ॥

yadā kadācij jīvātmā saṁsaran nija-karmabhiḥ nānā-yoniṣv anīśo ’yaṁ pauruṣīṁ gatim āvrajet

जब कभी अपने ही कर्मों से नाना योनियों में भ्रमण करता हुआ यह परतंत्र जीवात्मा किसी प्रकार मनुष्य-जन्म जैसी गति पाता है,

श्लोक 26 (bhagavata.8.22.26)

जन्मकर्मवयोरूपविद्यैश्वर्यधनादिभिः । यद्यस्य न भवेत् स्तम्भस्तत्रायं मदनुग्रहः ॥ २६ ॥

janma-karma-vayo-rūpa- vidyaiśvarya-dhanādibhiḥ yady asya na bhavet stambhas tatrāyaṁ mad-anugrahaḥ

यदि उस समय उसे जन्म, कर्म, आयु, रूप, विद्या, ऐश्वर्य, धन आदि का अहंकार नहीं होता, तो यही समझना चाहिए कि उस पर मेरा विशेष अनुग्रह है।

श्लोक 27 (bhagavata.8.22.27)

मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्ततः । सर्वश्रेयःप्रतीपानां हन्त मुह्येन्न मत्परः ॥ २७ ॥

māna-stambha-nimittānāṁ janmādīnāṁ samantataḥ sarva-śreyaḥ-pratīpānāṁ hanta muhyen na mat-paraḥ

जन्म आदि जो प्रायः अहंकार का कारण बनकर सभी कल्याण-मार्गों में बाधक होते हैं, वे भी मेरे भक्त को कभी मोहित नहीं कर पाते।

श्लोक 28 (bhagavata.8.22.28)

एष दानवदैत्यानामग्रणीः कीर्तिवर्धनः । अजैषीदजयां मायां सीदन्नपि न मुह्यति ॥ २८ ॥

eṣa dānava-daityānām agranīḥ kīrti-vardhanaḥ ajaiṣīd ajayāṁ māyāṁ sīdann api na muhyati

यह बलि दानवों और दैत्यों में सबसे आगे, अत्यंत यशस्वी है, और जिस अजेय माया को कोई नहीं जीत सकता, उसे इसने जीत लिया है — इतना विपन्न होकर भी यह तनिक भी मोहित नहीं हुआ।

श्लोक 29 (bhagavata.8.22.29)

क्षीणरिक्थश्च्युतः स्थानात् क्षिप्तो बद्धश्च शत्रुभिः । ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो यातनामनुयापितः ॥ २९ ॥

kṣīṇa-rikthaś cyutaḥ sthānāt kṣipto baddhaś ca śatrubhiḥ jñātibhiś ca parityakto yātanām anuyāpitaḥ

धन-हीन होकर, अपने पद से च्युत होकर, शत्रुओं द्वारा पकड़कर बाँध लिए जाने पर, अपने ही स्वजनों द्वारा त्याग दिए जाने पर, और भारी यातना सहते हुए भी,

श्लोक 30 (bhagavata.8.22.30)

गुरुणा भर्त्सितः शप्तो जहौ सत्यं न सुव्रतः । छलैरुक्तो मया धर्मो नायं त्यजति सत्यवाक् ॥ ३० ॥

guruṇā bhartsitaḥ śapto jahau satyaṁ na suvrataḥ chalair ukto mayā dharmo nāyaṁ tyajati satya-vāk

अपने ही गुरु द्वारा फटकारे जाने और शाप दिए जाने पर भी, इस दृढ़व्रती ने सत्य का त्याग नहीं किया — छल से तो मैंने ही धर्म की बात कही थी, परंतु सत्यवादी बलि ने धर्म का त्याग नहीं किया।

श्लोक 31 (bhagavata.8.22.31)

एष मे प्रापितः स्थानं दुष्प्रापममरैरपि । सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रयः ॥ ३१ ॥

eṣa me prāpitaḥ sthānaṁ duṣprāpam amarair api sāvarṇer antarasyāyaṁ bhavitendro mad-āśrayaḥ

इसे मैंने वह पद प्राप्त कराया है जो देवताओं को भी दुर्लभ है — सावर्णि मन्वंतर में यह मेरे ही आश्रय में इंद्र बनेगा।

श्लोक 32 (bhagavata.8.22.32)

तावत् सुतलमध्यास्तां विश्वकर्मविनिर्मितम् । यदाधयो व्याधयश्च क्लमस्तन्द्रा पराभवः । नोपसर्गा निवसतां सम्भवन्ति ममेक्षया ॥ ३२ ॥

tāvat sutalam adhyāstāṁ viśvakarma-vinirmitam yad ādhayo vyādhayaś ca klamas tandrā parābhavaḥ nopasargā nivasatāṁ sambhavanti mamekṣayā

तब तक विश्वकर्मा द्वारा निर्मित सुतल लोक में निवास करो, जहाँ मेरी ही दृष्टि के कारण वहाँ रहने वालों को न मानसिक पीड़ा, न रोग, न थकान, न आलस्य, न पराजय और न ही कोई उपद्रव सताता है।

श्लोक 33 (bhagavata.8.22.33)

इन्द्रसेन महाराज याहि भो भद्रमस्तु ते । सुतलं स्वर्गिभिः प्रार्थ्यं ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३३ ॥

indrasena mahārāja yāhi bho bhadram astu te sutalaṁ svargibhiḥ prārthyaṁ jñātibhiḥ parivāritaḥ

हे महाराज इंद्रसेन, अब वहाँ जाओ, तुम्हारा कल्याण हो — अपने स्वजनों से घिरे हुए उस सुतल लोक में, जिसकी अभिलाषा स्वर्गवासी देवता भी करते हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.8.22.34)

न त्वामभिभविष्यन्ति लोकेशाः किमुतापरे । त्वच्छासनातिगान् दैत्यांश्चक्रं मे सूदयिष्यति ॥ ३४ ॥

na tvām abhibhaviṣyanti lokeśāḥ kim utāpare tvac-chāsanātigān daityāṁś cakraṁ me sūdayiṣyati

वहाँ लोकपाल भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे, फिर साधारण जनों की तो बात ही क्या; और जो दैत्य तुम्हारे शासन का उल्लंघन करेंगे, उन्हें मेरा चक्र स्वयं नष्ट कर देगा।

श्लोक 35 (bhagavata.8.22.35)

रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम् । सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान् ॥ ३५ ॥

rakṣiṣye sarvato ’haṁ tvāṁ sānugaṁ saparicchadam sadā sannihitaṁ vīra tatra māṁ drakṣyate bhavān

हे वीर, मैं सदा तुम्हारे निकट रहकर तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरों और सामग्री सहित, सब प्रकार से रक्षा करूँगा; और वहाँ तुम मुझे सदा प्रत्यक्ष देख सकोगे।

श्लोक 36 (bhagavata.8.22.36)

तत्र दानवदैत्यानां सङ्गात्ते भाव आसुरः । दृष्ट्वा मदनुभावं वै सद्यः कुण्ठो विनङ्क्ष्यति ॥ ३६ ॥

tatra dānava-daityānāṁ saṅgāt te bhāva āsuraḥ dṛṣṭvā mad-anubhāvaṁ vai sadyaḥ kuṇṭho vinaṅkṣyati

वहाँ दानवों और दैत्यों के संग से उत्पन्न तुम्हारा जो आसुरी भाव है, वह मेरी उस अद्भुत महिमा को प्रत्यक्ष देखकर शीघ्र ही सर्वथा नष्ट हो जाएगा।

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