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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23

देवगण स्वर्गलोक पुनः प्राप्त करते हैं

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (bhagavata.8.23.1)

श्रीशुक उवाच इत्युक्तवन्तं पुरुषं पुरातनं महानुभावोऽखिलसाधुसम्मतः । बद्धाञ्जलिर्बाष्पकलाकुलेक्षणो भक्त्युत्कलो गद्गदया गिराब्रवीत् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca ity uktavantaṁ puruṣaṁ purātanaṁ mahānubhāvo ’khila-sādhu-sammataḥ baddhāñjalir bāṣpa-kalākulekṣaṇo bhakty-utkalo gadgadayā girābravīt

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — समस्त साधुजनों द्वारा सम्मानित, महामना बलि, उस पुरातन पुरुष के इन वचनों को सुनकर, हाथ जोड़े, अश्रुपूरित नेत्रों से, भक्ति से उमड़ते हुए गद्गद स्वर में यह कहने लगे।

श्लोक 2 (bhagavata.8.23.2)

श्रीबलिरुवाच अहो प्रणामाय कृतः समुद्यमः प्रपन्नभक्तार्थविधौ समाहितः । यल्लोकपालैस्त्वदनुग्रहोऽमरै- रलब्धपूर्वोऽपसदेऽसुरेऽर्पितः ॥ २ ॥

śrī-balir uvāca aho praṇāmāya kṛtaḥ samudyamaḥ prapanna-bhaktārtha-vidhau samāhitaḥ yal loka-pālais tvad-anugraho ’marair alabdha-pūrvo ’pasade ’sure ’rpitaḥ

श्री बलि ने कहा — अहो, केवल आपको प्रणाम करने का प्रयास मात्र भी कितना सफल हुआ! जो अनुग्रह आपने मुझ पतित असुर पर किया, वह लोकपालों और देवताओं को भी पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 3 (bhagavata.8.23.3)

श्रीशुक उवाच इत्युक्त्वा हरिमानत्य ब्रह्माणं सभवं ततः । विवेश सुतलं प्रीतो बलिर्मुक्तः सहासुरैः ॥ ३ ॥

śrī-śuka uvāca ity uktvā harim ānatya brahmāṇaṁ sabhavaṁ tataḥ viveśa sutalaṁ prīto balir muktaḥ sahāsuraiḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — यह कहकर बलि ने हरि को, फिर ब्रह्मा और शिव को प्रणाम किया, और मुक्त होकर प्रसन्नचित्त वे अपने असुर-साथियों सहित सुतल लोक में प्रवेश कर गए।

श्लोक 4 (bhagavata.8.23.4)

एवमिन्द्राय भगवान् प्रत्यानीय त्रिविष्टपम् । पूरयित्वादितेः काममशासत् सकलं जगत् ॥ ४ ॥

evam indrāya bhagavān pratyānīya triviṣṭapam pūrayitvāditeḥ kāmam aśāsat sakalaṁ jagat

इस प्रकार भगवान ने तीनों लोक इंद्र को लौटा दिए, अदिति की कामना पूर्ण की, और समूचे विश्व का शासन संभाला।

श्लोक 5 (bhagavata.8.23.5)

लब्धप्रसादं निर्मुक्तं पौत्रं वंशधरं बलिम् । निशाम्य भक्तिप्रवणः प्रह्लाद इदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

labdha-prasādaṁ nirmuktaṁ pautraṁ vaṁśa-dharaṁ balim niśāmya bhakti-pravaṇaḥ prahrāda idam abravīt

जब भक्तिभाव से भरे प्रह्लाद ने सुना कि उनका पौत्र और वंशधर बलि, भगवान की कृपा पाकर बंधन से मुक्त हो गया है, तो उन्होंने यह कहा।

श्लोक 6 (bhagavata.8.23.6)

श्रीप्रह्लाद उवाच नेमं विरिञ्चो लभते प्रसादं न श्रीर्न शर्वः किमुतापरेऽन्ये । यन्नोऽसुराणामसि दुर्गपालो विश्वाभिवन्द्यैरभिवन्दिताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥

śrī-prahrāda uvāca nemaṁ viriñco labhate prasādaṁ na śrīr na śarvaḥ kim utāpare ’nye yan no ’surāṇām asi durga-pālo viśvābhivandyair abhivanditāṅghriḥ

श्री प्रह्लाद ने कहा — यह अनुग्रह न तो ब्रह्मा को, न लक्ष्मी को, न शिव को प्राप्त हुआ, फिर औरों की तो बात ही क्या — कि आप हम असुरों के दुर्गपालक बन जाएँ, आप जिनके चरण समस्त लोकवंद्य ब्रह्मा-शिव आदि द्वारा भी वंदित होते हैं।

श्लोक 7 (bhagavata.8.23.7)

यत्पादपद्ममकरन्दनिषेवणेन ब्रह्मादयः शरणदाश्नुवते विभूतीः । कस्माद् वयं कुसृतयः खलयोनयस्ते दाक्षिण्यदृष्टिपदवीं भवतः प्रणीताः ॥ ७ ॥

yat-pāda-padma-makaranda-niṣevaṇena brahmādayaḥ śaraṇadāśnuvate vibhūtīḥ kasmād vayaṁ kusṛtayaḥ khala-yonayas te dākṣiṇya-dṛṣṭi-padavīṁ bhavataḥ praṇītāḥ

हे शरणदाता, जिनके चरणकमल के मकरंद का सेवन कर ब्रह्मा आदि महापुरुष अपनी विभूतियाँ प्राप्त करते हैं — हम तो कुटिल-मार्गी, दुष्ट-वंश में जन्मे प्राणी हैं, फिर हमें भी आपकी वह दक्षिण-दृष्टि, वह कृपादृष्टि, कैसे प्राप्त हुई?

श्लोक 8 (bhagavata.8.23.8)

चित्रं तवेहितमहोऽमितयोगमाया- लीलाविसृष्टभुवनस्य विशारदस्य । सर्वात्मनः समदृशोऽविषमः स्वभावो भक्तप्रियो यदसि कल्पतरुस्वभावः ॥ ८ ॥

citraṁ tavehitam aho ’mita-yoga-māyā- līlā-visṛṣṭa-bhuvanasya viśāradasya sarvātmanaḥ samadṛśo ’viṣamaḥ svabhāvo bhakta-priyo yad asi kalpataru-svabhāvaḥ

अहो, आपकी लीलाएँ कितनी विचित्र हैं! अपनी असीम योगमाया की लीला से आपने ये समस्त लोक रचे हैं; सर्वज्ञ, सर्वात्मा, समदर्शी होते हुए भी आपका स्वभाव पक्षपातरहित है — फिर भी आप भक्तवत्सल हैं, क्योंकि आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है।

श्लोक 9 (bhagavata.8.23.9)

श्रीभगवानुवाच वत्स प्रह्लाद भद्रं ते प्रयाहि सुतलालयम् । मोदमानः स्वपौत्रेण ज्ञातीनां सुखमावह ॥ ९ ॥

śrī-bhagavān uvāca vatsa prahrāda bhadraṁ te prayāhi sutalālayam modamānaḥ sva-pautreṇa jñātīnāṁ sukham āvaha

श्री भगवान ने कहा — हे वत्स प्रह्लाद, तुम्हारा कल्याण हो; अब सुतल लोक को जाओ, अपने पौत्र के साथ आनंदपूर्वक अपने स्वजनों को सुख पहुँचाओ।

श्लोक 10 (bhagavata.8.23.10)

नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् । मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥ १० ॥

nityaṁ draṣṭāsi māṁ tatra gadā-pāṇim avasthitam mad-darśana-mahāhlāda- dhvasta-karma-nibandhanaḥ

वहाँ तुम मुझे सदा गदा हाथ में लिए स्थित देखते रहोगे; और मेरे उस दर्शन के परम आनंद से तुम्हारे कर्म-बंधन सर्वथा नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 11 (bhagavata.8.23.11)

श्रीशुक उवाच आज्ञां भगवतो राजन्प्रह्लादो बलिना सह । बाढमित्यमलप्रज्ञो मूर्ध्न्याधाय कृताञ्जलिः ॥ ११ ॥

śrī-śuka uvāca ājñāṁ bhagavato rājan prahrādo balinā saha bāḍham ity amala-prajño mūrdhny ādhāya kṛtāñjaliḥ

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन्, निर्मल बुद्धिवाले प्रह्लाद ने भगवान की इस आज्ञा को 'हाँ, ऐसा ही होगा' कहकर सिर पर धारण कर लिया, और हाथ जोड़कर बलि के साथ,

श्लोक 12 (bhagavata.8.23.12)

परिक्रम्यादिपुरुषं सर्वासुरचमूपतिः । प्रणतस्तदनुज्ञातः प्रविवेश महाबिलम् ॥ १२ ॥

parikramyādi-puruṣaṁ sarvāsura-camūpatiḥ praṇatas tad-anujñātaḥ praviveśa mahā-bilam

उन आदिपुरुष की परिक्रमा कर, समस्त असुर-सेनापतियों का स्वामी प्रह्लाद उन्हें प्रणाम कर, उनकी अनुमति पाकर उस विशाल बिल (सुतल लोक) में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 13 (bhagavata.8.23.13)

अथाहोशनसं राजन्हरिर्नारायणोऽन्तिके । आसीनमृत्विजां मध्ये सदसि ब्रह्मवादिनाम् ॥ १३ ॥

athāhośanasaṁ rājan harir nārāyaṇo ’ntike āsīnam ṛtvijāṁ madhye sadasi brahma-vādinām

हे राजन्, तत्पश्चात् हरि नारायण ने, ब्रह्मवादी ऋत्विजों की उस सभा में समीप बैठे शुक्राचार्य से यह कहा।

श्लोक 14 (bhagavata.8.23.14)

ब्रह्मन् सन्तनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः । यत् तत् कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्टं समं भवेत् ॥ १४ ॥

brahman santanu śiṣyasya karma-cchidraṁ vitanvataḥ yat tat karmasu vaiṣamyaṁ brahma-dṛṣṭaṁ samaṁ bhavet

'हे ब्रह्मन्, अपने शिष्य के यज्ञ-कर्म में जो भी त्रुटि रह गई हो, उसे बताइए — ब्राह्मणों की दृष्टि में परखी गई कोई भी विषमता समरूप हो जाती है।'

श्लोक 15 (bhagavata.8.23.15)

श्रीशुक्र उवाच कुतस्तत्कर्मवैषम्यं यस्य कर्मेश्वरो भवान् । यज्ञेशो यज्ञपुरुषः सर्वभावेन पूजितः ॥ १५ ॥

śrī-śukra uvāca kutas tat-karma-vaiṣamyaṁ yasya karmeśvaro bhavān yajñeśo yajña-puruṣaḥ sarva-bhāvena pūjitaḥ

श्री शुक्राचार्य ने कहा — जिसके यज्ञ के स्वामी स्वयं आप हैं, जो यज्ञेश्वर और यज्ञपुरुष सर्वभाव से पूजित हुए, उसके यज्ञ-कर्म में विषमता कहाँ से आ सकती है?

श्लोक 16 (bhagavata.8.23.16)

मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः । सर्वं करोति निश्छिद्रमनुसङ्कीर्तनं तव ॥ १६ ॥

mantratas tantrataś chidraṁ deśa-kālārha-vastutaḥ sarvaṁ karoti niśchidram anusaṅkīrtanaṁ tava

मंत्र में, विधि में, देश-काल-पात्र-वस्तु में जो भी त्रुटि रह जाए, आपके निरंतर संकीर्तन से वह सब सर्वथा निर्दोष हो जाती है।

श्लोक 17 (bhagavata.8.23.17)

तथापि वदतो भूमन् करिष्याम्यनुशासनम् । एतच्छ्रेयः परं पुंसां यत् तवाज्ञानुपालनम् ॥ १७ ॥

tathāpi vadato bhūman kariṣyāmy anuśāsanam etac chreyaḥ paraṁ puṁsāṁ yat tavājñānupālanam

फिर भी, हे प्रभो, आपके कहने पर मैं यह अनुशासन करूँगा — क्योंकि मनुष्यों के लिए आपकी आज्ञा का पालन ही परम कल्याण है।

श्लोक 18 (bhagavata.8.23.18)

श्रीशुक उवाच प्रतिनन्द्य हरेराज्ञामुशना भगवानिति । यज्ञच्छिद्रं समाधत्त बलेर्विप्रर्षिभिः सह ॥ १८ ॥

śrī-śuka uvāca pratinandya harer ājñām uśanā bhagavān iti yajña-cchidraṁ samādhatta baler viprarṣibhiḥ saha

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार हरि की आज्ञा का सम्मान कर, महाबली शुक्राचार्य ने विद्वान ब्राह्मणों सहित बलि के यज्ञ की त्रुटियों का सुधार किया।

श्लोक 19 (bhagavata.8.23.19)

एवं बलेर्महीं राजन् भिक्षित्वा वामनो हरिः । ददौ भ्रात्रे महेन्द्राय त्रिदिवं यत्परैर्हृतम् ॥ १९ ॥

evaṁ baler mahīṁ rājan bhikṣitvā vāmano hariḥ dadau bhrātre mahendrāya tridivaṁ yat parair hṛtam

हे राजन्, इस प्रकार बलि से भूमि माँगकर वामनरूपी हरि ने अपने भाई महेंद्र को वह स्वर्गलोक लौटा दिया, जिसे शत्रुओं ने छीन लिया था।

श्लोक 20 (bhagavata.8.23.20)

प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा देवर्षिपितृभूमिपैः । दक्षभृग्वङ्गिरोमुख्यैः कुमारेण भवेन च ॥ २० ॥

prajāpati-patir brahmā devarṣi-pitṛ-bhūmipaiḥ dakṣa-bhṛgv-aṅgiro-mukhyaiḥ kumāreṇa bhavena ca

प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्मा ने, देवताओं, ऋषियों, पितरों, मनुओं, दक्ष-भृगु-अंगिरा आदि प्रमुखों, तथा कार्तिकेय और शिव सहित,

श्लोक 21 (bhagavata.8.23.21)

कश्यपस्यादितेः प्रीत्यै सर्वभूतभवाय च । लोकानां लोकपालानामकरोद् वामनं पतिम् ॥ २१ ॥

kaśyapasyāditeḥ prītyai sarva-bhūta-bhavāya ca lokānāṁ loka-pālānām akarod vāmanaṁ patim

कश्यप और अदिति की प्रसन्नता के लिए और समस्त प्राणियों के कल्याणार्थ, समस्त लोकों और लोकपालों का स्वामी वामनदेव को ही बना दिया।

श्लोक 22 (bhagavata.8.23.22)

वेदानां सर्वदेवानां धर्मस्य यशसः श्रियः । मङ्गलानां व्रतानां च कल्पं स्वर्गापवर्गयोः ॥ २२ ॥

vedānāṁ sarva-devānāṁ dharmasya yaśasaḥ śriyaḥ maṅgalānāṁ vratānāṁ ca kalpaṁ svargāpavargayoḥ

वेदों, समस्त देवताओं, धर्म, यश, श्री, मंगलों, व्रतों तथा स्वर्ग और मोक्ष दोनों के — इन सबके सर्वश्रेष्ठ रक्षक के रूप में,

श्लोक 23 (bhagavata.8.23.23)

उपेन्द्रं कल्पयांचक्रे पतिं सर्वविभूतये । तदा सर्वाणि भूतानि भृशं मुमुदिरे नृप ॥ २३ ॥

upendraṁ kalpayāṁ cakre patiṁ sarva-vibhūtaye tadā sarvāṇi bhūtāni bhṛśaṁ mumudire nṛpa

उन्होंने उपेंद्र को ही सर्वऐश्वर्य के स्वामी के रूप में स्थापित किया; हे राजन्, उस समय समस्त प्राणी अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 24 (bhagavata.8.23.24)

ततस्त्विन्द्रः पुरस्कृत्य देवयानेन वामनम् । लोकपालैर्दिवं निन्ये ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥ २४ ॥

tatas tv indraḥ puraskṛtya deva-yānena vāmanam loka-pālair divaṁ ninye brahmaṇā cānumoditaḥ

तत्पश्चात् इंद्र ने वामनदेव को आगे रखकर, लोकपालों सहित, ब्रह्मा की सहमति से, देवयान विमान द्वारा उन्हें स्वर्गलोक ले गए।

श्लोक 25 (bhagavata.8.23.25)

प्राप्य त्रिभुवनं चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालितः । श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वसः ॥ २५ ॥

prāpya tri-bhuvanaṁ cendra upendra-bhuja-pālitaḥ śriyā paramayā juṣṭo mumude gata-sādhvasaḥ

उपेंद्र की भुजाओं द्वारा रक्षित इंद्र ने तीनों लोक पुनः प्राप्त कर, परम ऐश्वर्य से युक्त होकर, निर्भय होकर आनंद मनाया।

श्लोक 26 (bhagavata.8.23.26)

ब्रह्मा शर्वः कुमारश्च भृग्वाद्या मुनयो नृप । पितरः सर्वभूतानि सिद्धा वैमानिकाश्च ये ॥ २६ ॥

brahmā śarvaḥ kumāraś ca bhṛgv-ādyā munayo nṛpa pitaraḥ sarva-bhūtāni siddhā vaimānikāś ca ye

हे राजन्, ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, भृगु आदि मुनिगण, पितर, समस्त प्राणी, सिद्धगण तथा विमानचारी देवगण — सभी ने,

श्लोक 27 (bhagavata.8.23.27)

सुमहत् कर्म तद् विष्णोर्गायन्तः परमद्भुतम् । धिष्ण्यानि स्वानि ते जग्मुरदितिं च शशंसिरे ॥ २७ ॥

sumahat karma tad viṣṇor gāyantaḥ param adbhutam dhiṣṇyāni svāni te jagmur aditiṁ ca śaśaṁsire

विष्णु के उस महान, परम अद्भुत कर्म का गान करते हुए अपने-अपने लोकों को लौट गए, और अदिति की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

श्लोक 28 (bhagavata.8.23.28)

सर्वमेतन्मयाख्यातं भवतः कुलनन्दन । उरुक्रमस्य चरितं श्रोतृणामघमोचनम् ॥ २८ ॥

sarvam etan mayākhyātaṁ bhavataḥ kula-nandana urukramasya caritaṁ śrotṝṇām agha-mocanam

हे कुलनंदन, मैंने आपको उरुक्रम भगवान के इस समूचे चरित्र का वर्णन कर दिया, जिसे सुनने वाले श्रोताओं के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 29 (bhagavata.8.23.29)

पारं महिम्न उरुविक्रमतो गृणानो यः पार्थिवानि विममे स रजांसि मर्त्यः । किं जायमान उत जात उपैति मर्त्य इत्याह मन्त्रदृगृषिः पुरुषस्य यस्य ॥ २९ ॥

pāraṁ mahimna uruvikramato gṛṇāno yaḥ pārthivāni vimame sa rajāṁsi martyaḥ kiṁ jāyamāna uta jāta upaiti martya ity āha mantra-dṛg ṛṣiḥ puruṣasya yasya

जो मरणधर्मा मनुष्य महापराक्रमी भगवान की महिमा का माप कर सके, वही पृथ्वी के समस्त परमाणुओं की भी गणना कर सकता है — यह बात मंत्रद्रष्टा ऋषि ने उन पुरुष के विषय में कही, चाहे वह जन्म ले चुका हो या भविष्य में जन्म लेने वाला हो।

श्लोक 30 (bhagavata.8.23.30)

य इदं देवदेवस्य हरेरद्भुतकर्मणः । अवतारानुचरितं शृण्वन् याति परां गतिम् ॥ ३० ॥

ya idaṁ deva-devasya harer adbhuta-karmaṇaḥ avatārānucaritaṁ śṛṇvan yāti parāṁ gatim

जो कोई देवाधिदेव हरि के इस अद्भुत कर्मों से युक्त अवतार-चरित्र को सुनता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 31 (bhagavata.8.23.31)

क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्र्येऽथ मानुषे । यत्र यत्रानुकीर्त्येत तत् तेषां सुकृतं विदुः ॥ ३१ ॥

kriyamāṇe karmaṇīdaṁ daive pitrye ’tha mānuṣe yatra yatrānukīrtyeta tat teṣāṁ sukṛtaṁ viduḥ

देवताओं की प्रसन्नता के लिए, पितरों के निमित्त, अथवा मनुष्यों से संबंधित किसी भी कर्म के अवसर पर, जहाँ-जहाँ इसका कीर्तन किया जाता है, उसे उन कर्मों का सुकृत ही समझना चाहिए।

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