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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6

देव-असुरों की संधि

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (bhagavata.8.6.1)

श्रीशुक उवाच एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान् हरिरीश्वरः । तेषामाविरभूद् राजन्सहस्रार्कोदयद्युतिः ॥ 6.1 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ stutaḥ sura-gaṇair bhagavān harir īśvaraḥ teṣām āvirabhūd rājan sahasrārkodaya-dyutiḥ

शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! देवताओं द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, सहस्र सूर्यों के एक साथ उदय होने के समान तेजस्वी भगवान हरि उनके समक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.8.6.2)

तेनैव सहसा सर्वे देवाः प्रतिहतेक्षणाः । नापश्यन् खं दिशः क्षौणी- मात्मानं च कुतो विभुम् ॥ 6.2 ॥

tenaiva sahasā sarve devāḥ pratihatekṣaṇāḥ nāpaśyan khaṁ diśaḥ kṣauṇīm ātmānaṁ ca kuto vibhum

उसी तेज से समस्त देवताओं की दृष्टि तत्काल कुंठित हो गई; वे न आकाश देख सके, न दिशाएँ, न पृथ्वी, न स्वयं को — तो उन सर्वशक्तिमान् भगवान को कैसे देख पाते?

श्लोक 3 (bhagavata.8.6.3)

विरिञ्चो भगवान्दृष्ट्वा सह शर्वेण तां तनुम् । स्वच्छां मरकतश्यामां कञ्जगर्भारुणेक्षणाम् ॥ 6.3 ॥

viriñco bhagavān dṛṣṭvā saha śarveṇa tāṁ tanum svacchāṁ marakata-śyāmāṁ kañja-garbhāruṇekṣaṇām

तब ब्रह्मा ने शिव सहित उस स्वच्छ, मरकतमणि के समान श्यामल, कमल-गर्भ के समान अरुण नेत्रों वाले दिव्य स्वरूप का दर्शन किया।

श्लोक 4 (bhagavata.8.6.4)

तप्तहेमावदातेन लसत्कौशेयवाससा । प्रसन्नचारुसर्वाङ्गीं सुमुखीं सुन्दरभ्रुवम् ॥ 6.4 ॥

tapta-hemāvadātena lasat-kauśeya-vāsasā prasanna-cāru-sarvāṅgīṁ sumukhīṁ sundara-bhruvam

तपाए हुए स्वर्ण के समान उज्ज्वल, चमकते रेशमी वस्त्रों से सुशोभित, प्रसन्न व सुंदर अंगों वाले, मनोहर मुख तथा सुंदर भौंहों वाले उस स्वरूप को उन्होंने देखा।

श्लोक 5 (bhagavata.8.6.5)

महामणिकिरीटेन केयूराभ्यां च भूषिताम् । कर्णाभरणनिर्भातकपोलश्रीमुखाम्बुजाम् ॥ 6.5 ॥

mahā-maṇi-kirīṭena keyūrābhyāṁ ca bhūṣitām karṇābharaṇa-nirbhāta- kapola-śrī-mukhāmbujām

महामणिजड़ित मुकुट तथा भुजबन्दों से सुशोभित, कर्ण-आभूषणों की आभा से दीप्तिमान कपोलों वाले तथा शोभायमान कमल-मुख वाले उस रूप को उन्होंने देखा।

श्लोक 6 (bhagavata.8.6.6)

काञ्चीकलापवलयहारनूपुरशोभिताम् । कौस्तुभाभरणां लक्ष्मीं बिभ्रतीं वनमालिनीम् ॥ 6.6 ॥

kāñcīkalāpa-valaya- hāra-nūpura-śobhitām kaustubhābharaṇāṁ lakṣmīṁ bibhratīṁ vana-mālinīm

करधनी, कंकण, हार तथा नूपुरों से सुशोभित, कौस्तुभमणि से अलंकृत, लक्ष्मी को धारण करने वाले तथा वनमाला पहने हुए उस रूप को उन्होंने देखा।

श्लोक 7 (bhagavata.8.6.7)

सुदर्शनादिभिः स्वास्त्रैर्मूर्तिमद्भिरुपासिताम् । तुष्टाव देवप्रवरः सशर्वः पुरुषं परम् । सर्वामरगणैः साकं सर्वाङ्गैरवनिं गतैः ॥ 6.7 ॥

sudarśanādibhiḥ svāstrair mūrtimadbhir upāsitām tuṣṭāva deva-pravaraḥ saśarvaḥ puruṣaṁ param sarvāmara-gaṇaiḥ sākaṁ sarvāṅgair avaniṁ gataiḥ

सुदर्शन आदि साक्षात् शरीरधारी अस्त्रों से सेवित, उस परम पुरुष की, ब्रह्मा ने शिव सहित तथा समस्त देवगणों के साथ, सब भूमि पर साष्टांग प्रणाम करते हुए स्तुति की।

श्लोक 8 (bhagavata.8.6.8)

श्रीब्रह्मोवाच अजातजन्मस्थितिसंयमाया- गुणाय निर्वाणसुखार्णवाय । अणोरणिम्नेऽपरिगण्यधाम्ने महानुभावाय नमो नमस्ते ॥ 6.8 ॥

śrī-brahmovāca ajāta-janma-sthiti-saṁyamāyā- guṇāya nirvāṇa-sukhārṇavāya aṇor aṇimne ’parigaṇya-dhāmne mahānubhāvāya namo namas te

ब्रह्मा ने कहा — जो स्वयं अजन्मा होते हुए भी जन्म, स्थिति और संहार के कारण हैं, जो सद्गुणस्वरूप, निर्वाण-सुख के सागर, अणु से भी अणु, अपरिमेय तेज वाले तथा महान् प्रभावशाली हैं — आपको बारंबार नमस्कार।

श्लोक 9 (bhagavata.8.6.9)

रूपं तवैतत् पुरुषर्षभेज्यं श्रेयोऽर्थिभिर्वैदिकतान्त्रिकेण । योगेन धातः सह नस्त्रिलोकान् पश्याम्यमुष्मिन्नु ह विश्वमूर्तौ ॥ 6.9 ॥

rūpaṁ tavaitat puruṣarṣabhejyaṁ śreyo ’rthibhir vaidika-tāntrikeṇa yogena dhātaḥ saha nas tri-lokān paśyāmy amuṣminn u ha viśva-mūrtau

हे पुरुषोत्तम! आपके इस रूप की आराधना कल्याण-कामी जन वैदिक तथा तान्त्रिक विधि से करते हैं; हे विधाता! इस विश्वरूप में हम आपके साथ त्रिलोक का साक्षात्कार कर रहे हैं।

श्लोक 10 (bhagavata.8.6.10)

त्वय्यग्र आसीत् त्वयि मध्य आसीत् त्वय्यन्त आसीदिदमात्मतन्त्रे । त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यं घटस्य मृत्स्नेव परः परस्मात् ॥ 6.10 ॥

tvayy agra āsīt tvayi madhya āsīt tvayy anta āsīd idam ātma-tantre tvam ādir anto jagato ’sya madhyaṁ ghaṭasya mṛtsneva paraḥ parasmāt

हे स्वतन्त्र प्रभु! आप में ही यह जगत् आदि में था, आप में ही मध्य में है, तथा आप में ही अन्त में रहेगा; जिस प्रकार घट का मूल कारण मिट्टी है, उसी प्रकार आप इस जगत् के आदि, मध्य और अन्त हैं, तथा परम से भी परे हैं।

श्लोक 11 (bhagavata.8.6.11)

त्वं माययात्माश्रयया स्वयेदं निर्माय विश्वं तदनुप्रविष्टः । पश्यन्ति युक्ता मनसा मनीषिणो गुणव्यवायेऽप्यगुणं विपश्चितः ॥ 6.11 ॥

tvaṁ māyayātmāśrayayā svayedaṁ nirmāya viśvaṁ tad-anupraviṣṭaḥ paśyanti yuktā manasā manīṣiṇo guṇa-vyavāye ’py aguṇaṁ vipaścitaḥ

आपने अपनी ही आश्रित माया से इस विश्व की रचना कर, स्वयं उसमें प्रवेश किया; संयमित मन वाले विद्वान् ज्ञानीजन देखते हैं कि गुणों के व्यापार के बीच भी आप सदा निर्गुण ही रहते हैं।

श्लोक 12 (bhagavata.8.6.12)

यथाग्निमेधस्यमृतं च गोषु भुव्यन्नमम्बूद्यमने च वृत्तिम् । योगैर्मनुष्या अधियन्ति हि त्वां गुणेषु बुद्ध्या कवयो वदन्ति ॥ 6.12 ॥

yathāgnim edhasy amṛtaṁ ca goṣu bhuvy annam ambūdyamane ca vṛttim yogair manuṣyā adhiyanti hi tvāṁ guṇeṣu buddhyā kavayo vadanti

जैसे काष्ठ में अग्नि, गौओं में अमृततुल्य दुग्ध, पृथ्वी में अन्न-जल तथा उद्यम में आजीविका छिपी रहती है, वैसे ही मनुष्य योग-साधना द्वारा आपको प्राप्त करते हैं — ऐसा ज्ञानीजन गुणों के माध्यम से बुद्धिपूर्वक कहते हैं।

श्लोक 13 (bhagavata.8.6.13)

तं त्वां वयं नाथ समुज्जिहानं सरोजनाभातिचिरेप्सितार्थम् । दृष्ट्वा गता निर्वृतमद्य सर्वे गजा दवार्ता इव गाङ्गमम्भः ॥ 6.13 ॥

taṁ tvāṁ vayaṁ nātha samujjihānaṁ saroja-nābhāticirepsitārtham dṛṣṭvā gatā nirvṛtam adya sarve gajā davārtā iva gāṅgam ambhaḥ

हे नाथ! हे कमलनाभ! चिरकाल से अभीष्ट आपको इस प्रकार प्रकट हुआ देखकर, हम सब आज उसी प्रकार आनन्दित हो गए हैं जैसे दावाग्नि से पीड़ित हाथी गंगाजल पाकर हो जाते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.8.6.14)

स त्वं विधत्स्वाखिललोकपाला वयं यदर्थास्तव पादमूलम् । समागतास्ते बहिरन्तरात्मन् किं वान्यविज्ञाप्यमशेषसाक्षिणः ॥ 6.14 ॥

sa tvaṁ vidhatsvākhila-loka-pālā vayaṁ yad arthās tava pāda-mūlam samāgatās te bahir-antar-ātman kiṁ vānya-vijñāpyam aśeṣa-sākṣiṇaḥ

अतः आप ही व्यवस्था करें — हम सब लोकपाल जिस प्रयोजन से आपके चरणों में आए हैं, हे अन्तर्बाह्य आत्मा! आप सर्वसाक्षी को और क्या निवेदन करें?

श्लोक 15 (bhagavata.8.6.15)

अहं गिरित्रश्च सुरादयो ये दक्षादयोऽग्नेरिव केतवस्ते । किं वा विदामेश पृथग्विभाता विधत्स्व शं नो द्विजदेवमन्त्रम् ॥ 6.15 ॥

ahaṁ giritraś ca surādayo ye dakṣādayo ’gner iva ketavas te kiṁ vā vidāmeśa pṛthag-vibhātā vidhatsva śaṁ no dvija-deva-mantram

मैं, शिव तथा दक्ष आदि अन्य देवगण — हम सब उसी प्रकार आपसे उत्पन्न स्फुलिंग हैं जैसे अग्नि से चिंगारियाँ; हे ईश्वर! हम पृथक्-पृथक् प्रकट हुए भला क्या जान सकते हैं? आप हमें वह उपाय बताइए जो ब्राह्मणों और देवताओं दोनों के लिए कल्याणकारी हो।

श्लोक 16 (bhagavata.8.6.16)

श्रीशुक उवाच एवं विरिञ्चादिभिरीडितस्तद् विज्ञाय तेषां हृदयं यथैव । जगाद जीमूतगभीरया गिरा बद्धाञ्जलीन्संवृतसर्वकारकान् ॥ 6.16 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ viriñcādibhir īḍitas tad vijñāya teṣāṁ hṛdayaṁ yathaiva jagāda jīmūta-gabhīrayā girā baddhāñjalīn saṁvṛta-sarva-kārakān

शुकदेव जी ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा आदि द्वारा स्तुति किए जाने पर, उनके हृदय के भाव को यथावत् जानकर, भगवान ने मेघ के समान गंभीर वाणी में, हाथ जोड़े तथा सभी इन्द्रियों को संयत किए खड़े उन देवताओं से कहा।

श्लोक 17 (bhagavata.8.6.17)

एक एवेश्वरस्तस्मिन्सुरकार्ये सुरेश्वरः । विहर्तुकामस्तानाह समुद्रोन्मथनादिभिः ॥ 6.17 ॥

eka eveśvaras tasmin sura-kārye sureśvaraḥ vihartu-kāmas tān āha samudronmathanādibhiḥ

उस देवकार्य को अकेले ही सम्पन्न करने में समर्थ होते हुए भी, देवेश्वर भगवान ने लीला-विहार की इच्छा से उनसे समुद्र-मन्थन आदि के विषय में कहा।

श्लोक 18 (bhagavata.8.6.18)

श्रीभगवानुवाच हन्त ब्रह्मन्नहो शम्भो हे देवा मम भाषितम् । शृणुतावहिताः सर्वे श्रेयो वः स्याद् यथा सुराः ॥ 6.18 ॥

śrī-bhagavān uvāca hanta brahmann aho śambho he devā mama bhāṣitam śṛṇutāvahitāḥ sarve śreyo vaḥ syād yathā surāḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे शम्भो! हे देवताओ! तुम सब मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो, जिससे तुम्हारा कल्याण हो सके।

श्लोक 19 (bhagavata.8.6.19)

यात दानवदैतेयैस्तावत् सन्धिर्विधीयताम् । कालेनानुगृहीतैस्तैर्यावद् वो भव आत्मनः ॥ 6.19 ॥

yāta dānava-daiteyais tāvat sandhir vidhīyatām kālenānugṛhītais tair yāvad vo bhava ātmanaḥ

जाओ और, जब तक तुम्हारा अपना बल न बढ़ जाए, तब तक काल द्वारा अनुगृहीत उन दानवों और दैत्यों से संधि कर लो।

श्लोक 20 (bhagavata.8.6.20)

अरयोऽपि हि सन्धेयाः सति कार्यार्थगौरवे । अहिमूषिकवद् देवा ह्यर्थस्य पदवीं गतैः ॥ 6.20 ॥

arayo ’pi hi sandheyāḥ sati kāryārtha-gaurave ahi-mūṣikavad devā hy arthasya padavīṁ gataiḥ

हे देवगण! जब कोई गुरुतर कार्य सिद्ध करना हो, तो शत्रुओं से भी उसी प्रकार संधि कर लेनी चाहिए, जैसे सर्प और चूहा प्रयोजनवश परस्पर सहयोग कर लेते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.8.6.21)

अमृतोत्पादने यत्नः क्रियतामविलम्बितम् । यस्य पीतस्य वै जन्तुर्मृत्युग्रस्तोऽमरो भवेत् ॥ 6.21 ॥

amṛtotpādane yatnaḥ kriyatām avilambitam yasya pītasya vai jantur mṛtyu-grasto ’maro bhavet

अविलम्ब अमृत उत्पन्न करने का प्रयत्न करो, जिसे पीकर मृत्यु के ग्रास में पड़ा प्राणी भी अमर हो जाए।

श्लोक 22 (bhagavata.8.6.22)

क्षिप्त्वा क्षीरोदधौ सर्वा वीरुत्तृणलतौषधीः । मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् ॥ 6.22 ॥

kṣiptvā kṣīrodadhau sarvā vīrut-tṛṇa-latauṣadhīḥ manthānaṁ mandaraṁ kṛtvā netraṁ kṛtvā tu vāsukim

क्षीरसागर में समस्त लता, तृण तथा औषधियाँ डालकर, मन्दराचल को मन्थनदण्ड तथा वासुकि को मथानी की रस्सी बनाकर।

श्लोक 23 (bhagavata.8.6.23)

सहायेन मया देवा निर्मन्थध्वमतन्द्रिताः । क्लेशभाजो भविष्यन्ति दैत्या यूयं फलग्रहाः ॥ 6.23 ॥

sahāyena mayā devā nirmanthadhvam atandritāḥ kleśa-bhājo bhaviṣyanti daityā yūyaṁ phala-grahāḥ

हे देवगण! मुझे सहायक बनाकर अथक भाव से मन्थन करो; परिश्रम दैत्यों के भाग्य में होगा, और फल तुम्हें प्राप्त होगा।

श्लोक 24 (bhagavata.8.6.24)

यूयं तदनुमोदध्वं यदिच्छन्त्यसुराः सुराः । न संरम्भेण सिध्यन्ति सर्वार्थाः सान्त्वया यथा ॥ 6.24 ॥

yūyaṁ tad anumodadhvaṁ yad icchanty asurāḥ surāḥ na saṁrambheṇa sidhyanti sarvārthāḥ sāntvayā yathā

हे देवगण! असुर जो कुछ माँगें, उसे स्वीकार कर लो; क्योंकि क्रोध से किसी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती, जैसी सांत्वना और सहमति से होती है।

श्लोक 25 (bhagavata.8.6.25)

न भेतव्यं कालकूटाद् विषाज्जलधिसम्भवात् । लोभः कार्यो न वो जातु रोषः कामस्तु वस्तुषु ॥ 6.25 ॥

na bhetavyaṁ kālakūṭād viṣāj jaladhi-sambhavāt lobhaḥ kāryo na vo jātu roṣaḥ kāmas tu vastuṣu

समुद्र से उत्पन्न होने वाले कालकूट विष से मत डरो; तथा जो भी वस्तुएँ निकलें, उनके प्रति तुम्हें कभी लोभ, क्रोध अथवा कामना नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 26 (bhagavata.8.6.26)

श्रीशुक उवाच इति देवान्समादिश्य भगवान् पुरुषोत्तमः । तेषामन्तर्दधे राजन्स्वच्छन्दगतिरीश्वरः ॥ 6.26 ॥

śrī-śuka uvāca iti devān samādiśya bhagavān puruṣottamaḥ teṣām antardadhe rājan svacchanda-gatir īśvaraḥ

शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! देवताओं को इस प्रकार आदेश देकर, स्वेच्छाचारी गति वाले भगवान पुरुषोत्तम उनकी दृष्टि से अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 27 (bhagavata.8.6.27)

अथ तस्मै भगवते नमस्कृत्य पितामहः । भवश्च जग्मतुः स्वं स्वं धामोपेयुर्बलिं सुराः ॥ 6.27 ॥

atha tasmai bhagavate namaskṛtya pitāmahaḥ bhavaś ca jagmatuḥ svaṁ svaṁ dhāmopeyur baliṁ surāḥ

तब पितामह ब्रह्मा और शिव, उन भगवान को प्रणाम करके, अपने-अपने धाम को चले गए; और देवगण बलि के पास पहुँचे।

श्लोक 28 (bhagavata.8.6.28)

दृष्ट्वारीनप्यसंयत्ताञ्जातक्षोभान्स्वनायकान् । न्यषेधद् दैत्यराट् श्लोक्यः सन्धिविग्रहकालवित् ॥ 6.28 ॥

dṛṣṭvārīn apy asaṁyattāñ jāta-kṣobhān sva-nāyakān nyaṣedhad daitya-rāṭ ślokyaḥ sandhi-vigraha-kālavit

अपने सेनापतियों को निःशस्त्र शत्रुओं पर भी आक्रमण के लिए उद्वेलित देखकर, संधि और युद्ध के समय को भलीभाँति जानने वाले यशस्वी दैत्यराज बलि ने उन्हें रोक दिया।

श्लोक 29 (bhagavata.8.6.29)

ते वैरोचनिमासीनं गुप्तं चासुरयूथपैः । श्रिया परमया जुष्टं जिताशेषमुपागमन् ॥ 6.29 ॥

te vairocanim āsīnaṁ guptaṁ cāsura-yūtha-paiḥ śriyā paramayā juṣṭaṁ jitāśeṣam upāgaman

वे देवगण असुर-सेनापतियों से सुरक्षित, परम श्री से युक्त तथा सर्वविजयी वैरोचनि (बलि) के पास पहुँचे।

श्लोक 30 (bhagavata.8.6.30)

महेन्द्रः श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयित्वा महामतिः । अभ्यभाषत तत् सर्वं शिक्षितं पुरुषोत्तमात् ॥ 6.30 ॥

mahendraḥ ślakṣṇayā vācā sāntvayitvā mahā-matiḥ abhyabhāṣata tat sarvaṁ śikṣitaṁ puruṣottamāt

महाबुद्धिमान् महेन्द्र ने मृदु वचनों से उन्हें सांत्वना देकर, पुरुषोत्तम भगवान से जो कुछ सीखा था, वह सब उनसे कह सुनाया।

श्लोक 31 (bhagavata.8.6.31)

तत्त्वरोचत दैत्यस्य तत्रान्ये येऽसुराधिपाः । शम्बरोऽरिष्टनेमिश्च ये च त्रिपुरवासिनः ॥ 6.31 ॥

tat tv arocata daityasya tatrānye ye ’surādhipāḥ śambaro ’riṣṭanemiś ca ye ca tripura-vāsinaḥ

यह प्रस्ताव दैत्यराज को तथा वहाँ उपस्थित अन्य असुर-नायकों — शम्बर, अरिष्टनेमि तथा त्रिपुरवासियों — को भी भा गया।

श्लोक 32 (bhagavata.8.6.32)

ततो देवासुराः कृत्वा संविदं कृतसौहृदाः । उद्यमं परमं चक्रुरमृतार्थे परन्तप ॥ 6.32 ॥

tato devāsurāḥ kṛtvā saṁvidaṁ kṛta-sauhṛdāḥ udyamaṁ paramaṁ cakrur amṛtārthe parantapa

हे परन्तप! तत्पश्चात् देव और असुर, आपस में संधि कर मित्रता स्थापित करके, अमृत-प्राप्ति के लिए महान् उद्यम में जुट गए।

श्लोक 33 (bhagavata.8.6.33)

ततस्ते मन्दरगिरिमोजसोत्पाट्य दुर्मदाः । नदन्त उदधिं निन्युः शक्ताः परिघबाहवः ॥ 6.33 ॥

tatas te mandara-girim ojasotpāṭya durmadāḥ nadanta udadhiṁ ninyuḥ śaktāḥ parigha-bāhavaḥ

तब वे शक्तिशाली, गदा के समान भुजाओं वाले, मदमत्त देव-असुरों ने बलपूर्वक मन्दराचल को उखाड़कर, गर्जन करते हुए समुद्र की ओर ले चला।

श्लोक 34 (bhagavata.8.6.34)

दूरभारोद्वहश्रान्ताः शक्रवैरोचनादयः । अपारयन्तस्तं वोढुं विवशा विजहुः पथि ॥ 6.34 ॥

dūra-bhārodvaha-śrāntāḥ śakra-vairocanādayaḥ apārayantas taṁ voḍhuṁ vivaśā vijahuḥ pathi

इन्द्र, बलि आदि, इतनी दूर तक भारी बोझ ढोने से थककर, उसे और आगे न ले जा पाने के कारण, विवश होकर मार्ग में ही छोड़ बैठे।

श्लोक 35 (bhagavata.8.6.35)

निपतन्स गिरिस्तत्र बहूनमरदानवान् । चूर्णयामास महता भारेण कनकाचलः ॥ 6.35 ॥

nipatan sa giris tatra bahūn amara-dānavān cūrṇayām āsa mahatā bhāreṇa kanakācalaḥ

गिरते हुए उस स्वर्णमय पर्वत ने अपने विशाल भार से वहाँ अनेक देवताओं और दानवों को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 36 (bhagavata.8.6.36)

तांस्तथा भग्नमनसो भग्नबाहूरुकन्धरान् । विज्ञाय भगवांस्तत्र बभूव गरुडध्वजः ॥ 6.36 ॥

tāṁs tathā bhagna-manaso bhagna-bāhūru-kandharān vijñāya bhagavāṁs tatra babhūva garuḍa-dhvajaḥ

उन्हें इस प्रकार निराश, भुजा, जंघा और गर्दन टूटे हुए देखकर, भगवान गरुड़ पर आरूढ़ होकर वहाँ प्रकट हो गए।

श्लोक 37 (bhagavata.8.6.37)

गिरिपातविनिष्पिष्टान्विलोक्यामरदानवान् । ईक्षया जीवयामास निर्जरान् निर्व्रणान् यथा ॥ 6.37 ॥

giri-pāta-viniṣpiṣṭān vilokyāmara-dānavān īkṣayā jīvayām āsa nirjarān nirvraṇān yathā

पर्वत के गिरने से कुचले हुए देव-दानवों को देखकर, उन्होंने अपनी दृष्टिमात्र से उन्हें पुनः जीवित कर दिया, मानो वे पहले की भाँति निर्जर और घावरहित हों।

श्लोक 38 (bhagavata.8.6.38)

गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनैकेन लीलया । आरुह्य प्रययावब्धिं सुरासुरगणैर्वृतः ॥ 6.38 ॥

giriṁ cāropya garuḍe hastenaikena līlayā āruhya prayayāv abdhiṁ surāsura-gaṇair vṛtaḥ

फिर एक ही हाथ से खेल-खेल में पर्वत को गरुड़ पर आरोपित कर, स्वयं भी आरूढ़ होकर, देव-असुरों के समूह से घिरे हुए वे समुद्र की ओर चले।

श्लोक 39 (bhagavata.8.6.39)

अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः । ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ 6.39 ॥

avaropya giriṁ skandhāt suparṇaḥ patatāṁ varaḥ yayau jalānta utsṛjya hariṇā sa visarjitaḥ

पक्षियों में श्रेष्ठ सुपर्ण (गरुड़) ने पर्वत को अपने कंधे से उतारकर जल के समीप रख दिया, और तत्पश्चात् हरि द्वारा विदा किए जाने पर वहाँ से चले गए।

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