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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11

बुधोत्पत्ति

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (devibhagavatam.1.11.1)

ऋषय ऊचुः । कोऽसौ पुरूरवा राजा कोर्वशी देवकन्यका । कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना ॥ 11.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ ko'sau purūravā rājā korvaśī devakanyakā kathaṁ kaṣṭaṁ ca samprāptaṁ tena rājñā mahātmanā

ऋषियों ने कहा — वह राजा पुरूरवा कौन था, और देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस महात्मा राजा को किस प्रकार का कष्ट प्राप्त हुआ?

श्लोक 2 (devibhagavatam.1.11.2)

सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना । श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम् ॥ 11.2 ॥

sarvaṁ kathānakaṁ brūhi lomaharṣaṇajādhunā śrotukāmā vayaṁ sarve tvanmukhābjacyutaṁ rasam

हे लोमहर्षण-पुत्र! अब वह सम्पूर्ण कथा बताइए; हम सब आपके मुख-कमल से झरते रस को सुनने के इच्छुक हैं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.1.11.3)

अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका । न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामराः ॥ 11.3 ॥

amṛtādapi miṣṭā te vāṇī sūta rasātmikā na tṛpyāmo vayaṁ sarve sudhayā ca yathāmarāḥ

हे सूत! आपकी रसमय वाणी अमृत से भी अधिक मधुर है; जैसे देवगण अमृत से तृप्त नहीं होते, वैसे ही हम सब भी तृप्त नहीं होते।

श्लोक 4 (devibhagavatam.1.11.4)

सूत उवाच । शृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम् । वक्ष्याम्यहं यथाबुद्।ह्ध्या श्रुतां व्यासवरोत्तमात् ॥ 11.4 ॥

sūta uvāca śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve kathāṁ divyāṁ manoramām vakṣyāmyahaṁ yathābud|hdhyā śrutāṁ vyāsavarottamāt

सूत ने कहा — हे मुनिगण! सुनिए यह दिव्य, मनोहर कथा; व्यासश्रेष्ठ से जैसा सुना है, वैसा ही अपनी बुद्धि के अनुसार मैं कहूँगा।

श्लोक 5 (devibhagavatam.1.11.5)

गुरोस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता । रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला ॥ 11.5 ॥

gurostu dayitā bhāryā tārā nāmeti viśrutā rūpayauvanayuktā sā cārvaṅgī madavihvalā

गुरु (बृहस्पति) की प्रिय पत्नी तारा नाम से प्रसिद्ध थी, रूप-यौवन से युक्त, सुंदर अंगों वाली, गर्व से विह्वल।

श्लोक 6 (devibhagavatam.1.11.6)

गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनी । दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी ॥ 11.6 ॥

gataikadā vidhordhāma yajamānasya bhāminī dṛṣṭā ca śaśinātyarthaṁ rūpayauvanaśālinī

एक बार वह सुंदरी यजमान (बृहस्पति के यज्ञ-कार्य से) चन्द्रमा के धाम गई, और रूप-यौवन से सुशोभित उसे चन्द्रमा ने अत्यंत ध्यान से देखा।

श्लोक 7 (devibhagavatam.1.11.7)

कामातुरस्तदा जातः शशी शशिमुखीं प्रति । सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीडिता ॥ 11.7 ॥

kāmāturastadā jātaḥ śaśī śaśimukhīṁ prati sāpi vīkṣya vidhuṁ kāmaṁ jātā madanapīḍitā

तब चन्द्रमा उस चन्द्रमुखी के प्रति कामातुर हो उठे; वह भी चन्द्रमा को देखकर काम से पीड़ित हो गई।

श्लोक 8 (devibhagavatam.1.11.8)

तावन्योन्यं प्रेमयुक्तौ स्मरार्तौ च बभूवतुः । तारा शशी मदोन्मत्तौ कामबाणप्रपीडितौ ॥ 11.8 ॥

tāvanyonyaṁ premayuktau smarārtau ca babhūvatuḥ tārā śaśī madonmattau kāmabāṇaprapīḍitau

वे दोनों परस्पर प्रेमयुक्त तथा स्मरातुर हो गए — तारा और चन्द्रमा, मदोन्मत्त, कामबाणों से अत्यंत पीड़ित।

श्लोक 9 (devibhagavatam.1.11.9)

रेमाते मदमत्तौ तौ परस्परस्पृहान्वितौ । दिनानि कतिचित्तत्र जातानि रममाणयोः ॥ 11.9 ॥

remāte madamattau tau parasparaspṛhānvitau dināni katicittatra jātāni ramamāṇayoḥ

मदमत्त, परस्पर आसक्त वे दोनों रमण करने लगे; वहाँ रमण करते हुए उनके कुछ दिन बीत गए।

श्लोक 10 (devibhagavatam.1.11.10)

बृहस्पतिस्तु दुःखार्तस्तारामानयितुं गृहम् । प्रेषयामास शिष्यं तु नायाता सा वशीकृता ॥ 11.10 ॥

bṛhaspatistu duḥkhārtastārāmānayituṁ gṛham preṣayāmāsa śiṣyaṁ tu nāyātā sā vaśīkṛtā

दुःखी बृहस्पति ने तारा को घर लाने के लिए अपने शिष्य को भेजा; परन्तु वह उनके वश में हो चुकी थी, वापस नहीं लौटी।

श्लोक 11 (devibhagavatam.1.11.11)

पुनः पुनर्यदा शिष्यं परावर्तत चन्द्रमाः । बृहस्पतिस्तदा क्रुद्धो जगाम स्वयमेव हि ॥ 11.11 ॥

punaḥ punaryadā śiṣyaṁ parāvartata candramāḥ bṛhaspatistadā kruddho jagāma svayameva hi

जब चन्द्रमा ने बार-बार उस शिष्य को लौटा दिया, तब बृहस्पति क्रोधित होकर स्वयं ही वहाँ गए।

श्लोक 12 (devibhagavatam.1.11.12)

गत्वा सोमगृहं तत्र वाचस्पतिरुदारधीः । उवाच शशिनं क्रुद्धः स्मयमानं मदान्वितम् ॥ 11.12 ॥

gatvā somagṛhaṁ tatra vācaspatirudāradhīḥ uvāca śaśinaṁ kruddhaḥ smayamānaṁ madānvitam

उदार बुद्धि वाले वाचस्पति ने चन्द्रमा के घर जाकर, हँसते हुए, मद से युक्त चन्द्रमा से क्रोधपूर्वक कहा —

श्लोक 13 (devibhagavatam.1.11.13)

किं कृतं किल शीतांशो कर्म धर्मविगर्हितम् । रक्षिता मम भार्येयं सुन्दरी केन हेतुना ॥ 11.13 ॥

kiṁ kṛtaṁ kila śītāṁśo karma dharmavigarhitam rakṣitā mama bhāryeyaṁ sundarī kena hetunā

'हे शीतांशु! यह क्या धर्मविगर्हित कार्य किया है? किस कारण मेरी इस सुंदरी पत्नी को यहाँ रोक रखा है?'

श्लोक 14 (devibhagavatam.1.11.14)

तव देव गुरुश्चाहं यजमानोऽसि सर्वथा । गुरुभार्या कथं मूढ भुक्ता किं रक्षिताथवा ॥ 11.14 ॥

tava deva guruścāhaṁ yajamāno'si sarvathā gurubhāryā kathaṁ mūḍha bhuktā kiṁ rakṣitāthavā

'हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ, और सर्वथा तुम्हारा यजमान हूँ; हे मूर्ख! गुरुपत्नी का भोग या रक्षण कैसे किया गया?'

श्लोक 15 (devibhagavatam.1.11.15)

ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः । महापातकिनो ह्येते तत्संसर्गी च पञ्चमः ॥ 11.15 ॥

brahmahā hemahārī ca surāpo gurutalpagaḥ mahāpātakino hyete tatsaṁsargī ca pañcamaḥ

'ब्रह्महत्यारा, स्वर्णचोर, मद्यपायी और गुरु की शय्या को दूषित करने वाला — ये महापातकी हैं; और पाँचवाँ है उनका संगी।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.1.11.16)

महापातकयुक्तस्त्वं दुराचारोऽतिगर्हितः । न देवसदनार्होऽसि यदि भुक्तेयमङ्गना ॥ 11.16 ॥

mahāpātakayuktastvaṁ durācāro'tigarhitaḥ na devasadanārho'si yadi bhukteyamaṅganā

'तुम महापातक से युक्त, दुराचारी, अत्यंत निन्दनीय हो; यदि इस स्त्री का भोग किया गया है, तो तुम देवसदन के योग्य नहीं हो।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.1.11.17)

मुञ्चेमामसितापाङ्गीं नयामि सदनं मम । नोचेद्वक्ष्यामि दुष्टात्मन् गुरुदारापहारिणम् ॥ 11.17 ॥

muñcemāmasitāpāṅgīṁ nayāmi sadanaṁ mama nocedvakṣyāmi duṣṭātman gurudārāpahāriṇam

'इस श्यामनयना को छोड़ दो, मैं इसे अपने घर ले जाता हूँ; अन्यथा, हे दुरात्मन्! मैं तुम्हें गुरुपत्नी-अपहर्ता कहकर घोषित करूँगा।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.1.11.18)

इत्येवं भाषमाणं तमुवाच रोहिणीपतिः । गुरुं क्रोधसमायुक्तं कान्ताविरहदुःखितम् ॥ 11.18 ॥

ityevaṁ bhāṣamāṇaṁ tamuvāca rohiṇīpatiḥ guruṁ krodhasamāyuktaṁ kāntāvirahaduḥkhitam

इस प्रकार बोलते हुए उस गुरु से, जो क्रोध से भरे तथा प्रिया के वियोग से दुःखी थे, रोहिणीपति (चन्द्रमा) ने कहा —

श्लोक 19 (devibhagavatam.1.11.19)

इन्दुरुवाच । क्रोधात्ते तु दुराराध्या ब्राह्मणाः क्रोधवर्जिताः । पूजार्हा धर्मशास्त्रज्ञा वर्जनीयास्ततोऽन्यथा ॥ 11.19 ॥

induruvāca krodhātte tu durārādhyā brāhmaṇāḥ krodhavarjitāḥ pūjārhā dharmaśāstrajñā varjanīyāstato'nyathā

चन्द्रमा ने कहा — क्रोध के कारण ही तुम दुराराध्य हो गए हो; ब्राह्मण तो क्रोधरहित होते हैं। धर्मशास्त्र के ज्ञाता ही पूजा के योग्य हैं, अन्यथा वे त्याज्य हैं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.1.11.20)

आगमिष्यति सा कामं गृहं ते वरवर्णिनी । अत्रैव संस्थिता बाला का ते हानिरिहानघ ॥ 11.20 ॥

āgamiṣyati sā kāmaṁ gṛhaṁ te varavarṇinī atraiva saṁsthitā bālā kā te hānirihānagha

'वह सुंदरी अपनी इच्छा से तुम्हारे घर वापस आ जाएगी; यह युवती तो अभी यहीं ठहरी है — हे निष्पाप! इसमें तुम्हारी क्या हानि है?'

श्लोक 21 (devibhagavatam.1.11.21)

इच्छया संस्थिता चात्र सुखकामार्थिनी हि सा । दिनानि कतिचित्स्थित्वा स्वेच्छया चागमिष्यति ॥ 11.21 ॥

icchayā saṁsthitā cātra sukhakāmārthinī hi sā dināni katicitsthitvā svecchayā cāgamiṣyati

'वह अपनी इच्छा से ही यहाँ ठहरी है, सुख और कामना की अभिलाषिणी; कुछ दिन ठहरकर वह अपनी इच्छा से ही लौट जाएगी।'

श्लोक 22 (devibhagavatam.1.11.22)

त्वयैवोदाहृतं पूर्वं धर्मशास्त्रमतं तथा । न स्त्री दुष्यति चारेण न विप्रो वेदकर्मणा ॥ 11.22 ॥

tvayaivodāhṛtaṁ pūrvaṁ dharmaśāstramataṁ tathā na strī duṣyati cāreṇa na vipro vedakarmaṇā

'तुमने ही पहले धर्मशास्त्र के मत के अनुसार कहा है कि स्त्री केवल आचरण मात्र से दूषित नहीं होती, जैसे ब्राह्मण वेद-कर्म से दूषित नहीं होता।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.1.11.23)

इत्युक्तः शशिना तत्र गुरुरत्यन्तदुःखितः । जगाम स्वगृहं तूर्णं चिन्ताविष्टः स्मरातुरः ॥ 11.23 ॥

ityuktaḥ śaśinā tatra gururatyantaduḥkhitaḥ jagāma svagṛhaṁ tūrṇaṁ cintāviṣṭaḥ smarāturaḥ

चन्द्रमा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, अत्यंत दुःखी गुरु चिन्तामग्न और वियोग-पीड़ित होकर शीघ्र ही अपने घर लौट गए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.1.11.24)

दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा चिन्तातुरो गुरुः । ययावथ गृहं तस्य त्वरितश्चौषधीपतेः ॥ 11.24 ॥

dināni katicittatra sthitvā cintāturo guruḥ yayāvatha gṛhaṁ tasya tvaritaścauṣadhīpateḥ

वहाँ कुछ दिन रहकर, चिन्तित गुरु फिर उस औषधिपति (चन्द्रमा) के घर शीघ्रता से गए।

श्लोक 25 (devibhagavatam.1.11.25)

स्थितः क्षत्रा निषिद्धोऽसौ द्वारदेशे रुषान्वितः । नाजगाम शशी तत्र चुकोपाति बृहस्पतिः ॥ 11.25 ॥

sthitaḥ kṣatrā niṣiddho'sau dvāradeśe ruṣānvitaḥ nājagāma śaśī tatra cukopāti bṛhaspatiḥ

वे द्वारपाल द्वारा रोके जाकर द्वार पर ही क्रोधसहित खड़े रह गए; चन्द्रमा वहाँ नहीं आए, और बृहस्पति अत्यंत क्रोधित हो गए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.1.11.26)

अयं मे शिष्यतां यातो गुरुपत्नीं तु मातरम् । जग्राह बलतोऽधर्मी शिक्षणीयो मयाधुना ॥ 11.26 ॥

ayaṁ me śiṣyatāṁ yāto gurupatnīṁ tu mātaram jagrāha balato'dharmī śikṣaṇīyo mayādhunā

'यह जो मेरा शिष्य बना, उसने बलपूर्वक गुरुपत्नी को — जो उसके लिए माता के समान है — छीन लिया है; इस अधर्मी को अब मैं दण्ड दूँगा।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.1.11.27)

उवाच वाचं कोपात्तु द्वारदेशस्थितो बहिः । किं शेषे भवने मन्द पापाचार सुराधम ॥ 11.27 ॥

uvāca vācaṁ kopāttu dvāradeśasthito bahiḥ kiṁ śeṣe bhavane manda pāpācāra surādhama

द्वार के बाहर खड़े होकर उन्होंने क्रोधवश यह वचन कहा — 'हे मन्द! हे पापाचारी! हे सुरों में अधम! तू घर में क्यों पड़ा है?'

श्लोक 28 (devibhagavatam.1.11.28)

देहि मे कामिनीं शीघ्रं नोचेच्छापं ददाम्यहम् । करोमि भस्मसान्नूनं न ददासि प्रियां मम ॥ 11.28 ॥

dehi me kāminīṁ śīghraṁ nocecchāpaṁ dadāmyaham karomi bhasmasānnūnaṁ na dadāsi priyāṁ mama

'मेरी प्रिया को शीघ्र लौटा दे, अन्यथा मैं तुझे शाप दूँगा; यदि प्रिया नहीं लौटाता, तो निश्चय ही मैं तुझे भस्म कर दूँगा।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.1.11.29)

सूत उवाच । क्रूराणि चैवमादीनि भाषणानि बृहस्पतेः । श्रुत्वा द्विजपतिः शीघ्रं निर्गतः सदनाद्बहिः ॥ 11.29 ॥

sūta uvāca krūrāṇi caivamādīni bhāṣaṇāni bṛhaspateḥ śrutvā dvijapatiḥ śīghraṁ nirgataḥ sadanādbahiḥ

सूत ने कहा — बृहस्पति के इस प्रकार के क्रूर वचन सुनकर, द्विजपति (चन्द्रमा) शीघ्र ही घर से बाहर निकल आए।

श्लोक 30 (devibhagavatam.1.11.30)

तमुवाच हसन्सोमः किमिदं बहु भाषसे । न ते योग्यासितापाङ्गी सर्वलक्षणसंयुता ॥ 11.30 ॥

tamuvāca hasansomaḥ kimidaṁ bahu bhāṣase na te yogyāsitāpāṅgī sarvalakṣaṇasaṁyutā

सोम ने हँसते हुए उनसे कहा — 'तुम इतना क्यों बोल रहे हो? यह सर्वलक्षणसंयुक्त श्यामनयना तुम्हारे योग्य नहीं है।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.1.11.31)

कुरूपां च स्वसदृशीं गृहाणान्यां स्त्रियं द्विज । भिक्षुकस्य गृहे योग्या नेदृशी वरवर्णिनी ॥ 11.31 ॥

kurūpāṁ ca svasadṛśīṁ gṛhāṇānyāṁ striyaṁ dvija bhikṣukasya gṛhe yogyā nedṛśī varavarṇinī

'हे द्विज! अपने ही समान कुरूप कोई अन्य स्त्री ग्रहण करो; भिक्षुक के घर के योग्य ऐसी सुंदरी नहीं होती।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.1.11.32)

रतिः स्वसदृशे कान्ते नार्याः किल निगद्यते । त्वं न जानासि मन्दात्मन् कामशास्त्रविनिर्णयम् ॥ 11.32 ॥

ratiḥ svasadṛśe kānte nāryāḥ kila nigadyate tvaṁ na jānāsi mandātman kāmaśāstravinirṇayam

'स्त्री का रमण अपने ही समान प्रियतम के साथ कहा गया है; हे मन्दात्मन्! तुम कामशास्त्र के निर्णय को नहीं जानते।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.1.11.33)

यथेष्टं गच्छ दुर्बुद्धे नाहं दास्यामि कामिनीम् । यच्छक्यं कुरु तत्कामं न देया वरवर्णिनी ॥ 11.33 ॥

yatheṣṭaṁ gaccha durbuddhe nāhaṁ dāsyāmi kāminīm yacchakyaṁ kuru tatkāmaṁ na deyā varavarṇinī

'हे दुर्बुद्धे! जहाँ चाहो जाओ, मैं इस प्रिया को नहीं दूँगा; जो शक्य हो वह करो — यह सुंदरी नहीं दी जाएगी।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.1.11.34)

कामार्तस्य च ते शापो न मां बाधितुमर्हति । नाहं ददे गुरो कान्तां यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 11.34 ॥

kāmārtasya ca te śāpo na māṁ bādhitumarhati nāhaṁ dade guro kāntāṁ yathecchasi tathā kuru

'तुम्हारा कामार्त शाप मुझे बाधित करने में समर्थ नहीं है; हे गुरो! मैं यह प्रिया नहीं दूँगा, तुम्हें जो उचित लगे वह करो।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.1.11.35)

सूत उवाच । इत्युक्तः शशिना चेज्यश्चिन्तामाप रुषान्वितः । जगाम तरसा सद्म क्रोधयुक्तः शचीपतेः ॥ 11.35 ॥

sūta uvāca ityuktaḥ śaśinā cejyaścintāmāpa ruṣānvitaḥ jagāma tarasā sadma krodhayuktaḥ śacīpateḥ

सूत ने कहा — चन्द्रमा से इस प्रकार कहे जाने पर, वह यजमान (बृहस्पति) क्रोधाकुल होकर चिन्तित हो गए, और क्रोधसहित वे शचीपति (इन्द्र) के भवन को शीघ्रता से गए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.1.11.36)

दृष्ट्वा शतक्रतुस्तत्र गुरुं दुःखातुरं स्थितम् । पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः पूजयित्वा सुसंस्थितः ॥ 11.36 ॥

dṛṣṭvā śatakratustatra guruṁ duḥkhāturaṁ sthitam pādyārghyācamanīyādyaiḥ pūjayitvā susaṁsthitaḥ

शतक्रतु (इन्द्र) ने वहाँ अपने दुःखी गुरु को खड़ा देखकर, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि से पूजा करके सुस्थिर भाव से खड़े होकर —

श्लोक 37 (devibhagavatam.1.11.37)

पप्रच्छ परमोदारस्तं तथावस्थितं गुरुम् । का चिन्ता ते महाभाग शोकार्तोऽसि महामुने ॥ 11.37 ॥

papraccha paramodārastaṁ tathāvasthitaṁ gurum kā cintā te mahābhāga śokārto'si mahāmune

— परम उदार इन्द्र ने वहाँ खड़े गुरु से पूछा — 'हे महाभाग! आपको क्या चिन्ता है? हे महामुने! आप शोक से आतुर हैं।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.1.11.38)

केनापमानितोऽसि त्वं मम राज्ये गुरुश्च मे । त्वदधीनमिदं सर्वं सैन्यं लोकाधिपैः सह ॥ 11.38 ॥

kenāpamānito'si tvaṁ mama rājye guruśca me tvadadhīnamidaṁ sarvaṁ sainyaṁ lokādhipaiḥ saha

'मेरे ही राज्य में, मेरे ही गुरु होते हुए, आपका अपमान किसने किया? यह सारी सेना, लोकाधिपतियों सहित, आपके ही अधीन है।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.1.11.39)

बह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्ये चान्ये देवसत्तमाः । करिष्यन्ति च साहाय्यं का चिन्ता वद साम्प्रतम् ॥ 11.39 ॥

bahmā viṣṇustathā śambhurye cānye devasattamāḥ kariṣyanti ca sāhāyyaṁ kā cintā vada sāmpratam

'ब्रह्मा, विष्णु, शम्भु तथा अन्य देवश्रेष्ठ भी सहायता करेंगे; अब बताइए, आपकी क्या चिन्ता है?'

श्लोक 40 (devibhagavatam.1.11.40)

गुरुरुवाच । शशिनापहृता भार्या तारा मम सुलोचना । न ददाति स दुष्टात्मा प्रार्थितोऽपि पुनः पुनः ॥ 11.40 ॥

gururuvāca śaśināpahṛtā bhāryā tārā mama sulocanā na dadāti sa duṣṭātmā prārthito'pi punaḥ punaḥ

गुरु ने कहा — मेरी सुनयना पत्नी तारा को चन्द्रमा ने हर लिया है; वह दुरात्मा बार-बार प्रार्थना करने पर भी उसे नहीं दे रहा।

श्लोक 41 (devibhagavatam.1.11.41)

किं करोमि सुरेशान त्वमेव शरणं मम । साहाय्यं कुरु देवेश दुःखितोऽस्मि शतक्रतो ॥ 11.41 ॥

kiṁ karomi sureśāna tvameva śaraṇaṁ mama sāhāyyaṁ kuru deveśa duḥkhito'smi śatakrato

'हे सुरेशान! मैं क्या करूँ? तुम ही मेरी शरण हो; हे देवेश! सहायता करो, हे शतक्रतु! मैं दुःखी हूँ।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.1.11.42)

इन्द्र उवाच । मा शोकं कुरु धर्मज्ञ दासोऽस्मि तव सुव्रत । आनयिष्याम्यहं नूनं भार्यां तव महामते ॥ 11.42 ॥

indra uvāca mā śokaṁ kuru dharmajña dāso'smi tava suvrata ānayiṣyāmyahaṁ nūnaṁ bhāryāṁ tava mahāmate

इन्द्र ने कहा — हे धर्मज्ञ! शोक न कीजिए, हे सुव्रत! मैं आपका सेवक हूँ; हे महामते! मैं निश्चय ही आपकी पत्नी को ला दूँगा।

श्लोक 43 (devibhagavatam.1.11.43)

प्रेषिते चेन्मया दूते न दास्यति मदाकुलः । ततो युद्धं करिष्यामि देवसैन्यैः समावृतः ॥ 11.43 ॥

preṣite cenmayā dūte na dāsyati madākulaḥ tato yuddhaṁ kariṣyāmi devasainyaiḥ samāvṛtaḥ

मेरे दूत को भेजने पर भी यदि वह मद से आकुल होकर न दे, तो मैं देवसेनाओं से घिरा होकर युद्ध करूँगा।

श्लोक 44 (devibhagavatam.1.11.44)

इत्याश्वास्य गुरुं शक्रो दूतं वक्तृविचक्षणम् । प्रेषयामास सोमाय वार्ताशंसिनमद्भुतम् ॥ 11.44 ॥

ityāśvāsya guruṁ śakro dūtaṁ vaktṛvicakṣaṇam preṣayāmāsa somāya vārtāśaṁsinamadbhutam

इस प्रकार गुरु को आश्वस्त करके इन्द्र ने वाक्पटु दूत को अद्भुत संदेश देकर चन्द्रमा के पास भेजा।

श्लोक 45 (devibhagavatam.1.11.45)

स गत्वा शशिलोकं तु त्वरितः सुविचक्षणः । उवाच वचनेनैव वचनं रोहिणीपतिम् ॥ 11.45 ॥

sa gatvā śaśilokaṁ tu tvaritaḥ suvicakṣaṇaḥ uvāca vacanenaiva vacanaṁ rohiṇīpatim

वह अत्यंत निपुण दूत शीघ्र ही चन्द्रलोक जाकर रोहिणीपति से केवल वचनों द्वारा ही वह संदेश कह सुनाया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.1.11.46)

प्रेषितोऽहं महाभाग शक्रेण त्वां विवक्षया । कथितं प्रभुणा यच्च तद्ब्रवीमि महामते ॥ 11.46 ॥

preṣito'haṁ mahābhāga śakreṇa tvāṁ vivakṣayā kathitaṁ prabhuṇā yacca tadbravīmi mahāmate

'हे महाभाग! मैं इन्द्र द्वारा आपसे कुछ कहने के लिए भेजा गया हूँ; हे महामते! प्रभु ने जो कहा, वह मैं बताता हूँ।'

श्लोक 47 (devibhagavatam.1.11.47)

धर्मज्ञोऽसि महाभाग नीतिं जानासि सुव्रत । अत्रिः पिता ते धर्मात्मा न निद्यं कर्तुमर्हसि ॥ 11.47 ॥

dharmajño'si mahābhāga nītiṁ jānāsi suvrata atriḥ pitā te dharmātmā na nidyaṁ kartumarhasi

'हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, हे सुव्रत! आप नीति जानते हैं; आपके पिता अत्रि धर्मात्मा हैं — आपको निन्दनीय कार्य नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 48 (devibhagavatam.1.11.48)

भार्या रक्ष्या सर्वभूतैर्यथाशक्ति ह्यतन्द्रितैः । तदर्थे कलहः कामं भविता नात्र संशयः ॥ 11.48 ॥

bhāryā rakṣyā sarvabhūtairyathāśakti hyatandritaiḥ tadarthe kalahaḥ kāmaṁ bhavitā nātra saṁśayaḥ

'पत्नी की रक्षा सभी प्राणियों को अपनी शक्ति के अनुसार सावधान होकर करनी चाहिए; उसी के लिए निश्चय ही यह कलह उत्पन्न हुआ है, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.1.11.49)

यथा तव तथा तस्य यत्नः स्याद्दाररक्षणे । आत्मवत्सर्वभूतानि चिन्तय त्वं सुधानिधे ॥ 11.49 ॥

yathā tava tathā tasya yatnaḥ syāddārarakṣaṇe ātmavatsarvabhūtāni cintaya tvaṁ sudhānidhe

'जैसा आपके लिए वैसा ही उनके लिए भी पत्नी की रक्षा का प्रयत्न होना चाहिए; हे अमृतनिधे! आप सब प्राणियों को अपने समान समझें।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.1.11.50)

अष्टाविंशतिसङ्ख्यास्ते कामिन्यो दक्षजाः शुभाः । गुरुपत्नीं कथं भोक्तुं त्वमिच्छसि सुधानिधे ॥ 11.50 ॥

aṣṭāviṁśatisaṅkhyāste kāminyo dakṣajāḥ śubhāḥ gurupatnīṁ kathaṁ bhoktuṁ tvamicchasi sudhānidhe

'दक्ष की उन अट्ठाईस सुंदर कामिनी कन्याओं के होते हुए, हे अमृतनिधे! आप गुरुपत्नी का भोग क्यों करना चाहते हैं?'

श्लोक 51 (devibhagavatam.1.11.51)

स्वर्गे सदा वसन्त्येता मेनकाद्या मनोरमाः । भुङ्क्ष्व ताः स्वेच्छया कामं मुञ्च पत्नीं गुरोरपि ॥ 11.51 ॥

svarge sadā vasantyetā menakādyā manoramāḥ bhuṅkṣva tāḥ svecchayā kāmaṁ muñca patnīṁ gurorapi

'स्वर्ग में सदा मेनका आदि मनोहर स्त्रियाँ निवास करती हैं; उन्हें अपनी इच्छानुसार भोगिए, और गुरु की पत्नी को छोड़ दीजिए।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.1.11.52)

ईश्वरा यदि कुर्वन्ति जुगुप्सितमहन्तया । अज्ञास्तदनुवर्तन्ते तदा धर्मक्षयो भवेत् ॥ 11.52 ॥

īśvarā yadi kurvanti jugupsitamahantayā ajñāstadanuvartante tadā dharmakṣayo bhavet

'यदि शक्तिशाली लोग अहंकार से घृणित कार्य करने लगें, तो अज्ञानी लोग भी उनका अनुसरण करेंगे, और तब धर्म का नाश हो जाएगा।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.1.11.53)

तस्मान्मुञ्च महाभाग गुरोः पत्नीं मनोरमाम् । कलहस्त्वन्निमित्तोऽद्य सुराणां न भवेद्यथा ॥ 11.53 ॥

tasmānmuñca mahābhāga guroḥ patnīṁ manoramām kalahastvannimitto'dya surāṇāṁ na bhavedyathā

'इसलिए, हे महाभाग! गुरु की मनोहर पत्नी को छोड़ दीजिए, जिससे आज आपके कारण देवों में कलह न हो।'

श्लोक 54 (devibhagavatam.1.11.54)

सूत उवाच । सोमः शक्रवचः श्रुत्वा किञ्चित्क्रोधसमाकुलः । भङ्ग्या प्रतिवचः प्राह शक्रदूतं तदा शशी ॥ 11.54 ॥

sūta uvāca somaḥ śakravacaḥ śrutvā kiñcitkrodhasamākulaḥ bhaṅgyā prativacaḥ prāha śakradūtaṁ tadā śaśī

सूत ने कहा — इन्द्र का यह वचन सुनकर, कुछ क्रोधाकुल हुए सोम ने चतुराईपूर्वक इन्द्र के दूत को उत्तर दिया —

श्लोक 55 (devibhagavatam.1.11.55)

इन्दुरावाच । धर्मज्ञोऽसि महाबाहो देवानामधिपः स्वयम् । पुरोधापि च ते तादृग्युवयोः सदृशी मतिः ॥ 11.55 ॥

indurāvāca dharmajño'si mahābāho devānāmadhipaḥ svayam purodhāpi ca te tādṛgyuvayoḥ sadṛśī matiḥ

चन्द्रमा ने कहा — हे महाबाहो! आप स्वयं देवों के अधिपति और धर्मज्ञ हैं; आपके पुरोहित की भी आप ही जैसी बुद्धि है — तुम दोनों की मति एक समान है।

श्लोक 56 (devibhagavatam.1.11.56)

परोपदेशे कुशला भवन्ति बहवो जनाः । दुर्लभस्तु स्वयं कर्ता प्राप्ते कर्मणि सर्वदा ॥ 11.56 ॥

paropadeśe kuśalā bhavanti bahavo janāḥ durlabhastu svayaṁ kartā prāpte karmaṇi sarvadā

दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग कुशल होते हैं; परन्तु कार्य आ पड़ने पर स्वयं करने वाला सदा दुर्लभ होता है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.1.11.57)

बार्हस्पत्यप्रणीतं च शास्त्रं गृह्णन्ति मानवाः । को विरोधोऽत्र देवेश कामयानां भजन्स्त्रियम् ॥ 11.57 ॥

bārhaspatyapraṇītaṁ ca śāstraṁ gṛhṇanti mānavāḥ ko virodho'tra deveśa kāmayānāṁ bhajanstriyam

मनुष्य स्वयं बृहस्पति के ही रचे शास्त्र को स्वीकार करते हैं — हे देवेश! स्त्री की कामना करने और उसे भोगने में यहाँ क्या विरोध है?

श्लोक 58 (devibhagavatam.1.11.58)

स्वकीयं बलिनां सर्वं दुर्बलानां न किञ्चन । स्वीया च परकीया च भ्रमोऽयं मन्दचेतसाम् ॥ 11.58 ॥

svakīyaṁ balināṁ sarvaṁ durbalānāṁ na kiñcana svīyā ca parakīyā ca bhramo'yaṁ mandacetasām

बलवानों का सब कुछ अपना है, दुर्बलों का कुछ भी नहीं; 'अपना' और 'पराया' — यह भेद तो मन्दबुद्धियों का भ्रम मात्र है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.1.11.59)

तारा मय्यनुरक्ता च यथा न तु तथा गुरौ । अनुरक्ता कथं त्याज्या धर्मतो न्यायतस्तथा ॥ 11.59 ॥

tārā mayyanuraktā ca yathā na tu tathā gurau anuraktā kathaṁ tyājyā dharmato nyāyatastathā

तारा मुझमें ही अनुरक्त है, गुरु में उस प्रकार अनुरक्त नहीं; जो मुझमें अनुरक्त है, उसे धर्मतः और न्यायतः कैसे त्यागा जाए?

श्लोक 60 (devibhagavatam.1.11.60)

गृहारम्भस्तु रक्तायां विरक्तायां कथं भवेत् । विरक्तेयं यदा जाता चकमेऽनुजकामिनीम् ॥ 11.60 ॥

gṛhārambhastu raktāyāṁ viraktāyāṁ kathaṁ bhavet virakteyaṁ yadā jātā cakame'nujakāminīm

विरक्त स्त्री में गृहस्थी की नींव कैसे टिक सकती है? जब वह विरक्त हो गई, तो [स्वयं गुरु ने भी पहले] अपने ही छोटे भाई की प्रिया की कामना की थी।

श्लोक 61 (devibhagavatam.1.11.61)

न दास्येऽहं वरारोहां गच्छ दूत वद स्वयम् । ईश्वरोऽसि सहस्राक्ष यदिच्छसि कुरुष्व तत् ॥ 11.61 ॥

na dāsye'haṁ varārohāṁ gaccha dūta vada svayam īśvaro'si sahasrākṣa yadicchasi kuruṣva tat

'मैं इस सुंदरी को नहीं दूँगा; हे दूत! जाओ, स्वयं ही यह बात कह देना। हे सहस्राक्ष! आप स्वामी हैं, जो चाहें सो करें।'

श्लोक 62 (devibhagavatam.1.11.62)

सूत उवाच । इत्युक्तः शशिना दूतः प्रययौ शक्रसन्निधिम् । इन्द्रायाचष्ट तत्सर्वं यदुक्तं शीतरश्मिना ॥ 11.62 ॥

sūta uvāca ityuktaḥ śaśinā dūtaḥ prayayau śakrasannidhim indrāyācaṣṭa tatsarvaṁ yaduktaṁ śītaraśminā

सूत ने कहा — चन्द्रमा से इस प्रकार कहे जाने पर वह दूत इन्द्र के पास गया, और शीतरश्मि (चन्द्रमा) ने जो कुछ कहा था, वह सब इन्द्र को बताया।

श्लोक 63 (devibhagavatam.1.11.63)

तुराषाडपि तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तो बभूव ह । सेनोद्योगं तथा चक्रे साहाय्यार्थं गुरोर्विभुः ॥ 11.63 ॥

turāṣāḍapi tacchrutvā krodhayukto babhūva ha senodyogaṁ tathā cakre sāhāyyārthaṁ gurorvibhuḥ

तुराषाढ़ (इन्द्र) भी यह सुनकर क्रोधित हो गए; उस समर्थ ने गुरु की सहायता के लिए सेना को तैयार करवाया।

श्लोक 64 (devibhagavatam.1.11.64)

शुक्रस्तु विग्रहं श्रुत्वा गुरुद्वेषात्ततो ययौ । मा ददस्वेति तं वाक्यमुवाच शशिनं प्रति ॥ 11.64 ॥

śukrastu vigrahaṁ śrutvā gurudveṣāttato yayau mā dadasveti taṁ vākyamuvāca śaśinaṁ prati

शुक्राचार्य ने संघर्ष की बात सुनकर गुरु के प्रति द्वेष से चन्द्रमा के पास जाकर उससे कहा — 'उसे मत देना।'

श्लोक 65 (devibhagavatam.1.11.65)

साहाय्यं ते करिष्यामि मन्त्रशक्त्या महामते । भविता यदि सङ्ग्रामस्तव चेन्द्रेण मारिष ॥ 11.65 ॥

sāhāyyaṁ te kariṣyāmi mantraśaktyā mahāmate bhavitā yadi saṅgrāmastava cendreṇa māriṣa

'हे महामते! मैं तुम्हें मंत्र-शक्ति से सहायता दूँगा, यदि तुम्हारा और इन्द्र का युद्ध हो, हे माननीय!'

श्लोक 66 (devibhagavatam.1.11.66)

शङ्करस्तु तदाकर्ण्य गुरुदाराभिमर्शनम् । गुरुशत्रुं भृगुं मत्वा साहाय्यमकरोत्तदा ॥ 11.66 ॥

śaṅkarastu tadākarṇya gurudārābhimarśanam guruśatruṁ bhṛguṁ matvā sāhāyyamakarottadā

गुरुपत्नी के इस अपमान को सुनकर शंकर ने, भृगु (शुक्र) को गुरु का शत्रु मानकर, तब गुरु की सहायता की।

श्लोक 67 (devibhagavatam.1.11.67)

सङ्ग्रामस्तु तदा वृत्तो देवदानवयोर्द्रुतम् । बहूनि तत्र वर्षाणि तारकासुरवत्किल ॥ 11.67 ॥

saṅgrāmastu tadā vṛtto devadānavayordrutam bahūni tatra varṣāṇi tārakāsuravatkila

तब देवों और दानवों के बीच शीघ्र युद्ध छिड़ गया; वह अनेक वर्षों तक वहाँ तारकासुर के युद्ध के समान चलता रहा।

श्लोक 68 (devibhagavatam.1.11.68)

देवासुरकृतं युद्धं दृष्ट्वा तत्र पितामहः । हंसारूढो जगामाशु तं देशं क्लेशशान्तये ॥ 11.68 ॥

devāsurakṛtaṁ yuddhaṁ dṛṣṭvā tatra pitāmahaḥ haṁsārūḍho jagāmāśu taṁ deśaṁ kleśaśāntaye

देव-असुरों के बीच होने वाले उस युद्ध को देखकर पितामह ब्रह्मा हंस पर आरूढ़ होकर उस संघर्ष को शान्त करने के लिए शीघ्र उस स्थान पर गए।

श्लोक 69 (devibhagavatam.1.11.69)

राकापतिं तदा प्राह मुञ्च भार्यां गुरोरिति । नोचेद्विष्णुं समाहूय करिष्यामि तु सङ्क्षयम् ॥ 11.69 ॥

rākāpatiṁ tadā prāha muñca bhāryāṁ guroriti nocedviṣṇuṁ samāhūya kariṣyāmi tu saṅkṣayam

उन्होंने राकापति (चन्द्रमा) से कहा — 'गुरु की पत्नी को छोड़ दो, अन्यथा विष्णु को बुलाकर मैं तुम्हारा पूर्ण विनाश करवा दूँगा।'

श्लोक 70 (devibhagavatam.1.11.70)

भृगुं निवारयामास ब्रह्मा लोकपितामहः । किमन्यायमतिर्जाता सङ्गदोषान्महामते ॥ 11.70 ॥

bhṛguṁ nivārayāmāsa brahmā lokapitāmahaḥ kimanyāyamatirjātā saṅgadoṣānmahāmate

लोकपितामह ब्रह्मा ने भृगु को भी रोका — 'हे महामते! कुसंगति के दोष से तुम्हारी बुद्धि अन्याय की ओर क्यों गई?'

श्लोक 71 (devibhagavatam.1.11.71)

निषेधयामास ततो भृगुस्तं चौषधीपतिम् । मुञ्च भार्यां गुरोरद्य पित्राहं प्रेषितस्तव ॥ 11.71 ॥

niṣedhayāmāsa tato bhṛgustaṁ cauṣadhīpatim muñca bhāryāṁ guroradya pitrāhaṁ preṣitastava

तब भृगु ने भी उस औषधिपति (चन्द्रमा) को रोका — 'आज गुरु की पत्नी को छोड़ दो, मुझे पितामह ने ही तुम्हारे पास भेजा है।'

श्लोक 72 (devibhagavatam.1.11.72)

सूत उवाच । द्विजराजस्तु तच्छ्रुत्वा भृगोर्वचनमद्भुतम् । ददौ च तत्प्रियां भार्यां गुरोर्गर्भवतीं शुभाम् ॥ 11.72 ॥

sūta uvāca dvijarājastu tacchrutvā bhṛgorvacanamadbhutam dadau ca tatpriyāṁ bhāryāṁ gurorgarbhavatīṁ śubhām

सूत ने कहा — भृगु के इस अद्भुत वचन को सुनकर द्विजराज (चन्द्रमा) ने अपनी वह प्रिय, गर्भवती, शुभ पत्नी गुरु को लौटा दी।

श्लोक 73 (devibhagavatam.1.11.73)

प्राप्य कान्तां गुरुर्हृष्टः स्वगृहं मुदितो ययौ । ततो देवास्ततो दैत्या ययुः स्वान्स्वान्गृहान्प्रति ॥ 11.73 ॥

prāpya kāntāṁ gururhṛṣṭaḥ svagṛhaṁ mudito yayau tato devāstato daityā yayuḥ svānsvāngṛhānprati

अपनी प्रिया को पाकर हर्षित गुरु प्रसन्नतापूर्वक अपने घर चले गए; फिर देवगण और दानवगण भी अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 74 (devibhagavatam.1.11.74)

ब्रह्मा स्वसदनं प्राप्तः कैलासं चापि शङ्करः । बृहस्पतिस्तु सन्तुष्टः प्राप्य भार्यां मनोरमाम् ॥ 11.74 ॥

brahmā svasadanaṁ prāptaḥ kailāsaṁ cāpi śaṅkaraḥ bṛhaspatistu santuṣṭaḥ prāpya bhāryāṁ manoramām

ब्रह्मा अपने भवन पहुँचे, और शंकर भी कैलास; बृहस्पति संतुष्ट होकर अपनी मनोहर पत्नी को पाकर —

श्लोक 75 (devibhagavatam.1.11.75)

ततः कालेन कियता तारासूत सुतं शुभम् । सुदिने शुभनक्षत्रे तारापतिसमं गुणैः ॥ 11.75 ॥

tataḥ kālena kiyatā tārāsūta sutaṁ śubham sudine śubhanakṣatre tārāpatisamaṁ guṇaiḥ

— फिर कुछ समय बाद तारा ने एक शुभ पुत्र को जन्म दिया, शुभ दिन और शुभ नक्षत्र में, चन्द्रमा के समान गुणों वाला।

श्लोक 76 (devibhagavatam.1.11.76)

दृष्ट्वा पुत्रं गुरुर्जातं चकार विधिपूर्वकम् । जातकर्मादिकं सर्वं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ 11.76 ॥

dṛṣṭvā putraṁ gururjātaṁ cakāra vidhipūrvakam jātakarmādikaṁ sarvaṁ prahṛṣṭenāntarātmanā

पुत्र को जन्म लेते देखकर गुरु ने प्रसन्न अन्तःकरण से जातकर्म आदि सभी संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किए।

श्लोक 77 (devibhagavatam.1.11.77)

श्रुतं चन्द्रमसा जन्म पुत्रस्य मुनिसत्तमाः । दूतं च प्रेषयामास गुरुं प्रति महामतिः ॥ 11.77 ॥

śrutaṁ candramasā janma putrasya munisattamāḥ dūtaṁ ca preṣayāmāsa guruṁ prati mahāmatiḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! चन्द्रमा ने भी पुत्र के जन्म की बात सुनी, और महाबुद्धि चन्द्रमा ने गुरु के पास एक दूत भेजा —

श्लोक 78 (devibhagavatam.1.11.78)

न चायं तव पुत्रोऽस्ति मम वीर्यसमुद्भवः । कथं त्वं कृतवान्कामं जातकर्मादिकं विधिम् ॥ 11.78 ॥

na cāyaṁ tava putro'sti mama vīryasamudbhavaḥ kathaṁ tvaṁ kṛtavānkāmaṁ jātakarmādikaṁ vidhim

'यह तुम्हारा पुत्र नहीं है, यह मेरे ही वीर्य से उत्पन्न है; तुमने कैसे इच्छानुसार जातकर्म आदि सारे संस्कार कर डाले?'

श्लोक 79 (devibhagavatam.1.11.79)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दूतस्य च बृहस्पतिः । उवाच मम पुत्रो मे सदृशो नात्र संशयः ॥ 11.79 ॥

tacchrutvā vacanaṁ tasya dūtasya ca bṛhaspatiḥ uvāca mama putro me sadṛśo nātra saṁśayaḥ

दूत का यह वचन सुनकर बृहस्पति ने कहा — 'यह मेरा ही पुत्र है, मुझ ही जैसा है, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 80 (devibhagavatam.1.11.80)

पुनर्विवादः सञ्जातो मिलिता देवदानवाः । युद्धार्थमागतास्तेषां समाजः समजायत ॥ 11.80 ॥

punarvivādaḥ sañjāto militā devadānavāḥ yuddhārthamāgatāsteṣāṁ samājaḥ samajāyata

पुनः विवाद उत्पन्न हो गया, देव और दानव फिर एकत्रित हो गए; युद्ध के लिए आए हुए उनका सम्मेलन पुनः हो गया।

श्लोक 81 (devibhagavatam.1.11.81)

तत्रागतः स्वयं ब्रह्मा शान्तिकामः प्रजापतिः । निवारयामास मुखे संस्थितान्युद्धदुर्मदान् ॥ 11.81 ॥

tatrāgataḥ svayaṁ brahmā śāntikāmaḥ prajāpatiḥ nivārayāmāsa mukhe saṁsthitānyuddhadurmadān

वहाँ शान्ति की कामना करने वाले प्रजापति ब्रह्मा स्वयं आए, और युद्ध के लिए उन्मत्त, आमने-सामने खड़े लोगों को रोका।

श्लोक 82 (devibhagavatam.1.11.82)

तारां पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यायं तनयः शुभे । सत्यं वद वरारोहे यथा क्लेशः प्रशाम्यति ॥ 11.82 ॥

tārāṁ papraccha dharmātmā kasyāyaṁ tanayaḥ śubhe satyaṁ vada varārohe yathā kleśaḥ praśāmyati

धर्मात्मा ब्रह्मा ने तारा से पूछा — 'हे शुभे! यह किसका पुत्र है? हे वरारोहे! सत्य बोलो, जिससे यह क्लेश शान्त हो।'

श्लोक 83 (devibhagavatam.1.11.83)

तमुवाचासितापाङ्गी लज्जमानाप्यधोमुखी । चन्द्रस्येति शनैरन्तर्जगाम वरवर्णिनी ॥ 11.83 ॥

tamuvācāsitāpāṅgī lajjamānāpyadhomukhī candrasyeti śanairantarjagāma varavarṇinī

उस श्यामनयना ने लज्जित होकर, मुख नीचा किए हुए धीरे से कहा — 'यह चन्द्रमा का है' — और वह सुंदरी धीरे-धीरे भीतर चली गई।

श्लोक 84 (devibhagavatam.1.11.84)

जग्राह तं सुतं सोमः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । नाम चक्रे बुध इति जगाम स्वगृहं पुनः ॥ 11.84 ॥

jagrāha taṁ sutaṁ somaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā nāma cakre budha iti jagāma svagṛhaṁ punaḥ

सोम ने प्रसन्न अन्तःकरण से उस पुत्र को ग्रहण किया, उसका नाम 'बुध' रखा, और फिर अपने घर चले गए।

श्लोक 85 (devibhagavatam.1.11.85)

ययौ ब्रह्मा स्वकं धाम सर्वे देवाः सवासवाः । यथागतं गतं सर्वैः सर्वशः प्रेक्षकैर्जनैः ॥ 11.85 ॥

yayau brahmā svakaṁ dhāma sarve devāḥ savāsavāḥ yathāgataṁ gataṁ sarvaiḥ sarvaśaḥ prekṣakairjanaiḥ

ब्रह्मा अपने धाम को चले गए, तथा इन्द्र सहित सभी देवगण भी; जैसे-जैसे लोग आए थे, वैसे ही सभी दर्शक भी वापस चले गए।

श्लोक 86 (devibhagavatam.1.11.86)

कथितेयं बुधोत्पत्तिर्गुरुक्षेत्रे च सोमतः । यथा श्रुता मया पूर्वं व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥ 11.86 ॥

kathiteyaṁ budhotpattirgurukṣetre ca somataḥ yathā śrutā mayā pūrvaṁ vyāsātsatyavatīsutāt

इस प्रकार गुरु-क्षेत्र में उत्पन्न, चन्द्रमा से जन्मा यह बुध की उत्पत्ति की कथा कही गई, जैसी मैंने पूर्व में सत्यवती-पुत्र व्यास से सुनी थी।

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