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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15

शुक-वैराग्य-वर्णन

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (devibhagavatam.1.15.1)

श्रीशुक उवाच । नाहं गृहं करिष्यामि दुःखदं सर्वदा पितः । वागुरासदृशं नित्यं बन्धनं सर्वदेहिनाम् ॥ 15.1 ॥

śrīśuka uvāca nāhaṁ gṛhaṁ kariṣyāmi duḥkhadaṁ sarvadā pitaḥ vāgurāsadṛśaṁ nityaṁ bandhanaṁ sarvadehinām

श्रीशुक ने कहा — हे पिता! मैं घर नहीं बसाऊँगा, वह सदा दुःखदायी है; सभी देहधारियों के लिए वह जाल के समान एक नित्य बंधन है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.1.15.2)

धनचिन्तातुराणां हि क्व सुखं तात दृश्यते । स्वजनैः खलु पीड्यन्ते निर्धना लोलुपा जनाः ॥ 15.2 ॥

dhanacintāturāṇāṁ hi kva sukhaṁ tāta dṛśyate svajanaiḥ khalu pīḍyante nirdhanā lolupā janāḥ

हे तात! धन की चिन्ता में डूबे लोगों को सुख कहाँ दिखता है? निर्धन, लोलुप लोग तो अपने ही स्वजनों द्वारा पीड़ित होते हैं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.1.15.3)

इन्द्रोऽपि न सुखी तादृग्यादृशो भिक्षुनिःस्पृहः । कोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकीविभवे सति ॥ 15.3 ॥

indro'pi na sukhī tādṛgyādṛśo bhikṣuniḥspṛhaḥ ko'nyaḥ syādiha saṁsāre trilokīvibhave sati

इन्द्र भी निःस्पृह भिक्षु जैसे सुखी नहीं हैं; तीनों लोकों का वैभव होते हुए भी इस संसार में और कौन सुखी हो सकता है?

श्लोक 4 (devibhagavatam.1.15.4)

तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत् । विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः ॥ 15.4 ॥

tapantaṁ tāpasaṁ dṛṣṭvā maghavā duḥkhito'bhavat vighnānbahuvidhānasya karoti ca divaspatiḥ

तपस्वी को तप करते देखकर मघवा (इन्द्र) दुःखी हो उठते हैं, और वे स्वर्गपति नाना प्रकार के विघ्न उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.1.15.5)

ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम् । खेदं प्राप्नोति सततं सङ्ग्रामैरसुरैः सह ॥ 15.5 ॥

brahmāpi na sukhī viṣṇurlakṣmīṁ prāpya manoramām khedaṁ prāpnoti satataṁ saṅgrāmairasuraiḥ saha

ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं; विष्णु भी मनोहर लक्ष्मी को पाकर असुरों के साथ युद्धों में सदा क्लेश ही प्राप्त करते हैं।

श्लोक 6 (devibhagavatam.1.15.6)

करोति विपुलान्यत्नांस्तपश्चरति दुश्चरम् । रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम् ॥ 15.6 ॥

karoti vipulānyatnāṁstapaścarati duścaram ramāpatirapi śrīmānkasyāsti vipulaṁ sukham

वे विशाल प्रयास करते हैं, दुष्कर तप करते हैं; रमापति भी, श्रीसम्पन्न होते हुए भी — तो किसे विपुल सुख प्राप्त है?

श्लोक 7 (devibhagavatam.1.15.7)

शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्म्यहम् । तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा ॥ 15.7 ॥

śaṅkaro'pi sadā duḥkhī bhavatyeva ca vedmyaham tapaścaryāṁ prakurvāṇo daityayuddhakaraḥ sadā

शंकर भी सदा दुःखी ही रहते हैं, यह मैं जानता हूँ — निरन्तर तप करते हुए, सदा दैत्यों से युद्ध करते हुए।

श्लोक 8 (devibhagavatam.1.15.8)

कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः । निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः ॥ 15.8 ॥

kadācinna sukhī śete dhanavānapi lolupaḥ nirdhanastu kathaṁ tāta sukhaṁ prāpnoti mānavaḥ

लोभी धनवान भी कभी सुखपूर्वक नहीं सोता; तो हे तात! निर्धन मनुष्य को सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?

श्लोक 9 (devibhagavatam.1.15.9)

जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम् । नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा ॥ 15.9 ॥

jānannapi mahābhāga putraṁ vā vīryasambhavam niyokṣyasi mahāghore saṁsāre duḥkhade sadā

हे महाभाग! यह जानते हुए भी क्या आप अपने ही वीर्य से उत्पन्न पुत्र को इस अत्यंत भयंकर, सदा दुःखदायी संसार में झोंकेंगे?

श्लोक 10 (devibhagavatam.1.15.10)

जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा । गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः ॥ 15.10 ॥

janmaduḥkhaṁ jarāduḥkhaṁ duḥkhaṁ ca maraṇe tathā garbhavāse punarduḥkhaṁ viṣṭhāmūtramaye pitaḥ

जन्म में दुःख है, बुढ़ापे में दुःख है, तथा मृत्यु में भी दुःख है; हे पिता! गर्भवास में विष्ठा-मूत्र के बीच पुनः दुःख है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.1.15.11)

तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम् । याञ्चायां परमं दुःखं मरणादपि मानद ॥ 15.11 ॥

tasmādatiśayaṁ duḥkhaṁ tṛṣṇālobhasamudbhavam yāñcāyāṁ paramaṁ duḥkhaṁ maraṇādapi mānada

उससे भी अधिक तृष्णा और लोभ से उत्पन्न दुःख है; हे मानद! याचना में तो मृत्यु से भी बढ़कर परम दुःख है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.1.15.12)

प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः । पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने ॥ 15.12 ॥

pratigrahadhanā viprā na buddhibalajīvanāḥ parāśā paramaṁ duḥkhaṁ maraṇaṁ ca dine dine

जो ब्राह्मण अपनी बुद्धि-बल पर नहीं, बल्कि प्रतिग्रह के धन पर जीते हैं, उनके लिए दूसरों की आशा पर निर्भरता ही परम दुःख है, प्रतिदिन एक मृत्यु के समान।

श्लोक 13 (devibhagavatam.1.15.13)

पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः । गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः ॥ 15.13 ॥

paṭhitvā sakalān vedāñchāstrāṇi ca samantataḥ gatvā ca dhanināṁ kāryā stutiḥ sarvātmanā budhaiḥ

समस्त वेद तथा शास्त्रों को पूर्णतः पढ़कर भी विद्वानों को धनवानों के पास जाकर सर्वात्मना उनकी स्तुति करनी पड़ती है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.1.15.14)

एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः । येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते ॥ 15.14 ॥

ekodarasya kā cintā patramūlaphalādibhiḥ yenakenāpyupāyena santuṣṭyā ca prapūryate

एक उदर के लिए पत्ते, मूल, फल आदि से क्या चिन्ता? जिस किसी भी उपाय से वह संतोषपूर्वक भर जाता है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.1.15.15)

भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति । पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम् ॥ 15.15 ॥

bhāryā putrāstathā pautrāḥ kuṭumbe vipule sati pūraṇārthaṁ mahadduḥkhaṁ kva sukhaṁ pitaradbhutam

पत्नी, पुत्र तथा पौत्रों सहित विशाल परिवार के होने पर, उनके भरण-पोषण के लिए बड़ा दुःख होता है; हे पिता! फिर उसमें अद्भुत सुख कहाँ है?

श्लोक 16 (devibhagavatam.1.15.16)

योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम् । कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन ॥ 15.16 ॥

yogaśāstraṁ vada mama jñānaśāstraṁ sukhākaram karmakāṇḍe'khile tāta na rame'haṁ kadācana

मुझे योगशास्त्र सिखाइए, वह ज्ञानशास्त्र जो सुखदायी है; हे तात! समस्त कर्मकाण्ड में मुझे कभी रुचि नहीं है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.1.15.17)

वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा । वर्तमानं यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम् ॥ 15.17 ॥

vada karmakṣayopāyaṁ prārabdhaṁ sañcitaṁ tathā vartamānaṁ yathā naśyet trividhaṁ karmamūlajam

मुझे कर्म-क्षय के उपाय बताइए — प्रारब्ध, संचित, तथा वर्तमान, इन तीनों कर्म-मूल से उत्पन्न को नष्ट करने का मार्ग बताइए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.1.15.18)

जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै । मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः ॥ 15.18 ॥

jalūkeva sadā nārī rudhiraṁ pibatīti vai mūrkhastu na vijānāti mohito bhāvaceṣṭitaiḥ

स्त्री सदा जोंक के समान रक्त पीती रहती है; परन्तु उसकी कृत्रिम मुद्राओं से मोहित मूर्ख यह नहीं समझ पाता।

श्लोक 19 (devibhagavatam.1.15.19)

भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः । कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः ॥ 15.19 ॥

bhogairvīryaṁ dhanaṁ pūrṇaṁ manaḥ kuṭilabhāṣaṇaiḥ kāntā harati sarvasvaṁ kaḥ stenastādṛśo'paraḥ

भोगों से वीर्य, धन तथा मन को कुटिल वाणी से हर लेती है — प्रिया सर्वस्व हर लेती है, उसके समान चोर और कौन है?

श्लोक 20 (devibhagavatam.1.15.20)

निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसङ्ग्रहम् । करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च ॥ 15.20 ॥

nidrāsukhavināśārthaṁ mūrkhastu dārasaṅgraham karoti vañcito dhātrā duḥkhāya na sukhāya ca

निद्रा के सुख को भी नष्ट करने के लिए मूर्ख विधाता द्वारा ठगा जाकर पत्नी-संग्रह करता है — यह दुःख के लिए ही होता है, सुख के लिए नहीं।

श्लोक 21 (devibhagavatam.1.15.21)

सूत उवाच । एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च । सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम् ॥ 15.21 ॥

sūta uvāca evaṁvidhāni vākyāni śrutvā vyāsaḥ śukasya ca samprāpa mahatīṁ cintāṁ kiṁ karomītyasaṁśayam

सूत ने कहा — शुक के इस प्रकार के वचन सुनकर व्यास महान चिन्ता में पड़ गए — 'अब मैं क्या करूँ?' — यह निःसंदेह उनकी दशा हो गई।

श्लोक 22 (devibhagavatam.1.15.22)

तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनादुःखजानि च । वेपथुश्च शरीरेऽभूद्ग्लानिं प्राप मनस्तथा ॥ 15.22 ॥

tasya susruvuraśrūṇi locanāduḥkhajāni ca vepathuśca śarīre'bhūdglāniṁ prāpa manastathā

उनके नेत्रों से दुःखजन्य आँसू बहने लगे, शरीर में कम्पन हुआ, और उनका मन भी ग्लानि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (devibhagavatam.1.15.23)

शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम् । उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ 15.23 ॥

śocantaṁ pitaraṁ dṛṣṭvā dīnaṁ śokapariplutam uvāca pitaraṁ vyāsaṁ vismayotphullalocanaḥ

अपने दीन, शोक में डूबे पिता को देखकर विस्मय से खिले नेत्रों वाले शुक ने पिता व्यास से कहा —

श्लोक 24 (devibhagavatam.1.15.24)

अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम् । वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम् ॥ 15.24 ॥

aho māyābalaṁ cograṁ yanmohayati paṇḍitam vedāntasya ca kartāraṁ sarvajñaṁ vedasammitam

'आश्चर्य है, कैसा उग्र माया-बल है, जो एक विद्वान को, वेदान्त के रचयिता, सर्वज्ञ, वेदतुल्य पुरुष को भी मोहित कर देता है!'

श्लोक 25 (devibhagavatam.1.15.25)

न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा । या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ 15.25 ॥

na jāne kā ca sā māyā kiṁsvitsātīva duṣkarā yā mohayati vidvāṁsaṁ vyāsaṁ satyavatīsutam

'मैं नहीं जानता वह माया क्या है, जो इतनी दुष्कर है, जो विद्वान सत्यवती-पुत्र व्यास को भी मोहित कर देती है।'

श्लोक 26 (devibhagavatam.1.15.26)

पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च । विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः ॥ 15.26 ॥

purāṇānāṁ ca vaktā ca nirmātā bhāratasya ca vibhāgakartā vedānāṁ so'pi mohamupāgataḥ

'पुराणों के वक्ता, महाभारत के रचयिता, वेदों के विभाजनकर्ता — वे भी मोह को प्राप्त हो गए!'

श्लोक 27 (devibhagavatam.1.15.27)

तां यामि शरणं देवीं या मोहयति वै जगत् । ब्रह्मविष्णुहरादींश्च कथान्येषां च कीदृशी ॥ 15.27 ॥

tāṁ yāmi śaraṇaṁ devīṁ yā mohayati vai jagat brahmaviṣṇuharādīṁśca kathānyeṣāṁ ca kīdṛśī

'मैं उसी देवी की शरण जाता हूँ, जो ब्रह्मा, विष्णु, हर आदि को भी मोहित कर देती है — फिर अन्यों की तो बात ही क्या है?'

श्लोक 28 (devibhagavatam.1.15.28)

कोऽप्यस्ति त्रिषु लोकेषु यो न मुह्यति मायया । यन्मोहं गमिताः पूर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ 15.28 ॥

ko'pyasti triṣu lokeṣu yo na muhyati māyayā yanmohaṁ gamitāḥ pūrve brahmaviṣṇuharādayaḥ

'तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं है जो माया से मोहित न हो, जब स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, हर आदि पहले ही मोह को प्राप्त हो चुके हैं।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.1.15.29)

अहो बलमहो वीर्यं देव्या खलु विनिर्मितम् । माययैव वशं नीतः सर्वज्ञ ईश्वरः प्रभुः ॥ 15.29 ॥

aho balamaho vīryaṁ devyā khalu vinirmitam māyayaiva vaśaṁ nītaḥ sarvajña īśvaraḥ prabhuḥ

'आश्चर्य है, कैसा बल, कैसा पराक्रम देवी द्वारा रचा गया है! सर्वज्ञ ईश्वर, प्रभु भी माया के ही वश में आ गए हैं।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.1.15.30)

विष्ण्वंशसम्भवो व्यास इति पौराणिका जगुः । सोऽपि मोहार्णवे मग्नो भग्नपोतो वणिग्यथा ॥ 15.30 ॥

viṣṇvaṁśasambhavo vyāsa iti paurāṇikā jaguḥ so'pi mohārṇave magno bhagnapoto vaṇigyathā

'व्यास को विष्णु के अंश से उत्पन्न कहते हैं पौराणिक विद्वान; फिर भी वे मोह के सागर में डूबे हैं, जैसे टूटी नौका वाला वणिक्।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.1.15.31)

अश्रुपातं करोत्यद्य विवशः प्राकृतो यथा । अहो मायाबलं चैतद्दुस्त्यजं पण्डितैरपि ॥ 15.31 ॥

aśrupātaṁ karotyadya vivaśaḥ prākṛto yathā aho māyābalaṁ caitaddustyajaṁ paṇḍitairapi

'आज वे साधारण, विवश मनुष्य की भाँति आँसू बहा रहे हैं; आश्चर्य है, यह माया-बल विद्वानों के लिए भी दुस्त्याज्य है!'

श्लोक 32 (devibhagavatam.1.15.32)

कोऽयं कोऽहं कथं चेह कीदृशोऽयं भ्रमः किल । पञ्चभूतात्मके देहे पितापुत्रेति वासना ॥ 15.32 ॥

ko'yaṁ ko'haṁ kathaṁ ceha kīdṛśo'yaṁ bhramaḥ kila pañcabhūtātmake dehe pitāputreti vāsanā

'यह कौन है? मैं कौन हूँ? और यहाँ यह भ्रम कैसे उत्पन्न हुआ — पंचभूतात्मक देह में पिता-पुत्र जैसी वासना?'

श्लोक 33 (devibhagavatam.1.15.33)

बलिष्ठा खलु मायेयं मायिनामपि मोहिनी । ययाभिभूतः कृष्णोऽपि करोति रोदनं द्विजः ॥ 15.33 ॥

baliṣṭhā khalu māyeyaṁ māyināmapi mohinī yayābhibhūtaḥ kṛṣṇo'pi karoti rodanaṁ dvijaḥ

'यह माया निश्चय ही अत्यंत बलवती है, मायावियों को भी मोहित करने वाली; उससे अभिभूत होकर द्विज कृष्ण (व्यास) भी रो रहे हैं।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.1.15.34)

सूत उवाच । तां नत्वा मनसा देवीं सर्वकारणकारणाम् । जननीं सर्वदेवानां ब्रह्मादीनां तथेश्वरीम् ॥ 15.34 ॥

sūta uvāca tāṁ natvā manasā devīṁ sarvakāraṇakāraṇām jananīṁ sarvadevānāṁ brahmādīnāṁ tatheśvarīm

सूत ने कहा — मन-ही-मन उन देवी को नमस्कार करके, जो समस्त कारणों की कारण हैं, ब्रह्मा आदि समस्त देवों की जननी तथा उनकी भी स्वामिनी हैं,

श्लोक 35 (devibhagavatam.1.15.35)

पितरं प्राह दीनं तं शोकार्णवपरिप्लुतम् । अरणीसम्भवो व्यासं हेतुमद्वचनं शुभम् ॥ 15.35 ॥

pitaraṁ prāha dīnaṁ taṁ śokārṇavapariplutam araṇīsambhavo vyāsaṁ hetumadvacanaṁ śubham

— अरणि से उत्पन्न शुक ने शोक-सागर में डूबे अपने दीन पिता व्यास से ये शुभ, तर्कसंगत वचन कहे —

श्लोक 36 (devibhagavatam.1.15.36)

पाराशर्य महाभाग सर्वेषां बोधदः स्वयम् । किं शोकं कुरुषे स्वामिन्यथाज्ञः प्राकृतो नरः ॥ 15.36 ॥

pārāśarya mahābhāga sarveṣāṁ bodhadaḥ svayam kiṁ śokaṁ kuruṣe svāminyathājñaḥ prākṛto naraḥ

'हे पाराशर्य! हे महाभाग! आप स्वयं सबको बोध देने वाले हैं; हे स्वामिन्! अज्ञानी, साधारण मनुष्य के समान आप शोक क्यों कर रहे हैं?'

श्लोक 37 (devibhagavatam.1.15.37)

अद्याहं तव पुत्रोऽस्मि न जाने पूर्वजन्मनि । कोऽहं कस्त्वं महाभाग विभ्रमोऽयं महात्मनि ॥ 15.37 ॥

adyāhaṁ tava putro'smi na jāne pūrvajanmani ko'haṁ kastvaṁ mahābhāga vibhramo'yaṁ mahātmani

'आज मैं आपका पुत्र हूँ, पूर्वजन्म में क्या था, नहीं जानता। हे महाभाग! मैं कौन हूँ, आप कौन हैं? हे महात्मन्! यह तो केवल भ्रम है।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.1.15.38)

कुरु धैर्यं प्रबुध्यस्व मा विषादे मनः कृथाः । मोहजालमिमं मत्वा मुञ्च शोकं महामते ॥ 15.38 ॥

kuru dhairyaṁ prabudhyasva mā viṣāde manaḥ kṛthāḥ mohajālamimaṁ matvā muñca śokaṁ mahāmate

'धैर्य धारण कीजिए, जागिए; विषाद में मन मत लगाइए। इसे मोह-जाल समझकर, हे महामते! शोक त्यागिए।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.1.15.39)

क्षुधानिवृत्तिर्भक्ष्येण न पुत्रदर्शनेन च । पिपासा जलपानेन याति नैवात्मजेक्षणात् ॥ 15.39 ॥

kṣudhānivṛttirbhakṣyeṇa na putradarśanena ca pipāsā jalapānena yāti naivātmajekṣaṇāt

'क्षुधा की शान्ति भोजन से होती है, पुत्र के दर्शन से नहीं; प्यास जल पीने से मिटती है, अपने पुत्र को देखने से नहीं।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.1.15.40)

घ्राणं सुखं सुगन्धेन कर्णजं श्रवणेन च । स्त्रीसुखं तु स्त्रिया नूनं पुत्रोऽहं किं करोमि ते ॥ 15.40 ॥

ghrāṇaṁ sukhaṁ sugandhena karṇajaṁ śravaṇena ca strīsukhaṁ tu striyā nūnaṁ putro'haṁ kiṁ karomi te

'सुगन्ध से घ्राण-सुख, श्रवण से कर्ण-सुख होता है; पत्नी से जो सुख मिलता है, वह निश्चय ही पत्नी से ही मिलता है — मैं तो पुत्र हूँ, आपके लिए क्या कर सकता हूँ?'

श्लोक 41 (devibhagavatam.1.15.41)

अजीगर्तेन पुत्रोऽपि हरिश्चन्द्राय भूभुजे । पशुकामाय यज्ञार्थे दत्तो मौल्येन सर्वथा ॥ 15.41 ॥

ajīgartena putro'pi hariścandrāya bhūbhuje paśukāmāya yajñārthe datto maulyena sarvathā

'अजीगर्त ने भी अपने पुत्र को राजा हरिश्चन्द्र को, जो पशु की कामना रखते थे, यज्ञ के लिए पूरे मूल्य पर दे दिया था।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.1.15.42)

सुखानां साधनं द्रव्यं धनात्सुखसमुच्चयः । धनमर्जय लोभश्चेत्पुत्रोऽहं किं करोम्यहम् ॥ 15.42 ॥

sukhānāṁ sādhanaṁ dravyaṁ dhanātsukhasamuccayaḥ dhanamarjaya lobhaścetputro'haṁ kiṁ karomyaham

'सुखों का साधन धन है, धन से ही सुखों की वृद्धि होती है; यदि आपको धन का लोभ है, तो धन अर्जित कीजिए — पुत्र होकर मैं इसमें क्या करूँ?'

श्लोक 43 (devibhagavatam.1.15.43)

मां प्रबोधय बुद्।ह्ध्या त्वं दैवज्ञोऽसि महामते । यथा मुच्येयमत्यन्तं गर्भवासभयान्मुने ॥ 15.43 ॥

māṁ prabodhaya bud|hdhyā tvaṁ daivajño'si mahāmate yathā mucyeyamatyantaṁ garbhavāsabhayānmune

'बल्कि आप अपनी बुद्धि से मुझे बोध दीजिए — हे महामते! आप दैवज्ञ हैं — जिससे मैं गर्भवास के भय से पूर्णतः मुक्त हो सकूँ, हे मुने!'

श्लोक 44 (devibhagavatam.1.15.44)

दुर्लभं मानुषं जन्म कर्मभूमाविहानघ । तत्रापि ब्राह्मणत्वं वै दुर्लभं चोत्तमे कुले ॥ 15.44 ॥

durlabhaṁ mānuṣaṁ janma karmabhūmāvihānagha tatrāpi brāhmaṇatvaṁ vai durlabhaṁ cottame kule

'हे निष्पाप! इस कर्मभूमि पर मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, और उसमें भी ब्राह्मणत्व निश्चय ही दुर्लभ है, तथा उत्तम कुल में जन्म तो और भी अधिक।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.1.15.45)

बद्धोऽहमिति मे बुद्धिर्नापसर्पति चित्ततः । संसारवासनाजाले निविष्टा वृद्धिगामिनी ॥ 15.45 ॥

baddho'hamiti me buddhirnāpasarpati cittataḥ saṁsāravāsanājāle niviṣṭā vṛddhigāminī

'मैं बद्ध हूँ — यह बुद्धि मेरे चित्त से हटती नहीं; यह संसार-वासना के जाल में उलझी हुई निरन्तर बढ़ती ही जाती है।'

श्लोक 46 (devibhagavatam.1.15.46)

सूत उवाच । इत्युक्तस्तु तदा व्यासः पुत्रेणामितबुद्धिना । प्रत्युवाच शुकं शान्तं चतुर्थाश्रममानसम् ॥ 15.46 ॥

sūta uvāca ityuktastu tadā vyāsaḥ putreṇāmitabuddhinā pratyuvāca śukaṁ śāntaṁ caturthāśramamānasam

सूत ने कहा — अपार बुद्धि वाले पुत्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, व्यास ने चतुर्थाश्रम (संन्यास) की ओर मन लगाए शान्त शुक को उत्तर दिया —

श्लोक 47 (devibhagavatam.1.15.47)

व्यास उवाच । पठ पुत्र महाभाग मया भागवतं कृतम् । शुभं न चातिविस्तीर्णं पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥ 15.47 ॥

vyāsa uvāca paṭha putra mahābhāga mayā bhāgavataṁ kṛtam śubhaṁ na cātivistīrṇaṁ purāṇaṁ brahmasammitam

व्यास ने कहा — हे पुत्र! हे महाभाग! मेरे द्वारा रचित भागवत पढ़ो — वह शुभ, अत्यंत विस्तृत नहीं, ब्रह्मतुल्य पुराण है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.1.15.48)

स्कन्धा द्वादश तत्रैव पञ्चलक्षणसंयुतम् । सर्वेषां च पुराणानां भूषणं मम सम्मतम् ॥ 15.48 ॥

skandhā dvādaśa tatraiva pañcalakṣaṇasaṁyutam sarveṣāṁ ca purāṇānāṁ bhūṣaṇaṁ mama sammatam

उसमें पंचलक्षणों से युक्त बारह स्कन्ध हैं; वह मेरे मत में समस्त पुराणों का आभूषण है।

श्लोक 49 (devibhagavatam.1.15.49)

सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते । येन भागवतेनेह तत्पठ त्वं महामते ॥ 15.49 ॥

sadasajjñānavijñānaṁ śrutamātreṇa jāyate yena bhāgavateneha tatpaṭha tvaṁ mahāmate

जिस भागवत को केवल सुनने मात्र से सत्-असत् का ज्ञान और विज्ञान उत्पन्न हो जाता है — हे महामते! उसी को पढ़ो।

श्लोक 50 (devibhagavatam.1.15.50)

वटपत्रशयानाय विष्णवे बालरूपिणे । केनास्मि बालभावेन निर्मितोऽहं चिदात्मना ॥ 15.50 ॥

vaṭapatraśayānāya viṣṇave bālarūpiṇe kenāsmi bālabhāvena nirmito'haṁ cidātmanā

वटपत्र पर शयन करने वाले बालरूपधारी विष्णु के लिए — 'चिदात्मा होकर भी मैं किसके द्वारा बालरूप में रचा गया?'

श्लोक 51 (devibhagavatam.1.15.51)

किमर्थं केन द्रव्येण कथं जानामि चाखिलम् । इत्येवं चिन्त्यमानाय मुकुन्दाय महात्मने ॥ 15.51 ॥

kimarthaṁ kena dravyeṇa kathaṁ jānāmi cākhilam ityevaṁ cintyamānāya mukundāya mahātmane

'किसलिए, किस पदार्थ से, और कैसे मैं सब कुछ जानता हूँ?' — इस प्रकार चिन्तन करते हुए उस महात्मा मुकुन्द के प्रति,

श्लोक 52 (devibhagavatam.1.15.52)

श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं भगवत्याखिलार्थदम् । सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ॥ 15.52 ॥

ślokārdhena tayā proktaṁ bhagavatyākhilārthadam sarvaṁ khalvidamevāhaṁ nānyadasti sanātanam

उन भगवती ने आधे श्लोक में समस्त अर्थ देने वाला वचन कहा — 'यह सब कुछ निश्चय ही मैं ही हूँ, इसके अतिरिक्त कोई सनातन तत्त्व नहीं है।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.1.15.53)

तद्वचो विष्णुना पूर्वं संविज्ञातं मनस्यपि । केनोक्ता वागियं सत्या चिन्तयामास चेतसा ॥ 15.53 ॥

tadvaco viṣṇunā pūrvaṁ saṁvijñātaṁ manasyapi kenoktā vāgiyaṁ satyā cintayāmāsa cetasā

उस वचन को विष्णु ने पहले मन में ही समझ लिया था; उन्होंने मन-ही-मन विचार किया — 'यह सत्य वाणी किसने कही?'

श्लोक 54 (devibhagavatam.1.15.54)

कथं वेद्मि प्रवक्तारं स्त्रीपुंसौ वा नपुंसकम् । इति चिन्ताप्रपन्नेन धृतं भागवतं हृदि ॥ 15.54 ॥

kathaṁ vedmi pravaktāraṁ strīpuṁsau vā napuṁsakam iti cintāprapannena dhṛtaṁ bhāgavataṁ hṛdi

'मैं उस वक्ता को कैसे जानूँ — स्त्री, पुरुष, या नपुंसक?' — इस प्रकार चिन्ता में पड़े हुए उन्होंने भागवत को हृदय में धारण किया।

श्लोक 55 (devibhagavatam.1.15.55)

पुनः पुनः कृतोच्चारस्तस्मिनेवास्तचेतसा । वटपत्रे शयानः सन्नभूच्चिन्तासमन्वितः ॥ 15.55 ॥

punaḥ punaḥ kṛtoccārastasminevāstacetasā vaṭapatre śayānaḥ sannabhūccintāsamanvitaḥ

बार-बार उसी का उच्चारण करते हुए, उसी में मन लगाए, वटपत्र पर शयन करते हुए वे चिन्तनयुक्त हो गए।

श्लोक 56 (devibhagavatam.1.15.56)

तदा शान्ता भगवती प्रादुरास चतुर्भुजा । शङ्खचक्रगदापद्मवरायुधधरा शिवा ॥ 15.56 ॥

tadā śāntā bhagavatī prādurāsa caturbhujā śaṅkhacakragadāpadmavarāyudhadharā śivā

तब शान्त भगवती चतुर्भुज रूप में प्रकट हुईं, शंख-चक्र-गदा-पद्म जैसे श्रेष्ठ आयुध धारण किए हुए।

श्लोक 57 (devibhagavatam.1.15.57)

दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता । संयुता सदृशीभिश्च सखीभिः स्वविभूतिभिः ॥ 15.57 ॥

divyāmbaradharā devī divyabhūṣaṇabhūṣitā saṁyutā sadṛśībhiśca sakhībhiḥ svavibhūtibhiḥ

दिव्य वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से भूषित वह देवी, अपनी ही विभूतियों की तुल्य सखियों के साथ —

श्लोक 58 (devibhagavatam.1.15.58)

प्रादुर्बभूव तस्याग्रे विष्णोरमिततेजसः । मन्दहास्यं प्रयुञ्जाना महालक्ष्मीः शुभानना ॥ 15.58 ॥

prādurbabhūva tasyāgre viṣṇoramitatejasaḥ mandahāsyaṁ prayuñjānā mahālakṣmīḥ śubhānanā

— अमित तेजस्वी विष्णु के सामने प्रकट हुईं — शुभानना महालक्ष्मी, मन्द मुस्कान बिखेरती हुई।

श्लोक 59 (devibhagavatam.1.15.59)

सूत उवाच । तां तथा संस्थितां दृष्ट्वा हृदये कमलेक्षणः । विस्मितः सलिले तस्मिन्निराधारा मनोरमाम् ॥ 15.59 ॥

sūta uvāca tāṁ tathā saṁsthitāṁ dṛṣṭvā hṛdaye kamalekṣaṇaḥ vismitaḥ salile tasminnirādhārā manoramām

सूत ने कहा — उस जल में निराधार, मनोहर, इस प्रकार खड़ी उन्हें देखकर कमलनयन विष्णु हृदय में विस्मित हो गए।

श्लोक 60 (devibhagavatam.1.15.60)

रतिर्भूतिस्तथा बुद्धिर्मतिः कीर्तिः स्मृतिर्धृतिः । श्रद्धा मेधा स्वधा स्वाहा क्षुधा निद्रा दया गतिः ॥ 15.60 ॥

ratirbhūtistathā buddhirmatiḥ kīrtiḥ smṛtirdhṛtiḥ śraddhā medhā svadhā svāhā kṣudhā nidrā dayā gatiḥ

रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति —

श्लोक 61 (devibhagavatam.1.15.61)

तुष्टिः पुष्टिः क्षमा लज्जा जृम्भा तन्द्रा च शक्तयः । संस्थिताः सर्वतः पार्श्वे महादेव्याः पृथक्पृथक् ॥ 15.61 ॥

tuṣṭiḥ puṣṭiḥ kṣamā lajjā jṛmbhā tandrā ca śaktayaḥ saṁsthitāḥ sarvataḥ pārśve mahādevyāḥ pṛthakpṛthak

तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा — ये सभी शक्तियाँ उस महादेवी के चारों ओर पृथक्-पृथक् स्थित थीं।

श्लोक 62 (devibhagavatam.1.15.62)

वरायुधधराः सर्वा नानाभूषणभूषिताः । मन्दारमालाकुलिता मुक्ताहारविराजिताः ॥ 15.62 ॥

varāyudhadharāḥ sarvā nānābhūṣaṇabhūṣitāḥ mandāramālākulitā muktāhāravirājitāḥ

सभी श्रेष्ठ आयुध धारण किए हुए, नाना आभूषणों से भूषित, मन्दार-मालाओं से गुंथी, मुक्ता-हारों से सुशोभित थीं।

श्लोक 63 (devibhagavatam.1.15.63)

तां दृष्ट्वा ताश्च संवीक्ष्य तस्मिन्नेकार्णवे जले । विस्मयाविष्टहृदयः सम्बभूव जनार्दनः ॥ 15.63 ॥

tāṁ dṛṣṭvā tāśca saṁvīkṣya tasminnekārṇave jale vismayāviṣṭahṛdayaḥ sambabhūva janārdanaḥ

उस एकार्णव जल में उन्हें तथा उन सबको देखकर जनार्दन का हृदय विस्मय से भर गया।

श्लोक 64 (devibhagavatam.1.15.64)

चिन्तयामास सर्वात्मा दृष्टमायोऽतिविस्मितः । कुतो भूताः स्त्रियः सर्वाः कुतोऽहं वटतल्पगः ॥ 15.64 ॥

cintayāmāsa sarvātmā dṛṣṭamāyo'tivismitaḥ kuto bhūtāḥ striyaḥ sarvāḥ kuto'haṁ vaṭatalpagaḥ

अत्यंत विस्मित, माया को देख चुके उस सर्वात्मा ने विचार किया — 'ये सब स्त्रियाँ कहाँ से आईं? और मैं इस वटपत्र-शय्या पर कहाँ से आया?'

श्लोक 65 (devibhagavatam.1.15.65)

अस्मिन्नेकार्णवे घोरे न्यग्रोधः कथमुत्थितः । केनाहं स्थापितोऽस्म्यत्र शिशुं कृत्वा शुभाकृतिम् ॥ 15.65 ॥

asminnekārṇave ghore nyagrodhaḥ kathamutthitaḥ kenāhaṁ sthāpito'smyatra śiśuṁ kṛtvā śubhākṛtim

'इस भयंकर एकार्णव में यह वटवृक्ष कैसे उत्पन्न हुआ? मुझे शुभ आकृति वाला शिशु बनाकर यहाँ किसने बिठाया है?'

श्लोक 66 (devibhagavatam.1.15.66)

ममेयं जननी नो वा माया वा कापि दुर्घटा । दर्शनं केनचित्त्वद्य दत्तं वा केन हेतुना ॥ 15.66 ॥

mameyaṁ jananī no vā māyā vā kāpi durghaṭā darśanaṁ kenacittvadya dattaṁ vā kena hetunā

'क्या यह मेरी माता है, या नहीं? या यह कोई दुर्घट माया है? यह दर्शन मुझे किसके द्वारा, किस कारण से दिया गया है?'

श्लोक 67 (devibhagavatam.1.15.67)

किं मया चात्र वक्तव्यं गन्तव्यं वा न वा क्वचित् । मौनमास्थाय तिष्ठेयं बालभावादतन्द्रितः ॥ 15.67 ॥

kiṁ mayā cātra vaktavyaṁ gantavyaṁ vā na vā kvacit maunamāsthāya tiṣṭheyaṁ bālabhāvādatandritaḥ

'मुझे यहाँ क्या कहना चाहिए, या कहीं जाना चाहिए या नहीं?' — इस बालभाव में मौन धारण करके ही मैं अथक भाव से यहीं स्थिर रहूँगा।

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