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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19

शुक के विवाहादि-कार्य का वर्णन

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (devibhagavatam.1.19.1)

शुक उवाच । सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम । मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत् ॥ 19.1 ॥

śuka uvāca sandeho'yaṁ mahārāja vartate hṛdaye mama māyāmadhye vartamānaḥ sa kathaṁ niḥspṛho bhavet

शुक ने कहा — हे महाराज! मेरे हृदय में यह संशय बना हुआ है — माया के मध्य रहते हुए कोई कैसे निःस्पृह हो सकता है?

श्लोक 2 (devibhagavatam.1.19.2)

शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम् । त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः ॥ 19.2 ॥

śāstrajñānaṁ ca samprāpya nityānityavicāraṇam tyajate na mano mohaṁ sa kathaṁ mucyate naraḥ

शास्त्रज्ञान तथा नित्य-अनित्य का विवेक पाकर भी यदि मन मोह नहीं त्यागता, तो वह मनुष्य कैसे मुक्त होगा?

श्लोक 3 (devibhagavatam.1.19.3)

अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद्बोधो हि न क्षमः । यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया ॥ 19.3 ॥

antargataṁ tamaśchettuṁ śāstrādbodho hi na kṣamaḥ yathā na naśyati tamaḥ kṛtayā dīpavārtayā

भीतर के अन्धकार को काटने में केवल शास्त्र से प्राप्त बोध समर्थ नहीं है, जैसे केवल दीपक की बात कहने से अन्धकार नष्ट नहीं होता।

श्लोक 4 (devibhagavatam.1.19.4)

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः । स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा ॥ 19.4 ॥

adrohaḥ sarvabhūteṣu kartavyaḥ sarvadā budhaiḥ sa kathaṁ rājaśārdūla gṛhasthasya bhavettathā

समस्त प्राणियों के प्रति अद्रोह विद्वानों को सदा रखना चाहिए; हे राजशार्दूल! यह गृहस्थ के लिए कैसे सम्भव है?

श्लोक 5 (devibhagavatam.1.19.5)

वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा । जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः ॥ 19.5 ॥

vittaiṣaṇā na te śāntā tathā rājyasukhaiṣaṇā jayaiṣaṇā ca saṅgrāme jīvanmuktaḥ kathaṁ bhaveḥ

आपकी धन की इच्छा शान्त नहीं हुई, उसी प्रकार राज्य-सुख की इच्छा भी नहीं, और युद्ध में विजय की इच्छा भी — तो आप जीवन्मुक्त कैसे हैं?

श्लोक 6 (devibhagavatam.1.19.6)

चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे । स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप ॥ 19.6 ॥

caureṣu caurabuddhistu sādhubuddhistu tāpase svaparatvaṁ tavāpyasti videhastvaṁ kathaṁ nṛpa

चोरों के प्रति आपकी 'चोर' की बुद्धि है, तपस्वी के प्रति 'साधु' की बुद्धि है; आपमें भी 'अपना-पराया' का भाव विद्यमान है — तो हे राजन्! आप 'विदेह' कैसे हैं?

श्लोक 7 (devibhagavatam.1.19.7)

कटुतीक्ष्णुकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान् । शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप ॥ 19.7 ॥

kaṭutīkṣṇukaṣāyāmlarasānvetsi śubhāśubhān śubheṣu ramate cittaṁ nāśubheṣu tathā nṛpa

आप कटु, तीक्ष्ण, कषैले, खट्टे रसों को शुभ-अशुभ जानते हैं; आपका चित्त शुभ में रमता है, अशुभ में नहीं, हे राजन्।

श्लोक 8 (devibhagavatam.1.19.8)

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि । अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप ॥ 19.8 ॥

jāgratsvapnasuṣuptiśca tava rājan bhavanti hi avasthāstu yathākālaṁ turīyā tu kathaṁ nṛpa

हे राजन्! आपको भी जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाएँ यथासमय होती ही हैं; तो हे राजन्! तुरीय अवस्था कैसे संभव है?

श्लोक 9 (devibhagavatam.1.19.9)

पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम । स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे ॥ 19.9 ॥

padātyaśvarathebhāśca sarve vai vaśagā mama svāmyahaṁ caiva sarveṣāṁ manyase tvaṁ na manyase

'पैदल सेना, अश्व, रथ और हाथी — ये सब मेरे वश में हैं, और मैं ही इन सबका स्वामी हूँ' — ऐसा आप मानते हैं या नहीं मानते?

श्लोक 10 (devibhagavatam.1.19.10)

मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा । मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम ॥ 19.10 ॥

miṣṭamatsi sadā rājanmudito vimanāstathā mālāyāṁ ca tathā sarpe samadṛk kva nṛpottama

हे राजन्! आप मिष्ठान्न सदा प्रसन्नता से खाते हैं, और साधारण भोजन उदास मन से; हे नृपोत्तम! माला और सर्प में आपकी समान दृष्टि कहाँ है?

श्लोक 11 (devibhagavatam.1.19.11)

विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः । एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु ॥ 19.11 ॥

vimuktastu bhavedrājan samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ekātmabuddhiḥ sarvatra hitakṛtsarvajantuṣu

हे राजन्! वही मुक्त है जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान माने; जिसकी एकात्म-बुद्धि सर्वत्र हो, तथा जो समस्त प्राणियों का हित करे।

श्लोक 12 (devibhagavatam.1.19.12)

न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित् । एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः ॥ 19.12 ॥

na me'dya ramate cittaṁ gṛhadārādiṣu kvacit ekākī niḥspṛho'tyarthaṁ careyamiti me matiḥ

मेरा मन आज घर, पत्नी आदि किसी में भी नहीं रमता; मेरा निश्चय है कि मैं अकेला, अत्यंत निःस्पृह होकर विचरण करूँ।

श्लोक 13 (devibhagavatam.1.19.13)

निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः । मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ 19.13 ॥

niḥsaṅgo nirmamaḥ śāntaḥ patramūlaphalāśanaḥ mṛgavadvicariṣyāmi nirdvandvo niṣparigrahaḥ

संगरहित, ममतारहित, शान्त, पत्ते-मूल-फल खाकर, मृग के समान द्वंद्व-रहित, अपरिग्रही होकर मैं विचरण करूँगा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.1.19.14)

किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया । विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव ॥ 19.14 ॥

kiṁ me gṛheṇa vittena bhāryayā ca surūpayā virāgamanasaḥ kāmaṁ guṇātītasya pārthiva

हे राजन्! विरक्त मन तथा गुणातीत मुझे घर, धन और सुंदरी पत्नी से क्या प्रयोजन?

श्लोक 15 (devibhagavatam.1.19.15)

चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम् । दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे ॥ 19.15 ॥

cintyase vividhākāraṁ nānārāgasamākulam dambho'yaṁ kila te bhāti vimukto'smīti bhāṣase

आप नाना प्रकार के रागों से व्याकुल दिखते हैं; यह मुझे तो मात्र छल प्रतीत होता है — जबकि आप कहते हैं 'मैं मुक्त हूँ'।

श्लोक 16 (devibhagavatam.1.19.16)

कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन । कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप ॥ 19.16 ॥

kadācicchatrujā cintā dhanajā ca kadācana kadācitsainyajā cintā niścinto'si kadā nṛpa

कभी शत्रु से उत्पन्न चिन्ता, कभी धन से उत्पन्न चिन्ता; कभी सेना से उत्पन्न चिन्ता — हे राजन्! आप कब चिन्तारहित होते हैं?

श्लोक 17 (devibhagavatam.1.19.17)

वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः । तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम् ॥ 19.17 ॥

vaikhānasā ye munayo mitāhārā jitavratāḥ te'pi muhyanti saṁsāre jānanto'pi hyasatyatām

मित भोजन करने वाले, दृढ़-व्रती वैखानस मुनि भी संसार की असत्यता जानते हुए भी उसमें मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.1.19.18)

तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते । कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन ॥ 19.18 ॥

tava vaṁśasamutthānāṁ videhā iti bhūpate kuṭilaṁ nāma jānīhi nānyatheti kadācana

हे भूपते! आपके वंश में उत्पन्न राजाओं का 'विदेह' नाम एक कुटिल (व्यंग्यपूर्ण) नाम ही जानिए, अन्यथा कभी नहीं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.1.19.19)

विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः । लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम् ॥ 19.19 ॥

vidyādharo yathā mūrkho janmāndhastu divākaraḥ lakṣmīdharo daridraśca nāma teṣāṁ nirarthakam

जैसे कोई मूर्ख 'विद्याधर' कहलाए, जन्मान्ध 'दिवाकर' कहलाए, या दरिद्र 'लक्ष्मीधर' कहलाए — ऐसे नाम निरर्थक होते हैं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.1.19.20)

तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः । विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते ॥ 19.20 ॥

tava vaṁśodbhavā ye ye śrutāḥ pūrve mayā nṛpāḥ videhā iti vikhyātā nāmataḥ karmato na te

आपके वंश में उत्पन्न जिन-जिन राजाओं के बारे में मैंने पूर्व में सुना है, वे 'विदेह' नाम से ही प्रसिद्ध थे, कर्म से नहीं।

श्लोक 21 (devibhagavatam.1.19.21)

निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप । यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम् ॥ 19.21 ॥

nimināmābhavadrājā pūrvaṁ tava kule nṛpa yajñārthaṁ sa tu rājarṣirvasiṣṭhaṁ svaguruṁ munim

हे राजन्! आपके कुल में पूर्वकाल में निमि नामक राजा हुए थे; उस राजर्षि ने यज्ञ के लिए अपने गुरु मुनि वसिष्ठ को —

श्लोक 22 (devibhagavatam.1.19.22)

निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः । निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल ॥ 19.22 ॥

nimantrayāmāsa tadā tamuvāca nṛpaṁ muniḥ nimantrito'smi yajñārthaṁ devendreṇādhunā kila

— तब निमंत्रित किया; मुनि ने उस राजा से कहा — 'मैं अभी देवेन्द्र के यज्ञ के लिए पहले ही निमंत्रित हूँ।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.1.19.23)

कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै । तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः ॥ 19.23 ॥

kṛtvā tasya makhaṁ pūrṇaṁ kariṣyāmi tavāpi vai tāvatkuruṣva rājendra sambhāraṁ tu śanaiḥ śanaiḥ

'उनका यज्ञ पूर्ण करके मैं तुम्हारा भी यज्ञ सम्पन्न करूँगा; हे राजेन्द्र! तब तक धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री जुटाओ।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.1.19.24)

इत्युक्त्या निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः । निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम् ॥ 19.24 ॥

ityuktyā niryayau so'tha mahendrayajane muniḥ nimiranyaṁ guruṁ kṛtvā cakāra makhamuttamam

यह कहकर वे मुनि महेन्द्र के यज्ञ के लिए चले गए; निमि ने अन्य गुरु बनाकर वह उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.1.19.25)

तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः । शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक ॥ 19.25 ॥

tacchrutvā kupito'tyarthaṁ vasiṣṭho nṛpatiṁ punaḥ śaśāpa ca patatvadya dehaste gurulopaka

यह सुनकर वसिष्ठ अत्यंत क्रोधित हो उठे, और उन्होंने राजा को पुनः शाप दिया — 'हे गुरु-अवमानक! तुम्हारा शरीर आज ही गिर जाए!'

श्लोक 26 (devibhagavatam.1.19.26)

राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम् । अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम् ॥ 19.26 ॥

rājāpi taṁ śaśāpātha tavāpi ca patatvayam anyonyaśāpātpatitau tāveva ca mayā śrutam

राजा ने भी उन्हें प्रतिशाप दिया — 'तुम्हारा भी यह शरीर गिर जाए!' परस्पर शाप से वे दोनों गिर पड़े, ऐसा ही मैंने सुना है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.1.19.27)

विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम् । विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम ॥ 19.27 ॥

videhena ca rājendra kathaṁ śapto guruḥ svayam vinoda iva me citte vibhāti nṛpasattama

हे राजेन्द्र! एक 'विदेह' अपने गुरु को स्वयं कैसे शाप दे सकता है? हे नृपसत्तम! यह तो मेरे मन में मानो एक हास्यास्पद बात ही लगती है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.1.19.28)

जनक उवाच । सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम् । तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः ॥ 19.28 ॥

janaka uvāca satyamuktaṁ tvayā nātra mithyā kiñcididaṁ matam tathāpi śṛṇu viprendra gururmama supūjitaḥ

जनक ने कहा — तुमने सत्य कहा है, इसमें कुछ भी असत्य नहीं है। फिर भी, हे विप्रेन्द्र! सुनो — मेरे गुरु भलीभाँति पूजित ही रहे हैं।

श्लोक 29 (devibhagavatam.1.19.29)

पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि । मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः ॥ 19.29 ॥

pituḥ saṅgaṁ parityajya tvaṁ vanaṁ gantumicchasi mṛgaiḥ saha susambandho bhavitā te na saṁśayaḥ

तुम पिता का साथ त्यागकर वन जाना चाहते हो; वहाँ निःसंदेह मृगों के साथ ही तुम्हारा घनिष्ठ सम्बन्ध होगा।

श्लोक 30 (devibhagavatam.1.19.30)

महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि । आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चिन्तः स्याः कथं मुने ॥ 19.30 ॥

mahābhūtāni sarvatra niḥsaṅgaḥ kva bhaviṣyasi āhārārthaṁ sadā cintā niścintaḥ syāḥ kathaṁ mune

पंचमहाभूत तो सर्वत्र हैं — आसक्ति-रहित तुम कहाँ रहोगे? भोजन के लिए सदा चिन्ता रहेगी — हे मुने! तुम चिन्तारहित कैसे रहोगे?

श्लोक 31 (devibhagavatam.1.19.31)

दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च । तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा ॥ 19.31 ॥

daṇḍājinakṛtā cintā yathā tava vane'pi ca tathaiva rājyacintā me cintayānasya vā na vā

जैसे वन में भी तुम्हें दण्ड और मृगचर्म की चिन्ता रहेगी, वैसे ही मुझे राज्य की चिन्ता है — उसका चिन्तन करूँ या न करूँ, दोनों समान हैं।

श्लोक 32 (devibhagavatam.1.19.32)

विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः । न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा ॥ 19.32 ॥

vikalpopahatastvaṁ vai dūradeśamupāgataḥ na me vikalpasandeho nirvikalpo'smi sarvathā

तुम संकल्प-विकल्प से आहत होकर दूर देश से आए हो; मुझमें संकल्प का कोई संशय नहीं है — मैं सर्वथा निर्विकल्प हूँ।

श्लोक 33 (devibhagavatam.1.19.33)

सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा । न बद्धोऽस्मीति बुद्।ह्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने ॥ 19.33 ॥

sukhaṁ svapimi viprāhaṁ sukhaṁ bhuñjāmi sarvathā na baddho'smīti bud|hdhyāhaṁ sarvadaiva sukhī mune

हे विप्र! मैं सुखपूर्वक सोता हूँ, सुखपूर्वक भोजन करता हूँ, सर्वथा; 'मैं बद्ध नहीं हूँ' — इस बुद्धि से, हे मुने! मैं सदा सुखी रहता हूँ।

श्लोक 34 (devibhagavatam.1.19.34)

त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया । इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः ॥ 19.34 ॥

tvaṁ tu duḥkhī sadaivāsi baddho'hamiti śaṅkayā iti śaṅkāṁ parityajya sukhī bhava samāhitaḥ

परन्तु तुम सदा दुःखी हो, 'मैं बद्ध हूँ' — इस आशंका से; इस आशंका को त्यागकर, समाहित होकर सुखी बनो।

श्लोक 35 (devibhagavatam.1.19.35)

देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता । तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः ॥ 19.35 ॥

deho'yaṁ mama bandho'yaṁ na mameti ca muktatā tathā dhanaṁ gṛhaṁ rājyaṁ na mameti ca niścayaḥ

'यह देह मेरी है' — यही बंधन है, 'यह मेरी नहीं है' — यही मुक्तता है; उसी प्रकार 'धन, घर, राज्य मेरा नहीं है' — यही दृढ़ निश्चय है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.1.19.36)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत् । आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम् ॥ 19.36 ॥

sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya śukaḥ prītamanābhavat āpṛcchya taṁ jagāmāśu vyāsasyāśramamuttamam

सूत ने कहा — उनका यह वचन सुनकर शुक का मन प्रसन्न हो गया; उनसे विदा लेकर वे शीघ्र व्यास के उत्तम आश्रम की ओर गए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.1.19.37)

आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान् । आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः ॥ 19.37 ॥

āgacchantaṁ sutaṁ dṛṣṭvā vyāso'pi sukhamāptavān āliṅgyāghrāya mūrdhānaṁ papraccha kuśalaṁ punaḥ

अपने पुत्र को आते देखकर व्यास भी प्रसन्न हुए; आलिंगन करके, सिर सूँघकर उन्होंने फिर कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 38 (devibhagavatam.1.19.38)

स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः । वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ 19.38 ॥

sthitastatrāśrame ramye pituḥ pārśve samāhitaḥ vedādhyayanasampannaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ

वे उस रमणीय आश्रम में पिता के पास एकाग्रचित्त होकर रहे, वेदाध्ययन-सम्पन्न, समस्त शास्त्रों में निपुण।

श्लोक 39 (devibhagavatam.1.19.39)

जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः । स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः ॥ 19.39 ॥

janakasya daśāṁ dṛṣṭvā rājyasthasya mahātmanaḥ sa nirvṛtiṁ parāṁ prāpya piturāśramasaṁsthitaḥ

राज्य में स्थित महात्मा जनक की दशा देखकर, वे परम शान्ति को प्राप्त होकर पिता के आश्रम में ही रहे।

श्लोक 40 (devibhagavatam.1.19.40)

पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी । शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि ॥ 19.40 ॥

pitṝṇāṁ subhagā kanyā pīvarī nāma sundarī śukaścakāra patnīṁ tāṁ yogamārgasthito'pi hi

योगमार्ग में स्थित होते हुए भी शुक ने पितरों की सुंदर, सौभाग्यशाली कन्या पीवरी नामक स्त्री को अपनी पत्नी बनाया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.1.19.41)

स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि । कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा ॥ 19.41 ॥

sa tasyāṁ janayāmāsa putrāṁścatura eva hi kṛṣṇaṁ gauraprabhaṁ caiva bhūriṁ devaśrutaṁ tathā

उनसे उन्होंने चार पुत्र उत्पन्न किए — कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि तथा देवश्रुत।

श्लोक 42 (devibhagavatam.1.19.42)

कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान् । ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणहाय महात्मने ॥ 19.42 ॥

kanyāṁ kīrtiṁ samutpādya vyāsaputraḥ pratāpavān dadau vibhrājaputrāya tvaṇahāya mahātmane

प्रतापी व्यास-पुत्र (शुक) ने कीर्ति नामक कन्या को भी जन्म देकर, उसे विभ्राज के पुत्र, महात्मा अणुह को विवाह में दिया।

श्लोक 43 (devibhagavatam.1.19.43)

अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शककन्यासमुद्भवः ॥ 19.43 ॥

aṇuhasya sutaḥ śrīmānbrahmadattaḥ pratāpavān brahmajñaḥ pṛthivīpālaḥ śakakanyāsamudbhavaḥ

अणुह के प्रतापी पुत्र श्रीमान ब्रह्मदत्त हुए, जो ब्रह्मज्ञानी, पृथ्वी के पालक, तथा इन्द्र-कन्या से उत्पन्न थे।

श्लोक 44 (devibhagavatam.1.19.44)

कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः । ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम् ॥ 19.44 ॥

kālena kiyatā tatra nāradasyopadeśataḥ jñānaṁ paramakaṁ prāpya yogamārgamanuttamam

कुछ समय बाद, नारद के उपदेश से, परम ज्ञान तथा अनुपम योगमार्ग को प्राप्त करके,

श्लोक 45 (devibhagavatam.1.19.45)

पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम् । मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निरर्गलम् ॥ 19.45 ॥

putre rājyaṁ nidhāyātha gato badarikāśramam māyābījopadeśena tasya jñānaṁ nirargalam

— राज्य को पुत्र को सौंपकर वे बदरिकाश्रम गए; मायाबीज के उपदेश से उनका ज्ञान निर्बाध हो गया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.1.19.46)

नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम् । कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः ॥ 19.46 ॥

nāradasya prasādena jātaṁ sadyo vimuktidam kailāsaśikhare ramye tyaktvā saṅgaṁ pituḥ śukaḥ

नारद की कृपा से वह ज्ञान तत्काल मुक्तिदायी हो गया; रमणीय कैलास शिखर पर पिता का साथ त्यागकर शुक,

श्लोक 47 (devibhagavatam.1.19.47)

ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः । उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः ॥ 19.47 ॥

dhyānamāsthāya vipulaṁ sthitaḥ saṅgaparāṅmukhaḥ utpapāta gireḥ śṛṅgātsiddhiṁ ca paramāṁ gataḥ

— विपुल ध्यान में स्थित होकर, आसक्ति से पराङ्मुख होकर, पर्वत-शिखर से ऊपर उठे और परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 48 (devibhagavatam.1.19.48)

आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः । गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा ॥ 19.48 ॥

ākāśago mahātejā virarāja yathā raviḥ gireḥ śṛṅgaṁ dvidhā jātaṁ śukasyotpatane tadā

आकाशगामी, महातेजस्वी वे सूर्य के समान सुशोभित हुए; शुक के उत्थान के समय पर्वत-शिखर दो भागों में विभक्त हो गया।

श्लोक 49 (devibhagavatam.1.19.49)

उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत् । अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः ॥ 19.49 ॥

utpātā bahavo jātāḥ śukaścākāśago'bhavat antarikṣe yathā vāyuḥ stūyamānaḥ surarṣibhiḥ

अनेक उत्पात हुए, और शुक आकाशगामी हो गए, जैसे देवर्षियों द्वारा स्तुत वायु आकाश में गमन करता है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.1.19.50)

तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः । व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत् ॥ 19.50 ॥

tejasātivirājanvai dvitīya iva bhāskaraḥ vyāsastu virahākrāntaḥ krandanputreti cāsakṛt

तेज से अत्यंत सुशोभित होते हुए, मानो द्वितीय सूर्य हों; परन्तु व्यास वियोग से आक्रान्त होकर बार-बार 'पुत्र, पुत्र' पुकारते रहे।

श्लोक 51 (devibhagavatam.1.19.51)

गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत् । क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम् ॥ 19.51 ॥

gireḥ śṛṅge gatastatra śuko yatra sthito'bhavat krandamānaṁ tadā dīnaṁ vyāsaṁ matvā śramākulam

वे उसी पर्वत-शिखर पर गए, जहाँ शुक खड़े हुए थे; व्यास को इस प्रकार विलाप करते, दीन, श्रम से व्याकुल देखकर,

श्लोक 52 (devibhagavatam.1.19.52)

सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा । तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत् ॥ 19.52 ॥

sarvabhūtagataḥ sākṣī pratiśabdamadāttadā tatrādyāpi gireḥ śṛṅge pratiśabdaḥ sphuṭo'bhavat

समस्त प्राणियों में स्थित साक्षी शुक ने तब प्रतिध्वनि दी; आज भी उस पर्वत-शिखर पर वह प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है।

श्लोक 53 (devibhagavatam.1.19.53)

रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसमन्वितम् । पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिप्लुतम् ॥ 19.53 ॥

rudantaṁ taṁ samālakṣya vyāsaṁ śokasamanvitam putra putreti bhāṣantaṁ viraheṇa pariplutam

उन्हें रोते हुए, शोक से भरे, 'पुत्र, पुत्र' कहते हुए, वियोग से अभिभूत व्यास को देखकर —

श्लोक 54 (devibhagavatam.1.19.54)

शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत् । व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः ॥ 19.54 ॥

śivastatra samāgatya pārāśaryamabodhayat vyāsa śokaṁ mā kuru tvaṁ putraste yogavittamaḥ

— शिव वहाँ आए और पाराशर्य को समझाया — 'हे व्यास! शोक मत करो, तुम्हारा पुत्र योग-विद्या में परम निपुण है।'

श्लोक 55 (devibhagavatam.1.19.55)

परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः । तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाशोकं विजानता ॥ 19.55 ॥

paramāṁ gatimāpanno durlabhāṁ cākṛtātmabhiḥ tasya śoko na kartavyastvayāśokaṁ vijānatā

'वह असिद्ध-आत्मा वालों के लिए दुर्लभ परम गति को प्राप्त हो चुका है; शोक की सच्ची प्रकृति को जानने वाले तुम्हें उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.1.19.56)

कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ । व्यास उवाच । न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते ॥ 19.56 ॥

kīrtiste vipulā jātā tena putreṇa cānagha vyāsa uvāca na śoko yāti deveśa kiṁ karomi jagatpate

'हे निष्पाप! उस पुत्र के कारण तुम्हारी कीर्ति विशाल हो गई है।' व्यास ने कहा — 'हे देवेश! शोक नहीं जाता, हे जगत्पते! मैं क्या करूँ?'

श्लोक 57 (devibhagavatam.1.19.57)

अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे । महादेव उवाच । छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम् ॥ 19.57 ॥

atṛpte locane me'dya putradarśanalālase mahādeva uvāca chāyāṁ drakṣyasi putrasya pārśvasthāṁ sumanoharām

'पुत्र-दर्शन की लालसा से आज मेरे नेत्र अतृप्त हैं।' महादेव ने कहा — 'तुम अपने पुत्र की अत्यंत मनोहर छाया अपने पार्श्व में स्थित देखोगे।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.1.19.58)

तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप । सूत उवाच । तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम् ॥ 19.58 ॥

tāṁ vīkṣya muniśārdūla śokaṁ jahi parantapa sūta uvāca tadā dadarśa vyāsastu chāyāṁ putrasya suprabhām

'हे मुनिशार्दूल! उसे देखकर, हे परन्तप! शोक त्याग दो।' सूत ने कहा — तब व्यास ने पुत्र की वह देदीप्यमान छाया देखी।

श्लोक 59 (devibhagavatam.1.19.59)

दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत । अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात् ॥ 19.59 ॥

dattvā varaṁ harastasmai tatraivāntaradhīyata antarhite mahādeve vyāsaḥ svāśramamabhyagāt

उन्हें यह वर देकर हर वहीं से अन्तर्धान हो गए; महादेव के अन्तर्धान होने पर व्यास अपने आश्रम को लौट गए,

श्लोक 60 (devibhagavatam.1.19.60)

शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः ॥ 19.60 ॥

śukasya viraheṇāpi taptaḥ paramaduḥkhitaḥ

— फिर भी शुक के वियोग से संतप्त, परम दुःखी होकर।

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