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प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8

आराध्य-निर्णय-वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (devibhagavatam.1.8.1)

ऋषय ऊचुः । सन्देहोऽत्र महाभाग कथायां तु महाद्भुतः । वेदशास्त्रपुराणैश्च निश्चितं तु सदा बुधैः ॥ 8.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sandeho'tra mahābhāga kathāyāṁ tu mahādbhutaḥ vedaśāstrapurāṇaiśca niścitaṁ tu sadā budhaiḥ

ऋषियों ने कहा — हे महाभाग! इस कथा में हमें एक महान आश्चर्यजनक संशय है — क्योंकि वेद, शास्त्र और पुराणों द्वारा विद्वानों में सदा यह निश्चित माना गया है —

श्लोक 2 (devibhagavatam.1.8.2)

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवाः सनातनाः । नातः परतरं किञ्चिद्ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महामते ॥ 8.2 ॥

brahmā viṣṇuśca rudraśca trayo devāḥ sanātanāḥ nātaḥ parataraṁ kiñcidbrahmāṇḍe'sminmahāmate

— कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, ये तीन सनातन देव ही सर्वोपरि हैं; हे महामते! इस ब्रह्माण्ड में इनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.1.8.3)

ब्रह्मा सृजति लोकान्वै विष्णुः पात्यखिलं जगत् । रुद्रः संहरते काले त्रय एतेऽत्र कारणम् ॥ 8.3 ॥

brahmā sṛjati lokānvai viṣṇuḥ pātyakhilaṁ jagat rudraḥ saṁharate kāle traya ete'tra kāraṇam

ब्रह्मा लोकों की रचना करते हैं, विष्णु सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं, रुद्र काल आने पर संहार करते हैं — ये तीनों ही यहाँ के कारण हैं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.1.8.4)

एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । रजःसत्त्वतमोभिश्च संयुताः कार्यकारकाः ॥ 8.4 ॥

ekā mūrtistrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ rajaḥsattvatamobhiśca saṁyutāḥ kāryakārakāḥ

एक ही स्वरूप, तीन देव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर — रज, सत्त्व और तम से युक्त होकर कार्य करने वाले हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.1.8.5)

तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः । आदिदेवो जगन्नाथः समर्थः सर्वकर्मसु ॥ 8.5 ॥

teṣāṁ madhye hariḥ śreṣṭho mādhavaḥ puruṣottamaḥ ādidevo jagannāthaḥ samarthaḥ sarvakarmasu

उनमें भी हरि श्रेष्ठ हैं, माधव, पुरुषोत्तम, आदिदेव, जगन्नाथ, समस्त कार्यों में समर्थ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.1.8.6)

नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति विष्णोरतुलतेजसः । स कथं स्वापितः स्वामी विवशो योगमायया ॥ 8.6 ॥

nānyaḥ ko'pi samartho'sti viṣṇoratulatejasaḥ sa kathaṁ svāpitaḥ svāmī vivaśo yogamāyayā

अतुल तेजस्वी विष्णु के समान समर्थ कोई और नहीं है; फिर वे स्वामी योगमाया द्वारा विवश होकर कैसे सुला दिए गए?

श्लोक 7 (devibhagavatam.1.8.7)

क्व गतं तस्य विज्ञानं जीवतश्चेष्टितं कुतः । सन्देहोऽयं महाभाग कथयस्व यथाशुभम् ॥ 8.7 ॥

kva gataṁ tasya vijñānaṁ jīvataśceṣṭitaṁ kutaḥ sandeho'yaṁ mahābhāga kathayasva yathāśubham

उनका ज्ञान कहाँ चला गया? जीवित रहते हुए भी यह चेष्टारहित अवस्था कहाँ से आई? हे महाभाग! यह हमारा संशय है, इसे यथोचित रूप से बताइए।

श्लोक 8 (devibhagavatam.1.8.8)

का सा शक्तिः पुरा प्रोक्ता यया विष्णुजितः प्रभुः । कुतो जाता कथं शक्ता का शक्तिर्वद सुव्रत ॥ 8.8 ॥

kā sā śaktiḥ purā proktā yayā viṣṇujitaḥ prabhuḥ kuto jātā kathaṁ śaktā kā śaktirvada suvrata

पहले जो शक्ति बताई गई, जिसके द्वारा प्रभु विष्णु पराजित हुए — वह शक्ति कहाँ से उत्पन्न हुई, कैसे इतनी समर्थ है? हे सुव्रत! वह शक्ति क्या है, बताइए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.1.8.9)

यस्तु सर्वेश्वरो विष्णुर्वासुदेवो जगद्गुरुः । परमात्मा परानन्दः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥ 8.9 ॥

yastu sarveśvaro viṣṇurvāsudevo jagadguruḥ paramātmā parānandaḥ saccidānandavigrahaḥ

जो विष्णु सर्वेश्वर, वासुदेव, जगद्गुरु, परमात्मा, परानन्द, सच्चिदानन्दस्वरूप हैं,

श्लोक 10 (devibhagavatam.1.8.10)

सर्वकृत्सर्वभृत्स्रष्टा विरजः सर्वगः शुचिः । स कथं निद्रया नीतः परतन्त्रः परात्परः ॥ 8.10 ॥

sarvakṛtsarvabhṛtsraṣṭā virajaḥ sarvagaḥ śuciḥ sa kathaṁ nidrayā nītaḥ paratantraḥ parātparaḥ

— सर्वकर्ता, सर्वभर्ता, स्रष्टा, रजोगुण से रहित, सर्वव्यापी, पवित्र — वे परात्पर कैसे निद्रा द्वारा पराधीन बना दिए गए?

श्लोक 11 (devibhagavatam.1.8.11)

एतदाश्चर्यभूतो हि सन्देहो नः परन्तप । छिन्धि ज्ञानासिना सूत व्यासशिष्य महामते ॥ 8.11 ॥

etadāścaryabhūto hi sandeho naḥ parantapa chindhi jñānāsinā sūta vyāsaśiṣya mahāmate

हे परन्तप! यह हमारा आश्चर्यजनक संशय है; हे सूत! हे व्यास-शिष्य! हे महामते! इसे ज्ञान-खड्ग से काट दीजिए।

श्लोक 12 (devibhagavatam.1.8.12)

सूत उवाच । कः सन्देहं भिनत्त्येनं त्रैलोक्ये सचराचरे । मुह्यन्ति मुनयः कामं ब्रह्मपुत्राः सनातनाः ॥ 8.12 ॥

sūta uvāca kaḥ sandehaṁ bhinattyenaṁ trailokye sacarācare muhyanti munayaḥ kāmaṁ brahmaputrāḥ sanātanāḥ

सूत ने कहा — इस त्रैलोक्य में, चराचर सहित, इस संशय को कौन दूर कर सकता है? सनातन ब्रह्मपुत्र मुनिगण भी इसमें अत्यंत मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.1.8.13)

नारदः कपिलश्चैव प्रश्नेऽस्मिन्मुनिसत्तमाः । किं ब्रवीमि महाभागा दुर्घटेऽस्मिन्विमर्शने ॥ 8.13 ॥

nāradaḥ kapilaścaiva praśne'sminmunisattamāḥ kiṁ bravīmi mahābhāgā durghaṭe'sminvimarśane

हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रश्न में नारद और कपिल भी मोहित हो जाते हैं; हे महाभागो! इस दुर्घट विमर्श में मैं क्या कहूँ?

श्लोक 14 (devibhagavatam.1.8.14)

देवेषु विष्णुः कथितः सर्वगः सर्वपालकः । यतो विराडिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम् ॥ 8.14 ॥

deveṣu viṣṇuḥ kathitaḥ sarvagaḥ sarvapālakaḥ yato virāḍidaṁ sarvamutpannaṁ sacarācaram

देवों में विष्णु को सर्वव्यापी, सर्वपालक कहा गया है, क्योंकि उस विराट पुरुष से ही यह सम्पूर्ण चराचर उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.1.8.15)

ते सर्वे समुपासन्ते नत्वा देवं परात्परम् । नारायणं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम् ॥ 8.15 ॥

te sarve samupāsante natvā devaṁ parātparam nārāyaṇaṁ hṛṣīkeśaṁ vāsudevaṁ janārdanam

वे सब उस परात्पर देव को नमस्कार करके उनकी उपासना करते हैं — नारायण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन।

श्लोक 16 (devibhagavatam.1.8.16)

तथा केचिन्महादेवं शङ्करं शशिशेखरम् । त्रिनेत्रं पञ्चवक्त्रं च शूलपाणिं वृषध्वजम् ॥ 8.16 ॥

tathā kecinmahādevaṁ śaṅkaraṁ śaśiśekharam trinetraṁ pañcavaktraṁ ca śūlapāṇiṁ vṛṣadhvajam

और कुछ लोग महादेव, शंकर, शशिशेखर की उपासना करते हैं — त्रिनेत्र, पंचमुख, शूलपाणि, वृषभध्वज।

श्लोक 17 (devibhagavatam.1.8.17)

तथा वेदेषु सर्वेषु गीतं नाम्ना त्रियम्बकम् । कपर्दिनं पञ्चवक्त्रं गौरीदेहार्धधारिणम् ॥ 8.17 ॥

tathā vedeṣu sarveṣu gītaṁ nāmnā triyambakam kapardinaṁ pañcavaktraṁ gaurīdehārdhadhāriṇam

और सभी वेदों में जिनका नाम त्र्यंबक कहकर गान किया गया है — जटाजूटधारी, पंचमुख, गौरी की देह का आधा भाग धारण करने वाले —

श्लोक 18 (devibhagavatam.1.8.18)

कैलासवासनिरतं सर्वशक्तिसमन्वितम् । भूतवृन्दयुतं देवं दक्षयज्ञविघातकम् ॥ 8.18 ॥

kailāsavāsanirataṁ sarvaśaktisamanvitam bhūtavṛndayutaṁ devaṁ dakṣayajñavighātakam

— कैलास-वास में रत, समस्त शक्तियों से युक्त, भूत-गणों से घिरे, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले उस देव की।

श्लोक 19 (devibhagavatam.1.8.19)

तथा सूर्यं वेदविदः सायम्प्रातर्दिने दिने । मध्याह्ने तु महाभागाः स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः ॥ 8.19 ॥

tathā sūryaṁ vedavidaḥ sāyamprātardine dine madhyāhne tu mahābhāgāḥ stuvanti vividhaiḥ stavaiḥ

वेदज्ञ महाभाग प्रतिदिन सायं, प्रातः और मध्याह्न में विविध स्तोत्रों से सूर्य की भी स्तुति करते हैं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.1.8.20)

तथा वेदेषु सर्वेषु सूर्योपासनमुत्तमम् । परमात्मेति विख्यातं नाम तस्य महात्मनः ॥ 8.20 ॥

tathā vedeṣu sarveṣu sūryopāsanamuttamam paramātmeti vikhyātaṁ nāma tasya mahātmanaḥ

और सभी वेदों में सूर्य की उपासना को उत्तम माना गया है; उस महात्मा का 'परमात्मा' नाम प्रसिद्ध है।

श्लोक 21 (devibhagavatam.1.8.21)

अग्निः सर्वत्र वेदेषु संस्तुतो वेदवित्तमैः । इन्द्रश्चापि त्रिलोकेशो वरुणश्च तथापरः ॥ 8.21 ॥

agniḥ sarvatra vedeṣu saṁstuto vedavittamaiḥ indraścāpi trilokeśo varuṇaśca tathāparaḥ

अग्नि की भी वेदों में सर्वत्र वेदज्ञों द्वारा स्तुति की गई है; तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र की भी, तथा उसी प्रकार वरुण की भी।

श्लोक 22 (devibhagavatam.1.8.22)

यथा गङ्गा प्रवाहैश्च बहुभिः परिवर्तते । तथैव सर्वदेवेषु विष्णुः प्रोक्तो महर्षिभिः ॥ 8.22 ॥

yathā gaṅgā pravāhaiśca bahubhiḥ parivartate tathaiva sarvadeveṣu viṣṇuḥ prokto maharṣibhiḥ

जैसे गंगा अनेक धाराओं से बहती हुई भी एक ही रहती है, वैसे ही सभी देवों में विष्णु ही महर्षियों द्वारा कहे गए हैं।

श्लोक 23 (devibhagavatam.1.8.23)

त्रीण्येव हि प्रमाणानि पठितानि सुपण्डितैः । प्रत्यक्षं चानुमानं च शाब्दं चैव तृतीयकम् ॥ 8.23 ॥

trīṇyeva hi pramāṇāni paṭhitāni supaṇḍitaiḥ pratyakṣaṁ cānumānaṁ ca śābdaṁ caiva tṛtīyakam

सुपंडितों द्वारा केवल तीन ही प्रमाण पढ़ाए गए हैं — प्रत्यक्ष, अनुमान, तथा तीसरा शब्द (आगम)।

श्लोक 24 (devibhagavatam.1.8.24)

चत्वार्येवेतरे प्राहुरुपमानयुतानि च । अर्थापत्तियुतान्यन्ये पञ्च प्राहुर्महाधियः ॥ 8.24 ॥

catvāryevetare prāhurupamānayutāni ca arthāpattiyutānyanye pañca prāhurmahādhiyaḥ

अन्य विद्वान उपमान सहित चार बताते हैं; महाबुद्धिमान अन्य विद्वान अर्थापत्ति सहित पाँच बताते हैं।

श्लोक 25 (devibhagavatam.1.8.25)

सप्त पौराणिकाश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः । एतैः प्रमाणैर्दुर्ज्ञेयं यद्ब्रह्म परमं च तत् ॥ 8.25 ॥

sapta paurāṇikāścaiva pravadanti manīṣiṇaḥ etaiḥ pramāṇairdurjñeyaṁ yadbrahma paramaṁ ca tat

पौराणिक विद्वान सात प्रमाण बताते हैं; परन्तु उन प्रमाणों से भी वह परम ब्रह्म दुर्ज्ञेय ही है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.1.8.26)

वितर्कश्चात्र कर्तव्यो बुद्।ह्ध्या चैवागमेन च । निश्चयात्मिकया युक्त्या विचार्य च पुनः पुनः ॥ 8.26 ॥

vitarkaścātra kartavyo bud|hdhyā caivāgamena ca niścayātmikayā yuktyā vicārya ca punaḥ punaḥ

यहाँ बुद्धि और आगम दोनों से तर्क करना चाहिए, निश्चयात्मक युक्ति से और बार-बार विचार करके।

श्लोक 27 (devibhagavatam.1.8.27)

प्रत्यक्षतस्तु विज्ञानं चिन्त्यं मतिमता सदा । दृष्टान्तेनापि सततं शिष्टमार्गानुसारिणा ॥ 8.27 ॥

pratyakṣatastu vijñānaṁ cintyaṁ matimatā sadā dṛṣṭāntenāpi satataṁ śiṣṭamārgānusāriṇā

बुद्धिमान को सदा प्रत्यक्ष ज्ञान का चिन्तन करना चाहिए, और शिष्ट मार्ग का अनुसरण करते हुए निरन्तर दृष्टान्तों से भी।

श्लोक 28 (devibhagavatam.1.8.28)

विद्वांसोऽपि वदन्त्येवं पुराणैः परिगीयते । द्रुहिणे सृष्टिशक्तिश्च हरौ पालनशक्तिता ॥ 8.28 ॥

vidvāṁso'pi vadantyevaṁ purāṇaiḥ parigīyate druhiṇe sṛṣṭiśaktiśca harau pālanaśaktitā

विद्वान भी ऐसा ही कहते हैं, और पुराणों में भी यह गाया गया है — ब्रह्मा में सृष्टि-शक्ति है, हरि में पालन-शक्ति है,

श्लोक 29 (devibhagavatam.1.8.29)

हरे संहारशक्तिश्च सूर्ये शक्तिः प्रकाशिका । धराधरणशक्तिश्च शेषे कूर्मे तथैव च ॥ 8.29 ॥

hare saṁhāraśaktiśca sūrye śaktiḥ prakāśikā dharādharaṇaśaktiśca śeṣe kūrme tathaiva ca

हर में संहार-शक्ति है, सूर्य में प्रकाश-शक्ति है; पृथ्वी को धारण करने की शक्ति शेष में है, और उसी प्रकार कूर्म में भी।

श्लोक 30 (devibhagavatam.1.8.30)

साद्या शक्तिः परिणता सर्वस्मिन्या प्रतिष्ठिता । दाहशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे प्रेरणात्मिका ॥ 8.30 ॥

sādyā śaktiḥ pariṇatā sarvasminyā pratiṣṭhitā dāhaśaktistathā vahnau samīre preraṇātmikā

वही आद्या शक्ति परिणत होकर सर्वत्र प्रतिष्ठित है — जलाने की शक्ति उसी प्रकार अग्नि में है, प्रेरणा-शक्ति वायु में है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.1.8.31)

शिवोऽपि शवतां याति कुण्डलिन्या विवर्जितः । शक्तिहीनस्तु यः कश्चिदसमर्थः स्मृतो बुधैः ॥ 8.31 ॥

śivo'pi śavatāṁ yāti kuṇḍalinyā vivarjitaḥ śaktihīnastu yaḥ kaścidasamarthaḥ smṛto budhaiḥ

कुण्डलिनी से रहित होकर शिव भी शव-तुल्य हो जाते हैं; जो भी शक्तिहीन है, वह विद्वानों द्वारा असमर्थ माना गया है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.1.8.32)

एवं सर्वत्र भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महातपाः ॥ 8.32 ॥

evaṁ sarvatra bhūteṣu sthāvareṣu careṣu ca brahmādistambaparyantaṁ brahmāṇḍe'sminmahātapāḥ

हे महातपस्वियो! इसी प्रकार सर्वत्र, स्थावर और चर सभी प्राणियों में, इस ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा से लेकर तृण तक, यही सत्य है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.1.8.33)

शक्तिहीनं तु निन्द्यं स्याद्वस्तुमात्रं चराचरम् । अशक्तः शत्रुविजये गमने भोजने तथा ॥ 8.33 ॥

śaktihīnaṁ tu nindyaṁ syādvastumātraṁ carācaram aśaktaḥ śatruvijaye gamane bhojane tathā

चर या अचर, जो भी वस्तु शक्तिहीन है, वह निन्दनीय है — शत्रु-विजय में, गमन में, तथा भोजन में भी वह असमर्थ रहता है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.1.8.34)

एवं सर्वगता शक्तिः सा ब्रह्मेति विविच्यते । सोपास्या विविधैः सम्यग्विचार्या सुधिया सदा ॥ 8.34 ॥

evaṁ sarvagatā śaktiḥ sā brahmeti vivicyate sopāsyā vividhaiḥ samyagvicāryā sudhiyā sadā

इस प्रकार सर्वव्यापी वह शक्ति ही ब्रह्म है, ऐसा विवेचित होता है; उसी की सम्यक उपासना करनी चाहिए, और सुबुद्धिमान को सदा उसी का विचार करना चाहिए।

श्लोक 35 (devibhagavatam.1.8.35)

विष्णौ च सात्त्विकी शक्तिस्तया हीनोऽप्यकर्मकृत् । द्रुहिणे राजसी शक्तिर्यया हीनो ह्यसृष्टिकृत् ॥ 8.35 ॥

viṣṇau ca sāttvikī śaktistayā hīno'pyakarmakṛt druhiṇe rājasī śaktiryayā hīno hyasṛṣṭikṛt

विष्णु में सात्त्विकी शक्ति है — उसके बिना वे भी कर्महीन हो जाएँ; ब्रह्मा में राजसी शक्ति है — जिसके बिना वे सृष्टि नहीं कर सकते।

श्लोक 36 (devibhagavatam.1.8.36)

शिवे च तामसी शक्तिस्तया संहारकारकः । इत्यूह्यं मनसा सर्वं विचार्य च पुनः पुनः ॥ 8.36 ॥

śive ca tāmasī śaktistayā saṁhārakārakaḥ ityūhyaṁ manasā sarvaṁ vicārya ca punaḥ punaḥ

शिव में तामसी शक्ति है — उसी से वे संहारकर्ता बनते हैं। यह सब मन से बार-बार विचार करके समझना चाहिए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.1.8.37)

शक्तिः करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयतेऽखिलम् । इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम् ॥ 8.37 ॥

śaktiḥ karoti brahmāṇḍaṁ sā vai pālayate'khilam icchayā saṁharatyeṣā jagadetaccarācaram

शक्ति ही ब्रह्माण्ड की रचना करती है, वही सम्पूर्ण जगत का पालन करती है, और अपनी इच्छा से ही वह इस चराचर जगत का संहार करती है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.1.8.38)

न विष्णुर्न हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः । न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन ॥ 8.38 ॥

na viṣṇurna haraḥ śakro na brahmā na ca pāvakaḥ na sūryo varuṇaḥ śaktaḥ sve sve kārye kathañcana

न विष्णु, न हर, न इन्द्र, न ब्रह्मा, न अग्नि; न सूर्य, न वरुण — अपने-अपने कार्य में कोई भी उसके बिना समर्थ नहीं है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.1.8.39)

तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः । सैव कारणकार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ 8.39 ॥

tayā yuktā hi kurvanti svāni kāryāṇi te surāḥ saiva kāraṇakāryeṣu pratyakṣeṇāvagamyate

उससे युक्त होकर ही वे देवगण अपने-अपने कार्य करते हैं; वही कार्य-कारण सम्बन्धों में प्रत्यक्ष रूप से जानी जाती है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.1.8.40)

सगुणा निर्गुणा सा तु द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः । सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः ॥ 8.40 ॥

saguṇā nirguṇā sā tu dvidhā proktā manīṣibhiḥ saguṇā rāgibhiḥ sevyā nirguṇā tu virāgibhiḥ

विद्वानों ने उसे दो प्रकार का कहा है — सगुण और निर्गुण; सगुण रूप रागियों द्वारा सेव्य है, निर्गुण रूप वैरागियों द्वारा।

श्लोक 41 (devibhagavatam.1.8.41)

धर्मार्थकाममोक्षाणां स्वामिनी सा निराकुला । ददाति वाच्छितान्कामान्पूजिता विधिपूर्वकम् ॥ 8.41 ॥

dharmārthakāmamokṣāṇāṁ svāminī sā nirākulā dadāti vācchitānkāmānpūjitā vidhipūrvakam

वे सदा शान्त रहते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की स्वामिनी हैं; विधिपूर्वक पूजित होने पर वे अभीष्ट कामनाओं को प्रदान करती हैं।

श्लोक 42 (devibhagavatam.1.8.42)

न जानन्ति जना मूढास्तां सदा माययावृताः । जानन्तोऽपि नराः केचिन्मोहयन्ति परानपि ॥ 8.42 ॥

na jānanti janā mūḍhāstāṁ sadā māyayāvṛtāḥ jānanto'pi narāḥ kecinmohayanti parānapi

उन्हीं की माया से सदा आवृत, मूर्ख लोग उन्हें नहीं जानते; और कुछ मनुष्य जानते हुए भी दूसरों को मोहित करते हैं।

श्लोक 43 (devibhagavatam.1.8.43)

पण्डिताः स्वोदरार्थं वै पाखण्डानि पूथक्पृथक् । प्रवर्तयन्ति कलिना प्रेरिता मन्दचेतसः ॥ 8.43 ॥

paṇḍitāḥ svodarārthaṁ vai pākhaṇḍāni pūthakpṛthak pravartayanti kalinā preritā mandacetasaḥ

मन्दबुद्धि पंडित लोग अपने ही उदर-पोषण के लिए, कलियुग से प्रेरित होकर, तरह-तरह के पाखण्ड चलाते रहते हैं।

श्लोक 44 (devibhagavatam.1.8.44)

कलावस्मिन्महाभागा नानाभेदसमुत्थिताः । नान्ये युगे तथा धर्मा वेदबाह्याः कथञ्चन ॥ 8.44 ॥

kalāvasminmahābhāgā nānābhedasamutthitāḥ nānye yuge tathā dharmā vedabāhyāḥ kathañcana

हे महाभागो! इस कलियुग में नाना भेद उत्पन्न हुए हैं; अन्य युगों में वेद-बाह्य धर्म इस प्रकार कभी नहीं होते।

श्लोक 45 (devibhagavatam.1.8.45)

विष्णुश्चरत्यसावुग्र तपो वर्षाण्यनेकशः । ब्रह्मा हरस्त्रयो देवा ध्यायन्तः कमपि धुवम् ॥ 8.45 ॥

viṣṇuścaratyasāvugra tapo varṣāṇyanekaśaḥ brahmā harastrayo devā dhyāyantaḥ kamapi dhuvam

विष्णु स्वयं अनेक वर्षों तक उग्र तप करते हैं; ब्रह्मा और हर — ये तीनों देव किसी अन्य [उच्चतर सत्ता] का ही निरन्तर ध्यान करते हैं।

श्लोक 46 (devibhagavatam.1.8.46)

कामयानाः सदा कामं ते त्रयः सर्वदैव हि । यजन्ति यज्ञान्विविधान्ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ 8.46 ॥

kāmayānāḥ sadā kāmaṁ te trayaḥ sarvadaiva hi yajanti yajñānvividhānbrahmaviṣṇumaheśvarāḥ

सदा किसी न किसी कामना से युक्त होकर वे तीनों — ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर — विविध यज्ञों का यजन करते हैं।

श्लोक 47 (devibhagavatam.1.8.47)

ते वै शक्तिं परां देवीं ब्रह्माख्यां परमात्मिकाम् । ध्यायन्ति मनसा नित्यं नित्यां मत्वा सनातनीम् ॥ 8.47 ॥

te vai śaktiṁ parāṁ devīṁ brahmākhyāṁ paramātmikām dhyāyanti manasā nityaṁ nityāṁ matvā sanātanīm

वे निश्चय ही उस परम शक्ति, ब्रह्म नामक परमात्मस्वरूपा देवी का, उन्हें नित्य-सनातन मानकर, सदा मन से ध्यान करते हैं।

श्लोक 48 (devibhagavatam.1.8.48)

तस्माच्छक्तिः सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः । निश्चयः सर्वशास्त्राणां ज्ञातव्यो मुनिसत्तमाः ॥ 8.48 ॥

tasmācchaktiḥ sadā sevyā vidvadbhiḥ kṛtaniścayaiḥ niścayaḥ sarvaśāstrāṇāṁ jñātavyo munisattamāḥ

इसलिए दृढ़निश्चयी विद्वानों द्वारा शक्ति की ही सदा उपासना करनी चाहिए; हे मुनिश्रेष्ठो! समस्त शास्त्रों का यही निश्चित निष्कर्ष जानना चाहिए।

श्लोक 49 (devibhagavatam.1.8.49)

कृष्णाच्छ्रुतं मया चैतत्तेन ज्ञातं तु नारदात् । पितुः सकाशात्तेनापि ब्रह्मणा विष्णुवाक्यतः ॥ 8.49 ॥

kṛṣṇācchrutaṁ mayā caitattena jñātaṁ tu nāradāt pituḥ sakāśāttenāpi brahmaṇā viṣṇuvākyataḥ

यह मैंने कृष्ण (द्वैपायन) से सुना, और उन्होंने नारद से जाना; और वे अपने पिता (ब्रह्मा) से, तथा ब्रह्मा ने विष्णु के वचन से।

श्लोक 50 (devibhagavatam.1.8.50)

न श्रोतव्यं न मन्तव्यमन्येषां वचनं बुधैः । शक्तिरेव सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः ॥ 8.50 ॥

na śrotavyaṁ na mantavyamanyeṣāṁ vacanaṁ budhaiḥ śaktireva sadā sevyā vidvadbhiḥ kṛtaniścayaiḥ

विद्वानों को अन्य किसी का वचन न सुनना चाहिए, न मानना चाहिए; दृढ़निश्चयी विद्वानों द्वारा शक्ति की ही सदा उपासना करनी चाहिए।

श्लोक 51 (devibhagavatam.1.8.51)

प्रत्यक्षमपि द्रष्टव्यमशक्तस्य विचेष्टितम् । अतः सर्वेषु भूतेषु ज्ञातव्या शक्तिरेव हि ॥ 8.51 ॥

pratyakṣamapi draṣṭavyamaśaktasya viceṣṭitam ataḥ sarveṣu bhūteṣu jñātavyā śaktireva hi

शक्तिहीन की चेष्टा भी प्रत्यक्ष देखी जा सकती है; इसलिए समस्त प्राणियों में केवल शक्ति को ही [वास्तविक सत्ता] जानना चाहिए।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9