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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5

श्रीगायत्रीस्तोत्रवर्णनम्

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (devibhagavatam.12.5.1)

नारद उवाव भक्तानुकम्पिन् सर्वज्ञ हृदयं पापनाशनम् । गायत्र्याः कथितं तस्माद्गायत्र्याः स्तोत्रमीरय

nārada uvāva bhaktānukampin sarvajña hṛdayaṁ pāpanāśanam gāyatryāḥ kathitaṁ tasmādgāyatryāḥ stotramīraya

नारद जी ने कहा — हे भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले! हे सर्वज्ञ! आपने गायत्री का पापनाशक हृदय कह दिया; अब उसी प्रकार गायत्री का स्तोत्र भी कहिए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.12.5.2)

श्रीनारायण उवाच । आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि । सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसन्ध्ये ते नमोऽस्तु ते

śrīnārāyaṇa uvāca ādiśakte jaganmātarbhaktānugrahakāriṇi sarvatra vyāpike'nante śrīsandhye te namo'stu te

श्री नारायण ने कहा — हे आदिशक्ति! हे जगन्माता! हे भक्तों पर अनुग्रह करने वाली! हे सर्वत्र व्याप्त! हे अनन्ते! हे श्रीसन्ध्या! तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.12.5.3)

त्वमेव सन्ध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती । बाह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा

tvameva sandhyā gāyatrī sāvitrī ca sarasvatī bāhmī ca vaiṣṇavī raudrī raktā śvetā sitetarā

तुम ही सन्ध्या, गायत्री, सावित्री और सरस्वती हो; तुम ही ब्राह्मी, वैष्णवी और रौद्री हो; तुम लाल, श्वेत और श्वेत से भिन्न (श्याम) वर्ण वाली हो।

श्लोक 4 (devibhagavatam.12.5.4)

प्रातर्बाला च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः । वृद्धा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा

prātarbālā ca madhyāhne yauvanasthā bhavetpunaḥ vṛddhā sāyaṁ bhagavatī cintyate munibhiḥ sadā

प्रातःकाल तुम बाला हो, मध्याह्न में पुनः युवावस्था को प्राप्त होती हो, और हे भगवती! सायंकाल तुम्हें मुनिजन सदा वृद्धा रूप में ध्याते हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.12.5.5)

हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहिनी । ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः

haṁsasthā garuḍārūḍhā tathā vṛṣabhavāhinī ṛgvedādhyāyinī bhūmau dṛśyate yā tapasvibhiḥ

हंस पर बैठी, गरुड़ पर आरूढ़, तथा वृषभ पर सवार होकर, ऋग्वेद का अध्ययन करती हुई तुम पृथ्वी पर तपस्वियों द्वारा देखी जाती हो।

श्लोक 6 (devibhagavatam.12.5.6)

यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते । सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि

yajurvedaṁ paṭhantī ca antarikṣe virājate sā sāmagāpi sarveṣu bhrāmyamāṇā tathā bhuvi

यजुर्वेद का पाठ करती हुई तुम अन्तरिक्ष में विराजमान होती हो; और सामवेद गाने वाली होकर भी तुम सर्वत्र पृथ्वी पर घूमती रहती हो।

श्लोक 7 (devibhagavatam.12.5.7)

रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी

rudralokaṁ gatā tvaṁ hi viṣṇulokanivāsinī tvameva brahmaṇo loke'martyānugrahakāriṇī

तुम रुद्रलोक को भी प्राप्त होती हो और विष्णुलोक में भी निवास करती हो; तुम ही ब्रह्मा के लोक में अमरों पर अनुग्रह करने वाली हो।

श्लोक 8 (devibhagavatam.12.5.8)

सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा । शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा

saptarṣiprītijananī māyā bahuvarapradā śivayoḥ karanetrotthā hyaśrusvedasamudbhavā

तुम सप्तर्षियों को प्रसन्न करने वाली, माया-स्वरूपा, अनेक वर देने वाली हो; तुम शिव-शिवा के हाथों और नेत्रों से उत्पन्न, उनके अश्रु और स्वेद से प्रकट हुई हो।

श्लोक 9 (devibhagavatam.12.5.9)

आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपढ्यते । वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरवर्णिनी

ānandajananī durgā daśadhā paripaḍhyate vareṇyā varadā caiva variṣṭhā varavarṇinī

आनन्द को जन्म देने वाली दुर्गा दस प्रकार से पढ़ी जाती हैं — वरेण्या, वरदा, वरिष्ठा और वरवर्णिनी,

श्लोक 10 (devibhagavatam.12.5.10)

गरिष्ठा च वरार्हा च वरारोहा च सप्तमी । नीलगङ्गा तथा सन्ध्या सर्वदा भोगमोक्षदा

gariṣṭhā ca varārhā ca varārohā ca saptamī nīlagaṅgā tathā sandhyā sarvadā bhogamokṣadā

गरिष्ठा, वरार्हा, तथा सातवीं वरारोहा, नीलगंगा और सन्ध्या — ये सदा भोग और मोक्ष दोनों देने वाली हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.12.5.11)

भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि । त्रिलोकवाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी

bhāgīrathī martyaloke pātāle bhogavatyapi trilokavāhinī devī sthānatrayanivāsinī

मृत्युलोक में तुम भागीरथी (गंगा) हो, पाताल में भोगवती हो; हे देवी! तुम तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली, तीनों स्थानों में निवास करने वाली हो।

श्लोक 12 (devibhagavatam.12.5.12)

भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री लोकधारिणी । भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः

bhūrlokasthā tvamevāsi dharitrī lokadhāriṇī bhuvo loke vāyuśaktiḥ svarloke tejasāṁ nidhiḥ

भूर्लोक में स्थित तुम ही लोकों को धारण करने वाली पृथ्वी हो; भुवर्लोक में तुम वायु-शक्ति हो, स्वर्लोक में तेजों की निधि हो।

श्लोक 13 (devibhagavatam.12.5.13)

महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि । तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक्

maharloke mahāsiddhirjanaloke janetyapi tapasvinī tapoloke satyaloke tu satyavāk

महर्लोक में तुम महासिद्धि हो, जनलोक में जना कहलाती हो; तपोलोक में तपस्विनी हो, और सत्यलोक में सत्यवाक् हो।

श्लोक 14 (devibhagavatam.12.5.14)

कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकदा । रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धाङ्गनिवासिनी

kamalā viṣṇuloke ca gāyatrī brahmalokadā rudraloke sthitā gaurī harārdhāṅganivāsinī

विष्णुलोक में तुम कमला हो, गायत्री रूप में ब्रह्मलोक देने वाली हो; रुद्रलोक में स्थित तुम गौरी हो, हर के आधे अंग में निवास करने वाली।

श्लोक 15 (devibhagavatam.12.5.15)

अहमो महतश्चैव प्रकृतिस्त्वं हि गीयसे । साम्यावस्थात्मिका त्वं हि शबलब्रह्मरूपिणी

ahamo mahataścaiva prakṛtistvaṁ hi gīyase sāmyāvasthātmikā tvaṁ hi śabalabrahmarūpiṇī

तुम्हें ही अहंकार और महत्तत्त्व तथा प्रकृति कहा जाता है; गुणों की साम्यावस्थारूपा तुम ही शबल ब्रह्म का स्वरूप हो।

श्लोक 16 (devibhagavatam.12.5.16)

ततः परा परा शक्तिः परमा त्वं हि गीयसे । इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्रिशक्तिदा

tataḥ parā parā śaktiḥ paramā tvaṁ hi gīyase icchāśaktiḥ kriyāśaktirjñānaśaktistriśaktidā

उससे भी परे तुम्हें परमा शक्ति कहा जाता है; तुम इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति — इन तीनों शक्तियों को देने वाली हो।

श्लोक 17 (devibhagavatam.12.5.17)

गङ्गा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती । सरयूर्देविका सिन्धुर्नर्मदैरावती तथा

gaṅgā ca yamunā caiva vipāśā ca sarasvatī sarayūrdevikā sindhurnarmadairāvatī tathā

गंगा, यमुना, विपाशा (व्यास), सरस्वती, सरयू, देविका, सिन्धु, नर्मदा तथा ऐरावती —

श्लोक 18 (devibhagavatam.12.5.18)

गोदावरी शतद्रूश्च कावेरी देवलोकगा । कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती

godāvarī śatadrūśca kāverī devalokagā kauśikī candrabhāgā ca vitastā ca sarasvatī

गोदावरी, शतद्रु (सतलज), कावेरी, देवलोकगा, कौशिकी, चन्द्रभागा और वितस्ता तथा सरस्वती —

श्लोक 19 (devibhagavatam.12.5.19)

गण्डकी तापिनी तोया गोमती वेत्रवत्यपि । इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका

gaṇḍakī tāpinī toyā gomatī vetravatyapi iḍā ca piṅgalā caiva suṣumṇā ca tṛtīyakā

गण्डकी, तापिनी, तोया, गोमती, वेत्रवती भी, तथा इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्णा —

श्लोक 20 (devibhagavatam.12.5.20)

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषापूषा तथैव च । अलम्बुषा कुहूश्चैव शङ्खिनी प्राणवाहिनी

gāndhārī hastijihvā ca pūṣāpūṣā tathaiva ca alambuṣā kuhūścaiva śaṅkhinī prāṇavāhinī

गान्धारी, हस्तिजिह्वा, तथा पूषा, अलम्बुषा, कुहू, शंखिनी और प्राणवाहिनी नाड़ी —

श्लोक 21 (devibhagavatam.12.5.21)

नाडी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैर्बुधैः । हृत्पद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका

nāḍī ca tvaṁ śarīrasthā gīyase prāktanairbudhaiḥ hṛtpadmasthā prāṇaśaktiḥ kaṇṭhasthā svapnanāyikā

तुम ही शरीर में स्थित नाड़ी के रूप में प्राचीन विद्वानों द्वारा गाई जाती हो; हृदय-कमल में स्थित तुम प्राणशक्ति हो, कण्ठ में स्थित तुम स्वप्न की स्वामिनी हो।

श्लोक 22 (devibhagavatam.12.5.22)

तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी । मूले तु कुण्डलीशक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा

tālusthā tvaṁ sadādhārā bindusthā bindumālinī mūle tu kuṇḍalīśaktirvyāpinī keśamūlagā

तालु में स्थित तुम सदा आधाररूपा हो, बिन्दु में स्थित तुम बिन्दुमालिनी हो; मूल में तुम कुण्डलिनी-शक्ति हो, सर्वव्यापिनी होकर केशमूल में भी स्थित हो।

श्लोक 23 (devibhagavatam.12.5.23)

शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रे तु मनोन्मनी । किमन्यद्बहुनोक्तेन यत्किञ्चिज्जगतीत्रये

śikhāmadhyāsanā tvaṁ hi śikhāgre tu manonmanī kimanyadbahunoktena yatkiñcijjagatītraye

तुम शिखा के मध्य में विराजमान हो, और शिखा के अग्रभाग में मनोन्मनी हो। अधिक कहने से क्या लाभ — तीनों लोकों में जो कुछ भी है,

श्लोक 24 (devibhagavatam.12.5.24)

तत्सर्वं त्वं महादेवि श्रिये सन्ध्ये नमोऽस्तु ते । इतीदं कीर्तितं स्तोत्रं सन्ध्यायां बहुपुण्यदम्

tatsarvaṁ tvaṁ mahādevi śriye sandhye namo'stu te itīdaṁ kīrtitaṁ stotraṁ sandhyāyāṁ bahupuṇyadam

हे महादेवि! वह सब तुम ही हो। हे श्रीसन्ध्ये! तुम्हें नमस्कार है। इस प्रकार यह स्तोत्र कहा गया, जो सन्ध्या के समय बहुत पुण्य देने वाला है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.12.5.25)

महापापप्रशमनं महासिद्धिविधायकम् । य इदं कीर्तयेत्स्तोत्रं सन्ध्याकाले समाहितः

mahāpāpapraśamanaṁ mahāsiddhividhāyakam ya idaṁ kīrtayetstotraṁ sandhyākāle samāhitaḥ

यह महापापों का शमन करने वाला और महासिद्धि प्रदान करने वाला है। जो कोई एकाग्रचित्त होकर सन्ध्या के समय इस स्तोत्र का कीर्तन करता है,

श्लोक 26 (devibhagavatam.12.5.26)

अपुत्रः प्राप्नुयात्युत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । सर्वतीर्थतपोदानयज्ञयोगफलं लभेत्

aputraḥ prāpnuyātyutraṁ dhanārthī dhanamāpnuyāt sarvatīrthatapodānayajñayogaphalaṁ labhet

पुत्रहीन पुत्र को प्राप्त कर लेता है, धन का इच्छुक धन पाता है; उसे समस्त तीर्थ, तप, दान, यज्ञ और योग का फल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.12.5.27)

भोगान्भुक्त्वा चिरं कालमन्ते मोक्षमवाप्नुयात् । तपस्विभिः कृतं स्तोत्रं स्नानकाले तु यः पठेत्

bhogānbhuktvā ciraṁ kālamante mokṣamavāpnuyāt tapasvibhiḥ kṛtaṁ stotraṁ snānakāle tu yaḥ paṭhet

वह दीर्घकाल तक भोगों को भोगकर अन्त में मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो स्नान के समय तपस्वियों द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करता है,

श्लोक 28 (devibhagavatam.12.5.28)

यत्र कुत्र जले मग्नः सन्ध्यामज्जनजं फलम् । लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं च नारद

yatra kutra jale magnaḥ sandhyāmajjanajaṁ phalam labhate nātra sandehaḥ satyaṁ satyaṁ ca nārada

चाहे वह कहीं भी जल में डूबा हो, उसे सन्ध्या-स्नान का ही फल प्राप्त होता है — इसमें संदेह नहीं है, हे नारद! यह सत्य है, सत्य है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.12.5.29)

शृणुयाद्योऽपि तद्भक्त्या स तु पापात्प्रमुच्यते । पीयूषसदृशं वाक्यं सन्ध्योक्तं नारदेरितम्

śṛṇuyādyo'pi tadbhaktyā sa tu pāpātpramucyate pīyūṣasadṛśaṁ vākyaṁ sandhyoktaṁ nāraderitam

जो कोई भी इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है। यह नारद द्वारा कहा गया सन्ध्या का वचन अमृत के समान है।

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